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गुरुवार, 31 अगस्त 2023

भारतीय संस्कृति

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1. अंको का अविष्कार 307 ई. पूर्व भारत में हुआ


2. शून्य का अविष्कार भारत में आर्यभट्ट ने किया


3. अंकगणित का अविष्कार पूर्व भास्कराचार्य ने किया


4. बीज गणित का अविष्कार भारत में आर्यभट्ट ने किया


5. सर्वप्रथम ग्रहों की गणना आर्यभट्ट ने 499 ई. पूर्व में की


6. भारतीयों को त्रिकोणमिति व रेखागणित का 2,500 ई.पूर्व से ज्ञान था


7. समय और काल की गणना करने वाला विश्व का पहला कैलेण्डर र भारत में लतादेव ने 505 ई. पूर्व सूर्य सिद्धान्त नामक अपनी पुस्तक में वर्णित किया 


8. न्यूटन से भी पहले गुरूत्वाकर्षण का सिद्धान्त भारत में भास्कराचार्य ने प्रतिपादित किया


9. 3,000 ई. पूर्व लोहे के प्रयोग के प्रभाव वेदों में वर्षित है अशोक स्तम्भ इसका स्पष्ट प्रमाण है


10. लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्डस् के अनुसार 400 ई. पूर्व सुश्रूत (भारतीय चिकित्सक) द्वारा सर्वप्रथम प्लास्टिक सर्जरी का प्रयोग किया गया


11. विश्व का पहला विश्वविद्यालय तक्षशिला के रूप में 700 ई. पूर्व भारत में स्थापित था जहाँ दुनिया भर के 10,500 विद्यार्थी 60 विषयों का अध्ययन करते थे


12. सूर्य से पृथ्वी पर पहुँचने वाले प्रकाश की गति की गणना सर्वप्रथम भास्कराचार्य ने की


13. यूरोपिय गणितज्ञों से पूर्व ही छठी शताब्दी में बोद्धायन ने पाई के मान की गणना की जो की पाइथोगोरस प्रमेय के रूप में जाना जाता है हमारा ज्ञान-विज्ञान एवं इतिहास इतना गौरवशाली एवं समृद्ध है 


14. दुनिया का पहला संवत्-"विक्रम संवत्" पूरे एशिया से शकों को परास्त करते हुये अवन्ति के चक्रवर्ती सम्राट "विक्रमादित्य महान" ने प्रवर्तित किया। जो ईसा पूर्व 56 से आरम्भ हुआ। इसका उल्लेख जूलियस सीज़र के रोम के ऐतिहासिक तिथिक्रम में भी है। सम्राट गदाफेरिज के लेख में भी विक्रम संवत् का उल्लेख ज्यू ग्रन्थ अनुसार मिलता है इससे विक्रम संवत् की विश्व व्यापकता स्पष्ट होती है


15. महान वैज्ञानिक डां.जगदिशचन्द्र बसु ने ही पहला वायरलेस कम्युनिकेशन का अविष्कार किया जो बाद में विकसित होता चला और आज मोबाइल, इण्टरनेट आदि के रूप में विकसित हुआ


16. सूर्य किरण में सात रंग है यह डां. सी. व्ही. रमन ने पहली बार दुनिया को बताया 19 वीं सदी में यह दुनिया ने जाना और scattering of lights के सिध्दान्त पर उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लैकिन उससे भी गर्व और हैरानी की बात है कि "तैत्तिरीय संहिता" नामक प्राचीन ग्रन्थ को "सप्त-रश्मी" कहा गया है। यानी तैत्तिरीय संहिता के लेखक ऋषि वैज्ञानिक, सी. वी. रमन से पहले ही उनकी Theory समझ चुके थे और उस ज्ञान विज्ञान के ज्ञाता थे


17. सबसे पहला अर्थशास्त्र भारत में लिखा गया। कौटिल्य दुनिया के पहले अर्थशास्त्र नामक पुस्तक लिखने वाले आचार्य थे


18. दुनिया का पहला संविधान भारत ने ही लिखा राजा मनु इसके रचयिता थे और वेद आधार था इसका नाम मनुस्मृति था। यह राजनितीशास्त्र का पहला महान ग्रन्थ है। अंग्रेज़ी षड्यन्त्र के तहत मैक्समूलर के हाथो इसे अंग्रेज़ों ने लिखवाकर इसमें तोडमरोड़ की और तथ्यों को बदल दिया


19. नाव का अविष्कार और सोने के सिक्कों का चलन में प्रचलन आर्यावर्त की ही देन है


20. पारा (mercury) बनाने की विधियाँ वैज्ञानिक नागार्जुन एवं महर्षि चरक ने सर्वप्रथम दुनिया को दी


21. एक्यूप्रेशर चिकित्सा जो आज चीन में भी विकसित है, वह तक भारत की ही देन है


22. बोधिवर्मन की मार्शल आर्ट प्रणाली भारत की ही प्राचीन देन है स्वयं श्रीकृष्ण इसमें निष्णात और पारंगत योध्दा थे उन्होंने इसी के प्रयोग द्वारा कंस के बलाढ्य पहलवान मार गिराये...!!


जय श्रीराम 🚩🙏💐❣️

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बुधवार, 30 अगस्त 2023

अष्टांग हृदयम (Astang hrudayam) और इस पुस्तक में उन्होंने बीमारियों को ठीक करने के लिए 7000 सूत्र लिखें थे

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हार्ट अटैक..हमारे  देश  भारत  में  3000 साल  पहले  एक  बहुत  बड़े ऋषि  हुये  थे..उनका  नाम  था महाऋषि वागवट  जी उन्होंने एक   पुस्तक   लिखी थी जिसका  नाम  है अष्टांग हृदयम (Astang    hrudayam) और  इस  पुस्तक  में  उन्होंने बीमारियों  को  ठीक  करने  के लिए 7000 सूत्र  लिखें  थे 

यह  उनमें  से  ही  एक  सूत्र है वागवट  जी  लिखते  हैं  कि कभी  भी  हृदय  को  घात  हो रहा  है मतलब  दिल  की  नलियों  मे blockage  होना  शुरू  हो  रहा   है !

तो  इसका  मतलब  है  कि रक्त  (blood)  में , acidity (अम्लता )  बढ़ी  हुई  है अम्लता  आप  समझते  हैं जिसको  अँग्रेजी  में  कहते  हैं acidity 

अम्लता  दो  तरह  की  होती है एक  होती  है   पेट  की अम्लता और  एक  होती  है  रक्त (blood)  की  अम्लता आपके  पेट  में  अम्लता  जब बढ़ती  है तो आप  कहेंगे पेट  में जलन सी  हो  रही  है खट्टी  खट्टी  डकार  आ रही  हैं मुंह  से  पानी  निकल  रहा  है 

और  अगर  ये  अम्लता (acidity) और  बढ़  जाये 

तो  hyperacidity  होगी और  यही  पेट  की  अम्लता बढ़ते-बढ़ते  जब  रक्त  में  आती  है  तो  रक्त  अम्लता (blood  acidity)  होती है और  जब  blood  में  acidity बढ़ती  है  तो  ये  अम्लीय  रक्त (blood)  दिल  की  नलियों  में से  निकल  नहीं  पाती और  नलियों  में  blockage कर  देता  है तभी  heart  attack  होता है  इसके  बिना heart attack  नहीं  होता और  ये  आयुर्वेद  का  सबसे बढ़ा  सच  है  जिसको  कोई डाक्टर  आपको  बताता  नहीं 

क्योंकि  इसका  इलाज  सबसे सरल  है इलाज  क्या  है ?वागवट  जी  लिखते  हैं  कि जब  रक्त  (blood)  में  अम्लता  (acidity)  बढ़  गई है तो  आप  ऐसी  चीजों  का उपयोग  करो  जो  क्षारीय  हैं आप  जानते  हैं  दो  तरह  की चीजें  होती  हैं अम्लीय  और  क्षारीय 

acidic  and  alkaline अब  अम्ल  और  क्षार  को मिला  दो  तो  क्या  होता है ?acid  and  alkaline  को मिला  दो  तो  क्या  होता है ? neutral

होता  है  सब  जानते  हैं तो  वागवट  जी  लिखते  हैं कि  रक्त  की  अम्लता  बढ़ी हुई  है  तो  क्षारीय (alkaline) चीजें  खाओ तो  रक्त  की  अम्लता (acidity)  neutral  हो जाएगी और  रक्त  में  अम्लता neutral  हो  गई तो  heart  attack  की जिंदगी  मे  कभी  संभावना  ही नहीं ये  है  सारी  कहानी अब  आप  पूछेंगे कि  ऐसी कौन  सी  चीजें  हैं  जो  क्षारीय हैं  और  हम  खायें ? आपके  रसोई  घर  में  ऐसी बहुत  सी  चीजें  है  जो  क्षारीय हैं जिन्हें  आप  खायें  तो  कभी heart attack  न  आए और  अगर  आ  गया  है तो  दुबारा  न  आए यह हम सब जानते हैं कि सबसे  ज्यादा  क्षारीय चीज क्या हैं और सब घर मे आसानी से उपलब्ध रहती हैं, तो वह  है लौकी जिसे  दुधी  भी  कहते  हैं English  में  इसे  कहते  हैं bottle  gourd जिसे  आप  सब्जी  के  रूप  में खाते  हैं ! इससे  ज्यादा  कोई  क्षारीय चीज  ही  नहीं  है

तो  आप  रोज  लौकी  का  रस निकाल-निकाल  कर  पियो या  कच्ची  लौकी  खायो वागवट  जी  कहते  हैं  रक्त की  अम्लता  कम  करने  की सबसे  ज्यादा  ताकत  लौकी  में ही  है तो  आप  लौकी  के  रस  का सेवन  करें कितना   सेवन करें ? रोज  200  से  300  मिलीग्राम   पियो कब   पिये ? सुबह  खाली  पेट (toilet जाने के बाद ) पी  सकते  हैं या  नाश्ते  के  आधे  घंटे  के बाद  पी  सकते  हैं इस  लौकी  के  रस  को  आप और  ज्यादा  क्षारीय  बना सकते  हैं इसमें 7 से 10 पत्ते तुलसी के डाल लो तुलसी  बहुत  क्षारीय  है इसके  साथ  आप  पुदीने  के  7  से 10  पत्ते  मिला  सकते  हैं पुदीना  भी बहुत  क्षारीय  है इसके  साथ  आप  काला नमक  या  सेंधा  नमक  जरूर डाले 

ये भी बहुत क्षारीय है लेकिन  याद  रखें नमक काला या सेंधा ही डाले वो  दूसरा  आयोडीन  युक्त नमक  कभी  न  डाले ये  आओडीन  युक्त  नमक अम्लीय  है 

तो  आप  इस  लौकी  के जूस  का  सेवन  जरूर  करें 

2  से  3  महीने  की  अवधि में आपकी  सारी  heart  की blockage  को  ठीक  कर देगा 21  वें  दिन  ही  आपको  बहुत ज्यादा  असर  दिखना  शुरू  हो जाएगा 

कोई  आपरेशन  की  आपको जरूरत  नहीं  पड़ेगी 

घर  में  ही  हमारे  भारत  के आयुर्वेद  से  इसका  इलाज  हो जाएगा और  आपका  अनमोल  शरीर और  लाखों  रुपए  आपरेशन के  बच  जाएँगे आपने  पूरी  पोस्ट  पढ़ी , आपका   बहुत- बहुत धन्यवाद !


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शनिवार, 26 अगस्त 2023

जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?

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जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?भूतापीय ऊर्जा यानी जियोथर्मल एनर्जी के तमाम फायदों के बावजूद जीवाश्म ईंधन की तुलना में उसका उपयोग बहुत कम होता है. जानने की कोशिश करते हैं कि ऊर्जा के इस नवीकरणीय स्रोत की लोकप्रियता कैसे बढ़ रही है: 


अर्थव्यवस्थाजर्मनी

जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?

गेरो रुइटर

6 घंटे पहले6 घंटे पहले

भूतापीय ऊर्जा यानी जियोथर्मल एनर्जी के तमाम फायदों के बावजूद जीवाश्म ईंधन की तुलना में उसका उपयोग बहुत कम होता है. जानने की कोशिश करते हैं कि ऊर्जा के इस नवीकरणीय स्रोत की लोकप्रियता कैसे बढ़ रही है:


https://p.dw.com/p/4VbcH

बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोग

बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोगतस्वीर: Stella/imageBROKER/picture alliance

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पृथ्वी के कोर यानी केंद्र का तापमान करीब 6,000 डिग्री सेल्सियस (11,000 डिग्री फारेनहाइट) है और इस तापमान पर पृथ्वी का केंद्र उतना ही गर्म है जितना कि सूर्य. हालांकि यह तुलना ठीक नहीं है क्योंकि पृथ्वी की सतह से 2,000 से 5,000 मीटर नीचे भी, तापमान 60 से 200 डिग्री सेल्सियस तक होता है जो झुलसा देने वाला होता है. यहां तक कि ज्वालामुखीय क्षेत्रों में तो सतह का तापमान भी 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा से बचत


इस तापमान से ऊष्मा-आधारित ऊर्जा प्राप्त करने संभावना होती है. हमारे पूर्वज जियोथर्मल एनर्जी की शक्ति से अपरिचित नहीं थे. पहली शताब्दी ईस्वी में, पश्चिमी जर्मनी के शहरों में रहने वाले रोमन, जिन्हें अब आखन और वीसबाडेन के नाम से जाना जाता है, वे अपने घरों को गर्म करते थे और गर्म पानी के झरने से नहाते थे.


न्यूजीलैंड में, माओरी लोग पृथ्वी की गर्मी से निकली ऊष्मा का इस्तेमाल करते हुए अपना भोजन पकाते थे और 1904 में, मध्य इटली के एक क्षेत्र लार्डेरेलो में तो बिजली पैदा करने के लिए जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल किया गया था.

ज्वालामुखीय क्षेत्र जियोथर्मल एनर्जी को बिजली में बदल देते हैं

इन दिनों, 30 देशों में करीब 400 बिजली संयंत्र पृथ्वी की सतह के नीचे पैदा होने वाली भाप का इस्तेमाल करके बिजली पैदा कर रहे हैं, जिसमें कुल 16 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) की क्षमता होती है.


बिजली पैदा करने की यह विधि संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, अल साल्वाडोर, आइसलैंड, तुर्की, केन्या, इंडोनेशिया, फिलीपींस और न्यूजीलैंड सहित पैसिफिक रिंग ऑफ फायर के साथ ज्वालामुखीय क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. लेकिन वैश्विक स्तर पर, भू-तापीय ऊर्जा का हिस्सा बिजली के कुल उत्पादन का सिर्फ 0.5 फीसद ही है.

https://p.dw.com/p/4VbcH

अर्थव्यवस्थाजर्मनी

जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?

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6 घंटे पहले6 घंटे पहले

भूतापीय ऊर्जा यानी जियोथर्मल एनर्जी के तमाम फायदों के बावजूद जीवाश्म ईंधन की तुलना में उसका उपयोग बहुत कम होता है. जानने की कोशिश करते हैं कि ऊर्जा के इस नवीकरणीय स्रोत की लोकप्रियता कैसे बढ़ रही है:


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बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोग

बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोगतस्वीर: Stella/imageBROKER/picture alliance

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पृथ्वी के कोर यानी केंद्र का तापमान करीब 6,000 डिग्री सेल्सियस (11,000 डिग्री फारेनहाइट) है और इस तापमान पर पृथ्वी का केंद्र उतना ही गर्म है जितना कि सूर्य. हालांकि यह तुलना ठीक नहीं है क्योंकि पृथ्वी की सतह से 2,000 से 5,000 मीटर नीचे भी, तापमान 60 से 200 डिग्री सेल्सियस तक होता है जो झुलसा देने वाला होता है. यहां तक कि ज्वालामुखीय क्षेत्रों में तो सतह का तापमान भी 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा से बचत


इस तापमान से ऊष्मा-आधारित ऊर्जा प्राप्त करने संभावना होती है. हमारे पूर्वज जियोथर्मल एनर्जी की शक्ति से अपरिचित नहीं थे. पहली शताब्दी ईस्वी में, पश्चिमी जर्मनी के शहरों में रहने वाले रोमन, जिन्हें अब आखन और वीसबाडेन के नाम से जाना जाता है, वे अपने घरों को गर्म करते थे और गर्म पानी के झरने से नहाते थे.


न्यूजीलैंड में, माओरी लोग पृथ्वी की गर्मी से निकली ऊष्मा का इस्तेमाल करते हुए अपना भोजन पकाते थे और 1904 में, मध्य इटली के एक क्षेत्र लार्डेरेलो में तो बिजली पैदा करने के लिए जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल किया गया था.


भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटभाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांट

भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटतस्वीर: Stefan Ziese/imageBROKER/picture alliance

ज्वालामुखीय क्षेत्र जियोथर्मल एनर्जी को बिजली में बदल देते हैं

इन दिनों, 30 देशों में करीब 400 बिजली संयंत्र पृथ्वी की सतह के नीचे पैदा होने वाली भाप का इस्तेमाल करके बिजली पैदा कर रहे हैं, जिसमें कुल 16 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) की क्षमता होती है.


बिजली पैदा करने की यह विधि संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, अल साल्वाडोर, आइसलैंड, तुर्की, केन्या, इंडोनेशिया, फिलीपींस और न्यूजीलैंड सहित पैसिफिक रिंग ऑफ फायर के साथ ज्वालामुखीय क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. लेकिन वैश्विक स्तर पर, भू-तापीय ऊर्जा का हिस्सा बिजली के कुल उत्पादन का सिर्फ 0.5 फीसद ही है.


ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मे

ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेतस्वीर: DW

गहरी जियोथर्मल एनर्जी से मिलने वाली ऊष्मा हर जगह उपलब्ध है

दुनिया भर में, जियोथर्मल एनर्जी का उपयोग मुख्य रूप से स्विमिंग पूल्स, इमारतों, ग्रीनहाउसेज और शहरी हीटिंग सिस्टम्स को गर्म करने के लिए किया जाता है. इसके लिए 200 डिग्री सेल्सियस तक का पानी 5,000 मीटर गहरे बोरहोल से पंप किया जाता है. फिर गर्मी निकाली जाती है और ठंडा पानी दूसरे बोर के माध्यम से वापस पंप किया जाता है.


ऊष्मा को पकड़ने यानी कैप्चर करने का यह तरीका दुनिया भर में संभव है, सस्ता है और उन देशों में तेजी से लोकप्रिय है जहां ज्वालामुखीय गतिविधियां कम होती हैं. रीन्यूएबल्स ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक, दुनिया भर में जियोथर्मल प्लांट्स की स्थापित क्षमता करीब 38 गीगावॉट है, जो बिजली पैदा करने वाले जियोथर्मल पॉवर प्लांट्स की क्षमता के दोगुने से भी ज्यादा है.


फिलहाल, चीन (14 गीगावॉट), तुर्की (3 गीगावॉट), आइसलैंड (2 गीगावॉट) और जापान (2 गीगावॉट) गहरी जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने में अग्रणी हैं और ज्यादा से ज्यादा शहर, जिलों और ग्रीनहाउस को गर्मी पहुंचा रहे हैं. जर्मनी में, म्यूनिख शहर में सस्ती जियोथर्मल हीटिंग उपलब्ध है और उसने 2035 तक इस क्षेत्र को जलवायु तटस्थ बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है.


जर्मनी की सरकार 2045 तक राष्ट्रव्यापी जलवायु-तटस्थ ताप आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए गहरी यानी डीप जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने पर भी विचार कर रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, गहरी जियोथर्मल एनर्जी 70 गीगावॉट की स्थापित क्षमता से सालाना करीब 300 टेरावॉट घंटे ऊष्मा (गर्मी) पैदा कर सकती है. यह ऊष्मा इतनी ज्यादा है कि भविष्य में सभी इमारतों की हीटिंग के लिए जितनी ऊष्मा की डिमांड है, यह उसे पूरा कर सकती है.

पृथ्वी की सतह से गर्मी निकालने के लिए हीट पम्प्स का इस्तेमाल

हालांकि, जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल हीट पंप्स की मदद से पृथ्वी की सतह के निकट के स्रोतों से भी किया जा रहा है. केवल 50 से 400 मीटर गहरे बोरहोल में, पाइप्स के जरिए पानी को सतह से जमीन के अंदर तक ले जाया जाता है और फिर वापस भी लाया जाता है. इस दौरान पाइप के भीतर का पानी 10 से 20 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाता है. फिर हीट पम्प के जरिए इस ऊर्जा का उपयोग पानी के तापमान को 30 से 70 डिग्री तक पहुंचाने के लिए होता है, और फिर इसी तापमान पर पानी का इस्तेमाल इमारतों को गर्म करने में होता है.


शोधकर्ताओं का मानना है कि जर्मनी में इस छिछली जियोथर्मल एनर्जी के इस्तेमाल से करीब उतनी ही क्षमता वाली ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है जितनी डीप जियोथर्मल एनर्जी से मिलती है. जर्मनी में सिर्फ इन्हीं दो टेक्नोलॉजीज के जरिए इमारतों के लिए भविष्य की संपूर्ण हीटिंग मांग को पूरा किया जा सकता है.

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अर्थव्यवस्थाजर्मनी

जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?

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भूतापीय ऊर्जा यानी जियोथर्मल एनर्जी के तमाम फायदों के बावजूद जीवाश्म ईंधन की तुलना में उसका उपयोग बहुत कम होता है. जानने की कोशिश करते हैं कि ऊर्जा के इस नवीकरणीय स्रोत की लोकप्रियता कैसे बढ़ रही है:


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बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोग

बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोगतस्वीर: Stella/imageBROKER/picture alliance

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पृथ्वी के कोर यानी केंद्र का तापमान करीब 6,000 डिग्री सेल्सियस (11,000 डिग्री फारेनहाइट) है और इस तापमान पर पृथ्वी का केंद्र उतना ही गर्म है जितना कि सूर्य. हालांकि यह तुलना ठीक नहीं है क्योंकि पृथ्वी की सतह से 2,000 से 5,000 मीटर नीचे भी, तापमान 60 से 200 डिग्री सेल्सियस तक होता है जो झुलसा देने वाला होता है. यहां तक कि ज्वालामुखीय क्षेत्रों में तो सतह का तापमान भी 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा से बचत


इस तापमान से ऊष्मा-आधारित ऊर्जा प्राप्त करने संभावना होती है. हमारे पूर्वज जियोथर्मल एनर्जी की शक्ति से अपरिचित नहीं थे. पहली शताब्दी ईस्वी में, पश्चिमी जर्मनी के शहरों में रहने वाले रोमन, जिन्हें अब आखन और वीसबाडेन के नाम से जाना जाता है, वे अपने घरों को गर्म करते थे और गर्म पानी के झरने से नहाते थे.


न्यूजीलैंड में, माओरी लोग पृथ्वी की गर्मी से निकली ऊष्मा का इस्तेमाल करते हुए अपना भोजन पकाते थे और 1904 में, मध्य इटली के एक क्षेत्र लार्डेरेलो में तो बिजली पैदा करने के लिए जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल किया गया था.


भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटभाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांट

भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटतस्वीर: Stefan Ziese/imageBROKER/picture alliance

ज्वालामुखीय क्षेत्र जियोथर्मल एनर्जी को बिजली में बदल देते हैं

इन दिनों, 30 देशों में करीब 400 बिजली संयंत्र पृथ्वी की सतह के नीचे पैदा होने वाली भाप का इस्तेमाल करके बिजली पैदा कर रहे हैं, जिसमें कुल 16 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) की क्षमता होती है.


बिजली पैदा करने की यह विधि संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, अल साल्वाडोर, आइसलैंड, तुर्की, केन्या, इंडोनेशिया, फिलीपींस और न्यूजीलैंड सहित पैसिफिक रिंग ऑफ फायर के साथ ज्वालामुखीय क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. लेकिन वैश्विक स्तर पर, भू-तापीय ऊर्जा का हिस्सा बिजली के कुल उत्पादन का सिर्फ 0.5 फीसद ही है.


ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मे

ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेतस्वीर: DW

गहरी जियोथर्मल एनर्जी से मिलने वाली ऊष्मा हर जगह उपलब्ध है

दुनिया भर में, जियोथर्मल एनर्जी का उपयोग मुख्य रूप से स्विमिंग पूल्स, इमारतों, ग्रीनहाउसेज और शहरी हीटिंग सिस्टम्स को गर्म करने के लिए किया जाता है. इसके लिए 200 डिग्री सेल्सियस तक का पानी 5,000 मीटर गहरे बोरहोल से पंप किया जाता है. फिर गर्मी निकाली जाती है और ठंडा पानी दूसरे बोर के माध्यम से वापस पंप किया जाता है.


ऊष्मा को पकड़ने यानी कैप्चर करने का यह तरीका दुनिया भर में संभव है, सस्ता है और उन देशों में तेजी से लोकप्रिय है जहां ज्वालामुखीय गतिविधियां कम होती हैं. रीन्यूएबल्स ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक, दुनिया भर में जियोथर्मल प्लांट्स की स्थापित क्षमता करीब 38 गीगावॉट है, जो बिजली पैदा करने वाले जियोथर्मल पॉवर प्लांट्स की क्षमता के दोगुने से भी ज्यादा है.


फिलहाल, चीन (14 गीगावॉट), तुर्की (3 गीगावॉट), आइसलैंड (2 गीगावॉट) और जापान (2 गीगावॉट) गहरी जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने में अग्रणी हैं और ज्यादा से ज्यादा शहर, जिलों और ग्रीनहाउस को गर्मी पहुंचा रहे हैं. जर्मनी में, म्यूनिख शहर में सस्ती जियोथर्मल हीटिंग उपलब्ध है और उसने 2035 तक इस क्षेत्र को जलवायु तटस्थ बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है.


जर्मनी की सरकार 2045 तक राष्ट्रव्यापी जलवायु-तटस्थ ताप आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए गहरी यानी डीप जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने पर भी विचार कर रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, गहरी जियोथर्मल एनर्जी 70 गीगावॉट की स्थापित क्षमता से सालाना करीब 300 टेरावॉट घंटे ऊष्मा (गर्मी) पैदा कर सकती है. यह ऊष्मा इतनी ज्यादा है कि भविष्य में सभी इमारतों की हीटिंग के लिए जितनी ऊष्मा की डिमांड है, यह उसे पूरा कर सकती है.


हाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जाहाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जा

हाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जातस्वीर: Thomas Koehler/photothek/picture alliance

पृथ्वी की सतह से गर्मी निकालने के लिए हीट पम्प्स का इस्तेमाल

हालांकि, जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल हीट पंप्स की मदद से पृथ्वी की सतह के निकट के स्रोतों से भी किया जा रहा है. केवल 50 से 400 मीटर गहरे बोरहोल में, पाइप्स के जरिए पानी को सतह से जमीन के अंदर तक ले जाया जाता है और फिर वापस भी लाया जाता है. इस दौरान पाइप के भीतर का पानी 10 से 20 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाता है. फिर हीट पम्प के जरिए इस ऊर्जा का उपयोग पानी के तापमान को 30 से 70 डिग्री तक पहुंचाने के लिए होता है, और फिर इसी तापमान पर पानी का इस्तेमाल इमारतों को गर्म करने में होता है.


शोधकर्ताओं का मानना है कि जर्मनी में इस छिछली जियोथर्मल एनर्जी के इस्तेमाल से करीब उतनी ही क्षमता वाली ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है जितनी डीप जियोथर्मल एनर्जी से मिलती है. जर्मनी में सिर्फ इन्हीं दो टेक्नोलॉजीज के जरिए इमारतों के लिए भविष्य की संपूर्ण हीटिंग मांग को पूरा किया जा सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनीजियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनी

जियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनीतस्वीर: Jens Büttner/dpa/picture alliance

डीप जियोथर्मल एनर्जी से मिलने वाली ऊष्मा की लागत कितनी है?

जर्मनी के छह रिसर्च इंस्टीट्यूट्स के विश्लेषण के मुताबिक, गहरी भू-तापीय ऊर्जा के साथ ऊष्मा प्राप्त करने की लागत तीन यूरो सेंट प्रति किलोवॉट ऑवर से कम है.


अब तक जिस प्रकार की जियोथर्मल एनर्जी तकनीक का उपयोग किया जाता है, वह भूमिगत जलाशयों और पानी वाले क्षेत्रों से गर्म पानी को सतह पर पंप करती है और इस ऊष्मा का उपयोग घरों को गर्म करने के लिए करती है. लेकिन अब जर्मनी के बावेरिया राज्य के गेरेट्स्ट्राइड शहर में दुनिया का ऐसा पहला व्यावसायिक जियोथर्मल प्लांट बनाया जा रहा है जो जलाशयों से निकाले गए पानी पर निर्भर नहीं है.


फ्राउनहोफर रिसर्च इंस्टीट्यूशन फॉर एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड जियोथर्मल सिस्टम्स के प्रमुख प्रोफेसर रॉल्फ ब्रैके कहते हैं कि नई तकनीक की मदद से ऐसे तमाम देश भी उन स्थानों पर जियोथर्मल एनर्जी का दोहन कर सकते हैं जहां पहले ऐसा करना संभव नहीं था.


यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले, यूरोप में कई नगरपालिकाओं में अपनी जरूरतों के लिए प्राकृतिक गैस से इससे भी सस्ती ऊष्मा पैदा की जा सकती थी. इससे गहरे जियोथर्मल एनर्जी प्लांट्स के निर्माण में निवेश करने को लेकर दिलचस्पी कम हो गई. हालांकि, रूस के आक्रमण के बाद जब गैस की कीमतों में तेजी से बढ़ोत्तरी होने लगी तो इस पर आने वाली लागत भी बढ़कर 12 सेंट प्रतिकिलोवॉट से ज्यादा हो गई. इसलिए अब नगरपालिकाएं ऊष्मा की आपूर्ति के लिए गहरी भू-तापीय ऊर्जा में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही हैं.

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जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?

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भूतापीय ऊर्जा यानी जियोथर्मल एनर्जी के तमाम फायदों के बावजूद जीवाश्म ईंधन की तुलना में उसका उपयोग बहुत कम होता है. जानने की कोशिश करते हैं कि ऊर्जा के इस नवीकरणीय स्रोत की लोकप्रियता कैसे बढ़ रही है:


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बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोग

बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोगतस्वीर: Stella/imageBROKER/picture alliance

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पृथ्वी के कोर यानी केंद्र का तापमान करीब 6,000 डिग्री सेल्सियस (11,000 डिग्री फारेनहाइट) है और इस तापमान पर पृथ्वी का केंद्र उतना ही गर्म है जितना कि सूर्य. हालांकि यह तुलना ठीक नहीं है क्योंकि पृथ्वी की सतह से 2,000 से 5,000 मीटर नीचे भी, तापमान 60 से 200 डिग्री सेल्सियस तक होता है जो झुलसा देने वाला होता है. यहां तक कि ज्वालामुखीय क्षेत्रों में तो सतह का तापमान भी 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा से बचत


इस तापमान से ऊष्मा-आधारित ऊर्जा प्राप्त करने संभावना होती है. हमारे पूर्वज जियोथर्मल एनर्जी की शक्ति से अपरिचित नहीं थे. पहली शताब्दी ईस्वी में, पश्चिमी जर्मनी के शहरों में रहने वाले रोमन, जिन्हें अब आखन और वीसबाडेन के नाम से जाना जाता है, वे अपने घरों को गर्म करते थे और गर्म पानी के झरने से नहाते थे.


न्यूजीलैंड में, माओरी लोग पृथ्वी की गर्मी से निकली ऊष्मा का इस्तेमाल करते हुए अपना भोजन पकाते थे और 1904 में, मध्य इटली के एक क्षेत्र लार्डेरेलो में तो बिजली पैदा करने के लिए जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल किया गया था.


भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटभाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांट

भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटतस्वीर: Stefan Ziese/imageBROKER/picture alliance

ज्वालामुखीय क्षेत्र जियोथर्मल एनर्जी को बिजली में बदल देते हैं

इन दिनों, 30 देशों में करीब 400 बिजली संयंत्र पृथ्वी की सतह के नीचे पैदा होने वाली भाप का इस्तेमाल करके बिजली पैदा कर रहे हैं, जिसमें कुल 16 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) की क्षमता होती है.


बिजली पैदा करने की यह विधि संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, अल साल्वाडोर, आइसलैंड, तुर्की, केन्या, इंडोनेशिया, फिलीपींस और न्यूजीलैंड सहित पैसिफिक रिंग ऑफ फायर के साथ ज्वालामुखीय क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. लेकिन वैश्विक स्तर पर, भू-तापीय ऊर्जा का हिस्सा बिजली के कुल उत्पादन का सिर्फ 0.5 फीसद ही है.


ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मे

ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेतस्वीर: DW

गहरी जियोथर्मल एनर्जी से मिलने वाली ऊष्मा हर जगह उपलब्ध है

दुनिया भर में, जियोथर्मल एनर्जी का उपयोग मुख्य रूप से स्विमिंग पूल्स, इमारतों, ग्रीनहाउसेज और शहरी हीटिंग सिस्टम्स को गर्म करने के लिए किया जाता है. इसके लिए 200 डिग्री सेल्सियस तक का पानी 5,000 मीटर गहरे बोरहोल से पंप किया जाता है. फिर गर्मी निकाली जाती है और ठंडा पानी दूसरे बोर के माध्यम से वापस पंप किया जाता है.


ऊष्मा को पकड़ने यानी कैप्चर करने का यह तरीका दुनिया भर में संभव है, सस्ता है और उन देशों में तेजी से लोकप्रिय है जहां ज्वालामुखीय गतिविधियां कम होती हैं. रीन्यूएबल्स ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक, दुनिया भर में जियोथर्मल प्लांट्स की स्थापित क्षमता करीब 38 गीगावॉट है, जो बिजली पैदा करने वाले जियोथर्मल पॉवर प्लांट्स की क्षमता के दोगुने से भी ज्यादा है.


फिलहाल, चीन (14 गीगावॉट), तुर्की (3 गीगावॉट), आइसलैंड (2 गीगावॉट) और जापान (2 गीगावॉट) गहरी जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने में अग्रणी हैं और ज्यादा से ज्यादा शहर, जिलों और ग्रीनहाउस को गर्मी पहुंचा रहे हैं. जर्मनी में, म्यूनिख शहर में सस्ती जियोथर्मल हीटिंग उपलब्ध है और उसने 2035 तक इस क्षेत्र को जलवायु तटस्थ बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है.


जर्मनी की सरकार 2045 तक राष्ट्रव्यापी जलवायु-तटस्थ ताप आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए गहरी यानी डीप जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने पर भी विचार कर रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, गहरी जियोथर्मल एनर्जी 70 गीगावॉट की स्थापित क्षमता से सालाना करीब 300 टेरावॉट घंटे ऊष्मा (गर्मी) पैदा कर सकती है. यह ऊष्मा इतनी ज्यादा है कि भविष्य में सभी इमारतों की हीटिंग के लिए जितनी ऊष्मा की डिमांड है, यह उसे पूरा कर सकती है.


हाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जाहाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जा

हाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जातस्वीर: Thomas Koehler/photothek/picture alliance

पृथ्वी की सतह से गर्मी निकालने के लिए हीट पम्प्स का इस्तेमाल

हालांकि, जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल हीट पंप्स की मदद से पृथ्वी की सतह के निकट के स्रोतों से भी किया जा रहा है. केवल 50 से 400 मीटर गहरे बोरहोल में, पाइप्स के जरिए पानी को सतह से जमीन के अंदर तक ले जाया जाता है और फिर वापस भी लाया जाता है. इस दौरान पाइप के भीतर का पानी 10 से 20 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाता है. फिर हीट पम्प के जरिए इस ऊर्जा का उपयोग पानी के तापमान को 30 से 70 डिग्री तक पहुंचाने के लिए होता है, और फिर इसी तापमान पर पानी का इस्तेमाल इमारतों को गर्म करने में होता है.


शोधकर्ताओं का मानना है कि जर्मनी में इस छिछली जियोथर्मल एनर्जी के इस्तेमाल से करीब उतनी ही क्षमता वाली ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है जितनी डीप जियोथर्मल एनर्जी से मिलती है. जर्मनी में सिर्फ इन्हीं दो टेक्नोलॉजीज के जरिए इमारतों के लिए भविष्य की संपूर्ण हीटिंग मांग को पूरा किया जा सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनीजियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनी

जियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनीतस्वीर: Jens Büttner/dpa/picture alliance

डीप जियोथर्मल एनर्जी से मिलने वाली ऊष्मा की लागत कितनी है?

जर्मनी के छह रिसर्च इंस्टीट्यूट्स के विश्लेषण के मुताबिक, गहरी भू-तापीय ऊर्जा के साथ ऊष्मा प्राप्त करने की लागत तीन यूरो सेंट प्रति किलोवॉट ऑवर से कम है.


अब तक जिस प्रकार की जियोथर्मल एनर्जी तकनीक का उपयोग किया जाता है, वह भूमिगत जलाशयों और पानी वाले क्षेत्रों से गर्म पानी को सतह पर पंप करती है और इस ऊष्मा का उपयोग घरों को गर्म करने के लिए करती है. लेकिन अब जर्मनी के बावेरिया राज्य के गेरेट्स्ट्राइड शहर में दुनिया का ऐसा पहला व्यावसायिक जियोथर्मल प्लांट बनाया जा रहा है जो जलाशयों से निकाले गए पानी पर निर्भर नहीं है.


फ्राउनहोफर रिसर्च इंस्टीट्यूशन फॉर एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड जियोथर्मल सिस्टम्स के प्रमुख प्रोफेसर रॉल्फ ब्रैके कहते हैं कि नई तकनीक की मदद से ऐसे तमाम देश भी उन स्थानों पर जियोथर्मल एनर्जी का दोहन कर सकते हैं जहां पहले ऐसा करना संभव नहीं था.


यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले, यूरोप में कई नगरपालिकाओं में अपनी जरूरतों के लिए प्राकृतिक गैस से इससे भी सस्ती ऊष्मा पैदा की जा सकती थी. इससे गहरे जियोथर्मल एनर्जी प्लांट्स के निर्माण में निवेश करने को लेकर दिलचस्पी कम हो गई. हालांकि, रूस के आक्रमण के बाद जब गैस की कीमतों में तेजी से बढ़ोत्तरी होने लगी तो इस पर आने वाली लागत भी बढ़कर 12 सेंट प्रतिकिलोवॉट से ज्यादा हो गई. इसलिए अब नगरपालिकाएं ऊष्मा की आपूर्ति के लिए गहरी भू-तापीय ऊर्जा में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही हैं.


भारत की जियोथर्मल संभावनाएं


04:00

क्या भूतापीय ऊर्जा ऊष्मा की मांग को पूरा करने में सक्षम है?

नहीं, लेकिन दुनिया की इमारतों की हीटिंग डिमान्ड्स को डीप जियोथर्मल एनर्जी और सतह के नजदीक वाली जियोथर्मल एनर्जी की लगभग असीमित क्षमता के दोहन से जरूर पूरा किया जा सकता है.


लेकिन औद्योगिक जरूरतों के लिए कभी-कभी 200 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान की आवश्यकता होती है, जिसे तकनीक की मौजूदा स्थिति में अकेले भूतापीय ऊर्जा पूरा करने में सक्षम नहीं है. ऐसे उच्च तापमान के लिए, बिजली, बायोगैस, बायोमास और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे जलवायु-अनुकूल विकल्प कहीं बेहतर हैं.


गहरी भू-तापीय ऊर्जा कितनी जल्दी ऊष्मा की आपूर्ति शुरू कर सकती है?

पिछली शताब्दी में, खासतौर पर तेल और गैस उद्योगों ने पृथ्वी की उपसतह, ड्रिल तकनीक, कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के तरीके जैसे क्षेत्रों में काफी ज्ञान अर्जित किया है और परिष्कृत तकनीक विकसित की है. फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड जियोथर्मल एनर्जी (आईईजी) के प्रमुख प्रोफेसर रॉल्फ ब्राके ने डीडब्ल्यू को बताया कि उन्हें विश्वास है कि "यदि तेल और गैस उद्योग अपना ध्यान जियोथर्मल ऊर्जा पर केंद्रित करते हैं तो जियोथर्मल ऊर्जा का तेजी से विस्तार किया जा सकता है."


लेकिन उनका यह भी कहना है कि ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में यदि ये कंपनियां तेल और गैस उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना जारी रखती हैं तो भू-तापीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार करने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों और ड्रिलिंग तकनीक कम पड़ जाएंगी. ब्राके के मुताबिक, यदि मंजूरी जल्दी मिल जाती है तो भू-तापीय ऊष्मा स्रोतों को विकसित करने में दो से तीन साल लगते हैं लेकिन अन्य जगहों पर नौकरशाही की वजह से होने वाली देरी के कारण जर्मनी की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा समय लगता है. जर्मन सरकार अब इस प्रक्रिया को और तेज करना चाहती है और 2030 तक ताप ऊर्जा उत्पादन को मौजूदा 1 टेरावॉट की तुलना में दस गुना बढ़ाना चाहती है.

 डीप जियोथर्मल एनर्जी भूकंप का कारण बन सकती है?

जी हां. भूकंपीय गतिविधि वाले क्षेत्रों में, भूतापीय ऊर्जा छोटे भूकंपों को ट्रिगर कर सकती है. क्योंकि जब पानी को बहुत अधिक दबाव के साथ पृथ्वी की ऊपरी सतह में इंजेक्ट किया जाता है तो वहां तनाव पैदा होता है. कुछ मामलों में, भूकंप के झटकों के कारण इमारतों में दरारें पड़ गईं और इस तकनीक का सार्वजनिक विरोध भी हुआ.


ब्राके कहते हैं कि ऐसे क्षेत्रों में भूकंप की कोई रिपोर्ट नहीं आई जहां किसी तरह का बाहरी तनाव नहीं था. इस बीच, भू-तापीय तकनीकों में भी सुधार किया गया है. अब कम भूमिगत जल दबाव और अधिक बेहतर मॉनीटिरिंग तरीकों से भूकंपी झटकों से बचा जा सकता है.


लेकिन तेल, गैस और कोयला निष्कर्षण की तुलना में, जियोथर्मल तकनीक में बहुत कम जोखिम है. ब्राके कहते हैं, "यह हमारी पृथ्वी से ऊर्जा का अब तक का सबसे सुरक्षित स्रोत है. Sabhar dw.de

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उपलब्धि: 53 साल की महिला का कायाकल्प, 30 जैसी बनाई त्वचा, वैज्ञानिक ने तकनीक का नाम रखा 'टाइम जंप'

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उपलब्धि: 53 साल की महिला का कायाकल्प, 30 जैसी बनाई त्वचा, वैज्ञानिक ने तकनीक का नाम रखा 'टाइम जंप' 

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह तकनीक चेहरे की कोशिकाओं को बगैर नुकसान पहुंचाए उसे जवां बनाए रखती है। वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को ‘टाइम जंप’ का नाम दिया है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता व नोबेल पुरस्कार विजेता शिनाया यामानाका ने भी 2006 में इस तकनीक पर काम किया था। 

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने एक ऐसी तकनीक खोजी है, जिसके इस्तेमाल से उन्होंने 53 वर्षीय महिला की त्वचा को 30 वर्षीय युवती के जैसे जवां बनाने में सफलता पाई है।

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह तकनीक चेहरे की कोशिकाओं को बगैर नुकसान पहुंचाए उसे जवां बनाए रखती है। ‘ई लाइफ पत्रिका’ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को ‘टाइम जंप’ का नाम दिया है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता व नोबेल पुरस्कार विजेता शिनाया यामानाका ने भी 2006 में इस तकनीक पर काम किया था।  वैज्ञानिकों ने कहा कि निष्कर्ष अभी शुरुआती चरण में हैं, लेकिन तकनीक विकसित हो चुकी है। अगर अधिक शोध किया जाता है, तो इस विधि का इस्तेमाल रीजेनेरिटिव मेडिसिन (चेहरे को जवां दिखाने वाली दवाएं) जैसी एक उन्नत दवा बनाने में किया जा सकता है।

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उपलब्धि: 53 साल की महिला का कायाकल्प, 30 जैसी बनाई त्वचा, वैज्ञानिक ने तकनीक का नाम रखा 'टाइम जंप'

एजेंसी, वाशिंगटन। Published by: देव कश्यप Updated Mon, 11 Apr 2022 06:27 AM IST

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सार

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह तकनीक चेहरे की कोशिकाओं को बगैर नुकसान पहुंचाए उसे जवां बनाए रखती है। वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को ‘टाइम जंप’ का नाम दिया है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता व नोबेल पुरस्कार विजेता शिनाया यामानाका ने भी 2006 में इस तकनीक पर काम किया था। 

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Rejuvenation of 53 year old woman skin made like 30 Years age Scientist named the Technique Time Jump

सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया

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विस्तार

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने एक ऐसी तकनीक खोजी है, जिसके इस्तेमाल से उन्होंने 53 वर्षीय महिला की त्वचा को 30 वर्षीय युवती के जैसे जवां बनाने में सफलता पाई है।

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कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह तकनीक चेहरे की कोशिकाओं को बगैर नुकसान पहुंचाए उसे जवां बनाए रखती है। ‘ई लाइफ पत्रिका’ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को ‘टाइम जंप’ का नाम दिया है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता व नोबेल पुरस्कार विजेता शिनाया यामानाका ने भी 2006 में इस तकनीक पर काम किया था।  वैज्ञानिकों ने कहा कि निष्कर्ष अभी शुरुआती चरण में हैं, लेकिन तकनीक विकसित हो चुकी है। अगर अधिक शोध किया जाता है, तो इस विधि का इस्तेमाल रीजेनेरिटिव मेडिसिन (चेहरे को जवां दिखाने वाली दवाएं) जैसी एक उन्नत दवा बनाने में किया जा सकता है।




चेहरे की कोशिकाओं को नुकसान बिना जवां बनाए रखेगी तकनीक

स्कॉटलैंड में रोसलिन इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने करीब 25 साल पहले एक डॉली नामक भेड़ का क्लोन बनाकर उस पर किया था काम। 

इसमें वैज्ञानिकों ने भेड़ से ली गई स्तन ग्रंथि कोशिका को भ्रूण में बदल दिया था। 

तकनीक का उद्देश्य मानव भ्रूण स्टेम सेल बनाना था, जिसे मांसपेशियों, तंत्रिका कोशिकाओं जैसे विशिष्ट ऊतकों में विकसित किया जा सकता था। इनका उपयोग शरीर के पुराने अंगों को बदलने के लिए किया जा सकता है।

50 दिनों की है पूरी प्रक्रिया

नोबेल विजेता वैज्ञानिक की तकनीक पर काम करते हुए जर्मन आणविक जीवविज्ञानी वुल्फ रीक, पोस्टडॉक्टरल छात्र दिलजीत गिल व संस्थान की टीम ने बताया िक स्टेम सेल रीप्रोग्रामिंग की पूरी प्रक्रिया 50 दिन की है, जो कि कई चरणों में पूरी होती है। sabhar Amar Ujala.com

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