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सम्भोग और समाधि

संभोग की  इस प्रक्रिया में  जो तत्व  एक साथ आते हैं,  उन्हें  शिव और शक्ति के  नाम से जाना जाता है।  शिव पुरुष या चेतना का  प्रतिनिधित्व करते हैं  और  शक्ति प्रकृति या ऊर्जा का  प्रतिनिधित्व करती है।  शक्ति,  विभिन्न रूपों में,  सभी सृष्टि में मौजूद है।  भौतिक और आध्यात्मिक  दोनों ऊर्जा को  शक्ति के रूप में  जाना जाता है।  जब ऊर्जा  बाहर की ओर जाती है,  तो यह  भौतिक ऊर्जा होती है  और  जब यह ऊपर की ओर  निर्देशित होती है,  तो यह आध्यात्मिक ऊर्जा होती है।  इसलिए,  जब तंत्रयोग में  साधिका और साधिका    के बीच संभोग का  सही तरीके से  अभ्यास किया जाता है,  तो इसका  आध्यात्मिक जागरूकता  के विकास पर  बहुत सकारात्मक  प्रभाव पड़ता है। साधक आनंदमुक्त

अघोरी के चमत्कार

 🌹:अघोरी के चमत्कार:🌹          अघोरियों के चमत्कारों और उनकी सिद्धियों के बारे में अनेक लेख पढ़े होंगे। मगर किसी ने यह सोचा है कि ये सिद्धियां उनके पास आती कैसे हैं  जिनके बल पर वे अलौकिक चमत्कार करते हैं।       तांत्रिक साधना का एक सशक्त पक्ष परामनोविज्ञान पर आधारित है। उस पक्ष के अंतर्गत कई साधना और सम्प्रदाय हैं जिनमें एक है--'अघोर सम्प्रदाय'। 'घोर' शब्द का मतलब 'संसार' है, 'अ' नकारात्मक है अर्थात् जो संसारी नहीं है, वह 'अघोरी' है। इसी अघोरी शब्द का बिगड़ा रूप 'औघड़' है। यह अति प्राचीन सम्प्रदाय है। लेकिन इससे भली-भांति लोग परिचित हुए बाबा कीनाराम के समय से। गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन बाबा कीनाराम 'अघोर' संप्रदाय के उच्चकोटि के सिद्ध महात्मा और सन्त थे जिनकी समाधि वाराणसी के 'शिवाला' मोहल्ले में आज भी दर्शनीय है। शरीर, संसार, समाज की मर्यादा के बन्धनों के कारण 'मन में जड़ता' आ जाती है। इस जड़ता को दूर करने के लिए 'मन का स्वतंत्र होना' ज़रूरी है।       इस सम्प्रदाय में मल-मूत्र का सेवन, अन्य नशीली वस्तुओं क...

मन की सुक्ष्म गतिविधियां

 1. मन: आत्मा का प्रतिबिंब (सूक्ष्म स्वरूप) ​तात्विक दृष्टि से मन आत्मा का ही प्रतिबिंब है। यहाँ जब हम चेतना की बात करते हैं, तो इसका वह हिस्सा अतिसूक्ष्म है। इस अवस्था में मन अपनी व्यापकता में सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वरूप को समाहित किए रहता है। यह चेतना का वह शुद्ध रूप है जहाँ कोई सीमा नहीं है। ​ 2. मन: जीव का प्रतिबिंब (पिंड स्वरूप) ​इसके विपरीत, जब मन अपनी मूल चेतना (आत्मा) से विमुख हो जाता है, तब वह केवल 'जीव' का प्रतिबिंब बनकर रह जाता है। इस अवस्था में वह विराट ब्रह्मांडीय स्वरूप को त्यागकर 'पिंड' (सीमित शरीर) के स्वरूप में सिमट जाता है। ​ 3. यथार्थ से विस्मृति और भौतिक आसक्ति ​जब चेतना अनंत विषयों को धारण कर लेती है, तब वह अपने वास्तविक और यथार्थ स्वरूप से भटक जाती है। इस प्रक्रिया में: • वह अपनी सूक्ष्म सत्ता का त्याग कर देती है। • वह केवल शरीरी सत्ता (भौतिक अस्तित्व) को ही एकमात्र सत्य मान लेती है। • परिणामस्वरूप, चेतना स्वयं का अस्तित्व भूलकर केवल भौतिक शरीर का प्रतिबिंब बन जाती है। ​ 4. इंद्रियों के अधीन जीवन ​अन्ततः, अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होकर यह जीव के...

राजयोग (Raja Yoga) का अर्थ है "योगों का राजा"

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 राजयोग (Raja Yoga) का अर्थ है "योगों का राजा" । यह महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए 'अष्टांग योग' का ही एक रूप है, जिसका मुख्य लक्ष्य मन पर पूर्ण विजय प्राप्त करना और आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) है। ​जहाँ अन्य योग शरीर या श्वास पर ध्यान केंद्रित करते हैं, राजयोग सीधे चित्त (मन) की वृत्तियों को रोकने पर बल देता है। ​राजयोग के आठ अंग (अष्टांग योग) ​पतंजलि के अनुसार राजयोग की प्राप्ति के लिए इन आठ चरणों का पालन किया जाता है: ​यम: नैतिक अनुशासन (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह)। ​नियम: व्यक्तिगत अनुशासन (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान)। ​आसन: शरीर को स्थिर और सुखदायक अवस्था में रखना। ​प्राणायाम: श्वास की गति पर नियंत्रण। ​प्रत्याहार: इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना। ​धारणा: मन को किसी एक विचार या बिंदु पर केंद्रित करना। ​ध्यान: उस केंद्र बिंदु पर निरंतर एकाग्रता। ​समाधि: वह अवस्था जहाँ साधक और ईश्वर (या परम तत्व) एक हो जाते हैं। ​राजयोग के मुख्य लाभ ​मानसिक शांति: यह तनाव और चिंता को कम कर मन को शांत और स्थिर बनाता है। ​इच्...

जनेऊ पहनते के क्या है लाभ, और क्यों पहनते हैं

 जनेऊ पहनते के क्या है लाभ, और क्यों पहनते हैं ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम अर्थात ब्राह्मण ब्रह्म ,ईश्वर, तेज से युक्‍त हो। ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। कालांतर में इस संस्कार को दूसरे धर्मों में धर्मांतरित करने के लिए उपयोग किया जाने लगा। हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे। क्यों पहनते हैं जनेऊ : हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे यज्ञोपवीत स...

कामवासना (Sexual energy) को भारतीय दर्शन और मनोविज्ञान में एक अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा

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 कामवासना (Sexual energy) को भारतीय दर्शन और मनोविज्ञान में एक अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा माना गया है। सात्विक दृष्टिकोण का अर्थ है—शुद्धता, संतुलन और ऊर्ध्वगमन (ऊपर की ओर उठाना)। काम का सात्विक उपयोग इसे केवल शारीरिक भोग से हटाकर सृजन और आध्यात्मिक उन्नति की ओर मोड़ने की प्रक्रिया है। ​इसके मुख्य सात्विक उपयोग निम्नलिखित हैं: ​1. सृष्टि का सृजन और निरंतरता ​सात्विक दृष्टि में कामवासना का प्राथमिक उद्देश्य उत्तम संतान की उत्पत्ति है। इसे एक "यज्ञ" की तरह देखा जाता है, जहाँ संभोग का उद्देश्य केवल इंद्रिय सुख न होकर, समाज को एक सजग और संस्कारी नई पीढ़ी देना होता है। ​2. प्रेम और आत्मीयता की प्रगाढ़ता ​जब कामवासना में स्वार्थ या केवल शरीर का आकर्षण नहीं होता, तो वह प्रेम (Love) में बदल जाती है। पति और पत्नी के बीच यह ऊर्जा आपसी विश्वास, मित्रता और मानसिक जुड़ाव को गहरा करने का माध्यम बनती है। यह दो व्यक्तियों के बीच के "अहंकार" को मिटाकर उन्हें एक-दूसरे के प्रति समर्पित बनाती है। ​3. ओज और मेधा में परिवर्तन (Transmutation) ​योग शास्त्र के अनुसार, काम ऊर्जा को यदि संयमित र...

विद्युतमानस यंत्र एक अत्यंत सूक्ष्म तांत्रिक यंत्र

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 विद्युतमानस यंत्र एक अत्यंत सूक्ष्म तांत्रिक यंत्र माना जाता है, जिसका संबंध मन, ऊर्जा और विचार तरंगों को नियंत्रित करने से जोड़ा जाता है। “विद्युत” अर्थात ऊर्जा और “मानस” अर्थात मन—इन दोनों के संयोग से यह यंत्र साधक के मानसिक क्षेत्र को स्थिर, तेज और प्रभावशाली बनाने का माध्यम बनता है। तांत्रिक परंपरा में इसे मानसिक विद्युत शक्ति को जाग्रत करने वाला साधन कहा गया है, जो व्यक्ति के विचारों को दिशा देने और आकर्षण शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है। यह यंत्र मुख्यतः मन को केंद्रित करने, ध्यान में स्थिरता लाने, संकल्प शक्ति बढ़ाने और सूक्ष्म अनुभूति को जाग्रत करने के लिए उपयोग किया जाता है। कुछ साधनाओं में इसे वशीकरण, आकर्षण और संवाद शक्ति को प्रबल करने के लिए भी प्रयोग किया जाता है, क्योंकि यह विचार तरंगों को प्रभावी बनाने की क्षमता से जोड़ा जाता है। जो व्यक्ति लगातार मानसिक अशांति, भ्रम या निर्णय लेने में कमजोरी अनुभव करता है, उसके लिए यह यंत्र सहायक माना जाता है। इसके लाभों की बात करें तो यह मन को स्थिर करता है, ध्यान में गहराई लाता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है और व्यक्ति की आंतरिक ऊर्जा ...