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जुलाई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मनोमय कोष की साधना

{{{ॐ}}}                                                 #  मन मे एक गुप्त शक्ति छिपी होती है यदि वह शक्ति मनोविकार,छल,छिद्र, लोभ, मोह, वश अनैतिक कार्य पाप कर्म की ओर प्रवृत्ति होती है तोअधोगति कारक है अत: उसे आध्यात्म की ओर मोडने से ही परमात्मा सी प्राप्ति होती है । गीता मे कहा गया है कि मन ही बंधन व मोक्ष का कारक है पतञ्जलि ऋषि ने कहा कि चित्त की वृत्तियों का निरोध  करना एकाग्र करना ही योग है । भगवान कृष्ण ने अर्जुन को मन वश मे करने के लिए दो उपाय बताये है:- १:- अभ्यास २:- वैराग्य । इनके द्वारा ऐषणा प्रकृति को रोककर ऋतम्भरा बुद्धि को अन्तरात्मा के आधीन किया जा सकता है। जिसे मनोयोग कहते है इसके अनन्तर:-- १, ध्यानयोग २, त्राटक ३, जप ४, तन्मात्रा साधन                                                               #ध्यानयोग ध्यान चुम्बक की तरह मन खीचकर एकाग्र करता है ध्यान के लिए आदर्शों को दिव्यरूप धारी देवताओं के रूप मानकर उनमे तन्मयता स्थापित करने का यौगिक विधान है । ऐसा भी हो सकता है। कि एक ही ईष्ट देव को आवश्यकतानुसार विभिन्न गुणो वाला मान लिया जाये। ईष्टदेव का मन क्षेत्र मे ध्यान करे

maha avatar baba ji sangrila ghati in himalaya

“Babaji was living in a little home in Banaras, when Shankaracharaya visited that city. Shankara at that time was a famous astrologer. Babaji’s manservant went therefore to see him. He received from Shankara the shocking news that, that very night, it was his destiny to die! In fear and trembling, on his return, he approached Babaji with the news.” “Go back,” said Babaji, ‘and say to him that you will not die tonight.’ “The servant carried this reply back to Swami Shankara, who affirmed. ‘This karma is so fixed that, should you survive it, I shall go to your master and ask him to accept me as his disciple.’ “That night, a terrible thunderstorm lashed the city. Lightening struck everywhere. It felled trees all around the house where Babaji lived. The great master stretched himself out over the servant’s body, to protect him. When morning came, the servant was still alive. He then went and presented himself to Shankara. The Swami was amazed. Realizing that he had encountered a power much

गूगल एक परिचय

यह कम्पनी स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से पी॰एच॰डी॰ के दो छात्र लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन द्वारा स्थापित की गयी थी। इन्हें प्रायः "गूगल गाइस"[7][8][9] के नाम से सम्बोधित किया जाता है। सितम्बर 4, 1998 को इसे एक निजि-आयोजित कम्पनी में निगमित किया गया। इसका पहला सार्वजनिक कार्य/सेवा 19 अगस्त 2004 को प्रारम्भ हुआ। इसी दिन लैरी पेज, सर्गेई ब्रिन और एरिक स्ख्मिड्ट ने गूगल में अगले बीस वर्षों (2024) तक एक साथ कार्य करने की रजामंदी की। कम्पनी का शुरूआत से ही "विश्व में ज्ञान को व्यवस्थित तथा सर्वत्र उपलब्ध और लाभप्रद करना" कथित मिशन रहा है। कम्पनी का गैर-कार्यालयीन नारा, जोकि गूगल इन्जीनियर पौल बुखीट ने निकाला था— "डोन्ट बी इवल (बुरा न बनें)"। सन् 2006 से कम्पनी का मुख्यालय माउंटेन व्यू, कैलिफोर्निया में है। गूगल विश्वभर में फैले अपने डाटा-केन्द्रों से दस लाख से ज़्यादा सर्वर चलाता है और दस अरब से ज़्यादा खोज-अनुरोध तथा चौबीस पेटाबाईट उपभोक्ता-सम्बन्धी जानकारी (डाटा) संसाधित करता है। गूगल की सन्युक्ति के पश्चात् इसका विकास काफ़ी तेज़ी से हुआ है, जिसके कारण कम्पनी की मू

अनाज से बनाया जाएगा एथेनाल

  गोरखपुर, उमेश पाठक। गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) में 100 करोड़ रुपये के निवेश से  एथेनाल बनाया जाएगा। इंडिया ग्लाइकाल्स लिमिटेड (आइजीएल) इसके लिए प्लांट स्थापित कर रहा है और अगले कुछ महीनों में उत्पादन शुरू हो जाने की उम्मीद है। इस प्लांट में गेहूं, चावल के साथ स्टार्च वाले अन्य अनाजों से एथेनाल तैयार किया जाएगा, जिससे किसानों को सीधा फायदा होगा। आइजीएल के इस प्लांट में हर वर्ष तीन करोड़ लीटर एथेनाल तैयार होगा। इतना एथेनाल बनाने में हर वर्ष करीब 90 हजार टन अनाज की जरूरत होगी। आइजीएल पूर्वांचल के किसानों से सीधे भी अनाज का क्रय कर सकता है। इस प्रक्रिया में खराब अनाज, चावल के टूटन का भी उपयोग किया जा सकता है। प्लांट में अनाज को पीसकर पानी मिलाया जाएगा। उसके बाद फर्मंटेंशन के जरिए एल्कोहल अलग किया जाएगा। किसानों से गेहूं खरीद के बाद गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं होती। भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में गोरखपुर मंडल में करीब 2.75 लाख टन अनाज रखने की जगह है। मंडल में औसतन तीन लाख टन गेहूं जबकि 5.50 लाख टन धान की खरीद की जाती है। हर बार अनाज के भंडारण की समस्या होती है। उद्यमि

क्या महत्व है मृत संजीवनी मंत्र का

मृत संजीवनी मंत्र का महत्व ;- 06 FACTS;- 1-हमारे शास्त्रों और पुराणों में गायत्री मंत्र और महा मृत्युंजय मंत्र का सबसे अधिक महत्व है, इन दोनों मंत्र को बहुत बड़े मंत्रो में से एक माना जाता है क्यूंकि यह दोनों मंत्र से आपको सभी तरह के संकटों से मुक्ति मिल जाती है।हमारे शास्त्रों में ऐसे कई सारे उल्लेख मिलते है जिनमे यही दो मंत्र सबसे प्रमुख स्थान में आते है क्यूंकि इनसे अधिक शक्तिशाली और कोई मंत्र नहीं है।माना जाता है की कोई सच्चे दिल से निरंतर इस मंत्र का जाप करता है तो कई सारे बड़े-बड़े संकटों से आसानी से मुक्ति पायी जा सकती है।वैसे तो भगवान शिव के कई सारे मंत्र है पर अपनी सभी तरह की इच्छाओं को पूरी करने के लिए सबसे शक्तिशाली मंत्र है "महामृत्युंजय मंत्र"।शिवजी के मृत संजीवनी मंत्र में काल को भी रोकने की शक्ति है;जिसका जाप रावण करता था।मृत्युंजय मंत्र  पांच प्रकार के हैं- जो उपरोक्त चित्र में दिए है।पांचवा  संजीवनी मंत्र  का निम्न  महत्व है।  2-पांचवा  संजीवनी मंत्र (महामृत्युंजय गायत्री ) का महत्व...  महा मृत्युंजय मंत्र ... गायत्री मंत्र और महा मृत्युंजय मंत्र दोनों से मिल

विद्युत Electricity

विद्युत आवेशों के मौजूदगी और बहाव से जुड़े भौतिक परिघटनाओं के समुच्चय को विद्युत (Electricity) कहा जाता है।अर्थात् इसे न तो देखा जा सकता है व न ही छुआ जा सकता है केवल इसके प्रभाव के माध्यम से महसुस किया जा सकता है| विद्युत से जानी-मानी घटनाएं जुड़ी है जैसे कि तडित, स्थैतिक विद्युत, विद्युतचुम्बकीय प्रेरण, तथा विद्युत धारा। इसके अतिरिक्त, विद्युत के द्वारा ही वैद्युतचुम्बकीय तरंगो (जैसे रेडियो तरंग) का सृजन एवं प्राप्ति सम्भव होता है? वायुमण्डलीय विद्युत विद्युत के साथ चुम्बकत्व जुड़ी हुई घटना है।[1] विद्युत आवेश वैद्युतचुम्बकीय क्षेत्र पैदा करते हैं। विद्युत क्षेत्र में रखे विद्युत आवेशों पर बल लगता है। समस्त विद्युत का आधार इलेक्ट्रॉन हैं। क्योंकि इलेक्ट्रॉन हल्के होने के कारण ही आसानी से स्थानांतरित हो पाते हैं। इलेक्ट्रानों के हस्तानान्तरण के कारण ही कोई वस्तु आवेशित होती है। आवेश की गति की दर विद्युत धारा है। विद्युत के अनेक प्रभाव हैं जैसे चुम्बकीय क्षेत्र, ऊष्मा, रासायनिक प्रभाव आदि। जब विद्युत और चुम्बकत्व का एक साथ अध्ययन किया जाता ह

-व्यक्त और अव्यक्त चेतना क्या है

****************************** परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन  -------: मनुष्य को व्यक्ति की संज्ञा क्यों दी गयी है ?:-------- ******************************       व्यक्त चेतना वह चेतना है जो किसी वस्तु, किसी पदार्थ या किसी अन्य साधन द्वारा व्यक्त (प्रकट) हो गयी हो। हमें मालूम होना चाहिए कि मानव पिण्ड में चेतना की सबसे अधिक अभिव्यक्ति (प्रकटीकरण)  होने के कारण ही मनुष्य को 'व्यक्ति' कहते हैं। तात्पर्य यह है कि जिसमें चेतना की अभिव्यक्ति सर्वाधिक है, वह मनुष्य ही 'व्यक्ति' कहलाता है।        अव्यक्त चेतना उसे कहते हैं, जो निराकार है, जो अनुभव के परे है और जो किसी वस्तु, पदार्थ या किसी अन्य साधन के द्वारा व्यक्त नहीं हुई हो।         वैज्ञानिक 'चेतना' के प्रश्न पर काफी लम्बे समय से अनुसन्धान करते आ रहे हैं और वे इस निष्कर्ष पर आ पहुंचे हैं कि हजारों साल पूर्व हमारे ऋषियों और मुनियों की तपस्या के परिणामस्वरूप जो निष्कर्ष सामने आये, वे असत्य नहीं हैं। वही धर्म की श्रेणी में रखे गए हैं। धर्म

क्या हैं शिव और शक्ति के अर्धनारीश्वर स्वरूप की महिमा

क्या हैं शिव और शक्ति के अर्धनारीश्वर स्वरूप की महिमा और क्या महत्व है -'' प्रार्थना और प्रतीक्षा'' का?PART-01  कौन है परब्रह्म ? 05 FACTS;- 1-हिन्दू शास्त्रों  के अनुसार ईश्वर एक है...उस परमतत्व को हम ब्रह्म, परात्पर शिव या परब्रह्म कहते है।इस सृष्टि को चलाने के के लिए दो वस्तुएँ जरूरी है,एक आधार और दूसरी शक्ति या प्रकृति, शिव आधार है और शक्ति वो ऊर्जा है जो इस  संसार को चलाती है... अलग अलग प्रकृति के स्वरूप से । 2-शिव-शक्ति का संयोग ही परमात्मा (परब्रह्म) है।जब मनुष्य ईश्वर की और मुड़ता है और अपनी चेतना का स्तर ऊपर उठाता जाता है तब वो बाहर की दुनिया की सारी विविधता को अपने अंदर समाता जाता है, और वो एकत्व या अद्वैत की और बढ़ता जाता है।  3-सत्-चित् और आनन्द–ईश्वर के तीन रूप हैं। इनमें सत्स्वरूप उनका मातृस्वरूप है, चित्स्वरूप उनका पितृस्वरूप है और उनके आनन्दस्वरूप के दर्शन अर्धनारीश्वररूप में ही होते हैं, जब शिव और शक्ति दोनों मिलकर पूर्णतया एक हो जाते हैं। सृष्टि के समय परम पुरुष अपने ही वामांग से प्रकृति को निकालकर उसमें समस्त सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं। शिव गृहस्थों के

हमारा शरीर ब्रह्मांड की एक ईकाई है

शरीर के भीतर के 28 प्राणों को जानकर रह जाएंगे हैरान         हमारा शरीर ब्रह्मांड की एक ईकाई है। जैसा ऊपर, वैसा नीचे। जैसा बाहर, वैसा भीतर। संपूर्ण ब्रह्मांड को समझने के बजाय यदि आप खुद के शरीर की संवरचना को समझ लेंगे तो ब्राह्मांड और उसके संचालित होने की प्रक्रिया को भी समझ जाएंगे। यहां प्रस्तुत है शरीर में स्थित प्राण की स्थिति के बारे में। प्राण के निकल जाने से व्यक्ति को मृत घोषित किया जाता है। यदि प्राणायाम द्वारा प्राण को शुद्ध और दीर्घ किया जा सके तो व्यक्ति की आयु भी दीर्घ हो जाती है। प्राण के विज्ञान को जरूर समझें। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता है तो पूर्णत: श्वास छोड़ देता है। प्राण जिस आयाम से आते हैं उसी आयाम में चले जाते हैं। हाथी, व्हेल और कछुए की आयु इसलिए अधिक है क्योंकि उनके श्वास प्रश्वास की गति धीमी और दीर्घ है। वैदिक विज्ञान के अनुसार : जिस तरह हमारे शरीर के बाहर कई तरह की वायु विचरण कर रही है उसी तरह हमारे शरीर में भी कई तरह की वायु विचरण कर रही है। वायु है तो ही प्राण है। अत: वायु को प्राण भी कहा जाता है। वैदिक ऋषि विज्ञान के अनुसार कुल 2

जीव शरीर में कहां रहता है

जीव शरीर में कहां रहता है ?   कहाँ उत्पन्न होता है ?  मृत्यु के अनन्तर कहाँ रहता है ?  जाकर कहाँ ठहरता है ? "शिव-गीता"  में श्रीराम जी के इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए भगवान् शंकर कहते हैं ------ "राम !  मैं सत्य-ज्ञानस्वरूप ,  अनन्त-परमानन्दस्वरूप हूँ । व्यक्त - अव्यक्त का कारण ,  नित्य - विशुद्ध - सर्वात्मा - निर्लेप - सर्वधर्म रहित -  मन से अग्राह्य हूँ ,  किन्तु ऐसा होने पर भी अविद्या अथवा अन्तःकरण से मिलकर शरीर में रहता हूँ । ५ कर्मेन्द्रियां ,  ५ ज्ञानेन्द्रियां  तथा अन्तःकरण चतुष्टय से मिलकर मैं जीव-भाव को प्राप्त हुआ हूँ  । मैं अत्यन्त निर्मल होने पर भी मलिन रूप से प्रतीत होता हूं ,  जिस प्रकार दर्पण मलिन होने पर मुख भी मलिन दिखता है ,  उसी प्रकार अन्तःकरण रूपी दर्पण में मलिनता के कारण आत्मा मलिन प्रतीत होता है । वह शरीर में कहां रहती है ?  इसको कहता हूं --- सुनो !  हृदयरूपी कमल में एक अधोमुखी सूक्ष्म छिद्र है , उसके दहराकाश में ,  यानी ह्रदय में स्थित आकाश में । अब सगुण - ब्रह्म  के उपासकों के क्रममुक्ति तथा नाड़ियों के विस्तार को बताते हुए शंकर जी कहते हैं ----

शिवलिंग के वैज्ञानिक तथ्य

अगर आप गौर से #भाभा_एटॉमिक_रिसर्च_सेंटर (मुंबई) के #न्यूक्लियर_रिएक्टर की संरचना को देखें तो आप पाएंगे की #शिवलिंग_और_न्यूक्लियर_रिएक्टर में काफी समानताएं हैं। दोनों की संरचनाएं भी एक सी हैं दोनों ही कहीं न कहीं उर्जा से संबंधित हैं। शिवलिंग पर लगातार जल प्रवाहित करने का नियम है।  देश में, ज्यादातर शिवलिंग वहीं पाए जाते हैं जहां जल का भंडार हो, जैसे नदी, तालाब, झील इत्यादि। विश्व के सारे न्यूक्लियर प्लांट भी पानी (समुद्र) के पास ही हैं। शिवलिंग की संरचना बेलनाकार होती है और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (मुंबई) की रिएक्टर की संरचना भी बेलनाकार ही है। न्यूक्लियर रिएक्टर को ठंडा रखने के लिये जो जल का इस्तेमाल किया जाता है उस जल को किसी और प्रयोग में नहीं लाया जाता। उसी तरह शिवलिंग पर जो जल चढ़ाया जाता है उसको भी प्रसाद के रूप में ग्रहण नहीं किया जाता है। शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती है। जहां से जल निष्कासित हो रहा है, उसको लांघा भी नहीं जाता है।  ऐसी मान्यता है की वह जल आवेशित (चार्ज) होता है। उसी तरह से जिस तरह से न्यूक्लियर रिएक्टर से निकले हुए जल को भी दूर

प्राणशक्ति क्या है

****************************** परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरूण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन        (आजकल सोशल मीडिया, व्हाट्स एप  और फेसबुक पर ध्यान, तंत्र, मंत्र, और यंत्र, कुण्डलिनी-जागरण, धन-प्राप्ति की लालसा के लिए तंत्र में उपाय, भूत-बाधा आदि भगाने के लिए तंत्र-मंत्र के अनुष्ठान कर् समाधान किये जाने के लिए बाढ़-सी आयी हुई है। अक्सर व्यक्ति का ध्यान नहीं लग पाता है, कैसे लगेगा ध्यान--यही जिज्ञासा लेकर सवाल करते रहते है और खास तौर से बॉक्स में आकर जरूर 'हाय हेलो' कहते हैं। वे ध्यान करने के चक्कर में  प्राणशक्ति को बढ़ाने के लिए प्राणायाम की बिलकुल ही उपेक्षा कर देते हैं। अनेक बार बॉक्स में सार्वजानिक हित चिन्तन के विषय पर प्रश्न करने के लिए मैंने साफ मना किया हुआ है, फिर भी लोग अपनी प्रकृति और आदत के अनुसार ध्यान नहीं देते हैं। मैंने लोगों को अपनी कोई व्यक्तिगत समस्या रखने और उसका समाधान प्राप्त करने के लिए स्पष्ट मना कर् रखा है। इस पोस्ट में ध्यान-साधना या योग-साधना के लिए प्राण-शक्ति की महत्

मल्टीप्ल यूनिवर्स

हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की गयी है हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की गयी है विज्ञान भी अब एक से ज्यादे विश्‍व को मानने लगा है | राजर पेनरोज़ जो की गणितग्य है लेकिन खगौल विज्ञान मे उनका महत्वा पूर्ण योगदान है |उन्होने अपनी पिछली पुस्तक "द एम्पर्स न्यू माएंड " मस्तिष्क और चेतना को लेकर थी , जी बहूत चर्चित हुई थी |उनकी नयी किताब " साएकल्स आफ टाईम : एन एक्सट्रा आर्डनरी न्यू आफ द यूनिवर्स " मे नयी अवधारणा के मुताबिक ब्रमांड अनन्त है वह कभी नष्ट नहीं होता उसमे उसमे अनन्त कल्पो के चक्र एक के बाद आते रहते है आम तौर पर विज्ञान मे प्रचलित है की सृष्टि का आरंभ एक विग बैक या बड़े विस्फोट से हुई है , इसके बाद ब्रमांड फैलता गया जो अब भी फैल रहा है एक समय के बाद ब्रमांड के फैलने की उर्जा समाप्त हो जायेगी और ब्रमांड पुनः छोटे से बिन्दु पे आ जायेगी | पेनरोज़ की अवधारणा इससे विल्कुल अलग है वह समय के चक्र की अवधारणा सामने रखते है उनका कहना है की एक 'एओन ' या कल्प की समाप्ति ब्रमांड की ऊर्जा खत्म होन

बिटकॉइन

बिटकॉइन एक Virtual Currency है इसका अविष्कार Santoshi Nakamoto ने 2009 में किया था ये बाकी करेंसी की तरह ही एक Digital Currency है। बस हम इसे बाकी करेंसी की तरह छुके नही सकते । लेकिन हम इसका उपयोग online कर सकते है क्योंकि यह एक Digital Currency है।Bitcoin एक Virtual मुद्रा है या फिर हम इसे डिजिटल मुद्रा भी कह सकते है। आप इसे एक उदाहरण की मदद से समझ सकते है। जैसे कि आपके बैंक खाते में जब पैसे होते है तो आप अपने बैंक खाते से net-banking या फिर debit या credit card की मदद से online shopping कर सकते है या बिलों का भुगतान कर सकते है। ठीक इसी तरह bitcoin भी आपके बैंक के खाते के पैसों की तरह होता है जिसका इस्तमाल आप बाकी सभी करेंसी की तरह कर सकते है। sorce https://currencyinbox.com

क्या सचमुच पृथ्वी के बाहर भी जीवन है?[Life beyond earth]

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क्वांटम क्रांति के मुहाने पर जर्मनी

sorce जर्मनी की छवि भले ही औद्योगिक शक्ति की है लेकिन जहां तक क्वांटम कंप्यूटिंग का सवाल है यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बाकियों से पीछे रह गई है लेकिन अब नया कंप्यूटर हालत बदल सकता है जर्मनी में क्वांटम युग का आगाज हो रहा है जर्मनी क्वांटम क्वांटम कंप्यूटिंग में चीन और अमेरिका ऐसी ताकतों से मुकाबला करना चाहता है और जिसके पास भी जितनी आधुनिक क्वांटम कंप्यूटिंग तकनीक है वह उतना ही ज्यादा ताकतवर है इसलिए जर्मनी अब इस ओर विशेष ध्यान दे रहा है इस हफ्ते म्यूनिख स्थित इंस्टिट्यूट और अमेरिकी कंपनी आईबीएम ने क्वांटम कंप्यूटिंग में मिलकर काम करने का ऐलान किया है आईबीएस के नए क्वांटम सिस्टम वन कंप्यूटर के इर्द-गिर्द केंद्रित होगा या दुनिया का सबसे ताकतवर कंप्यूटर है चीन और अमेरिका के पास क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में जर्मनी से कहीं ज्यादा पेटेंट है और ऐसा तब है जबकि जर्मनी में रिसर्च पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जाता है इसके बारे में दुनिया को ज्यादा नहीं पता है हनोवर की लाइव नित्स यूनिवर्सिटी में मैं क्वांटम फिजिक्स के प्रोफेसर क्रिस्टी यान आर एल का उस कहते हैं मैं कहूंगा कि अब हम स

अंतरिक्ष में इंसान पैदा करने की दिशा में कार्य हुआ

see sorce  अंतरिक्ष में बच्चे पैदा किए जा सकते हैं इस सवाल को वैज्ञानिक मानव प्रजाति के भविष्य के लिए हम मानते हैं इसलिए वर्षों से इस क्षेत्र में शोध किया जा रहा है और पहली बार इसमें कुछ सफलता हासिल हुई है वैज्ञानिकों का कहना है कि चूहे के स्तनों से उन्होंने 168 चूहे पैदा किए सालों तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में रखे जाने के बाद इनसे जापान की एक प्रयोगशाला में एक चुहिया को गर्भवती किया गया और 168 बच्चे पैदा हुए स्पर्म को स्विच करने के लिए जिस स्तर के रेडिएशन की जरूरत होती है जैपनीज एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी के  स्पेस सेंटर में इन्हें उस से 170 गुना ज्यादा रेडिएशन लेवल पर रखा गया अंतरिक्ष में रेडिएशन का स्तर पृथ्वी से ज्यादा होता है यामा नाशी यूनिवर्सिटी के जीव विज्ञानिक तेनु ही को वाह का या मां के नेतृत्व में हुआ या धन साइंस एडवांस नामक पत्रिका में छपा है डाकर डॉक्टर वाकायामा कहते हैं कि अंतरिक्ष में रेडिएशन के में शुक्राणुओं के डीएनए को नुकसान नहीं पहुंचाया ना ही इनकी जनन क्षमता को प्रभावित किया इन शुक्राणु से जन्मे बच्चे उतने ही स्वस्थ हुए जितने पृथ्वी पर जन्मे चूहे के बच्चे हो सकत

मन्त्र विज्ञान अजपा गायत्री और विकार मुक्ति

  तीन तल हुए—एक वाणी में प्रकट हो, एक विचार में प्रकट हो,  एक विचार के नीचे अचेतन में हो।  ऋषि कहते हैं, उसके नीचे भी एक तल है। अचेतन में भी होता है, तो भी उसमें आकृति और रूप होता है।  उसके भी नीचे एक तल है, महाअचेतन का कहें, जहां उसमें रूप और आकृति भी नहीं होती। वह अरूप होता है। जैसे एक बादल आकाश में भटक रहा है। अभी वर्षा नहीं हुई। ऐसा एक कोई अज्ञात तल पर भीतर कोई संभावित,पोटेंशियल विचार घूम रहा है ।  वह अचेतन में आकर अंकुरित होगा,  चेतन में आकर प्रकट होगा,  वाणी में आकर अभिव्यक्त हो जाएगा। ऐसे चार तल हैं। गायत्री उस तल पर उपयोग की है जो पहला तल है, सबसे नीचे। उस तल पर "अजपा"  का प्रवेश है।  तो जप का नियम है। अगर कोई भी जप शुरू करें—समझें कि राम—राम जप शुरू करते हैं, या ओम, कोई भी जप शुरू करते हैं; या अल्लाह, कोई भी जप शुरू करते है—तो पहले उसे वाणी से शुरू करें। पहले कहें, राम, राम; जोर से कहें। फिर जब यह इतना सहज हो जाए कि करना न पड़े और होने लगे, इसमें कोई एफर्ट न रह जाए पीछे, प्रयत्न न रह जाए,यह होने लगे; जैसे श्वास चलती है, ऐसा हो जाए कि राम, राम चलता ही रहे, तो फिर ओंठ ब

स्वस्थ रहने हेतु हेल्थ इंश्योरेंस करवाएं

आज के बढ़ते युग में करो ना जैसी महामारी और खानपान में बढ़ते बदलाव से बीमारियों का प्रचलन ज्यादा हो गया स्वास्थ्य एक समस्या हो गई है अतः हमें स्वास्थ्य बीमा करा लेना चाहिए तभी हम वैज्ञानिक सभी तकनीकी का फायदा उठाe

रेबीज

  ===================  रेबीज या जलांतक (Hydrophobia) दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक है। यह रोग मनुष्य को यदि एक बार हो जाए तो उसका बचना काफी मुश्किल होता है। रेबीज लाइसा वाइरस अर्थात् विषाणु द्वारा होती है और अधिकतर कुत्तों के काटने से ही होती है। परन्तु यह अन्य दाँत वाले प्राणियों जैसे-बिल्ली, बन्दर, सियार, भेड़िया, सूअर इत्यादि के काटने से भी हो सकती है। इन जानवरों या प्राणियों को नियततापी (Warm blooded) कहते हैं। 

सूर्य से हमें ज्योति मिलता है चन्द्रमा से अमृतत्त्व

श्रीमद्भगवद्गीता का आठवां अध्याय और वृहदारण्यकोपिषद् के छठवें अध्याय के दूसरे ब्राह्मण तथा और भी अनेकों आर्ष-ग्रन्थों के अनुसार  सूर्य-चन्द्र लोक में तो युक्तयोगी को भी जाना पड़ता है शरीर छोड़ने के बाद क्रममुक्ति के क्रम में । अच्छा , इनका आध्यात्मिक महत्त्व छोड़कर केवलमेव भौतिक-दृष्टि से भी विचार करे तो सूर्य प्रकाश व चन्द्रमा शीतलता प्रदान करने के बाद भी आपसे बिजली व एसी की भांति बिल नहीं लेते । कहते हैं जितनी पृथ्वी है , उससे तिगुणा जल है , किन्तु उस सामुद्रिक जल से क्या प्रयोजन , जो न पीने के काम आये , न स्नान के और  वस्त्र-प्रक्षालनादि के ही ! सूर्य की रश्मियां जब उसी सामुद्रिक-जल को खींचकर मेघमण्डल के फिल्टर में डालती है , और वह जब पुनः धरती पर बरसता है तो पीने-नहाने-वस्त्रादि धोने योग्य होता है । धरती के अंदर जाने पर उसी जल को ट्यूबवेल, कूप , चापाकल आदि के द्वारा लोग प्रयोग में लाते हैं । कुल मिलाकर सूर्य-चन्द्रमा है तो जीवन है , प्राण है , पृथ्वी है ।  किमधिकम् ये कलियुग के प्रत्यक्ष देवता हैं । इसी उपकार को ध्यान में रखकर भी जब सूर्य-चन्द्र ग्रहणादि का अवसर हो , उस समय निद्रा-मैथ