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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

हवन का महत्व

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       फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमें उन्हें पता चला कि हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर ही किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है, तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है। जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है तथा वातावरण को शु्द्ध करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला।

गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है। टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया कि यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो, तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की। क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्ध होता है और जीवाणु नाश होता है ? अथवा नही ? 

उन्होंने ग्रंथों में वर्णिंत हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया कि ये हवन विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी एक किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए। पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी तो एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर 94 % कम हो गया।

यही नहीं उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजूद जीवाणुओं का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के २४ घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से ९६ प्रतिशत कम था। बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।

यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर 2007 में छप चुकी है। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।

अपने स्वजनों परिजनों को इस जानकारी से अवगत कराएँ । हवन करने से न सिर्फ भगवान ही खुश होते हैं, बल्कि घर की शुद्धि भी हो जाती है। भगवान सभी परिजनों को सुरक्षा एवं समृद्धि प्रदान करे। 

ॐ स्वस्ति: 🚩🚩🚩

दिनांक :- ३०.०३.२०२१
---#राज_सिंह---

Vedic science

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शरीर मे प्राण और अपान

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की गति निरन्तर बनी रहती है। ह्रदय से बाहर की ओर जाने वाली श्वाश को प्राण कहा जाता है।तथा बाहर से भीतर आने वाली श्वास को अपान कहा जाता है।

प्राण के निकल जाने पर मृत्यु होती है। तथा अपान के आने से जीवन मिलता है। इसलिए इस अपान को ही जीव कहा जाता है।

जब अपना अपानवायु भीतर प्रवेश करती है। तो ('ह' ) की ध्वनि होती है। तथा श्वास छोड़ते समय (स) की ध्वनि होती है। इस प्रकार ह और स का उच्चारण निरंतर होता रहता है। जिसे हम हंस गायत्री कहते है।

अपान से ही वोध होता है। कि शरीर मे जीवात्मा विद्यमान है। अपान के प्रवेश न करने पर शरीर शव हो जाता है। जब तक शरीर जीवित है। तब तक अपान और प्राण का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है।

यह कब तक चलता राहेगा तथा यह क्रम कब टूट जाएगा इसके विषय मे कुछ नही कहा जा सकता।

जिस प्रकार हकार में ह की आकृति टेढ़ी मेढ़ी होती है। उसी प्रकार यह जीव भी अपनी इच्छा से ही कुटिल घुमावदार आकृति धारण कर लेता है यह वक्रता परमेस्वर की स्वतंत्रत इच्छा शक्ति के कारण होती है।

यह वक्रता प्राणों में आती है। जीव में नही यह जीव प्राण शक्ति के भीतर सूक्ष्म रूप में रहता है। प्राण और अपान की समानता के कारण ही जीव को हंस कहा जाता है। अर्थात हंस की भांति उसमे नीर क्षीर का विवेक प्राप्त होता है।

ह्रदय रूपी आकाश में रहने वाली यह संबित शक्ति इन सबको उत्तपन करने वाली है। इसी को परादेवी कहा गया है। यही दीर्धात्मा तथा परापरा उसी का स्वरूप है। यही श्रेष्ट तीर्थभूमि है। हंस मन्त्र को इसी कारण अजपा गायत्री कहा जाता है। जिनका निरंतर जप चलता है।

इस ह्रदय रूपी भूमि में जहाँ सकार और हकार का सम्लित होता है। अर्थात प्राण और अपान का मिलन हित है। उससे जो आनंद उत्तपन होता है। वह महानंद के नाम से प्रसिद्ध है। इस महानंद का अनुश्ठान करने से ही साधक को वह (शिव ) में ही हु इस प्रकार का ज्ञान हो जाता है।

इसी विचार में निमग्न रहने वाला साधक उस शिव उत्कृष्ट स्वरूप को प्राप्त कर लेता हैं उसमें समाविष्ट हो जाता है। जिससे जीव व शिव का भेद ही मिट जाता है दोनों एक रूप हो जाते है।

ओउम

पंडित महावीर प्रसाद

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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

चेरी की खेती

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चेरी सबसे मनमोहक फल हैं।खट्टा- मिठा स्वाद , गहरा लाल रंग और बेहद आकर्षक दिखने वाला चेरी  मानसून और गर्मियों का फल है। ये खट्टा-मीठा फल खाने में जितना टेस्टी होता है। सेहत के लिए उतना ही फायदेमंद होता है। इसमें पाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेट, विटामिन ए, बी और सी, बीटा कैरोटीन, कैल्शियम, लोहा, पोटेशियम, फॉस्फोरस शरीर को स्वस्थ रखने का काम करते हैं। इन पोषक तत्वों की वजह से चेरी को सूपरफूड की श्रेणी में रखा जाता है। यही पोषक कई प्रॉबल्म को दूर करने में मददगार होता है। अगर रोज 10 चेरी खाई जाए तो आप कई बीमारियों से बच सकते हैं।
आंखों के लिए फायदेमंद

चेरी में विटामिन ए की भरपूर मात्रा पाई जाती है। इसको खाने से आंखों से संवंधित समस्याएं नहीं होती। जिन लोगों को मोतियाबिंद की समस्या हो उनको रोजाना चेरी खानी चाहिए।

याद्दाशत बढाएं
चेरी में याद्दाशत बढ़ाने वाले गुण पाए जाते हैं। जिन लोगों को बातें या चीजें भूलने लगती हैं। उनके लिए चेरी खाना बहुत फायदेमंद होता है। 

अनिद्रा की समस्या से छुटकारा
चेरी में मेलाटोनिन की बहुत मात्रा होती है, जो अनिद्रा की समस्या से छुटकारा दिलाता है। रोजाना सुबह-शाम 1 गिलास चेरी का जूस पीने से अच्छी नींद आने लगेगी। 

 हड्डियां मजबूत
आजकल बहुत से लोगों को हाथों-पैरों की हड्डियों में दर्द होने या हड्डियां संबंधी कई प्रॉबल्मस होने लगती है। हड्डियों की समस्याओं से राहत पाने के लिए रोजाना चेरी खाएं। 

 दिल को रखे हैल्दी
चेरी में आयरन, मैगनीज, जिंक, पोटेशियम आदि कई पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। इसके साथ ही इसमें बिटा कैरोटीन तत्व भी होता है जो दिल की बीमारी को दूर करने में मदद करता है।

कैंसर
चेरी में मौजूद एंटीआक्सीडेंट्स शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति देते हैं। इसके साथ ही चेरी में फिनॉनिक एसिड और फ्लेवोनॉयड भी होता है जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के ऊतकों को बढ़ने से रोकते है। 

 वजन करें कंट्रोल
जो लोग वजन कम करना चाहते हैं उनके लिए चेरी किसी औषधि से कम नहीं है। चेरी में वसा की मात्रा बहुत कम पाई जाती है। इसके साथ 70 % पानी होता है जो घुलनशील फाइबर के लिए अच्छा होता है। रोजाना चेरी खाने वजन कंट्रोल में रहने के साथ ही पाचन तंत्र मजबूत होता। 

 ब्लड प्रैशर रखे ठीक
चेरी में पोटैशियम की मात्रा होती है जो शरीर में स्थित सोडियम की मात्रा कम कर देता है।  इस वजह से शरीर का रक्तचाप स्तर सामान्य हो जाता है। इसी के साथ कोलेस्ट्रोल का स्तर भी कंट्रोल में रहता है। 

डायबिटीज में सहायक
रोजाना चेरी खाने से डायबिटीज की समस्या से राहत पाई जा सकती है। चेरी में पाए जाे वाले गुण चेहरे की रंगत को साफ करने से साथ ही शरीर में इन्सुलिन की मात्रा को कम करके डायबिटीज के स्तर को कम करता है।

त्वचा में लाएं निखार
त्वचा को सॉफ्ट बनाने और रंगत निखारने के लिए चेरी का फल खाएं। आप चाहे तो चेरी का पेस्ट बनाकर भी चेहरे पर लगा सकते हैं। चेरी के पेस्ट को नियमित रूप से चेहरे पर लगाने से मृत कोशिकाएं हट जाती है। डैड सैल्स हटने से चेहरे पर निखार आने लगता है।

चेरी की खेती विश्व में सबसे अधिक यूरोप और एशिया, अमेरिका, तुर्की आदि देशों में की जाती है| जबकि भारत में इसकी खेती उत्तर पूर्वी राज्यो और हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, उत्तराखंड आदि राज्यों में कि जाती है| चेरी स्वास्थ्य के लिये अच्छा फल माना जाता है| यह एक खट्टा-मीठा गुठलीदार फल है| इसमें भरपूर मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते है, जैसे- विटामिन 6, विटामिन ए, नायसिन, थायमिन, राइबोफ्लैविन पोटेशियम, मैगनिज, काॅपर, आयरन तथा फस्फोरस प्रचूर मात्रा में पाए जाते है| इसके फल में एंटीआॅक्सीडेट अधिक मात्रा में होता है, जो स्वास्थ के लिये अधिक अच्छा माना जाता है|

इसको तीन वर्गो में विभाजित किया जाता है, जैसे-

 
1. मीठी चेरी जिसे प्रूनस एवियम कहते है, इसकी मूल क्रोमोजोम संख्या एन- 8 है, इसमें दो वर्ग की चेरी शामिल है एक हार्ट और दूसरी बिगारो|

2. खट्टी चेरी जिसका वैज्ञानिक नाम प्रूनस सीरैसस है, इसमें भी दो वर्ग की चेरी शामिल है, जैसे- एक अमरैलो तथा दूसरी मोरैलो|

3. ड्यूक चेरी जो पहले व दूसरे के संकरण से निकली है, यह एक पालीप्लायड चेरी है, जिसकी मूल क्रामोजोम संख्या 2एन- 32 है, सभी चेरी रोजेसी कुल की सदस्य हैं|

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उपयुक्त जलवायु
चेरी की खेती समुद्रतल से 2,100 मीटर की ऊँचाई के नीचे सफलतापूर्वक पैदा नहीं की जा सकती|परन्तु कश्मीर और कुल्लू की घाटियों में इसे 1500 मीटर की ऊँचाई पर भी सफलतापूर्वक पैदा किया जा सकता है| गर्मी में वातावरण ठंडा और शुष्क होना चाहिए| इसे लगभग 120 से 150 दिन तक अच्छी ठंडक यानि 7 डिग्री सेंटीग्रेट से कम तापमान की आवश्यकता होती है| अतः जिन स्थानों में उक्त दिनो तक 7 डिग्री सेंटीग्रेट से कम तापमान मिलता है वहीं इसे सफलतापूर्वक पैदा किया जा सकता है|

भूमि का चुनाव

 
चेरी की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में की जा सकती है| परन्तु इसके लिये रेतीली-टोमट मिट्टी को अच्छा माना जाता है| रेतीले टोमट मिट्टी जिसका पीएच मान 6.0 से 7.5 होना चाहिए| इस मिट्टी में नमी के साथ साथ साथ उपजाऊ होना भी आवश्यक है| चेरी की खेती के फूलों व फलों को पाले से बचाना जरूरी है|

उन्नत किस्में
चेरी की खेती के लिए अनेक किस्में उपलब्ध है, लेकिन व्यवसायिक दृष्टि से उगाई जाने वाली कुछ किस्में इस प्रकार है, जैसे-

जल्दी तैयार होने वाली किस्में- फ्रोगमोर अर्ली, ब्लेक हार्ट, अर्ली राईवरर्स, एल्टन|

मध्य समय में तैयार होने वाली किस्में- बेडफोर्ड प्रोलोफिक, वाटरलू|

देर से तैयार होने वाली किस्में- इम्परर, फ्रैंसिस, गर्वरनर उड|

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चेरी की किस्में जिन्हें बिगररेउ और हार्ट समूहों में बांटा गया है, जैसे-

बिगररेउ समूह- इस समूह का चेरी सामान्यतः इसका आकार गोलाकार तथा आमतौर पर फल का रंग अंधेरे से हल्के लाल भिन्न होता है, इसमें संकर किस्में जैसे- लैपिंस, सिखर सम्मेलन, सनबर्ट, सैम और स्टेला आदि है|

 
हार्ट समूह- इस समूह के तहत चेरी फल दिल का आकार का होता है, और फल का रंग हल्का लाल तथा रेडिस रंग का होता है|

भारत में चेरी की क्षेत्र के आधार पर किस्में इस प्रकार है, जैसे-

हिमाचल प्रदेश- वाइट हार्ट, स्टैला, लैम्बर्ट, पींक अर्ली, तरतरियन, अर्ली रिवर और ब्लैंक रिबलन आदि|

जम्मू कश्मीर- बिगरेयस नायर ग्रास, अर्ली परर्पिल, गुनेपोर, ब्लैक हार्ट आदि|

उत्तर प्रदेश- गर्वेनश वुड, बेडफोर्ड, ब्लैक हार्ट आदि|

पौधे तैयार करना
पौधे तैयार बीज के माध्यम से या जड़ कटाई द्वारा किए जाते है| मुख्य रूप से ग्राफ्टिंग पद्धति के माध्यम से चेरी पौधों को लगाया जा सकता है| आमतौर पर बीज अंकुरण के लिए शीतल उपचार की आवश्यकता होती है| आमतौर पर इसके बीज पूरी तरह से पके फल से निकाले जाते हैं| इन बीज को सूखे और ठंडे स्थान पर संग्रहीत किया जाना चाहिए| लगभग एक दिन के लिए इसके बीज को विशेष विधि से भिगोया जाता है|

पौधे ऊपर उठी क्यारियों में लगाए जाते हैं, इन क्यारियों की चैड़ाई 105 से 110 सेंटीमीटर व ऊँचाई लगभग 15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए, दो क्यारियों के बीच में 45 सेंटीमीटर का अन्तर रखा जाना चाहिए| क्यारियों में पौधों को चार पंक्तियों के बीच में 15 से 25 सेंटीमीटर की दूरी व पौधे की आपसी दूरी सेंटीमीटर रखना आवश्यक है| पौधों की रोपाई दिन के ठंडे समय में की जानी चाहिए|

प्रवर्धन और मूलवृन्त
चेरी की खेती या बागवानी हेतु कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में चेरी का अलेंगिक प्रवर्धक रोपण द्वारा तथा चश्मा चढ़ाकर किया जाता है| रोपण फरवरी में करते है और रिंग चश्मा जून और सितम्बर में चढ़ाते हैं| कश्मीर में चेरी का रोपण मैजर्ड प्रकंद से जो सकर्स निकलते है, उन पर किया जाता है| हिमाचल प्रदेश में इसका पाजा के बीजू पौधों पर रोपण करते है| पाजा के पेड़ जंगली पैमाने पर हिमाचल प्रदेश में उगते हैं, इनके पत्ते गिरते नहीं, अभी हाल ही में प्रूनस कारन्यूटा का भी प्रकंद इस्तेमाल किया गया है|

नर्सरी पैमाने पर यह सफल साबित हुआ है, कारन्यूटा का प्रकंद ओजस्वी और ठंड और वैक्टरीनियल गमोसिस के प्रति सहिष्णु है|अन्य देशों में माजार्ड और माहले के प्रंकद अधिक इस्तेमाल किये जाते हैं| फ्रांस और जर्मनी में स्टाक्टन मोरेलो का प्रकंद भी इस्तेमाल किया जाता हैं, खट्टी चेरी के लिए यह एक अच्छा प्रकंद है| सेब की तरह चेरी में अभी कोई बामन किस्म का प्रकन्द विकसित नहीं किया गया है|

पौधरोपण

चेरी में रेखांकन एवं पौध रोपण अन्य अष्ठिफलों जैसे आडू, प्लम आदि की तरह किया जाता है| पेड़ लगभग 10 मीटर की दूरी पर लगाये जाते हैं| लगाने के बाद लकड़ी गाढ़कर पौधो को आरम्भ में सहारा देना चाहिये| सूरज की तेज रोशनी से पौधे के तने पर बूरा प्रभाव पड़ता है| अतः इससे बचने के लिए तने पर चूने का लेप कर दें या इसे किसी कार्ड बोर्ड की पट्टी से ढ़क देना चाहिए| चेरी की खेती के लिए खेत की तैयारी और रोपण की अधिक जानकारी के लिए आडू की खेती कैसे करें लेख पढ़ें- आड़ू की खेती कैसे करें, जानिए उपयुक्त जलवायु, किस्में, रोग रोकथाम, पैदावार

परागण
चेरी की लगभग सभी किस्मों में स्वअनिषेच्यता पायी जाती है| अतः इनमें पर-परागण आवश्यक होता है| कुछ किस्मों में जैसे बिंग, लैम्बर्ट और नेपोलियन आदि में पर अनिषेच्यता भी मिलती है, इन किस्मों के लिए डूय्‌क किस्म परागण का काम करती है| अधिकांश मीठी किस्मों के परागण के लिए फ्रागमोर किस्म सबसे अच्छी पाई गयी है और खट्टी किस्मों में स्व-परागण से फल बनते हैं| अतः इनमें परागकारी किस्म लगाने की आवश्यकता नहीं पडती हैं|

सिंचाई और खरपतवार

मीठी चेरी को अन्य फलों की अपेक्षा बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है| इसका कारण यह है, कि इसके फल बहुत जल्दी पककर तैयार हो जाते हैं| जिससे इन्हें अधिक गर्मी का सामना नहीं करना पड़ता| परन्तु यदि ऐसी सूखी जलवायु में इसके पेड़ हों जहां उत्स्वेदन की क्रिया अधिक हो तो ऐसे स्थान में पेडों को पानी की आवश्यकता पडेगी| नमी बनाये रखने के लिए इसके उद्यान में मल्चिंग (पलवार बिछाना) अधिक लाभप्रद सिद्व हुई है| खट्टी चेरी में उत्स्वेदन अधिक होता है| अतः इसे अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है| चेरी के बाग में खरपतवार नहीं होने चाहिए|

खाद और उर्वरक
स्वीट चेरी के पेड़ आडू की अपेक्षा अधिक नाइट्रोजन लेने की क्षमता रखते हैं| पोटाश की कमी के लक्षण भी पेड़ों पर नहीं मिलते क्योंकि मिट्टी से पोटाश लेने की क्षमता इसके पेड़ों में अधिक होती है| खाद की जो मात्रा सेब के लिए बतायी गयी है, वही मात्रा स्वीट चेरी को भी दी जानी चाहिए| खट्टी चेरी को नाइट्रोजन की अधिक मात्रा दी जानी चाहिए| इसके लिए आप सेब की खेती कैसे करें पढ़ें- सेब की खेती कैसे करें, जानिए उपयुक्त जलवायु, किस्में, रोग रोकथाम, पैदावार

सघाई और कटाई-छटाई

चेरी के पेड़ बिना अधिक काट छांट के ही उचित आकार ग्रहण कर लेते हैं, फिर भी पेड़ों की ट्रेनिंग परिवर्तित अग्र प्ररोह विधि द्वारा की जाती है| मीठी चेरी में फूल दीर्घकालीन स्पर पर लगते हैं| ये स्पर 10 से 12 साल तक फूल-फल देते रहते हैं| इसलिए अन्य पर्ण पाती फल वृक्षों की अपेक्षा इसमें नयी लकड़ी के लिए बहुत कम काट-छांट की आवश्यकता होती है| यदि पेड़ की ट्रेनिंग ठीक ढंग से की गई तो फलत में आये पेड़ को उत्पादन में रखने के लिए किसी विशेष काट-छाट की आवश्यकता नहीं होती|

काट-छांट इस प्रकार करनी चाहिए कि प्रत्येक वर्ष लगभग 10 प्रतिशत पुराने स्पर निकाल दिये जायें जिससे नये स्पर का निकास हो सके| कहने का तात्पर्य यह है कि इसमें बहुत हल्की काट-छांट की जरुरत पड़ती है| हल्की काट-छांट के अतिरिक्त बाग की मिट्टी सही हालत में रखना आवश्यक है| जिससे इसका अच्छा उत्पादन दीर्घ काल तक मिलता रहता है|

रोग और कीट रोकथाम
बैक्टीरियल गमोसिस- बैक्टीरियल गमोसिस चेरी का प्रमुख रोग है|

रोकथाम- रोगजनित भाग को छीलकर अगल कर लें और चौबटिया पेस्ट लगाये| पतछड़ और बसंत ऋतु में एक एक छिड़काव बोर्डोमिश्रण का करें|

लीफ स्पाट- ग्रसित पत्तियों में बैंगनी धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में बढ़कर लाल-भूरे क्षेत्र के अन्दर भूरे रंग के दिखते हैं| जब धब्बों के सूखे हुए क्षेत्र झड़ जाते हैं, तोपत्तियों में छेद दीखने लगते हैं, बाद में पूरीपत्ती का हरपन समाप्त हो जाता है, और पत्तियाँ गिर जाती है|

रोकथाम- पत्तों के गिरने या कलियों के सूखने के समय ज़ीरम या थीरम 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें|

भुरी व्याधि- फल तोड़ते समय वातावरण की अर्द्रता के कारण यह रोग फैलता है| मीठी और ड्यूक किस्मों में इसका प्रकोप अधिक होता है| सडे़ हुए हिस्सों में पाउडर की तरह भूरे रंग के स्पोर बन जाते हैं|

रोकथाम- कैप्टान का छिड़काव दो बार करें 15 दिन के अन्तराल से|

ब्लेक फ्लाई- चेरी की खेती का यह मुख्य हानिकारक कीट है, नये साखाओं व पत्तियों को इसके झुंड कुंचित कर देते हैं और शहद जैसा पदार्थ छोड़ते हैं| जो फलों को बाजार के अयोग्य बना देते हैं|

रोकथाम- उपचार के लिए नीम का काढ़ा कीटनाशी या रोगोर का प्रयोग करें|

फल तुडाई और पैदावार 
चेरी के पेड़ लगाने के पांचवें साल बाद फल देना आरम्भ कर देते हैं और दस साल तक अच्छी तरह फलने लगते हैं| इसके पेड़ काफी दीर्द्यजीवी होते है और अच्छी देखभाल से 50 साल तक फल देते रहते हैं| फल मई के मध्य में पकना आरम्भ हो जाते हैं, इसमें कभी-कभी फल फटने की समस्या गम्भीर हो जाती है| परन्तु बिंग और ब्लैक हार्ट किस्मों के फल अधिक नहीं फटते| चेरी में फल विरलन करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उपज प्रायः कम होती है|

एक पेड़ से लगभग 15 से 25 किलोग्राम फल पैदा होते हैं| फल पकने के पहले तोड़ना ठीक रहता है, क्योंकि पूरा पकने पर वे जल्द खराब होने लगते है| फलों को छोटी छोटी टोकरियों या लकड़ी के बक्सों में पैक किया जाता है| मीठी चेरी ताजी ही खायी जाती है| खट्टी को शाक के रुप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है| इसका मुरब्बा भी अच्छा बनता है, डिब्बाबन्दी के लिए भी इसका इस्तेमाल होता हैं|
#एक_पहल
#आजाद_मन 
अनील शाह 
#जन_सेवा_समाज_सेवा
#किसान_की_जीत_देश_का_हीत

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श्रीचक्र साधना

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{{{ॐ}}}

                                                                     #श्रीचक्र

षोडशी विधा मे श्री चक्र का प्रयोग साधना मे किया जाता है । इस चक्र का उद्भव  तो प्रकृति करती है, किन्तु इसके ज्ञान का उद्भव शिवलिंग (मातृशक्ति) के पूजको के समुदाय मे हुआ था । aऔर इसे भैरवीचक्र,शक्तिचक्र,आधाचक्र,सृष्टिचक्र, आदि कहा जाता है ।s श्रीचक्र इसका वैदिक संस्करण है। लोग ताँबे आदि के पत्र पर इसे खुदवाकर  पूजाघरों  मे स्थापित कर लेते है। और धूप दीप दिखाकर पूजा करके समझते है , कि उन्होंने श्रीचक्र  की स्थापना कर ली है परन्तु यह बहुत भारी भ्रम है।h श्रीचक्र की घर मे स्थापना का वास्तविक अर्थ -- घर को इस स्वरूप मे व्यवस्थित करना ।o यह चक्र भूमि चयन से लेकर घर बनाने और उसकी व्यवस्थाओं ( कमरे ,सजावट आदि) को श्रीचक्र के अनुसार व्यवस्थित करने , उसका चिन्तन करने और उसमे देवी स्वरूप की छवि देखने सम्बन्धित है ।
इसका यह भी अर्थ है कि घर की व्यवस्था एवं नियन्त्रण किसी शक्ति (नारी) के हाथ मे हो और समस्त परिवार उससे शक्ति प्राप्त करके उन्नत हो । इस चक्र को घर मे स्थापित करने के बाद नारी का सम्मान करना उसे शक्ति रूपा समझना और उसका अपमान न करना अनिवार्य हो जाता है।k
षोडशी विधा के समस्त स्वरूपों यथा - कुलमार्ग, शाक्त मार्ग,बौद्ध मार्ग ,कापरूपमार्ग, राधाकृष्ण मार्ग, पुष्टिमार्ग, मधु मार्ग,साधना मार्ग ,आदि घर मे श्रीचक्र की स्थापना का अर्थ है अपने गृह मे एक कालक्रम मे इन साधनाओं  मे से अपने द्वारा चयनित साधनाओं का गुरू निर्देश मे आयोजन करवाना। इसके वैदिक संस्करण भी अनेक मार्गों मे व्याप्त है । k
जैसे कुमारी पूजा विधान भी इस प्रकार का संस्कारित विधान है। शाक्तमार्ग मे यह केवल पशुभाव  के साधक के लिए अनुमेय है। वीर साधक एवं दिव्यभाव  के साधकों के लिए कुमारी पूजा की वर्जना है। कुछ रूढ़गत संस्कारों से युक्त लोग यह सोच सकते है कि यह अनाचार है । परन्तु विचार किजिये  कि जिन पाप पुण्य के संस्कारों मे बँधे आप जी रहै है, वह सुख दो रहा है , या आप उससे आध्यात्मिक या भौतिक लाभ पा रहे , क्या जिन सामाजिक, धार्मिक रूप नैतिक संस्कारों के आदर्शों पर आज के परिवार, समाज, राष्ट्र, संस्कृति या विभिन्न धर्मों के नियम का जाल आप पर लदा हुआ है।u
वह आपके लिए सुखमय ,संतोषप्रद है क्या नारी पुरूष के रिश्ते को समाज ने जिस धर्म के नियमो से बाँध कर सबको भयभीत कर रखा है, उसके आदर्शों को कभी भी कहीं भी प्राप्त नही किया जा सका। इसकी विकृतियों से त्राहिमाम् करते हुए नारी और पुरूष आधुनिक विश्व के लिए समस्या बने हुए है।m 
नैतिकता, भावुकता, मर्यादा, कानुन का पाठ पढाये जा रहे है, किन्तु नतीजा क्या स्मरण रखे !आपने स्वयं ही प्रकृति विरूद्ध नियमों को बनाकर स्वयं को जकड लिया है और यह सोचते है कि देवी शक्तियाँ नियमों के पालन से प्रसन्न हो जायेगी ओर परलोक मे स्वर्ग मिलेगा वरना दुःख भोगना पडेगा।m
शाक्तसाधकों की दृष्टि मे यही पशुभाव है, क्यो

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लघु दुर्गा सप्तशती

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{{{ॐ}}}   

                                                      #लघु_दुर्गा_सप्तशती

ॐ वींवींवीं वेणुहस्ते स्तुतिविधवटुके हां तथा तानमाता,
स्वानंदेमंदरुपे अविहतनिरुते भक्तिदे मुक्तिदे त्वम् ।
हंसः सोहं विशाले वलयगतिहसे सिद्धिदे वाममार्गे,
ह्रीं ह्रीं ह्रीं सिद्धलोके कष कष विपुले वीरभद्रे नमस्ते ।। १ ।।

ॐ ह्रीं-कारं चोच्चरंती ममहरतु भयं चर्ममुंडे प्रचंडे,
खांखांखां खड्गपाणे ध्रकध्रकध्रकिते उग्ररुपे स्वरुपे ।
हुंहुंहुं-कार-नादे गगन-भुवि तथा व्यापिनी व्योमरुपे,
हंहंहं-कारनादे सुरगणनमिते राक्षसानां निहंत्रि ।। २ ।।

ऐं लोके कीर्तयंती मम हरतु भयं चंडरुपे नमस्ते,
घ्रां घ्रां घ्रां घोररुपे घघघघघटिते घर्घरे घोररावे ।
निर्मांसे काकजंघे घसित-नख-नखा-धूम्र-नेत्रे त्रिनेत्रे,
हस्ताब्जे शूलमुंडे कलकुलकुकुले श्रीमहेशी नमस्ते ।। ३ ।।

क्रीं क्रीं क्रीं ऐं कुमारी कुहकुहमखिले कोकिले,
मानुरागे मुद्रासंज्ञत्रिरेखां कुरु कुरु सततं श्रीमहामारि गुह्ये ।
तेजोंगे सिद्धिनाथे मनुपवनचले नैव आज्ञा निधाने,
ऐंकारे रात्रिमध्ये शयितपशुजने तंत्रकांते नमस्ते ।। ४ ।।

ॐ व्रां व्रीं व्रुं व्रूं कवित्ये दहनपुरगते रुक्मरुपेण चक्रे,
त्रिःशक्त्या युक्तवर्णादिककरनमिते दादिवंपूर्णवर्णे ।
ह्रीं-स्थाने कामराजे ज्वल ज्वल ज्वलिते कोशितैस्तास्तुपत्रे
स्वच्छंदं कष्टनाशे सुरवरवपुषे गुह्यमुंडे नमस्ते ।। ५ ।।

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोरतुंडे घघघघघघघे घर्घरान्यांघ्रिघोषे,
ह्रीं क्रीं द्रं द्रौं च चक्र र र र र रमिते सर्वबोधप्रधाने ।
द्रीं तीर्थे द्रीं तज्येष्ठ जुगजुगजजुगे म्लेच्छदे कालमुंडे,
सर्वांगे रक्तघोरामथनकरवरे वज्रदंडे नमस्ते ।। ६ ।।

ॐ क्रां क्रीं क्रूं वामभित्ते गगनगडगडे गुह्ययोन्याहिमुंडे,
वज्रांगे वज्रहस्ते सुरपतिवरदे मत्तमातंगरुढे ।
सूतेजे शुद्धदेहे ललललललिते छेदिते पाशजाले,
कुंडल्याकाररुपे वृषवृषभहरे ऐंद्रि मातर्नमस्ते ।। ७ ।।

ॐ हुंहुंहुंकारनादे कषकषवसिनी मांसि वैतालहस्ते,
सुंसिद्धर्षैः सुसिद्धिर्ढढढढढढढः सर्वभक्षी प्रचंडी ।
जूं सः सौं शांतिकर्मे मृतमृतनिगडे निःसमे सीसमुद्रे,
देवि त्वं साधकानां भवभयहरणे भद्रकाली नमस्ते ।। ८ ।।

ॐ देवि त्वं तुर्यहस्ते करधृतपरिघे त्वं वराहस्वरुपे,
त्वं चेंद्री त्वं कुबेरी त्वमसि च जननी त्वं पुराणी महेंद्री ।
ऐं ह्रीं ह्रीं कारभूते अतलतलतले भूतले स्वर्गमार्गे,
पाताले शैलभृंगे हरिहरभुवने सिद्धिचंडी नमस्ते ।। ९ ।।

हंसि त्वं शौंडदुःखं शमितभवभये सर्वविघ्नांतकार्ये,
गांगींगूंगैंषडंगे गगनगटितटे सिद्धिदे सिद्धिसाध्ये ।
क्रूं क्रूं मुद्रागजांशो गसपवनगते त्र्यक्षरे वै कराले,
ॐ हीं हूं गां गणेशी गजमुखजननी त्वं गणेशी नमस्ते ।। १० ।।

इसमें दस श्लोक लघु दुर्गा सप्तशती में परमेश्वरी के वीरभद्रा व्यापिनी महेशी अन्नता गुह्यमुंण्डा वज्रदंण्डा ऐन्द्रीं भद्रकाली सिद्धचंण्डी गणेशी रुपों का वर्णन और प्रणति निवेदन किया गयाa कांता  गुह्यमुंण्डा वज्रदंण्डा ऐन्द्रीं यह चार रूप अत्यंत उग्र हैं। इनका रहस्य स्वरूप ज्ञान वाममार्ग में होता है ज्ञानमार्ग में व्यापिनी की परिधि में इन रूपों का विराट दर्शन होता हैs सप्तशती में भी यह रूप पर कथा विस्तार में वे अन्तर्हित से हो गए हैं यहां कथा नहीं है वस्तुत यह स्वरूप की दुर्गति का कारण बनते हैं और परमेश्वरी के शरणागत होने पर यह दुर्गतिनाशिनी दुर्गा की कृपाकटाक्ष हो जाते हैं।
जब वह निग्रहकारिणी होती हैं तो यह स्वरूप व्यक्ति को मोह ग्रस्त करके अज्ञान के तामिस्र लोकों में धकेल देते हैं मोहग्रस्त व्यक्ति त्रिपुरा को भूलकर इनमें भूल जाता है जैसे बालक क्रीडा से मुक्त होकर मां को भूल जाता है पर क्रीडनक के टूटने पर अथवा परमा की अकाण्ड करुणा से जब उसको मातृस्मरण हो जाता है hऔर वह आर्तभाव से उसे पुकारता है तो वहीं निग्रहकारिणी करूणार्द्र होकर अनुग्रहकारिणी के रूप में आती है।
उसके बंधन पास भी बनते है तो ग्रन्थि भी मोह के पेशल संबंध भी बांधते हैं तो मद के घर्षक दोषरज्जु भी व्यक्ति को लपेटती लथेडती है वह यह चाहती है oकि यह कल्मष उसे छू भी ना सके वह इतना शुभ्र हो जाए कि यह उसे कुलुषित कर ही न सके उसकी कृपा का आनंद लेने के लिए साधक के संपूर्ण में उसका श्रद्धारूप चमकने लगे लधुसप्तशती ने ज्ञान की तटस्थ वृत्ति भक्ति की अरुणिमा से रंजित होकर प्रकट हुई है
 परमा को उसके चरित्रों के माध्यम से नहीं शुद्ध मूल रूप में भजा गया है इसके गान की अवस्था में ज्ञान के निर्बंन्ध "में भाषा और भाषा का व्याकरण गौण हो गया है सप्तशती का जो फल है वहीं इसका है पर इसमें बीजों की प्रधानता है इसलिए जिस साधक में इतनी योग्यता आ गई हो उसके लिए यह भी उतनी ही फलप्रद है और जो भी इतना योग्य नहीं हुआ है उसे इसके अधिक पाठ करने पर वह योग्यता प्राप्त होती है।
इसकी फलश्रुति नहीं दी गई है नहीं कोई विस्तृत वर्णन विधि समझाने की बात है यह है कि इसमें जिन दस रूपों की स्तुति की गई है उन रूपों में जो गुण प्रभाव निहित हैंk वहीं इस पाठ के फल स्वरुप प्राप्त होता है इन सबका संघनित रूप दुर्गा है अतः इसकी अधिष्ठातृ दुर्गा चंण्डी होगी।sabhar sakti upasak Facebook wall

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बुधवार, 31 मार्च 2021

योग के दृष्टि से आयु पे नियंत्रण

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अब योग के दृष्टि से आयु पे नियंत्रण की मनोवैज्ञानिक अथवा आध्यात्मिक प्रभाव एवं स्तर को जान अथवा समझ लेना अवयशक हैं

देखो उम्र और स्वाँस का वही सम्बंध होता हैं जो किसी गाड़ी और इधन की होती हैं जैसे जैसे गाड़ी की इधन जहाँ जाकर समाप्त हो जाती हैं वहीं उसका विराम लग जाता फिर चाह कर भी वहाँ से आगे अपनी गाड़ी को नहीं लेकर जा सकता चाहे उसका गंतव्य स्थान आए या नहीं आए और एक बात ये भी हैं की इस शरीर रूपी गाड़ी को प्राणी बिना मतलब इधर उधर चलाते जा रहा हैं उसपे ब्रेक लगाने की कला ही उसे मालूम नहीं हैं जब उसका कोई कार्य नहीं हैं अथवा बिना रास्ते का खबर रहे वो निरंतर अनजान और ग़लत दिशा में भागे जा रहा हैं और जब तक गाड़ी भाग रही हैं चाहे वो किसी भी दिशा में भागे इधन तो कम तटपश्चात समाप्त होगी ही ना उसे क्या मतलब की तुम किस दिशा में जा रहे हो सही दिशा में या ग़लत दिशा में ।

दूसरा पहलू योग के दृष्टि में जीवन क्या हैं स्वाँस और प्रस्वाँस की क्रिया का निरंतर जारी रहना ही जीवन हैं योग की मतअनुसार परंतु जिस साधक को इस स्वाँस और प्रस्वाँस की क्रिया को विराम देने की ठहराने की कला मालूम हैं उसका स्वतः आयु पे नियंत्रण स्थापित होने लगता हैं क्यूँकि वो उस इधन रूपी स्वाँस को एक सही दिशा में ही खर्च करता हैं और बिलकुल जागृत और बोध के साथ खर्च करता हैं की इतने इधन में
मुझे गंतव्य स्थान तक पहुँचना हैं और इस तथ्य से भी वो भली भाँति परिचित हैं की जितना इधन हैं वो
पर्याप्त हैं उस परम तत्व को जानने अथवा वहाँ तक की दूरी तय करने हेतु बशर्ते इस इधन को बचाने अथवा सही रास्ते की ओर जाने में लगाए तब।

अब जब प्राण की कोशों में बदलाव आती धीरे धीरे स्वाँस की आयु अथवा अविधि कम होने लगती अर्थात जो प्राणऊर्जा समस्त इंद्रियों अथवा कोशों में पहुँचनी चाहिए वो वो एक समान रूप से पहुँच नहीं पाती तत्पश्चात तन पे इसकी प्रभाव पड़नी प्रारंभ हो जाती हैं और इंद्रियाँ एवं त्वचा जर्जर होने लगती हैं अर्थात बुढ़ापा प्रारंभ होने लगती हैं इसी प्रकार आंतरिक तंत्र रूपी यंत्र जैसे गुर्दे, किडनी, फेफड़े, एवं हृदय में स्पंदित हो रही ऊर्जा रूपी वायु भी मंद पड़ने लगती हैं जिससे उसकी पोषण तत्व में भी कमी आने लगती हैं।sabhar satsang Facebook wall


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