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मंगलवार, 9 अगस्त 2022

सूक्ष्म शरीर की विशेषताएं:

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------------ *********************************** परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव भगवान पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन 1- सूक्ष्म शरीर की पहली विशेषता यह है कि इच्छानुसार उसकी गति घटायी-बढ़ायी जा सकती है। 2- दूसरी विशेषता यह है कि कोई भी भौतिक वस्तु या पदार्थ उसके मार्ग में बाधक नहीं बन सकता। 3- सूक्ष्म शरीर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से मुक्त रहता है। 4- पृथ्वी के किसी भी भाग में निर्बाध गति से तत्काल पहुंच सकता है सूक्ष्म शरीर। एक बात जानकर हम-आप आश्चर्यचकित होंगे कि पृथ्वी पर जितने भी जीवित मनुष्य हैं, उनसे कहीं अधिक पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की परिधि में सूक्ष्म शरीरधारी विभिन्न प्रकार की आत्माएं विद्यमान हैं जो पुनः शरीर ग्रहण करने के लिए बराबर प्रयासरत रहती हैं। उन्हीं में बहुत-सी उच्चकोटि की दिव्यात्मायें और योगात्मायें भी हैं जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की सीमा लांघकर पारलौकिक जगत में प्रवेश करने के लिए सचेष्ट हैं। ------------:एक योगात्मा से साक्षात्कार:------------ *********************************** ऐसी ही एक योगात्मा से मेरा साक्षात्कार हुआ। उस समय अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा सूक्ष्म जगत के एक सुरम्य और रमणीक वातावरण में विचरण कर रहा था मैं। चारों ओर प्राकृतिक मनोहारी दृश्य थे जिनका अवलोकन करते हुए मैं आगे बढ़ रहा था। तभी मेरी दृष्टि पड़ी एक सूक्ष्म शरीरधारी महापुरुष पर। निश्चय ही वे कोई दिव्य पुरुष थे। उनके शरीर से दिव्य, अलौकिक आभा प्रस्फुटित हो रही थीं। एक वृक्ष के नीचे सिर झुकाए और नेत्र बन्द किए बैठे हुए थे वे। मेरी उपस्थिति का शायद आभास लग गया था उन्हें। सिर उठाकर देखा और देखकर मन्द-मन्द मुस्कराये। ज्ञात हुआ कि पिछले दो सौ वर्ष से रह रहे हैं महाशय सूक्ष्म जगत में। आये थे मेरी ही तरह सूक्ष्म जगत में भ्रमण करने, लेकिन ऐसे फँसे कि वापस ही न लौट सके अपने पार्थिव शरीर में। आश्चर्य हुआ मुझे। कैसे हुआ यह सब ? उन नहापुरुष का नाम था--केशव भट्ट। योगसाधक थे केशव भट्ट। *खेचरी सिद्धि* थी उनको। काशी के दशाश्वमेध घाट के ऊपर एक मकान में रहते थे। गुरु की सेवा करते हुए साधना में आगे बढ़ते जा रहे थे केशव भट्ट। गुरु का नाम था रत्नदेव। वीरशैव सम्प्रदाय के अनुयायी थे वे। आकाश मार्ग से प्रायः भ्रमण किया करते थे रत्नदेव। अपने शिष्य को पूर्ण योगी बना देना चाहते थे वे। क्या पूर्ण योगी बना पाए अपने शिष्य को ? नहीं ! व्याघात उत्पन्न हो गया। जो मेरा उद्देश्य था, वही उद्देश्य था केशव भट्ट का भी। सूक्ष्म जगत में निवास करने वाले महात्माओं और दिव्यात्माओं के साथ सत्संग और ज्ञानार्जन। केशव भट्ट जब शरीर छोड़कर सूक्ष्म शरीर द्वारा सूक्ष्म जगत में भ्रमणार्थ करने निकलते थे, उस समय उनके शरीर की रक्षा उनके गुरु रत्नदेव करते थे। नियम के अनुसार केशव भट्ट निश्चित अवधि में लौट आने का संकल्प करते थे और उसी अवधि में लौट भी आते थे अपने स्थूल शरीर में। एक बात यहाँ बतला देना आवश्यक है कि सूर्योदय के पूर्व जैसा ऊषाकाल का प्रकाश होता है, वैसे ही प्रकाश से भरा रहता है हर समय सूक्ष्म जगत। समय का ज्ञान नहीं होता। वहां काल का प्रभाव अत्यन्त मन्द है। जो काल की गति भूलोक पर है, उससे धीमी गति भावजगत में होती है और जो भाव जगत में काल की गति होती है, उससे भी मन्द गति सूक्ष्म जगत में होती है। इसलिए यहां के चार वर्ष भाव जगत के एक वर्ष के बराबर होते हैं और यहां के 400 वर्ष सूक्ष्म जगत के चार वर्ष के बराबर। जैसे-जैसे सूक्ष्म जगत के आयाम बदले जाते हैं, हम सूक्ष्म से सूक्ष्मतर जगत में प्रवेश करते जाते हैं, समय की गति उतनी ही मन्द से मंदतर होती जाती है। यहां की जिस अवस्था में योगी सूक्ष्म जगत में प्रवेश करता है, बस समझिए उसी अवस्था का होकर रह जाता है सूक्ष्म जगत में। जो योगी अपने जीवन-काल का अधिक समय सूक्ष्म जगत में व्यतीत करता है, उसके शरीर पर काल की गति का प्रभाव अत्यन्त मन्द पड़ता है। दीर्घकाल तक योगी के जीवित रहने का एकमात्र यही रहस्य है। वैसे मैंने (गुरुदेव ने) अपनी पुस्तकों में यथाप्रसंग सूक्ष्म शरीर की चर्चा की है। यहां सूक्ष्म शरीर के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण बात बतलाना चाहता हूं और वह यह कि सूक्ष्म शरीर में 10 % पृथ्वी तत्व, 20 % मनस्तत्व और शेष 70 % प्राणतत्व रहता है। 10 % पृथिवी तत्व रहने के कारण कभी-कभी सूक्ष्म शरीरधारी आत्माएं दिखलाई दे जाती हैं लोगों को और वह भी कुछ क्षणों के लिए। जैसे स्थूल शरीर में सूक्ष्म शरीर समाहित रहता है, उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर में मनोमय शरीर रहता है समाहित। लेकिन प्रतिशत कम होने के कारण उसमें गति नहीं होती और न तो होती है ऊर्जा ही। उसको विशेष यौगिक क्रियाओं से बढ़ाना पड़ता है साधक को। जैसा कि संकेत किया जा चुका है कि सूक्ष्म जगत की सीमा के पार पारलौकिक जगत है और उसके पार हैं विशिष्ट लोक-लोकांतर। sabhar shiv ram tiwari Facebook wall

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---------------:साधना-मार्ग में भैरवी की अवधारणा:--

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-------------- *********************************** परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव भगवान पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अलौकिक अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन परामानसिक जगत की दिशा में चक्र का उन्मेष तो पहले ही हो चुका था, अब वह क्रियाशील अवस्था में है। शक्ति तो निराकार होती है, वह अनुभव का विषय है, लेकिन अत्यन्त आश्चर्य का विषय है जिस पर सहसा कोई विश्वास करने को तैयार नहीं होगा। लेकिन कभी-कदा आवश्यकता पड़ने पर कुण्डलिनी-शक्ति साकार रूप भी धारण कर सकती है। चमेली (गुरुदेव के निवास पर झाड़ू, पोंछा, भोजन, बर्तन आदि का काम करने वाली लड़की) जैसी किसी माध्यम द्वारा प्रकट होकर साधक के पास आती है और मार्गदर्शन भी करती है। तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि तांत्रिक साधना-भूमि में भैरवी का महत्वपूर्ण स्थान है। बिना भैरवी के साधक अपने साधना-मार्ग में निर्विघ्न सफल हो ही नहीं सकता। इसके अनेक कारण हैं। सच बात तो यह है कि पूरा तंत्र-शास्त्र काम-शास्त्र पर आधारित है, इसलिए कि चार पुरुषार्थो में तीसरा पुरुषार्थ 'काम' है। 'काम' सिद्ध होने पर ही चौथा पुरषार्थ 'मोक्ष' उपलब्ध हो सकता है। काम की मूलशक्ति साक्षात स्त्रीस्वरूपा है और वह पुरुष के मूलाधार चक्र में (कुण्डलिनी-शक्ति के रूप में विद्यमान है। वह प्राकृतिक है, स्वयंभू है इसीलिए तांत्रिक साधना-भूमि में स्त्री का विशेष महत्व है। स्त्री के दो रूप हैं--*भोग्या* रूप और दूसरा *पूज्या* रूप। भोग्या रूप इस अर्थ में है कि स्त्री में जो नैसर्गिक शक्ति है जिसे हम 'काम की मूल शक्ति' भी कह सकते हैं, वह साधना- भूमि में साधक के लिए आन्तरिक रूप से उपयोगी सिद्ध होती है। उसी के आधार पर साधना में सफलता प्राप्त करता है साधक और अन्त में प्राप्त करता है उच्च अवस्था को भी। स्त्री में उसकी नैसर्गिक शक्ति को जागृत करना और उसे 'नियोजित' करना अत्यन्त कठिन कार्य है। यह गुह्य कार्य है और इसके सम्पन्न होने पर विशेष तांत्रिक क्रियाओं का आश्रय लेकर स्त्री को *भैरवी दीक्षा* प्रदान की जाती है जिसके फलस्वरूप भैरवी में 'मातृत्व का भाव' उदय होता है। तन्त्र-भूमि में 'मातृत्व भाव' बहुत ही महत्वपूर्ण है। तंत्र-साधना के जितने गुह्य और गंभीर अनुभव हैं, उनमें एक यह भी अनुभव है कि विशेष तांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा पूज्यभाव से साधक अपने सामने पूर्ण नग्न स्त्री को यदि देख लेता है तो वह सदैव-सदैव के लिए स्त्री और स्त्री के आकर्षण से मुक्त हो जाता है। संसार में तीन सबसे बड़े आकर्षण हैं-- धन का आकर्षण, लोक का आकर्षण और स्त्री का आकर्षण। इन्हें 'वित्तैषणा','लोकैषणा' और 'दारैषणा' भी कहा जाता है। दारैषणा का आकर्षण सबसे बड़ा होता है क्योंकि उसके मूल में कामवासना होती है जिसके संस्कार-बीज जन्म-जन्मान्तर से आत्मा के साथ जुड़े हुए हैं। स्त्री के आकर्षण से मुक्त होने के बाद स्त्री साधक के लिए माँ के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहती। यहाँ यह भी बतला देना आवश्यक है कि इसी तांत्रिक प्रक्रिया द्वारा यदि स्त्री पुरुष को पूर्ण नग्न देख ले तो वह भी सदैव के लिए पुरुष और उसके आकर्षण से मुक्त हो जाती है।( यह कार्य तभी संभव है जब स्त्री-पुरुष एक दूसरे को सम्पूर्ण रूप से नग्न देखते समय एक विशेष तांत्रिक प्रक्रिया से गुजरते हैं, साधारण रूप से नग्न देखते समय नहीं, क्योंकि उस समय तो कामवासना और भी ज्यादा बढ़ जाती है। आज तंत्र-साधना केंद्रों पर यही कुछ हो रहा है। वह अनुकरण परम्परा का तो कर रहे हैं लेकिन वह विशेष तांत्रिक प्रक्रिया को नहीं जानते। फलस्वरूप ये केंद्र ऐय्यासी के अड्डे बन गए हैं।) यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है। जैसे तंत्र-शास्त्र काम-शास्त्र पर आधारित है उसी प्रकार काम-शास्त्र भी मनोविज्ञान पर आश्रित है। Sabhar shiv ram tiwari punrjanm Facebook wall

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बुधवार, 3 अगस्त 2022

तंत्र साधना में मंत्रों का विशेष महत्व

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तंत्र साधना में मंत्रों का विशेष महत्व है। इन मंत्रों में प्रमुख होता है उस मंत्र का बीज अक्षर। जैसे सरस्वती का बीज है ऐम् काली का बीज है कलीम् इसी प्रकार अलग अलग देवी देवताओं के लिए एक विशेष बीज अक्षर होता है जो स्वयं में पूर्ण मंत्र भी होता है। इन अक्षरों से एक विशेष प्रकार की ध्वनि या नाद उत्पन्न किया जाता है जिनकी डिजाइन और शेप भी एक विशेष प्रकार के बनते हैं। ये अक्षर हमारे ऋषि मुनीयों ने एक विशेष प्रकार की शक्ति का आहवाहन करने के उद्देश्य से खोजे। इन बीज अक्षरों का संबंध हमारी रीढ़ की हड्डी से लगी शुष्मना नाड़ी में स्थित अलग अलग चक्रों से है। तो जब साधक पूर्ण शुद्धी के साथ मंत्रों का जप करता है तो एक निश्चित केंद्र पर ऊर्जा का धक्का देता है। जिससे धीरे धीरे उस अमुक चक्र की शुद्धी होती है और उस चक्र से ऊर्जा के विस्फोट शुरू हो जाते हैं। इसी उत्पन्न ऊर्जा को ऋषि मुनियों ने सिद्धी नाम दिया। अर्थात सरस्वती और बगला कंठ को सिद्धी देती हैं। महालक्ष्मी नाभी को सिद्धी देती हैं। शिव हृदय को सिद्धी देते हैं। इन पृयोगों में अलग अलग सिद्धियों के लिए विशेष प्रकार की गंध का भी पृयोग किया जाता है। इसकी वजह थी की जब अमुक सिद्धी उत्पन्न होती हैं। तो एक विशेष प्रकार की गंध उत्पन्न करती हैं। तो पृक्रिया को सहज करने उन विशेष गन्धों को पहले से ही साधना में शामिल कर लिया जाता है। यही वजह रही कि आज भी पूजा पाठ में धूप बत्ती लोहाँग पान इत्यादि शामिल किये जाते हैं। सनातनी पूजा पाठ और तंत्र मंत्र इत्यादि सब वैज्ञानिक युक्तियों से निर्मित किये गए थे। मगर पुराने लोगों ने इन पृक्रियाओं को बाँटना उचित नहीं समझा कि कहीं कोई इन शक्तियों का गलत पृयोग ना करे। समय बीतता गया और ये विध्याएँ लुप्त होती चली गई। सनातनी का यह विज्ञान समाप्त होने लगा और ज्ञान ना होने के कारण लोग इसे अंधविश्वास से अधिक कुछ नहीं समझते। sabhar punarjanm Facebook wall जय श्री गुरु महाराज जी की। 🙏🙏🙏💐💐💐🙏🙏🙏।।।

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सोमवार, 1 अगस्त 2022

अम्ल क्षार और लवण क्या होते हैं

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अम्ल • अम्ल ऐसे यौगिक पदार्थ होते हैं, जिनमें हाइड्रोजन प्रतिस्थाप्य के रूप में रहता है। UTT • विलयन में H (aq) आयन के निर्माण के कारण ही पदार्थ की प्रकृति अम्लीय होती है। • जब कोई अम्ल किसी धातु के साथ अभिक्रिया करता है तब हाइड्रोजन का उत्सर्जन होता है। साथ ही संगत लवण का निर्माण होता है। • जब अम्ल किसी धातु कार्बोनेट या धातु हाइड्रोजन कार्बोनेट से अभिक्रिया करता है तो यह संगत लवण कार्बन डाइऑक्साइड गैस एवं जल उत्पन्न करता है। • अम्ल का जलीय विलयन नीले लिटमस को लाल कर देता है। • अम्ल स्वाद में खट्टे होते हैं। ● खट्टे दूध में लैक्टिक अम्ल पाया जाता है। • सिरके एवं अचार में एसीटिक अम्ल होता है। ● नींबू एवं सन्तरे में साइट्रिक अम्ल होता है। नाइट्रिक अम्ल का प्रयोग सोने एवं चाँदी के शुद्धीकरण में किया जाता है। • कपड़े से जंग के धब्बे हटाने के लिए ऑक्जैलिक अम्ल प्रयोग होता है। • 3:1 के अनुपात में सान्द्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एवं सान्द्र नाइट्रिक अम्ल का ताजा मिश्रण 'अम्लराज' (Aqua regia) कहलाता है। यह सोने एवं प्लेटिनम को गलाने में समर्थ होता है। भस्म • भस्म ऐसा यौगिक होता है जो अम्ल से प्रतिक्रिया कर लवण एवं जल देता है। • जब भस्म किसी धातु से अभिक्रिया करता है तो हाइड्रोजन गैस के उत्सर्जन के साथ एक लवण का निर्माण होता है जिसका ऋण आयन एक धातु एवं ऑक्सीजन के परमाणुओं से संयुक्त रूप से निर्मित होता है। pH स्केल क्या है ? • जल में क्षारकीय विलयन विद्युत का चालन करते हैं, क्योंकि ये हाइड्रॉक्साइड आयन का निर्माण करते हैं। तो अम्लीय होता है न ही क्षारकीय, तब यह बैंगनी रंग का होता है। • भस्म दो प्रकार के होते हैं- जल में विलेय भस्म एवं जल में अविलेय भस्म । अम्ल, भस्म एवं लवण हाइड्रॉक्साइड (KOH), सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NAOH) आदि। • मिल्क ऑफ मैग्नेशिया या मैग्नेशियम हाइड्रॉक्साइड [Mg(OH)2 ] नामक भस्म का उपयोग पेट की अम्लीयता को दूर करने में किया जाता है। • जल में विलेय भस्म को 'क्षार' कहा जाता है। यह लाल लिटमस पत्र को नीला कर देता है तथा स्वाद में कड़वा होता है, जैसे-पोटैशियम • जल में अविलेय भस्म, अम्ल के साथ प्रतिक्रिया कर लवण एवं जल बनाते हैं, किन्तु क्षार के अन्य गुण प्रदर्शित नहीं करते, जैसे- कॉपर हाइड्रॉक्साइड (Cu(OH)2) • कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड [Ca(OH)2] ऐसा भस्म है, जिसका उपयोग घरों में चूना पोतने में, ब्लीचिंग पाउडर बनाने में जल को मृदु बनाने में तथा चमड़े के ऊपर बाल साफ करने में किया जाता है। • कास्टिक सोडा या सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) भी एक भस्म है। इसका उपयोग साबुन बनाने में दवा बनाने में पेट्रोलियम साफ में एवं कपड़ा व कागज बनाने में किया जाता है। क्या होता है लिटमस -पत्र ? लिटमस-पत्र एक प्राकृतिक सूचक होता है, जिसका निर्माण थैलोफाइटा समूह के लिचेन (lichen) नामक पौधे से किया जाता है। लिटमस विलयन जब न • किसी विलयन के pH का मान 7 से जितना कम होगा, उसकी अम्लीयता उतनी ही अधिक होगी तथा किसी विलयन के pH का मान 7 से जितना अधिक होगा उसकी क्षारीयता उतनी ही कम होगी। • एक उदासीन विलयन के pH का मान 7 होता बढ़ती हुई अम्लीय प्रकृति, उदासीन, बढ़ती हुई ● है। क्षारक प्रकृति • H आयन की सान्द्रता में वृद्धि 7 H आयन की सान्द्रता में कमी हमारा शरीर 7.0 से 7.8 pH परास के बीच कार्य करता है। वर्षा के जल का pH मान जब 5.6 से कम जाता है तो वह 'अम्लीय वर्षा' कहलाती है। ● • सभी जीवों में उपापचय की क्रिया pH की एक सीमा में होती है। ● मुँह के pH का मान 5.5 से कम होने पर दाँतों प्रारम्भ हो जाता है। • जीवित प्राणी केवल संकीर्ण pH परास में ही जीवित रह सकते हैं। कुछ सामान्य पदार्थों के pH मान पदार्थ pH मान 8.4 7.4 6.5 6.4 6.0 2.8 24 22 समुद्री जल रक्त लार दूध मूत्र शराब सिरका नींबू • किसी विलयन में उपस्थित हाइड्रोजन आयन की सान्द्रता ज्ञात करने के लिए एक स्केल विकसित किया गया, जिसे 'pH स्केल' कहते हैं। का क्षय लवण • अम्ल एवं भस्म की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप लवण का निर्माण होता है। • इस pH में P अक्षर जर्मन भाषा के शब्द Potz से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है 'शक्ति'। इस pH स्केल से सामान्यतः शून्य से चौदह तक pH को ज्ञात किया जा सकता है। • प्रबल अम्ल एवं प्रबल भस्म से निर्मित लवण का pH मान 7 होता है तथा ये उदासीन होते हैं। • जब प्रबल अम्ल एवं दुर्बल भस्म के लवण के pH का मान 7 से कम होता है तो ये 'अम्लीय' होते हैं। • जब प्रबल भस्म एवं दुर्बल अम्ल के लवण के pH 7 से अधिक होता है तो ये 'क्षारकीय' होते हैं। pH स्केल से सम्बन्धित कुछ तथ्य • pH (0-14) स्केल का उपयोग अम्ल या क्षारक की प्रबलता की जाँच में होता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एवं सोडियम हाइड्रोक्साइड के विलयन की अभिक्रिया से उत्पन्न लवण 'सोडियम क्लोराइड' का प्रयोग हम भोजन में करते हैं। ●समसामयिकी महासागर

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रविवार, 24 जुलाई 2022

समझदार कंप्यूटर

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आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस की रिसर्च में सबसे बड़ी चुनौती है एक समझदार कंप्यूटर बनाना. कुछ लोग आगाह करते हैं कि यह तकनीक हमारे वजूद को खतरे में डाल सकती है. अगर मशीन हमसे भी ज्यादा स्मार्ट बन बैठे, तब क्या होगा? टेक्टोपिया के इस एपिसोड में हम बात करेंगे एआई की दुनिया की और उन सवालों की, जो मानवता के सामने मुंह बाए खड़े हैं. sabhar dw.de

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बुधवार, 20 जुलाई 2022

घर को ठंडा रखेंगे खास तौर से तैयार किए गए शीशे

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एयरकंडीशनर अब बीते दिनों की बात होगी क्योंकि वैज्ञानिकों ने शीशे की ऐसी खिड़कियां तैयार कर ली हैं जो गर्मी में ठंडक और जाड़े में गर्मी का अहसास दिलाएगी। खास रसायन की परत वाले ये शीशे कम आय वाले लोगों के लिए एक अच्छी खबर है। भारत जैसे विकासशील देशों में तो खास किस्म की परत वाले शीशों से बनी खिड़कियां धूम मचा सकती हैं। 'क्वींसलैंड यूनीवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी' के शोधकर्ताओं ने कहा कि बड़ी मात्रा में ग्रीन हाउस गैंसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार एयरकंडीशनर का यह 'इको फ्रेंडली' विकल्प होगा। शोधकर्ताओं के अनुसार विभिन्न प्रकार के चमकदार परत वाले शीशों से घरों में बेतहाशा ऊर्जा की खपत कम कर 45 फीसदी तक बिजली की बचत हो सकेगी। साथ ही कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आयेगी। शोधकर्ता 'डॉ. बेल' के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों के उत्सर्जन में एयरकंडीशनरों का बहुत बड़ा हाथ है। उनके मुताबिक वातानुकूलित घरों और आफिसों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है । बेल ने कहा कि बाजार में उपलब्ध ये शीशे एयरकंडीशनर के मुकाबले तो कूलिंग नहीं करेंगे पर चिलचिलाती गर्मी से राहत दिलाने के लिए ये काफी हैं। ऐसे शीशे वाली खिड़कियों में टिंटेड ग्लास, फिर एयरगैप और उसके बाद खास किस्म की ऊष्मारोधी परत वाले लो-ई ग्लास का इस्तेमाल किया गया है। बेल के अनुसार अच्छी खिड़कियां घरों को ऊष्मारोधी बनाने में मदद करती हैं। इससे जाड़ों में घर गर्म रहता है और गर्मी में ठंडा । शोधकर्ता ने कहा कि शीशे पर रासायनिक परत वाले और खास किस्म की खिड़कियों के ढांचे जल्द ही हर घर की शोभा बढ़ाएंगे। sabhar dipak kohali vigyan pragati

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डायबिटीज से बचाते हैं खट्टे फल

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दीपक कोहली sabhar vigyan pragati कनाडा के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया है कि खट्टे फल वजन बढ़ने, टाइप टू डायबिटीज और हृदय रोग के खतरे को कम करते हैं। 'ओंटेरियो यूनीवर्सिटी' के शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि खट्टे फलों में पाये जाने वाला 'फ्लेवोनॉयड नैरीनजेनिन' तत्व शरीर में अतिरिक्त वसा को नष्ट कर देता है और वजन बढ़ने से भी रोकता है। इसमें इंसुलिन जैसे गुण भी पाये जाते हैं जो डायबिटीज को रोकने में सहायक सिद्ध हुए हैं। फ्लेवोनॉयड तत्व पौधों में पाया जाता है और मनुष्यों में यह एंटीऑक्सीडेंट की सक्रियता बढ़ाने का काम करता है । अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि यह तत्व लीवर में आनुवंशिक ढंग से अतिरिक्त वसा को नष्ट करता है। वैज्ञानिकों ने चूहों पर इसके सफल प्रयोग किये हैं।

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जीन्स में छिपा है दीर्घायु का राज

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। जर्मनी के गुटनबर्ग में 12 जून से 15 जून तक यूरोपियन ह्यूमन जेनेटिक्स कांफ्रेंस 2010 सम्पन्न हुई थी इस कांफ्रेंस में बोस्टन विश्वविद्यालय के प्रो. पाओला सेविस्टियनी द्वारा प्रस्तुत शोध में बताया गया था कि स्वस्थ मनुष्य की जीवन शैली व वातावरण के आधार पर आयु 80 वर्ष होती है। इससे अधिक जीवित रहने का कारण जीन्स में निहित होता है। प्रो. पाओला ने अधिक उम्र वाले लोगों के डीएनए स्कैनिंग टेक्नोलॉजी के जरिये दर्शाया। उन्होंने बताया है कि मानव शरीर में 30 करोड़ (300 मिलियन) जींस में से 150 जींस इससे संबंधित होते हैं, जिनकी पहचान कर ली गई है । 110 साल से अधिक उम्र वाले व्यक्ति एक करोड़ में एक होते हैं। जिनमें से 85 से 90 फीसदी महिलायें होती हैं ।

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कैंसर को खत्म करने वाले टीके का निर्माण

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ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने एक ऐसा टीका बनाने का दावा किया है जो सर्वाधिक घातक किस्म के कैंसरों को भी ठीक कर सकता है । मिडिलसेक्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रे आइल्स के अनुसार स्तन, पेट, अग्न्याशय, सर्विकल और अंडाशय के कैंसर से पीड़ित रोगियों पर परीक्षित इस इंजेक्शन को अगले पांच सालों के दौरान बाजार में उतार दिया जाएगा । अमेरिकी फर्म सेलफेडेक्स थिनेपियूटिक्स के साथ संयुक्त रूप से इस इंजेक्शन को विकसित किया जा रहा है। आईल्स का कहना है कि इस टीके से कैंसर को सिकोड़ा जा सकता है ताकि वह आगे नहीं बढ़े।

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सोमवार, 18 जुलाई 2022

जापान चांद और मंगल पर अपने ट्रेन चलाएगा

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 यह वीडियो अंकित अवस्थी का है उन्होंने समाचार पत्रों का रिसर्च करके बनाया है अंकित अवस्थी जी ने काफी गहराई से इसका अध्ययन किया है इसमें जापान के वैज्ञानिकों ने दावा किया है की सन 2050 के बाद चांद और मंगल के लिए ट्रेन चलाई जाएगी यह मैग्नेट पद्धति के ट्रेन पर आधारित होगी यात्रियों को चांद और मंगल पर जाने की यह सुविधा हो जाएगी


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