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शनिवार, 19 जून 2021

हमारा विज्ञानऔर हमारी धरोहर

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जब हमारे देश में बड़ी बड़ी  राइस मील नहीं थी तो धान को घर पर ही कूटकर भूसे को अलग कर चावल प्राप्त किया जाता था... असलियत में वही चावल था जिसे  whole rise कहते हैं... चावल का प्राकृतिक रंग सुनहरा भूरा ही होता है... सुर्ख लाल काला भी होता है लेकिन इंसानी फितरत है उसे सहज प्राकृतिक  चीजों से नफरत होती है...सफेद चमड़ी रंगत की तरह सफेद वस्तुओं से उसका अलग ही आकर्षण होता है |

इसे समझने के लिए आपको चावल  दाने की संरचना को समझना होगा... चावल  ही क्या प्रत्येक खाद्यान्न ज्वार मक्का बाजरा सभी की सरचना  4 स्तरीय होती है... सबसे बाहरी संरचना  जिसे हस्क बोला जाता है या भूसी कहते हैं वह होती है... दूसरा स्तर ब्रेन का होता है जिसे चोकर भी कह देते हैं... इसमें कैल्शियम मैग्नीशियम सहित जरूरी मिनरल होते हैं.. तीसरा स्तर  ग्रेन का होता है... यह चावल या किसी दाने  भूर्ण होता है इसमें विटामिन प्रोटीन अमीनो एसिड प्रचुर मात्रा में होते हैं..  चावल या किसी दाने की जीवनी शक्ति परमात्मा ने इसी हिस्से में डाल दी है यहीं से किसी वृक्ष , पौधे का अंकुर निकलता है.. मोटे तौर पर चौथा व अंतिम स्तर एंडोस्पर्म होता है इसमें केवल स्टार्ट , कार्बोहाइड्रेट होती है यह पूरी तरह सफेद होता है चाहे गेहूं का हो या चावल का हो... इसे हम कह सकते हैं यह चावल के तीसरे स्तर का भोजन होता है अर्थात ग्रेन का....|

समस्या अब यहां से शुरू होती है मिलों में जब से  इंसान ने विज्ञान तकनीक में महारत हासिल की है... प्रोसेसिंग मशीनों की सहायता से चावल के तीन स्तरों को अलग कर दिया जाता है चौथे मृत अंतिम स्तर  endosperm जिसमें केवल कार्बोहाइड्रेट है जो केवल शरीर में शुगर या मोटापा ही बढ़ाएगा उसको कंपनियां  चावल के दाने के रूप में पैक कर बेच रही है जिसे हम हम खाने में  लगाते हैं... अर्थात सफेद चावल यह वही चौथा अंतिम हिस्सा है जिसकी सार्थकता संपूर्ण चावल के तीन स्तरों के साथ ही होती है बगैर इन तीन स्तरों के यह सफेद चावल कुछ भी नहीं है... इसमें ना प्रोटीन होती है ना फाइबर कैल्शियम व विटामिन इसमें केवल स्टार्च  कार्बोहाइड्रेट ही होती है...|

पहले हमारे पूर्वज जो  घर पर ही या खलियान में हाथ कुटा चावल तैयार करते थे वह संपूर्ण चावल होता था केवल  भूसी को अलग करते थे चारों स्तरों से युक्त सुनहरा चावल जिसे ब्राउन राइस कहते हैं... यह सुनहरा चावल ही चावल है.... सफेद चावल तो सच्चे अच्छे सुनहरे चावल  का मृत अंतिम स्तर है जो सही मायने में चावल के भ्रूण  की ऊर्जा के लिए बनी हुई है... ठीक इसी तरह हम इंसानों को उर्जा से ज्यादा पोषण की जरूरत है पोषण मिलता है विटामिन  मिनरल  प्रोटीन से... अब जिस हिस्से में यह पोषण था वह तो हमने वेस्ट  बायो प्रोडक्ट बनाकर अलग कर दिया... हमारे हिस्से में आई बीमारी....वनवासी  आज भी संपूर्ण चावल या सुनहरा चावल इस्तेमाल में लाया जाता है वह बहुत मजबूत होते हैं... जिम जाने वाले नौजवान भी आजकल सुनहरा चावल ही खाते हैं मोटापे कुपोषण से बचने के लिए.... अब डायटिशियन लोगों को जागरूक कर रहे हैं लेकिन कंपनियां अपने स्वार्थ और लालच के लिए तमाम तरीके के एडवरटाइजिंग सफेद चावल के प्रचार प्रसार को लेकर 
करती है आम व्यक्ति यह सब नहीं जानता था क्योंकि वह अपनी प्राचीन परंपराओं बुजुर्गों की आहार शैली को लेकर एकदम अनभिज्ञ है..|

  समझिए चावल का मतलब सुनहरा चावल संपूर्ण चावल या ब्राउन राइस यह पोस्टिक भी है स्वादिष्ट भी है|
 हमारे   पूर्वज इसी को इस्तेमाल में लाते थे |

लेखक : आर्य सागर खारी

विकल्प 
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धान को छिलका सहित आंशिक रूप से उबालने के बाद उसे सुखाकर जो चावल निकाला जाता है उसे उबला चावल (Parboiled rice) कहते हैं। इसके लिये, धान को पहले पानी में कुछ समय के भिग्कर रखा जाता है, फिर उसे उबाला जाता है और अन्ततः सुखा लिया जाता है। इस प्रक्रिया को अपनाने से ढेंका या हाथ से भी चावल निकालने में आसानी होती है। इसके अलावा इस प्रक्रिया के करने से चावल में चमक आती है तथा उसमें पोषक तत्त्व अधिक रह जाते हैं। विश्व का लगभग ५०% उबला चावल खाया जाता है। भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यान्मार, मलेशिया, नेपाल, श्री लंका, गिनिया, दक्षिण, अफ्रीका, इटली, स्पेन, नाइजेरिया, थाईलैण्ड, स्विट्जरलैण्ड और फ्रांस में उबालकर चावल निकालने की विधि प्रचलित है

लेखक : राजीव कुमार, CA, धुरी, पंजाब

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शुक्रवार, 18 जून 2021

6G सिर्फ मोबाइल फोंस को नहीं बल्कि आम ज़िंदगी को एडवांस और फास्ट बनाएगा

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6जी सिर्फ तेज इंटरनेट ही नहीं बल्कि इससे बहुत ही ज्यादा व्यापक तकनीक लेकर आएगा। 6G सिर्फ मोबाइल फोंस को नहीं बल्कि आम ज़िंदगी को एडवांस और फास्ट बनाएगा। VR और AR नॉमर्ल दिनचर्या को अहम हिस्सा बनकर सामने आएंगे तथा कम्यूनिकेशन के साथ ही इंटेलिजेंस और IOT यानि इंटरनेट ऑफ थिंग्स के क्षेत्र में बड़ी क्रांति होगी। ऐसा भी माना जा सकता है कि 6G आने के बाद रोबोट्स का चलन भी सार्वजनिक किया जा सकता है। जिस तरीके से आज स्मार्टफोन और स्मार्ट टीवी के अलावा स्मार्ट होम अप्लायंस जैसे फ्रिज, लाईट, फैन्स, सीसीटीवी, स्पीकर इत्यादि घर का हिस्सा बनते जा रहे हैं, इसी तरह 6G तकनीक रोबोट्स को भी नॉमर्ल लाइफ का हिस्सा बना सकती है।

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बुधवार, 16 जून 2021

वासना क्या है और प्रार्थना क्या है?

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मेरे देखे, एक ही सीढ़ी के दो छोर: जैसे बीज और वृक्ष; जैसे अंडा और मुर्गी। वासना ही एक दिन पंख पा लेती है इसलिए मेरे मन में वासना की कोई निंदा नहीं है।
मेरे मन में निंदा है ही नहीं; किसी भी बात की निंदा नहीं है। मेरे मन में सर्व स्वीकार है क्योंकि मैं देखता हूं, जब सब परमात्मा को स्वीकार है तो उसमें से कुछ भी अस्वीकार करना परमात्मा को अस्वीकार करना है।

मैंने सुना है, सूफी फकीर बायजीद एक पड़ोसी से बहुत परेशान था। सालभर से उसके पड़ोस में था। वह बड़ा उपद्रवी था पड़ोसी। जब बायजीद ध्यान करने बैठता तब वह ढोल बजाने लगता; या बायजीद नमाज पढ़ता तो वह गालियां बकने लगता। बायजीद शिष्यों को समझाता तो वह कुछ उपद्रव मचा देता। कूड़ा—करकट इकट्ठा करके बायजीद के झोंपड़े में फेंक देता।

एक रात बायजीद प्रार्थना करा, प्रार्थना करके उठ रहा था, परमात्मा की झलक से भरा था। झलक इतनी स्पष्ट थी कि उसने कहा, हे प्रभु! इतनी कृपा की है कि मुझे आज झलक दी है, इतना और कर दो कि इस पड़ोसी से छुटकारा करो। और पता है परमात्मा की क्या आवाज बायजीद को सुनाई पड़ी? उसने कहा, बायजीद, इस आदमी को मैं पचास साल से बर्दाश्त कर रहा हूं और तू तो अभी साल ही भर हुआ…..! और पचास साल तो इस जिंदगी के! पिछली जिंदगियों का तो हिसाब ही मत रख। अगर मैं इसे बर्दाश्त कर रहा हूं और मैंने आशा नहीं छोड़ी और मैं आशा बांधे हूं कि यह भी बदलेगा। तू भी आशा न छोड़।

परमात्मा अगर वासना के विपरीत होता तो वासना होती ही नहीं। महात्मा विपरीत है इसलिए मैं कहता हूं, महात्मा गलत है। परमात्मा विपरीत नहीं है वासना के। हर बच्चे को वासना से सजाकर भेजता है, वासना भरकर भेजता है।

वासना ऊर्जा है, शुद्ध ऊर्जा है, संपदा है। कहां लगाओगे इस पर सब कुछ निर्भर करेगा। यही वासना धन में लग जाएगी तो धन—कुबेर हो जाओगे। यही वासना पद के पीछे पड़ जाएगी तो किसी देश के राष्ट्रपति हो जाओगे। यही वासना परमात्मा की दिशा में लग जाएगी तो प्रार्थना हो जाएगी।

वासना शुद्ध ऊर्जा है। वासना तटस्थ है। वासना अपने आप में कोई लक्ष्य लेकर नहीं आयी है, लक्ष्य तुम्हें तय करना है। फिर तुम्हारी ऊर्जा उसी दिशा में बहनी शुरू हो जाती है। स्त्री को प्रेम करोगे तो वासना घर बसाएगी। परमात्मा को प्रेम करोगे, मंदिर बनेगा। परिवार को प्रेम करोगे तो छोटा—सा परिवार होगा सारे संसार के विरोध में। सारे संसार को प्रेम करोगे तो कोई विरोध में न होगा। सारा संसार तुम्हारा घर होगा। तुम पर निर्भर है।

वासना प्रार्थना का बीज है। और जब तक वासना प्रार्थना नहीं बन जाती है तब तक तुम्हें संसार में लौट—लौटकर आना पड़ेगा क्योंकि तुमने पाठ सीखा नहीं। फिर भेज दिए जाओगे कि और जाओ, फिर उसी कक्षा में भर्ती हो जाओ। जब तक तुम उत्तीर्ण न हो जाओ…..। और उत्तीर्ण होने की कसौटी क्या है? जिस दिन तुम्हारी सारी वासना रूपांतरित हो जाए प्रार्थना में, जिस दिन परमात्मा के अतिरिक्त तुम्हें कुछ और दिखाई न पड़े। तुम चाहो तो परमात्मा को। फिर चाहे तुम किसी से भी संबंध जोड़ो, किसी को भी चाहो लेकिन हर चाहत में परमात्मा की ही चाहत हो। तुम्हारी पत्नी में परमात्मा दिखाई पड़े, तुम्हारे बेटे में परमात्मा दिखाई पड़े, तुम्हारे मित्र में परमात्मा दिखाई पड़े, तुम्हारे शत्रु में परमात्मा दिखाई पड़े।

इसलिए जीसस ने कहा है, शत्रु को भी प्रेम करना अपने जैसा। यह मत भूल जाना कि उसमें भी परमात्मा छिपा है। एक क्षण को भी यह बात विस्मरण मत करना, नहीं तो उतनी प्रार्थना चूक जाएगी; उतने तुम प्रार्थना से नीचे गिर जाओगे।

मिट्टी में वासना के कारण ही प्राण पड़ गए हैं, रेगिस्तान में मरुद्यान उगा है। इस जीवन में तुम्हें जितनी हरियाली दिखाई पड़ती है, सब वासना की है। पक्षी गीत गाते हैं, वे वासना के गीत हैं। कोयल अपने प्रेमी को पुकार रही है। मोर अपने प्रेमी के लिए नाच रहा है। वे जो उसने सुंदर पंख फैलाए हैं वे वासना के पंख हैं। वह मोर—पंखों का जो सौंदर्य है वह वासना का ही सौंदर्य है। फूल खिले हैं, पूछो वैज्ञानिक से; वे सब वासना के ही फूल हैं। उन फूलों में वृक्षों के रजकण हैं, वीर्यकण हैं। तितलियां अपने पैरों में लगाकर उन्हें पहुंचा देगी उनकी मंजिल तक।

अगर तुम गौर से देखोगे तो तुम चकित हो जाओगे। तुम जब गुलाब के फूल तोड़कर परमात्मा के चरणों पर चढ़ाते हो तो तुमने गुलाब की वासना परमात्मा के पैरों पर चढ़ायी चढ़ानी थी अपनी वासना।

_नाम सुमिर मन बाँवरे_

*ओशो*

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शनिवार, 5 जून 2021

केंचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट

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Kuch Facts 

केंचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost) पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है।
इसको  बनाने मे कम  से कम  40-45 दिन का समय लगता हैं 
नही से ये कच्चा गोबर ही रेहता हैं 

वर्मी कम्पोस्ट में बदबू नहीं होती है और मक्खी एवं मच्छर नहीं बढ़ते जिससे वातावरण स्वस्थ रहता है। इससे सूक्ष्म पोषित तत्वों के साथ-साथ नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश मिलता है।

आप के यंहा अलग अलग तरह के packets available होंगे कुछ सस्ते तो कुछ म्हेंगे..

दोनो मे फर्क समझे 
सस्ता या महेंगे से फर्क  नही पड़ता सिर्फ आप quality को समझे ..

pure Vermicompost - 
कभी भी हाथों मे  नही  चिपकेगा 
उसका रंग  Dark Brown होगा 
उसमे से बदबू नही आयेगी - इसका मतलब पानी में घोल कर भी नही 
इसमे earthworm नही होना चाहिये अगर है  तो वो सिर्फ  दिखाने के लिए हैं क्यो  की हर एक earthworm किसान  के लिए important हैं.. उसमे earthworm eggs ज़रूर आ सकते हैं क्योकी छलनी का size इतना होता हैं ..
अगर आप धूप मे  देखो तो उसमे शिशे  जैसी झलक नही होनी  चाहिये 
उसको आप हथेली  पर  मसल कर  देखे तब भी वो मिट्टी की तरह  चिपकना  नही चाहिये 

ये कुछ तरिके हैं आप पता लगा सकते हैं की Vermicompost pure हैं य नही ..

इसमे Naalo Ka wasteg (kichad )
मिट्टी 
कच्चा गोबर  ( 40 दिन से कम )
city Compost 
ये सब मिलावट  की जाती हैं 

एक फोटो साझा की हैं.. sabhar shusil hindu Facebook wall

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गुरुवार, 3 जून 2021

काशी एक यंत्र है एक असाधारण यंत्र!!

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क्यूं कहते हैं कि "काशी जमीन पर नहीं है, वह शिव के त्रिशूल के ऊपर है!"
Jai ho....
           Jai Mhakal....
क्योंकि #काशी #एक_यंत्र है एक असाधारण यंत्र!!

मानव शरीर में जैसे नाभी का स्थान है, वैसे ही पृथ्वी पर वाराणसी का स्थान है.. शिव ने साक्षात धारण कर रखा है इसे!

शरीर के प्रत्येक अंग का संबंध नाभी से जुड़ा है और पृथ्वी के समस्त स्थान का संबंध भी वाराणसी से जुड़ा है।
धरती पर यह एकमात्र ऐसा यंत्र है!!

काशी की रचना सौरमंडल की तरह की गई है,
इस यंत्र का निर्माण एक ऐसे विशाल और भव्य मानव शरीर को बनाने के लिए किया गया, 
जिसमें भौतिकता को अपने साथ लेकर चलने की मजबूरी न हो, और जो सारी आध्यात्मिक प्रक्रिया को अपने आप में समा ले।

आपके अपने भीतर ११४ चक्रों में से ११२ आपके भौतिक शरीर में हैं, लेकिन जब कुछ करने की बात आती है, तो केवल १०८ चक्रों का ही इस्तेमाल आप कर सकते हैं।

इसमें एक खास तरीके से मंथन हो रहा है। यह घड़ा यानी मानव शरीर इसी मंथन से निकल कर आया है, इसलिए मानव शरीर सौरमंडल से जुड़ा हुआ है और ऐसा ही मंथन इस मानव शरीर में भी चल रहा है। 

सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास से 108 गुनी है। आपके अपने भीतर 114 चक्रों में से 112 आपके भौतिक शरीर में हैं, लेकिन जब कुछ करने की बात आती है, तो केवल 108 चक्रों का ही इस्तेमाल आप कर सकते हैं। 
अगर आप इन 108 चक्रों को विकसित कर लेंगे, तो बाकी के चार चक्र अपने आप ही विकसित हो जाएंगे। हम उन चक्रों पर काम नहीं करते। 
शरीर के 108 चक्रों को सक्रिय बनाने के लिए 108 तरह की योग प्रणालियां हैं।

पूरे काशी यानी बनारस शहर की रचना इसी तरह की गई थी। यह पांच तत्वों से बना है, और आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि शिव के योगी और भूतेश्वर होने से, उनका विशेष अंक पांच है।

इसलिए इस स्थान की परिधि पांच कोश है। इसी तरह से उन्होंने सकेंद्रित कई सतहें बनाईं। 
यह आपको काशी की मूलभूत ज्यामिति बनावट दिखाता है। गंगा के किनारे यह शुरू होता है, और ये सकेंद्रित वृत परिक्रमा की व्याख्या दिखा रहे हैं। सबसे बाहरी परिक्रमा की माप 168 मील है।

यह शहर इसी तरह बना है और विश्वनाथ मंदिर इसी का एक छोटा सा रूप है। 

असली मंदिर की बनावट ऐसी ही है। यह बेहद जटिल है। इसका मूल रूप तो अब रहा ही नहीं।
वाराणसी को मानव शरीर की तरह बनाया गया था। यहां 72 हजार शक्ति स्थलों यानी मंदिरों का निर्माण किया गया। 

एक इंसान के शरीर में नाड़िय़ों की संख्या भी इतनी ही होती है। इसलिए उन लोगों ने मंदिर बनाये, और आस-पास काफी सारे कोने बनाये - जिससे कि वे सब जुड़कर 72,000 हो जाएं।

यहां 468 मंदिर बने, क्योंकि चंद्र कैलेंडर के अनुसार साल में 13 महीने होते हैं, 

13 महीने और 9 ग्रह, 4 दिशाएं - इस तरह से तेरह, नौ और चार के गुणनफल के बराबर 468 मंदिर बनाए गए। तो यह नाडिय़ों की संख्या के बराबर है। 

यह पूरी प्रक्रिया एक विशाल मानव शरीर के निर्माण की तरह थी। इस विशाल मानव शरीर का निर्माण ब्रह्मांड से संपर्क करने के लिए किया गया था। 

इस शहर के निर्माण की पूरी प्रक्रिया ऐसी है, मानो एक विशाल इंसानी शरीर एक वृहत ब्रह्मांडीय शरीर के संपर्क में आ रहा हो। 
काशी बनावट की दृष्टि से सूक्ष्म और व्यापक जगत के मिलन का एक शानदार प्रदर्शन है। 

कुल मिलाकर, एक शहर के रूप में एक यंत्र की रचना की गई है।

रोशनी का एक दुर्ग बनाने के लिए, और ब्रह्मांड की संरचना से संपर्क के लिए, यहां एक सूक्ष्म ब्रह्मांड की रचना की गई। 

ब्रह्मांड और इस काशी रूपी सूक्ष्म ब्रह्मांड इन दोनों चीजों को आपस में जोड़ने के लिए 468 मंदिरों की स्थापना की गई। 

मूल मंदिरों में 54 शिव के हैं, और 54 शक्ति या देवी के हैं। अगर मानव शरीर को भी हम देंखें, तो उसमें आधा हिस्सा पिंगला है और आधा हिस्सा इड़ा। दायां भाग पुरुष का है और बायां भाग नारी का। 

यही वजह है कि शिव को अर्धनारीश्वर के रूप में भी दर्शाया जाता है - आधा हिस्सा नारी का और आधा पुरुष का।

आपके स्थूल शरीर का 72% हिस्सा पानी है, 12% पृथ्वी है, 6%वायु है और 4%अग्नि। बाकी का 6% आकाश है। सभी योगिक प्रक्रियाओं का जन्म एक खास विज्ञान से हुआ है, जिसे भूत शुद्धि कहते हैं। इसका अर्थ है अपने भीतर मौजूद तत्वों को शुद्ध करना। 
अगर आप अपने मूल तत्वों पर कुछ अधिकार हासिल कर लें, तो अचानक से आपके साथ अद्भुत चीजें घटित होने लगेंगी।

यहां एक के बाद एक 468 मंदिरों में सप्तऋषि पूजा हुआ करती थी और इससे इतनी जबर्दस्त ऊर्जा पैदा होती थी कि हर कोई इस जगह आने की इच्छा रखता था। यह जगह सिर्फ आध्यात्मिकता का ही नहीं, बल्कि संगीत, कला और शिल्प के अलावा व्यापार और शिक्षा का केंद्र भी बना। 

इस देश के महानतम ज्ञानी काशी के हैं। 
शहर ने देश को कई प्रखर बुद्धि और ज्ञान के धनी लोग दिए हैं।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, 'पश्चिमी और आधुनिक विज्ञान भारतीय गणित के आधार के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता था।’ 

यह गणित बनारस से ही आया। इस गणित का आधार यहां है। 

जिस तरीके से इस शहर रूपी यंत्र का निर्माण किया गया, वह बहुत सटीक था। 

ज्यामितीय बनावट और गणित की दृष्टि से यह अपने आप में इतना संपूर्ण है, कि हर व्यक्ति इस शहर में आना चाहता था। क्योंकि यह शहर अपने अन्दर अद्भुत ऊर्जा पैदा करता था।

इसीलिए, आज भी यह कहा जाता है कि "काशी जमीन पर नहीं है। वह शिव के त्रिशूल के ऊपर है....radhe radhe.. oli amit on Facebook..

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बुधवार, 2 जून 2021

काम और ध्यान

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जब दो प्रेमी काम से निकट आते हैं, जब वे संभोग से गुजरते हैं, तब सच में ही वे परमात्मा के मंदिर के निकट से गुजर रहे हैं। वहीं परमात्मा काम कर रहा है, उनकी उस निकटता में। वहीं परमात्मा की सृजन शक्ति काम कर रही है।

और मेरी अपनी दृष्टि यह है कि मनुष्य को समाधि का, ध्यान का जो पहला अनुभव मिला हो कभी भी मनुष्य के इतिहास में, तो वह संभोग के क्षण में मिला है और कभी नहीं। संभोग के क्षण में ही पहली बार यह स्मरण आया है आदमी को कि इतने आनंद की वर्षा हो सकती है। और जिन्होंने सोचा, जिन्होंने मेडिटेट किया, जिन लोगों ने काम के संबंध पर और मैथुन पर चिंतन किया और ध्यान किया, उन्हें यह दिखाई पड़ा कि काम के क्षण में, मैथुन के क्षण में, संभोग के क्षण में मन विचारों से शून्य हो जाता है। एक क्षण को मन के सारे विचार रुक जाते हैं। और वह विचारों का रुक जाना और वह मन का ठहर जाना ही आनंद की वर्षा का कारण होता है।

तब उन्हें सीक्रेट मिल गया, राज मिल गया कि अगर मन को विचारों से मुक्त किया जा सके किसी और विधि से भी, तो भी इतना ही आनंद मिल सकता है। और तब समाधि और योग की सारी व्यवस्थाएं विकसित हुईं, जिनमें ध्यान और सामायिक और मेडिटेशन और प्रेयर, इनकी सारी व्यवस्थाएं विकसित हुईं। इन सबके मूल में संभोग का अनुभव है। और फिर मनुष्य को अनुभव हुआ कि बिना संभोग में जाए भी चित्त शून्य हो सकता है। और जो रस की अनुभूति संभोग में हुई थी, वह बिना संभोग के भी बरस सकती है। फिर संभोग क्षणिक हो सकता है, क्योंकि शक्ति और ऊर्जा का वह निकास और बहाव है। लेकिन ध्यान सतत हो सकता है। तो मैं आपसे कहना चाहता हूं कि एक युगल संभोग के क्षण में जिस आनंद को अनुभव करता है, एक योगी चैबीस घंटे उस आनंद को अनुभव करने लगता है।
ओशो👼

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