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विश्व मे गोबर के मकानों का प्रचलन

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#पश्चिम_से_पूर्व क्या आप जानते है, इस समय पूरे विश्व मे गोबर के मकानों का प्रचलन बढ़ा है । अमेरिका, इटली, जर्मनी जैसे उन्नत देशो के वैज्ञनिक भी अब गौबर के मकानों के महत्व को समझने लगे है .....  यही बात हजारो सालों पहले ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी लिखी है ....  "गौ के पैरों में समस्त तीर्थ व गोबर में साक्षात लक्ष्मी का वास है" । लक्ष्मी का वास कैसे है ...इसका विश्लेषण समझिए ... गोबर से विशेषकर गाय के गोबर से घर, आंगन, रसोई आदि की जमीन पोतना हर प्रकार से उत्तम है। इससे हम शुद्धता पाते हैं। टी.बी. के वायरस और रोगाणु मर जाते हैं। गर्मी का प्रकोप कम होता है। ठंडक महसूस होती है। गोबर के मकानों में किसी भी का वायरस नही ठहरता .... झोपड़ी में आपको AC नही लगाना पड़ेगा, प्राकृतिक ठंडक ही इतनी अधिक रहेगी ।। अफ्रीका -अरब् आदि गर्म अरब प्रदेशो में जब AC नही था, उस समय गौबर के मकानों ने ही उनकी गर्मी से रक्षा की थी ... सरकार इस समय सबको मकान देने की योजनाओं पर कार्य कर रही है ।। और गौ-संवर्धन पर भी कार्य कर रही है । गौ आधारित अर्थव्यवस्था भारत का आदिकाल का इतिहास रहा है, ओर वर्तमान मे

शवासन

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"" शरीर और मन से तनाव दूर कर साक्षी में प्रवेश करवाने वाला अद्भुत आसन -  शवासन योग का आरंभिक चरण है। शवासन हमारे शरीर को उस स्थिति में प्रवेश करवाता है जिस स्थिति में ध्यान आसानी से घटित हो सके। शवासन का मतलब है कि शव या मुरदा जिस आसन या स्थिति में होता है, अपने शरीर को उस स्थिति में ले जाना। जिस भांति मुरदा न श्वास लेता, न कोई हलचल करता, चेहरे पर कोई भाव नहीं होता है, चेहरा निर्भाव होता है, ठीक उसी स्थिति में अपने शरीर को ले जाना शवासन कहलाता है। मुर्दे के जैसा चेहरा तब होता है जब हमारे चेहरे पर कोई भाव नहीं होता है और मुर्दे जैसा शरीर तब होता है जब हमारे मन में कोई भी विचार नहीं होता है। यानि ध्यान वाली स्थिति। ध्यान वाली स्थिति में हमारा शरीर मुर्दे जैसा शांत और शिथिल हो जाता है।  जब हमारा ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश होता है, अचेतन में प्रवेश होता है, तब चेहरे से भाव और मन से विचार विलिन होने लगते हैं। भाव और विचारों के विलिन होते ही मन शांत होने लगता है और मन के शांत और शिथिल होते ही शरीर एक स्थिति में प्रवेश करता है। वह शांत और शिथिल हो उस स्थिति में प्रवेश

मानव शरीर का सम्बन्ध प्रकृति से

                                                परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन       मानव शरीर का सम्बन्ध प्रकृति से है। प्रकृति ने जिस प्रकार मानव शरीर की संरचना की है, वह अपने आप में विस्मयकारी है। शरीर शास्त्र के अनुसार शरीर की रचना का जितना ही अधिक विचार-विश्लेषण किया जाय, उतना ही यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि इसकी संरचना अद्भुत है।        206 हड्डियों और 600 से भी अधिक मांसपेशियों के ऊपर त्वचा का चोला तना है। हड्डियों, मांसपेशियों और त्वचा--तीनों की संरचना का कौशल आश्चर्यजनक है। हड्डियों जैसी मजबूत और हल्की चीज़ की कल्पना करना भी कठिन है। शरीर का जितना वजन होता है, हड्डियां उसके पांचवें हिस्से से भी कम होती हैं। अपने शरीर का ही भार इन पर कम नहीं होता। जब हम ख़ाली हाथ डुलाते हुए चलते हैं तो उस समय हमारे जांघ की हड्डी के एक-एक वर्ग इंच क्षेत्र पर पांच-पांच सौ किलो का दबाव पड़ रहा होता है। शरीर का भार, धरती का गुरुत्वाकर्षण और हवा का तेज भार-ये तीन दबाव हड्डियां झेल रही होती

सनातन सदाशिव निर्गुण एवं सगुण

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सनातन सदाशिव निर्गुण एवं सगुण दो स्वरूपों में जाने जाते हैं प्रकृति से शुन्य  जहां प्रकृति नहीं है शिव निर्गुण हैं और जब यह प्रकृति रूप में होते तो हैं तो वह सगुण हैं सत चित एवं आनंद रूप ऐश्वर्य से परिपूर्ण उस परमेश्वर के प्रकृति से युक्त हो जाने पर (उसमें प्रकृति की उत्पत्ति होने पर) शक्ति की उत्पत्ति हुई है शक्ति से नाद एवं नाद से बिंन्दु की उत्पत्ति हुई है समस्त ज्ञान का कारण  निरंजन ब्रह्म है जो साक्षी रूप है साक्षी रूप इसलिए कि वह वही सब कुछ उत्पन्न और नष्ट होने के समय उपस्थित रहता है aऔर प्रत्येक स्थान पर प्रत्येक क्रिया को अनुभूत करता है प्रकृति की विकृति का उद्भव इसी में होता है और इसे ही #तत्व कहते हैं। प्रकृति एवं पुरुष महाघोर एवं निराकार है सृष्टि के समय वही ब्रह्म प्रकृति एवं पुरुषों दो स्वरूपों में अभिव्यक्त होते हैं प्रकृति पुरुष चणक के आकार का है कोई से प्रकृति कहता है कोई पुरुष ब्रह्मवाक्य सें से अतीत एवं निर्मल समुज्वल घुतियुक्त है ब्रह्म मन से बुद्धि आदि से क्रिया से एवं वाक्य से अतीत है सदाशिव केवल साधकों के हितार्थ एवं ज्ञातार्थ एकत्वाश्रित ब्रह्म की उस

योग किसको कहते है

           योग मे ही सजॅन है,योग मे ही विसजॅन है, योग मे ही रूपांतरण है, योग मे ही समानता है,योग मे ही जीवन है,योग मे हो चलायमान है,योग मे ही वियोग है,योग मे ही विग्यान है, योग मे ही ग्यान है।           मानव शरीर मे जो योग क्रिया के माध्यम से मानव मशीन का उपयोग करके स्थूळ शरीर की दसेय ईन्द्रीयो की जो अलग अलग रूप मे शक्तिओ काम करती है वह सभी शक्तिओ को एक स्थान पर एक रूप मे एकत्रित करके कायॅवाहीत करके ध्यान  धारणा के मारफत अपनी आत्मा को ज्योत (ऊजाॅ)  स्वरूप मे दशॅन करना  ये पुरी क्रिया जो करते है उनको योग कहा जाता है ओर निती नियमो के आधिन जो नित्य ये क्रियामे लगे रहते है उनको योगी षुरूष कहा जाता है। आत्मा से परमात्मा तक देखना ईसीको योग कहते है निराकार चैंतन्य को आंतरीक द्रष्टि से  आकार मे देखना ऊसीको योग कहते है।            मानव शरीर मे अलग-अलग स्थान पर जो अलग-अलग शक्तिया काम करती है उन सभी को क्रम वाईझ जागृत करने के बाद सभी शक्तियो को त्रिभेटी ए एक रूप मे एकत्रित  करके उनको कायॅवाहित करना है। ओर शरीर की भीतर जो प्राण तत्व होता है वह प्राणतत्व को जागृत करने के लीए प्राणायाम का सहारा लेके

दस महाविद्याओं का रहस्य

{{{ॐ}}}                                                              #कमला_रहस्य दस महाविद्याओं में से प्रत्येक की अंग देवियां है इनकी संख्या अंनगनित है दक्षिण मार्ग की पूजा आधारित तंत्र विधियों में सोलह  आवरण तक की पूजा विधि मिलती है पर इसका अर्थ यह नहीं कि यह यहीं तक सीमित है प्रथम केंद्र की में कर्णिका के बाद कमल में आठ दल हो जाते हैं जिसमें पचास से ऊपर देवी देवताओं की पूजा करनी होती है और फिर दूसरे आवरण में सोलह के तीसरे में बत्तीस चौथे में चौसठ अर्थात हर आवरण मे दल दोगुना होते होते चले जाते हैंa इस प्रकार हजारों से अधिक देवी देवताओं और उनके आयुधों पूजा करनी होती है समस्त शास्त्रीय वाड्गमय मैं ऐसे ही तंत्र साधना कहा गया है किंतु सत्य यह नहीं है यह तंत्र के दक्षिणमार्गी जिसे वैदिक मार्ग भी कहते हैं कर्म कांडों को के आधार पर किया गया रूपांतर है हम पूर्व पोस्टों मे लिखते आये है के तंत्र जिन लोगों की संस्कृति से प्रस्फुटित हुआ है उसमें कर्मकांड प्रचलित नहीं थे यह विद्या वैदिक संस्कारों के अनुरूप नहीं थी इसलिए उन्हें परिवर्द्धित संशोधित कर दिया था।  कमला लक्ष्मी का ही दूसरा नाम है यह मण

चतुर्थ क्रिया पीनियल ग्रंथि

  चतुर्थ क्रिया का अभ्यास करने से आप ललाट, पोन्स, थैलेमस, हाइपोथैलेमस, पीनियल ग्रंथि के अंदर, पिट्यूटरी के सामने और मध्य मस्तिष्क में कुछ विशेष आत्मिक गति को अनुभव करते हैं। आपको लगता है कि प्रकाश  उर्ध्वलोकों से  भूलोक की ओर घूमते हुए आ रहा है । इस चौथे स्तर को असंशक्ति समाधि कहा जाता है, इसका अर्थ है कि आप स्वतंत्र रूप से परमचेतना में विचरण कर रहे हैं और अपने पूरे शरीर में भगवान की प्रत्यक्ष उपस्थिति का अनुभव करते हैं। आप स्वयं को एक दिव्य प्रकाश एवं भगवत अनुभूति का अनुभव करने वाले  देवता के रूप में देखते हैं। आप हजारों ज्योतियों और उनके प्रकाश को देख सकते हैं, यहां तक ​​कि खुली आंखों से, जो आपकी आंतरिक जगत को प्रकाशित करती हैं। आप वास्तव में सहस्रार के ऊपर एक परम प्रकाश को पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशमान करते हुए देख सकते हैं । आपके शरीर में आप सात प्रकार के प्रकाश देख सकते हैं,  सात केंद्रों में से प्रत्येक में दो अग्नि, एक आरोही और दूसरा अवरोही । आप इन ज्योतियों को अपने शरीर के भीतर और बाहर दोनों जगह देख सकते हैं। गुरु का शरीर अंधकार जैसा दिखाई देगा, जिसके चारों तरफ प्रकाश होगा। ~ परम