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मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

वेदो का मनोमयी कोश

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 {{{ॐ}}}


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मनस शरीर यानि मनोमय शरीर का विकास साधना के द्वारा किया जाता है यह इक्कीस वर्ष के बाद विकसित हो सकता है इसे विकसित होने सअतीन्द्रिय शक्ति आ जाती है जैसे सम्मोहन ,दुर संरेक्षण दसरो का मनपढ़ लेना शरीर से बहार निकल कर यात्रा करना अपने को शरीर से अलग करना वनस्पतियो  के गुण पता लगना उपयोग करना  आदि।

चरक और सुश्रुत ने इसी सिद्धि से शरीर के बारिक  से बारिक अंगो का भी वर्णन किया था। सुषुम्ना नाडी़ ,कुण्डलिनी और षट् चक्रों  को विज्ञान अभी भी नही खोज पाया।

इन विचार तरगों  का प्रभाव पदार्थ पर भी पडता है संकल्प से वस्तु  हिलाई व तोडी  जा सकती है। विज्ञान ने भी इसके कई प्रयोग किये है योग की समस्त सिद्धियाँ जो पांतजलयोग दर्शन मे दी गयी है वे इसी शरीर के विकसित होने से आ जाती है कुण्डलिनी भी इसी शरीर की घटना है।

जादु चमत्कार इसी का विकास है और इसका केन्द्र है अनाहत चक्र  जब अनाहत जाग्रत होता है तो ये सिद्धियाँ आ जाती है

इसके जाग्रत होने से काल व स्थान की दुरी मिट जाती है  वह बिना मन इन्द्रियो के सीधा मन से देख व सुन सकता है।

कल्पना, इसकी संकल्प सम्भावनाएँ है ऐसा व्यक्ति शाप दे सकता है

पुराण शरीर को इसी उपलब्ध व्यक्तियों  द्वारा लिखे गये है किन्तु उनकी भाषा प्रतीकात्मक  होने से विज्ञानिक उन्हे समझ नही पाते ऐसे व्यक्तियों  ने प्रेतात्मा को जाना मृत्यु के बाद जीवात्मा कहाँ जाती है कहां कैसे रहती है कैसा अनुभव करती  है कौन इन आत्माओं को ले जाता है पुनर्जन्म  कब और कैसे होता है गर्भ मे जीवात्मा  का प्रवेश कब होता है । स्वर्ग  और नरक कहां हैआदि की जानकारी ऐसे व्यक्ति ही दे सकते है जो मनोमय  शरीर या मनस शरीर को सक्रिय कर लेते है यही वेदातं का मनोमय कोष है

शाबर व डामर मंत्रों का सत्य शाबर मंत्र तंत्र का सरलीकरण है ।इसके प्रवर्तक भगवान शंकर है।

जिन्होंने सिद्ध साधकों को इसका उपदेश दिया है वे तंत्र मार्ग के साधक रहे है ।

शास्त्र के समान्तर शास्त्र की पद्धति भी चलती है । इसे शास्त्र के बराबर मान्यता नही मिलती किन्तु उपयोगिता की दृष्टि में इसमें कोई कमी होती नही है।

यही बात तंत्र विज्ञान में भी है । शाबर मंत्र शाखा की महत्ता को प्राप्त नही कर सका परन्तु तंत्र विज्ञान मे ठीक बैठ गया, इसलिए जन कल्याण हेतु इसका प्रसार किया गया है साभार फेसबुक वॉल अज्ञानी

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सोमवार, 6 दिसंबर 2021

आत्मा का शरीर छोड़ना

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 🚩 जय श्री हरि 🚩


आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है । ऐसे में वह स्वयं भी हथियार डाल देता है अन्यथा उसने आत्मा को शरीर में बनाये रखने का भरसक प्रयत्न किया होता है और इस चक्कर में कष्ट झेला होता है । 


अब उसके सामने उसके सारे जीवन की यात्रा चल-चित्र की तरह चल रही होती है । उधर आत्मा शरीर से निकलने की तैयारी कर रही होती है इसलिये शरीर के पाँच प्राण एक 'धनंजय प्राण' को छोड़कर शरीर से बाहर निकलना आरम्भ कर देते हैं । 


ये प्राण, आत्मा से पहले बाहर निकलकर आत्मा के लिये सूक्ष्म-शरीर का निर्माण करते हैं जो कि शरीर छोड़ने के बाद आत्मा का वाहन होता है । धनंजय प्राण पर सवार होकर आत्मा शरीर से निकलकर इसी सूक्ष्म-शरीर में प्रवेश कर जाती है । 


बहरहाल अभी आत्मा शरीर में ही होती है और दूसरे प्राण धीरे-धीरे शरीर से बाहर निकल रहे होते हैं कि व्यक्ति को पता चल जाता है । 


उसे बेचैनी होने लगती है, घबराहट होने लगती है । सारा शरीर फटने लगता है, खून की गति धीमी होने लगती है । सांँस उखड़ने लगती है । बाहर के द्वार बंद होने लगते हैं । 


अर्थात् अब चेतना लुप्त होने लगती है और मूर्च्छा आने लगती है । चैतन्य ही आत्मा के होने का संकेत है और जब आत्मा ही शरीर छोड़ने को तैयार है - तो चेतना को तो जाना ही है और वो मूर्छित होने लगता है ।


 बुद्धि समाप्त हो जाती है और किसी अनजाने लोक में प्रवेश की अनुभूति होने लगती है - यह चौथा आयाम होता है ।


फिर मूर्च्छा आ जाती है और आत्मा एक झटके से किसी भी खुली हुई इंद्रिय से बाहर निकल जाती है । इसी समय चेहरा विकृत हो जाता है । यही आत्मा के शरीर छोड़ देने का मुख्य चिह्न होता है । 


शरीर छोड़ने से पहले - केवल कुछ पलों के लिये आत्मा अपनी शक्ति से शरीर को शत-प्रतिशत सजीव करती है - ताकि उसके निकलने का मार्ग अवरुद्ध न रहे - और फिर उसी समय आत्मा निकल जाती है और शरीर खाली मकान की तरह निर्जीव रह जाता है । 

इससे पहले घर के आसपास कुत्ते-बिल्ली के रोने की आवाजें आती हैं । इन पशुओं की आँखे अत्याधिक चमकीली होती है  जिससे ये रात के अँधेरे में तो क्या सूक्ष्म-शरीर धारी आत्माओं को भी देख लेते हैं । 


जब किसी व्यक्ति की आत्मा शरीर छोड़ने को तैयार होती है तो उसके अपने सगे-संबंधी जो मृतात्माओं के रूप में होते है  उसे लेने आते हैं और व्यक्ति उन्हें यमदूत समझता है और कुत्ते-बिल्ली उन्हें साधारण जीवित मनुष्य ही समझते हैं और अनजान होने की वजह से उन्हें देखकर रोते हैं और कभी-कभी भौंकते भी हैं ।


शरीर के पाँच प्रकार के प्राण बाहर निकलकर उसी तरह सूक्ष्म-शरीर का निर्माण करते हैं । जैसे गर्भ में स्थूल-शरीर का निर्माण क्रम से होता है । 


सूक्ष्म-शरीर का निर्माण होते ही आत्मा अपने मूल वाहक धनंजय प्राण के द्वारा बड़े वेग से निकलकर सूक्ष्म-शरीर में प्रवेश कर जाती है ।


 आत्मा शरीर के जिस अंग से निकलती है उसे खोलती, तोड़ती हुई निकलती है । जो लोग भयंकर पापी होते है उनकी आत्मा मूत्र या मल-मार्ग से निकलती है । जो पापी भी हैं और पुण्यात्मा भी हैं उनकी आत्मा मुख से निकलती है । जो पापी कम और पुण्यात्मा अधिक है उनकी आत्मा नेत्रों से निकलती है और जो पूर्ण धर्मनिष्ठ हैं, पुण्यात्मा और योगी पुरुष हैं उनकी आत्मा ब्रह्मरंध्र से निकलती है ।


अब तक शरीर से बाहर सूक्ष्म-शरीर का निर्माण हुआ रहता है । लेकिन ये सभी का नहीं हुआ रहता । जो लोग अपने जीवन में ही मोहमाया से मुक्त हो चुके योगी पुरुष है  उन्ही के लिये तुरंत सूक्ष्म-शरीर का निर्माण हो पाता है । 


अन्यथा जो लोग मोहमाया से ग्रस्त हैं परंतु बुद्धिमान हैं, ज्ञान-विज्ञान से अथवा पांडित्य से युक्त हैं ,  ऐसे लोगों के लिये दस दिनों में सूक्ष्म शरीर का निर्माण हो पाता है ।


हिंदू धर्म-शास्त्र में - दस गात्र का श्राद्ध और अंतिम दिन मृतक का श्राद्ध करने का विधान इसीलिये है कि - दस दिनों में शरीर के दस अंगों का निर्माण इस विधान से पूर्ण हो जाये और आत्मा को सूक्ष्म-शरीर मिल जाये ।


 ऐसे में, जब तक दस गात्र का श्राद्ध पूर्ण नहीं होता और सूक्ष्म-शरीर तैयार नहीं हो जाता आत्मा, प्रेत-शरीर में निवास करती है ।


 अगर किसी कारणवश ऐसा नहीं हो पाता है तो आत्मा प्रेत-योनि में भटकती रहती है । 


एक और बात, आत्मा के शरीर छोड़ते समय व्यक्ति को पानी की बहुत प्यास लगती है । शरीर से प्राण निकलते समय कण्ठ सूखने लगता है । ह्रदय सूखता जाता है और इससे नाभि जलने लगती है । लेकिन कण्ठ अवरुद्ध होने से पानी पिया नहीं जाता और ऐसी ही स्थिति में आत्मा शरीर छोड़ देती है । प्यास अधूरी रह जाती है । इसलिये अंतिम समय में मुख में 'गंगा-जल' डालने का विधान है । 


इसके बाद आत्मा का अगला पड़ाव होता है शमशान का 'पीपल' ।


 यहाँ आत्मा के लिये 'यमघंट' बंँधा होता है । जिसमें पानी होता है । यहाँ प्यासी आत्मा यमघंट से पानी पीती है जो उसके लिये अमृत तुल्य होता है । इस पानी से आत्मा तृप्ति का अनुभव करती है । 


 हिन्दू धर्म शास्त्रों में विधान है कि - मृतक के लिये यह सब करना होता है ताकि उसकी आत्मा को शान्ति मिले । अगर किसी कारण वश मृतक का दस गात्र का श्राद्ध न हो सके और उसके लिये पीपल पर यमघंट भी न बाँधा जा सके तो उसकी आत्मा प्रेत-योनि में चली जायेगी और फिर कब वहांँ से उसकी मुक्ति होगी, कहना कठिन होगा l


*हांँ,  कुछ उपाय अवश्य हैं। पहला तो यह कि किसी के देहावसान होने के समय से लेकर तेरह दिन तक  निरन्तर भगवान् के नामों का उच्च स्वर में जप अथवा कीर्तन किया जाय और जो संस्कार बताये गये हैं उनका पालन करने से मृतक भूत प्रेत की योनि, नरक आदि में जाने से बच जायेगा , लेकिन यह करेगा कोन ?*


*यह संस्कारित परिजन, सन्तान, नातेदार ही कर सकते हैं l अन्यथा आजकल अनेक लोग केवल औपचारिकता निभाकर केवल दिखावा ही अधिक करते हैं l*


*दूसरा उपाय कि मरने वाला व्यक्ति स्वयं भजनानंदी हो, भगवान का भक्त हो और अंतिम समय तक यथासंभव हरि स्मरण में रत रहा हो ।*


इसी संदर्भ में , भक्त कहता है...


कृष्ण त्वदीय पदपंकजपंजरांके अद्यैव मे विशतु मानस राजहंसः


प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्तैः कंठावरोधनविधौ स्मरणं कुतस्ते।।


श्रीकृष्ण कहते हैं....


कफवातादिदोषेन मद्भक्तो न तु मां स्मरेत् 


अहं स्मरामि तद्भक्तं ददामि परमां गतिम्।।


फिर श्रीकृष्ण को लगता है कि यह मैं कुछ अनुचित बोल गया।


पुनश्च वे कहते हैं....


कफवातादिदोषेन मद्भक्तो न च मां स्मरेत्


तस्य स्मराम्यहं नो चेत् कृतघ्नो नास्ति मत्परः


ततस्तं मृयमाणं तु काष्ठपाषाणसन्निभं 


अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम्।।


*तीसरा भगवान के धामों में देह त्यागी हो, अथवा दाह संस्कार काशी, वृंदावन या चारों धामों में से किसी में हुआ हो l*


*स्वयं विचार करना चाहिये कि हम दूसरों के भरोसे रहें या अपना हित स्वयं साधें l*


 जीवन बहुत अनमोल है, इसको व्यर्थ मत गँवायें। एक - एक पल को सार्थक करें। हरिनाम का नित्य आश्रय लें । मन के दायरे से बाहर निकल कर सचेत होकर जीवन को जियें, न कि मन के अधीन होकर। 


यह मानव शरीर बार- बार नहीं मिलता। 


🙏🙏


जीवन का एक- एक पल जो जीवन का गुजर रहा है ,वह फिर वापस नहीं मिलेगा। इसमें जितना अधिक हो भगवान् का स्मरण जप करते रहें,   हर पल जो भी कर्म करो बहुत सोच कर करें। क्योंकि कर्म परछाईं की तरह मनुष्य के साथ रहते है। इसलिये सदा शुभ कर्मों की शीतल छाया में रहें।


 वैसे भी कर्मों की ध्वनि शब्दों की धवनि से अधिक ऊँची होती है।


अतः सदा कर्म सोच विचार कर करें। जिस प्रकार धनुष में से तीर छूट जाने के बाद वापस नहीं आता, इसी प्रकार जो कर्म आपसे हो गया वह उस पल का कर्म वापस नहीं होता चाहे अच्छा हो या बुरा।


इसलिये इससे पहले कि आत्मा इस शरीर को छोड़ जाये, शरीर मेँ रहते हुए आत्मा को यानी स्वयं को जान लें और जितना अधिक हो सके मन से, वचन से, कर्म से भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण का ध्यान, चिंतन, जप कीर्तन करते रहें, निरन्तर स्मरण से हम यम पाश से तो बचेंगे ही बचेंगे, साथ ही हमें भगवत् धाम भी प्राप्त हो सकेगा जो कि जीवन

 का वास्तविक लक्ष्य है ।


आयुष्यक्षणमेकोSपि न लभ्यः स्वर्णकोटिभिः


स वृथा नीयते येन तस्मै मूढात्मने नमः।।


।। हरिः ओम् तत् सत् ।।


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏

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शनिवार, 4 दिसंबर 2021

प्राण का रहस्य

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{{{ॐ}}}
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प्राण क्या है जिस अन्न को हम खाते है वह पेट मे चला जाता है वहाँ पर नाभि में रहने वाली जठराग्नि उसे पत्ती है और चन्द घण्टों के अन्दर उस अन्न कि स्थल भाग मल मुत्र पसीने इत्यादि के द्वारा बाहर चला जाता है ।
और उसका वास्तविक तत्व भीतर ही रह जाता है उसी जठराग्नि के द्वारा शक्ति के रूप मे बदल जाता है 
और प्राण वही स्रोतों द्वारा शरीर के सारे अंगो मे प्रवाहित होता रहता है ।
साधारण लोग प्राण को वायु कहते है क्योंकि हवा हमारे जीवन के लिए सबसे आवश्यक है इसलिए अगर हम उसे प्राण के नाम से पुकारने लगे तो भी कोई  बुराई नही है ।
परन्तु प्राण  उस शक्ति का नाम है जो हमे जीवन देती है इसी को हम जीवन शक्ति कहते है ।
जीवन शक्ति का बहुत बडा भण्डार इस ब्रह्माण्ड की चोटी पर है वहाँ से सीधी ब्रहारंध्र के शरीर मे प्रवेश हो अपने अपने केन्द्र पर इकट्ठा होती है ।
इसको सुरति,कुण्डलिनीशक्ति और आघाशक्ति इत्यादि कहते है ।
मुख्य प्राण शक्ति इसी का नाम है। यह जीवन शक्ति ब्रह्माण्ड से जब शरीर मे उतरती है तो वह चोटी के स्थान से प्रवेश हो उसके एक इंच नीचे अपना एक केन्द्र बनाती है।
फिर वहाँ से चलकर मस्तिष्क मे कई स्थानों पर ठहरती हुई यौगिक तक आती है।नाडियो की संख्या ऋषियों ने बहत्तर लाख बतलाई है।
इन नाड़ियों में तीन नाड़ी मुख्य मानी जाती है जिनके नाम इडा़ पिंगला और सुषुम्ना यह तीनो मस्तिष्क ये केन्द्र से निकल कर मेरूदंड मे गुथी हुई नीचे गुदा के स्थान तक चली गई है
और वहाँ मिल कर तीनो एक ग्रन्थि की शक्ल मे आ गई है ।
आगे इनका बहाव रूक जाता है और इनके भीतर से अनेकों छोटी छोटी मीडिया नीचे वालों पर चली गयी है।
 साधारण स्थित मे प्राणका बहाव इड़ा व पिंगला मे ही रहता है ।
योग व साधना करने पर कुण्डलिनी की धार सुषुम्ना मे आ जाती है ।
पिंगला मे प्राण जाने पर ह्रदय व इन्द्रियों मे रजोगुणी प्रभाव उठ खड़ा होता है।
और इडा़ मे बहाव होने पर तमोगुणी आच्छादित हो जाता है ।
पिंगला का नाम सुर्यनाडी़ और इडा़ का नाम चन्द्र नाड़ी है 
यह नाड़ी विद्वानों के अनुसार नील वर्ण की है।
यहाँ बीज अक्षर ,र, है जिसका वाहन ,मेढा,है प्रधान तत्व अग्नि है अग्नि वायु मिलकर मेढे़ की चाल चलके ,र, शब्द पैदा करती है। यह चक्र त्रिकोण है यहाँ दस दलों से, ड ,से ,फ, तक वर्णमाला के दस अक्षर निकलते है ।यहा चैतन्य अधिष्ठाता विष्णु और अधिष्ठात्री शक्ति वैष्णवी के नाम से जानी जाती है । sabhar Facebook wall sakti upasak agyani

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शनिवार, 27 नवंबर 2021

अंतर्मन और चेतना तथा इच्छापूर्ति

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भाग-१

अंतर्करन अथवा अंतर्मन की वो स्थान जहाँ जाकर उत्पन इक्षाओं की कम्पन कुदरत ये परम चेतना अनुभव करती हैं, सुनती हैं, स्वीकार करती हैं और अंत फ़ैसला भी 

आज मैं तुम्हें एक रोचक तथ्य से अवगत करवाता हुँ ऐसा लोग कहते हैं और सभी का मानना भी हैं सभी का मानने से अर्थात जो सभी रूप ऑऑ स्वीकार करते हैं तो यहाँ धर्म और मजहब जैसी शब्द का प्रयोग करना उचित नही होगा तो ऐसा सभी मानते हैं की एक दिन की अनेको इक्षाओ में से एक इक्षा अवश्य कभी ना कभी जाकर पूर्ण होती हैं ।

अब अनेकों इक्षाओं में से कौन सी एक इक्षा पूरी होती क्यूँकि वो जीवन में कब जाकर पूर्ण होगी या होती इसकी ठीक ठाक अनुमान लगाना किसी भी व्यक्ति हेतु संभव नहीं😆😆😂😂 तो अब यहाँ एक सवाल का जवाब डाउ ज़रा किस समय की कौन सी इक्षा मेरी पूर्ण हुई जिसके पास ऐसी बोध हो वाक़ई में वो तीक्ष्ण से भी तीक्ष्ण बुद्धि प्राप्त कर लिया हो अब कैसेय प्राप्त किया ये उसकी अपनी विधि हैं क्रिया हैं दिनचैर्या हैं इसलिए आइलेट कोई टिप्पणी नही तो जिसे वो बोध प्राप्त हैं वाउ बुद्धतव से जायदा दूर नही हैं 🙌🏼 परंतु स्वाभाविक रूप से ये ज्ञात करना निरंतर स्वयं का अध्यण करते रहना ही होता हैं यही ब्रह्म किताब हैं और जो निरंतर इस स्वयं रूपी ब्रह्मकिताब का अध्यण करता हैं वही वास्तविक में ध्यानी हैं और योगी भी । जिससे व्यक्ति अपने उस इक्षा तक पहुँच जाता हैं जो उसकी पूरी हुई हो परंतु इसके लिए उसे निरंतर अपने इक्षाओं और भावों के प्रति सचेत होना होगा तभी तो एक दिन उस अनेकों इक्षाओं में से उस एक इक्षाओ को ढूँढ लिया जो किसी दिन जाकर पूर्ण हुई हो।

अगर इस गहराईं के और तर में जाओ तो चेतना एक और विषय सा तुम्हें अवगत करवाएगी और वो क्या हैं वो ये होगी की मूर्ख तुम अनेको इक्षाओं को जाँचने परखने में काल लव दुरुपयोग मत करो अपितु अपने अंतर्करन में उस स्थान की हक़ अवस्था की तलाश करो जहाँ जाकर इक्षाओं की लहर कंपन को ये विश्वशक्ति कुदरत अपने अंतर्गत ले लेती हैं उसे स्वीकार्य कर लेती हैं और उस अमुक इक्षाओं की पूर्ति कुदरत की ओर सा उसे वापिस प्राप्त होती हैं। sabhar Ravi Sharma Facebook wall

क्रमशः

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रविवार, 21 नवंबर 2021

#पाराशर ऋषि द्वारा लिखित विमानन शस्त्र जिसे जानने को अमेरिका बैताब

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प्राचीन #भारतीय_विमान_शास्त्र : सनातन वैदिक विज्ञान का अप्रतिम स्वरूप :
हिंदू वैदिक ग्रंथोँ एवं प्राचीन मनीषी साहित्योँ मेँ वायुवेग से उड़ने वाले विमानोँ (हवाई जहाज़ोँ) का वर्णन है, सेकुलरोँ के लिए ये कपोल कल्पित कथाएं हो सकती हैँ, परन्तु धर्मभ्रष्ट लोगोँ की बातोँ पर ध्यान ना देते हुए हम तथ्योँ को विस्तार देते हैँ।ब्रह्मा का १ दिन, पृथ्वी पर हमारे वर्षोँ के ४,३२,००००००० दिनोँ के बराबर है। और यही १ ब्रह्म दिन चारोँ युगोँ मेँ विभाजित है यानि, सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं वर्तमान मेँ कलियुग।
सतयुग की आयु १,७२,८००० वर्ष निर्धारित है, इसी प्रकार १,००० चक्रोँ के सापेक्ष त्रेता और कलियुग की आयु भी निर्धारित की गई है।

सतयुग मेँ प्राणी एवं जीवधारी वर्तमान से बेहद लंबा एवं जटिल जीवन जीते थे, क्रमशः त्रेता एवं द्वापर से कलियुग आयु कम होती गई और सत्य का प्रसार घटने लगा,
उस समय के व्यक्तियोँ की आयु लम्बी एवं सत्य का अधिक प्रभाव होने के कारण उनमेँ आध्यात्मिक समझ एवं रहस्यमयी शक्तियां विकसित हुई, और उस समय के व्यक्तियोँ ने जिन वैज्ञानिक रचनाओँ को बनाया उनमेँ से एक थी "वैमानिकी"।

उस समय की मांग के अनुसार विभिन्न विमान विकसित किए गए, जिन्हेँ भगवान ब्रह्मा और अन्य देवताओँ के आदेश पर यक्षोँ (जिन्हेँ इंजीनियर कह सकते हैँ) ने बनाया था,
ये विमान प्राकृतिक डिज़ाइन से बनाए जाते थे, इनमेँ पक्षियोँ के परोँ जैसी संरचनाओँ का प्रयोग जाता था, इसके पश्चात् के विमान, वैदिक ज्ञान के प्रकांड संतएवं मनीषियोँ द्वारा निर्मित किए गए, तीनोँ युगोँ के अनुरूप विमानोँ केभी अलग अलग प्रकार होते थे,
प्रथम युग सतयुग मेँ विमान मंत्र शक्ति से उड़ा करते थे, द्वितीय युग त्रेता मेँ मंत्र एवं तंत्र की सम्मिलित शक्ति का प्रयोग होता था, तृतीय युग द्वापर मेँ मंत्र-तंत्र-यंत्र तीनोँ की सामूहिक ऊर्जा से विमान उड़ा करते थे, वर्तमान मेँ अर्थात् कलियुग मेँ मंत्र एवं तंत्र के ज्ञान की अथाह कमी है, अतः आज के विमान सिर्फ यंत्र (मैकेनिकल) शक्ति से उड़ा करते हैँ,
युगोँ के अनुरूप हमेँ विमानोँ के प्रकारोँ की संख्या ज्ञात है, सतयुग मेँ मंत्रिका विमानोँ के २६ प्रकार (मॉडल) थे, त्रेता मेँ तंत्रिका विमानोँ के ५६ प्रकार थे, तथा द्वापर मेँ कृतिका (सम्मिलित) विमानोँ के भी २६ प्रकार थे,
हालांकि आकार और निर्माण के संबंध मेँ इनमेँ आपस मेँ कोई अंतर नहीँ हैँ।

महान भारतीय आचार्य महर्षि भारद्वाज ने एक ग्रंथ रचा, जिसका नाम है, "विमानिका" या "विमानिका शास्त्र"

१८७५ ईसवीँ में दक्षिण भारत के एक मन्दिर में विमानिका शास्त्र ग्रंथ की एक प्रति मिली थी। इस ग्रन्थ को ईसा से ४०० वर्ष पूर्व का बताया जाता है, इस ग्रंथ का अनुवाद अंग्रेज़ी भाषा में हो चुका है। इसी ग्रंथ में पूर्व के ९७ अन्य विमानाचार्यों का वर्णन है तथा २० ऐसी कृतियों का वर्णन है जो विमानों के आकार प्रकार के बारे में विस्तृत जानकारी देते हैं। खेद का विषय है कि इन में से कई अमूल्य कृतियां अब लुप्त हो चुकी हैं। कई कृतियोँ को तो विधर्मियोँ ने नालंदा विश्वविद्यालय मेँ जला दिया,
इस महान ग्रंथ मेँ विभिन्न प्रकार के विमान, हवाई जहाज एवं उड़न-खटोले बनाने की विधियाँ दी गई हैँ, तथा विमान और उसके कलपुर्जे तथा ईंधन के प्रयोग तथा निर्माण की विधियोँ का भी सचित्र वर्णन किया गया है, उन्होँने अपने विमानोँ मेँ ईंधन या नोदक अथवा प्रणोदन (प्रोपेलेँट) के रूप मेँ पारे (मर्करी Hg) का प्रयोग किया।

बहुत कम लोग जानते हैँ कि कलियुग का पहला विमान राइट ब्रदर्स ने नहीँ बनाया था, पहला विमान १८९५ ई. में मुम्बई स्कूल ऑफ आर्ट्स के अध्यापक शिवकर बापूजी तलपड़े, जो एक महान वैदिक विद्वान थे, ने अपनी पत्नी (जो स्वयं भी संस्कृत की विदुषा थीं) की सहायता से बनाया एवं उड़ाया था। उन्होँने एक मरुत्सखा प्रकार के विमान का निर्माण किया। इसकी उड़ान का प्रदर्शन तलपड़े ने मुंबई चौपाटी पर तत्कालीन बड़ौदा नरेश सर शिवाजी राव गायकवाड़ और बम्बई के प्रमुख नागरिक लालजी नारायण के सामने किया था। विमान १५०० फुट की ऊंचाई तक उड़ा और फिर अपने आप नीचे उतर आया। बताया जाता है कि इस विमान में एक ऐसा यंत्र लगा था, जिससे एक निश्चित ऊंचाई के बाद उसका ऊपर उठना बन्द हो जाता था। इस विमान को उन्होंने महादेव गोविन्द रानडे को भी दिखाया था।

दुर्भाग्यवश इसी बीच तलपड़े की विदुषी जीवनसंगिनी का देहावसान हो गया। फलत: वे इस दिशा में और आगे न बढ़ सके। १७ सितंबर, १९१८ ईँसवी को उनका देहावसान हो गया।
राइट ब्रदर्स के काफी पहले वायुयान निर्माण कर उसे उड़ाकर दिखा देने वाले तलपड़े महोदय को आधुनिक विश्व का प्रथम विमान निर्माता होने की मान्यता देश के स्वाधीन (?) हो जाने के इतने वर्षों बाद भी नहीं दिलाई जा सकी, यह निश्चय ही अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। और इससे भी कहीं अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पाठ्य-पुस्तकों में शिवकर बापूजी तलपड़े के बजाय राइटब्रदर्स (राइट बन्धुओं) को ही अब भी प्रथम विमान निर्माता होने का श्रेय दिया जा रहा है, जो नितान्त असत्य है।
"समरांगन:-सूत्र धारा" नामक भारतीय ग्रंथ मेँ भी विमान निर्माण संबंधी जानकारी है। इस ग्रंथ मेँ युद्ध के समय वैमानिक मशीनोँ के प्रयोग का वर्णन है, इस ग्रंथ मेँ संस्कृत के २३० श्लोक हैँ, स्थान की कमी के कारण हम यहाँ इस ग्रंथ के पूरे श्लोक नहीँ लिख रहे हैँ, अन्यथा लेख लंबा हो जाएगा।
परन्तु हम इस ग्रंथ के १९० वेँ श्लोक का अनुवाद अवश्य कर रहे हैँ :-
"[२:२० . १९०] परिपत्रोँ से पूर्ण विमान के दाहिने पंख से अंदर जाते हुए केंद्र पर ध्वनि की गति से पारे को ईँधन के सापेक्ष पहुँचाने पर एक छोटी पर अधिक दबाव वाली आंतरिक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो आपके यंत्र को आकाश मेँ शनैः शनैः ले जाएगी, जिससे यंत्र के अंदर बैठा व्यक्ति अविस्मरणीय तरीके से नभ की यात्रा करेगा, चार कठोर धातु से बने पारे के पात्रोँ का संयोजन उचित स्थिति मेँ किया जाना चाहिए, एवं उन्हेँ नियंत्रित तरीके से ऊष्मा देनी चाहिए, ऐसा करने से आपका विमान आकाश मेँ चमकीले मोती के समान उड़ता नज़र आएगा।।"
इस ग्रंथ के एक गद्य का अनुवाद इस प्रकार है -

"सर्वप्रथम पाँच प्रकार के विमानों का निर्माण ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर तथा इन्द्र के लिये किया गया था। तत्पश्चात अन्य विमान बनाये गये। चार मुख्य श्रेणियों का ब्योरा इस प्रकार हैः-

(१) रुकमा – रुकमा नुकीले आकार के और स्वर्ण रंग के विमान थे।

(२) सुन्दरः –सुन्दर: त्रिकोण के आकार के तथा रजत (चाँदी) युक्त विमान थे।

(३) त्रिपुरः – त्रिपुरः तीन तल वाले शंक्वाकार विमान थे।

(४) शकुनः – शकुनः का आकार पक्षी के जैसा था। तथा ये अंतर्राक्षीय विमान थे।

दस अध्याय संलगित विषयों पर लिखे गये हैं जैसे कि विमान चालकों का प्रशिक्षण, उडान के मार्ग, विमानों के कल-पुर्ज़े, उपकरण, चालकों एवं यात्रियों के परिधान तथा लम्बी विमान यात्रा के समय भोजन किस प्रकार का होना चाहिये। ग्रंथ में धातुओं को साफ करने की विधि, उस के लिये प्रयोग करने वाले द्रव्य, अम्ल जैसे कि नींबू अथवा सेब या अन्य रसायन, विमान में प्रयोग किये जाने वाले तेल तथा तापमान आदि के विषयों पर भी लिखा गया है।

साथ ही, ७ प्रकार के इंजनों का वर्णन किया गया है, तथा उनका किस विशिष्ट उद्देश्य के लिये प्रयोग करना चाहिये तथा कितनी ऊंचाई पर उसका प्रयोग सफल और उत्तम होगा ये भी वर्णित है।

ग्रंथ का सारांश यह है कि इसमेँ प्रत्येक विषय पर तकनीकी और प्रयोगात्मक जानकारी उपलब्ध है। विमान आधुनिक हेलीकॉप्टरों की तरह सीधे ऊंची उडान भरने तथा उतरने के लिये, आगे-पीछे तथा तिरछा चलने में भी सक्षम बताये गये हैं

इसके अतिरिक्त हमारे दूसरे ग्रंथोँ - रामायण, महाभारत, चारोँ वेद, युक्तिकरालपातु (१२ वीं सदी ईस्वी) मायाम्तम्, शतपत् ब्राह्मण, मार्कण्डेय पुराण, विष्णु पुराण, भागवतपुराण, हरिवाम्सा, उत्तमचरित्र ,हर्षचरित्र, तमिल पाठ जीविकाचिँतामणि, मेँ तथा और भी कई वैदिक ग्रंथोँ मेँ भी विमानोँ के बारे मेँ विस्तार से बताया गया है।

महर्षि भारद्वाज के शब्दों में - "पक्षियों की भान्ति उडने के कारण वायुयान को विमान कहते हैं, (वेगसाम्याद विमानोण्डजानामिति ।।)
विमानों के प्रकार:-

(१) शकत्युदगम विमान -"विद्युत से चलने वाला विमान"

(२) धूम्र विमान - "धुँआ, वाष्प आदि से चलने वाला विमान"

(३) अशुवाह विमान - "सूर्य किरणों से चलने वाला विमान",

(४) शिखोदभग विमान - "पारे से चलने वाला विमान",

(५) तारामुख विमान -"चुम्बकीय शक्ति से चलने वाला विमान",

(६) मरूत्सख विमान - "गैस इत्यादि से चलने वाला विमान"

(७) भूतवाहक विमान - "जल,अग्नि तथा वायु से चलने वाला विमान"

वो विमान जो मानवनिर्मित नहीं थे किन्तु उन का आकार प्रकार आधुनिक ‘उडनतशतरियों’ के अनुरूप है। विमान विकास के प्राचीन ग्रन्थ भारतीय उल्लेख प्राचीन संस्कृत भाषा में सैंकडों की संख्या में उपलब्द्ध हैं, किन्तु खेद का विषय है कि उन्हें अभी तक किसी आधुनिक भाषा में अनुवादित ही नहीं किया गया।

प्राचीन भारतीयों ने जिन विमानों का अविष्कार किया था उन्होंने विमानों की संचलन प्रणाली तथा उन की देख भाल सम्बन्धी निर्देश भी संकलित किये थे, जो आज भी उपलब्द्ध हैं और उनमें से कुछ का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया जा चुका है। विमान-विज्ञान विषय पर कुछ मुख्य प्राचीन ग्रन्थों का ब्योरा इस प्रकार हैः-

प्रथम ग्रंथ :

(१) ऋगवेद- इस आदिग्रन्थ में कम से कम २०० बार विमानों के बारे में उल्लेख है। उन में तिमंजिला, त्रिभुज आकार के, तथा तिपहिये विमानों का उल्लेख है जिन्हेँ अश्विनों (वैज्ञानिकों) ने बनाया था। उन में साधारणतया तीन यात्री जा सकते थे। विमानों के निर्माण के लिये स्वर्ण,रजत तथा लोह धातु का प्रयोग किया गया था तथा उन के दोनो ओर पंख होते थे। वेदों में विमानों के कई आकार-प्रकार उल्लेखित किये गये हैं। अहनिहोत्र विमान के दो ईंजन तथा हस्तः विमान (हाथी की शक्ल का विमान) में दो से अधिक ईंजन होते थे। एक अन्य विमान का रुप किंग-फिशर पक्षी के अनुरूप था। इसी प्रकार कई अन्य जीवों के रूप वाले विमान थे। इस में कोई संदेह नहीं कि बीसवीं सदी की तरह पहले भी मानवों ने उड़ने की प्रेरणा पक्षियों से ही ली होगी।

यातायात के लिये ऋग्वेद में जिन विमानों का उल्लेख है वह इस प्रकार है-

(१) जलयान – यह वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद ६.५८.३)

(२) कारायान – यह भी वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद ९.१४.१)

(३) त्रिताला – इस विमान का आकार तिमंजिला था। (ऋगवेद ३.१४.१)

(४) त्रिचक्र रथ – यह रथ के समान तिपहिया विमान आकाश में उड़ सकता था। (ऋगवेद ४.३६.१)

(५) वायुरथ – रथ के जैसा ये यह विमान गैस अथवा वायु की शक्ति से चलता था। (ऋगवेद ५.४१.६)

(६) विद्युत रथ – इस प्रकार का रथ विमान विद्युत की शक्ति से चलता था। (ऋगवेद ३.१४.१).

द्वितीय ग्रंथ :

(२) यजुर्वेद - यजुर्वेद में भी एक अन्य विमान का तथा उन की संचलन प्रणाली उल्लेख है जिसका निर्माण जुड़वा अश्विन कुमारों ने किया था। इस विमान के प्रयोग से उन्होँने राजा भुज्यु को समुद्र में डूबने से बचाया था।

तृतीय ग्रंथ :

(३) यन्त्र सर्वस्वः – यह ग्रंथ भी महर्षि भारद्वाज रचित है। इसके ४० भाग हैं जिनमें से एक भाग मेँ ‘विमानिका प्रकरण’ के आठ अध्याय, लगभग १०० विषय और ५०० सूत्र हैं जिन में विमान विज्ञान का उल्लेख है। इस ग्रन्थ में ऋषि भारद्वाज ने विमानों को तीन श्रैँणियों में विभाजित किया हैः-

(१) अन्तर्देशीय – जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।

(२) अन्तर्राष्ट्रीय – जो एक देश से दूसरे देश को जाते हैँ।

(३) अन्तर्राक्षीय – जो एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाते हैँ।

इनमें सें अति-उल्लेखनीय सैनिक विमान थे जिनकी विशेषतायें विस्तार पूर्वक लिखी गयी हैं और वह अति-आधुनिक साईंस फिक्शन लेखक को भी आश्चर्य चकित कर सकती हैं।

उदाहरणार्थ - सैनिक विमानों की विशेषतायें इस प्रकार की थीं-

पूर्णत्या अटूट,

अग्नि से पूर्णतयाः सुरक्षित

आवश्यक्तता पड़ने पर पलक झपकने मात्र के समय मेँ ही एक दम से स्थिर हो जाने में सक्षम,

शत्रु से अदृश्य हो जाने की क्षमता (स्टील्थ क्षमता),

शत्रुओं के विमानों में होने वाले वार्तालाप तथा अन्य ध्वनियों को सुनने में सक्षम। 

शत्रु के विमान के भीतर से आने वाली आवाजों को तथा वहाँ के दृश्योँ को विमान मेँ ही रिकार्ड कर लेने की क्षमता, 

 शत्रु के विमानोँ की दिशा तथा दशा का अनुमान लगाना और उस पर निगरानी रखना, 

शत्रु के विमान चालकों तथा यात्रियों को दीर्घ काल के लिये स्तब्द्ध कर देने की क्षमता, 

निजी रुकावटों तथा स्तब्द्धता की दशा से उबरने की क्षमता, 

आवश्यकता पडने पर स्वयं को नष्ट कर सकने की क्षमता, 

चालकों तथा यात्रियों में मौसमानुसार अपने आप को बदल लेने की क्षमता, 

स्वचालित तापमान नियन्त्रण करने की क्षमता, 

 हल्के तथा उष्णता ग्रहण कर सकने वाले धातुओं से निर्मित तथा आपने आकार को छोटा बड़ा करने, तथा अपने चलने की आवाजों को पूर्णतयाः नियन्त्रित कर सकने की सक्षमता।

विचार करने योग्य तथ्य है कि इस प्रकार का विमान अमेरिका के अति आधुनिक स्टेल्थ विमानोँ और अन्य हवाई जहाज़ोँ का मिश्रण ही हो सकता है। ऋषि भारद्वाज कोई आधुनिक ‘फिक्शन राइटर’ तो थे नहीं। परन्तु ऐसे विमान की परिकल्पना करना ही आधुनिक बुद्धिजीवियों को चकित करता है, कि भारत के ऋषियों ने इस प्रकार के वैज्ञानिक माडल का विचार कैसे किया।

उन्होंने अंतरिक्ष जगत और अति-आधुनिक विमानों के बारे में लिखा जब कि विश्व के अन्य देश साधारण खेती-बाड़ी का ज्ञान भी हासिल नहीं कर पाये थे।

चतुर्थ ग्रंथ :

(४) कथा सरित सागर – यह ग्रन्थ उच्च कोटि के श्रमिकों (इंजीनियरोँ) का उल्लेख करता है जैसे कि काष्ठ का काम करने वाले जिन्हें राज्यधर और प्राणधर कहा जाता था। यह समुद्र पार करने के लिये भी रथों का निर्माण करते थे तथा एक सहस्त्र यात्रियों को ले कर उडने वाले विमानों को बना सकते थे। यह रथ विमान मन की गति से चलते थे।

पंचम ग्रंथ :

(५) अर्थशास्त्र - चाणक्य के अर्थशास्त्र में भी अन्य कारीगरों के अतिरिक्त सेविकाओं (पायलट) का भी उल्लेख है जो विमानों को आकाश में उड़ाती थी। चाणक्य ने उनके लिये विशिष्ट शब्द "आकाश युद्धिनाः" का प्रयोग किया है जिसका अर्थ है आकाश में युद्ध करने वाला (फाईटर-पायलट)

आकाश-रथ, का उल्लेख सम्राट अशोक के शिलालेखों में भी किया गया है जो उसके काल (२३७-२५६ ईसा पूर्व) में लगाये गये थे। 

भारद्वाज मुनि ने विमानिका शास्त्र मेँ लिखा हैं, -"विमान के रहस्यों को जानने वाला ही उसे चलाने का अधिकारी है।"

शास्त्रों में विमान चलाने के बत्तीस रहस्य बताए गए हैं। उनका भलीभाँति ज्ञान रखने वाला ही उसे चलाने का अधिकारी है। क्योँकि वहीँ सफल पायलट हो सकता है।

विमान बनाना, उसे जमीन से आकाश में ले जाना, खड़ा करना, आगे बढ़ाना टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलाना या चक्कर लगाना और विमान के वेग को कम अथवा अधिक करना उसे जाने बिना यान चलाना असम्भव है।

अब हम कुछ विमान रहस्योँ की चर्चा करेँगे।

(१) कृतक रहस्य - बत्तीस रहस्यों में यह तीसरा रहस्य है, जिसके अनुसार हम विश्वकर्मा , छायापुरुष, मनु तथा मयदानव आदि के विमान शास्त्रोँ के आधार पर आवश्यक धातुओं द्वारा इच्छित विमान बना सकते , इसमें हम कह सकते हैं कि यह हार्डवेयर यानी कल-पुर्जोँ का वर्णन है।

(२) गूढ़ रहस्य - यह पाँचवा रहस्य है जिसमें विमान को छिपाने (स्टील्थ मोड) की विधि दी गयी है। इसके अनुसार वायु तत्व प्रकरण में कही गयी रीति के अनुसार वातस्तम्भ की जो आठवीं परिधि रेखा है उस मार्ग की यासा , वियासा तथा प्रयासा इत्यादि वायु शक्तियों के द्वारा सूर्य किरण हरने वाली जो अन्धकार शक्ति है, उसका आकर्षण करके विमान के साथ उसका सम्बन्ध बनाने पर विमान छिप जाता है।

(३) अपरोक्ष रहस्य - यह नौँवा रहस्य है। इसके अनुसार शक्ति तंत्र में कही गयी रोहिणी विद्युत के फैलाने से विमान के सामने आने वाली वस्तुओं को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

(४) संकोचा - यह दसवाँ रहस्य है। इसके अनुसार आसमान में उड़ने समय आवश्यकता पड़ने पर विमान को छोटा करना।

(५) विस्तृता - यह ग्यारहवाँ रहस्य है। इसके अनुसार आवश्यकता पड़ने पर विमान को बड़ा या छोटा करना होता है। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि वर्तमान काल में यह तकनीक १९७० के बाद विकसित हुई है।

(६) सर्पागमन रहस्य - यह बाइसवाँ रहस्य है जिसके अनुसार विमान को सर्प के समान टेढ़ी - मेढ़ी गति से उड़ाना संभव है। इसमें कहा गया है दण्ड, वक्र आदि सात प्रकार के वायु और सूर्य किरणों की शक्तियों का आकर्षण करके यान के मुख में जो तिरछें फेंकने वाला केन्द्र है, उसके मुख में उन्हें नियुक्त करके बाद में उसे खींचकर शक्ति पैदा करने वाले नाल में प्रवेश कराना चाहिए। इसके बाद बटन दबाने से विमान की गति साँप के समान टेढ़ी - मेढ़ी हो जाती है।

(७) परशब्द ग्राहक रहस्य - यह पच्चीसवाँ रहस्य है। इसमें कहा गया है कि शब्द ग्राहक यंत्र विमान पर लगाने से उसके द्वारा दूसरे विमान पर लोगों की बात-चीत सुनी जा सकती है।

(८) रूपाकर्षण रहस्य - इसके द्वारा दूसरे विमानों के अंदर का दृश्य देखा जा सकता है।

(९) दिक्प्रदर्शन रहस्य - दिशा सम्पत्ति नामक यंत्र द्वारा दूसरे विमान की दिशा का पता चलता है।

(९) स्तब्धक रहस्य - एक विशेष प्रकार का अपस्मार नामक गैस स्तम्भन यंत्र द्वारा दूसरे विमान पर छोड़ने से अंदर के सब लोग मूर्छित हो जाते हैं।

(१०) कर्षण रहस्य - यह बत्तीसवाँ रहस्य है, इसके अनुसार आपके विमान का नाश करने आने वाले शत्रु के विमान पर अपने विमान के मुख में रहने वाली वैश्र्‌वानर नाम की नली में ज्वालिनी को जलाकर सत्तासी लिंक (डिग्री जैसा कोई नाप है) प्रमाण हो, तब तक गर्म कर फिर दोनों चक्कल की कीलि (बटन) चलाकर शत्रु विमानों पर गोलाकार दिशा से उस शक्ति की फैलाने से शत्रु का विमान नष्ट हो जाता है।

"विमान-शास्त्री महर्षि शौनक" आकाश मार्ग का पाँच प्रकार का विभाजन करते हैं तथा "महर्षि धुण्डीनाथ" विभिन्न मार्गों की ऊँचाई पर विभिन्न आवर्त्त या तूफानोँ का उल्लेख करते हैं और उस ऊँचाई पर सैकड़ों यात्रा पथों का संकेत देते हैं। इसमें पृथ्वी से १०० किलोमीटर ऊपर तक विभिन्न ऊँचाईयों पर निर्धारित पथ तथा वहाँ कार्यरत शक्तियों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

आकाश मार्ग तथा उनके आवर्तों का वर्णन निम्नानुसार है -

(१) १० किलोमीटर - रेखा पथ - शक्त्यावृत्त तूफान या चक्रवात आने पर

(२) ५० किलोमीटर - वातावृत्त - तेज हवा चलने पर

(३) ६० किलोमीटर - कक्ष पथ - किरणावृत्त सौर तूफान आने पर

(४) ८० किलोमीटर - शक्तिपथ - सत्यावृत्त बर्फ गिरने पर

एक महत्वपूर्ण बात विमान के पायलटोँ को विमान मेँ तथा पृथ्वी पर किस तरह भोजन करना चाहिए इसका भी वर्णन है-

उस समय के विमान आज से कुछ भिन्न थे। आज के विमान की उतरने की जगह (लैँडिग) निश्चित है, पर उस समय विमान कहीं भी उतर सकते थे।

अतः युद्ध के दौरान जंगल में उतरना पड़ा तो जीवन निर्वाह कैसे करना चाहिए, इसीलिए १०० वनस्पतियों का वर्णन दिया गया है, जिनके सहारे दो-तीन माह जीवन चलाया जा सकता है। जब तक दूसरे विमान आपको खोज नहीँ लेते।

विमानिका शास्त्र में कहा गया है कि पायलट को विमान कभी खाली पेट नहीं उड़ाना चाहिए। १९९० में अमेरिकी वायुसेना ने १० वर्ष के निरीक्षण के बाद ऐसा ही निष्कर्ष निकाला है।

अब जरा विमानोँ मेँ लगे यंत्रोँ और उपकरणोँ के बारे मेँ तथ्य प्रस्तुत कियेँ जाएं -

"विमानिका-शास्त्र" में ३१ प्रकार के यंत्र तथा उनके विमान में निश्चित स्थान का वर्णन मिलता है। इन यंत्रों का कार्य क्या है इसका भी वर्णन किया गया है। कुछ यंत्रों की जानकारी निम्नानुसार है -

(१) विश्व क्रिया दर्पण - इस यंत्र के द्वारा विमान के आसपास चलने वाली गतिविधियों का दर्शन पायलट को विमान के अंदर होता था, इसे बनाने में अभ्रक तथा पारा आदि का प्रयोग होता था।

(२) परिवेष क्रिया यंत्र - ये यंत्र विमान की गति को नियंत्रित करता था।

(३) शब्दाकर्षण मंत्र - इस यंत्र के द्वारा २६ किमी. क्षेत्र की आवाज सुनी जा सकती थी तथा पक्षियों की आवाज आदि सुनने से विमान को "पक्षी-टकराने" जैसी दुर्घटना से बचाया जा सकता था।

(४) गर्भ-गृह यंत्र - इस यंत्र के द्वारा जमीन के अन्दर विस्फोटक खोजा जाता था।

(५) शक्त्याकर्षण यंत्र - इस यंत्र का कार्य था, विषैली किरणों को आकर्षित कर उन्हें ऊष्णता में परिवर्तित करना और ऊष्णता के वातावरण में छोड़ना।

(६) दिशा-दर्शी यंत्र - ये दिशा दिखाने वाला यंत्र था (कम्पास)।

(७) वक्र प्रसारण यंत्र - इस यंत्र के द्वारा शत्रु विमान अचानक सामने आ गया, तो उसी समय पीछे मुड़ना संभव होता था।

(८) अपस्मार यंत्र - युद्ध के समय इस यंत्र से विषैली गैस छोड़ी जाती थी।

(९) तमोगर्भ यंत्र - इस यंत्र के द्वारा शत्रु युद्ध के समय विमान को छिपाना संभव था। तथा इसके निर्माण में तमोगर्भ लौह प्रमुख घटक रहता था।

"विमानिका-शास्त्र" मेँ विमान को संचालित करने हेतु विभिन्न ऊर्जा स्रोतोँ का वर्णन किया गया है, महर्षि भारद्वाज इसके लिए तीन प्रकार के ऊर्जा स्रोतों उल्लेख करते हैं।

(१) विभिन्न दुर्लभ वनस्पतियोँ का तेल - ये ईँधन की भाँति काम करता था।

(२) पारे की भाप - प्राचीन शास्त्रों में इसका शक्ति के रूप में उपयोग किए जाने का वर्णन है। इसके द्वारा अमेरिका में विमान उड़ाने का प्रयोग हुआ, पर वह जब ऊपर गया, तब उसमेँ विस्फोट हो गया। पर यह सिद्ध हो गया कि पारे की भाप का ऊर्जा की तरह प्रयोग हो सकता है, इस दिशा मेँ अभी और कार्य करने बाकी हैँ।

(३) सौर ऊर्जा - सूर्य की ऊर्जा द्वारा भी विमान संचालित होता था। सौर ऊर्जा ग्रहण कर विमान उड़ाना जैसे समुद्र में पाल खोलने पर नाव हवा के सहारे तैरता है। इसी प्रकार अंतरिक्ष में विमान वातावरण से सूर्य शक्ति ग्रहण कर चलता रहेगा। सेटेलाइट इसी प्रक्रिया द्वारा चलते हैँ।

"विमानिका-शास्त्र" मेँ महर्षि भारद्वाज विमान बनाने के लिए आवश्यक धातुओँ का वर्णन किया है, पर प्रश्न उठता है कि क्या "विमानिका-शास्त्र" ग्रंथ का कोई ऐसा भाग है जिसे प्रारंभिक तौर पर प्रयोग द्वारा सिद्ध किया जा सके?

यदि कोई ऐसा भाग है, तो क्या इस दिशा में कुछ प्रयोग हुए हैं?

क्या उनमें कुछ सफलता मिली है

सौभाग्य से इन प्रश्नों के उत्तर हाँ में दिए जा सकते हैं।

हैदराबाद के डॉ. श्रीराम प्रभु ने "विमानिक-शास्त्र" ग्रंथ के यंत्राधिकरण को देखा , तो उसमें वर्णित ३१ यंत्रों में कुछ यंत्रों की उन्होंने पहचान की तथा इन यंत्रों को बनाने वाली मिश्र धातुओं का निर्माण सम्भव है या नहीं , इस हेतु प्रयोंग करने का विचार उनके मन में आया । प्रयोग हेतु डॉ. प्रभु तथा उनके साथियों ने हैदराबाद स्थित बी. एम. बिरला साइंस सेन्टर के सहयोग से प्राचीन भारतीय साहित्य में वर्णित धातुएं, दर्पण आदि का निर्माण प्रयोगशाला में करने का प्रकल्प किया और उसके परिणाम आशाष्पद हैं। साभार divine Shiva temple Facebook wall

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तंत्र का रहस्य

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तंत्र का रहस्य विविध प्रकार के त्रास अर्थात वैसे रक्षा करते हुए जो त्राण अर्थात रक्षा करे वही तंत्र है अतः तंत्र किसी प्रकार का अहित कारी है ही नहीं और तंत्र शास्त्र की उत्पत्ति भी मनुष्य को विभिन्न प्रकार के भयो रोगभय शत्रुभय राजभय उत्पातभय से सुरक्षित रखने हेतु विशेष साधना पद्धति से हुआ है।
जो विभिन्न अलौकिक सुख वह रक्षाकार होने के साथ ही प्रालौकिक मुक्ति का ईश्वरीय साक्षात्कार का उत्तम साधन है aलेकिन कुछ व्यक्तियों ने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु तंत्र का दुरुपयोग करके दूसरों को हानि पहुंचाने वाले अभिचार कर्मों को भी जन्म दिया है।
जो पाप मूलक वह निंदनीय है किसी भी तंत्रवित्ता को जब तक जीवन पर संकट ना हो तंत्र के दुरुपयोग करने का निषेध है केवल जीवन पर संकट उपस्थित होने और रक्षा का कोई साधन ने बचने पर ही अभिचार कृत्य की आज्ञा है।
इसी कारण आज तंत्र में तांत्रिक भय का एक पर्याय कारण बन चुका है जबकि वास्तव में वह साधना और रक्षा का पर्याय है तंत्र तथा तांत्रिक के नाम पर लोग जटा में दाढ़ी बढ़ाए ऐसे कुत्सित रूप की कल्पना कर लेते हैं जो शमशान में जाकर शव का भक्षण कर रहा हूं अनर्गल हवन कर रहा हूं मुंण्डधारी आदि वेशभूषा में हूं जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है यह एक ही शुद्ध सात्विक उपासना है और एक सामान्य सांसारिक व्यक्ति उपासना को कर सकता है।
यही कारण है कि अनादिकाल से ही तंत्र शास्त्र की मान्यता है तांत्रिक उपासना में विधि-विधान का पूर्ण ज्ञान आवश्यक है विधि रहित वह त्रुटिपूर्ण उपासना लाभ करने के स्थान पर अशुभकारी भी हो सकती है आते हैं तंत्र शास्त्र की दीक्षा लेने के साथ ही सर्वप्रथम किस के संपूर्ण विधि विधान का ज्ञान होना आवश्यक है आज तक ऐसा कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं जिसमें क्रमश  सभी विधि-विधान का संकलन हो और विधि पूर्वक साधना न होने साधना कभी सफल नहीं हो सकती है और असफलता के कारण तंत्र विद्या पर अविश्वास होना स्वाभाविक है।
इसी प्रयोजन से समस्त विधि-विधान का ज्ञान आवश्यक है जो अत्यंत जटिल वह समय साध्य है किसी भी प्रयोग को सिद्ध करने से पहले साधक को इन सभी क्रियाओं एवं विधियों का पालन करना होगा तभी सिद्धि संभव है साधना कोई भी हो कठिन होती है sअर्थात साधना तलवार की धार पर चलने के समान है सभी के लिए संभव नहीं है लाखों व्यक्तियों में से एक दो व्यक्ति ऐसी चेष्टा करते हैं और प्रयत्नशील ऐसे लाखों लोगों में से कोई एक सिद्धि प्राप्त कर पाता है।
साधना में ज्यादातर लोग कमीज पजामा पहन कर बैठते हैं पर आपको ज्ञात होना चाहिए कि साधना में अनसिला एक वस्त्र पहना जाता है इसी प्रकार साधना नियमाकुल ना होने के कारण सफल नहीं होती है।
तंत्र साधना में मन तथा इंद्रियों पर संयम अनिवार्य है जिसका मन तथा इंद्रियों पर संयम न हो वे साधना के योग्य नहीं है अतः तंत्र साधना के नियमित योग साधना भी आवश्यक है।
आतम संयम इंद्रिय संयम एवं मनोनिग्रह का स्वरूप यह है कि व्यक्ति विषम परिस्थितियों में भी काम के वशीभूत में हो सके यदि साधक पुरुष है तो सभी नारी मात्र को मां के रूप में और साधक स्त्री है तो पुरुष मात्र को पुत्र के रूप में देखें साधक का संयम ऐसा हो कि रूप गर्विता नवयौवना युवती के समक्ष भी जिस व्यक्ति ने कामवासना जागृत ना हो उसमें भी मातृभाव की दृष्टि हो इसी प्रकार महिला साधक के हृदय में भी पुरुष मात्र के प्रति पुत्रवत वात्सल्य हो ऐसे साधक ही तंत्र विद्या के अधिकारी हैं।
एक उल्लेखनीय बात यह है कि 11 मंत्र को सिद्ध करने में ही काफी समय लगता है ऐसी स्थिति में व्यक्ति जीवन पर्यंत कुछ ही मंत्र सिद्ध कर सकता है यदि लोकहित की कामना से अनेक मंत्र सिद्ध करना चाहे तो उसके निमित्त ग्रहण काल में मंत्र सिद्ध करने की सरल विधि है हां उसे प्रयोग में ला सकते हैं।
सफलता की दृष्टि से यह भी आवश्यक है की तांत्रिक प्रयोग हेतु जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है वह भी प्रामाणिक हो या तो व्यक्ति स्वयं उनका ज्ञाता हो और स्वयं संग्रह करें अन्यथा बाजार से क्रय करने पर भी वास्तव में वह वस्तु शुद्ध है या नहीं इसका ध्यान भी रखना चाहिए अन्यथा प्रयोग असफल वह व्यर्थ होगा तांत्रिक को चाहिए कि द्वेषवश भयवश लोभवश कभी भी मंत्र का दुरुपयोग ना करें और इसका व्यावसायिक उपयोग भी कदापि न करें अन्यथा सिद्धि समाप्त होने के साथ साथी अपना भी लोक परलोक नष्ट होगा केवल लोकहित की कामना से जनमानस के कष्टों का निराकरण हेतु ही इस विद्या का सदुपयोग करें इसका दुरुपयोग कभी न करें।
कुछ स्वार्थी साधकों द्वारा लोभवश द्वेषवश या स्वार्थवश तंत्र का दुरुपयोग मारण मोहन उच्चाटन वशीकरण आदि षटकर्म एवं अभिचार कर्म करते हैं अतः जनसाधारण को भी सावधान रहना चाहिए व्यक्ति इन अभिचारों से कैसे बच सकता है कोई भी मंत्र तभी सफल होता है hजबकि पहले पुरश्चरण करके विधि पूर्वक उसे सिद्ध कर लिया जाए बिना मंत्र सिद्ध किए हुए वह प्रभावी नहीं हो सकता अतः बिना सिद्ध किए हुए किसी मंत्र का प्रयोग करने की चेष्टा न करें व्यर्थ ही होगा एक और बात उल्लेखनीय है राजनेताओं उच्चाधिकारियों प्रतिष्ठित जनों के संपर्क में अनेक ऐसे स्वार्थी व्यक्ति आते रहते हैं जो अपने को परायोगी सिद्ध त्रिकालदर्शी तांत्रिक आदि नाम देकर अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ वर्ष संपर्क करते हैं भविष्य की जिज्ञासा पदोन्नति एवं धन की लिप्सा आदि मानव की दुर्बलता स्वाभाविक है और बड़े-बड़े शिक्षित व्यक्ति भी इनके शुद्र चमत्कारों के प्रभावित होकर इनके चक्र में फंस जाते हैं। और कालांतर में यही अनिष्ट का कारण बनते हैं अतः किसी को भी गुरु बनाने से पहले पूर्ण परिचय ज्ञात करने की उसकी शिक्षा आचरण ज्ञान आदि का भी अवलोकन कर ले बहुधा लोग अनेक व्यक्तियों से परामर्श लेते रहते हैं यह एक भ्रांति है कि विभिन्न लोगों से परामर्श करने से सही मार्गदर्शन होगा ऐसा करने से और भी भ्रांति ही बढ़ेगी और यह उचित भी नहीं है सोच विचार कर किसी एक को गुरु बनाएं उसी पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखें कुछ साधक प्राय लोगों को अपने शूद्र चमत्कारों से वशीभूत कर लेते हैं उन से लाभ उठाते हैं और कालांतर में अपने हित साधन या स्वार्थवश उसीका अनिष्ट करने में भी नहीं चूकते हैं‌।
जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपनी कार्य संपादन हेतु किसी अपराधिक व्यक्ति का आश्रय लेता है तो उसका वह कार्य भी कर देता है किंतु बाद में वही व्यक्ति एवं उसका भी उत्पीड़न करने से नहीं चूकता है।
उदाहरण स्वरूप शत्रु के मारण प्रयोग हेतु शत्रु के बाल पैर की धूल वस्त्र आदि की आवश्यकता होती है जो सीधे या सुलभता से मिल नहीं सकते ऐसे में वह व्यक्ति अपने शत्रु के पास किसी माध्यम से किसी ऐसे व्यक्ति को भेजता है जो आप को प्रभावित कर सके और आप उस पर विश्वास कर सकें कालांतर में उसके प्रति आपका पूर्ण विश्वास हो जाने पर वह व्यक्ति आपके शत्रु के पास से सामग्री प्राप्त कर पहुंचा सकता है आपका विश्वस्त बनाए यही व्यक्ति आपके प्रति अभी चार अनिष्ट कारी प्रयोग कर सकता है। oमैंने भी ऐसे कई लोगों को देखा है जो बहुत ज्ञानी सज्जन लेकिन वह भी अनेकों से परामर्श लेने की अपनी प्रकृति के कारण तांत्रिकों से पीड़ित रहे है और उनके द्वारा तांत्रिकों को निश्चित लाभ पहुंचा है कुछ तांत्रिक लोग ऐसे तंत्र प्रयोग करके अपने जीवन को इतना कलंकित पापी और अपवित्र कर लेते हैं कि उनकी मृत्यु के समय की घटनाओं का स्मरण करके ही मन थरथराने लगता है। कोई चमत्कार दिखाना भभूत आदि उत्पन्न करना हाथ उठाकर हवा में कोई वस्तु प्रकट करना आपका चिंतित कार्य छाप देना बीती भी घटनाएं बता देना आदि भूत प्रेत अथवा जादू अथवा रासायनिक क्रियायें हैं यह उत्कृष्ट साधना नहीं है जबकि तांत्रिक उपासना का लक्ष्य पुरुषार्थ धर्म अर्थ काम तथा मोक्ष साधना है विशिष्ट तांत्रिक साधना से ही अष्टधा सिद्धियों की उपलब्धि होती है।
अर्थात अपनी शरीर या किसी वस्तु को अति सूक्ष्म कण वह अणुरूप में घटित करना गुरुतर बना देना बड़ा बना देना हल्का बना देना दूर की वस्तु प्राप्त करना उत्पन्न इच्छाओं की पूर्ति होना समस्त इंद्रियों व प्राणी मात्र पर नियंत्रण एवं ईश्वर के समान किसी कार्य को पूर्ण करने की शक्ति आते हैं उच्चतर साधना से उसे प्राप्त हिंदी से व्यक्ति में हो सकती हैं kऐसा सिद्ध व्यक्ति जो वरदान भी आशीर्वाद देता है वह निश्चित रूप से पूर्ण होता है भले ही असंभव क्यों न हो परंतु ऐसे सिद्ध का मिलना हिमालय की एकांत गुफाओं में ही संभव है। sabhar sakti upasak agyani Facebook wall

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सोमवार, 18 अक्तूबर 2021

ऊर्जा

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जिस प्रकार एक पुष्प सर्वप्रथम कली के रूप में प्रकट होता हैं कली जानते हो ना कली से तात्पर्य हैं की वो अब तक खिला नही अर्थात उसकी पंखुडियाँ पूर्ण रूपेन से अब तक खुल नही पाया परंतु अगर लम्बे समय तक यही स्थिति बनी रहे अर्थात वो कली कली ही रह जाए पुष्प के समान खिल ना पाए तो उसकी सुगंध तो मंद मंद होते नष्ट होगी ही स्वयं उसकी अस्तित्व भी ज़र ज़र होकर छिन्न भिन्न हो जाएगी और अल्ल समय में ही वो कली के रूप में ही नष्ट हो जाएगा 

अर्थात उसके अंदर भी जीवन हैं परंतु वो जीवन उस प्राण रुकी अनंत विराट जीवन रुकी स्पंदन को मुक्त होने हेतु उसने रास्ता नही दिया अर्थात जब तक खिले नही तब तक वो प्राण अपने निम्न रूप में ही निवास करने लगती हैं अर्थात यहाँ प्रक्रिया बिलकुल उल्टी हो गयीं जीवन देने वाली प्राण ही जीवन का भक्षण करने लगी और धीरे धीरे वो कली जर्जर होने लगा मुरझाने लगा उसकी सुगंध की चरम अवस्था आने से पूर्व वो नष्ट होने लगी 

शायद मेरी बातें आप लोग को समझ में अच्छे से नही आ पाए परंतु इस विषय को बताना उतना ही जटिल हैं जैसे समुंदर की  गहराई को नापना परंतु फिर भी साधक तो इसे समझ ही सकते हैं हाँ जिन्हें साधना से कोई तात्पर्य नहीं उनके लिए ये जटिल ही नही असम्भव प्रयास होगी फिर भी मैं कोशिश करता हूँ ।

जैसा कि आपने ऊपर पढ़ा की अगर पुष्प कली से फूल नही बन पाया तो अल्प में समय में वही प्राण जिसने उसे जन्म दिया वही उसकी भक्षण कर जाएगी अर्थात उस विराट मुक्त असीमित प्राण रूपी सत्ता को बांधने क़ैद करने अथवा सीमित करने की कार्य की गयी जो की अप्राकृतिक हैं इसलिए यहाँ उसने भी अपने अप्राकृतिक स्वरूप को धारण कर जीवन से मृत्यु सुगंध से दुर्गंध, का रूप लेकर उसे तमस रूप से रूपांतरित करने लगा अर्थात अप्राकृतिक रूप से और अल्ल समय में उसे सूखा दिया जर्जर कर दिया और उसे अपने में विलीन कर लिया परंतु अगर वो खिल जाता तो वही जीवन अपने प्राकृत शौम्य, शांत , ममता मयी रूप को ना छोड़ती उसमें सुगंध भर देती उसकी सुंदरता और जीवन दोनो अंत तक आकर्षित और ताजग़ी की मूरत बन जाती हैं ना ?

अब यहाँ कुछ ऐसी ही समीकरण मनुष्य के मन, मस्तिष्क, इंद्रिया, चित्त और प्राण के साथ बनती हैं तुमने प्राण के सबसे निम्न क़ोष में स्थित होकर इसे भौतिकता तक ही सीमित कर दिया हैं इसके सबसे उच्य रूप को समझने की कोशिश ही नही किया इस प्राण रूपी तत्व को तुमने पृथ्वी तत्व से इस क़दर जोड़ लिया की ये अनंत, विराट, असीमित से सीमित हो गयी और अंत निम्न क़ोष प्राण वायु के रूप में और पृथ्वी तत्व अर्थात मूलआधार चक्र में अनंत विषय वस्तु, तत्व का माया रूपी आवरण ओढ़कर  सुप्त और जागृति के मध्य के अवस्था में आलस लेकर विश्राम करने लगी और अप्राकृतिक तमस रूप को धारण कर नित्य तुझे जर्जर करते जा रही, उसकी ताप धीरे धीरे समस्त इंद्रिया , चित्त, को वायु रूपी काल के साथ मिल कर बुढ़ापे और मृत्यु की ओर लेकर जा रही हैं क्यूँकि इसकी ये ताप इसकी अप्राकृतिक स्वरूप से प्रकट हो रही हैं इसलिए ये काल सूचक हैं परंतु जब तप, ध्यान, साधन के द्वारा इसे प्राकृत रूप में रूपांतरित कर दिया जाता तो यही ताप पवित्र अग्नि स्वरूप बन कर हर उस तत्व, विषय, गुण को  लीलती हुई अपने क़ोष, रूप को रूपांतरित करते हुए निम्न से उच्य अवस्था को धारण करते जाती हैं अधो से ऊध्रव में गति कर इस तंत्र रूपी भौतिक आवरण को छोड़ तालु के रास्ते अनंत विराट मस्तिष्क में प्रवेश कर चेतना को उच्य अवस्था प्रदान कर डालती।
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