अनादिनाथ की माया

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अनादिनाथ सदाशिव की लीला बडी ही विचित्र है ,विचित्र मायानगरी का निर्माण करती है और यही मायानगरी, महामाया,प्रकृति यह ब्रह्माण्ड है। पौराणिक रूपक कथाएं मूर्त होकर ज्ञानी महात्माओं के मन मे भी घर कर गयी है भारतीय आध्यात्म जगत् मे एक भारी कमी विधमान हैa, यह कर्मकाण्ड और मुक्ति पूजा एवं उनकी विधियों का भण्डार बन गया है । और उन्हें विश्वास हुए है। कि वे सभी तैतींस करेंट देवी- देवतागण इस विशाल ब्रह्माण्ड के भिन्न भिन्न लोको मे रहते है ।a
साधक की तपस्या से प्रसन्न होकर वे आते है और वर देकर चले जाते है। किसी को यह भी विश्वास है ,कि कहीं पर क्षीर सागर है, जिसमे एक विशालकाय शेषनाग की कुड़ली पर विष्णु भगवान शयन करते है और लक्ष्मी जी उनके पैर कराती रहती है।s और वे भक्तों की पुकार सुनकर वे नंगे पांव दौडे चले आते है। इसी प्रकार शिव और देवताओं के बारे मे विश्वास है ।और यह विश्वास इतना प्रबल है, कि इन पर किसी प्रकार की चोट बर्दाश्त नही कर पाते है।
अनेक अन्धीआस्था मे डुबे  हुए अज्ञानता के अन्धकार मे विलोपित स्त्री पुरूषों को इससे चोट पहुंचती है! परन्तु यह वास्तविक सत्य यही हैs कि वे भारी भ्रम मे पडे हुए है यह सब वह नही है, जो वह समझ रहे है।  हमारे देवालयों परमात्मा नही होता मंदिर तो केवल यन्त्र मात्र है ,hजिससे ऊर्जा प्राप्त करके हम ऐश्वर्य वान बनते है ।जब हम किसी देवी देवता की साधना कर रहे होते है।
तो कण कण मे व्याप्त उसकी सुक्ष्म शक्तियों को अपने अन्दर एकत्र कर रहे है। यह हमारी शक्ति को बढाकर हमे दिव्य शक्तियों से सुसज्जित कर देती है ।और इसी का मानसिक प्रतिरूप हमारे सामने प्रकट होता है। इस मायानगरी की माया इतनी सबल हैo कि ज्ञानी महात्माओं के भी ज्ञान को हरण कर लेती हैh और उन्हें भ्रम के माया जाल मे भटकाती है। यह श्रीराम को भी विलाप करने पर विवश कर देती है और पराशर जैसे ऋषि को भी पशु बना देती है। 
 यह वह आधाशक्ति हुए, जिसकी धारा मे सभी बँधे है और इस बात से बेखबर होकर इस जादूनगरी मे भटक रहे है। कि मृत्यु का भयानक जबडा़ उन्हें अपने अन्दर खींचे जा रहा है । इसे समझये  कि जो सत्य को प्रकाशित करता है ,ज्ञान के रूप मे , सुत्रों एवं नियमो के रूप मे आपको प्राप्त होता है o। यह सभी कहते है कि तंत्र की उत्पत्ति सदाशिव से हुई है , लेकिन कोई नही जानना चाहता कि तंत्र क्या है। विधियाँ तंत्र नही है क्योंकि वे अनेक है, मंत्र भी तंत्र नही है क्योंकि वह भी अनेक है । फिर तंत्र क्या है?
सदाशिव से प्रकृति यानि आधाशक्ति की उत्पत्ति होती है , जिसकी माया से यह ब्रह्माण्ड का मायाजाल बनता है । इस मायाजाल मे ही सारे दैवी देवता विशेष बिन्दुओं मे निवास करते है , किन्तु यह मानवाकृति नही है। यहाँ लिंग और योनि का समागमन हो रहा है ।इससे ऊर्जा निकल रही है और यही ऊर्जा शक्ति है जिससे हमारा अस्तित्व है या इस ब्रह्माण्ड का अस्तित्व है यह एक व्यवस्थित ऊर्जा संरचना है। एक दूसरे से जुडा, खोल पर खोल चढाये यह पूरा ऊर्जा परिपथ जलती बुझती धाराओं  मे ऊर्जा का उत्पादन कर रहा है ।
यह नजारा अदभुत है ,तब यह और भी विस्मयकारी लगता है, जब इसकी धाराओ मे सदाशिव की ही लहरें दौडती दृष्टि गत होती है। यह सम्पूर्ण व्यवस्था कैसे उत्पन्न होती है कैसे विकसित होती है यह स्मरण रखिये वह परमात्मा, सदाशिव सब मे विधमान है ,उनसे उत्पन्न होने वाली शक्तियां सबमे व्याप्त रही। उनमें भी जो इनके बारे में जानते नही या निन्दा करने वाले है। kये केवल किसी समुदाय के ही परमात्मा नही है ,ये मच्छर और मछली के भी परमात्मा है।
पृथ्वी, सूर्य, और इस ब्रह्माण्ड सहित सभी ईकाईयों के भी परमात्मा है, यह एक विचित्र तत्त्व है और समस्त लीला इसी से इसी मे इसी के कारण इसी की इच्छा से चलती है उपनिषदों मे भी कहा गया है कि हम क्या बताये वह कैसा है। वैसा कुछ इस संसार मे नही है। वह निर्गुण है निराकार है अदभूत है उसमे चेतना नही है, क्योंकि चेतना भौतिक उत्पत्ति है ।उसकी लीला क्यो है, यह वही जानता है, अर्थात ब्रह्माण्ड और इसकी लीला की उत्पत्ति क्यो होती है, यह वही जानता है । वह सबका जीवनदाता है, सबका भाग्यविधाता है ।
वह अपनी तेज धाराओं से एक ऊर्जा वृक्ष बना रहा है और उस ऊर्जा वृक्ष मे विचित्र लीला चल रही है । सभी इकाइयाँ अपनी अलग अलग अनुभूतियों के मायाजाल मे भटक रही है । यह माया जो कुछ भी नही है ।केवल अनुभूतियों का संसार है, सभी को मोहक लगती है कि वे उसी मे लिप्त होकर संसार को भोगने मे लगे हुए है

हवन का महत्व



       फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमें उन्हें पता चला कि हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर ही किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है, तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है। जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है तथा वातावरण को शु्द्ध करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला।

गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है। टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया कि यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो, तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की। क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्ध होता है और जीवाणु नाश होता है ? अथवा नही ? 

उन्होंने ग्रंथों में वर्णिंत हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया कि ये हवन विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी एक किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए। पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी तो एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर 94 % कम हो गया।

यही नहीं उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजूद जीवाणुओं का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के २४ घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से ९६ प्रतिशत कम था। बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।

यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर 2007 में छप चुकी है। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।

अपने स्वजनों परिजनों को इस जानकारी से अवगत कराएँ । हवन करने से न सिर्फ भगवान ही खुश होते हैं, बल्कि घर की शुद्धि भी हो जाती है। भगवान सभी परिजनों को सुरक्षा एवं समृद्धि प्रदान करे। 

ॐ स्वस्ति: 🚩🚩🚩

दिनांक :- ३०.०३.२०२१
---#राज_सिंह---

Vedic science

शरीर मे प्राण और अपान


की गति निरन्तर बनी रहती है। ह्रदय से बाहर की ओर जाने वाली श्वाश को प्राण कहा जाता है।तथा बाहर से भीतर आने वाली श्वास को अपान कहा जाता है।

प्राण के निकल जाने पर मृत्यु होती है। तथा अपान के आने से जीवन मिलता है। इसलिए इस अपान को ही जीव कहा जाता है।

जब अपना अपानवायु भीतर प्रवेश करती है। तो ('ह' ) की ध्वनि होती है। तथा श्वास छोड़ते समय (स) की ध्वनि होती है। इस प्रकार ह और स का उच्चारण निरंतर होता रहता है। जिसे हम हंस गायत्री कहते है।

अपान से ही वोध होता है। कि शरीर मे जीवात्मा विद्यमान है। अपान के प्रवेश न करने पर शरीर शव हो जाता है। जब तक शरीर जीवित है। तब तक अपान और प्राण का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है।

यह कब तक चलता राहेगा तथा यह क्रम कब टूट जाएगा इसके विषय मे कुछ नही कहा जा सकता।

जिस प्रकार हकार में ह की आकृति टेढ़ी मेढ़ी होती है। उसी प्रकार यह जीव भी अपनी इच्छा से ही कुटिल घुमावदार आकृति धारण कर लेता है यह वक्रता परमेस्वर की स्वतंत्रत इच्छा शक्ति के कारण होती है।

यह वक्रता प्राणों में आती है। जीव में नही यह जीव प्राण शक्ति के भीतर सूक्ष्म रूप में रहता है। प्राण और अपान की समानता के कारण ही जीव को हंस कहा जाता है। अर्थात हंस की भांति उसमे नीर क्षीर का विवेक प्राप्त होता है।

ह्रदय रूपी आकाश में रहने वाली यह संबित शक्ति इन सबको उत्तपन करने वाली है। इसी को परादेवी कहा गया है। यही दीर्धात्मा तथा परापरा उसी का स्वरूप है। यही श्रेष्ट तीर्थभूमि है। हंस मन्त्र को इसी कारण अजपा गायत्री कहा जाता है। जिनका निरंतर जप चलता है।

इस ह्रदय रूपी भूमि में जहाँ सकार और हकार का सम्लित होता है। अर्थात प्राण और अपान का मिलन हित है। उससे जो आनंद उत्तपन होता है। वह महानंद के नाम से प्रसिद्ध है। इस महानंद का अनुश्ठान करने से ही साधक को वह (शिव ) में ही हु इस प्रकार का ज्ञान हो जाता है।

इसी विचार में निमग्न रहने वाला साधक उस शिव उत्कृष्ट स्वरूप को प्राप्त कर लेता हैं उसमें समाविष्ट हो जाता है। जिससे जीव व शिव का भेद ही मिट जाता है दोनों एक रूप हो जाते है।

ओउम

पंडित महावीर प्रसाद

चेरी की खेती

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चेरी सबसे मनमोहक फल हैं।खट्टा- मिठा स्वाद , गहरा लाल रंग और बेहद आकर्षक दिखने वाला चेरी  मानसून और गर्मियों का फल है। ये खट्टा-मीठा फल खाने में जितना टेस्टी होता है। सेहत के लिए उतना ही फायदेमंद होता है। इसमें पाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेट, विटामिन ए, बी और सी, बीटा कैरोटीन, कैल्शियम, लोहा, पोटेशियम, फॉस्फोरस शरीर को स्वस्थ रखने का काम करते हैं। इन पोषक तत्वों की वजह से चेरी को सूपरफूड की श्रेणी में रखा जाता है। यही पोषक कई प्रॉबल्म को दूर करने में मददगार होता है। अगर रोज 10 चेरी खाई जाए तो आप कई बीमारियों से बच सकते हैं।
आंखों के लिए फायदेमंद

चेरी में विटामिन ए की भरपूर मात्रा पाई जाती है। इसको खाने से आंखों से संवंधित समस्याएं नहीं होती। जिन लोगों को मोतियाबिंद की समस्या हो उनको रोजाना चेरी खानी चाहिए।

याद्दाशत बढाएं
चेरी में याद्दाशत बढ़ाने वाले गुण पाए जाते हैं। जिन लोगों को बातें या चीजें भूलने लगती हैं। उनके लिए चेरी खाना बहुत फायदेमंद होता है। 

अनिद्रा की समस्या से छुटकारा
चेरी में मेलाटोनिन की बहुत मात्रा होती है, जो अनिद्रा की समस्या से छुटकारा दिलाता है। रोजाना सुबह-शाम 1 गिलास चेरी का जूस पीने से अच्छी नींद आने लगेगी। 

 हड्डियां मजबूत
आजकल बहुत से लोगों को हाथों-पैरों की हड्डियों में दर्द होने या हड्डियां संबंधी कई प्रॉबल्मस होने लगती है। हड्डियों की समस्याओं से राहत पाने के लिए रोजाना चेरी खाएं। 

 दिल को रखे हैल्दी
चेरी में आयरन, मैगनीज, जिंक, पोटेशियम आदि कई पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। इसके साथ ही इसमें बिटा कैरोटीन तत्व भी होता है जो दिल की बीमारी को दूर करने में मदद करता है।

कैंसर
चेरी में मौजूद एंटीआक्सीडेंट्स शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति देते हैं। इसके साथ ही चेरी में फिनॉनिक एसिड और फ्लेवोनॉयड भी होता है जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के ऊतकों को बढ़ने से रोकते है। 

 वजन करें कंट्रोल
जो लोग वजन कम करना चाहते हैं उनके लिए चेरी किसी औषधि से कम नहीं है। चेरी में वसा की मात्रा बहुत कम पाई जाती है। इसके साथ 70 % पानी होता है जो घुलनशील फाइबर के लिए अच्छा होता है। रोजाना चेरी खाने वजन कंट्रोल में रहने के साथ ही पाचन तंत्र मजबूत होता। 

 ब्लड प्रैशर रखे ठीक
चेरी में पोटैशियम की मात्रा होती है जो शरीर में स्थित सोडियम की मात्रा कम कर देता है।  इस वजह से शरीर का रक्तचाप स्तर सामान्य हो जाता है। इसी के साथ कोलेस्ट्रोल का स्तर भी कंट्रोल में रहता है। 

डायबिटीज में सहायक
रोजाना चेरी खाने से डायबिटीज की समस्या से राहत पाई जा सकती है। चेरी में पाए जाे वाले गुण चेहरे की रंगत को साफ करने से साथ ही शरीर में इन्सुलिन की मात्रा को कम करके डायबिटीज के स्तर को कम करता है।

त्वचा में लाएं निखार
त्वचा को सॉफ्ट बनाने और रंगत निखारने के लिए चेरी का फल खाएं। आप चाहे तो चेरी का पेस्ट बनाकर भी चेहरे पर लगा सकते हैं। चेरी के पेस्ट को नियमित रूप से चेहरे पर लगाने से मृत कोशिकाएं हट जाती है। डैड सैल्स हटने से चेहरे पर निखार आने लगता है।

चेरी की खेती विश्व में सबसे अधिक यूरोप और एशिया, अमेरिका, तुर्की आदि देशों में की जाती है| जबकि भारत में इसकी खेती उत्तर पूर्वी राज्यो और हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, उत्तराखंड आदि राज्यों में कि जाती है| चेरी स्वास्थ्य के लिये अच्छा फल माना जाता है| यह एक खट्टा-मीठा गुठलीदार फल है| इसमें भरपूर मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते है, जैसे- विटामिन 6, विटामिन ए, नायसिन, थायमिन, राइबोफ्लैविन पोटेशियम, मैगनिज, काॅपर, आयरन तथा फस्फोरस प्रचूर मात्रा में पाए जाते है| इसके फल में एंटीआॅक्सीडेट अधिक मात्रा में होता है, जो स्वास्थ के लिये अधिक अच्छा माना जाता है|

इसको तीन वर्गो में विभाजित किया जाता है, जैसे-

 
1. मीठी चेरी जिसे प्रूनस एवियम कहते है, इसकी मूल क्रोमोजोम संख्या एन- 8 है, इसमें दो वर्ग की चेरी शामिल है एक हार्ट और दूसरी बिगारो|

2. खट्टी चेरी जिसका वैज्ञानिक नाम प्रूनस सीरैसस है, इसमें भी दो वर्ग की चेरी शामिल है, जैसे- एक अमरैलो तथा दूसरी मोरैलो|

3. ड्यूक चेरी जो पहले व दूसरे के संकरण से निकली है, यह एक पालीप्लायड चेरी है, जिसकी मूल क्रामोजोम संख्या 2एन- 32 है, सभी चेरी रोजेसी कुल की सदस्य हैं|

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उपयुक्त जलवायु
चेरी की खेती समुद्रतल से 2,100 मीटर की ऊँचाई के नीचे सफलतापूर्वक पैदा नहीं की जा सकती|परन्तु कश्मीर और कुल्लू की घाटियों में इसे 1500 मीटर की ऊँचाई पर भी सफलतापूर्वक पैदा किया जा सकता है| गर्मी में वातावरण ठंडा और शुष्क होना चाहिए| इसे लगभग 120 से 150 दिन तक अच्छी ठंडक यानि 7 डिग्री सेंटीग्रेट से कम तापमान की आवश्यकता होती है| अतः जिन स्थानों में उक्त दिनो तक 7 डिग्री सेंटीग्रेट से कम तापमान मिलता है वहीं इसे सफलतापूर्वक पैदा किया जा सकता है|

भूमि का चुनाव

 
चेरी की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में की जा सकती है| परन्तु इसके लिये रेतीली-टोमट मिट्टी को अच्छा माना जाता है| रेतीले टोमट मिट्टी जिसका पीएच मान 6.0 से 7.5 होना चाहिए| इस मिट्टी में नमी के साथ साथ साथ उपजाऊ होना भी आवश्यक है| चेरी की खेती के फूलों व फलों को पाले से बचाना जरूरी है|

उन्नत किस्में
चेरी की खेती के लिए अनेक किस्में उपलब्ध है, लेकिन व्यवसायिक दृष्टि से उगाई जाने वाली कुछ किस्में इस प्रकार है, जैसे-

जल्दी तैयार होने वाली किस्में- फ्रोगमोर अर्ली, ब्लेक हार्ट, अर्ली राईवरर्स, एल्टन|

मध्य समय में तैयार होने वाली किस्में- बेडफोर्ड प्रोलोफिक, वाटरलू|

देर से तैयार होने वाली किस्में- इम्परर, फ्रैंसिस, गर्वरनर उड|

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चेरी की किस्में जिन्हें बिगररेउ और हार्ट समूहों में बांटा गया है, जैसे-

बिगररेउ समूह- इस समूह का चेरी सामान्यतः इसका आकार गोलाकार तथा आमतौर पर फल का रंग अंधेरे से हल्के लाल भिन्न होता है, इसमें संकर किस्में जैसे- लैपिंस, सिखर सम्मेलन, सनबर्ट, सैम और स्टेला आदि है|

 
हार्ट समूह- इस समूह के तहत चेरी फल दिल का आकार का होता है, और फल का रंग हल्का लाल तथा रेडिस रंग का होता है|

भारत में चेरी की क्षेत्र के आधार पर किस्में इस प्रकार है, जैसे-

हिमाचल प्रदेश- वाइट हार्ट, स्टैला, लैम्बर्ट, पींक अर्ली, तरतरियन, अर्ली रिवर और ब्लैंक रिबलन आदि|

जम्मू कश्मीर- बिगरेयस नायर ग्रास, अर्ली परर्पिल, गुनेपोर, ब्लैक हार्ट आदि|

उत्तर प्रदेश- गर्वेनश वुड, बेडफोर्ड, ब्लैक हार्ट आदि|

पौधे तैयार करना
पौधे तैयार बीज के माध्यम से या जड़ कटाई द्वारा किए जाते है| मुख्य रूप से ग्राफ्टिंग पद्धति के माध्यम से चेरी पौधों को लगाया जा सकता है| आमतौर पर बीज अंकुरण के लिए शीतल उपचार की आवश्यकता होती है| आमतौर पर इसके बीज पूरी तरह से पके फल से निकाले जाते हैं| इन बीज को सूखे और ठंडे स्थान पर संग्रहीत किया जाना चाहिए| लगभग एक दिन के लिए इसके बीज को विशेष विधि से भिगोया जाता है|

पौधे ऊपर उठी क्यारियों में लगाए जाते हैं, इन क्यारियों की चैड़ाई 105 से 110 सेंटीमीटर व ऊँचाई लगभग 15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए, दो क्यारियों के बीच में 45 सेंटीमीटर का अन्तर रखा जाना चाहिए| क्यारियों में पौधों को चार पंक्तियों के बीच में 15 से 25 सेंटीमीटर की दूरी व पौधे की आपसी दूरी सेंटीमीटर रखना आवश्यक है| पौधों की रोपाई दिन के ठंडे समय में की जानी चाहिए|

प्रवर्धन और मूलवृन्त
चेरी की खेती या बागवानी हेतु कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में चेरी का अलेंगिक प्रवर्धक रोपण द्वारा तथा चश्मा चढ़ाकर किया जाता है| रोपण फरवरी में करते है और रिंग चश्मा जून और सितम्बर में चढ़ाते हैं| कश्मीर में चेरी का रोपण मैजर्ड प्रकंद से जो सकर्स निकलते है, उन पर किया जाता है| हिमाचल प्रदेश में इसका पाजा के बीजू पौधों पर रोपण करते है| पाजा के पेड़ जंगली पैमाने पर हिमाचल प्रदेश में उगते हैं, इनके पत्ते गिरते नहीं, अभी हाल ही में प्रूनस कारन्यूटा का भी प्रकंद इस्तेमाल किया गया है|

नर्सरी पैमाने पर यह सफल साबित हुआ है, कारन्यूटा का प्रकंद ओजस्वी और ठंड और वैक्टरीनियल गमोसिस के प्रति सहिष्णु है|अन्य देशों में माजार्ड और माहले के प्रंकद अधिक इस्तेमाल किये जाते हैं| फ्रांस और जर्मनी में स्टाक्टन मोरेलो का प्रकंद भी इस्तेमाल किया जाता हैं, खट्टी चेरी के लिए यह एक अच्छा प्रकंद है| सेब की तरह चेरी में अभी कोई बामन किस्म का प्रकन्द विकसित नहीं किया गया है|

पौधरोपण

चेरी में रेखांकन एवं पौध रोपण अन्य अष्ठिफलों जैसे आडू, प्लम आदि की तरह किया जाता है| पेड़ लगभग 10 मीटर की दूरी पर लगाये जाते हैं| लगाने के बाद लकड़ी गाढ़कर पौधो को आरम्भ में सहारा देना चाहिये| सूरज की तेज रोशनी से पौधे के तने पर बूरा प्रभाव पड़ता है| अतः इससे बचने के लिए तने पर चूने का लेप कर दें या इसे किसी कार्ड बोर्ड की पट्टी से ढ़क देना चाहिए| चेरी की खेती के लिए खेत की तैयारी और रोपण की अधिक जानकारी के लिए आडू की खेती कैसे करें लेख पढ़ें- आड़ू की खेती कैसे करें, जानिए उपयुक्त जलवायु, किस्में, रोग रोकथाम, पैदावार

परागण
चेरी की लगभग सभी किस्मों में स्वअनिषेच्यता पायी जाती है| अतः इनमें पर-परागण आवश्यक होता है| कुछ किस्मों में जैसे बिंग, लैम्बर्ट और नेपोलियन आदि में पर अनिषेच्यता भी मिलती है, इन किस्मों के लिए डूय्‌क किस्म परागण का काम करती है| अधिकांश मीठी किस्मों के परागण के लिए फ्रागमोर किस्म सबसे अच्छी पाई गयी है और खट्टी किस्मों में स्व-परागण से फल बनते हैं| अतः इनमें परागकारी किस्म लगाने की आवश्यकता नहीं पडती हैं|

सिंचाई और खरपतवार

मीठी चेरी को अन्य फलों की अपेक्षा बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है| इसका कारण यह है, कि इसके फल बहुत जल्दी पककर तैयार हो जाते हैं| जिससे इन्हें अधिक गर्मी का सामना नहीं करना पड़ता| परन्तु यदि ऐसी सूखी जलवायु में इसके पेड़ हों जहां उत्स्वेदन की क्रिया अधिक हो तो ऐसे स्थान में पेडों को पानी की आवश्यकता पडेगी| नमी बनाये रखने के लिए इसके उद्यान में मल्चिंग (पलवार बिछाना) अधिक लाभप्रद सिद्व हुई है| खट्टी चेरी में उत्स्वेदन अधिक होता है| अतः इसे अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है| चेरी के बाग में खरपतवार नहीं होने चाहिए|

खाद और उर्वरक
स्वीट चेरी के पेड़ आडू की अपेक्षा अधिक नाइट्रोजन लेने की क्षमता रखते हैं| पोटाश की कमी के लक्षण भी पेड़ों पर नहीं मिलते क्योंकि मिट्टी से पोटाश लेने की क्षमता इसके पेड़ों में अधिक होती है| खाद की जो मात्रा सेब के लिए बतायी गयी है, वही मात्रा स्वीट चेरी को भी दी जानी चाहिए| खट्टी चेरी को नाइट्रोजन की अधिक मात्रा दी जानी चाहिए| इसके लिए आप सेब की खेती कैसे करें पढ़ें- सेब की खेती कैसे करें, जानिए उपयुक्त जलवायु, किस्में, रोग रोकथाम, पैदावार

सघाई और कटाई-छटाई

चेरी के पेड़ बिना अधिक काट छांट के ही उचित आकार ग्रहण कर लेते हैं, फिर भी पेड़ों की ट्रेनिंग परिवर्तित अग्र प्ररोह विधि द्वारा की जाती है| मीठी चेरी में फूल दीर्घकालीन स्पर पर लगते हैं| ये स्पर 10 से 12 साल तक फूल-फल देते रहते हैं| इसलिए अन्य पर्ण पाती फल वृक्षों की अपेक्षा इसमें नयी लकड़ी के लिए बहुत कम काट-छांट की आवश्यकता होती है| यदि पेड़ की ट्रेनिंग ठीक ढंग से की गई तो फलत में आये पेड़ को उत्पादन में रखने के लिए किसी विशेष काट-छाट की आवश्यकता नहीं होती|

काट-छांट इस प्रकार करनी चाहिए कि प्रत्येक वर्ष लगभग 10 प्रतिशत पुराने स्पर निकाल दिये जायें जिससे नये स्पर का निकास हो सके| कहने का तात्पर्य यह है कि इसमें बहुत हल्की काट-छांट की जरुरत पड़ती है| हल्की काट-छांट के अतिरिक्त बाग की मिट्टी सही हालत में रखना आवश्यक है| जिससे इसका अच्छा उत्पादन दीर्घ काल तक मिलता रहता है|

रोग और कीट रोकथाम
बैक्टीरियल गमोसिस- बैक्टीरियल गमोसिस चेरी का प्रमुख रोग है|

रोकथाम- रोगजनित भाग को छीलकर अगल कर लें और चौबटिया पेस्ट लगाये| पतछड़ और बसंत ऋतु में एक एक छिड़काव बोर्डोमिश्रण का करें|

लीफ स्पाट- ग्रसित पत्तियों में बैंगनी धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में बढ़कर लाल-भूरे क्षेत्र के अन्दर भूरे रंग के दिखते हैं| जब धब्बों के सूखे हुए क्षेत्र झड़ जाते हैं, तोपत्तियों में छेद दीखने लगते हैं, बाद में पूरीपत्ती का हरपन समाप्त हो जाता है, और पत्तियाँ गिर जाती है|

रोकथाम- पत्तों के गिरने या कलियों के सूखने के समय ज़ीरम या थीरम 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें|

भुरी व्याधि- फल तोड़ते समय वातावरण की अर्द्रता के कारण यह रोग फैलता है| मीठी और ड्यूक किस्मों में इसका प्रकोप अधिक होता है| सडे़ हुए हिस्सों में पाउडर की तरह भूरे रंग के स्पोर बन जाते हैं|

रोकथाम- कैप्टान का छिड़काव दो बार करें 15 दिन के अन्तराल से|

ब्लेक फ्लाई- चेरी की खेती का यह मुख्य हानिकारक कीट है, नये साखाओं व पत्तियों को इसके झुंड कुंचित कर देते हैं और शहद जैसा पदार्थ छोड़ते हैं| जो फलों को बाजार के अयोग्य बना देते हैं|

रोकथाम- उपचार के लिए नीम का काढ़ा कीटनाशी या रोगोर का प्रयोग करें|

फल तुडाई और पैदावार 
चेरी के पेड़ लगाने के पांचवें साल बाद फल देना आरम्भ कर देते हैं और दस साल तक अच्छी तरह फलने लगते हैं| इसके पेड़ काफी दीर्द्यजीवी होते है और अच्छी देखभाल से 50 साल तक फल देते रहते हैं| फल मई के मध्य में पकना आरम्भ हो जाते हैं, इसमें कभी-कभी फल फटने की समस्या गम्भीर हो जाती है| परन्तु बिंग और ब्लैक हार्ट किस्मों के फल अधिक नहीं फटते| चेरी में फल विरलन करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उपज प्रायः कम होती है|

एक पेड़ से लगभग 15 से 25 किलोग्राम फल पैदा होते हैं| फल पकने के पहले तोड़ना ठीक रहता है, क्योंकि पूरा पकने पर वे जल्द खराब होने लगते है| फलों को छोटी छोटी टोकरियों या लकड़ी के बक्सों में पैक किया जाता है| मीठी चेरी ताजी ही खायी जाती है| खट्टी को शाक के रुप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है| इसका मुरब्बा भी अच्छा बनता है, डिब्बाबन्दी के लिए भी इसका इस्तेमाल होता हैं|
#एक_पहल
#आजाद_मन 
अनील शाह 
#जन_सेवा_समाज_सेवा
#किसान_की_जीत_देश_का_हीत

श्रीचक्र साधना

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                                                                     #श्रीचक्र

षोडशी विधा मे श्री चक्र का प्रयोग साधना मे किया जाता है । इस चक्र का उद्भव  तो प्रकृति करती है, किन्तु इसके ज्ञान का उद्भव शिवलिंग (मातृशक्ति) के पूजको के समुदाय मे हुआ था । aऔर इसे भैरवीचक्र,शक्तिचक्र,आधाचक्र,सृष्टिचक्र, आदि कहा जाता है ।s श्रीचक्र इसका वैदिक संस्करण है। लोग ताँबे आदि के पत्र पर इसे खुदवाकर  पूजाघरों  मे स्थापित कर लेते है। और धूप दीप दिखाकर पूजा करके समझते है , कि उन्होंने श्रीचक्र  की स्थापना कर ली है परन्तु यह बहुत भारी भ्रम है।h श्रीचक्र की घर मे स्थापना का वास्तविक अर्थ -- घर को इस स्वरूप मे व्यवस्थित करना ।o यह चक्र भूमि चयन से लेकर घर बनाने और उसकी व्यवस्थाओं ( कमरे ,सजावट आदि) को श्रीचक्र के अनुसार व्यवस्थित करने , उसका चिन्तन करने और उसमे देवी स्वरूप की छवि देखने सम्बन्धित है ।
इसका यह भी अर्थ है कि घर की व्यवस्था एवं नियन्त्रण किसी शक्ति (नारी) के हाथ मे हो और समस्त परिवार उससे शक्ति प्राप्त करके उन्नत हो । इस चक्र को घर मे स्थापित करने के बाद नारी का सम्मान करना उसे शक्ति रूपा समझना और उसका अपमान न करना अनिवार्य हो जाता है।k
षोडशी विधा के समस्त स्वरूपों यथा - कुलमार्ग, शाक्त मार्ग,बौद्ध मार्ग ,कापरूपमार्ग, राधाकृष्ण मार्ग, पुष्टिमार्ग, मधु मार्ग,साधना मार्ग ,आदि घर मे श्रीचक्र की स्थापना का अर्थ है अपने गृह मे एक कालक्रम मे इन साधनाओं  मे से अपने द्वारा चयनित साधनाओं का गुरू निर्देश मे आयोजन करवाना। इसके वैदिक संस्करण भी अनेक मार्गों मे व्याप्त है । k
जैसे कुमारी पूजा विधान भी इस प्रकार का संस्कारित विधान है। शाक्तमार्ग मे यह केवल पशुभाव  के साधक के लिए अनुमेय है। वीर साधक एवं दिव्यभाव  के साधकों के लिए कुमारी पूजा की वर्जना है। कुछ रूढ़गत संस्कारों से युक्त लोग यह सोच सकते है कि यह अनाचार है । परन्तु विचार किजिये  कि जिन पाप पुण्य के संस्कारों मे बँधे आप जी रहै है, वह सुख दो रहा है , या आप उससे आध्यात्मिक या भौतिक लाभ पा रहे , क्या जिन सामाजिक, धार्मिक रूप नैतिक संस्कारों के आदर्शों पर आज के परिवार, समाज, राष्ट्र, संस्कृति या विभिन्न धर्मों के नियम का जाल आप पर लदा हुआ है।u
वह आपके लिए सुखमय ,संतोषप्रद है क्या नारी पुरूष के रिश्ते को समाज ने जिस धर्म के नियमो से बाँध कर सबको भयभीत कर रखा है, उसके आदर्शों को कभी भी कहीं भी प्राप्त नही किया जा सका। इसकी विकृतियों से त्राहिमाम् करते हुए नारी और पुरूष आधुनिक विश्व के लिए समस्या बने हुए है।m 
नैतिकता, भावुकता, मर्यादा, कानुन का पाठ पढाये जा रहे है, किन्तु नतीजा क्या स्मरण रखे !आपने स्वयं ही प्रकृति विरूद्ध नियमों को बनाकर स्वयं को जकड लिया है और यह सोचते है कि देवी शक्तियाँ नियमों के पालन से प्रसन्न हो जायेगी ओर परलोक मे स्वर्ग मिलेगा वरना दुःख भोगना पडेगा।m
शाक्तसाधकों की दृष्टि मे यही पशुभाव है, क्यो

लघु दुर्गा सप्तशती

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                                                      #लघु_दुर्गा_सप्तशती

ॐ वींवींवीं वेणुहस्ते स्तुतिविधवटुके हां तथा तानमाता,
स्वानंदेमंदरुपे अविहतनिरुते भक्तिदे मुक्तिदे त्वम् ।
हंसः सोहं विशाले वलयगतिहसे सिद्धिदे वाममार्गे,
ह्रीं ह्रीं ह्रीं सिद्धलोके कष कष विपुले वीरभद्रे नमस्ते ।। १ ।।

ॐ ह्रीं-कारं चोच्चरंती ममहरतु भयं चर्ममुंडे प्रचंडे,
खांखांखां खड्गपाणे ध्रकध्रकध्रकिते उग्ररुपे स्वरुपे ।
हुंहुंहुं-कार-नादे गगन-भुवि तथा व्यापिनी व्योमरुपे,
हंहंहं-कारनादे सुरगणनमिते राक्षसानां निहंत्रि ।। २ ।।

ऐं लोके कीर्तयंती मम हरतु भयं चंडरुपे नमस्ते,
घ्रां घ्रां घ्रां घोररुपे घघघघघटिते घर्घरे घोररावे ।
निर्मांसे काकजंघे घसित-नख-नखा-धूम्र-नेत्रे त्रिनेत्रे,
हस्ताब्जे शूलमुंडे कलकुलकुकुले श्रीमहेशी नमस्ते ।। ३ ।।

क्रीं क्रीं क्रीं ऐं कुमारी कुहकुहमखिले कोकिले,
मानुरागे मुद्रासंज्ञत्रिरेखां कुरु कुरु सततं श्रीमहामारि गुह्ये ।
तेजोंगे सिद्धिनाथे मनुपवनचले नैव आज्ञा निधाने,
ऐंकारे रात्रिमध्ये शयितपशुजने तंत्रकांते नमस्ते ।। ४ ।।

ॐ व्रां व्रीं व्रुं व्रूं कवित्ये दहनपुरगते रुक्मरुपेण चक्रे,
त्रिःशक्त्या युक्तवर्णादिककरनमिते दादिवंपूर्णवर्णे ।
ह्रीं-स्थाने कामराजे ज्वल ज्वल ज्वलिते कोशितैस्तास्तुपत्रे
स्वच्छंदं कष्टनाशे सुरवरवपुषे गुह्यमुंडे नमस्ते ।। ५ ।।

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोरतुंडे घघघघघघघे घर्घरान्यांघ्रिघोषे,
ह्रीं क्रीं द्रं द्रौं च चक्र र र र र रमिते सर्वबोधप्रधाने ।
द्रीं तीर्थे द्रीं तज्येष्ठ जुगजुगजजुगे म्लेच्छदे कालमुंडे,
सर्वांगे रक्तघोरामथनकरवरे वज्रदंडे नमस्ते ।। ६ ।।

ॐ क्रां क्रीं क्रूं वामभित्ते गगनगडगडे गुह्ययोन्याहिमुंडे,
वज्रांगे वज्रहस्ते सुरपतिवरदे मत्तमातंगरुढे ।
सूतेजे शुद्धदेहे ललललललिते छेदिते पाशजाले,
कुंडल्याकाररुपे वृषवृषभहरे ऐंद्रि मातर्नमस्ते ।। ७ ।।

ॐ हुंहुंहुंकारनादे कषकषवसिनी मांसि वैतालहस्ते,
सुंसिद्धर्षैः सुसिद्धिर्ढढढढढढढः सर्वभक्षी प्रचंडी ।
जूं सः सौं शांतिकर्मे मृतमृतनिगडे निःसमे सीसमुद्रे,
देवि त्वं साधकानां भवभयहरणे भद्रकाली नमस्ते ।। ८ ।।

ॐ देवि त्वं तुर्यहस्ते करधृतपरिघे त्वं वराहस्वरुपे,
त्वं चेंद्री त्वं कुबेरी त्वमसि च जननी त्वं पुराणी महेंद्री ।
ऐं ह्रीं ह्रीं कारभूते अतलतलतले भूतले स्वर्गमार्गे,
पाताले शैलभृंगे हरिहरभुवने सिद्धिचंडी नमस्ते ।। ९ ।।

हंसि त्वं शौंडदुःखं शमितभवभये सर्वविघ्नांतकार्ये,
गांगींगूंगैंषडंगे गगनगटितटे सिद्धिदे सिद्धिसाध्ये ।
क्रूं क्रूं मुद्रागजांशो गसपवनगते त्र्यक्षरे वै कराले,
ॐ हीं हूं गां गणेशी गजमुखजननी त्वं गणेशी नमस्ते ।। १० ।।

इसमें दस श्लोक लघु दुर्गा सप्तशती में परमेश्वरी के वीरभद्रा व्यापिनी महेशी अन्नता गुह्यमुंण्डा वज्रदंण्डा ऐन्द्रीं भद्रकाली सिद्धचंण्डी गणेशी रुपों का वर्णन और प्रणति निवेदन किया गयाa कांता  गुह्यमुंण्डा वज्रदंण्डा ऐन्द्रीं यह चार रूप अत्यंत उग्र हैं। इनका रहस्य स्वरूप ज्ञान वाममार्ग में होता है ज्ञानमार्ग में व्यापिनी की परिधि में इन रूपों का विराट दर्शन होता हैs सप्तशती में भी यह रूप पर कथा विस्तार में वे अन्तर्हित से हो गए हैं यहां कथा नहीं है वस्तुत यह स्वरूप की दुर्गति का कारण बनते हैं और परमेश्वरी के शरणागत होने पर यह दुर्गतिनाशिनी दुर्गा की कृपाकटाक्ष हो जाते हैं।
जब वह निग्रहकारिणी होती हैं तो यह स्वरूप व्यक्ति को मोह ग्रस्त करके अज्ञान के तामिस्र लोकों में धकेल देते हैं मोहग्रस्त व्यक्ति त्रिपुरा को भूलकर इनमें भूल जाता है जैसे बालक क्रीडा से मुक्त होकर मां को भूल जाता है पर क्रीडनक के टूटने पर अथवा परमा की अकाण्ड करुणा से जब उसको मातृस्मरण हो जाता है hऔर वह आर्तभाव से उसे पुकारता है तो वहीं निग्रहकारिणी करूणार्द्र होकर अनुग्रहकारिणी के रूप में आती है।
उसके बंधन पास भी बनते है तो ग्रन्थि भी मोह के पेशल संबंध भी बांधते हैं तो मद के घर्षक दोषरज्जु भी व्यक्ति को लपेटती लथेडती है वह यह चाहती है oकि यह कल्मष उसे छू भी ना सके वह इतना शुभ्र हो जाए कि यह उसे कुलुषित कर ही न सके उसकी कृपा का आनंद लेने के लिए साधक के संपूर्ण में उसका श्रद्धारूप चमकने लगे लधुसप्तशती ने ज्ञान की तटस्थ वृत्ति भक्ति की अरुणिमा से रंजित होकर प्रकट हुई है
 परमा को उसके चरित्रों के माध्यम से नहीं शुद्ध मूल रूप में भजा गया है इसके गान की अवस्था में ज्ञान के निर्बंन्ध "में भाषा और भाषा का व्याकरण गौण हो गया है सप्तशती का जो फल है वहीं इसका है पर इसमें बीजों की प्रधानता है इसलिए जिस साधक में इतनी योग्यता आ गई हो उसके लिए यह भी उतनी ही फलप्रद है और जो भी इतना योग्य नहीं हुआ है उसे इसके अधिक पाठ करने पर वह योग्यता प्राप्त होती है।
इसकी फलश्रुति नहीं दी गई है नहीं कोई विस्तृत वर्णन विधि समझाने की बात है यह है कि इसमें जिन दस रूपों की स्तुति की गई है उन रूपों में जो गुण प्रभाव निहित हैंk वहीं इस पाठ के फल स्वरुप प्राप्त होता है इन सबका संघनित रूप दुर्गा है अतः इसकी अधिष्ठातृ दुर्गा चंण्डी होगी।sabhar sakti upasak Facebook wall

Kisan Ganne se Sirka Banakar Kamayein 15-20 गुना ज्यादा लाभ | How To Mak...

योग के दृष्टि से आयु पे नियंत्रण

अब योग के दृष्टि से आयु पे नियंत्रण की मनोवैज्ञानिक अथवा आध्यात्मिक प्रभाव एवं स्तर को जान अथवा समझ लेना अवयशक हैं

देखो उम्र और स्वाँस का वही सम्बंध होता हैं जो किसी गाड़ी और इधन की होती हैं जैसे जैसे गाड़ी की इधन जहाँ जाकर समाप्त हो जाती हैं वहीं उसका विराम लग जाता फिर चाह कर भी वहाँ से आगे अपनी गाड़ी को नहीं लेकर जा सकता चाहे उसका गंतव्य स्थान आए या नहीं आए और एक बात ये भी हैं की इस शरीर रूपी गाड़ी को प्राणी बिना मतलब इधर उधर चलाते जा रहा हैं उसपे ब्रेक लगाने की कला ही उसे मालूम नहीं हैं जब उसका कोई कार्य नहीं हैं अथवा बिना रास्ते का खबर रहे वो निरंतर अनजान और ग़लत दिशा में भागे जा रहा हैं और जब तक गाड़ी भाग रही हैं चाहे वो किसी भी दिशा में भागे इधन तो कम तटपश्चात समाप्त होगी ही ना उसे क्या मतलब की तुम किस दिशा में जा रहे हो सही दिशा में या ग़लत दिशा में ।

दूसरा पहलू योग के दृष्टि में जीवन क्या हैं स्वाँस और प्रस्वाँस की क्रिया का निरंतर जारी रहना ही जीवन हैं योग की मतअनुसार परंतु जिस साधक को इस स्वाँस और प्रस्वाँस की क्रिया को विराम देने की ठहराने की कला मालूम हैं उसका स्वतः आयु पे नियंत्रण स्थापित होने लगता हैं क्यूँकि वो उस इधन रूपी स्वाँस को एक सही दिशा में ही खर्च करता हैं और बिलकुल जागृत और बोध के साथ खर्च करता हैं की इतने इधन में
मुझे गंतव्य स्थान तक पहुँचना हैं और इस तथ्य से भी वो भली भाँति परिचित हैं की जितना इधन हैं वो
पर्याप्त हैं उस परम तत्व को जानने अथवा वहाँ तक की दूरी तय करने हेतु बशर्ते इस इधन को बचाने अथवा सही रास्ते की ओर जाने में लगाए तब।

अब जब प्राण की कोशों में बदलाव आती धीरे धीरे स्वाँस की आयु अथवा अविधि कम होने लगती अर्थात जो प्राणऊर्जा समस्त इंद्रियों अथवा कोशों में पहुँचनी चाहिए वो वो एक समान रूप से पहुँच नहीं पाती तत्पश्चात तन पे इसकी प्रभाव पड़नी प्रारंभ हो जाती हैं और इंद्रियाँ एवं त्वचा जर्जर होने लगती हैं अर्थात बुढ़ापा प्रारंभ होने लगती हैं इसी प्रकार आंतरिक तंत्र रूपी यंत्र जैसे गुर्दे, किडनी, फेफड़े, एवं हृदय में स्पंदित हो रही ऊर्जा रूपी वायु भी मंद पड़ने लगती हैं जिससे उसकी पोषण तत्व में भी कमी आने लगती हैं।sabhar satsang Facebook wall


:मनुष्य इस विश्व ब्रह्माण्ड की अद्भुत कृति



पूज्य ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

      इस विश्वब्रह्माण्ड के कण-कण में नैसर्गिक शक्तियों का विपुल भण्डार भरा हुआ है। ये नैसर्गिक शक्तियां ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होकर सर्वप्रथम ग्रह-नक्षत्रों की ऊर्जाओं में परिवर्तित होती हैं और उनके द्वारा मनुष्य के विभिन्न अंगों से अपना सम्बन्ध स्थापित करती हैं। इसके पश्चात पंचतत्वों का आश्रय लेकर विभिन्न पदार्थों का निर्माण करती हैं। हमें ज्ञात होना चाहिए कि सूर्य से निःसृत उष्ण ऊर्जा ही वास्तव में वह नैसर्गिक शक्ति है। हम-आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि केवल दस एकड़ भूमि पर सूर्य की जो उष्ण ऊर्जा दिन के समय बिखरी हुई होती है, उसकी शक्ति से पूरे विश्व के कल-कारखाने और मशीनों को पूरे एक महीने तक चलाया जा सकता है। लेकिन यह सम्भव कैसे है ?
      सूर्य की उसी उष्ण ऊर्जा का दूसरा नाम 'सौर ऊर्जा' है जो ज्योतिर्विज्ञान की मूलभित्ति है। ज्योतिर्विज्ञान के अन्तर्गत छः विज्ञान हैं--नक्षत्रविज्ञान, राशिविज्ञान, क्षणविज्ञान, कालविज्ञान, चंद्रविज्ञान और सूर्यविज्ञान।
      इस नैसर्गिक ऊर्जा का एक विशिष्ट क्षेत्र है--मानव पिण्ड जिसमें नैसर्गिक ऊर्जा मानसिक शक्ति, प्राणशक्ति, विचारशक्ति, इच्छाशक्ति और कल्पनाशक्ति के रूप में कार्य करती है।
      इस पृथ्वी पर सूर्य की यह कितनी ऊर्जा निःसृत होती है--इसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता। उस ऊर्जा से कैसे लाभान्वित हुआ जा सकता है--यह वैज्ञानिकों के लिए अनुसंधान का विषय है।
      अब आकाश में काले-भूरे बादलों के बीच  कुछ क्षणों के लिए चमकने वाली बिजली को ही लीजिए। वह इतनी अधिक होती है कि उससे दिल्ली, मुंबई जैसे महानगर को पूरे चौबीस घण्टे प्रकाशित किया जा सकता है। लेकिन हम उसे अपने उपयोग में नहीं ला पाते। इतनी उपयोगी विद्युतशक्ति अंतरिक्ष में ही अनुपयोगी रूप में नष्ट हो जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि इतनी मूल्यवान सूर्य की उष्ण ऊर्जा और इतनी महत्वपूर्ण आकाशीय विद्युतशक्ति का सदुपयोग मानव जीवन में नहीं हो पाता। वास्तव में यदि देखा जाये तो अब तक उसके उपयोग करने की कला से ही परिचित नहीं हो पाए हैं हम और जिस दिन परिचित हो जाएंगे, उसी दिन मनुष्य की वे अभिलाषाएं पूर्ण हो जाएंगी जो मनुष्य के लिए अब तक अज्ञात हैं।
      लेकिन मनुष्य की शक्तियों के संदर्भ में ऐसा कुछ नहीं है। यदि आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि से देखा जाये तो विश्वब्रह्माण्ड की एक अद्भुत और श्रेष्ठतम कृति है मनुष्य और अति मूल्यवान है उसका जीवन। आत्मिक शक्ति, मनःशक्ति, विचारशक्ति, इच्छाशक्ति, बौद्धिकशक्ति, रचनात्मक शक्ति और शारीरिक शक्ति--इन सात शक्तियों का विभु है मानव। एक साथ ये शक्तियां इस विश्वब्रह्माण्ड में अन्य किसी के पास नहीं हैं और यही एकमात्र कारण है कि देवगण, ऋषिगण, पितृगण, योगीगण, सिद्ध-साधकगण की आत्माएं मानव शरीर को उपलब्ध होने के लिए सदैव तत्पर और आकुल रहती हैं। सोचने की बात है इतना महत्वपूर्ण और गरिमामय मानव शरीर होते हुए भी आज का व्यक्ति विशेषकर युवावर्ग निराश, निर्धन एवम शक्तिहीन है तो इसका कारण बाहर नहीं, उसीके भीतर है। यदि मनुष्य अपनी क्षमताओं को और प्रकृति प्रदत्त अपनी शक्तियों को अपने ध्येय पर एकाग्र करे तो उसके जीवन में सभी प्रकार की सफलताओं के पुष्प खिलने में देर न लगेगी और देर न लगेगी उसके व्यक्तित्व को और महिमामंडित और गरिमामण्डित होने में।



(श्रद्धेय गुरुदेव की 'अभौतिक सत्ता में प्रवेश'नामक पुस्तक के आधार पर)

सृष्टि और प्रलय

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                                                                  #

इस समस्त जड़ चेतनात्मक जगत का एक  मात्र निमित्त एवं उपादान कारण वह परब्रह्म ही है यही वह मूल तत्व है जिससे सृष्टि कि रचना होती है उसी से संचालित होती है तथा प्रलय काल मे उसी मे विलीन हो जाती है यह सृष्टि उसी सी अभिव्यक्ति है जो ब्रह्म से भिन्न नही है
यह जड प्रकृति सृष्टि या कारण नही है प्रलय काल मे वह सबको अपने मे विलीन  करने ये कारण ही उसे भोक्ता कहा गया है
कल्प ये आरम्भ मे सृष्टि सी रचना उसी प्रकार होती है जैसी पूर्व कल्प मे हुई थी वेद भी नित्य है प्रत्येक कल्प मे इनकी नई रचना नही होती है
हर कल्प मे उसी नाम रूप और ऐश्वर्य वाले देवता उत्पन्न होते है किन्तु उनके जीव बदल जाते है इसलिए वे नित्य है तथा जन्म मरण से मुक्त है
जगत के कारण के समाधान ये लिए वेदानुकुल स्मृतियाँ सी प्रमाण है सांख्य और योग दर्शन वेदानुकुल नही होने से प्रमाण नही है
जिस प्रकार बीज मे सम्पूर्ण वृक्ष सी सत्ता विधमान है उसी प्रकार यह जगत अप्रकट रूप से शक्ति रूप से ब्रह्म मे विधमान है प्रलय काल मे भी यह शक्ति रूप से उस परब्रह्म मे विधमान रहता है तथा रचना काल मे वही शक्ति जड चेतन ये रूप मे प्रकट होती है प्रलय काल मे जगत अव्यक्त रूप से ब्रह्म मे विधमान रहता है सत्ता या कभी नाश नही होता रूपान्तरण मात्र होता है 
सृष्टि सी रचना मे ब्रह्म से सर्वप्रथम आकाश उत्पन हुआ आकाश से वायु  वायु से तेज तेज से जल  जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई sabhar sakti upasak agyani facebook

अचेतन में प्रवेश


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स्वप्न देखते हुए जागने की पहली विधि - 

एक तो यह कि तुम यह मानकर अपना कामकाज, अपना व्यवहार शुरू करो कि सारा संसार स्वप्‍नवत है। तुम जो भी करो, यह याद रखो कि यह सपना है। जब जागे हुए हो तो निरंतर याद रखो कि सब कुछ सपना है।

अगर तुम स्वप्न देखते हुए स्मरण रखना चाहते हो कि यह स्वप्न है तो तुम्हें जागते हुए ही उसका आरंभ करना होगा। अभी तो ऐसा है कि स्वप्न देखते हुए तुम नहीं याद रख सकते कि यह स्‍वप्‍न है। तुम तो सोचते हो कि यह यथार्थ ही है।

क्यों तुम सोचते हो कि यह यथार्थ है? क्योंकि दिनभर तो तुम यही समझते हो कि सब कुछ यथार्थ है। वह तुम्हारी दृष्टि बन गई है —बंधी—बंधाई दृष्टि। जागते हुए तुमने स्नान किया, वह यथार्थ था। जागते हुए तुम भोजन कर रहे थे, वह यथार्थ था। जागते हुए तुम बातचीत कर रहे थे, वह भी यथार्थ था। पूरे दिन और इसी तरह पूरी जिंदगी, तुम जो भी सोचते हो, करते हो, उस पर तुम्हारी दृष्टि उसके यथार्थ होने की रहती है। यह दृष्टि फिक्स हो जाती है, यह मन की बंधी—बंधाई धारणा बन जाती है। फिर रात में जब तुम स्‍वप्‍न देखते हो तो वही दृष्टि काम करती है कि यह यथार्थ है।

इसलिए पहले तो हम विश्लेषण करें। स्‍वप्‍न और यथार्थ के बीच कुछ समानता होनी चाहिए, अन्यथा यह दृष्टि बननी कठिन होगी। मैं तुम्हें देख रहा हूं। फिर मैं आंख मूंदता हूं रूप का और स्‍वप्‍न देखने लगता हूं और स्‍वप्‍न में तुम्हें देखता हूं। इन दोनों देखने में फर्क नहीं है। जब मैं तुम्हें सचमुच देखता हूं तो क्या करता हूं? मैं तुम्हें नहीं देखता हूं तुम्हारा चित्र मेरी आंखौं मैं प्रतिबिंबित होता है। पहले तुम्हारा चित्र प्रतिबिंबित होता है और तब वह चित्र किसी रहस्यपूर्ण

प्रक्रिया के द्वारा—विज्ञान अभी उस प्रक्रिया को नहीं जान सका है—रासायनिक रूप में रूपांतरित होता है और मस्तिष्क के भीतर कहीं पहुंचा दिया जाता है। विज्ञान को अभी यह भी पता नहीं है कि यह बात ठीक किस स्थान पर घटित होती है। आंख में यह नहीं घटित होती है, आंख तो सिर्फ द्वार है। मैं तुम्हें सीधे आंख से नहीं देखता हूं आंख के माध्यम से देखता हूं।

आंख में तुम प्रतिबिंबित होते हो। तुम मात्र एक चित्र हो सकते हो, तुम यथार्थ हो सकते हो, तुम स्वप्न हो सकते हो। याद रखो, स्वप्न तीन— आयामी होता है। मैं एक चित्र को पहचान पाता हूं क्योंकि चित्र दो— आयामी होता है। स्वप्न तीन—आयामी होता है, इसलिए वह ठीक तुम्हारे जैसा दिखता है। और आंख नहीं कह सकती कि जो देखा गया है यह यथार्थ है या नहीं। निर्णय लेने का कोई उपाय नहीं है, आंख निर्णायक नहीं है।

मैं सदा भीतर हूं और तुम सदा बाहर हो, और दोनों का मिलन नहीं होता। इसलिए यह समस्या ही है कि तुम यथार्थ हो कि स्वप्न। ठीक इस क्षण भी निर्णय लेने का उपाय नहीं है कि मैं स्‍वप्‍न देख रहा हूं या तुम सचमुच यहां हो। और मुझे सुनते हुए तुम कैसे कह सकते हो कि तुम मुझे सच में सुन रहे हो या कि तुम स्‍वप्‍न देख रहे हो? कोई उपाय नहीं है। यही कारण है कि जो तुम्हारी दृष्टि दिनभर बनी रहती है, वही रात में भी, नींद में भी प्रवेश कर जाती है। तुम स्‍वप्‍न को सच मानते हो।

विपरीत का प्रयोग करो। 
सतत यह तीन सप्ताह याद रखो कि जो भी तुम करते हो वह सपना है। शुरू में यह बहुत कठिन होगा। तुम बार—बार मन के पुराने ढांचे में पड़ोगे, तुम सोचने लगोगे कि यह यथार्थ है। तुम्हें निरंतर अपने को सजग करना होगा और याद दिलाना होगा कि यह स्वप्न है। अगर तीन सप्ताह तक लगातार तुमने इस दृष्टि को कायम रखा तो पांचवें सप्ताह में किसी रात स्वप्न देखते हुए तुम अचानक यह भी जान लोगे कि यह स्‍वप्‍न है।

स्वप्न में चेतना को, होश को प्रविष्ट कराने का यह एक उपाय है। रात स्वप्‍न देखते हुए यदि याद रख सको कि यह स्वप्न है तो फिर दिन में याद रखने की जरूरत नहीं रहेगी कि यह स्वप्न है। तब तुम जान जाओगे।

आरंभ में जब इसका अभ्यास करोगे तो यह एक आरोपित धारणा ही रहेगी। तुम चेष्टापूर्वक विश्वास करना शुरू करोगे कि यह स्‍वप्‍न है। लेकिन जब स्वप्न में भी यह स्मरण रहने लगेगा कि यह स्‍वप्‍न है तो यह यथार्थ बन जाएगा। तब दिन में जब तुम उठोगे तो यह नहीं अनुभव करोगे कि तुम नींद से उठ रहे हो; तुम्हें महज यह लगेगा कि मैं एक स्‍वप्‍न से दूसरे स्वप्न में सरक रहा हूं। तब दिन के कामकाज को स्‍वप्‍न की तरह देखना यथार्थ रूप लेगा।

और अगर चौबीस घंटे ही स्वप्न हो जाएं, और तुम्हें उसका अनुभव और स्मरण होता रहे, तो तुम अपने केंद्र पर पहुंच जाओगे। तब तुम्हारी चेतना का तीर दो फल वाला तीर हो जाएगा। और तुम जब स्वप्न समझने लगोगे तो तुम स्‍वप्‍न देखने वाले को, विषयी को भी समझने लगोगे। अगर तुम स्‍वप्‍न को ही सच मानते हो तो तुम स्वप्न—द्रष्टा को नहीं अनुभव कर सकते। जब फिल्म यथार्थ हो गई तो तुम अपने को भूल जाते हो। जब फिल्म बंद होती है और तुम फिर समझने लगते हो कि यह यथार्थ नहीं थी तब तुम्हारा स्वयं का यथार्थ आविर्भूत होता है, प्रकट होता है। तुम स्वयं को अनुभव कर सकते हो—यह एक तरीका हुआ।

यह भारत का एक सबसे पुराना तरीका रहा है। यही कारण है कि हमने इस बात पर जोर दिया है कि संसार मिथ्या है। यह बात हम किसी दार्शनिक अर्थ में नहीं कहते हैं। हम यह नहीं कहते कि यह घर मिथ्या है और यह कि तुम इसकी दीवार से निकल सकते हो। उस अर्थ में नहीं। जब हम कहते हैं कि यह घर मिथ्या है, तो यह एक युक्ति है। यह घर के खिलाफ कोई दलील नहीं है।

यह शंकर का कोई दार्शनिक मत नहीं है। वे यहां सत्य के संबंध में कुछ नहीं कह रहे हैं, वे यहां जगत के बारे में भी नहीं कह रहे हैं। यह तो तुम्हारे मन को बदलने की उनकी एक युक्ति है, तुम्हारी बंधी दृष्टि को बदलने का उनका एक उपाय है; ताकि तुम संसार को सर्वथा भिन्न ढंग से देख सको।

भारतीय चिंतन के लिए यह सदा ही एक समस्या रही है। क्योंकि उसके लिए सब कुछ ध्यान की युक्ति है। यह सत्य है या नहीं, इसमें हमें रस नहीं है। हम तो मनुष्य को बदलने के लिए उसकी उपयोगिता की फिक्र करते हैं। और पश्चिमी चित्त के लिए यह चीज बिलकुल भिन्न है। जब पश्चिम के लोग कोई सिद्धांत प्रस्तावित करते हैं तो वे इस बात की चिंता करते हैं कि यह सच है अथवा नहीं, इसे तर्क से सिद्ध किया जा सकता है या नहीं। लेकिन जब हम कोई चीज प्रस्तावित करते हैं तो हम उसके सत्य की नहीं, उसकी उपयोगिता की चिंता करते हैं। हम देखते हैं कि मनुष्य के मन को बदलने की उसकी क्षमता क्या है। वह सच है या झूठ, हम इसकी चिंता ही नहीं करते। वस्तुत: तो वह दोनों नहीं है। वह एक युक्ति भर है।

मैंने बाहर फूल देखे हैं। सुबह सूरज उगता है और सब चीज सौंदर्य से भर जाती है। लेकिन तुम कभी घर से बाहर नहीं गए हो, तुमने कभी फूल नहीं देखे हैं और तुमने सुबह का सूरज नहीं देखा है। तुमने कभी खुला आकाश भी नहीं देखा है। और तुम नहीं जानते हो कि सौंदर्य क्या है। तुम सदा एक कारागृह में बंद रहे हो। और मैं तुम्हें बाहर ले चलना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि तुम भी खुले आसमान के नीचे आ जाओ और फूलों से मिलो।

यह मैं कैसे करूं? तुम फूलों को नहीं जानते हो। यदि मैं फूलों की बात करूं तो तुम कहोगे कि आप पागल हो गए हैं, फूल वगैरह नहीं हैं। अगर मैं सुबह के सूरज की बात करूं तो तुम कहोगे कि आप कल्पना कर रहे हैं, स्वप्न देख रहे हैं, आप कवि हैं। अगर मैं खुले आकाश की बात करूं तो तुम हंसोगे और पूछोगे कि आकाश कहां है, यहां तो दीवार ही दीवार है। फिर मैं क्या करूं?

मुझे कोई ऐसी युक्ति निकालनी होगी जो तुम्हारी समझ में आए और जिससे तुम बाहर निकल सको। इसलिए मैं कहता हूं कि घर में आग लगी है और मैं खुद भागने लगता हूं। यह बात संक्रामक हो जाती है, और तुम भी मेरे पीछे भागते हो और बाहर निकल जाते हो। और तभी तुम जानोगे कि जो मैं कह रहा था वह न सही था और न गलत। तब तुम फूलों को जानोगे और मुझे क्षमा कर दोगे।

बुद्ध ने वही किया था, महावीर ने वही किया था, शिव ने और शंकर ने वही किया था। इसलिए बाद में हम उन्हें क्षमा कर देते हैं। क्योंकि एक बार बाहर निकलने पर हमें पता चल जाता है कि वे क्या कर रहे थे। और तब हम समझते हैं कि उनके साथ बहस करना व्यर्थ था, क्योंकि यह बात ही बहस की नहीं थी। आग कहीं नहीं थी, लेकिन हम आग की भाषा समझ सकते थे। फूल थे, लेकिन हम फूलों की भाषा नहीं समझ सकते थे। हमारे लिए वे प्रतीक अर्थहीन थे।
ओशो 
तंत्र -सूत्र, भाग -1, प्रवचन -6

Rajesh Saini

तन्त्र शक्ति युद्ध


एक समय पर तन्त्र का बहुत सम्मान होता था, तन्त्र द्वारा असम्भव कार्य को भी सम्भव कर लिया जाता था। उस समय पर जो युद्ध होते थे वो तन्त्र द्वारा लड़े जाते थे। जो श्री राम रावण का युद्ध हुआ, महाभारत युद्ध हुआ ये सब तन्त्र शक्ति द्वारा ही लड़े गए थे। जो अस्त्र शस्त्र थे वो तन्त्र शक्ति से चलते थे, रावण का वाहन तन्त्र शक्ति द्वारा ही उड़ता था, मारीच तन्त्र शक्ति द्वारा ही कोई भी रूप धारण कर सकता था, नल नील ने जल को बांधकर पुल बना दिया था, कितने ही दानव थे जो तन्त्र शक्तियो में पारंगत थे। अगर हम कहे कि रावण, श्रीराम जी आदि उच्च कोटि के साधक थे तो लोगो को अच्छा नही लगेगा क्योकि तन्त्र को हीन दृष्टि से देखते है। तन्त्र साधनाओ द्वारा सबने अलग अलग प्रकार की दिव्य शक्तिया प्राप्त की हुई थी। 

ऐसे ही महाभारत का युद्ध लड़ा गया था, यदि सभी चीजो को ध्यान से देखो तो ये सब समझ आएगा लेकिन हम सिर्फ सोचते है कि वो बस शक्तिशाली था लेकिन कभी ये नही सोचते कि इतना शक्तिशाली बना कैसे, ये एक साधना होती है कि किसी का श्राप फलित हो जाये। लेकिन जब बाहरी लोग आए तो यहा की शिक्षा पद्ति को देखा तो घबरा गए कि इनसे जीतना सम्भव नही है। इनको जीतने के लिए इनकी शिक्षा प्रणाली को समाप्त करना होगा। और यही हुआ भी धीरे धीरे बाहरी शिक्षा को स्थापित कर दिया गया।

आप कहेंगे कि ये तो पुरानी बातें है सत्य में क्या हुआ था ये कोई नही जानता तो हम बता दे 1962 और 1971 में चीन के साथ युद्ध हुआ था इस युद्ध मे तंत्र शक्ति का प्रयोग हुआ था। जब भारत अपनी हार की तरफ बढ़ रहा था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने मध्यप्रदेश के दतिया में स्थापित माँ बगलामुखी की तन्त्र विद्या का प्रयोग करवाया था। इसमें 51 हवन कुंडों द्वारा कार्य हुआ था और 11वे दिन की अंतिम आहुति के साथ ही चीन ने अपनी सेना पीछे हटा ली थी। ये हवन कुंड आज भी आपको दतिया में देखने को मिल जाएंगे।

 ये है तंत्र की शक्ति लेकिन ये विद्याएं बहुत खतरनाक थी इसलिए बाहरी लोगों ने इसको समाप्त करने के लिए बहुत प्रयास किये, इनको अंधविस्वास बता दिया गया। यदि सत्य में अंधविस्वास होता तो हमारे देश के तन्त्र द्वारा चैतन्य मंदिरों को तोड़ा नही जाता, गुरुकुल शिक्षा प्रणाली, तन्त्र स्थानों को नष्ट नही किया जाता।

शिव अघोरनाथ
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ऊर्जाओं का रहस्य



इस सृष्टि के संचालन में सकारात्मक और नकारात्मक दोनो ऊर्जाओं का सहयोग है। सभी जीवो में दोनो प्रकार की ऊर्जा होती है। जब मनुष्य क्रोध करता है तो उसमे नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है इसी कारण सही गलत देख नही पाता और जो मनुष्य शुद्ध विचार और क्रोध ना करने वाला होगा उसमे सकारात्मक ऊर्जा की अधिकता होगी उसके पास जाने से ही शांति का अनुभव होगा जैसे हमारे साधु संत होते है। 

आप एक संत से कहो कि किसी की हत्या करदे तो वो नही करेगा चाहे आप उसे कुछ भी दे दे, लेकिन वही एक क्रोधित व्यक्ति को उनकी पसंद की वस्तु दे दो वो आपका कार्य तुरंत कर देगा। जब सृष्टि में अधर्म ( नकारात्मकता) बढ़ता है तो उसे संतुलन में लाने के लिए सकारात्मक शक्ति को नकारात्मक स्वरूप धारण करना पड़ता है। क्योकि नकारात्मक ऊर्जा की प्रवर्ति संहारक,हिंसात्मक होती है। 

जब प्रभु को ऐसे स्वरूप धारण करने पड़ते है तो  सकारात्मकता को भी उसे नियंत्रित करना पड़ता है। जैसे महाकाली ने दानवों के बाद देवो को मारना आरम्भ कर दिया था तब महादेव के सकारात्मक शिव स्वरूप महाकाली के चरणों मे आकर नकारात्मक ऊर्जा को  नियंत्रित किया था। 

नरसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यपु का वध करके पृथ्वी को नष्ट करने लग गए थे तब भगवान शिव ने शरभ अवतार लेकर नरसिंह भगवान की नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित किया था। 

जो अवतार क्रोध स्वरूप में है उनकी पूजन साधना में गलती होती है तो तुरंत दण्ड मिलता है चाहे आप उनके भक्त ही क्यो ना हो लेकिन सकारात्मक ऊर्जा के  स्वरूप में गलती होने पर क्षमादान मिल जाता है।

किसी ने महाकाली का प्रयोग कर दिया मारण के लिए तो महाकाली मारण कर देंगी चाहे सामने उसका भक्त ही क्यो न हो क्योकि उस क्रोध अवस्था मे महाकाली को  देव और दानव में भी भेद भूल गयी थी और सभी का संहार करने लगी थी।

यदि सामान्य मनुष्य की बात करे तो जब क्रोध करते है तो नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है तब सही गलत का बोध नही होता लेकिन जैसे ही क्रोध शांत होता है तो अपनी गलती का अहसास होता है। 

मनुष्य ने धारणा बना ली है कि नकारात्मक ऊर्जा सदैव अहित करती है लेकिन ऐसा नही है नकारात्मक ऊर्जा सृष्टि के लिए कल्याणकारी है। महाकाल, महाकाली, काल भैरव आदि सभी नकारात्मक ऊर्जा के स्वरूप है और सृष्टि का कल्याण करते है। 

शिव अघोरनाथ 

क्रोध की उर्जा का रूपांतरण



जब कभी तुम्हें यह पता चले कि तुम्हें क्रोध आ रहा है तो इसे सतत अभ्यास बना लो कि क्रोध में प्रवेश करने के पहले तुम पांच गहरी सांसें लो। यह एक सीधा—सरल अभ्यास है। स्‍पष्टतया क्रोध से बिलकुल संबंधित नहीं है और कोई इस पर हंस भी सकता है कि इससे मदद कैसे मिलने वाली है? लेकिन इससे मदद मिलने वाली है। इसलिए जब कभी तुम्हें अनुभव हो कि क्रोध आ रहा है तो इसे व्यक्त करने के पहले पांच गहरी सांस अंदर खींचो और बाहर छोड़ो।

क्या होगा इससे? इससे बहुत सारी चीजें हो पायेंगी। क्रोध केवल तभी हो सकता है अगर तुम होश नहीं रखते। और यह श्वसन एक सचेत प्रयास है। बस, क्रोध व्यक्त करने से पहले जरा होशपूर्ण ढंग से पांच बार अंदर—बाहर सांस लेना। यह तुम्हारे मन को जागरूक बना देगा। और जागरूकता के साथ क्रोध प्रवेश नहीं कर सकता। और यह केवल तुम्हारे मन को ही जागरूक नहीं बनायेगा, यह तुम्हारे शरीर को भी जागरूक बना देगा, क्योंकि शरीर में ज्यादा ऑक्सीजन हो तो शरीर ज्यादा जागरूक होता है। जागरूकता की इस घड़ी में,अचानक तुम पाओगे कि क्रोध विलीन हो गया है।

दूसरी बात, तुम्हारा मन केवल एक—विषयी हो सकता है। मन दो बातें साथ—साथ नहीं सोच सकता; यह मन के लिए असंभव है। यह एक से दूसरी चीज में बहुत तेजी से परिवर्तित हो सकता है। दो विषय एक साथ एक ही समय मन में नहीं हो सकते। एक चीज होती है, एक वक्त में। मन का गलियारा बहुत संकरा होता है। एक वक्त में केवल एक चीज वहां हो सकती है। इसलिए यदि क्रोध वहां होता, तो क्रोध वहां होता है, लेकिन यदि तुम पांच बार सांस अंदर—बाहर लो, तो अचानक मन सांस लेने के साथ संबंधित हो जाता है। वह दूसरी दशा में मोड़ दिया गया है। अब वह अलग दिशा में बढ़ रहा होता है। और यदि तुम फिर क्रोध की ओर सरकते भी हो,तो तुम फिर से वही नहीं हो सकते क्योंकि वह घड़ी जा चुकी है।

गुरजिएफ ने कहा था, जब मेरे पिता मर रहे थे,उन्होंने मुझसे केवल एक बात याद रखने को कहा, 'जब कभी तुम्हें क्रोध आये तो चौबीस घंटे प्रतीक्षा करो, और फिर वह करो जो कुछ भी तुम चाहते हो। अगर तुम जाकर कत्‍ल भी करना चाहते हो, जाओ और कर दो कत्‍ल, लेकिन चौबीस घंटे प्रतीक्षा करना।’

चौबीस घंटे तो बहुत ज्यादा है; चौबीस सेकंड चल जायेंगे। प्रतीक्षा करना मात्र तुम्हें बदल देता है। वह ऊर्जा जो क्रोध की ओर बह रही है, नया रास्ता अपना लेती है। यह वही ऊर्जा है। यह क्रोध बन सकती है, यह करुणा बन सकती है। इसे जरा मौका दे दो।

तो पुराने शास्त्र कहते है, 'यदि कोई अच्छा विचार तुम्हारे मन में आता है, तो उसे स्थगित मत करो; उस काम को तुरंत करो। और यदि कोई बुरा विचार मन में आता है, तो उसे स्थगित कर दो; उसे तत्काल कभी मत करो।’ लेकिन हम बहुत चालाक हैं, बहुत होशियार। हम सोचते हैं, और जब भी कोई अच्छा विचार आता है, हम उसे स्थगित कर देते है।

मार्क ट्वेन ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि वह दस मिनट तक एक पादरी को सुन रहा था, किसी चर्च में। व्याख्यान तो असाधारण था और उसने अपने मन में सोचा,आज मुझे दस डॉलर दान करने ही हैं। यह पादरी अद्भुत है। इस चर्च की मदद की ही जानी चाहिए! उसने निर्णय ले लिया कि व्याख्यान के बाद उसे दस डॉलर दान करने ही हैं। दस मिनट और हुए और वह सोचने लगा कि दस डालर तो बहुत ज्यादा होंगे। पांच से काम चलेगा। दस मिनट और हुए और उसने सोचा, 'यह आदमी तो पांच के लायक भी नहीं है।’

अब वह कुछ सुन भी नहीं रहा था। अब वह उन दस डॉलर के लिए चिंतित था। उसने इस विषय में किसी से कुछ नहीं कहा था, लेकिन अब वह अपने को यकीन दिला रहा था कि यह तो बहुत ज्यादा था। जिस समय तक व्याख्यान समाप्त हुआ, उसने कहा, 'मैने कुछ न देने का फैसला किया। और जब वह आदमी मेरे सामने चंदा लेने आया, वह आदमी जो इधर से उधर जा रहा था चंदा इकट्ठा करने के लिए, मैंने कुछ डॉलर उठा लेने और चर्च से भागने तक की बात सोच ली।’

मन निरंतर परिवर्तित हो रहा है। यह गतिहीन कभी नहीं है; यह एक प्रवाह है। तो अगर कुछ बुरा वहां है, तो थोड़ी प्रतीक्षा करना। तुम मन को स्थिर नहीं कर सकते। मन एक प्रवाह है। बस, थोड़ी प्रतीक्षा करना और तुम बुरा नहीं कर पाओगे। लेकिन अगर कुछ अच्छा होता है और तुम उसे करना चाहते हो, तो फौरन उसे कर डालो क्योंकि मन परिवर्तित हो रहा है। कुछ मिनटों के बाद तुम उसे कर न पाओगे। तो अगर वह प्रेमपूर्ण और भला कार्य है, तो उसे स्थगित मत करो। और अगर यह कुछ हिंसात्मक या विध्वंसक है, तो उसे थोड़ा—सा स्थगित कर दो।

यदि क्रोध आये, तो उसे पांच सांसों तक स्थगित करना, और तुम क्रोध कर न पाओगे। यह एक अभ्यास बन जायेगा। हर बार जब क्रोध आये, पहले अंदर सांस लो और बाहर निकालो पांच बार। फिर तुम मुक्त हो वह करने के लिए,जो तुम करना चाहते हो। निरंतर इसे किये जाओ। यह आदत बन जाती है, तुम्हें इसके बारे में सोचने की भी जरूरत नहीं। जिस क्षण क्रोध प्रवेश करता है, तुम्हारे अंदर का रचनातंत्र तेज, गहरी सांस लेने लगता है। तुम सांस शांत और शिथिल लेने लगो, तो कुछ वर्षों के भीतर तुम्हारे लिए नितांत असंभव हो जायेगा क्रोध करना। तुम क्रोधित हो नहीं पाओगे।

कोई अभ्यास, कोई सचेतन प्रयास तुम्हारे पुराने ढांचे को बदल सकता है। लेकिन यह कोई ऐसा कार्य नहीं है जो तुरंत किया जा सकता हो। इसमें समय लगेगा क्योंकि तुमने अपनी आदतो का ढांचा बहुत से जन्मों से बनाया है। यदि तुम एक जीवन में भी इसे बदल सको, तो यह बहुत जल्दी है।
ओशो 
पतंजलि योग सूत्र, भाग 1, प्रवचन- 7

Rajesh Saini

अपने अवचेतन मन को आदेश दीजिए ! “वो कहेगा जो हुक्म मेरे आका” !


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हम अपनी हर समस्या का समाधान औरों में ही क्यों ढूंढते हैं ?
हम क्यों ये चाहते हैं कि मेरी समस्या का हल कोई दूसरा बता दे ? या हम किसी ऐसे महापुरुष की खोज में ही रहते हैं जो हमें हमारी जिंदगी का सही किनारा दिखा दे। खैर, अगर दूसरों से बात करने पर आपको अपनी समस्या का समाधान मिल जाता है तो अच्छा है लेकिन यहां ज़रा सोचने वाली बात ये है कि औरों से बात करने से पहले क्या आपने अपने भीतर उपस्थित अपने अवचेतन मन से बात करने की कोशिश की ? जी हां जिस महापुरुष की खोज में हम बाहरी दुनियां में भटक रहे हैं असल में एक ऐसी महाशक्ति हमारे भीतर ही स्थित है जो सर्वशक्तिमान है, और एक निश्चित समय पर वो जागृत होती है। हमारा मन दो प्रकार का होता है। पहला चेतन व दूसरा अवचेतन। चेतन मन के द्वारा हम जाग्रत अवस्था में सोचते हैं और बाहरी दुनिया का अनुभव प्राप्त करते हैं। अवचेतन मन इन्हीं सब बातों को ग्रहण कर सुरक्षित रख लेता है और उसे पूरा करने में जुट जाता है।

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डॉ जोसेफ मर्फी की रिसर्च क्या कहती है ?
मनोवैज्ञानिक डॉ. जोसेफ मर्फी ने एक शोध से पता लगाया था कि चेतन मन जिस भी बात को स्वीकार करता है और उसके सही और सच होने पर भरोसा करता है हमारा अवचेतन मन उसे स्वीकार कर हकीकत में बदल देता है। अवचेतन मन के आदेश पर मस्तिक उसी प्रकार के हार्मोन पैदा करके उस कार्य को पूरा करता है। डॉ. मर्फी के अनुसार हम जो कुछ भी हासिल करते हैं या नहीं करते वह हमारे विचारों के परिणाम होते हैं”। अवचेतन मन केवल वर्तमान जीवन को ही नहीं प्रभावित करता, बल्कि आत्मा के साथ दूसरा शरीर धारण करते समय भी साथ रहता है। दूसरे जन्म में इसी अवचेतन मन के कारण व्यक्तित्व निर्माण व संस्कार प्राप्त होते हैं। इसीलिए यदि मनुष्य वर्तमान जीवन और अगले जीवन में आनंद चाहता है, तो उसे अपने चेतन मन व अवचेतन मन को सकारात्मक सोच व विचारों से परिपूर्ण करना होगा।

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डॉ. मर्फ़ी ने आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक शोध के साथ स्पष्ट किया ।
अवचेतन मन आपके हर काम को प्रभावित करता है। अवचेतन मन की शक्ति से हम क्या हासिल कर सकते हैं? वो इस प्रकार है। 1. सेहत सुधार सकते हैं और शारीरिक रोग ठीक कर सकते हैं। 2. प्रमोशन पा सकते हैं, तनख़्वाह बढ़वा सकते हैं, लोकप्रियता पा सकते हैं। 3. मनचाही दौलत पा सकते हैं। 4. अपने दोस्तों का दायरा बढ़ा सकते हैं और अपने परिवार, सहकर्मियों तथा मित्रों से बेहतर संबंध बना सकते हैं। 5. अपने वैवाहिक जीवन या प्रेम संबंध को सशक्त बना सकते हैं। 6. डरों और बुरी आदतों से छुटकारा पा सकते हैं। 7. ‘‘चिर युवा’’ रहने का रहस्य सीख सकते हैं।

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मनुष्य अगर विश्वास करे, तो उसके लिए हर चीज संभव है।
क्योंकि हमें खुद ही नहीं पता कि हमारे अंदर क्या-क्या समाया हुआ है। दूसरों से हम अपनी परेशानियों के बारे में बात करके हसीं या मज़ाक का पात्र ही बनते हैं। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो आपके दुख में आपका सहारा बनें और आपको सही मार्गदर्शन दें। जबकि प्रतियोगिता के इस दौर में अगर आप किसी से सहारे की कामना करते हैं या अपना दुख बांटने की कोशिश करते हैं तो वो आपके सामने तो दुखी होने का नाटक करेंगे लेकिन आपकी पीठ पीछे कितने ही लोगों के बीच आपका मज़ाक उड़ाएंगे। इसलिए ऐसे लोगों के वर्ग में न शामिल हों जो आपमे नैगेटिव उर्जा भरें। बस आप अपने अंदर इस तरह के नैगेटिव प्रश्नों को दोहराना बंद करें जैसे “अगर मैं ये काम नहीं कर पाया तो? अगर मैं पास नहीं हुआ तो? अगर मुझे नौकरी नहीं मिली तो? डर व शंकाओं को दूर कीजिए क्योंकि ऐसा डर ही हमें आगे नहीं बढ़ने देता। हम वहीं के वहीं रह जाते हैं कुएं के मेंडक की तरह एक स्थान से बाहर निकलने की कोशिश भी नहीं करते।

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अगर हम चाहें तो हम जीवन में प्रभावशाली प्रभुत्व के स्वामी बन सकते हैं।
आपकी सभी इच्छाएं साकार हो सकती हैं यदि हम अपने अवचेतन मन में छिपी हुई शक्ति का प्रयोग कर लें जिससे हम अपने जीवन में प्रभावशाली प्रभुत्व के स्वामी बन सकते हैं। अवचेतन मन में समाहित शक्तिया प्रकट करने के लिए निम्नलिखित विचार स्मरण रखने योग्य है- 1- हमारा अवचेतन मन हमारी हर बात मानता है। रात को सोनें से पहले अपने अवचेतन मन से कहे,” मै सुबह पांच बजे उठना चाहता हूँ” तो यह आपको ठीक आपके कहे समयानुसार जगा देगा। 2- हमारा अवचेतन मन हमारा उपचार भी कर सकता है। यदि हम रोज़ सोने से पहले अपनी सेहत के बारे में अच्छा कहकर सोएंगे और अपने मन से कहेंगे मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा है और मैं ठीक हो रहा हूं। हमारा अवचेतन मन हमारे आदेशानुसार पालन करेगा। 3- आप जो भी करना चाहते हैं, जिसके लिए आप दिन-रात मेहनत कर रहे हैं और अगर आपने ये तय कर लिया है वो काम करना ही है तो देखिएगा परिस्थितियां आपके अनुसार ही उत्पन्न होनें लग जाएंगी।

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अपने अवचेतन मन को अपने अनुसार ढालने की कौशिश करें।
4- आप जो भी करना चाहते हैं, जिसके लिए आप दिन-रात मेहनत कर रहे हैं और अगर आपने ये तय कर लिया है वो काम करना ही है तो देखिएगा परिस्थितियां आपके अनुसार ही उत्पन्न होनें लग जाएंगी। 5- वास्तव में हमारा अवचेतन मन गीली मिट्टी की तरह होता है जिसे हम जैसा ढालनें की कोशिश करेंगे वो वैसे ही ढल जाएगा। इसी तरह से हमे अपने अवचेतन मन को सही आदेश (विचार और तस्वीरें) देने होगें, जो हमारे सभी अनुभवो को नियंत्रित करता है।

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रोज़ाना नेगेटिव वाक्यों को न दोहराएं ।
इस तरह का वाक्यों का प्रयोग कभी नही करना चाहिए,”मेरे पास इसके लिए पैसे नही है”, “मै ये काम नही कर सकता”, “मेरी तो किस्मत ही खराब है”, मेरे तो कर्म ही फूटे थे”, मेरी किस्मत में कुछ अच्छा होना लिखा ही नहीं है”, मैं कोई भी काम करुं, मेरा काम पूरा होता ही नहीं है”, इससे अच्छा तो मैं मर ही जाऊं” आदि। हम जो सोचते हैं हमारा अवचेतन मन उसी बात को सच मान लेता है इसलिए वह यह सुनिश्चित कर लेता है कि हमारे पास कभी पैसे न रहें या वह काम करने की क्षमता न रहे, जो हम करना चाहते हैं। इसके बजाय दृढ़ता से कहें, ”मैं अपने अवचेतन मन की शक्ति से सारे काम कर सकता हूं।”

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आपका अवचेतन मन आपके आदेश का इंतज़ार कर रहा है ।
7- विश्वास ही जावन का नियम है। विश्वास हमारे मस्तिष्क का एक विचार है। उन चीजो में विश्वास न करें, जो हमे नुकसान या चोट पहुचायें। अपने अवचेतन मन की शक्तियों में विश्वास करें। यह विश्वास रखें कि वे हमारा उपचार करेगीं, प्रेरित करेगी, हमें शक्तिशाली और समृद्ध बनाएंगी। असल में हमें दृढ होने की ज़रूरत है, जरूरत है हमें आत्म-ज्ञानी और आत्मविश्वासी होने की। ज़रूरत है हमें अपने अवचेतन मन से बात करने की और उसे आदेश देने की। देखना आपके काम बनने शुरु हो जाएंगे बस अपने अवचेतन मन को आदेश दीजिए ऐसा लगेगा मानों भीतर से आवाज़ आयी हो “जो हुक्म मेरे आका”

Rajesh Saini

तत्त्वासार

{{{ॐ}}}

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वास्तव मे सृष्टि मे एक ब्रह्म की ही सत्ता है जो विभिन्न रूपों मे अभिव्यक्त हुआ है । इसलिए सभी रूप उससे भिन्न नही है बल्कि भ्रम के कारण आत्मज्ञान के अभाव के कारण ये भिन्न भिन्न प्रतीत होते है । इसी प्रकार शरीर भी भ्रम वश उससे भिन्न प्रतीत होता है तथा जिस भ्रम के कारण प्रतीत होने वाले की सत्ता नही होती ,जिस भ्रम से रस्सी मे सर्प दिखाई देता है किन्तु उसमे सर्प की सत्ता नही होती ,वह रस्सी ही है ।इसी प्रकार शरीर भी भ्रम मात्र ही है ।
जिनको ऐसी शंका होती है कि यदि ज्ञान से अज्ञान का मूल सहित नाश हो जाता है, तो ज्ञानी का यह देह स्थूल कैसे रह जाता है उन मूर्खों को समझाने के लिए श्रुति ऊपरी दृष्टि ऊपरी दृष्टि से प्रारब्ध को उसका कारण बता देती है वह विद्वान को देहादि का सत्य स्व समझाने के लिए ऐसा नही कहती ; क्योंकि श्रुति का अभिप्राय तो एकमात्र परमार्थ वस्तु का वर्णन करने से ही है।
ज्ञानी और अज्ञानी को समझाने की भाषा मे भिन्नता रखनी ही पड़ती है। जिस भाषा मे ज्ञानी अथवा विद्वान को समझाया जाता है उस भाषा मे मूर्ख को नही समझाया जा सकता ।उसको भिन्न प्रतीकों, उदाहरणों के द्वारा ही समझाया जाता है। इसलिए श्रुतियों मे प्रारब्ध को शरीर का कारण बताया गया है वह अज्ञानियों के लिए है। आत्मज्ञानी को यही कहा जाता है, कि सब कुछ ब्रह्म ही है तथा शरीर, प्रारब्ध आदि भ्रममात्र है जिसका को अस्तित्व नही है।
किन्तु अज्ञानी इसे नही मान सकता क्या कि वह शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है इसलिए उसको समझाने के लिए प्रारब्ध की बात कही गई है ज्ञानी के लिए प्रारब्ध जैसी कोई वस्तु ही नही है बल्कि सभी आत्मा ही है एवं आत्मा का कोई प्रारब्ध नही होता है ।
             यदा नास्ति स्वयंकर्त्ता,कारण, न जगत बीजम,।अव्यक्तं च परं शिवम, अनामा विद् यते तदा ।।
जब कोई कर्ता नही होता , कार्य के अभाव मे जगत की उत्पत्ति करने वाला कारण भी नही होता, तब वह सदा शिव एवं नाम रहित होता है ।
यह वर्णन अव्यक्त विभु परमतेजोमय शाश्वत तत्त्व के अनन्त फैलाव से तात्पर्यित है। एक परमतेजोमय , परम सुक्ष्म, कालातीत, भौतिक गुणों से रिक्त, निर्गुण, निष्क्रिय तत्त्व, जहां तक स्थान है वहाँ तक विधमान है। स्थान का कोई अन्तः नही इसलिए इस तत्त्व के अस्तित्व को भी कोई छोर नही है। यह अनन्त है कालातीत है सदा से है सदा रहेगा यह न जन्म लेता है न उत्पन्न होता है, न मृत होता है यही वैदिक परमात्मा का ही वर्णन है।
आत्मा को वैदिक संस्कृति सार के अर्थ मे लेती रही है इस तरह परमात्मा का अर्थ परमसार । इस सृष्टि का जो परमसार है, सृष्टि जिसमे उत्पन्न होती है उस परमसार तत्त्व मे न कोई कर्ता होता है, और नही कोई कर्ता के अभाव मे क्रिया होती है । यह उसकी अव्यक्त अवस्था है इस समय न सृष्टि मे बीज उत्पन्न होता ,न उसके कारण का अस्तित्व होता है। 
 

अशोक वशिष्ठ जी

आकाश तत्व को कैसे शुद्ध करें?


हमारी पंचतत्व श्रृंखला में आज पढ़ते हैं आकाश तत्व के बारे में। यह एक ऐसा तत्व है जिस पर बाकी के चारों तत्व टिके हुए हैं। क्या कुछ ऐसा है जो हम आकाश को अर्पित कर के उसे अपने लिए फायदेमंद बना सकते हैं?
आकाश तत्व को कैसे शुद्ध करें?

आज पढ़ते हैं आकाश तत्व के बारे में। यह एक ऐसा तत्व है जिस पर बाकी के चारों तत्व टिके हुए हैं। क्या कुछ ऐसा है जो हम आकाश को अर्पित कर के उसे अपने लिए फायदेमंद बना सकते हैं?

आधुनिक विज्ञान यह स्वीकार करने लगा है कि आकाशीय बुद्धि या ज्ञान जैसी कोई चीज होती है। इसका मतलब है कि आकाश में एक खास तरह की बुद्धि होती है।

सूर्योदय के बाद, इससे पहले कि सूर्य तीस डिग्री का कोण पार करे, फिर दिन में एक बार और सूर्य के अस्त होने के बाद एक बार आकाश की ओर देखें और शीश झुकाएं - वहां बैठे किसी देवता के लिए नहीं, बस आकाश के लिए।
यह आकाशीय बुद्धि आपके साथ कैसा व्यवहार करती है - वह आपके हित में काम करती है या आपके खिलाफ, इससे तय होगा कि आपका जीवन कैसा होगा। आप एक खुशकिस्मत प्राणी हैं या आप अपना बाकी का जीवन धक्के खाते हुए बिताएंगे, यह आपकी इस योग्यता पर निर्भर करता है कि जाने या अनजाने में आप इस व्यापक बुद्धि से कितना सहयोग ले पाते हैं।
आकाश को पांचवां तत्व कहना सही नहीं है क्योंकि यही सबसे अहम तत्व है। बाकी चार बस उसी के सहारे हैं, आकाश बुनियादी तत्व है। असीम आकाश की गोद में ये चार तत्व यह खेल खेलते हैं। हम सौर मंडल के एक गोल, घूमते ग्रह पर बैठे हुए हैं। यह अपनी जगह पर बना हुआ है तो सिर्फ आकाश की वजह से। आप अपनी जगह पर अपनी काबिलियत के दम पर नहीं बैठे हैं, बल्कि इसलिए बैठे हैं क्योंकि आकाश आपको उस स्थान पर थामे हुए है। आकाश ही इस पृथ्वी, इस सौर मंडल, इस आकाश गंगा और पूरे ब्रह्मांड को अपनी जगह पर थामे हुए है।

अगर आप जानते हैं कि अपने जीवन में आकाश का सहयोग कैसे लेना है, तो यह जीवन धन्य हो जाएगा। इसके लिए आप एक आसान सा काम कर सकते हैं।

 

सूर्योदय के बाद, इससे पहले कि सूर्य तीस डिग्री का कोण पार करे, एक बार आकाश की ओर देखें और आकाश के सामने नत-मस्तक हो जाएं कि आज उसने आपको थामे रखा।
सूर्य के तीस डिग्री का कोण पार करने के बाद, दिन में कभी भी ऊपर देखें और शीश नवाएं।
सूर्य के अस्त होने के बाद, एक बार फिर ऊपर देखकर शीश झुकाएं, वहां बैठे किसी देवता के लिए नहीं, बस आकाश के लिए जिसने आपको आज थामे रखा।
 

सिर्फ इतना करें और देखें कि आपके जीवन में कैसे नाटकीय ढंग से बदलाव आता है।

क्या आपने ध्यान दिया है, तेंदुलकर भी ऊपर देखते हैं? सिर्फ वही नहीं, प्राचीन काल से ही, कोई व्यक्ति जब कोई कामयाबी हासिल करता था तो कामयाबी के उन पलों में वह ऊपर की ओर देखता था क्योंकि अनजाने में ही उसमें यह बोध होता था।

आकाश को पांचवां तत्व कहना सही नहीं है क्योंकि यही सबसे अहम तत्व है। बाकी चार बस उसी के सहारे हैं, आकाश बुनियादी तत्व है। असीम आकाश की गोद में ये चार तत्व यह खेल खेलते हैं।
कुछ लोग भले ही ऊपरवाले के लिए ऊपर देखते हों, लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब आपको कोई गहरा अनुभव होता है, तो अनजाने में ही आपका शरीर कृतज्ञता के भाव में ऊपर की ओर देखता है? कहीं न कहीं एक स्वीकृति है, वहां पर एक बुद्धि है जो उसे स्वीकार करती है।
इस प्रक्रिया को सचेतन दिन में तीन बार करें। अगर आपको आकाश से मदद मिलती है, तो जीवन चमत्कारी ढंग से चलने लगेगा। आपने जिस ज्ञान या बुद्धि की संभावना की उम्मीद नहीं की होगी वह आपकी हो जाएगी।

Isha Foundation

जन्म और मृत्यु


परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

 जीवितो यस्य कैवल्यम् विदेहो$पि स केवलः। 
समाधि निष्ठितामेत्य निर्विकल्पो भवानघ:।।

      अर्थात्--जिसको जीवन काल में ही कैवल्य उपलब्ध् हो गया है, वह शरीरसहित होने पर भी ब्रह्मरूप रहेगा। इसीलिये समाधिष्ठ होकर सभी प्रकार के विकल्पों से शून्य हो जाना चाहिए।
      उपनिषद के इस श्लोक में कितना गूढ़ अर्थ छिपा हुआ है। वास्तव में मनुष्य का जीवन कितना मूल्यवान है ? लौकिक और पारलौकिक  दृष्टि से जो कुछ मनुष्य को पाने योग्य वस्तु है, उसे जीवन के रहते ही पाया जा सकता है। लेकिन ऐसे बहुत से व्यक्ति भी हैं जो मृत्यु के बाद की प्रतीक्षा करते हैं। उनका कहना है कि इस संसार में, इस शरीर में रहते हुए मुक्ति को, ब्रह्म को नहीं प्राप्त किया जा सकता। यह सब मृत्यु के बाद ही सम्भव है।
       जो लोग ऐसा सोचते हैं, वास्तव में वे भारी भ्रम में हैं। सच बात तो यह है कि जो जीवन के रहते नहीं पाया जा सकता, वह मृत्यु के बाद भी नहीं पाया जा सकता।
        मनुष्य का जीवन एक अवसर है--एक स्वर्णिम अवसर, शीघ्र फिर न प्राप्त होने वाला अवसर। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि इस अवसर को चाहे जैसे गँवा दें। नौकरी-व्यापार करके, धन-दौलत इकठ्ठा करके, मान-प्रतिष्ठा अर्जित करके गँवा दें, चाहे चोरी-डकैती, व्यभिचार करके गँवा दें अथवा चाहें तो पूजा-पाठ, ध्यान-धारणा तथा सत्य की खोज में बिता दें। जीवन एक 'तटस्थ' अवसर है। हमें क्या करना है, क्या पाना है, क्या बनना है ?--इन सबसे जीवन का कोई मतलब नहीं। हम कुछ भी करें, जीवन हमें रोकेगा नहीं। जो लोग यह सोचते हैं कि जीवन संसार के लिए है, भोग के लिए है तो वे अपने को धोखा देते हैं।
       मृत्यु अवसर नहीं है। मृत्यु तो है अवसर की समाप्ति। मृत्यु का मतलब है कि अब कोई अवसर नहीं बचा। अवसर समाप्त हो गया। मृत्यु से कुछ पाया नहीं जा सकता। कुछ पाने के लिए अवसर चाहिए और वह अवसर है--एकमात्र 'जीवन'।
       प्रायः यह देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति  मर रहा होता है तो लोग उसके कान में गायत्री मन्त्र पढ़ते हैं, गीता-रामायण सुनाते हैं, राम-नारायण का नाम फूंकते हैं। यह कितनी ना-समझी की बात है। वे गायत्री मंत्र पढ़ते हैं, राम नाम फूंकते हैं मगर उसे कुछ सुनाई ही नहीं पड़ता होता। मृत्यु के समय सारी इन्द्रियां जवाब दे रही होती हैं, आँखें देखना बन्द कर् देती हैं, कान सुनना बन्द कर् देते है, मुंह बोलना बन्द कर् देता है, वाणी अवरुद्ध हो जाती है, प्राण धीरे-धीरे लीन होने लगते हैं अपने मूल बीज में। उस स्थिति में मरने वाला व्यक्ति क्या गायत्री मंत्र सुन सकेगा ? राम-नाम का उच्चारण समझ जायेगा ? लेकिन लोग हैं कि सुनाए चले जाते हैं, गीता-पाठ किये चले जाते हैं।


मुक्ति कैसे प्राप्त हो?

----------: आणवमल ही जन्म-जन्मान्तर के सुख-दुःख, क्लेश- चिंता का कारण हैं :-----------
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

             मुक्ति कैसे प्राप्त हो?
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      चौरासी लाख योनियों का भ्रमण करने के बाद कहीं जाकर मानव योनि प्राप्त होती है। अन्य योनियों में सब कुछ रहता है पर 'मन' नहीं रहता। 'मन' की उपलब्धि होती है केवल मनुष्य को। इसीलिए उसे 'मनुष्य' कहते हैं। मन से मनुष्य बना। मनुष्य मानव इसलिए कहलाता है क्योंकि वह मनु की सन्तान है। जब पहली बार जीव मानव-तन को उपलब्ध होता है ,तो उस अवस्था में उससे लिप्त पिछले चौरासी लाख योनियों के पशुत्व भरे न जाने कौन-कौन से संस्कार रहते हैं। इन्हें तंत्र कहता है--'आणव मल'--

"मिथ्याज्ञानमधर्मश्चासक्तिहेतुश्च्युतिस्तथा।
पशुत्वमूलं पंचैते तन्त्रे हेयाधिकारितः।।

अर्थात्--असत्य, अज्ञान, अधर्म, आसक्ति और पशुता--ये पांच ऐसे प्रमुख हेय और त्याज्य दुर्गुण आणव मल के रूप में  हैं जो मनुष्य के जन्म-जन्मान्तर के पतन के कारण बनते रहते हैं।

      'आणव मल' बराबर जीवात्मा का पीछा करता रहता है, हर जन्म में, हर जीवन में। यही मनुष्य के सभी प्रकार के मानसिक, शारीरिक कष्ट, पीड़ा, दुःख, क्लेश, चिता आदि का एक मात्र कारण है। मनुष्य कितना भी अपना विकास करता जाय लेकिन आणव मल से मुक्त नहीं हो सकता। उसके फल का सामना बराबर करना पड़ेगा। भले ही हम योगी हों, साधक हों, संत हों, महात्मा हों, साधू हों, सन्यासी हों या हों विरक्त --आणव मल से उत्पन्न सुख-दुःख, क्लेश, चिन्ता  आदि को भोगना ही पड़ेगा हर अवस्था में। योगी, साधक, संत, भक्त इसके साक्षात् प्रमाण हैं। अनेक महापुरुषों ने भी आणव मल के परिणामस्वरुप जीवनभर कष्ट भोगा। आणव मल का अस्तित्व जब तक है, तब तक न मुक्ति है, न मोक्ष, न कैवल्य और न है निर्वाण।
       प्रश्न यह है कि आणव मल के इस अभेद्य आवरण को किस प्रकार से भेदा जाय ?
       इस सम्बन्ध में तंत्र-मन्त्र का कहना है कि आणव मल का सर्वथा के लिए नाश न ज्ञान द्वारा संभव है और न तो कार्य के ही द्वारा, यदि संभव है तो मात्र  'क्रिया' द्वारा। क्रिया के माध्यम से ही उसके अस्तित्व का नाश संभव है। मानव शरीर में चौरासी लाख योनियों का आणव मल एकत्र होकर धीरे-धीरे परपक्व होता रहता है। जब तक वह पूरी तरह परिपक्व नहीं हो जाता, तब तक उसका नाश नहीं होता। कंस, रावण, हिरण्य कश्यपु आदि इसके ज्वलंत उदहारण हैं।
    आणव मल को पूर्ण परिपक्व होना ही चाहिए। इसके लिए जीवन में निरपेक्ष और विरक्त भाव चाहिए। कर्म करते रहना चाहिए। उसका परिणाम क्या होगा ?--इस पर सोच-विचार नहीं करना चाहिए।
      आणव मल एक 'सत्तात्मक द्रव्य' है। जिस प्रकार नेत्र में मोतिया बिन्द हो जाने पर उसे उचित समय पर ही ऑपरेशन द्वारा हटाया जाता है, ठीक ऐसी ही स्थिति आणव मल की भी है। परिपक्वता दोनों में आवश्यक है। स्वयं जीवात्मा में ऐसी कोई शक्ति नहीं है जिससे आणव मल का नाश हो सके। आध्यात्मिक ज्ञान, योग, तप, तपस्या, साधना इस दिशा में पूर्ण असमर्थ हैं। तलवार की धार कितनी ही तेज क्यों न हो, वह स्वयं को नहीं काट सकती।
"असिधारा सुतीक्षणा च स्वात्मानमच्छेदिका।"

अष्टांग योग आसन और प्राणायाम

शरीर धर्म को साधने का सबसे पहला साधन है यह सुत्र अपने आप मे अति महत्वपुर्ण है लेकिन इस परम वचन को बिना उसका मर्म समझे उन लोगो ने अपना लिया है जो केवल शरीर को महत्व देते है शरीर कोस्वस्थ और मजबुत बनाने के प्रयास मे रहते है जो कसरत करते व्यायाम करते है और करते है पहलवानी धर्म साधना के प्रथम चरण की तरह नही 
ध्यान व योग के प्रचलित रूप भी शरीर की उपेक्षा करना सिखाते है अष्टांग योग केवल आसन और प्राणायाम की कुछ क्रियाओं मे ही सिमट कर रह गया है योगासनों का उपयोग लोग स्वास्थ्य का लाभ के लिये ही करते है देह के रहस्य को जानने समझने  के लिए नही वेशरीर मन का गुलाम बनाकर प्रसन्न होते है उनके लिये  योग का अर्थ है इन्द्रियो का दमन कर शरीर को अपने वश मे करना योग का लोकप्रिय रूप त्याग पर आधारित है योग पर नही 
एकमात्र तंत्र ही एक एसा शास्त्र है जो शरीर को अन्तर्विज्ञानकी दृष्टि से देखता है
मनऔर तन के संघर्ष में तन को जीतने दे तन को मन पर हावी होने दे तन बहुत अनुभवी है उसकी प्रज्ञा लाखो वर्ष पुरानी है तन सीधे प्रकृति से जुडा है इस विश्व को चलाने वाला जो नियम है उसी को धाराएं शरीर के भीतर भी स्पन्दित होती रहती है इतना भर जान ले कि जहाँ शरीर है वहाँ जीवन है और कहीं नही और कहीं है भी तो वह भोग जीवन है                      
ध्यान के दो प्रयोजन है प्रथमतया सभी साधक सिध्दयों की तरफ दौडते है कुछ विरले ही साधक है जो मोक्ष कामना रखते है ध्याता वैराग्युक्त क्षमाशील श्रध्दालु तथा मोहादि से रहित होना चाहिए ध्यान ध्येय ध्यानप्रयोजन को जानकर उत्साह पूर्वक अभ्यास करे ध्यान से थक जाये तो जप करे पुनः ध्यान करे इस तरह क्रमशः कर अजपा जप का अभ्यास करे
१२ प्राणायामों की एक धारणा होती है १२धारणाओ काएक ध्यान होता है एवं १२ ध्यान की समाधि कही जाती है समाधि मे साधक स्थिर भाव मेस्थिर रहता है और ध्यान स्वरूप से शुन्य हो जाता है सर्वत्र बुध्दि प्रकाश  फैलता है विज्ञानमय शरीर में प्रवेश कर बाद मे अानन्दमय कोश शरीर मे प्रवेश कर परमानन्द को प्राप्त होता है

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