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शनिवार, 11 सितंबर 2021

ब्रह्म साक्षात्कार

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❓ ब्रह्म साक्षात्कार का वास्तविक अर्थ क्या है ? हम कैसे जानेंगे कि हमने ब्रह्म साक्षात्कार कर लिया है?
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ॐ जब साधक साधना करते हुए प्राण वायु पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है और प्राण का प्रवाह सुषुम्ना मार्ग के अवरोधों को पार करते हुए आज्ञा चक्र को पार कर  नाद ध्वनि का साक्षात्कार कर लेता है , तब उसे मानना चाहिए कि वह ब्रह्म के क्रियात्मक अस्तित्व को जानने लगा है ।उसकी क्रिया शक्ति को उसने अपने ही शरीर में महसूस कर लिया है । यह नाद 10 प्रकार का होता है । इसमें सबसे उच्च स्तरीय नाद ओंकार की ध्वनि के समान है ।यह नाद ही है जो संपूर्ण ब्रह्मांड को गतिमान किए हुए है और हमारे संपूर्ण शरीर की क्रियाओं को संचालित करने का मुख्य कारण यह नाद ब्रह्म ही है । यदि इस संपूर्ण  ब्रह्मांड के सृजन एवं क्रिया का कारण खोजा जाए तो यह नाद ही इसका एकमात्र कारण है । हमारे शरीर में यह नाद ही कारण शरीर का प्रतिनिधित्व करता है । इसे हम ईश्वर भी कह सकते हैं जो त्रिगुणात्मक प्रकृति को नियंत्रित एवं संचालित करता है । इसी के द्वारा त्रिगुणात्मक प्रकृति का संचालन हो रहा है।जब साधक नाद ब्रह्म का साक्षात्कार करता है तो प्रारंभ में यह नाद अत्यंत धीमा होता है  किंतु बाद में यह बहुत तीव्र होता जाता है उच्च स्तरीय तीव्रता को प्राप्त होने के बाद जैसे-जैसे साधक अपनी साधना को आगे बढ़ाते जाता है ,वैसे वैसे यह नाद  क्रमश  धीरे-धीरे धीमा होता चला जाता है और यही नाद प्रकाश तत्व में बदलता जाता है । धीरे-धीरे साधक का आज्ञा चक्र पूर्ण प्रकाशित हो जाता है और ऐसी स्थिति में उसे अमृत के स्राव का आनंद भी प्राप्त होने लगता है । इससे आगे जैसे-जैसे साधक की साधना आगे बढ़ती है। आज्ञा चक्र से प्रकाश तत्व का विस्तार सहस्रार चक्र की ओर होने लगता है । सहस्रार चक्र में प्रकाश तत्व का विस्तार पूर्ण व्यापक होने लगता है । संपूर्ण सहस्रार चक्र प्रकाशित होता जाता है और सहस्रार चक्र से असीम आनंददायी लहरें उठने लगती हैं । इस स्थिति में अमृत का स्राव अत्यधिक बढ़ जाता है । इससे संपूर्ण शरीर आनंद की आगोश से भर जाता है । जब संपूर्ण शरीर में यह आनंद दोड़ने लगता है और  साधक घंटों इस आनंद में डूबा रहता है ,तभी सहस्रार चक्र से एकाएक हृदय चक्र में असीम तेजोमयी श्वेत शीतल  प्रकाश उत्पन्न होता है ।एक श्वेत शीतल आनंददायी प्रकाश जिसे प्राप्त करके साधक पूर्ण आत्म विभोर हो जाता है । इसे प्राप्त करके साधक अपनी पूर्णता का अहसास करता है। साधक अपने भीतर एवं बाहर संपूर्ण सृष्टि में एक ही आत्म तत्व का विस्तार प्रकाशित होता हुआ देखता है। यही है -"परब्रह्म  के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार "। यदि कोई साधक यहां तक पहुंच पाता है और संसार की इस महानतम उपलब्धि को प्राप्त करता है  तो उसे मान लेना चाहिए कि उसने ब्रह्म की क्रिया शक्ति के साथ अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप अर्थात ब्रह्म स्वरूप का साक्षात्कार कर लिया है ।उसकी आत्मा ने अपने ब्रह्म स्वरूप को बुद्धि के समक्ष प्रकट कर दिया है। यह किसी भी  उच्च स्तरीय योगी साधक के द्वारा ब्रह्म के स्वरूप को व्यक्त करने की अंतिम शब्द सीमा है। इससे आगे  कोई भी महानतम साधक  एक भी शब्द  अभिव्यक्त नहीं कर सकता  क्योंकि अब अभिव्यक्त करने जैसा कुछ भी नहीं है ।इससे आगे बढ़ने पर साधक निर्विचार, निर्विकल्प समाधि की ओर गति करता है। जहां पर मन ,बुद्धि ,अहंकार आदि क्रियाहीन हो जाते हैं । मन के क्रिया हीन होने से समस्त इंद्रियां अपने अपने कार्य करना बंद कर देती है ।जिससे इनके समस्त कार्य अवरुद्ध हो जाते हैं ।निर्विचार ,निर्विकल्प या असंप्रज्ञात समाधि में स्थित हो जाना ब्रह्म में पूर्ण स्थिति को प्राप्त कर लेना है । जहां पर सिर्फ और सिर्फ उस ब्रह्म के सिवा कुछ भी शेष नहीं रहता । इस स्थिति में स्थित होने वाला साधक  माया के संपूर्ण आवरण को हमेशा हमेशा के लिए मिटा देता है और पूर्ण ब्रह्म परमात्मा में लीन होकर  मुक्त हो जाता है -हमेशा हमेशा के लिए।
                      -- रामेश्वर हिंदू
      ⚜🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜
🌞 अखिल विश्व गायत्री परिवार अकलेरा
     ⚜🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜

2 टिप्पणियाँ:

Unknown ने कहा…

Bohot acchi jankari mili

बेनामी ने कहा…

उत्कृष्ट लेख 🙏जय माँ गायत्री जय गुरूदेव्🙏🌺🌹

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