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शनिवार, 31 जुलाई 2021

मनोमय कोष की साधना

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{{{ॐ}}}

                                                # 

मन मे एक गुप्त शक्ति छिपी होती है यदि वह शक्ति मनोविकार,छल,छिद्र, लोभ, मोह, वश अनैतिक कार्य पाप कर्म की ओर प्रवृत्ति होती है तोअधोगति कारक है अत: उसे आध्यात्म की ओर मोडने से ही परमात्मा सी प्राप्ति होती है ।
गीता मे कहा गया है कि मन ही बंधन व मोक्ष का कारक है पतञ्जलि ऋषि ने कहा कि चित्त की वृत्तियों का निरोध  करना एकाग्र करना ही योग है ।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को मन वश मे करने के लिए दो उपाय बताये है:- १:- अभ्यास २:- वैराग्य ।
इनके द्वारा ऐषणा प्रकृति को रोककर ऋतम्भरा बुद्धि को अन्तरात्मा के आधीन किया जा सकता है। जिसे मनोयोग कहते है इसके अनन्तर:--
१, ध्यानयोग २, त्राटक ३, जप ४, तन्मात्रा साधन
                                                              #ध्यानयोग
ध्यान चुम्बक की तरह मन खीचकर एकाग्र करता है ध्यान के लिए आदर्शों को दिव्यरूप धारी देवताओं के रूप मानकर उनमे तन्मयता स्थापित करने का यौगिक विधान है ।
ऐसा भी हो सकता है। कि एक ही ईष्ट देव को आवश्यकतानुसार विभिन्न गुणो वाला मान लिया जाये।
ईष्टदेव का मन क्षेत्र मे ध्यान करे। ध्यान के पांच अंग है:-
१. स्थिति:-उपासक को यह ज्ञान होना चाहिए कि कौन सी दिशा मे मुँह करके किस स्थान मे किस आसन द्वारा साधना करे।
२.संस्थिति:- ईष्ट की छवि रंग रूप अंग आभूषणों वाहन आदि स्थिति निश्चित करे।
३.विगति:- ईष्ट के गुण ,पराक्रम, आदि या संस्मरण करे।
४. प्रगति:- माता ,पिता, सखा, मित्र, गुरू, दास, किस रूप नें ईष्ट की साधना करनी है ।
५.संस्मिति:-यह व्यवस्था है जिसमे साधक और साध्य, उपासक,और उपास्य एक हो जाते है ।
                                                    #साधना_की_सहायक_विधियाँ 
१. इष्ट की सकाम व विविध उपचारों से पूजा करें।
२. भावना करे देवता को दिव्य तेज मय शरीर माने उस तेज से देह पुष्ट करे
३, भावना करें कि मेरे चारो ओर प्रचण्ड तेज है ओर मै परि पुष्ट हो रहा हूँ
४,ह्रदय के निकट सुर्य चक्र मे सुर्य का प्रकाश फैल रहा है 
५,भावना करे कि गायत्री सी स्वर्णिम किरणों मेरे शरीर मे प्रविष्ट हो रही है ।
                                                               #त्राटक
त्राटक दो तरह के है:-
 १,अन्तर त्राटक २,बाह्य त्राटक

अन्तरत्राटक:---
योगी प्रकाश बिन्दु पर ध्यान कर आंतरिक त्राटक करते है तो मैस्मरेजम वाले आन्तरिक त्राटक लाभ व बाह्य प्रयोग के लिये करते है वे उस उपासना का लाभ नही उठा पाते।
बाह्यत्राटक:-
बाह्य त्राटक का उद्देश्य बाह्यसाधनाों के आधार पर मन को वश मे कर चित्तवृत्तियो का एकीकरण करना है
अपनी दृष्टि को किसी विशेष वस्तु पर जमाकर अत न्याय ता पूर्वक ध्यान करे इससे हमारे नेत्रों मे चुम्बकीय शक्ति बढ जाती है। इसे दृष्टि बंधक भी कहते है । बंधक दृष्टि से किसी को वशीभूत या बेहोश  किया जा सकता है । इस त्राटक से रोग निवारण व अन्त करण का भेद मालुम किया जा सकता है
                                                              #जप
महर्षि भारद्वाज ने गायत्री व्याख्या मे कहा है समस्त यज्ञों मे जपयज्ञ अधिक श्रेष्ठ है यह मन को वश मे करने कि रामबाण है इसके लिए निम्न बातो का ध्यान रखे।
जप प्रातकाल ब्रह्म मुहुर्त्त मे ही करना चाहिए जप के लिए  एकान्त व शुद्ध स्थान होना चाहिए जप समय शुद्ध वस्त्र वआसन का प्रयोग करे।
 प्रात काल पूर्व मुखी सांय काल पश्चिम मुखी हो साधना करे
माला गोमुखी मे ही रखे या कपडे से ढककर करे।
यात्रा या रोगी होने से मानसिक जप करे।
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मस्तिष्क ये मध्य मे इष्ट कि स्मरण करे

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शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

maha avatar baba ji sangrila ghati in himalaya

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“Babaji was living in a little home in Banaras, when Shankaracharaya visited that city. Shankara at that time was a famous astrologer. Babaji’s manservant went therefore to see him. He received from Shankara the shocking news that, that very night, it was his destiny to die! In fear and trembling, on his return, he approached Babaji with the news.”

“Go back,” said Babaji, ‘and say to him that you will not die tonight.’

“The servant carried this reply back to Swami Shankara, who affirmed. ‘This karma is so fixed that, should you survive it, I shall go to your master and ask him to accept me as his disciple.’

“That night, a terrible thunderstorm lashed the city. Lightening struck everywhere. It felled trees all around the house where Babaji lived. The great master stretched himself out over the servant’s body, to protect him. When morning came, the servant was still alive. He then went and presented himself to Shankara. The Swami was amazed. Realizing that he had encountered a power much greater than his own, he went to Babaji and took initiation into Kriya Yoga.”

Om Kriya Babaji Namaha Aum!

-Conversations with Yogananda

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गूगल एक परिचय

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यह कम्पनी स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से पी॰एच॰डी॰ के दो छात्र लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन द्वारा स्थापित की गयी थी। इन्हें प्रायः "गूगल गाइस"[7][8][9] के नाम से सम्बोधित किया जाता है। सितम्बर 4, 1998 को इसे एक निजि-आयोजित कम्पनी में निगमित किया गया। इसका पहला सार्वजनिक कार्य/सेवा 19 अगस्त 2004 को प्रारम्भ हुआ। इसी दिन लैरी पेज, सर्गेई ब्रिन और एरिक स्ख्मिड्ट ने गूगल में अगले बीस वर्षों (2024) तक एक साथ कार्य करने की रजामंदी की। कम्पनी का शुरूआत से ही "विश्व में ज्ञान को व्यवस्थित तथा सर्वत्र उपलब्ध और लाभप्रद करना" कथित मिशन रहा है। कम्पनी का गैर-कार्यालयीन नारा, जोकि गूगल इन्जीनियर पौल बुखीट ने निकाला था— "डोन्ट बी इवल (बुरा न बनें)"। सन् 2006 से कम्पनी का मुख्यालय माउंटेन व्यू, कैलिफोर्निया में है।

गूगल विश्वभर में फैले अपने डाटा-केन्द्रों से दस लाख से ज़्यादा सर्वर चलाता है और दस अरब से ज़्यादा खोज-अनुरोध तथा चौबीस पेटाबाईट उपभोक्ता-सम्बन्धी जानकारी (डाटा) संसाधित करता है। गूगल की सन्युक्ति के पश्चात् इसका विकास काफ़ी तेज़ी से हुआ है, जिसके कारण कम्पनी की मूलभूत सेवा वेब-सर्च-इंजन के अलावा, गूगल ने कई नये उत्पादों का उत्पादन, अधिग्रहण और भागीदारी की है। कम्पनी ऑनलाइन उत्पादक सौफ़्ट्वेयर, जैसे कि जीमेल ईमेल सेवा और सामाजिक नेटवर्क साधन, ऑर्कुट और हाल ही का, गूगल बज़ प्रदान करती है। गूगल डेस्कटॉप कम्प्युटर के उत्पादक सोफ़्ट्वेयर का भी उत्पादन करती है, जैसे— वेब ब्राउज़र गूगल क्रोम, फोटो व्यवस्थापन और सम्पादन सोफ़्ट्वेयर पिकासा और शीघ्र संदेशन ऍप्लिकेशन गूगल टॉक। विशेषतः गूगल, नेक्सस वन तथा मोटोरोला ऍन्ड्रोइड जैसे फोनों में डाले जाने वाले ऑपरेटिंग सिस्टम ऍन्ड्रोइड, साथ-ही-साथ गूगल क्रोम ओएस, जो फिलहाल भारी विकास के अन्तर्गत है, पर सीआर-48 के मुख्य ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में प्रसिद्ध है, के विकास में अग्रणी है। एलेक्सा google.com को इंटरनेट की सबसे ज़्यादा दर्शित वेबसाइट बताती है। इसके अलावा गूगल की अन्य वेबसाइटें (google.co.in, google.co.uk, आदि) शीर्ष की सौ वेबासाइटों में आती हैं। यही स्थिती गूगल की साइट यूट्यूब और ब्लॉगर की है। ब्रैंडज़ी के अनुसार गूगल विश्व का सबसे ताकतवर (नामी) ब्राण्ड है। बाज़ार में गूगल की सेवाओं का प्रमुख होने के कारण, गूगल की आलोचना कई समस्याओं, जिनमें व्यक्तिगतता, कॉपीराइट और सेंसरशिप शामिल हैं, से हुई है। अगर भारत में गूगल के CEO की बात की जाए तो भारत में गूगल के CEO सुंदर पिचाई जी है जिनकी सालाना कमाई लगभग 1300 से 1500 करोड़ रूपये है।sabhar :vikipidia

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अनाज से बनाया जाएगा एथेनाल

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गोरखपुर, उमेश पाठक। गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) में 100 करोड़ रुपये के निवेश से  एथेनाल बनाया जाएगा। इंडिया ग्लाइकाल्स लिमिटेड (आइजीएल) इसके लिए प्लांट स्थापित कर रहा है और अगले कुछ महीनों में उत्पादन शुरू हो जाने की उम्मीद है। इस प्लांट में गेहूं, चावल के साथ स्टार्च वाले अन्य अनाजों से एथेनाल तैयार किया जाएगा, जिससे किसानों को सीधा फायदा होगा।


आइजीएल के इस प्लांट में हर वर्ष तीन करोड़ लीटर एथेनाल तैयार होगा। इतना एथेनाल बनाने में हर वर्ष करीब 90 हजार टन अनाज की जरूरत होगी। आइजीएल पूर्वांचल के किसानों से सीधे भी अनाज का क्रय कर सकता है। इस प्रक्रिया में खराब अनाज, चावल के टूटन का भी उपयोग किया जा सकता है।

प्लांट में अनाज को पीसकर पानी मिलाया जाएगा। उसके बाद फर्मंटेंशन के जरिए एल्कोहल अलग किया जाएगा।

किसानों से गेहूं खरीद के बाद गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं होती। भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में गोरखपुर मंडल में करीब 2.75 लाख टन अनाज रखने की जगह है। मंडल में औसतन तीन लाख टन गेहूं जबकि 5.50 लाख टन धान की खरीद की जाती है। हर बार अनाज के भंडारण की समस्या होती है। उद्यमियों की मानें तो इस समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार की भी मंशा है कि अनाज से एथेनाल बनाया जाए। जिससे किसानों के पास एक और विकल्प होगा 

आइजीएल किसानों से बाजार मूल्य के हिसाब से अनाज खरीदेगा। एथेनाल प्लांट स्थापित होने के बाद व्यापारी एवं क्रय केंद्रों के अलावा किसानों को तीसरा विकल्प भी मिल जाएगा। किसानों का खराब अनाज भी एथेनाल बनाने के लिए प्रयोग किया जाएगा। इसलिए उन्हें खराब अनाज की ङ्क्षचता करने की भी जरूरत नहीं होगी। एक तरह से कृषि के क्षेत्र में इससे बड़ा बदलाव 

style="font-family: "Noto Sans"; margin-left: 0px; margin-right: 0px; overflow-wrap: break-word;">एथेनाल एक प्रकार का एल्कोहल होता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर गाडिय़ों में ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। आइजीएल के प्लांट में तैयार होने वाला एथेनाल पेट्रोलियम कंपनियों को बेचा जाएगा।

अनाज से एथेनाल बनाने के लिए गोरखपुर इकाई में 100 करोड़ रुपये की लागत से प्लांट स्थापित किया जा रहा है। इसमें हर साल करीब तीन करोड़ लीटर एथेनाल बनेगा और 90 हजार टन अनाज का इस्तेमाल हो सकेगा। प्लांट शुरू होने के बाद किसानों के पास अनाज बेचने के लिए एक और विकल्प मिल सकेगा। इससे बड़ा बदलाव आएगा। - एसके शुक्ला, बिजनेस हेड, आइजीएल।


Sabhar jagarn .com

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गुरुवार, 29 जुलाई 2021

क्या महत्व है मृत संजीवनी मंत्र का

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मृत संजीवनी मंत्र का महत्व ;-

06 FACTS;-

1-हमारे शास्त्रों और पुराणों में गायत्री मंत्र और महा मृत्युंजय मंत्र का सबसे अधिक महत्व है, इन दोनों मंत्र को बहुत बड़े मंत्रो में से एक माना जाता है क्यूंकि यह दोनों मंत्र से आपको सभी तरह के संकटों से मुक्ति मिल जाती है।हमारे शास्त्रों में ऐसे कई सारे उल्लेख मिलते है जिनमे यही दो मंत्र सबसे प्रमुख स्थान में आते है क्यूंकि इनसे अधिक शक्तिशाली और कोई मंत्र नहीं है।माना जाता है की कोई सच्चे दिल से निरंतर इस मंत्र का जाप करता है तो कई सारे बड़े-बड़े संकटों से आसानी से मुक्ति पायी जा सकती है।वैसे तो भगवान शिव के कई सारे मंत्र है पर अपनी सभी तरह की इच्छाओं को पूरी करने के लिए सबसे शक्तिशाली मंत्र है "महामृत्युंजय मंत्र"।शिवजी के मृत संजीवनी मंत्र में काल को भी रोकने की शक्ति है;जिसका जाप रावण करता था।मृत्युंजय मंत्र  पांच प्रकार के हैं- जो उपरोक्त चित्र में दिए है।पांचवा  संजीवनी मंत्र  का निम्न  महत्व है। 
2-पांचवा  संजीवनी मंत्र (महामृत्युंजय गायत्री ) का महत्व...

 महा मृत्युंजय मंत्र ... गायत्री मंत्र और महा मृत्युंजय मंत्र दोनों से मिलकर बना है।माना जाता है की इसी मंत्र से किसी मृत व्यक्ति को भी दुबारा जीवित किया जा सकता है, यानि कि  इसी मंत्र से कई सारे बड़े-बड़े रोगों और संकटों से मुक्ति मिल जाती है, इसे ही शुक्राचार्य द्वारा आराधित महामृत्युंजय मंत्र कहा जाता है।दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है।इस मंत्र के जप से असाध्य रोग कैंसर, क्षय, टाइफाइड, हैपेटाइटिस बी, गुर्दे, पक्षाघात, ब्रेन ट्यूमर जैसी बीमारियों को दूर करने में भी मदद मिलती है। इस मंत्र का प्रतिदिन विशेषकर सोमवार को 101 जप करने से सामान्य व्याधियों के साथ ही मानसिक रोग, डिप्रैशन व तनाव आदि दूर किए जा सकते हैं। इतना ही नहीं मृत्युंजय जप व हवन से शनि की साढ़ेसाती, वैधव्य दोष, नाड़ी दोष, राजदंड, अवसादग्रस्त मानसिक स्थिति, चिंता व चिंता से उपजी व्यथा को कम किया जा सकता है।

3-यह शाश्वत सत्य है कि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। किंतु हमें वेद, पुराण तथा अन्य शास्त्रों में मृत्यु के पश्चात पुनः जीवित होने के वृत्तांत मिलते हैं। गणेश का सिर काट कर हाथी का सिर लगा कर शिव ने गणेश को पुनः जीवित कर दिया।
भगवान शंकर ने ही दक्ष प्रजापति का शिरोच्छेदन कर वध कर दिया था और पुनः अज (बकरे) का सिर लगा कर उन्हें जीवन दान दे दिया। सगर राजा के साठ हजार पुत्रों को पुनर्जीवित करने के लिए राजा भगीरथ सैकड़ों वर्ष तपस्या करके गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए और सागर पुत्रों को जीवन प्राप्त हुआ।ऐसे अनगिनत वृत्तांत शास्त्रों में मिलते हैं जिससे स्पष्ट होता है कि भगवान शिव, जो महामृत्युंजय भगवन भी कहलाते हैं, रोग, संकट, दारिद्र्य, शत्रु आदि का शमन तो करते ही हैं, जीवन तक प्रदान कर देते हैं। 

4-महर्षि वशिष्ठ, मार्कंडेय और शुक्राचार्य महामृत्युंजय मंत्र के साधक और प्रयोगकर्ता हुए हैं। ऋषि मार्कंडेय ने महामृत्युंजय मंत्र के बल पर अपनी मृत्यु को टाल दिया था, यमराज को खाली हाथ वापस यमलोक जाना पड़ा था। लंकापति रावण भी महामृत्युंजय मंत्र का साधक था। इसी मंत्र के प्रभाव से उसने दस बार अपने नौ सिर काट कर उन्हें अर्पित कर दिए थे।शुक्राचार्य के पास दिव्य महामृत्युंजय मंत्र था जिसके प्रभाव से वह युद्ध में आहत सैनिकों को स्वस्थ कर देते थे और मृतकों को तुरंत पुनर्जीवित कर देते थे।शुक्राचार्य ने रक्तबीज नामक राक्षस को महामृत्युंजय सिद्धि प्रदान कर युद्धभूमि में रक्त की बूंद से संपूर्ण देह की उत्पत्ति कराई थी।महामृत्युंजय मंत्र के प्रभाव से गुरु द्रोणाचार्य को अश्वत्थामा की प्राप्ति हुई थी, जिसके बारे में धारणा है कि वह आज भी जीवित है तथा उसे उसी देह में नर्मदा नदी के किनारे घूमते कई लोगों ने देखा है।माना जाता है की कोई सच्चे मन से निरंतर इस मंत्र का जाप करता है तो कई सारे बड़े-बड़े संकटों से आसानी से मुक्ति पायी जा सकती है।
5-इस मंत्र का नाम मृत संजीवनी मंत्र है,....

“ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ ˜त्र्यंबकंयजामहे ऊँ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ऊँ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम

ऊँ भर्गोदेवस्य धीमहि ऊँ उर्वारूकमिव बंधनान ऊँ धियो योन: प्रचोदयात

ऊँ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ऊँ स्व: ऊँ भुव: ऊँ भू: ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ”.......इस मंत्र का अर्थ है..'' हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं... उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए... जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं, तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं।  

 6-मृत संजीवनी मंत्र की पूजा और जप कैसे करना है?-

07 POINTS;-

1-सबसे पहले तो आपको की सुबह भगवान शिव की पूजा-अर्चना करनी है और फिर इस मंत्र का 108 बार जाप करना है।वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्री मृत संजीवनी पूजा का प्रयोग आसमयिक आने वाली मृत्यु को टालने के लिए, लंबी आयु के लिए, स्वास्थ्य के लिए तथा गंभीर कष्टों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है तथा इस पूजा को विधिवत करने वाले अनेक जातक अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त कर पाने में सफल होते हैं। श्री मृत संजीवनी पूजा का आरंभ शुक्ल पक्ष में किसी भी सोमवार या सामान्यतया सोमवार वाले दिन किया जाता है तथा उससे अगले सोमवार को इस पूजा का समापन कर दिया जाता है। इस पूजा को पूरा करने के लिए सामान्यता 7 दिन लगते हैं किन्तु कुछ स्थितियों में यह पूजा 7 से 10 दिन तक भी ले सकती है जिसके चलते सामान्यतया इस पूजा के आरंभ के दिन को बदल दिया जाता है तथा इसके समापन का दिन सामान्यतया सोमवार ही रखा जाता है।
2-किसी भी प्रकार की पूजा को विधिवत करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस पूजा के लिए निश्चित किये गए मंत्र का एक निश्चित संख्या में जाप करना तथा यह संख्या अधिकतर पूजाओं के लिए 125,000 मंत्र होती है तथा श्री मृतसंजीवनी पूजा में भी श्री मृतसंजीवनी मंत्र का 125,000 बार जाप करना अनिवार्य होता है। इस संकल्प के पश्चात सभी पंडित अपने यजमान अर्थात जातक के लिए श्री मृत संजीवनी मंत्र का जाप करना शुरू कर देते हैं तथा प्रत्येक पंडित इस मंत्र के जाप को प्रतिदिन लगभग 8 से 10 घंटे तक करता है जिससे वे इस मंत्र की 125,000 संख्या के जाप को संकल्प के दिन निश्चित की गई अवधि में पूर्ण कर सकें।भयंकर बीमारियों के लिए मृत्युंजय मंत्र के सवा लाख जप व उसका दशमांश का हवन करवाना उत्तम रहता है। प्राय: हवन के समय अग्निवास, ब्रह्मचर्य पालन, सात्विक भोजन व विचार, शिव पर पूर्ण श्रद्धा व भक्तिभाव पर विशेष ध्यान रखना चाहिए। जप के बाद बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ व इस दौरान घी का दीपक प्रज्ज्वलित रखना चाहिए। जप के साथ हवन व तर्पण और मार्जन के साथ ही साथ हवन की समाप्ति में ब्राह्मणों को भोजन करवा कर दान देना उत्तम माना गया है।जप व हवन का कार्य चैत्र मास में किसी पवित्र तीर्थ स्थल, शिवालय, नदी, सरोवर, पर्वतादि के पास शिवलिंग बनाकर करना चाहिए। महामृत्युमञ्जय मंत्र/ "मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र" की भक्ति में अविश्वास की कोई जगह नहीं होती।  
 3-यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि श्री मृत संजीवनी पूजा जातक की अनुपस्थिति में भी की जा सकती है तथा जातक के व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की स्थिति में इस पूजा में जातक की तस्वीर अर्थात फोटो का प्रयोग किया जाता है जिसके साथ साथ जातक के नाम, उसके पिता के नाम तथा उसके गोत्र आदि का प्रयोग करके जातक के लिए इस पूजा का संकल्प किया जाता है। इस संकल्प में यह कहा जाता है कि जातक किसी कारणवश इस पूजा के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने में सक्षम नहीं है जिसके चलते पूजा करने वाले पंडितों में से ही एक पंडित जातक के लिए जातक के द्वारा की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं पूरा करने का संकल्प लेता है तथा उसके पश्चात पूजा के समाप्त होने तक वह पंडित ही जातक की ओर से की जाने वाली सारी क्रियाएं करता है जिसका पूरा फल संकल्प के माध्यम से जातक को प्रदान किया जाता है। 
4-महामृत्युंजय मंत्र में जहां हिंदू धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ऊँ) की शक्तियां शामिल हैं।वहीं गायत्री मंत्र प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है। विधिवत रूप से संजीवनी मंत्र की साधना करने से इन दोनों मंत्रों के संयुक्त प्रभाव से व्यक्ति में कुछ ही समय में विलक्षण शक्तियां उत्पन्न हो जाती है।यदि वह नियमित रूप से इस मंत्र का जाप करता रहे तो उसे अष्ट सिद्धिया, नवनिधिया मिलती हैं तथा मृत्यु के बाद उसका मोक्ष हो जाता है।वैसे तो भगवान शिव के कई सारे मंत्र है पर अपनी सभी तरह की इच्छाओं को पूरी करने के लिए सबसे शक्तिशाली मंत्र है "महामृत्युंजय मंत्र"  ।महामृत्युञ्जय मंत्र यजुर्वेद के रूद्र अध्याय स्थित एक मंत्र है, यह श्लोक यजुर्वेद में भी आता है ।इसमें शिव की स्तुति की गयी है। शिव को 'मृत्यु को जीतने वाला' माना जाता है। यह मंत्र सर्वाधिक फल देने वाला माना गया है।
5-संजीवनी मंत्र के जाप में निम्न बातों का ध्यान रखें
(1) जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं।
(2) मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
(3) इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए।
(4) मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए।
(5) जपकाल के दौरान व्यक्ति को  काम ,मांस तथा शराबअन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए। उसे पूर्ण ब्रह्मचर्य के साथ रहते हुए अपनी पूजा करनी चाहिए।
6-क्यों नहीं करना चाहिए... महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप?-
 आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता, परिणामत: आदमी या तो कुछ सौ जाप करने में ही पागल हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। इसे गुरू के सान्निध्य में सीखा जाता है और धीरे-धीरे अभ्यास के साथ बढ़ाया जाता है। इसके साथ कुछ विशेष प्राणायाम और अन्य यौगिक क्रियाएं भी सिखनी होती है ताकि मंत्र से पैदा हुई असीम ऊर्जा को संभाला जा सके। 

7-कितनी बार महामृत्युञ्जय मंत्र बोलने पर क्या हो जाता है?-

शिव पुराण के मुताबिक महामृत्युञ्जय मंत्र के एक लाख जप करने पर शरीर हर तरह से पवित्र हो जाता है। यानी सारे दर्द, रोग या कलह दूर हो जाते हैं। दो लाख मंत्र जप पूरे होने पर पूर्वजन्म की बातें याद आ जाती हैं। तीन लाख मंत्र जप पूरे होने पर सभी मनचाही सुख-सुविधा और वस्तुएं मिल जाती है। चार लाख मंत्र जप पूरे होने पर भगवान शिव सपनों में दर्शन देते हैं। पांच लाख महामृत्युञ्जय मंत्र पूरे होते ही भगवान शिव तुरंत ही भक्त के सामने प्रकट हो जाते हैं। 

 मृत संजीवनी मंत्र साधना का विज्ञान;-

इस साधना से मूलाधार, मणिपुर, अनाहत और आज्ञा चक्रों की सक्रियता बढ़ती है। कुंडलिनी का जागरण होता है तथा पंचतत्वों के साथ शिवतत्व का जागरण होता है। इसकी सफलता के लिये जरूरी है कि साधक का सूक्ष्म शरीर सकारात्मक ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ सीधे जुड़ जाये और वहां से दिव्य संजीवनी शक्ति को ग्रहण करके अपने भीतर धारण करे ।इसके लिये साधक अपनी साधना शक्तियों का उपयोग करे ।सुबह 7 बजे से 10 मिनट पहले साधना हेतु बैठें। साधना से पहले नमक के पानी से स्नान कर लें।आपकी सारी नकारात्मक ऊर्जा का विनाश हो जाएगा और पॉजिटिविटी का संचार होगा। इसके अतिरिक्त साधना के बाद दो घंटे तक स्नान भी नही करना चाहिये। 7 बजे तक 10 मिनट का कोई योग या एक्सरसाइज करें... यह अनिवार्य है। किसी कारण कोई योग या एक्सरसाइज न कर सकें तो 5 मिनट ताली बजायें, और 5 मिनट खड़े होकर दोनों हाथों को ऊपर ऊठाते हुए हर हर महादेव बोलें। योग या एक्सरसाइज के बाद आराम से बैठ जायें। नीचे बैठने में दिक्कत हो तो कुर्सी आदि पर बैठें। मगर जिस पलंग पर सोते हैं उस पर न बैठें। 7 बजे साधना आरम्भ करें। 

साधना के स्टेप;-

05  POINTS;-

1-भगवान शिव को साक्षी बनायें. कहें- हे शिव आप मेरे गुरू हैं मै आपका/ आपकी शिष्य हूं, मुझ शिष्य पर दया करें। आपको साक्षी बनाकर मै  अमृत संजीवनी साधना सम्पन्न कर रहा/रही हूं। इसकी सफलता हेतु मुझे दैवीय सहायता और सुरक्षा प्रदान करें। 

2-भगवान शिव  का फोटो सामने रखें... फोटो को एकटक देखते रहें। उनके माथे के बीच तीसरे नेत्र का प्रतीक हल्का बिंदु दिखेगा। उसी पर अपनी नजरें टिकाये रखें।  

3-दोनों हाथों में मृत संजीवनी मुद्रा बनायें। मुद्रा में हाथ की तर्जनी (इंडेक्स फिंगर) को मोड़कर अंगूठे की जड़ में दबा लेना है।  तर्जनी उंगुली को मोड़कर अंगूठे की जड़ में लगाकर और मध्यम और अनामिका अंगुली के अग्र भाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाएं। सबसे छोटी अंगुली को सीधा रखें ऐसे मृत संजीवनी मुद्रा बनती है। इस मुद्रा में दो मुद्राएं बनती हैं—वायु मुद्रा और अपान मुद्रा। इसलिए इस मुद्रा को अपान वायु मुद्रा भी कहते हैं।  

 4- ऊं ह्रौं जूं सः मंत्र के साथ 10 संजीवनी प्राणायाम करें। इसके लिये ऊं ह्रौं का जप करते हुए सांस को धीरे धीरे भीतर खींचें  और जूं सः का जप करते हुए सांस को धीरे धीरे बाहर निकालें। सांस को अंदर लेने और बाहर निकालने के बीच कुछ क्षण रुकें। इसी तरह सांस निकालने और दोबारा खींचने के बीच भी कुछ क्षण रुकें। संजीवनी प्राणायाम से उर्जा चक्रों और पंच तत्वों का जागरण होता है। आभामंडल  सकारात्मक उर्जाओं से भर जाता है। जर्जर शरीर भी कायाकल्प की तरफ बढ़ जाते हैं। 

5- संजीवनी प्राणायाम के बाद आंखें बंद कर लें. हाथों में मृत संजीवनी मुद्रा बनाये रखें। रिलैक्स होकर बैठें और  अविचलित रूप से मृत संजीवनी मंत्र जप करते रहें। शिव धनदा मंत्र जीवन में लक्ष्मी सुख व्याप्त करने में सक्षम है..'' ऊं शं शंकराय धनम् देहि देहि ऊं ''का जप भी कर  सकते हैं।संजीवनी प्राणायाम के बाद इन मंत्र का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।  इससे मान-सम्मान प्रतिष्ठा और व्यक्तित्व का आकर्षण भी बढ़ता है। मंत्र जप पूरा होने पर आंखें खोल लें। तन,मन,धन के सुखों के लिये भगवान शिव को धन्यवाद दें। धरती मां को  ,दिव्य संजीवनी शक्ति को धन्यवाद दें। फिर ऊं इंद्राय नमः कहकर उठ जायें। जो लोग किसी कारण वश सुबह 7 बजे की साधना नही कर सकते; वे  रुद्राक्ष धारण करके साधना करें। जिससे दिन -रात में किसी भी टाइम साधना की जा सकती है।उसमें समय का बंधन नही। 

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विद्युत Electricity

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विद्युत आवेशों के मौजूदगी और बहाव से जुड़े भौतिक परिघटनाओं के समुच्चय को विद्युत (Electricity) कहा जाता है।अर्थात् इसे न तो देखा जा सकता है व न ही छुआ जा सकता है केवल इसके प्रभाव के माध्यम से महसुस किया जा सकता है| विद्युत से जानी-मानी घटनाएं जुड़ी है जैसे कि तडित, स्थैतिक विद्युत, विद्युतचुम्बकीय प्रेरण, तथा विद्युत धारा। इसके अतिरिक्त, विद्युत के द्वारा ही वैद्युतचुम्बकीय तरंगो (जैसे रेडियो तरंग) का सृजन एवं प्राप्ति सम्भव होता है?


वायुमण्डलीय विद्युत
विद्युत के साथ चुम्बकत्व जुड़ी हुई घटना है।[1] विद्युत आवेश वैद्युतचुम्बकीय क्षेत्र पैदा करते हैं। विद्युत क्षेत्र में रखे विद्युत आवेशों पर बल लगता है।

समस्त विद्युत का आधार इलेक्ट्रॉन हैं। क्योंकि इलेक्ट्रॉन हल्के होने के कारण ही आसानी से स्थानांतरित हो पाते हैं। इलेक्ट्रानों के हस्तानान्तरण के कारण ही कोई वस्तु आवेशित होती है। आवेश की गति की दर विद्युत धारा है। विद्युत के अनेक प्रभाव हैं जैसे चुम्बकीय क्षेत्र, ऊष्मा, रासायनिक प्रभाव आदि।

जब विद्युत और चुम्बकत्व का एक साथ अध्ययन किया जाता है तो इसे विद्युत चुम्बकत्व कहते हैं। मात्र जिसके अनुप्रयोगों पर दुनिया की इकोनामी टिकी हुई है।विद्युत को अनेकों प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है किन्तु सरल शब्दों में कहा जाये तो विद्युत आवेश की उपस्थिति तथा बहाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न उस सामान्य अवस्था को विद्युत कहते हैं जिसमें अनेकों कार्यों को सम्पन्न करने की क्षमता होती है। विद्युत चल अथवा अचल इलेक्ट्रान या प्रोटान से सम्बद्ध एक भौतिक घटना है। किसी चालक में विद्युत आवेशों के बहाव से उत्पन्न उर्जा को विद्युत कहते हैं।

विद्युत-आवेश के प्रवाह अर्थात विद्युत-आवेशित कणों के किसी निश्चित दिशा मे गति करने को 'विद्युत-धारा' कहते हैं vikipidia

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बुधवार, 28 जुलाई 2021

-व्यक्त और अव्यक्त चेतना क्या है

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन 

-------: मनुष्य को व्यक्ति की संज्ञा क्यों दी गयी है ?:--------
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      व्यक्त चेतना वह चेतना है जो किसी वस्तु, किसी पदार्थ या किसी अन्य साधन द्वारा व्यक्त (प्रकट) हो गयी हो। हमें मालूम होना चाहिए कि मानव पिण्ड में चेतना की सबसे अधिक अभिव्यक्ति (प्रकटीकरण)  होने के कारण ही मनुष्य को 'व्यक्ति' कहते हैं। तात्पर्य यह है कि जिसमें चेतना की अभिव्यक्ति सर्वाधिक है, वह मनुष्य ही 'व्यक्ति' कहलाता है।
       अव्यक्त चेतना उसे कहते हैं, जो निराकार है, जो अनुभव के परे है और जो किसी वस्तु, पदार्थ या किसी अन्य साधन के द्वारा व्यक्त नहीं हुई हो।
        वैज्ञानिक 'चेतना' के प्रश्न पर काफी लम्बे समय से अनुसन्धान करते आ रहे हैं और वे इस निष्कर्ष पर आ पहुंचे हैं कि हजारों साल पूर्व हमारे ऋषियों और मुनियों की तपस्या के परिणामस्वरूप जो निष्कर्ष सामने आये, वे असत्य नहीं हैं। वही धर्म की श्रेणी में रखे गए हैं। धर्म की दृष्टि में जो 'पराचेतना' है, वह सत्य है। मनुष्य का जाग्रत 'मन' उस 'विराट मन' का एक छोटा-सा हिस्सा है जिसका एक बड़ा अंश एक रहस्यमय आवरण में बराबर छिपा रहता है। वैज्ञानिकों ने उसी को 'परामन', 'अचेतन मन', 'उपचेतन मन' और 'पैरासाईकिक तत्व'  कहा है।
      आज का जन-मानस जो पाश्चात्य संस्कृति से और उपभोक्तावादी संस्कृति से बहुत गहराई से प्रभावित है, वह तबतक किसी आध्यात्मिक तथ्य को मानने के लिए तैयार नहीं होता जबतक कि उसे उन तथ्यों को वैज्ञानिक आधार पर न समझाया जाय।
       विज्ञान की दृष्टि में जगत् मानव से निरपेक्ष है .और मानव जगत् से। ऐसा मानने पर दोनों अपने-अपने स्थान पर निरर्थक हो जाते हैं। लेकिन आधुनिक युग में वैज्ञानिक जीवन और जगत् में अर्थ खोजना चाहते हैं। पर उनकी कठिनाई यह है कि इस दिशा में कदम बढ़ाते ही वे अपने आपको एक ऐसे क्षेत्र में पाते हैं, जहाँ उनके सभी वैज्ञानिक उपकरणों, सभी साधनों और सभी प्रयोगों की सीमा समाप्त हो जाती है और फिर उन्हें अपनी सीमाओं और फिर विराट के समक्ष अपने को असहाय होने का आभास हो जाता है। क्षुद्र है व्यक्ति का वैज्ञानिक ज्ञान, प्रयोग और प्रयत्न उस परम सत्ता के सामने।
      आधुनिक विज्ञान की एक सीमा तो यही है कि अभी तक पदार्थ की मूल इकाई 'इलेक्ट्रॉन' के विश्लेषण में वह नितान्त असमर्थ रहा है। वैज्ञानिक इलेक्ट्रॉन की मात्र कल्पना ही कर सकते हैं। उसे देखने के लिए उनके पास कोई किसी प्रकार न तो यंत्र है और न है कोई विधि ही। उनकी दृष्टि में इलेक्ट्रॉन उसी प्रकार रूपहीन है जैसे धर्म और अध्यात्म की दृष्टि में 'ब्रह्म' रूपहीन है। पदार्थ की ही भौतिक सत्ता को सर्वोपरि मानने वाले वैज्ञानिकों को जब पदार्थ की मूल इकाई इलेक्ट्रॉन की गतिविधि में किसी कार्य-कारण सम्बन्ध में सफलता नहीं मिली तो उन्हें यह स्वीकार करने को विवश होना पड़ा कि भौतिक सत्ता के परे शायद एक अभौतिक सत्ता भी है--एक शान्त, नीरव और चैतन्य सत्ता जिसमें प्रवेश कर् उन्हें उन उच्चतम वैज्ञानिक सत्यों का साक्षात्कार हो सकता है जो भौतिक और चेतना के स्तर पर नहीं हो पाया था। वह अभौतिक सत्ता बाह्य जगत् में नहीं, बल्कि स्वयम् मानव मन में है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यही क्षेत्र है परामनोविज्ञान का जिसकी ओर विज्ञान के कदम ठिठकते-झिझकते धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं।
      मनुष्य को मन के बारे में कुछ समय पहले तक कुछ भी नहीं मालूम था। मगर जब आधुनिक मनोविज्ञान का आविर्भाव हुआ, तभी वैज्ञानिकों को इस बात का पता चला कि मन के दो रूप हैं--चेतन और अचेतन। अचेतन, जो मन का दो तिहाई भाग् है, की क्रिया-कलापों से मनुष्य सर्वथा अपरिचित और अनभिज्ञ ही रहता है। परामनोविज्ञान का गहराई से अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों को ज्ञात हुआ कि अचेतन मन में विश्वास से परे 'अकल्पनीय शक्तियां' भरी पड़ी हैं जिनका अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन है। वे शक्तियां जब कभी अचेतन मन की सीमा लांघकर चेतन मन में प्रवेश करती हैं तो उनके अविश्वनीय कौतुक लोगों को एकबारगी हतप्रभ कर देते हैं। ऐसे ही कौतुक को हम 'दैवीय चमत्कार' कह देते हैं। लेकिन वे होती हैं अचेतन मन की असाधारण क्रियाएं ही जिन्हें समझने में हम लोग अभी असमर्थ हैं।

Shiv Ram Tiwari

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मंगलवार, 27 जुलाई 2021

क्या हैं शिव और शक्ति के अर्धनारीश्वर स्वरूप की महिमा

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क्या हैं शिव और शक्ति के अर्धनारीश्वर स्वरूप की महिमा और क्या महत्व है -'' प्रार्थना और प्रतीक्षा'' का?PART-01
 कौन है परब्रह्म ?

05 FACTS;-

1-हिन्दू शास्त्रों  के अनुसार ईश्वर एक है...उस परमतत्व को हम ब्रह्म, परात्पर शिव या परब्रह्म कहते है।इस सृष्टि को चलाने के के लिए दो वस्तुएँ जरूरी है,एक आधार और दूसरी शक्ति या प्रकृति, शिव आधार है और शक्ति वो ऊर्जा है जो इस  संसार को चलाती है... अलग अलग प्रकृति के स्वरूप से ।

2-शिव-शक्ति का संयोग ही परमात्मा (परब्रह्म) है।जब मनुष्य ईश्वर की और मुड़ता है और अपनी चेतना का स्तर ऊपर उठाता जाता है तब वो बाहर की दुनिया की सारी विविधता को अपने अंदर समाता जाता है, और वो एकत्व या अद्वैत की और बढ़ता जाता है। 

3-सत्-चित् और आनन्द–ईश्वर के तीन रूप हैं। इनमें सत्स्वरूप उनका मातृस्वरूप है, चित्स्वरूप उनका पितृस्वरूप है और उनके आनन्दस्वरूप के दर्शन अर्धनारीश्वररूप में ही होते हैं, जब शिव और शक्ति दोनों मिलकर पूर्णतया एक हो जाते हैं। सृष्टि के समय परम पुरुष अपने ही वामांग से प्रकृति को निकालकर उसमें समस्त सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं। शिव गृहस्थों के ईश्वर और विवाहित दम्पत्तियों के उपास्य देव हैं क्योंकि अर्धनारीश्वर शिव स्त्री और पुरुष की पूर्ण एकता की अभिव्यक्ति हैं।

4-संसार की सारी विषमताओं से घिरे रहने पर भी अपने मन को शान्त व स्थिर बनाये रखना ही योग है। भगवान शिव अपने पारिवारिक सम्बन्धों से हमें इसी योग की शिक्षा देते हैं। अपनी धर्मपत्नी के साथ पूर्ण एकात्मकता अनुभव कर, उसकी आत्मा में आत्मा मिलाकर ही मनुष्य आनन्दरूप शिव को प्राप्त कर सकता है।

 5-भगवान शिव कहते है ''जहाँ ना अमृत, ना विष। ना सुख, ना दुःख। ना स्वर्ग, ना नर्क। वहीँ परम आनंद है। उसी परम आनंद तक की यात्रा है तुम्हारी। यह यात्रा आनंद के सानिध्य की है। यह यात्रा सानिध्य के आनंद की है। इस यात्रा में; मैं प्रतिपल तुम्हारे साथ हूँ। मुझे ढूंढो मत, केवल पहचानो। तुम ही, मैं हूँ और मैं ही तुम। हर आरम्भ का मैं ही अंत हूँ और हर अंत का मैं ही आरम्भ हूँ।''

क्या अर्थ है ''शिव’' मंत्र का?-

06 FACTS;-

1-जीवन की बहुत गहन समझ के साथ हम उस ध्वनि या शब्द तक पहुंचे हैं, जिसे हम ‘शिव’ कहते हैं। इसका मानवीकरण / कहानी सिर्फ आपको इसके कई आयामों के बारे में समझाने के लिए है।इस ध्वनि में इतनी शक्ति है कि इसका... आपके ऊपर असाधारण असर हो सकता है।

2-यदि आपमें किसी चीज को ग्रहण करने की अच्छी क्षमता है, तो ये समझिए कि यह ध्वनि- शिव, आपके लिए एक विस्फोटक की तरह काम कर सकती है, सिर्फ एक उच्चारण आपके भीतर बहुत शक्तिशाली तरीके से विस्फोट कर सकता है।यह एक विज्ञान है जिसे हमने अपने भीतर एक बहुत गहन अनुभव से समझा है ..बहुत गहराई से उसे देखा है।

3-‘शि-व’ मंत्र में एक अंश उसे ऊर्जा देता है और दूसरा उसे संतुलित या नियंत्रित करता है। दिशाहीन ऊर्जा का कोई लाभ नहीं है, वह विनाशकारी हो सकती है। इसलिए जब हम ‘शिव’ कहते हैं, तो हम ऊर्जा को एक खास तरीके से, एक खास दिशा में ले जाने की बात करते हैं।

4-शिव में ‘शि’ ध्वनि का अर्थ मूल रूप से शक्ति या ऊर्जा होता है। भारतीय जीवन शैली में, हमने हमेशा से स्त्री गुण को शक्ति के रूप में देखा है। मजेदार बात यह है कि अंग्रेजी में भी स्त्री के लिए ‘शी’(she) शब्द का ही इस्तेमाल किया जाता है। शि का मूल अर्थ शक्ति या ऊर्जा है। लेकिन यदि आप सिर्फ “शि” का बहुत अधिक जाप करेंगे, तो वह आपको असंतुलित कर देगा। इसलिए इस मंत्र को मंद करने और संतुलन बनाए रखने के लिए उसमें “व” जोड़ा गया। “व” “वाम” से लिया गया है, जिसका अर्थ है प्रवीणता।

5-जब आप ‘शिव’ कहते हैं, तो इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। आज की दुनिया धर्म के आधार पर बंटी हुई है। इसके कारण आप जो कुछ भी बोलते हैं, उसे धर्म से जोड़ा जाता है। मगर यह धर्म नहीं, आंतरिक विकास का विज्ञान है। इसका मतलब ''परे जाना और मुक्ति पाना है'', चाहे आप कोई भी हों। अगर आप कोशिश करने को तैयार हैं, तो आपके माता-पिता ...जो भी थे या आप जिन सीमाओं के साथ पैदा हुए या जिन सीमाओं को अपना लिया, उन सब के परे आप जा सकते हैं।

6-भौतिक प्रकृति के नियमों को तोड़ना ही तो आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इस अर्थ में हम सभी नियमों को तोड़ने वाले लोग हैं, और शिव नियमों को तोड़ने में सर्वश्रेष्ठ  हैं, वे परम विध्‍वंसक हैं। आप शिव की पूजा नहीं कर सकते, पर भौतिक नियमों को तोड़कर उस असीम स्‍वरूप को जान सकते हैं, जो शिव हैं।

पुरुष और प्रकृति की समानता से होता है संसार में संतुलन;-

05 FACTS;-

1-शिव इस  सृष्टि का परम सत्य हैं और शिव ही सुंदर हैं।शिव मृत्युंजय’ हैं, तो शक्ति माता भुवनेश्वरी, त्रिपुर सुंदरी,काली, बगला, तारा हैं।

हर जीवात्मा के शरीर के आधार चक्र में शक्ति स्थापित हैं तो सिर के ऊपर सहस्रार में शिव बैठे हैं। परंतु वे नीचे नहीं उतरते, स्वयं शक्ति ही सारे चक्रों

का भेदन कर उनसे जा मिलती है।शिव शक्ति का प्रेम ही ऐसा है कि ये एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते।शिव त्रिकोण ऊर्ध्वमुख है,वहीं

शक्ति त्रिकोण अधोमुख है। शिव शक्ति की लीला तो परम आनंद प्रदान करती है।

 2-पुरुष और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित होने से ही सृष्टि सुचारु रूप से चल पाती है। शिव और शक्ति के प्रतीक शिवलिंग का यही अर्थ है। यहां शिव पुरुष के प्रतीक हैं, और शक्‍ति स्‍वरुप देवी पार्वती प्रकृति की। शिवलिंग के रूप में भगवान शिव बताते हैं कि पुरुष और प्रकृति के बीच यदि संतुलन न हो, तो सृष्टि का कोई भी कार्य भलीभांति संपन्न नहीं हो सकता है। जब शिव अपना भिक्षु रूप, तो शक्ति अपना भैरवी रूप त्याग कर समान्‍य घरेलू रूप धारण करती हैं, तब वे ललिता, और शिव-शंकर बन जाते हैं। इस संबंध में न कोई विजेता है और न कोई विजित है, दोनों का ही एक-दूसरे पर संपूर्ण अधिकार है, जिसे प्रेम कहते हैं।

4-माता पार्वती साधना के माध्यम से शिव के हृदय में करुणा और समभाव जगाना चाहती हैं।  उनकी साधना अन्य तपस्वियों की तपस्या से भिन्न है। सुर-असुर और ऋषि ईश्वर की प्राप्ति और अपनी इच्छापूर्ति के लिए तपस्या करते हैं।माता पार्वती किसी भी इच्छा या वरदान को परे रखकर ध्यान लगाती हैं। वे अपने व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि संसार के लाभ के लिए तपस्या करती हैं।

5-शिव पुराण के अनुसार, जब माता पार्वती शिव को पाने के लिए साधना करती हैं, तो शिव उन्हें ध्यान से देखते हैं। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सती ही पार्वती हैं। वे सोचते हैं कि यदि वे अपनी आंखे बंद कर लेंगे, तो वह काली में बदल जाएंगी और उनका रूप भयंकर हो जाएगा। अगर वे आंखें खोले रहेंगे, तो वह सुंदर और सुरूप गौरी बनी रहेंगी। इसके आधार पर वे यह बताना चाहते हैं कि अगर प्रकृति को ज्ञान की दृष्टि से न देखा जाए, तो वह डरावनी हो जाती है। यदि ज्ञान के साथ देखा जाए तो वह सजग और सुंदर प्रतीत होती है। वहीं माता पार्वती शिव को अपना दर्पण दिखाती हैं, जिसमें वे अपना शंकर (शांत) रूप देख पाते हैं।

क्या हैं शिव शक्ति रहस्य – शिवम ?-

09 FACTS;-

1-शिव शक्ति जब कृपा करते हैं, जीव सभी पाशों से मुक्त होकर सभी धर्मों, सभी रहस्यों को देख व समझ लेता है। कहीं विरोध नहीं, किसी का अपमान नहीं, कोई धर्म छोटा नहीं, सभी देव-देवी पूजनीय हैं।निराकार ब्रह्म जब साकार रूप धारण करता है, जब वह महाशून्य से प्रकट होकर सगुण रूप धारण करता है, तो शिव कहलाता है और उसकी शक्ति मां भगवती ही मूल आदि शक्ति के नाम से विख्यात है। जीव कई पाशों में बंधा है, वह आत्मदर्शन की चाह रखता है, आत्मा-परमात्मा के दर्शन की चाह रखता है, शिव और शक्ति साकार रूप धारण कर जीव का कल्याण करते हैं, उसकी अभिलाषा पूरी करते हैं।

2- मातृसत्ता की कृपा के बिना यह सृष्टि नहीं बन सकती, इसलिए संसार में जहां ‘म’ है वहीं पूर्णता है। राम में ‘म’, श्याम में ‘म’, प्रेम में ‘म’, आत्मा-परमात्मा में ‘म’, परंतु परमात्मा में दो म’ शिव शक्ति की एकता का बोध कराते हैं। भगवती के किसी भी बीजाक्षर में ‘म’ का उच्चारण बिंदु के बदले करने से विशेष मंत्र चैतन्य होता है। यह सृष्टि काल आधारित है इसलिए शिव महाकाल प्रथम और आद्या महाकाली प्रथमा ही मूल शक्ति हैं। शिव के अनेक रूप हैं जो महाकल्याणकारी हैं। वहीं आद्या शक्ति भी नाना रूपों में लीला करती हैं।  

3-शिव परम तत्व हैं परंतु उन्हें भी शक्ति प्रदान करने वाली, साथ रहने वाली आदि जगदंबा ही परब्रह्म परमेश्‍वरी हैं। शिव गुरु हैं, परमात्मा हैं। बिना इनकी कृपा के शक्ति को कौन जानेगा? जब जीवात्मा में शिव तत्व का प्रवेश होता है तभी जीव शक्ति को समझ पाता है। वेद, पुराण, तंत्र, शास्त्र आदि को पढ़कर अध्यात्म को नहीं समझा जा सकता है। इससे ज्ञान का विकास होगा, समझने की लालसा जगेगी, जानने की, देखने की तड़प पैदा होगी परंतु यह तो साधना है,जब शिव कृपा करेंगे तभी सही रास्ता मिलेगा। वैसे शिव शक्ति के पूर्ण रहस्य को जीव कभी नहीं जान सकता, वे बुद्धि, दृष्टि, ज्ञान से भी परे हैं।

 4-परमात्मा का पवित्र प्रणव बीज ऐं है। वहीं शक्ति का प्रणव ह्रीं है। शिव शक्ति के रहस्य की एक छोटी अनुभूति शिव का बीजाक्षर ह्रां, ह्रीं हैं। वहीं शक्ति के बीजाक्षर ह्रीं, क्रीं, श्रीं, ऐं, क्लीं आदि हैं। परंतु शिव ह्रां में राम ह्रीं में हरी (विष्णु) क्लीं में काली कृष्ण, श्रीं में लक्ष्मी, ऐं में गुरु और सरस्वती यही तो परम रहस्य है शिव शक्ति का। शिव का अपमान शक्ति सह नहीं पाईं, तो दक्ष यज्ञ मृत्यु यज्ञ बन गया। वहीं शक्ति का वियोग शिव सह नहीं पाए और शव लेकर विलाप करते हुए भटकने लगे। सृष्टि का नाश होने के भय से विष्णु को आना पड़ा। शिव शक्ति का प्रेम ही ऐसा है कि ये एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते।  

5-शक्ति शिव से मिलकर शांत होती है;-

02 POINTS;-

1-महाकाल महाकाली के नीचे लेटे हैं, शिव के लेटने का मूल कारण शक्ति के उग्र रूप से सृष्टि को बचाना है, वहीं कालिका के सौम्य रूप से सृजन कराना है। शिव को नीचे देख काली की उग्रता समाप्त हो गई। जो शिव के भक्त हैं उन्हें शक्ति को भी प्रसन्न करना पड़ेगा और जो शक्ति के उपासक हैं, उन्हें भी शिव को पूजना पड़ेगा- यही तो आखिरी सत्य है।

2-उपासना दक्षिण तथा वाम दोनों पद्धतियों से की जाती है। तंत्र शास्त्र कहता है कि वाम मार्ग योगियों के लिए भी कठिन है। यदि गुरु योग्य, तपस्वी व सच्चा नहीं हो, तो वाचाल, मांसाहारी, शराबी बन साधक भटक जाएगा। अतः दक्षिण मार्ग को अपनाना उचित है।सभी शिव या शक्ति रूपों की पूजन पद्धतियां, यंत्र मंत्र अलग-अलग हैं। वे साधक के कर्मानुसार फल देते हैं। शिव शक्ति कलातीत, शब्द ज्ञान से परे हैं।

6-शिव अर्धनारीश्‍वर;-

02 POINTS;-

शिव के अर्धनारीश्‍वर रूप में शक्ति उनके वाम भाग में विराजमान हैं, वहीं हरिहर रूप में वाम भाग में विष्णु विराजमान हैं। हर पुरुष में स्त्री छुपी होती है। उसी तरह हर स्त्री में पुरुष छुपा होता है। शक्ति भिन्न-भिन्न रूप धारण कर सृष्टि का संचालन करती है। शक्ति को हर जीव संभाल नहीं पाता परंतु शिव प्रेम हैं, परमात्मा हैं, सब कुछ हैं, इसी कारण शिव पिता व शक्ति माता हैं।

2-दोनों के प्रति प्रेम ही उच्च स्थिति प्राप्त कराता है। जीवन में शिव तत्व का विकास हो, उनका नियम, उनका गुण आ जाए, तो शक्ति स्वयं शिव से मिलन करती हैं- यही तो रहस्य है कुण्डलिनी शक्ति का। साधक जब निष्ठा पूर्वक ध्यान, योग, जप करता है, तो कुंडलिनी सारे चक्र को भेदकर शिव से मिलन कर ही लेती है। शिव और शक्ति के अनेक रूप धारण करने का यही रहस्य है। व्यक्ति को शिव और शक्ति की उपासना का ज्ञान गुरु के मार्ग दर्शन से प्राप्त होता है।

7-मिलन रहस्य;-

02 POINTS;-

1-शिव त्रिकोण ऊर्ध्वमुख है, वहीं शक्ति त्रिकोण अधोमुख है। शिव शक्ति की लीला तो परम आनंद प्रदान करती है। काली के नीचे शिव, तारा के माथे पर शिव, बगला के आगे शिव। वियोग में शक्ति आंसू बहाती हैं, वहीं सीता शोक में विलाप कर रही हैं, वहीं पार्वती घोर तप कर रही हैं, राम रो रहे हैं, श्याम भी रो रहे हैं और सती के लिए शिव भी रो रहे हैं। भक्त भी रोते हैं, साधु भी रोते हैं, पापी भी रोते हैं अपनी बर्बादी पर।

2-माता-पिता भी रोते हैं संतान के लिए, संतान भी रोती है, सभी रोते हैं। परंतु जो शिव शक्ति के लिए रोता है, वही इस जीवन में कुछ पा सकता है। शिव सहस्रार में मूल शक्ति के लिए रोता है तभी तो शक्ति दौड़कर भागी-भागी जीव के लिए शिव के पास पहुंच जाती हैं। नकली आंसू से कुछ नहीं होगा, शिव ही भाव देंगे, आंसू देंगे, शरण देंगे। तभी कुछ हो पाएगा। शिव शीघ्र सभी कुछ प्रदान करते हैं।

8-शिव लेते हैं हमारा विष;-

07 POINTS;-

1-शिव पिता हैं, गुरु हैं, परमात्मा हैं। शिव सिर्फ अमतृ देते हैं, लेते हैं हमारा विष, हमारे पाप, हमारे ताप। तभी तो हम शुद्ध, बुद्ध होकर परम पद को प्राप्त करते हैं, और शक्ति तो सब के पीछे, सबके कल्याण हेतु तत्पर रहती हैं। वह सबकी स्वामिनी हैं और जो शक्ति हैं वही शिव हैं और जो शिव हैं वही शक्ति हैं। दोनों में कोई भेद नहीं है। इन दोनों के परम लाड़ले हैं गणेश और कार्तिकेय।

2-अपनी इच्छा से संसार की सृष्टि के लिए उद्यत हुए महेश्वर का जो प्रथम परिस्पंद है, उसे शिवतत्व कहते हैं। यही इच्छाशक्ति तत्व है, क्योंकि संपूर्ण कृत्यों में इसी का अनुवर्तन होता है। ज्ञान और क्रिया, इन दो शक्तियों में जब ज्ञान का आधिक्य हो, तब उसे सदाशिवतत्व समझना चाहिए, जब क्रियाशक्ति का उद्रेक हो तब उसे महेश्वर तत्व जानना चाहिए तथा जब ज्ञान और क्रिया दोनों शक्तियां समान हों तब वहां शुद्ध विद्यात्मक तत्व समझना चाहए।

3-जब शिव अपने रूप को माया से निग्रहीत करके संपूर्ण पदार्थों को ग्रहण करने लगता है,

तब उसका नाम पुरुष होता है।शक्ति को जाग्रत करें, शिव भाव में मिलन करा दें। यही शिव

और शक्ति साधना का स्वरूप हैं।अगर आप भौतिकता से थोड़ा आगे जाएं, तो सब कुछ शून्य हो जाता है। शून्य का अर्थ है पूर्ण खालीपन, एक ऐसी स्थिति जहां भौतिक कुछ भी नहीं है। जहां भौतिक कुछ है ही नहीं, वहां आपकी ज्ञानेंद्रियां भी बेकाम की हो जाती हैं। अगर आप शून्य से परे जाएं, तो आपको जो मिलेगा, उसे हम शिव के रूप में जानते हैं।

4-शिव का अर्थ है, जो नहीं है। जो नहीं है, उस तक अगर पहुंच पाएंगे, तो आप देखेंगे कि इसकी प्रकृति भौतिक नहीं है। इसका मतलब है इसका अस्तित्व नहीं है, पर यह धुंधला है, अपारदर्शी है। ऐसा कैसे हो सकता है? यह आपके तार्किक दिमाग के दायरे में नहीं है। आधुनिक विज्ञान मानता है कि इस पूरी रचना को इंसान के तर्कों पर खरा उतरना होगा, लेकिन जीवन को देखने का यह बेहद सीमित तरीका है। संपूर्ण सृष्टि मानव बुद्धि के तर्कों पर कभी खरी नहीं उतरेगी।

5-आपका दिमाग इस सृष्टि में फिट हो सकता है, यह सृष्टि आपके दिमाग में कभी फिट नहीं हो सकती। तर्क इस अस्तित्व के केवल उन पहलुओं का विश्लेषण कर सकते हैं, जो भौतिक हैं। एक बार अगर आपने भौतिक पहलुओं को पार कर लिया, तो आपके तर्क पूरी तरह से उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर होंगे।

 6-जिस चीज को साबित करने के लिए वैज्ञानिकों ने खरबों डॉलर के यंत्र बनाए, उसी चीज को आपके भीतर आपके अपने अनुभवों में साबित किया जा सकता है, बशर्ते आप इस जीवन की गहराई में उतरने को इच्छुक हों। अगर आप गहराई से देखें तो आप पाएंगे कि इस ब्रह्मांड की हर चीज के बारे में अनुमान के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है। यहां तक कि विज्ञान भी अनुमान के आधार पर ही निष्कर्ष निकाल रहा है।

7-भौतिक से परे होने के कारण शून्य तत्व को सीधे तौर पर दर्शाया नहीं जा सकता। यही कारण है कि योगिक विज्ञान ने हमेशा कहानियों के माध्यम से इसकी ओर इंगित किया है। शिव और शक्ति का मेल, या आभूषणों और अलंकारों से सजा शिव का रूप... इसी शून्य की ओर संकेत करते हैं।  

9-शिव और शक्ति की क्रीड़ा;-

04 POINTS;-

1-योगिक विज्ञान में भगवान शिव को रूद्र कहा जाता है। रूद्र का अर्थ है वह जो रौद्र या भयंकर रूप में हो। शिव को सृष्टि -कर्ता भी कहा जाता है।शिव के इन्हीं दोनों पक्षों के मेल को

ही विज्ञान बिग-बैंग का नाम दे रहा है।आजकल वैज्ञानिक कह रहे हैं कि हर चीज डार्क मैटर से आती है साथ ही उन्होंने डार्क एनर्जी के बारे में भी बात करना शुरू कर दिया है। योग में हमारे पास दोनों मौजूद हैं - डार्क मैटर भी और डार्क एनर्जी भी। यहां शिव को काला माना गया है यानी डार्क मैटर और शक्ति का प्रथम रूप या डार्क एनर्जी को काली कहा जाता है।

 2-वैज्ञानिको को लगता था कि डार्क मैटर और डार्क एनर्जी ये चीजें अलग-अलग हैं।अब वैज्ञानिक कहते हैं  कि डार्क मैटर और डार्क एनर्जी के बीच एक तरह का लिंक है ...कि वे

एक दूसरे से जुड़ी हैं।योग सृष्टि को भीतर से समझाता है। यह एक तार्किक संस्कृति है।

इसकी शब्दावली की  अपनी एक खास पहचान है, क्योंकि यह एक ऐसे पहलू के बारे में बात कर रही है जो हमारी तार्किक समझ के दायरे में नहीं है। लेकिन इसे तार्किक ढंग से  समझना ज्यादा अच्छा है। तो कहानी कुछ इस तरह से है ...शिव सो रहे हैं। जब हम यहां शिव कहते हैं तो हम किसी व्यक्ति या उस योगी के बारे में बात नहीं कर रहे हैं, यहां शि-व का मतलब है “वह जो है ही नहीं”। जो है ही नहीं, वह सिर्फ सो सकता है। इसलिए शिव को हमेशा ही डार्क बताया गया है।

3-शिव सो रहे हैं और शक्ति उन्हें देखने आती हैं। वह उन्हें जगाने आई हैं क्योंकि वह उनके साथ नृत्य करना चाहती हैं, उनके साथ खेलना चाहती हैं और उन्हें रिझाना चाहती हैं। शुरू में वह नहीं जागते, लेकिन थोड़ी देर में उठ जाते हैं। मान लीजिए कि कोई गहरी नींद में है और आप उसे उठाते हैं तो उसे थोड़ा गुस्सा तो आएगा ही, बेशक उठाने वाला कितना ही सुंदर क्यों न हो। अत: शिव भी गुस्से में गरजे और तेजी से उठकर खड़े हो गए। उनके ऐसा करने के कारण ही उनका पहला रूप और पहला नाम 'रुद्र' पड़ गया। रुद्र शब्द का अर्थ होता है – दहाडऩे वाला, गरजने वाला।

4-एक वैज्ञानिक से बिग बैंग के धमाकों के बारे में पूछा –'' क्या केवल एक ही धमाका था या यह लगातार होने वाली प्रक्रिया थी''?वह कुछ सोचकर बोला..''यह एक धमाका नहीं हो सकता, यह धमाका एक पल से ज्यादा लंबा चला होगा''।अगर कई धमाकें हों, तो वह एक गर्जना जैसी होगी।अगर धमाकों की एक श्रृंखला बन जाए तो वह ऐसे ही होगा, जैसे किसी इंजन की आवाज हो। यह एक गर्जना जैसा  ही है ...जैसे कि शिव हुंकार भरकर खड़े हो गए हों।

क्या महत्व है -'' प्रार्थना और प्रतीक्षा'' का?-

08 FACTS;-

1- शिव-सूत्र का प्रारंभ  ''ॐ स्वप्रकाश आनंदस्वरूप भगवान शिव को

नमन'' से  होता है। वास्तव में,जीवन-सत्य की खोज दो मार्गों से हो सकती है। एक पुरुष का मार्ग है-आक्रमण का, हिंसा का, छीन-झपट का,

प्रतिक्रमण का।विज्ञान  पुरुष का मार्ग है; विज्ञान आक्रमण है। धर्म स्त्री  

का मार्ग है; धर्म नमन है।इसलिए  सभी शास्त्र परमात्मा को नमस्कार से शुरू होते हैं। वह नमस्कार   केवल एक परंपरा और रीति नहीं है। वह नमस्कार इंगित है कि.. मार्ग समर्पण का है, और जो विनम्र हैं, केवल वे ही उपलब्ध हो सकेंगे।

2-और, जो आक्रामक है; अहंकार से भरे हैं; जो सत्य को भी छीन-झपट

कर पाना चाहते हैं; जो सत्य के भी मालिक होने की आकांक्षा रखते हैं; जो परमात्मा के द्वार पर एक सैनिक की भाँति पहुँचे हैं-विजय करने, वे हार जाएँगे। वे क्षुद्र को भला छीन-झपट लें, विराट उनका न हो सकेगा।   

इसलिए विज्ञान व्यर्थ को खोज लेता है, सार्थक चूक जाता है। मिट्टी, पत्थर, पदार्थ के संबंध में जानकारी मिल जाती है, लेकिन आत्मा और परमात्मा की जानकारी छूट जाती है।

3-जो लोग परमात्मा की  तरफ,आक्रमक की तरह जाते हैं ;वे परमात्मा 

के शरीर पर भला कब्जा कर लें अथार्त प्रकृति पर, जो दिखाई पड़ता है.. जो दृश्य है-उसकी चीर-फाड़ कर, विश्लेषण करके, उसके कुछ राज खोल लें, लेकिन उनकी खोज वैसी ही क्षुद्र होगी, जैसे किसी पुरुष ने किसी स्त्री से जबरदस्ती विवाह किया हो ..स्त्री का शरीर तो उपलब्ध हो जाएगा, लेकिन वह उपलब्धि दो कौड़ी की है; क्योंकि उसकी आत्मा को वह छू भी न पायेगा और अगर उसकी आत्मा को न छूआ, तो उसके भीतर प्रेम की जो संभावना थी-वह जो प्रेम बीज छिपा था -वह कभी अँकुरित न होगा। उसकी प्रेम की वर्षा उसे न मिल सकेगी।

4-विज्ञान प्रकृति पर हमला है; जैसे कि प्रकृति कोई शत्रु हो; जैसे कि उसे जीतना है, पराजित करना है। इसलिए विज्ञान तोड़-फोड़ में भरोसा करता है-विश्लेषण 'तोड़-फोड़ 'है।अगर वैज्ञानिक से पूछो कि फूल सुंदर है,

तो तोड़ेगा फूल को, काटेगा, जाँच-पड़ताल करेगा; लेकिन उसे पता नहीं है कि तोड़ने में ही सौन्दर्य खो जाता है। सौन्दर्य तो पूरे में था। खंड-खंड में सौंदर्य न मिलेगा। हाँ, रासायनिक तत्त्व मिल जाएगा।

 5-तुम बोतलों में अलग-अलग फूल से खंड़ों को इकट्ठा करके लेबल लगा दोगे। तुम कहोगे-ये कैमिकल्स हैं, ये पदार्थ हैं, इनसे मिलकर फूल बना था। लेकिन तुम एक भी ऐसी बोतल न भर पाओगे, जिसमें तुम कह सको कि यह सौंदर्य है, जो फूल में भरा था। सौन्दर्य तिरोहित हो जाएगा। अगर तुमने फूल पर आक्रमण किया तो फूल की आत्मा तुम्हें न मिलेगी, शरीर ही मिलेगा। 

6-विज्ञान इसीलिए आत्मा में भरोसा नहीं करता। भरोसा करे भी कैसे ?

इतनी चेष्टा के बाद भी आत्मा की कोई झलक नहीं मिलती। झलक नहीं मिलेगी ..  इसलिए नहीं कि आत्मा नहीं है, बल्कि तुमने जो ढंग चुना है, वह आत्मा को पाने का ढंग नहीं है। तुम जिस द्वार से प्रवेश किए हो, वह क्षुद्र को पाने का ढंग है। 'आक्रमण से', जो बहुमूल्य है, वह नहीं मिल सकता। 

7-जीवन का रहस्य तुम्हें मिल सकेगा, अगर नमन के द्वार से तुम गए। अगर तुम झुके, तुमने प्रार्थना की, तो तुम प्रेम के केन्द्र तक पहुँच पाओगे। उसके पास अति प्रेमपूर्ण, अति विनम्र, प्रार्थना से भरा हृदय चाहिए। और वहाँ 'जल्दी' नहीं है। तुमने जल्दी की, कि तुम चूके। वहाँ बड़ा धैर्य चाहिए। तुम्हारी जल्दी और उसका हृदय बंद हो जाएगा। क्योंकि जल्दी भी आक्रमण की खबर है।

8-इसलिए जो परमात्मा को खोजने चलते हैं, उनके जीवन का ढंग दो शब्दों में समाया हुआ है- ''प्रार्थना और प्रतीक्षा''। प्रार्थना से शास्त्र शुरू होते हैं और प्रतीक्षा पर पूरे होते हैं।इसलिए प्रार्थना से खोज शुरू होती है।इस नमन को बहुत गहरे उतर जाने दें। sabhar China nanda Facebook wall




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हमारा शरीर ब्रह्मांड की एक ईकाई है

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शरीर के भीतर के 28 प्राणों को जानकर रह जाएंगे हैरान         हमारा शरीर ब्रह्मांड की एक ईकाई है। जैसा ऊपर, वैसा नीचे। जैसा बाहर, वैसा भीतर। संपूर्ण ब्रह्मांड को समझने के बजाय यदि आप खुद के शरीर की संवरचना को समझ लेंगे तो ब्राह्मांड और उसके संचालित होने की प्रक्रिया को भी समझ जाएंगे। यहां प्रस्तुत है शरीर में स्थित प्राण की स्थिति के बारे में।

प्राण के निकल जाने से व्यक्ति को मृत घोषित किया जाता है। यदि प्राणायाम द्वारा प्राण को शुद्ध और दीर्घ किया जा सके तो व्यक्ति की आयु भी दीर्घ हो जाती है। प्राण के विज्ञान को जरूर समझें। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता है तो पूर्णत: श्वास छोड़ देता है। प्राण जिस आयाम से आते हैं उसी आयाम में चले जाते हैं। हाथी, व्हेल और कछुए की आयु इसलिए अधिक है क्योंकि उनके श्वास प्रश्वास की गति धीमी और दीर्घ है।

वैदिक विज्ञान के अनुसार :
जिस तरह हमारे शरीर के बाहर कई तरह की वायु विचरण कर रही है उसी तरह हमारे शरीर में भी कई तरह की वायु विचरण कर रही है। वायु है तो ही प्राण है। अत: वायु को प्राण भी कहा जाता है। वैदिक ऋषि विज्ञान के अनुसार कुल 28 तरह के प्राण होते हैं। प्रत्येक लोक में 7-7 प्राण होते हैं।
जिस तरह ब्राह्माण में कई लोकों की स्थिति है जैसे स्वर्ग लोक (सूर्य या आदित्य लोक), अं‍तरिक्ष लोक (चंद्र या वायु लोक), पृथिवि (अग्नि लोक) लोक आदि, उसी तरह शरीर में भी कई लोकों की स्थिति है।

शरीर में कंठ से दृदय तक सूर्य लोक, दृदय से नाभि तक अंतरिक्ष लोक, नाभि से गुदा तक पृथिवि लोक की स्थिति बताई गई है। अर्थात हमारे शरीर की स्थिति भी बाहरी लोकों की तरह है। यही हम पृथिति लोक की बात करें तो इस अग्नि लोक भी कहते हैं। नाभि से गुदा तक अग्नि ही जलती है। उसके उपर दृदय से नाभि तक वायु का अधिकार है और उससे भी उपर कंठ से हृदय तक सूर्य लोक की स्थिति है। कंठ से उपर ब्रह्म लोक है।

कंठ से गुदा तक शरीर के तीन हिस्से हैं। उक्त तीन हिस्सों या लोकों में निम्नानुसार 7,7 प्राण हैँ। कंठ से गुदा तक शरीर के तीन हिस्से हैं। उक्त तीन हिस्सों या लोकों में निम्नानुसार 7,7 प्राण है। ये तीन हिस्से हैं- कंठ से हृदय तक, हृदय से नाभि तक और नाभि से गुदा तक। पृथिवि लोक को बस्ती गुहा, वायुलोक को उदरगुहा व सूर्यलोक को उरोगुहा कहा है। इन तीनोँ लोको मेँ हुए 21 प्राण है।

पांव के पंजे से गुदा तक तथा कंठ तक शरीर प्रज्ञान आत्मा ही है, किंतु इस आत्मा को संचालन करने वाला एक और है- वह है विज्ञान आत्मा। इसको परमेष्ठी मंडल कहते हैं। कंठ से ऊपर विज्ञान आत्मा में भी 7 प्राण हैँ- नेत्र, कान, नाक छिद्र 2, 2, 2 तथा वाक (मुंह)। यह 7 प्राण विज्ञान आत्मा परमेष्ठी में हैँ।

अब परमेष्ठी से ऊपर मुख्य है स्वयंभू मंडल जिसमें चेतना रहती है यही चेतना, शरीर का संचालन कर रही है अग्नि और वायु सदैव सक्रिय रहते हैं। आप सो रहे है कितु शरीर मेँ अग्नि और वायु (श्वांस) निरंतर सक्रिय रहते हैं। चेतना, विज्ञान आत्मा ही शरीर आत्मा का संचालन करती है। परमेष्ठी में ठोस, जल और वायु है। यही तीनों, पवमान सोम और वायव्यात्मक जल हैं। इन्हीं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन कहते हैं जल और वायु की अवस्था 3 प्रकार की है अत:जीव भी तीन प्रकार अस्मिता, वायव्य और जलज होते हैं। चेतना को भी लोक कहा है। इसे ही ब्रह्मलोक, शिवलोक या स्वयंभूलोक कहते हैं। ब्रह्मांड भी ऐसा ही है।

योग विज्ञान के अनुसार :
'प्राण' का अर्थ योग अनुसार उस वायु से है जो हमारे शरीर को जीवित रखती है। शरीरांतर्गत इस वायु को ही कुछ लोग प्राण कहने से जीवात्मा मानते हैं। इस वायु का मुख्‍य स्थान हृदय में है। इस वायु के आवागमन को अच्छे से समझकर जो इसे साध लेता है वह लंबे काल तक जीवित रहने का रहस्य जान लेता है। क्योंकि वायु ही शरीर के भीतर के पदार्थ को अमृत या जहर में बदलने की क्षमता रखती है।

हम जब श्वास लेते हैं तो भीतर जा रही हवा या वायु मुख्यत: पांच भागों में विभक्त हो जाती है या कहें कि वह शरीर के भीतर पांच जगह स्थिर और स्थित हो जाता हैं। लेकिन वह स्थिर और स्थित रहकर भी गतिशिल रहती है।

ये पंचक निम्न हैं- (1) व्यान, (2) समान, (3) अपान, (4) उदान और (5) प्राण।

वायु के इस पांच तरह से रूप बदलने के कारण ही व्यक्ति की चेतना में जागरण रहता है, स्मृतियां सुरक्षित रहती है, पाचन क्रिया सही चलती रहती है और हृदय में रक्त प्रवाह होता रहता है। इनके कारण ही मन के विचार बदलते रहते या स्थिर रहते हैं। उक्त में से एक भी जगह दिक्कत है तो सभी जगहें उससे प्रभावित होती है और इसी से शरीर, मन तथा चेतना भी रोग और शोक से घिर जाते हैं। मन-मस्तिष्क, चरबी-मांस, आंत, गुर्दे, मस्तिष्क, श्वास नलिका, स्नायुतंत्र और खून आदि सभी प्राणायाम से शुद्ध और पुष्ट रहते हैं। इसके काबू में रहने से मन और शरीर काबू में रहता है।

1.व्यान:- व्यान का अर्थ जो चरबी तथा मांस का कार्य करती है।
2.समान:- समान नामक संतुलन बनाए रखने वाली वायु का कार्य हड्डी में होता है। हड्डियों से ही संतुलन बनता भी है।
3.अपान:- अपान का अर्थ नीचे जाने वाली वायु। यह शरीर के रस में होती है।
4.उदान:- उदान का अर्थ उपर ले जाने वाली वायु। यह हमारे स्नायुतंत्र में होती है।
5.प्राण:- प्राण वायु हमारे शरीर का हालचाल बताती है। यह वायु मूलत: खून में होती है।

प्राणायाम करते या श्वास लेते समय हम तीन क्रियाएं करते हैं- 1.पूरक 2.कुम्भक 3.रेचक। उक्त तीन तरह की क्रियाओं को ही हठयोगी अभ्यांतर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और बाह्य वृत्ति कहते हैं। अर्थात श्वास को लेना, रोकना और छोड़ना। अंतर रोकने को आंतरिक कुम्भक और बाहर रोकने को बाह्म कुम्भक कहते हैं।

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जीव शरीर में कहां रहता है

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जीव शरीर में कहां रहता है ?   कहाँ उत्पन्न होता है ?  मृत्यु के अनन्तर कहाँ रहता है ?  जाकर कहाँ ठहरता है ?

"शिव-गीता"  में श्रीराम जी के इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए भगवान् शंकर कहते हैं ------

"राम !  मैं सत्य-ज्ञानस्वरूप ,  अनन्त-परमानन्दस्वरूप हूँ ।

व्यक्त - अव्यक्त का कारण ,  नित्य - विशुद्ध - सर्वात्मा - निर्लेप - सर्वधर्म रहित -  मन से अग्राह्य हूँ ,  किन्तु ऐसा होने पर भी अविद्या अथवा अन्तःकरण से मिलकर शरीर में रहता हूँ ।

५ कर्मेन्द्रियां ,  ५ ज्ञानेन्द्रियां  तथा अन्तःकरण चतुष्टय से मिलकर मैं जीव-भाव को प्राप्त हुआ हूँ  ।

मैं अत्यन्त निर्मल होने पर भी मलिन रूप से प्रतीत होता हूं ,  जिस प्रकार दर्पण मलिन होने पर मुख भी मलिन दिखता है ,  उसी प्रकार अन्तःकरण रूपी दर्पण में मलिनता के कारण आत्मा मलिन प्रतीत होता है ।

वह शरीर में कहां रहती है ?  इसको कहता हूं ---

सुनो !  हृदयरूपी कमल में एक अधोमुखी सूक्ष्म छिद्र है , उसके दहराकाश में ,  यानी ह्रदय में स्थित आकाश में ।

अब सगुण - ब्रह्म  के उपासकों के क्रममुक्ति तथा नाड़ियों के विस्तार को बताते हुए शंकर जी कहते हैं ----

कदम्ब - पुष्प में विद्यमान केसर के समान नाड़ियां हृदय से निकल कर सारे शरीर में फैली है ,  इन नाड़ियों में से अत्यन्त सूक्ष्मतम हिता नाम की नाड़ी है ।

योगियों ने बहत्तर हजार नाड़ियां बताई है , वे सब नाड़ियां हृदय - कमल से निकल कर वैसे ही फैलता है ,  जैसे सूर्यमण्डल से निकली सूर्य की किरणें फैलती है ।

इनमें १०१ मुख्य नाड़ियां हैं ।

जैसे नदियों में जल भरा रहता है , वैसे ही इन नाड़ियों में कर्मफल रूपी जल भरा रहता है , इनमें से एक नाड़ी सीधी ब्रह्मरन्ध्र तक गई है ।

प्रत्येक इन्द्रिय से १० - १०  नाड़ियां  निकल कर विषयोन्मुखी होती हैं ,  ये नाड़ियां आनन्द-प्राप्ति का कारण है तथा स्वप्न आदि का फल भोगने के लिए है ।

उनमें से एक सुषुम्ना नाम की नाड़ी है , उसमें चित्तवृत्ति को समाहित करने वाला योगी मुक्ति प्राप्त करता है ,  दोनों की उपाधि से युक्त चैतन्य को विद्वान् जीव कहते हैं ।

अब यहां शंका होती है कि  यदि सुषुम्ना के निर्गमन से ही मोक्ष होता है तो ज्ञान से मुक्ति का प्रतिपादन करने वाली श्रुतियां तथा स्मृतियां निरर्थक हो जाएंगी ,  क्योंकि  "ज्ञानादेव कैवल्यम् प्राप्यते येन मुच्यते"  अर्थात् ज्ञान से ही कैवल्य मुक्ति प्राप्त होती है , जिससे जीव का जन्म - मरण का बन्धन टूट जाता है ।

तो इसका उत्तर देते हुए कहा है कि कामादि दोष से रहित अन्तःकरण ही ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ है ।

जीव - दशा में मुक्ति नहीं होती , किन्तु सुषुम्ना के ब्रह्मरन्ध्र में कुण्डलिनी के जाग्रत होने से जीव को ब्रह्मादि लोकों की प्राप्ति  (गौण-मुक्ति)  होती है , मुख्य कैवल्य मुक्ति नहीं ,  अतः ज्ञान से मुक्ति का प्रतिपादन करने वाली श्रुति-स्मृति से विरोध नहीं है ।

जैसे अदृश्य होने पर भी सूर्य-चन्द्र-ग्रहण पर राहु का दर्शन होता है , प्रथम नहीं ;   वैसे सवव्यापी आत्मा होने पर भी सूक्ष्म-शरीर में दिखता है ।

जैसे घट-दर्शन से घटाकाश का दर्शन होता है तथा घट को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने से घटाकाश जाता हुआ प्रतीत होता है ,  वैसे ही सूक्ष्म शरीर के चले जाने पर आत्मा जाता हुआ प्रतीत होता है ।

इस विषय को समझने के लिए वेदान्त की प्रक्रिया समझ लेनी चाहिए ,  एक चैतन्य के होने पर भी उपाधि भेद से चैतन्य अनेक है ,  किन्तु प्रधान रूप से तीन प्रकार का है ------

१ -- प्रमाता-चैतन्य  ==  "प्रकर्षेण ज्ञाता इति प्रमाता" -- अर्थात् अन्तःकरण से मिला चैतन्य , जानने वाला चैतन्य प्रमाता-चैतन्य है ।

२ --  प्रमाण-चैतन्य  ==  अन्तःकरण की वृत्ति में विद्यमान चैतन्य प्रमाण-चैतन्य है ।

३ -- विषय-चैतन्य  ==  अन्तःकरण से निकल कर आंखादि इन्द्रियों से मिलकर जब चैतन्य जिस इन्द्रिय से सबन्धित होकर देखता है ,  सुनता है --- इन्द्रियों से निकल कर विषयों तक पहुँचने वाली अन्तःकरण की वृत्ति विषय-चैतन्य है ।

जब समान देश-काल में वृत्यवछिन्न चैतन्येन्द्रियों द्वारा विषय के पास जाकर विषय को व्याप्त करके चैतन्याकार होते हैं , तब घटादि पदार्थों का ज्ञान होता है --- इस प्रकार वेदान्त की प्रक्रिया  है ।

प्रमाण अनेकों है ==  प्रत्यक्ष - अनुमान - अर्थापत्ति आदि 

इनमें अनुमान प्रमाण से जैसे पर्वत पर धुआं देखकर अनुमान होता है कि वहाँ अग्नि है ।

"धूमत्वात्" -- धूम-युक्त होने से ,  जहां-जहां धुआं है , वहां-वहां आग है ।

जैसे स्वप्न का जगत् मिथ्या होने पर भी प्रतीत होता है , ऐसे ही जाग्रत भी तुरीया में मिथ्या प्रतीत होता है , स्वप्न का जगत् स्वप्न व स्वप्न के साक्षी तैजस का वासना मात्र है ।

जिस प्रकार दिन का थका हुआ पक्षी रात्रि में अपने पंखों को समेट कर विश्राम करता है , उसी प्रकार जाग्रत में तथा स्वप्न में थका हुआ जीव-रूपी पक्षी भी अपनी वृत्ति रूपी पंखों को समेट कर सुषुप्ति में विश्राम करता है ।

गाढ़ - सुषुप्ति  अविद्या की वृत्ति से होती है , उसमें अनुभव करता है ---- "मैं सुख से सोया था , कुछ भी नही जाना ।"

राम !   स्वयंप्रकाश देहातीत आत्मा का स्वरूप मैंने तुम्हारे सामने कहा , वह तीन गुण , तीनों शरीरों से परे , शुद्ध सच्चिदानंद स्वरूप है ,  वही हम दोनों में अभेद रूप से है ।

श्री शंकराचार्य वेद वेदांत विज्ञान sabhar satsang Facebook wall

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शिवलिंग के वैज्ञानिक तथ्य

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अगर आप गौर से #भाभा_एटॉमिक_रिसर्च_सेंटर (मुंबई) के #न्यूक्लियर_रिएक्टर की संरचना को देखें तो आप पाएंगे की #शिवलिंग_और_न्यूक्लियर_रिएक्टर में काफी समानताएं हैं।

दोनों की संरचनाएं भी एक सी हैं दोनों ही कहीं न कहीं उर्जा से संबंधित हैं। शिवलिंग पर लगातार जल प्रवाहित करने का नियम है। 

देश में, ज्यादातर शिवलिंग वहीं पाए जाते हैं जहां जल का भंडार हो, जैसे नदी, तालाब, झील इत्यादि। विश्व के सारे न्यूक्लियर प्लांट भी पानी (समुद्र) के पास ही हैं।

शिवलिंग की संरचना बेलनाकार होती है और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (मुंबई) की रिएक्टर की संरचना भी बेलनाकार ही है। न्यूक्लियर रिएक्टर को ठंडा रखने के लिये जो जल का इस्तेमाल किया जाता है उस जल को किसी और प्रयोग में नहीं लाया जाता। उसी तरह शिवलिंग पर जो जल चढ़ाया जाता है उसको भी प्रसाद के रूप में ग्रहण नहीं किया जाता है।

शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती है। जहां से जल निष्कासित हो रहा है, उसको लांघा भी नहीं जाता है। 

ऐसी मान्यता है की वह जल आवेशित (चार्ज) होता है। उसी तरह से जिस तरह से न्यूक्लियर रिएक्टर से निकले हुए जल को भी दूर ऱखा जाता है।

भारत का #रेडियोएक्टिविटी_मैप उठा कीजिये तो आप हैरान हो जाओगे की भारत सरकार के नुक्लिएर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योत्रिलिंगो के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है | 

शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं तभी उन पर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे। 

महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं | 

क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता | भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है | शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिल कर औषधि का रूप ले लेता है |

ऐसी मान्यता है कि वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की ही आकृति है। जिस तरीके से लगातार उर्जा देते रहने से न्यूक्लियर रिएक्टर गर्म हो जाता हैतथा उसको ठंडा रखने के लिये जल की जरूरत है उसी तरह शिवलिंग को भी जल की जरूरत होती है। 🔱🔱

ऐसा माना जाता है की शिवलिंग (ब्रह्मांड) भी एक उर्जा का स्रोत है जिससे लगातार उर्जा निकलती रहती है। लोग श्रद्धा से बेल का पत्ता शिवलिंग पर चढ़ाते हैं| 🔱🔱

वैज्ञानिक शोध से ये ज्ञात हुआ है की बेल के पत्तों में रेडियो विकिरण रोकने की क्षमता है।

प्राचीन कल में लोगशिवलिंग को उर्जा अथवा विकिरण का स्रोतमानकर उस पर जल एवं बेल पत्तों को चढ़ाते थे।

ऐसा भी माना जाता है की सोमनाथ के मंदिर के शिवलिंग में “स्यामन्तक” नामक एक पत्थर को हमारे पूर्वजों ने छुपा के रखा था।इसके बारे में धारणा है की ये रेडियोएक्टिव भी था। 

यह भी माना जाता हैं गजनी ने इस पत्थर को प्राप्त करने के लिये सोमनाथ के मंदिर पर कई बार हमला किया था।

एक कथा यह भी प्रचलित थी कि इस पत्थर से किसी भी धातु को सोना में बदला जा सकता था। शायद इसी कारण से लोग सोमनाथ के शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते थे ताकि विकिरण का प्रभाव कम हो सके।प्रथा आज भी प्रचलित है।

हम अपने दैनिक जीवन में भी देख सकते है की जब भी किसी स्थान पर अकस्मात उर्जा का उत्सर्जन होता है तो उर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एकवृताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दसों दिशाओं मेंफैलता है।

फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती है जैसे बम विस्फोट सेप्राप्त उर्जा का प्रतिरूप, शांत जल में कंकड़ फेंकने पर प्राप्त तरंग (उर्जा) काप्रतिरूप आदि।

सृष्टि के आरंभ में महाविस्फोट (बिग बैंग) के पश्चात उर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ, फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्य हुआ।

जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता है कि आरंभ में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल (अनंत) था कि देवता आदि मिल करभी उस लिंग के आदि और अंत का छोर या शाश्वत अंत न पा सके ।

पुराणों में कहा गया है कि प्रत्येक महायुग के पश्चात समस्त संसार इसी शिवलिंगमें समाहित (लय) होता है तथा इसी से पुन: सृजन होता है।

#बिग_बैंग (महाविस्फोट) का सिद्धांत सर्वप्रथम Georges Lemaître ने 1920 में दिया। 

यह सिद्धांत कहता है कि कैसे आज से लगभग 13.7 खरब वर्ष पूर्व एक अत्यंत गर्म और घनी अवस्था से ब्रह्मांड का जन्म हुआ। इसके अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक बिंदु से हुई थी जिसकी ऊर्जा अनंत थी।

उस समय मानव, समय और स्थान जैसी कोई वस्तु अस्तित्व में नहीं थी अर्थात कुछ नही था ! 

इस धमाके में अत्यधिक ऊर्जा का उत्सजर्न हुआ।यह ऊर्जा इतनी अधिक थी कि इसके प्रभाव से आज तक ब्रह्मांड फैलता ही जारहा है।

सारी भौतिक मान्यताएं इस एक ही घटना से परिभाषित होती हैं जिसे महाविस्फोट सिद्धांत कहा जाता है। महाविस्फोट नामक इस धमाके के मात्र 1.43 सेकेंड अंतराल के बाद समय,अंतरिक्ष की वर्तमान मान्यताएं अस्तित्व में आ चुकी थीं।

भौतिकी के नियम लागू होने लग गये थे।1.34वें सेकेंड में ब्रह्मांड 1030 गुणा फैल चुका था हाइड्रोजन, हीलियम आदि के अस्तित्त्व का आरंभ होने लगा था और अन्य भौतिक तत्व (आकाश,वायु,अग्नि,जल,पृथ्वी) बनने लगे थे।

शिवलिंग के महत्ता पीछे कई धार्मिक कहानियां भी हैं, जो प्रतीकात्मक तरीके से यही बातें कहती हैं। आधुनिक विज्ञान कई अवस्थाओं से गुजरने के बाद आज एक ऐसे बिंदु पर पहुँचा है जहाँ वे यह सिद्ध कर रहे हैं कि हर चीज जिसे आप जीवन के रूप में जानते हैं। वह सिर्फ ऊर्जा है, जो स्वयं को लाखों करोड़ों रूप में व्यक्त करती है।

दरअसल शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं तभी उन पर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे। 

इसलिए महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं।

 क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है। 🔱🔱

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्।।

केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।

वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने।
सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये।।

द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्।सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलो भवेत्।।

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,
जयतिपुण्य भूमि भारत,,
कष्ट हरो,,,काल हरो,,,दुःख हरो,,,दारिद्र्यहरो,

🚩🚩🚩🔱🔱 हर हर महादेव 🔱🔱🚩🚩🚩

श्रेय - The Power
दिनांक - २६.०७.२०२१
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रविवार, 25 जुलाई 2021

प्राणशक्ति क्या है

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरूण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

       (आजकल सोशल मीडिया, व्हाट्स एप  और फेसबुक पर ध्यान, तंत्र, मंत्र, और यंत्र, कुण्डलिनी-जागरण, धन-प्राप्ति की लालसा के लिए तंत्र में उपाय, भूत-बाधा आदि भगाने के लिए तंत्र-मंत्र के अनुष्ठान कर् समाधान किये जाने के लिए बाढ़-सी आयी हुई है। अक्सर व्यक्ति का ध्यान नहीं लग पाता है, कैसे लगेगा ध्यान--यही जिज्ञासा लेकर सवाल करते रहते है और खास तौर से बॉक्स में आकर जरूर 'हाय हेलो' कहते हैं। वे ध्यान करने के चक्कर में  प्राणशक्ति को बढ़ाने के लिए प्राणायाम की बिलकुल ही उपेक्षा कर देते हैं। अनेक बार बॉक्स में सार्वजानिक हित चिन्तन के विषय पर प्रश्न करने के लिए मैंने साफ मना किया हुआ है, फिर भी लोग अपनी प्रकृति और आदत के अनुसार ध्यान नहीं देते हैं। मैंने लोगों को अपनी कोई व्यक्तिगत समस्या रखने और उसका समाधान प्राप्त करने के लिए स्पष्ट मना कर् रखा है। इस पोस्ट में ध्यान-साधना या योग-साधना के लिए प्राण-शक्ति की महत्ता और उसकी उपयोगिता पर चर्चा करना उपयुक्त समझा है क्योंकि कोई भी व्यक्ति सीधे साधना की अन्तिम सीढ़ी 'ध्यान और समाधि' को उपलब्ध् नही हो सकता।
       मानव शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्व के सूक्ष्म अणुओं से निर्मित है और साथ ही यह जगत् भी। तो ध्यान साधना करने के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए पहले हमें अपने भौतिक शरीर को स्वस्थ रखने की परम आवश्यकता है जिसके अस्वस्थ होने की दशा में कोई भी साधना सम्भव नहीं है। इसीलिए पातंजल योगसूत्र के अष्टांग योग में सर्वप्रथम यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और फिर उसके बाद ही धारणा, ध्यान समाधि का वर्णन आया है।
        पहले पांच बहिरंग उपाय हैं जिनसे हमारी स्थूल काया निरीगी होने के साथ-साथ निर्मल भी रहे। इन उपायों से हमारा 'अन्नमय कोश' शुद्ध और ऊर्जावान बन जाता है। उसके बाद आते हैं अंतरंग उपाय पर जो धारणा, ध्यान के द्वारा फलीभूत होते हैं। अन्त में आती है समाधि जो गहनतम ध्यान की स्थिति में घटित होती है। यह साधना जन्म-जन्मान्तर में जाकर कहीं पूर्णता को प्राप्त होती है। 
       यम, नियम, आसन से जहाँ अन्नमय कोश ऊर्जावान बनता है, वहीँ प्राणायाम के माध्यम से हमारा प्राणमय कोश ऊर्जस्वित् होता है। प्राण शरीर प्राणमय कोश से निर्मित होने के कारण अन्नमय शरीर की तुलना में कई गुना अधिक शक्तिशाली होता है। इस पोस्ट में हम प्राणशक्ति क्या है--इस विषय पर चर्चा करेंगे)

       जिस प्रकार भौतिक विज्ञान के मूल में विद्युत-शक्ति है, उसी प्रकार योग-विज्ञान के मूल में है-- प्राण-शक्ति। प्राण और श्वास का अपना विज्ञान है जो योग-शास्त्र पर आधारित है। प्राण का विषय अत्यन्त रहस्यमय और जटिल भी है।
       वैदिक विज्ञान के अनुसार गहरा श्वास लेने पर शरीर के भीतर ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में परिवर्तन हो जाता है, उसके अनुपात में परिवर्तन हो जाता है। अनुपात के इस परिवर्तन का साधना में क्या प्रभाव पड़ता है ?--यह जानना-समझना अति आवश्यक है।
       प्रकृति के ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड ये दो मूल तत्व हैं और इन्हीं दोनों तत्वों के बीच जीवन और मृत्यु का खेल चलता है। एक का परिणाम 'जीवन' है और दूसरे का परिणाम है--'मृत्यु'। जब शरीर के भीतर ऑक्सीजन की मात्रा धीरे-धीरे कम हो जाती है तो अन्त में शेष रह जाता है--कार्बन डाई ऑक्साइड जिसका अर्थ है--मृत्यु। sabhar siyaram sharam Facebookwal
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मल्टीप्ल यूनिवर्स

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हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की गयी है हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की गयी है विज्ञान भी अब एक से ज्यादे विश्‍व को मानने लगा है | राजर पेनरोज़ जो की गणितग्य है लेकिन खगौल विज्ञान मे उनका महत्वा पूर्ण योगदान है |उन्होने अपनी पिछली पुस्तक "द एम्पर्स न्यू माएंड " मस्तिष्क और चेतना को लेकर थी , जी बहूत चर्चित हुई थी |उनकी नयी किताब " साएकल्स आफ टाईम : एन एक्सट्रा आर्डनरी न्यू आफ द यूनिवर्स " मे नयी अवधारणा के मुताबिक ब्रमांड अनन्त है वह कभी नष्ट नहीं होता उसमे उसमे अनन्त कल्पो के चक्र एक के बाद आते रहते है आम तौर पर विज्ञान मे प्रचलित है की सृष्टि का आरंभ एक विग बैक या बड़े विस्फोट से हुई है , इसके बाद ब्रमांड फैलता गया जो अब भी फैल रहा है एक समय के बाद ब्रमांड के फैलने की उर्जा समाप्त हो जायेगी और ब्रमांड पुनः छोटे से बिन्दु पे आ जायेगी | पेनरोज़ की अवधारणा इससे विल्कुल अलग है वह समय के चक्र की अवधारणा सामने रखते है उनका कहना है की एक 'एओन ' या कल्प की समाप्ति ब्रमांड की ऊर्जा खत्म होने के साथ होती है पर ब्रमांड सिकुड़ कर खत्म नहीं हो जाता ऊर्जा खत्म होने से ब्रमांड की मास या द्रब्यमान समाप्त हो जाता है, द्रब्यमान समाप्त होने से समय काल मे कोई भेद नहीं रह जाता |जब मास ही नहीं होता तो भूत भविष्य , छोटा बड़ा ये सारी अवधारणाये खत्म हो जाती है एक अर्थ मे ब्रमांड की अपनी विशालता की स्मृति खत्म हो जाती है , तब यह अंत अगले बिग बैंक की शुरूआत होती है |और यह अनन्त काल तक जारी रहता है इसके लिये उन्होने कयी प्रमाण दिये है हालांकि वो कहते है की इसमे अभी और काम करने की आवश्कता है क़्वाण्टम मेकेनिक्स से भी से भी अनेक सृष्टि की अवधारणा मिलती है भौतिक के स्ट्रिंग सिधांत के अनुसार चार आयाम के अलावा भी कई आयाम है ये सारे आयाम हमारी दुनिया मे कयी दुनिया बनाते है और इन दुनियाओ का आपस मे सम्बंध गुरुत्वा कर्षण के कारण होता है | जो तमाम स्तरों पर एक ही होता है तो केया वैज्ञान कही ना कही इस्वर की अवधारणा को स्वीकार तो नहीं कर रहे स्वय विचार करे | by akhilesh pal

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शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

बिटकॉइन

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बिटकॉइन एक Virtual Currency है इसका अविष्कार Santoshi Nakamoto ने 2009 में किया था ये बाकी करेंसी की तरह ही एक Digital Currency है। बस हम इसे बाकी करेंसी की तरह छुके नही सकते । लेकिन हम इसका उपयोग online कर सकते है क्योंकि यह एक Digital Currency है।Bitcoin एक Virtual मुद्रा है या फिर हम इसे डिजिटल मुद्रा भी कह सकते है। आप इसे एक उदाहरण की मदद से समझ सकते है। जैसे कि आपके बैंक खाते में जब पैसे होते है तो आप अपने बैंक खाते से net-banking या फिर debit या credit card की मदद से online shopping कर सकते है या बिलों का भुगतान कर सकते है। ठीक इसी तरह bitcoin भी आपके बैंक के खाते के पैसों की तरह होता है जिसका इस्तमाल आप बाकी सभी करेंसी की तरह कर सकते है। sorce https://currencyinbox.com

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क्वांटम क्रांति के मुहाने पर जर्मनी

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sorceजर्मनी की छवि भले ही औद्योगिक शक्ति की है लेकिन जहां तक क्वांटम कंप्यूटिंग का सवाल है यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बाकियों से पीछे रह गई है लेकिन अब नया कंप्यूटर हालत बदल सकता है जर्मनी में क्वांटम युग का आगाज हो रहा है जर्मनी क्वांटम क्वांटम कंप्यूटिंग में चीन और अमेरिका ऐसी ताकतों से मुकाबला करना चाहता है और जिसके पास भी जितनी आधुनिक क्वांटम कंप्यूटिंग तकनीक है वह उतना ही ज्यादा ताकतवर है इसलिए जर्मनी अब इस ओर विशेष ध्यान दे रहा है इस हफ्ते म्यूनिख स्थित इंस्टिट्यूट और अमेरिकी कंपनी आईबीएम ने क्वांटम कंप्यूटिंग में मिलकर काम करने का ऐलान किया है आईबीएस के नए क्वांटम सिस्टम वन कंप्यूटर के इर्द-गिर्द केंद्रित होगा या दुनिया का सबसे ताकतवर कंप्यूटर है चीन और अमेरिका के पास क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में जर्मनी से कहीं ज्यादा पेटेंट है और ऐसा तब है जबकि जर्मनी में रिसर्च पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जाता है इसके बारे में दुनिया को ज्यादा नहीं पता है हनोवर की लाइव नित्स यूनिवर्सिटी में मैं क्वांटम फिजिक्स के प्रोफेसर क्रिस्टी यान आर एल का उस कहते हैं मैं कहूंगा कि अब हम सब तरह की पकड़ में आए बिना उड़ते रहे हैं इसकी वजह है कि इस क्षेत्र में मिलने वाली वित्तीय मदद को अक्सर अलग तरीके के तकनीक नाम दिए जाते हैं यानी हमने यह कभी नहीं कहा कि हम एक कंप्यूटर बना रहे हैं बल्कि हम ने यह कहा कि हमें ऐसी अवस्था का अध्ययन कर रहे हैं जिसमें 20 आयन है  कंप्यूटर बाइनरी गणना करते हैं यानी एक बार जीरो अगली बार एक क्वांटम कंप्यूटर 0 और 1 दोनों को एक साथ गणना में रखते हैं जैसे आम कंप्यूटर में इकाई को बिट कहते हैं हैं यहां क्यूबिट कहा जाता है कि क्यूबिट में होने वाली गणना कहीं ज्यादा तेज होती है मौजूदा सुपर कंप्यूटर से भी ज्यादा तेज जिन समस्याओं को वैज्ञानिक हल नहीं कर पा रहे हैं क्वांटम  कंप्यूटर से हल कराया जा सकता है sorce dw. de Prime Shred Fat Burner For Men

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अंतरिक्ष में इंसान पैदा करने की दिशा में कार्य हुआ

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see sorce अंतरिक्ष में बच्चे पैदा किए जा सकते हैं इस सवाल को वैज्ञानिक मानव प्रजाति के भविष्य के लिए हम मानते हैं इसलिए वर्षों से इस क्षेत्र में शोध किया जा रहा है और पहली बार इसमें कुछ सफलता हासिल हुई है वैज्ञानिकों का कहना है कि चूहे के स्तनों से उन्होंने 168 चूहे पैदा किए सालों तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में रखे जाने के बाद इनसे जापान की एक प्रयोगशाला में एक चुहिया को गर्भवती किया गया और 168 बच्चे पैदा हुए स्पर्म को स्विच करने के लिए जिस स्तर के रेडिएशन की जरूरत होती है जैपनीज एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी के  स्पेस सेंटर में इन्हें उस से 170 गुना ज्यादा रेडिएशन लेवल पर रखा गया अंतरिक्ष में रेडिएशन का स्तर पृथ्वी से ज्यादा होता है यामा नाशी यूनिवर्सिटी के जीव विज्ञानिक तेनु ही को वाह का या मां के नेतृत्व में हुआ या धन साइंस एडवांस नामक पत्रिका में छपा है डाकर डॉक्टर वाकायामा कहते हैं कि अंतरिक्ष में रेडिएशन के में शुक्राणुओं के डीएनए को नुकसान नहीं पहुंचाया ना ही इनकी जनन क्षमता को प्रभावित किया इन शुक्राणु से जन्मे बच्चे उतने ही स्वस्थ हुए जितने पृथ्वी पर जन्मे चूहे के बच्चे हो सकते हैं ना उनके जींस में किसी तरह की खामी पाई गई यहां तक कि उनके बच्चों के बच्चे भी स्वस्थ पैदा हुए वैज्ञानिक समझने की कोशिश कर रहे हैं अंतरिक्ष की परिस्थितियां किस तरह प्रभावित करती हैं एक चिंता यह है कि अंतरिक्ष में रेडिएशन का ज्यादा होना जींस को प्रभावित कर सकता है जीरो ग्रेविटी की परिस्थिति लेकर भी चिंता है कि कहीं वह एंब्रियो  के विकास को प्रभावित ना कर दे  sorce www.dw.de

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मन्त्र विज्ञान अजपा गायत्री और विकार मुक्ति

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तीन तल हुए—एक वाणी में प्रकट हो,
एक विचार में प्रकट हो, 
एक विचार के नीचे अचेतन में हो।
 ऋषि कहते हैं, उसके नीचे भी एक तल है। अचेतन में भी होता है, तो भी उसमें आकृति और रूप होता है। 
उसके भी नीचे एक तल है, महाअचेतन का कहें, जहां उसमें रूप और आकृति भी नहीं होती। वह अरूप होता है। जैसे एक बादल आकाश में भटक रहा है। अभी वर्षा नहीं हुई। ऐसा एक कोई अज्ञात तल पर भीतर कोई संभावित,पोटेंशियल विचार घूम रहा है । 
वह अचेतन में आकर अंकुरित होगा, 
चेतन में आकर प्रकट होगा, 
वाणी में आकर अभिव्यक्त हो जाएगा। ऐसे चार तल हैं।

गायत्री उस तल पर उपयोग की है जो पहला तल है, सबसे नीचे। उस तल पर "अजपा"  का प्रवेश है। 
तो जप का नियम है। अगर कोई भी जप शुरू करें—समझें कि राम—राम जप शुरू करते हैं, या ओम, कोई भी जप शुरू करते हैं; या अल्लाह, कोई भी जप शुरू करते है—तो पहले उसे वाणी से शुरू करें। पहले कहें, राम, राम; जोर से कहें। फिर जब यह इतना सहज हो जाए कि करना न पड़े और होने लगे, इसमें कोई एफर्ट न रह जाए पीछे, प्रयत्न न रह जाए,यह होने लगे; जैसे श्वास चलती है, ऐसा हो जाए कि राम, राम चलता ही रहे, तो फिर ओंठ बंद कर लें।
 फिर उसको भीतर चलने दें। फिर मुख से न बोलें राम, राम; मन मे चलने दे राम, राम।

फिर इतना इसका अभ्यास हो जाए कि उसमें भी प्रयत्न न करना पड़े, तब इसे वहां से भी छोड़ दें, तब यह और नीचे 'डूब जाएगा। 
और अचेतन में चलने लगेगा—राम,राम। आपको भी पता न चलेगा कि चल रहा है, और चलता रहेगा। फिर वहां से भी गिरा दिए जाने की विधियां हैं और तब वह अजपा में गिर जाता है। फिर वहां राम, राम भी नहीं चलता। फिर राम का भाव ही रह जाता है—जस्ट क्लाउडी, एक बादल की तरह छा जाता है। जैसे पहाड़ पर कभी बादल बैठ जाता है धुआ—धुआ, ऐसा भीतर प्राणों के गहरे में अरूप छा जाता है।

उसको कहा है ऋषि ने, अजपा। 
और जब अजपा हो जाए कोई मंत्र, तब वह गायत्री बन गया। अन्यथा वह गायत्री नहीं है।

और क्या है इस अजपा का उपयोग ???
इस अजपा से सिद्ध क्या होगा ??? इससे सिद्ध होगा, विकार— मुक्ति। 
विकारदंडो ध्येय: इस अजपा का लक्ष्य है विकार से मुक्ति।

यह बहुत अदभुत कीमिया है, केमेस्ट्री है इसकी। 
मंत्र शास्त्र का अपना पूरा रसायन है। 
मंत्र शास्त्र यह कहता है कि अगर कोई भी मंत्र का उपयोग अजपा तक चला जाए,तो आपके चित्त से कामवासना क्षीण हो जाएगी, सब विकार गिर जाएंगे। क्योंकि जो व्यक्ति अपने अंतिम अचेतन तल तक पहुंचने में समर्थ हो गया, उसको फिर कोई चीज विकारग्रस्त नहीं कर सकती। क्योंकि सब विकार ऊपर—ऊपर हैं, भीतर तो निर्विकार बैठा हुआ है। हमें उसका पता नहीं है,इसलिए हम विकार से उलझे रहते हैं।

कोई भी मंत्र गायत्री बन जाता है,जब अजपा हो जाए। यही इस सूत्र का अर्थ है अजपागायत्री विकारदंडो ध्येय:।

मन का निरोध ही उनकी झोली है।

वे जो संन्यासी हैं, उनके कंधे पर एक ही बात टंगी हुई है चौबीस घंटे—मन का निरोध, मन से मुक्ति, मन के पार हो जाना। चौबीस घंटे उनके कंधे पर है।

आपने एक शब्द सुना होगा,खानाबदोश। यह बहुत बढ़िया शब्द है। इसका मतलब होता है, जिनका मकान अपने कंधे पर है। खाना—बदोश। खाना का मतलब होता है मकान—दवाखाना—खाना यानी मकान। दोश का मतलब होता है कंधा,बदोश का मतलब होता है, कंधे के ऊपर। जो अपने कंधे पर ही अपना मकान लिए हुए हैं, उनको खानाबदोश कहते हैं—घूमक्कडू लोग, जिनका कोई मकान नहीं है, कंधे पर ही मकान है।

संन्यासी भी अपने कंधे पर एक चीज ही लिए चलता है चौबीस घंटे—मन का निरोध। वही उसकी धारा है सतत श्वास—श्वास की, मन के पार कैसे जाऊं ??? क्योंकि मनातीत है सत्य। मन के पार कैसे जाऊं ???
क्योंकि मनातीत है अमृत। मन के पार कैसे जाऊं ??? 
क्योंकि मनातीत है प्रभु।

जाया जा सकता है। ध्यान उसका मार्ग है। sabhar dev sharma Facebook wall

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बुधवार, 21 जुलाई 2021

स्वस्थ रहने हेतु हेल्थ इंश्योरेंस करवाएं

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आज के बढ़ते युग में करो ना जैसी महामारी और खानपान में बढ़ते बदलाव से बीमारियों का प्रचलन ज्यादा हो गया स्वास्थ्य एक समस्या हो गई है अतः हमें स्वास्थ्य बीमा करा लेना चाहिए तभी हम वैज्ञानिक सभी तकनीकी का फायदा उठाe

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मंगलवार, 20 जुलाई 2021

रेबीज

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 रेबीज या जलांतक (Hydrophobia) दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक है। यह रोग मनुष्य को यदि एक बार हो जाए तो उसका बचना काफी मुश्किल होता है। रेबीज लाइसा वाइरस अर्थात् विषाणु द्वारा होती है और अधिकतर कुत्तों के काटने से ही होती है। परन्तु यह अन्य दाँत वाले प्राणियों जैसे-बिल्ली, बन्दर, सियार, भेड़िया, सूअर इत्यादि के काटने से भी हो सकती है। इन जानवरों या प्राणियों को नियततापी (Warm blooded) कहते हैं। 

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रविवार, 18 जुलाई 2021

सूर्य से हमें ज्योति मिलता है चन्द्रमा से अमृतत्त्व

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श्रीमद्भगवद्गीता का आठवां अध्याय और वृहदारण्यकोपिषद् के छठवें अध्याय के दूसरे ब्राह्मण तथा और भी अनेकों आर्ष-ग्रन्थों के अनुसार  सूर्य-चन्द्र लोक में तो युक्तयोगी को भी जाना पड़ता है शरीर छोड़ने के बाद क्रममुक्ति के क्रम में ।

अच्छा , इनका आध्यात्मिक महत्त्व छोड़कर केवलमेव भौतिक-दृष्टि से भी विचार करे तो सूर्य प्रकाश व चन्द्रमा शीतलता प्रदान करने के बाद भी आपसे बिजली व एसी की भांति बिल नहीं लेते ।

कहते हैं जितनी पृथ्वी है , उससे तिगुणा जल है , किन्तु उस सामुद्रिक जल से क्या प्रयोजन , जो न पीने के काम आये , न स्नान के और  वस्त्र-प्रक्षालनादि के ही !

सूर्य की रश्मियां जब उसी सामुद्रिक-जल को खींचकर मेघमण्डल के फिल्टर में डालती है , और वह जब पुनः धरती पर बरसता है तो पीने-नहाने-वस्त्रादि धोने योग्य होता है ।

धरती के अंदर जाने पर उसी जल को ट्यूबवेल, कूप , चापाकल आदि के द्वारा लोग प्रयोग में लाते हैं ।

कुल मिलाकर सूर्य-चन्द्रमा है तो जीवन है , प्राण है , पृथ्वी है ।  किमधिकम् ये कलियुग के प्रत्यक्ष देवता हैं ।

इसी उपकार को ध्यान में रखकर भी जब सूर्य-चन्द्र ग्रहणादि का अवसर हो , उस समय निद्रा-मैथुन-आलस्यादि को त्यागकर उनके कष्ट-निवृत्त्यर्थ जप-ध्यानादि करना चाहिये ।

जिन्हें यह सब बातें अन्धविश्वास लगते हों ,  चलो ! उनकी तुष्टि के लिए असत्य मानें , तब भी जप-ध्यानादि के करने से क्या हानि है !

किन्तु जब यह बातें पूर्णरूपेण सत्य ही है , तो ग्रहणकाल में टांग-फैलाकर सोने से तो हानि ही हानि है ।
 Sabhar satsang Facebook wall
श्री शंकराचार्य वेद वेदांत विज्ञान

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