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मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

कुण्डलिनी रहस्य

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कुण्डलिनी साधना से ऐसी कोई चमत्कारिक शक्ति नही मिलेगी कि आप खडे़ खडे़ गायब हो जायें ।आपकी उंगलियों या दृष्टि से कोई लपटें या किरण भी नहीं निकलेंगी।

हां आपकी चैतन्य शक्ति में विलक्षण परिवर्तन होगा। aजीवन शक्ति और ताकत बढ़ जायेगी।

सम्मोहन, दिव्य दृष्टि, अन्तर्ज्ञान, अन्तर्दृष्टि तीव्रतम होती चली जायेगी।

शारीरिक ऊर्जा मे वृद्धि होगी। भविष्य दर्शन होगा। भविष्यवाणीयां फलित होंगी।

कुण्डलिनी साधना जितनी सरल है उतनी ही सहजयोग में दुस्कर साधना समझा जाता है ।

वस्तुत सबसे अधिक परिश्रम मूलाधार पर करना होता है इसके फव्वारे  को तीव्र कर लेना या कथित सर्प के फण को उठा देना कठिन नही है ।

वास्तविक कठिनाई इस फण को ऊपर के स्वाधिष्ठान के नाभिक तक ले जाना है।

यह ऋणात्मक उर्जा है और इसका प्रवाह सबसे तीव्र होता है, क्योंकि यह ऊर्जा परिपथ के ऋण बिन्दू से उत्पन्न होती है ।

सर्वाधिक कठिनाई इसे नीचे की ओर क्षरित या पतित होने से रोकने मे है।

यहां के शिवलिंग से उत्पन्न होने वाली उर्जा महिषासुर है। इससे अन्धीं तीव्रता है। काम, क्रोध, कर्कशता, निर्माता, क्रूरता, मर्यादाहीन ,उच्छृंखलता इसका गुण है। sयह किसी का नियन्त्रण नही मानती है। जब तीव्र होकर दौड़ती है।

तो भैसें की तरह खतरों आदि को बारे मे अंधी हो जाती है

ज्ञान विवेक लुप्त हो जाता है ।

यह काली है जो शिव (शिव/विवेक)को पैरों तले रौंद डालती है।

तन्त्र विधा मे सबसे कठिन सिद्धि इसी शक्ति को करने मे होती है ।

इस बिन्दू को जाग्रत करना कठिन नही है । कठिनाई यह है कि जब यह उर्जा बढ़ती है, तो उपर्युक्त गुणों कि मात्रा भी बढती है।

इन गुणों मे बहकर उत्पन्न उर्जा को क्षरित करने से रोकना ही वास्तविक सिद्धि है ।

इसके लिये तंत्र मेनिर्देश है कि इस भैंसे की बलि देने या निरन्तर प्रयत्न करते रहें ।भैसें की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखें शराब पीकर भी इस उर्जा को आप प्राप्त कर सकते है। 

पर वास्तव मे सिद्धि तो वह है कि शराब पीयें ,पर नियन्त्रत रहें। काम की भावना से भी रति के समय भी यह ऊर्जा बढ़ जाती है ।

इस समय आप भैंसे की सवारी कर रहे होते है, तेज रफ्तार से दौड़ते हुए अंन्धे भैंसे को रोकने की कला नही आती तो वह पतन की खाई मे गिरा देता ही है ।

विवेक से इस भैसे  को नियन्त्रत करके इस भाव की बलि  देना ही तंत्र के भैंसे की बलि  है।

लोग धर्मस्थलों पर भैसा काट रहे है मूर्खों के सिर पर सींग नही होते । वे देखने मे आदमी जैसे लगते है।

तंत्र मे भैंसे के रक्त, सींग, पूछा के बाल गोबर  आदि कि उपयोग होता है, परन्तु यह रसायन सामग्री योग है।लेकिन इसका अर्थ भैंसे  को काटने से नही।

इसी तरह स्वाधिष्ठान की ऊर्जा बढ़ने पर से अंधी चंचलता या क्रियाशीलता बढ़ाती है।

मन हमेशा चंचल ,उन्माद बना रहता है । वह भी तामसी भाव मे उतेजित ठीक बकरी के बच्चे की तरह यदि आप इस चंचलता को नियन्त्रित करके मन के बकरी को बच्चे जैसी प्रवृत्ति की बलि देते है तो सिद्धि अवश्य मिलेगी।

स्वाधिष्ठान मां दुर्गा का स्थान है कृपया इस देवी को चरणों पर मालुम पशुओं की बलि मत किजिए।

माता कभी राक्षसी नही होती वह आपकी ही नही इस सृष्टि की माता है।

वह बकरी के बच्चे कि भी माता हैh इस देवी को आंचल को रक्त से संचित कर दिया जाता है ।

मै अहिंसा, भावुकता को वशीभूत नही हूं आपको मांसाहार से भी नही रोक रहा मगर कम से कम यह दुर्गा माता को नाम पर तो रोकये।

तंत्र मे इसका अर्थ कुछ ओर ही है कुण्डलिनी साधना आजकल इसकी हर तरफ चर्चा है।इस चर्चा का  लाभ अनेक तथाकथित अवतार आदि उठा रहे है।

इनका दावे डी,वी, डी , फोन पर फोटो पर शक्ति पात करके एवं कुछ तो दावा करते है ये दो घण्टे मे कुण्डलिनी जाग्रत कर देते है ऐसे विज्ञापन टी वी आदि संचार माध्यम  मे देखने को मिलते रहते है।

कुछ से हमने भी पुछा  कि कुण्डलिनी है क्या?

तो उत्तर मे वे बताने लगे कि मूलाधार मे एक शिवलिंग है उसमे सांप लिपटा है उसका फण लिंग मुण्ड पर है।

उस फण को जाग्रत करना ही कुण्डलिनी जागरण है।

ये लोग ठग है। ये कुछ नही जानते मूलाधार मे शिवलिंग अवश्य है पर वहाँ सांप जैसा कुछ नही है ।

वहाँ पर है क्या यह एक उर्जा संरचना है यह प्रथम परमाणु की संरचना है इसके शीर्ष पर सांप नही । यह इसके शीर्ष से निकलती उर्जा धाराएँ है।

जो शेषनाग के फणों  या फव्वारों की बुदों कि भाति निकलती है फुफकारती हुई उर्जा धाराएं ।

यह संरचना इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक इकाई कि है प्रत्येक उर्जा बिन्दू की है । मूलाधार मे नही रीढ मे व्याप्त 9बिन्दूओं , या शरीर को तैंतीस करोड बिन्दुओं , सभी तारों ,सूर्य, नाभिकों, सी संरचना है ।

हमारे शरीर मे जो नौ उर्जा बिन्दू मुख्य kहै रीढ़ मे उनके मध्य कुछ रिक्त स्थान है जिसे सुषुम्ना नाडी कहते है जिनमे उर्जाधाराएं एवं बिन्दू तो है पर मुख्य बिन्दु जैसे नही है  sabhar Facebook wall sakti upasak agyani

मूलाधार के शिवलिंग के शीर्ष से फव्वारों के रूप मे निकलती उर्जा को तीव्र करके उपर को बिन्दु के शिवलिंग के नीचे पुच्छल उर्जा धारा से मिलाने से शक्ति प्राप्त होती है

तब इसे उपर खींचा जाता है और उपरी शिवलिंग के नाभिक मे ले जाया जाता है इससे शाट् सर्किट होता है ( दोनो+ धन होते है) इससे दुसरे शिवलिंग का फव्वारा बढ जाता है ।

कुण्डलिनी साधना मे एक मूलाधार ये फव्वारे को उपर स्वाधिष्ठान के केन्द्र मे मिलाने से कई चमत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त होती है ।

परन्तु यह तो वर्षों का काम है वह भी निरन्तर लगन के साथ अभ्यास करने पर परन्तु दो घण्टे मे ईश्वर ही जानता है कि यह कैसा धोखा है।

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मन्त्र दोष

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ग्रहित मंत्र के अनुष्ठान करते समय साधक का कर्तव्य होता है कि मंत्र दोषों का सावधानीपूर्वक निराकरण कर ले, मंत्र के अर्थात मंत्रोंपासक के आठ दोष होते हैं पहला दोष है अभक्ति और इन रहस्यों को समझने की लेने के पश्चात मंत्रों को केवल शब्द समूह या भाषा के वाक्य मात्र मान लेने की भूल साधक नहीं कर सकता फिर भी यदि कोई व्यक्ति मंत्र को भाषा मात्र समझता हैa तो यह अभक्ति है।

किसी दूसरे के मंत्र को श्रेष्ठ और अपने मंत्र को निम्न कोटि का मानता है तो भी यह अभक्ति ही है अर्थात इन दोनों ही स्थितियों में मंत्र में मंत्र भावना और श्रद्धा नहीं रह पाती श्रद्धा नहीं होने से मंत्र की साधना फलवती नहीं होती है।

#अक्षर_भ्रान्ति-- साधना का दूसरा दोष अक्षर भ्रान्तिं साधक भ्रम वश अक्षरों में विपर्यक कर जाए अथवा अधिक जोड़ दें तो अक्षर भ्रान्ति दोष होता है उदाहरण के लिए ,भार्या रक्षतु भैरवी, किस स्थान पर भार्या भक्षतु भैरवी कश्यप अक्षर भ्रांति के दोष में ही दिन आ जाएगा।

#लुप्त-- तीसरा दोष लुप्ताक्षरता का है साधक मंत्र ग्रहण करने के समय सावधानी वर्ष या जप करते समय किसी अक्सर को भूल जाता है छोड़ देता है तो लुप्त दोष होता है।

#छिन्न-- मंत्र में प्रयुक्त संयुक्त अक्षर का एक अंश टूटता हुआ सा हो तो छिन्न दोष होता है।

#ह्नस्व-- दीर्घ वर्णन के स्थान पर ह्रस्व वर्ण का प्रयोग ह्रस्व दोष होता है जैसे मारवाड़ी लोग गधे को गधा बोलते हैं यहां ध के स्थान पर द का उपयोग होता हैs जैसे पंजाब के लोग छुट्टी शब्द को छुटि  बोलने में ह्रस्व दोष होता है भाषा में कुछ भी होता हूं मंत्र व्यवहार के कारण ध्वनि और रूप में परिवर्तन धर्मा नहीं होते इसलिए जो अक्सर जिस रूप में जिस ले में बोला जाता है उसी में बोलना चाहिए किसी दीर्घ मात्रा को ह्रस्व मात्रा के रूप में बोलना भी इसी दोष के अंतर्गत आता है।

#दीर्घ-- ह्रस्व से विपरीत स्थिति वाला दीर्घ दोष हुआ करता है छोटी मात्रा को बड़ी मात्रा के रूप में बोलने पर अथवा अल्पप्राण अक्षरों को महाप्राण की तरह बोलने पर भी दीर्घ दोष होता है।

#कथन-- मंत्र एक नितांत गुप्त रहस्य हैh मंत्र शब्द का दूसरा अर्थ गोपन ही होता है अतः मंत्र का प्रकाशन कथन दोष की श्रेणी में आता है किसी भी स्थिति में व्यक्ति को अपना मंत्र प्रकाशित नहीं करना चाहिए।

#स्वप्न_कथन-- यदि कोई व्यक्ति अपनी मंत्र को संपन्न में किसी दूसरे को बताता है तो स्वप्न कथन का दोषी होता है भीम दोस्तों के विभिन्न फल सामने आते हैं oकई बार साधक को चित्त विपेक्ष हो जाता है

किसी का शरीर लक्षण होने लग जाता है किसी को अर्थ की हानि होने लगती है किसी के परिवार जनों को आधि व्याधि सताने लगती है अर्थात जो मंत्र व्यक्ति के कल्याण का मार्ग खोलता था ऋद्धि सिद्धि प्रदान करता था वही अशुभ बन जाता है kनियम पूर्वक उपासना करने पर भी यदि विपरीत लक्षण और अशुभ फल मिलता हो तो व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने मंत्र का और साधना का आत्म निरीक्षण करें और उपर्युक्त दोनों में से कोई दोष दिखाई दे तो उसका प्रायश्चित  करके विधिपूर्वक पुणे अनुष्ठान करें ।sabhar Facebook wall sakti upasak

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रविवार, 26 दिसंबर 2021

भैरवनाथ के रहस्य एवं साधना...

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#भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है।

 

भैरव उत्पत्ति👉 उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। मुख्‍यत: दो भैरवों की पूजा का प्रचलन है, एक काल भैरव और दूसरे बटुक भैरव।  पुराणों में भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के पांचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है।

 

लोक देवता👉  लोक जीवन में भगवान भैरव को भैरू महाराज, भैरू बाबा, मामा भैरव, नाना भैरव आदि नामों से जाना जाता है। कई समाज के ये कुल देवता हैं और इन्हें पूजने का प्रचलन भी भिन्न-भिन्न है, जो कि विधिवत न होकर स्थानीय परम्परा का हिस्सा है। यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान भैरव किसी के शरीर में नहीं आते।

 

पालिया महाराज👉  सड़क के किनारे भैरू महाराज के नाम से ज्यादातर जो ओटले या स्थान बना रखे हैं दरअसल वे उन मृत आत्माओं के स्थान हैं जिनकी मृत्यु उक्त स्थान पर दुर्घटना या अन्य कारणों से हो गई है। ऐसे किसी स्थान का भगवान भैरव से कोई संबंध नहीं। उक्त स्थान पर मत्था टेकना मान्य नहीं है।

 

भैरव मंदिर👉  भैरव का प्रसिद्ध, प्राचीन और चमत्कारिक मंदिर उज्जैन और काशी में है। काल भैरव का उज्जैन में और बटुक भैरव का लखनऊ में मंदिर है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दूसरा नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। तीसरा उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है। नैनीताल के समीप घोड़ा खाड़ का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहां गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है।

 

काल भैरव👉  काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोष काल में हुआ था। यह भगवान का साहसिक युवा रूप है। उक्त रूप की आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय की प्राप्ति होती है। व्यक्ति में साहस का संचार होता है। सभी तरह के भय से मुक्ति मिलती है। काल भैरव को शंकर का रुद्रावतार माना जाता है।

 

काल भैरव की आराधना के लिए मंत्र है- ।। ॐ भैरवाय नम:।।

 

बटुक भैरव👉  'बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन:। ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।'


अर्थात्👉 ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी है। यह कार्य में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। 

 

उक्त आराधना के लिए मंत्र है-  ।।ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।।

 

भैरव तंत्र👉  योग में जिसे समाधि पद कहा गया है, भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है।

 

भैरव आराधना से शनि शांत👉  एकमात्र भैरव की आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है। आराधना का दिन रविवार और मंगलवार नियुक्त है। पुराणों के अनुसार भाद्रपद माह को भैरव पूजा के लिए अति उत्तम माना गया है। उक्त माह के रविवार को बड़ा रविवार मानते हुए व्रत रखते हैं। आराधना से पूर्व जान लें कि कुत्ते को कभी दुत्कारे नहीं बल्कि उसे भरपेट भोजन कराएं। जुआ, सट्टा, शराब, ब्याजखोरी, अनैतिक कृत्य आदि आदतों से दूर रहें। दांत और आंत साफ रखें। पवित्र होकर ही सात्विक आराधना करें। अपवि‍त्रता वर्जित है।

 

भैरव चरित्र👉  भैरव के चरित्र का भयावह चित्रण कर तथा घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं कर लोगों में उनके प्रति एक डर और उपेक्षा का भाव भरने वाले तांत्रिकों और अन्य पूजकों को भगवान भैरव माफ करें। दरअसल भैरव वैसे नहीं है जैसा कि उनका चित्रण किया गया है। वे मांस और मदिरा से दूर रहने वाले शिव और दुर्गा के भक्त हैं। उनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक है।

 

उनका कार्य है शिव की नगरी काशी की सुरक्षा करना और समाज के अपराधियों को पकड़कर दंड के लिए प्रस्तुत करना। जैसे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जिसके पास जासूसी कुत्ता होता है। उक्त अधिकारी का जो कार्य होता है वही भगवान भैरव का कार्य है।


श्री भैरव के आठ रूप हैं जिसमें प्रमुख रूप से बटुक भैरव, महाकाल भैरव तथा स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख हैं। जिस भैरव की पूजा करें उसी रूप के नाम का उच्चारण होना चाहिए। सभी भैरवों में बटुक भैरव उपासना का अधिक प्रचलन है। तांत्रिक ग्रंथों में अष्ट भैरव के नामों की प्रसिद्धि है। वे इस प्रकार हैं-


1. असितांग भैरव,

2. चंड भैरव,

3. रूरू भैरव,

4. क्रोध भैरव,

5. उन्मत्त भैरव,

6. कपाल भैरव,

7. भीषण भैरव

8. संहार भैरव।


क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है।

श्री भैरव से काल भी भयभीत रहता है अत: उनका एक रूप'काल भैरव'के नाम से विख्यात हैं।


दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें"आमर्दक"कहा गया है।


शिवजी ने भैरव को काशी के कोतवाल पद पर प्रतिष्ठित किया है।


जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रह अशुभ फलदायक हों, नीचगत अथवा शत्रु क्षेत्रीय हों। शनि की साढ़े-साती या ढैय्या से पीडित हों, तो वे व्यक्ति भैरव जयंती अथवा किसी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रविवार, मंगलवार या बुधवार प्रारम्भ कर बटुक भैरव मूल मंत्र की एक माला (१०८ बार) का जाप प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से ४१ दिन तक करें, अवश्य ही शुभ फलों की प्राप्ति होगी।

भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहाँ शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में १२ से ३ बजे का माना जाता है।


भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।


जन्मकुंडली में अगर आप मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण आसानी से कर सकते है। राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगानालाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है।

भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।


खास तौर पर कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है। भारत भर में कई परिवारों में कुलदेवता के रूप में भैरव की पूजा करने का विधान हैं। वैसे तो आम आदमी, शनि, कालिका माँ और काल भैरव का नाम सुनते ही घबराने लगते हैं, लेकिन सच्चे दिल से की गई इनकी आराधना आपके जीवन के रूप-रंग को बदल सकती है। ये सभी देवता आपको घबराने के लिए नहीं बल्कि आपको सुखी जीवन देने के लिए तत्पर रहते है बशर्ते आप सही रास्ते पर चलते रहे।

भैरव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके उनके कर्म सिद्धि को अपने आशीर्वाद से नवाजते है। भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त खत्म कर देती है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है।


एक बार भगवान शिव के क्रोधित होने पर काल भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने ब्रह्माजी के उस मस्तक को अपने नाखून से काट दिया जिससे उन्होंने असमर्थता जताई। तब ब्रह्म हत्या को लेकर हुई आकाशवाणी के तहत ही भगवान काल भैरव काशी में स्थापित हो गए थे।


मध्यप्रदेश के उज्जैन में भी कालभैरव के ऐतिहासिक मंदिर है, जो बहुत महत्व का है। पुरानी धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कालभैरव को यह वरदान है कि भगवान शिव की पूजा से पहले उनकी पूजा होगी। इसलिए उज्जैन दर्शन के समय कालभैरव के मंदिर जाना अनिवार्य है। तभी महाकाल की पूजा का लाभ आपको मिल पाता है।

 

 !! भैरव साधना !!

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मंत्र संग्रह पूर्व-पीठिका

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मेरु-पृष्ठ पर सुखासीन, वरदा देवाधिदेव शंकर से !!

पूछा देवी पार्वती ने, अखिल विश्व-गुरु परमेश्वर से !

जन-जन के कल्याण हेतु, वह सर्व-सिद्धिदा मन्त्र बताएँ !!


जिससे सभी आपदाओं से साधक की रक्षा हो, वह सुख पाए !

शिव बोले, आपद्-उद्धारक मन्त्र, स्तोत्र  मैं बतलाता,

देवि ! पाठ जप कर जिसका, है मानव सदा शान्ति-सुख पाता !!


                *!! ध्यान !!*


*सात्विकः-*

बाल-स्वरुप वटुक भैरव-स्फटिकोज्जवल-स्वरुप है जिनका,

घुँघराले केशों से सज्जित-गरिमा-युक्त रुप है जिनका,

दिव्य कलात्मक मणि-मय किंकिणि नूपुर से वे जो शोभित हैं !

भव्य-स्वरुप त्रिलोचन-धारी जिनसे पूर्ण-सृष्टि सुरभित है !

कर-कमलों में शूल-दण्ड-धारी का ध्यान-यजन करता हूँ !

रात्रि-दिवस उन ईश वटुक-भैरव का मैं वन्दन करता हूँ !!


*राजसः-*

नवल उदीयमान-सविता-सम, भैरव का शरीर शोभित है,

रक्त-अंग-रागी, त्रैलोचन हैं जो, जिनका मुख हर्षित है !

नील-वर्ण-ग्रीवा में भूषण, रक्त-माल धारण करते हैं !

शूल, कपाल, अभय, वर-मुद्रा ले साधक का भय हरते हैं !

रक्त-वस्त्र बन्धूक-पुष्प-सा जिनका, जिनसे है जग सुरभित,

ध्यान करुँ उन भैरव का, जिनके केशों पर चन्द्र सुशोभित !!


*तामसः-*

तन की कान्ति नील-पर्वत-सी, मुक्ता-माल, चन्द्र धारण कर,

पिंगल-वर्ण-नेत्रवाले वे ईश दिगम्बर, रुप भयंकर !

डमरु, खड्ग, अभय-मुद्रा, नर-मुण्ड, शुल वे धारण करते,

अंकुश, घण्टा, सर्प हस्त में लेकर साधक का भय हरते !

दिव्य-मणि-जटित किंकिणि, नूपुर आदि भूषणों से जो शोभित,

भीषण सन्त-पंक्ति-धारी भैरव हों मुझसे पूजित, अर्चित !!


!! तांत्रोक्त भैरव कवच !!

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ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः !

पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु !!

पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा !

आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः !!

नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे !

वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः !!

भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा !

संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः !!

ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः !

सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः !!

रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु !

जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च !!

डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः !

हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः !!

पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः !

मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा !!

महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा !

वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा !!


!! भैरव वशीकरण मन्त्र !!

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“ॐनमो रुद्राय, कपिलाय, भैरवाय, त्रिलोक- नाथाय, ॐ ह्रीं फट् स्वाहा ”

“ॐ भ्रां भ्रां भूँ भैरवाय स्वाहा। ॐ भं भं भं अमुक-मोहनाय स्वाहा ”

“ॐ नमो काला गोरा भैरुं वीर, पर-नारी सूँ देही सीर ! गुड़ परिदीयी गोरख जाणी, गुद्दी पकड़ दे भैंरु आणी, गुड़, रक्त का धरि ग्रास, कदे न छोड़े मेरा पाश ! जीवत सवै देवरो, मूआ सेवै मसाण ! पकड़ पलना ल्यावे ! काला भैंरु न लावै, तो अक्षर देवी कालिका की आण ! फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा !”


ॐ भैरवाय नम: !!*

ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवायनम:!

ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ !!


ॐ ह्रीं वां बटुकाये क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये कुरु कुरु बटुकाये ह्रीं बटुकाये स्वाहा !!


!! श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत् !!

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विनियोग -

 ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षणभैरव महामंत्रस्य श्री महाभैरव ब्रह्मा ऋषिः , त्रिष्टुप्छन्दः , त्रिमूर्तिरूपी भगवान स्वर्णाकर्षणभैरवो देवता, ह्रीं बीजं , सः शक्तिः, वं कीलकं मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः !!


      अब बाए हाथ मे जल लेकर दाहिने हाथ की उंगलियों को जल से स्पर्श करके मंत्र मे दिये हुए शरीर के स्थानो पर स्पर्श करे !!


!! ऋष्यादिन्यास !!

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श्री महाभैरव ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि !

त्रिष्टुप छ्न्दसे नमः मुखे !

श्री त्रिमूर्तिरूपी भगवान

स्वर्णाकर्षण भैरव देवतायै नमः ह्रदिः !

ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये !

सः शक्तये नमः पादयोः !

वं कीलकाय नमः नाभौ !

मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं

स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे !

मंत्र बोलते हुए दोनो हाथ के उंगलियों को आग्या चक्र पर स्पर्श करे ! अंगुष्ठ का मंत्र बोलते समय दोनो अंगुष्ठ से आग्या चक्र पर स्पर्श करना है !!


!! करन्यास !!

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ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः !

ऐं तर्जनीभ्यां नमः !

क्लां ह्रां मध्याभ्यां नमः !

क्लीं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः !

क्लूं ह्रूं कनिष्ठिकाभ्यां नमः !

सं वं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः !

अब मंत्र बोलते हुए दाहिने हाथ से मंत्र मे कहे गये शरीर के भाग पर स्पर्श करना है !!


!! हृदयादि न्यास !!

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आपदुद्धारणाय हृदयाय नमः !

अजामल वधाय शिरसे स्वाहा !

लोकेश्वराय शिखायै वषट् !

स्वर्णाकर्षण भैरवाय कवचाय हुम् !

मम् दारिद्र्य विद्वेषणाय नेत्रत्रयाय वौषट् !

श्रीमहाभैरवाय नमः अस्त्राय फट् !

रं रं रं ज्वलत्प्रकाशाय नमः इति दिग्बन्धः !!


      अब दोनो हाथ जोड़कर ध्यान करे !!

(ध्यान मंत्र का  उच्चारण करें !!

 जिसका हिन्दी में सरलार्थ नीचे दिया गया है ! वैसा ही आप भाव करें )


ॐ पीतवर्णं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं पीतवाससम् !

अक्षयं स्वर्णमाणिक्य तड़ित-पूरितपात्रकम् !!

अभिलसन् महाशूलं चामरं तोमरोद्वहम् !

सततं चिन्तये देवं भैरवं सर्वसिद्धिदम् !!


मंदारद्रुमकल्पमूलमहिते माणिक्य सिंहासने, संविष्टोदरभिन्न चम्पकरुचा देव्या समालिंगितः !

भक्तेभ्यः कररत्नपात्रभरितं स्वर्णददानो भृशं, स्वर्णाकर्षण भैरवो विजयते स्वर्णाकृति : सर्वदा !!


हिन्दी भावार्थ :- श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव जी मंदार (सफेद आक) के नीचे माणिक्य के सिंहासन पर बैठे हैं ! उनके वाम भाग में देवि उनसे समालिंगित हैं ! उनकी देह आभा पीली है तथा उन्होंने पीले ही वस्त्र धारण किये हैं ! उनके तीन नेत्र हैं ! चार बाहु हैं जिन्में उन्होंने स्वर्ण - माणिक्य से भरे हुए पात्र, महाशूल, चामर तथा तोमर को धारण कर रखा है ! वे अपने भक्तों को स्वर्ण देने के लिए तत्पर हैं। ऐसे सर्वसिद्धिप्रदाता श्री स्वर्णाकर्षण भैरव का मैं अपने हृदय में ध्यान व आह्वान करता हूं उनकी शरण ग्रहण करता हूं ! आप मेरे दारिद्रय का नाश कर मुझे अक्षय अचल धन समृद्धि और स्वर्ण राशि प्रदान करे और मुझ पर अपनी कृपा वृष्टि करें।

मानसोपचार पुजन के मंत्रो को मन मे बोलना है !


!! मानसोपचार पूजन !!

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लं पृथिव्यात्मने गंधतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं गंधं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

हं आकाशात्मने शब्दतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं पुष्पं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

यं वायव्यात्मने स्पर्शतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं धूपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

रं वह्न्यात्मने रूपतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं दीपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

वं अमृतात्मने रसतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं अमृतमहानैवेद्यं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

सं सर्वात्मने ताम्बूलादि सर्वोपचारान् पूजां श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !!


!! मंत्र !!

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ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं स: वं आपदुद्धारणाय अजामलवधाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण भैरवाय मम् दारिद्रय विद्वेषणाय ॐ ह्रीं महाभैरवाय नम: !!


मंत्र जाप के बाद स्तोत्र का एक पाठ अवश्य करे !!


!! श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्त्रोत् !!

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!! श्री मार्कण्डेय उवाच !!


भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम !

पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः !!

इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं !

तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् !!

तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर !!


!! श्री नन्दिकेश्वर उवाच !!


इदं ब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक !

स्तोत्रं वटुक-नाथस्य, दुर्लभं भुवन-त्रये !!

सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् !

दारिद्र्य-शमनं पुंसामापदा-भय-हारकम् !!

अष्टैश्वर्य-प्रदं नृणां, पराजय-विनाशनम् !

महा-कान्ति-प्रदं चैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् !!

महा-कीर्ति-प्रदं स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः !

न वक्तव्यं निराचारे, हि पुत्राय च सर्वथा !!

शुचये गुरु-भक्ताय, शुचयेऽपि तपस्विने !

महा-भैरव-भक्ताय, सेविते निर्धनाय च !!

निज-भक्ताय वक्तव्यमन्यथा शापमाप्नुयात् !

स्तोत्रमेतत् भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः !!

श्रृणुष्व ब्रूहितो ब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् !!


!! विनियोग !!


ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-स्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-देवता, ह्रीं बीजं, क्लीं शक्ति, सः कीलकम्, मम-सर्व-काम-सिद्धयर्थे पाठे विनियोगः !!


!! ध्यान !!


मन्दार-द्रुम-मूल-भाजि विजिते रत्नासने संस्थिते !

दिव्यं चारुण-चञ्चुकाधर-रुचा देव्या कृतालिंगनः !!

भक्तेभ्यः कर-रत्न-पात्र-भरितं स्वर्ण दधानो भृशम् !

स्वर्णाकर्षण-भैरवो भवतु मे स्वर्गापवर्ग-प्रदः !!


!! स्त्रोत् -पाठ !!

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ॐ नमस्तेऽस्तु भैरवाय, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मने !

नमः त्रैलोक्य-वन्द्याय, वरदाय परात्मने !!

रत्न-सिंहासनस्थाय, दिव्याभरण-शोभिने !

नमस्तेऽनेक-हस्ताय, ह्यनेक-शिरसे नमः !

नमस्तेऽनेक-नेत्राय, ह्यनेक-विभवे नमः !!

नमस्तेऽनेक-कण्ठाय, ह्यनेकान्ताय ते नमः !

नमोस्त्वनेकैश्वर्याय, ह्यनेक-दिव्य-तेजसे !!

अनेकायुध-युक्ताय, ह्यनेक-सुर-सेविने !

अनेक-गुण-युक्ताय, महा-देवाय ते नमः !!

नमो दारिद्रय-कालाय, महा-सम्पत्-प्रदायिने !

श्रीभैरवी-प्रयुक्ताय, त्रिलोकेशाय ते नमः !!

दिगम्बर ! नमस्तुभ्यं, दिगीशाय नमो नमः !

नमोऽस्तु दैत्य-कालाय, पाप-कालाय ते नमः !!

सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं, नमस्ते दिव्य-चक्षुषे !

अजिताय नमस्तुभ्यं, जितामित्राय ते नमः !

नमस्ते रुद्र-पुत्राय, गण-नाथाय ते नमः !

नमस्ते वीर-वीराय, महा-वीराय ते नमः !!

नमोऽस्त्वनन्त-वीर्याय, महा-घोराय ते नमः !

नमस्ते घोर-घोराय, विश्व-घोराय ते नमः !!

नमः उग्राय शान्ताय, भक्तेभ्यः शान्ति-दायिने !

गुरवे सर्व-लोकानां, नमः प्रणव-रुपिणे !!

नमस्ते वाग्-भवाख्याय, दीर्घ-कामाय ते नमः !

नमस्ते काम-राजाय, योषित्कामाय ते नमः !!

दीर्घ-माया-स्वरुपाय, महा-माया-पते नमः !

सृष्टि-माया-स्वरुपाय, विसर्गाय सम्यायिने !!

रुद्र- लोकेश- पूज्याय, ह्यापदुद्धारणाय च !

नमोऽजामल- बद्धाय, सुवर्णाकर्षणाय ते !!

नमो नमो भैरवाय, महा-दारिद्रय-नाशिने !

उन्मूलन-कर्मठाय, ह्यलक्ष्म्या सर्वदा नमः !!

नमो लोक-त्रेशाय, स्वानन्द-निहिताय ते !

नमः श्रीबीज-रुपाय, सर्व-काम-प्रदायिने !!

नमो महा-भैरवाय, श्रीरुपाय नमो नमः !

धनाध्यक्ष ! नमस्तुभ्यं, शरण्याय नमो नमः !!

नमः प्रसन्न-रुपाय, ह्यादि-देवाय ते नमः !

नमस्ते मन्त्र-रुपाय, नमस्ते रत्न-रुपिणे !!

नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, सुवर्णाय नमो नमः !

नमः सुवर्ण-वर्णाय, महा-पुण्याय ते नमः !!

नमः शुद्धाय बुद्धाय, नमः संसार-तारिणे !

नमो देवाय गुह्याय, प्रबलाय नमो नमः !!

नमस्ते बल-रुपाय, परेषां बल-नाशिने !

नमस्ते स्वर्ग-संस्थाय, नमो भूर्लोक-वासिने !!

नमः पाताल-वासाय, निराधाराय ते नमः !

नमो नमः स्वतन्त्राय, ह्यनन्ताय नमो नमः !!

द्वि-भुजाय नमस्तुभ्यं, भुज-त्रय-सुशोभिने !

नमोऽणिमादि-सिद्धाय, स्वर्ण-हस्ताय ते नमः !!

पूर्ण-चन्द्र-प्रतीकाश-वदनाम्भोज-शोभिने !

नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, स्वर्णालंकार-शोभिने !!

नमः स्वर्णाकर्षणाय, स्वर्णाभाय च ते नमः !

नमस्ते स्वर्ण-कण्ठाय, स्वर्णालंकार-धारिणे !!

स्वर्ण-सिंहासनस्थाय, स्वर्ण-पादाय ते नमः !

नमः स्वर्णाभ-पाराय, स्वर्ण-काञ्ची-सुशोभिने !!

नमस्ते स्वर्ण-जंघाय, भक्त-काम-दुघात्मने !

नमस्ते स्वर्ण-भक्तानां, कल्प-वृक्ष-स्वरुपिणे !!

चिन्तामणि-स्वरुपाय, नमो ब्रह्मादि-सेविने !

कल्पद्रुमाधः-संस्थाय, बहु-स्वर्ण-प्रदायिने !!

भय-कालाय भक्तेभ्यः, सर्वाभीष्ट-प्रदायिने !

नमो हेमादि-कर्षाय, भैरवाय नमो नमः !!

स्तवेनानेन सन्तुष्टो, भव लोकेश-भैरव !

पश्य मां करुणाविष्ट, शरणागत-वत्सल !

श्रीभैरव धनाध्यक्ष, शरणं त्वां भजाम्यहम् !

प्रसीद सकलान् कामान्, प्रयच्छ मम सर्वदा !!


!! फल-श्रुति !!

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श्रीमहा-भैरवस्येदं, स्तोत्र सूक्तं सु-दुर्लभम् !

मन्त्रात्मकं महा-पुण्यं, सर्वैश्वर्य-प्रदायकम् !!

यः पठेन्नित्यमेकाग्रं, पातकैः स विमुच्यते !

लभते चामला-लक्ष्मीमष्टैश्वर्यमवाप्नुयात् !!

चिन्तामणिमवाप्नोति, धेनुं कल्पतरुं ध्रुवम् !

स्वर्ण-राशिमवाप्नोति, सिद्धिमेव स मानवः !!

संध्याय यः पठेत्स्तोत्र, दशावृत्त्या नरोत्तमैः !

स्वप्ने श्रीभैरवस्तस्य, साक्षाद् भूतो जगद्-गुरुः !

स्वर्ण-राशि ददात्येव, तत्क्षणान्नास्ति संशयः !

सर्वदा यः पठेत् स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः !!

लोक-त्रयं वशी कुर्यात्, अचलां श्रियं चाप्नुयात् !

न भयं लभते क्वापि, विघ्न-भूतादि-सम्भव !!

म्रियन्ते शत्रवोऽवश्यम लक्ष्मी-नाशमाप्नुयात् !

अक्षयं लभते सौख्यं, सर्वदा मानवोत्तमः !!

अष्ट-पञ्चाशताणढ्यो, मन्त्र-राजः प्रकीर्तितः !

दारिद्र्य-दुःख-शमनं, स्वर्णाकर्षण- कारकः !!

य येन संजपेत् धीमान्, स्तोत्र वा प्रपठेत् सदा !

महा-भैरव-सायुज्यं, स्वान्त-काले भवेद् ध्रुवं !!


!! श्री भैरव चालीसा !!

!! दोहा !!

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श्री गणपति, गुरु गौरि पद, प्रेम सहित धरि माथ !

चालीसा वन्दन करों, श्री शिव भैरवनाथ !!

श्री भैरव संकट हरण, मंगल करण कृपाल !

श्याम वरण विकराल वपु, लोचन लाल विशाल !!


जय जय श्री काली के लाला !

जयति जयति काशी- कुतवाला !!


जयति बटुक भैरव जय हारी !

जयति काल भैरव बलकारी !!


जयति सर्व भैरव विख्याता !

जयति नाथ भैरव सुखदाता !!


भैरव रुप कियो शिव धारण !

भव के भार उतारण कारण !!


भैरव रव सुन है भय दूरी !

सब विधि होय कामना पूरी !!


शेष महेश आदि गुण गायो ! काशी-कोतवाल कहलायो !!


जटाजूट सिर चन्द्र विराजत !

बाला, मुकुट, बिजायठ साजत !!


कटि करधनी घुंघरु बाजत !

दर्शन करत सकल भय भाजत !!


जीवन दान दास को दीन्हो !

कीन्हो कृपा नाथ तब चीन्हो !!


वसि रसना बनि सारद-काली !

दीन्यो वर राख्यो मम लाली !!


धन्य धन्य भैरव भय भंजन !

जय मनरंजन खल दल भंजन !!


कर त्रिशूल डमरु शुचि कोड़ा !

कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोड़ा !!


जो भैरव निर्भय गुण गावत !

अष्टसिद्घि नवनिधि फल पावत !!


रुप विशाल कठिन दुख मोचन !

क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन !!


अगणित भूत प्रेत संग डोलत ! 

बं बं बं शिव बं बं बोतल !!


रुद्रकाय काली के लाला !

महा कालहू के हो काला !!


बटुक नाथ हो काल गंभीरा !

श्वेत, रक्त अरु श्याम शरीरा !!


करत तीनहू रुप प्रकाशा !

भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा !!


रत्न जड़ित कंचन सिंहासन !

व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन !!


तुमहि जाई काशिहिं जन ध्यावहिं !

विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं !!


जय प्रभु संहारक सुनन्द जय !

जय उन्नत हर उमानन्द जय !!


भीम त्रिलोकन स्वान साथ जय !

बैजनाथ श्री जगतनाथ जय !!


महाभीम भीषण शरीर जय !

रुद्र त्र्यम्बक धीर वीर जय !!


अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय !

श्वानारुढ़ सयचन्द्र नाथ जय !!


निमिष दिगम्बर चक्रनाथ जय !

गहत अनाथन नाथ हाथ जय !!


त्रेशलेश भूतेश चन्द्र जय !

क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय !!

श्री वामन नकुलेश चण्ड जय !

कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय !!


रुद्र बटुक क्रोधेश काल धर !

चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर !!


करि मद पान शम्भु गुणगावत !

चौंसठ योगिन संग नचावत !!


करत कृपा जन पर बहु ढंगा !

काशी कोतवाल अड़बंगा !!


देयं काल भैरव जब सोटा !

नसै पाप मोटा से मोटा !!


जाकर निर्मल होय शरीरा !

मिटै सकल संकट भव पीरा !!


श्री भैरव भूतों के राजा !

बाधा हरत करत शुभ काजा !!


ऐलादी के दुःख निवारयो !

सदा कृपा करि काज सम्हारयो !!


सुन्दरदास सहित अनुरागा !

श्री दुर्वासा निकट प्रयागा !!


श्री भैरव जी की जय लेख्यो !

सकल कामना पूरण देख्यो !!


!! दोहा !!


जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार !

कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार !!

जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार !

उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बड़े अपार !!


!! आरती श्री भैरव जी की !!

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जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा !

जय काली और गौरा देवी कृत सेवा !! जय !!

तुम्हीं पाप उद्घारक दुःख सिन्धु तारक !

भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक !! जय !!

वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी !

महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी !! जय !!

तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे !

चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे !! जय !!

तेल चटकि दधि मिश्रित भाषा वलि तेरी !

कृपा करिये भैरव करिए नहीं देरी !! जय !!

पांव घुंघरु बाजत अरु डमरु जमकावत !

बटुकनाथ बन बालकजन मन हरषावत !! जय !!

बटकुनाथ की आरती जो कोई नर गावे !

कहे धरणीधर नर मनवांछित फल पावे !! जय !!


!! साधना यंत्र !!

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      श्री बटुक भैरव का यंत्र लाकर उसे साधना के स्थान पर भैरव जी के चित्र के समीप रखें ! दोनों को लाल वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर यथास्थिति में रखें ! चित्र या यंत्र के सामने माला, फूल, थोड़े काले उड़द चढ़ाकर उनकी विधिवत पूजा करके लड्डू का भोग लगाएं !!


!! साधना का समय !!

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       इस साधना को किसी भी मंगलवार या मंगल विशेष भैरवाष्टमी के दिन आरम्भ करना चाहिए शाम ७ से १० बजे के बीच नित्य ४१ दिन करने से अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है !!


!! साधना की चेतावनी !!

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 साधना के दौरान खान-पान शुद्ध रखें !!

 सहवास से दूर रहें ! वाणी की शुद्धता रखें और किसी भी कीमत पर क्रोध न करें !!

 यह साधना किसी गुरु से अच्छे से जानकर ही करें !!


!! साधना नियम व सावधानी !!

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१ :-  यदि आप भैरव साधना किसी मनोकामना के लिए कर रहे हैं तो अपनी मनोकामना का संकल्प बोलें और फिर साधना शुरू करें !!


२ :- यह साधना दक्षिण दिशा में मुख करके की जाती है !!


३ :-  रुद्राक्ष या हकीक की माला से मंत्र जप किया जाता है !!


४ :-  भैरव की साधना रात्रिकाल में ही करें !!


५ :-  भैरव पूजा में केवल तेल के दीपक का ही उपयोग करना चाहिए !!


६ :-  साधक लाल या काले वस्त्र धारण करें !!


७ :-  हर मंगलवार को लड्डू के भोग को पूजन- साधना के बाद कुत्तों को खिला दें और नया भोग रख दें।


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मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

क्या हैं सातों शरीर के स्वप्नों के आयाम

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सातों  शरीर और सात चक्र;- 


1-फिजिकल बॉडी/ भौतिक शरीर>>> मूलाधार चक्र


2-भाव शरीर/ इमोशन बॉडी>>> स्वाधिष्ठान चक्र  


3- कारण शरीर/एस्ट्रल बॉडी>>>मणिपुर चक्र  


4-मेंटल बॉडी /मनस शरीर >>>अनाहत चक्र


5-स्पिरिचुअल बॉडी/आत्म शरीर>>> विशुद्ध चक्र


6- कास्मिक बॉडी/ब्रह्म शरीर>>>आज्ञा चक्र


7-बॉडीलेस बॉडी/ निर्वाण काया>>>सहस्रार चक्र


सातों  शरीर के स्वप्नों के   आयाम;-

07 FACTS;- 


1-भौतिक शरीर ;-


02 POINTS;-

1-अगर तुम अस्वस्थ हो, अगर तुम ज्वरग्रस्त हो तो भौतिक शरीर अपनी तरह से स्वप्न निर्मित करेगा। भौतिक रुग्णता अपना अलग स्वप्न-लोक निर्मित करती है इसलिए भौतिक स्वप्न को बाहर से निर्मित किया जा सकता है।अगर तुम्हारा पेट गड़बड़ है तो एक विशेष प्रकार का स्वप्न निर्मित होगा। तुम नींद में हो अगर तुम्हारे  Legs पर एक भीगा कपड़ा रख दिया जाए तो तुम स्वप्न देखने लगोगे। तुम्हें दिख सकता है कि तुम एक नदी पार कर रहे हो। अगर तुम्हारे सीने पर तकिया रख दिया जाए तो तुम स्वप्न देखने लगोगे कि कोई तुम्हारे ऊपर बैठा है या कोई पत्थर तुम पर गिर पड़ा है। ये स्वप्न भौतिक शरीर से पैदा होते हैं।


2-तुम्हारे भौतिक शरीर के पास सत्य को जानने का उपाय है और इसके बारे में स्वप्न देखने का भी। जब तुम भोजन करते हो, तो यह वास्तविकता है। किंतु जब तुम स्वप्न देखते हो कि तुम भोजन कर रहे हो तो यह वास्तविकता नहीं है बल्कि यह वास्तविक भोजन का एक विकल्प है । भौतिक शरीर की अपनी वास्तविकता है और स्वप्न देखने की अपनी विधि है। ये दो ढंग हैं, जिनसे भौतिक शरीर कार्य करता है। और ये दोनों ढंग एक-दूसरे से पूर्णत: भिन्न हैं।तुम जितना अधिक केंद्र की ओर

 जाओगे वास्तविकता और स्वप्नों की ये रेखाएं एक-दूसरे के निकट और निकटतर होती चली जाएंगी ।वैसे ही जैसे कि किसी वृत्त की परिधि/ Circumference से वृत्त के केंद्र की ओर खींची गई रेखाएं जैसे-जैसे तुम केंद्र के निकट जाते हो  पास आने लगती हैं। अगर तुम परिधि /बाहर की ओर जाओ तो वे दूर और एक-दूसरे से बहुत दूर होती जाती हैं। जहां तक भौतिक शरीर का संबंध है, स्वप्न और सत्य बहुत दूर हैं और उनके बीच की दूरी सर्वाधिक है। इसलिए स्वप्न असत्य हो जाते हैं.. कल्पना बन जाते हैं।

2-भाव शरीर;-


06 POINTS;-

1-दूसरा भाव शरीर–अपने ढंग के स्वप्न देखता है। भाव शरीर के इन स्वप्नों ने अनेक उलझनें और समस्याएं निर्मित कर 

दी हैं।फ्रायड उन्हें दमित इच्छाओं के रूप में समझता है। ये वे स्वप्न हैं जो भौतिक इच्छाओं के दमन से संबंधित हैं लेकिन वे भी पहले  भौतिक शरीर से संबंधित हैं।दूसरा भाव शरीर, इन मनोवैज्ञानिक खोजों से अछूता रह गया है, या इसे भी भौतिक शरीर के रूप में अभिव्यक्त करता है। अगर तुमने अपनी  इच्छाओं का  किया है ..उदाहरण के लिए अगर तुमने उपवास किया है—तो स्वप्न में इस बात की बहुत संभावना है कि तुम्हें कुछ नाश्ता दिखाई पड़े।  

2-भाव शरीर स्वप्नों में यात्रा कर सकता है। इस बात की पूरी संभावना है कि तुम्हारे भौतिक शरीर से तुम्हारा भाव शरीर बाहर निकल जाए। लेकिन जब तुम इसे याद करते हो, तो यह स्वप्न के रूप में याद आता है। लेकिन यह उन अर्थों में स्वप्न नहीं है जिस तरह भौतिक शरीर के स्वप्न हैं। जब तुम सोए हुए होते हो, तो भाव शरीर तुमसे बाहर जा सकता है। तुम्हारा भौतिक शरीर यहीं पर होगा, लेकिन तुम्हारा भाव शरीर बाहर जा सकता है और आकाश में यात्रा कर सकता है। इसके लिए समय और स्थान की कोई सीमा नहीं है। इसके लिए दूरी का भी कोई प्रश्न नहीं है। वे लोग जो इसे नहीं समझते हैं, ऐसा कह सकते हैं कि यह अचेतन का आयाम है, क्योंकि वे मनुष्य के मन को चेतन और अचेतन में बांटते हैं। भौतिक शरीर के स्वप्न चेतन बन जाते हैं, भाव शरीर के स्वप्न अचेतन।

3-भाव शरीर के स्वप्न अचेतन नहीं हैं। ये उतने ही चेतन हैं जितने भौतिक शरीर के स्वप्न लेकिन एक अन्य तल, अलग स्तर पर चेतन हैं। इसलिए अगर तुम अपने भाव शरीर के प्रति चेतन हो सको, तो उस आयाम के स्वप्न चेतन बन जाते हैं।

और जैसे भौतिक स्वप्नों को बाहर से निर्मित किया जा सकता है वैसे ही भाव शरीर के स्वप्न भी बाहर से उद्दीपित, निर्मित किए जा सकते हैं। और  उनमें से एक उपाय है  'मंत्र'... जिससे भाव-दृश्य निर्मित किए जा सकते हैं। एक विशेष मंत्र, ध्वनि का एक विशेष संयोजन ..भाव शरीर के भाव  स्वप्न निर्मित कर सकता है। एक विशेष ध्वनि / शब्द का भाव-केंद्र पर बार-बार उच्चार किया जाए तो भाव शरीर के स्वप्न निर्मित कर सकता है। इसलिए अपने शिष्यों के सम्मुख गुरुओं का प्रकट हो जाना केवल   ..भाव शरीर की यात्रा, भाव शरीर का स्वप्न है।

4-अनेक विधियां हैं जिसमे  ध्वनि और सुगंध भी एक उपाय है।एक विशेष सुगंध किसी विशेष स्वप्न को निर्मित कर सकती है। सूफियों ने भाव-दृश्य निर्मित करने के लिए सुगंध का उपयोग किया है। मोहम्मद साहब सुगंध के बहुत शौकीन थे।रंग से भी 

 सहायता मिल सकती है।  शरीर का आभामंडल…प्रत्येक व्यक्ति का एक विशिष्ट आभामंडल होता है, और उसके रंग ..भाव शरीर के आयाम से आते हैं। जब कोई ध्यान में गहरा उतरता है और अदभुत रंगों को देखता है, और अदभुत सुगंधों का और ध्वनियों का और संगीत का अनुभव करता है जो नितांत अज्ञात हैं, तो वे भी भाव शरीर के स्वप्न है। लेकिन हमने मन के रहस्यों को केवल एक शारीरिक तल पर खोजा है; इसलिए इन स्वप्नों को या तो शरीर के तल पर परिभाषित किया गया या उनकी उपेक्षा कर दी गई ।

5- ‘चेतन’ का अभिप्राय है, वह जो जाना हुआ है। ‘अचेतन’ का अभिप्राय है वह जो अभी तक नहीं जाना गया है, अज्ञात है।

 कुछ भी अचेतन नहीं है किंतु वह प्रत्येक चीज जो किसी गहरे तल पर चेतन है, अपने से पिछले तल पर अचेतन होती है। भौतिक शरीर के लिए भाव शरीर अचेतन है; भाव शरीर के लिए सूक्ष्म शरीर अचेतन है ;सूक्ष्म शरीर के लिए मनस शरीर अचेतन है।सूक्ष्म शरीर के स्वप्नों में तुम अपने पिछले जन्मों में जा सकते हो। यह तुम्हारे स्वप्नों का तीसरा आयाम है। कभी-कभी किसी सामान्य स्वप्न में भी भाव स्वप्न का या सूक्ष्म स्वप्न का अंश हो सकता है। तब वह स्वप्न एक उलझन बन जाता है ..उसे समझना असंभव हो जाता है।क्योंकि तुम्हारे सातों शरीर एक साथ अस्तित्व में हैं, और एक आयाम से कोई चीज दूसरे की सीमा रेखा को पार कर सकती है, प्रवेश कर सकती है या अतिक्रमण कर सकती है।


 6-लेकिन भाव शरीर में वास्तविकता और स्वप्न और पास आ जाते हैं। क्या वास्तविक है और क्या स्वप्न है ..यह जानना भौतिक शरीर की तुलना में भाव शरीर में अधिक कठिन है क्योंकि वे निकट आ गए हैं। किंतु फिर भी अंतर जाना जा सकता है।

 स्वप्न देखने के लिए तुम्हारा नींद में होना जरूरी है और वास्तविक की अनुभूति के लिए तुम्हें जागा हुआ होना चाहिए।  


अंतर जानने के लिए तुम्हें भाव शरीर के तल पर जाग्रत होना पड़ेगा अथार्त Highly Sensitive होना पड़ेगा। दूसरे शरीर के तल पर जागने की विधियां भी हैं। मंत्र की पुनरुक्ति की विधि, जप की विधि और आंतरिक  कार्यप्रणाली तुम्हें बाहर के संसार से अलग कर देती है। तुम एक भीतरी वर्तुल में होते हो  और घूमते ही रहते हो, तुम्हें बाहर के संसार से कुछ समय के अवकाश की जरूरत होती है।यह सतत  मंत्र जप एक सम्मोहित निद्रा पैदा कर सकती है। अगर तुम इस मंत्र जप के कारण 

सो जाते हो तो तुम स्वप्न देखोगे।किंतु अगर तुम अपने जप  के प्रति बोधपूर्ण रह सको और इससे तुम पर कोई सम्मोहक प्रभाव न पड़े तो  भाव शरीर   से सम्बंधित  वास्तविकता को जानोगे।

3-सूक्ष्म शरीर;-  

04 POINTS;-

1-सूक्ष्म शरीर के तीसरे शरीर के स्वप्नों में तुम न केवल आकाश में यात्रा कर सकते हो बल्कि समय में भी यात्रा कर सकते हो। पहले भौतिक शरीर के स्वप्नों में तुम न तो समय में यात्रा कर सकते हो और न आकाश में। तुम अपनी भौतिक अवस्था और अपने विशिष्ट समय तक ही सीमित हो–जैसे कि रात ग्यारह बजे। यह ग्यारह  बजे का समय तय है, एक विशेष कमरे में /एक फिजियोलॉजिकल स्थान में जो तुमने घेर रखा है ..तुम स्वप्न देख सकते हो, लेकिन इनके पार नहीं। भाव शरीर  में तुम आकाश में यात्रा कर सकते हो, किंतु समय में नहीं। तुम यहां पर सो रहे हो और किसी अन्य स्थान में हो सकते हो–यह आकाश में यात्रा है किंतु समय में नहीं। अभी भी रात के ग्यारह ही बजे हैं। तीसरे, सूक्ष्म शरीर में तुम समय के अवरोध का अतिक्रमण कर सकते हो लेकिन केवल अतीत की ओर, भविष्य की ओर नहीं। सूक्ष्म मन अतीत में जा सकता है अथार्त अतीत की पूरी अनंत श्रृंखला में, अमीबा से  मनुष्य तक–संपूर्ण प्रक्रिया में।

 2-मनोविज्ञान में पहले को चेतन दूसरे को अचेतन और तीसरे को सामूहिक अचेतन कहा जाता है। यह सामूहिक अचेतन   तुम्हारे जन्मों का निजी इतिहास है। कभी-कभी यह सामान्य स्वप्नों में प्रविष्ट हो जाता है, लेकिन ऐसा अक्सर बीमारी की अवस्था में होता है। स्वस्थ व्यक्ति के साथ यह नहीं होता। कोई व्यक्ति जो मानसिक रूप से रुग्ण है, उसमें ये तीनों मिले-जुले होते हैं।  बीमारी की अवस्था में उसके ये तीनों शरीर अपनी सामान्य पृथकता खो देते हैं। इसीलिए बीमार/  मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति आमतौर से अपने पिछले जन्मों का स्वप्न देख सकता है, किंतु कोई उसका विश्वास नहीं करेगा। वह स्वयं भी इस पर विश्वास नहीं करेगा। लेकिन यह साधारण स्वप्न नहीं है बल्कि सूक्ष्म शरीर का स्वप्न है। और सूक्ष्म शरीर के स्वप्न में बहुत अर्थ है, सार्थकता है। 

3-लेकिन तीसरा शरीर केवल अतीत के बारे में स्वप्न देख सकता है अथार्त जो हो चुका है, लेकिन उसे नहीं जो होने वाला है।तीसरे शरीर सूक्ष्म शरीर में वास्तविकता और स्वप्न के अंतर को जान पाना और भी कठिन होता है क्योंकि सीमा-रेखाएं और निकट आ चुकी हैं।यदि तुमने असली सूक्ष्म शरीर को जाना है, तो तुम मृत्यु के भय के पार चले जाओगे, क्योंकि उस बिंदु से व्यक्ति अमरत्व को जान लेता है। लेकिन अगर सूक्ष्म शरीर का यह स्वप्न ही है वास्तविकता नहीं है तो तुम मृत्यु के भय से अत्यंत पंगु हो जाओगे।मृत्यु का भय ही पहचान की कसौटी है अथार्त भेद का बिंदु है।अमरत्व में विश्वास नहीं करना है, इसे जानना है। और जानने से पूर्व, इसके बारे में संदेह, अनिश्चितता होनी चाहिए।जो व्यक्ति विश्वास करता है कि आत्मा अमर है 

और बार-बार इसे दोहराता है और अपने आपको सांत्वना दिए चला जाता है वह यह नहीं जान पाएगा कि सूक्ष्म शरीर में जो यथार्थ है और सूक्ष्म शरीर में जो स्वप्न है उनमें क्या अंतर है। 


4- जब यह तथ्य तुम पर उदघाटित हो जाता है कि तुम्हें नहीं मारा जा सकता है ;केवल तब तुम जानोगे कि तुमने इसे जाना 

है या बस स्वप्न में प्रक्षेपित कर लिया है। अगर तुमने अमरत्व को एक विश्वास के रूप में लिया है और इसका अभ्यास किया है तो यह तुम्हारे सूक्ष्म मन तक पहुंच सकता है। तब तुम स्वप्न देखना शुरू कर दोगे  किंतु यह बस एक स्वप्न होगा। अगर तुम्हारे पास ऐसा कोई विश्वास नहीं है, बस जानने की, खोजने की एक प्यास है।तब बिना किसी पूर्व- धारणा या पूर्वाग्रह के तुम शून्य में खोजोगे और अंतर को जान लोगे। जो लोग ऐसे विश्वास की दशा में होते हैं वे बस सूक्ष्म शरीर में स्वप्न देखते रहते हैं और वास्तविकता को नहीं जानते हैं।

4-चौथा शरीर, मनस शरीर;-

05 POINTS;-

1-चौथा शरीर, मनस शरीर है जो दोनों ओर की यात्रा करता है। यह एकतरफा नहीं है बल्कि अतीत और  भविष्य में यात्रा कर सकता है। यह मनस शरीर कभी-कभी भविष्य के बारे में स्वप्न देख सकता है। किसी परम आपातकाल में कोई सामान्य व्यक्ति भी भविष्य की एक झलक पा सकता है। कोई प्रियजन या तुम्हारा कोई निकटतम व्यक्ति मर रहा है तो यह आपातकाल की एक ऐसी अवस्था है जिसका संदेश तुम्हें तुम्हारे सामान्य स्वप्नों में भी दिया जा सकता है ।क्योंकि तुम स्वप्नों का कोई और आयाम नहीं जानते हो इसलिए यह संदेश तुम्हारे सामान्य स्वप्न में प्रविष्ट हो जाएगा।लेकिन यह स्पष्ट नहीं होगा,क्योंकि 

 कुछ ऐसे अवरोध हैं जिन्हें पार किया जाना है और  प्रत्येक मन के अपने प्रतीक होते हैं। 


2-इसलिए जब कोई स्वप्न एक शरीर से दूसरे शरीर में जाता है तो वह उस शरीर के प्रतीक के अनुसार बदल जाता है।दूसरे शरीरों के माध्यम से हर बात उलझ जाती है।अगर तुम स्पष्ट रूप से स्वप्न देखो, जैसे कि चौथे शरीर के स्वप्न होते हैं .. तब तुम भविष्य में झांक सकते हो। किंतु केवल अपने भविष्य में ... तुम दूसरों के भविष्य में नहीं झांक सकते हो।चौथे शरीर के लिए

अतीत ,भविष्य और वर्तमान एक हो जाते हैं। चौथे शरीर के लिए समय नहीं होता है, क्योंकि अतीत भी उतना ही वर्तमान है जितना कि भविष्य वर्तमान है। इसीलिए विभाजन अर्थ खो देता है और  प्रत्येक बात ‘अभी’ बन जाती है। यहां न अतीत है और न भविष्य लेकिन फिर भी समय है जो ‘वर्तमान’ के रूप में है। यह अब भी काल का प्रवाह है इसीलिए तुम्हें अपने मन को एकाग्र करना पड़ेगा।तुम अतीत की ओर देख सकते हो, किंतु यह एकाग्रता होगी, तब भविष्य और वर्तमान ओझल हो गए होंगे। जब तुम भविष्य की ओर एकाग्र होते हो तब वे दोनों अनुपस्थित होंगे। वहां एक क्रमबद्धता होगी। 


3- तुम संपूर्ण को एक साथ नहीं देख सकते हो। समय होगा, किंतु अतीत वर्तमान और भविष्य नहीं होंगे और यह तुम्हारी निजी 

स्वप्नावस्था होगी।चौथे शरीर में ये दोनों अथार्त,स्वप्न और वास्तविकता पड़ोसी हो जाते हैं। और उनके चेहरे इतने एक रूप हो जाते हैं जैसे कि वे जुड़वा हों और उनमें एक को दूसरे की तरह समझ लेने की पूरी संभावना है। मनस शरीर ऐसे स्वप्न देख सकता है जो इतने यथार्थ लगें कि वास्तविक जैसे प्रतीत हों। और उन स्वप्नों को निर्मित करने  के लिए  योग की, तंत्र की और बहुत विधियां हैं। अगर कोई व्यक्ति उपवास ,एकांत, अंधकार आदि का अभ्यास कर रहा हो, तो वह चौथे प्रकार के मानसिक स्वप्न निर्मित कर लेगा। और वे  उस यथार्थ से भी अधिक वास्तविक  होंगे जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है।अब मन सृजन करने के लिए पूर्णत: मुक्त है। वहां पर मन बिना किन्हीं बाह्य बाधाओं के अपनी पूरी सृजनात्मकता में  होता  है।कवि, चित्रकार आदि इस तरह के लोग स्वप्नों के चौथे प्रकार में जीते हैं। सभी कलाएं स्वप्नों के चौथे प्रकार द्वारा निर्मित हुई हैं।  

 4-जो व्यक्ति स्वप्नों के इस चौथे आयाम में स्वप्न देख सकता है वह महान कलाकार हो सकता है परंतु ज्ञानी नहीं।मन के चौथे

आयाम में, चौथे शरीर में व्यक्ति को किसी भी प्रकार के मानसिक सृजन के प्रति होशपूर्ण रहना पड़ेगा। उसे कुछ भी निर्मित या प्रक्षेपित नहीं करना चाहिए, वरना वही निर्मित हो जाएगा। व्यक्ति को कोई इच्छा नहीं करनी चाहिए वरना इस बात का पूरा खतरा है कि वह इच्छा पूरी हो जाएगी। और न केवल अंतस के लोक में बल्कि बाह्य जगत में भी इच्छा पूरी हो जा सकती है। 

चौथे शरीर में मन बहुत शक्तिशाली, बहुत सुस्पष्ट होता है। यह मन के लिए अंतिम घर है। इसके बाद अ-मन आरंभ हो जाता है।चौथा शरीर मन का, मूल-स्रोत है इसलिए तुम कुछ भी निर्मित कर सकते हो।व्यक्ति को इस बात के प्रति निरंतर सजग रहना चाहिए कि उसके भीतर कोई भी वासना, कोई भी कल्पना, कोई प्रतिमा कोई देवता, कोई देवी, कोई गुरु न हो।वरना वे सभी तुमसे निर्मित हो जाएंगे।तुम उनके सृष्टा होओगे और ये अनुभूतियां इतनी आनंददायी हैं कि तुम उन्हें निर्मित 

करना चाहोगे।


5-साधक के लिए यह अंतिम अवरोध है।अगर कोई इसको पार कर लेता है, तो उसे इससे बड़ी कोई और रुकावट नहीं मिलेगी।अगर तुम बोधपूर्ण हो और चौथे शरीर में बस एक साक्षी हो, तो तुम यथार्थ को जान लेते हो।अन्यथा तुम स्वप्न देखते रह सकते हो जो बहुत अच्छे होंगे और किसी भी आनंद या कोई वास्तविकता इनसे तुलना न कर पाएगी।इसलिए 

व्यक्ति को  किसी भी प्रकार की मानसिक प्रतिमा से सावधान रहना है।जैसे ही कोई प्रतिमा आती है, चौथा मन स्वप्न में बहने 

लगेगा।प्रतिमा मन को भटका देगी, तुम स्वप्न देखने लगोगे।चौथे प्रकार के स्वप्नों को सिर्फ तभी रोका या निर्मूल किया जा सकता है ;जब तुम बस एक साक्षी हो जाओ। इसलिए यह साक्षी होना मूल बात है।साक्षी होने से अंतर निर्मित हो जाता है, क्योंकि अगर यह स्वप्न है तो Identification/तादात्म्य होगा। जहां तक चौथे शरीर और उसके स्वप्नों का प्रश्न है तादात्म्य ही स्वप्न है क्योंकि तुम उसके साथ तादात्म्य कर लोगे। सजगता और साक्षी बन गया मन... यथार्थ की ओर जाने वाला पथ है।

5-पांचवां आत्मिक शरीर;- 

09 POINTS;-

1-पांचवां आत्मिक शरीर निजता का ,समय का आयाम पार कर लेता है।अब तुम शाश्वत में होते हो और स्वप्नों को एक अन्य ढंग ...एक और आयाम मिल जाता है। यह आयाम  चेतना के साथ जैसी वह है ...संबद्ध है। जहां तक चेतना का संबंध है, यह 

सामूहिक हो जाती है।अब तुम चेतना का संपूर्ण अतीत जानते हो किंतु भविष्य नहीं जानते ।इस पांचवें शरीर के  स्वप्नों के माध्यम से सृष्टि की सारी पुराण-कथाएं पैदा हुई हैं ..वे सभी एक सी हैं। प्रतीक भिन्न हैं, कहानियां भी कुछ अलग हैं लेकिन ईसाई या हिंदू या यहूदी या मिस्र की परंपराओं की सृजन की सारी पुराण-कथाएं–यह संसार कैसे रचा गया, यह अस्तित्व में कैसे आया-उन सभी में एक सी समानताएं हैं। 


2-पांचवें मन के द्वारा और उसके स्वप्नों के माध्यम से, विराट जलप्रलय की कहानियां.. सारी दुनिया में प्रचलित हैं! उनका कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन फिर भी रिकॉर्ड है और यह रिकॉर्ड पांचवें मन आत्मिक शरीर से संबद्ध है।वह मन उनके बारे

 में स्वप्न देख सकता है।और तुम भीतर जितना प्रवेश करते जाते हो, स्वप्न उतना वास्तविकता के निकट होता जाता है। भौतिक शरीर का स्वप्न इतना वास्तविक नहीं होता है । भाव शरीर के स्वप्न कुछ अधिक वास्तविक हैं।  सूक्ष्म शरीर के स्वप्न और अधिक वास्तविक हैं । मनस शरीर के स्वप्न लगभग वास्तविक ही हैं और पांचवें शरीर में तुम अपने स्वप्नों में प्रामाणिक रूप से यथार्थ को जानते हो। अब वास्तविकता को जानना संभव है। इसलिए अब इसे स्वप्न कहना भी ठीक नहीं है। लेकिन यह स्वप्न ही है क्योंकि वास्तविकता ऑब्जेक्ट के रूप में सामने नहीं है। 

3-यह एक सब्जेक्टिव अनुभव के रूप में है लेकिन इसका अपना ऑब्जेक्टिव अस्तित्व भी है।ऐसे दो व्यक्ति जिन्होंने पांचवें शरीर का साक्षात कर लिया है ..एक साथ स्वप्न देख सकते हैं जो कि चौथे शरीर तक संभव नहीं है। चौथे शरीर तक हम स्वप्नों में सहभागी नहीं हो सकते हैं। लेकिन पांचवें शरीर से एक ही स्वप्न अनेक लोगों द्वारा एक साथ देखा जा सकता है। इसीलिए एक अर्थों में वे ऑब्जेक्टिव बन जाते हैं। पांचवें शरीर में हम अपने स्वप्नों की ,अपने अनुभवों की तुलना कर सकते हैं। यही कारण है कि अनेक लोगों ने पांचवें शरीर में स्वप्न देखे और उन सभी ने समान पुराण कथाओं को जाना। ये पुराण कथाएं एक-एक व्यक्ति द्वारा नहीं रची गई हैं–सृष्टि रचना की पुराण कथाएं ,वह विराट प्रलय आदि उन विशेष विचारधाराओं द्वारा, विशेष समूहों के द्वारा निर्मित किया गया है जो एक साथ कार्य कर रहे थे। पांचवें शरीर के स्वप्न आश्चर्यजनक रूप से बहुत कुछ वास्तविक हो जाते हैं।

4-पिछले चारों प्रकार के स्वप्न एक प्रकार से अवास्तविक हैं क्योंकि पहली बात वे व्यक्तिगत हैं। दूसरी बात किसी और व्यक्ति के तुम्हारे स्वप्न में सहभागी होने ,इस अनुभव को बांट लेने , इसकी प्रामाणिकता की जांच कर पाने आदि की कोई संभावना नहीं है। और कल्पना और स्वप्नों में भेद होता है। कल्पना ऐसी चीज है जिसे तुमने प्रक्षेपित किया है, और स्वप्न ऐसी चीज है जो अस्तित्व में नहीं है–लेकिन तुमने इसे जान लिया है। इसलिए जैसे-जैसे भीतर की ओर जाना होगा, स्वप्न देखना अधिक वास्तविक अधिक प्रामाणिक हो जाता है।सभी धर्मशास्त्रीय अवधारणाएं पांचवें शरीर ने निर्मित की हैं। उनकी भाषा उनके शब्द, उनके प्रतीक उनकी धारणाएं भिन्न हैं, लेकिन मौलिक रूप से वे एक जैसे हैं और वे पांचवें चक्र के, पांचवें शरीर के स्वप्नों के.. पांचवें आयाम के द्वारा देखे गए हैं।

5-पांचवें शरीर में दोनों में कोई अंतर नहीं होता क्योंकि  स्वप्न और यथार्थ एक हो जाते हैं .. द्वैत का हर रूप खो जाता है। अब व्यक्ति बिना होश के भी हो सकता है–सजगता का कोई प्रश्न नहीं है। अगर तुम बेहोश हो, तो भी तुम अपनी बेहोशी के प्रति होशपूर्ण रहोगे। अब स्वप्न और यथार्थ एक-दूसरे के प्रतिबिंब हो जाते हैं। वे एक जैसे होते हैं परन्तु  एक भेद होता है। अगर  कोई अपने आप को दर्पण में देखता है तो  उसमें और उसके  प्रतिबिंब में कोई अंतर नहीं होता लेकिन एक भेद होता 

है।वह  वास्तविक है और दर्पण में दिख रही छवि वास्तविक नहीं है।पांचवां मन, यदि उसने कुछ धारणाएं बना ली हैं, तो वह अपने आप को दर्पण में जानने के भ्रम में पड़ सकता है।तब वह अपने आपको  दर्पण के माध्यम से जानेगा, किंतु–वैसा नहीं जैसा कि वह है, बल्कि वैसा जैसा कि वह प्रतिबिंबित हो रहा है।  

6-भले ही तुम दर्पण में देख रहे हो लेकिन तुम अपने आप को ही देख रहे हो। इस अर्थ में यहाँ  पर कोई खतरा नहीं है। लेकिन दूसरे अर्थों में इसमें काफी खतरा है। यह हो सकता है कि तुम संतुष्ट हो जाओ और दर्पण में दिख रही छवि को असली समझ 

 बैठो।जहां तक पांचवें शरीर का प्रश्न है, कोई खतरा नहीं है लेकिन छठवें शरीर  में  खतरा है। अगर तुमने अपने आप को दर्पण में देखा है, तो तुम पांचवें शरीर की सीमा पार नहीं करोगे। तुम छठवें शरीर में नहीं जाओगे, क्योंकि दर्पणों के द्वारा तुम कोई भी सीमा पार नहीं कर सकते हो। ऐसे लोग हुए हैं जो पांचवें में ही रुके रहे-वे लोग जो कहते हैं कि अनंत आत्माएं हैं और प्रत्येक आत्मा की अपनी निजता है-ये लोग पांचवें शरीर में ही ठहरे हुए हैं और वहीं पर रुक गए हैं, क्योंकि उन्होंने अपने आपको जाना तो है, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से नहीं जाना है, बल्कि दर्पण के माध्यम से जाना है।


7-वास्तव में,यह दर्पण  धारणाओं के माध्यम से आता है ‘मैं आत्मा हूं–शाश्वत अमर ..मृत्यु से परे ,जन्म से परे। अपने आपको बिना जाने आत्मा के रूप में मान लेने से दर्पण बन जाता है। और अगर दर्पण बन गया है तो तुम अपने आप को जानोगे, लेकिन वैसा नहीं जैसे कि तुम हो, बल्कि तुम्हारा वह रूप जानोगे जो तुम्हारी धारणाओं के माध्यम से प्रतिबिंबित हो रहा है। अंतर केवल यह होगा कि अगर यह ज्ञान दर्पण के माध्यम से आया है तो यह स्वप्न है और अगर यह सीधा प्रत्यक्ष है.. बिना 

किसी दर्पण के माध्यम से आया है, तो यह वास्तविक है।यही एक मात्र भेद है किंतु यह भेद विराट है।यह भेद उन शरीरों के संबंध में नहीं  है जिनको तुमने पार कर लिया है, बल्कि उन शरीरों के संबंध में जिनको अभी भी पार किया जाना है। 


8-कोई व्यक्ति इस बारे में कैसे सजग हो सकता है कि वह पांचवें शरीर में स्वप्न देख रहा है या वास्तविकता में जी रहा है? इसका एकमात्र उपाय है कि व्यक्ति को प्रत्येक प्रकार के सिद्धांतों , शास्त्रों का त्याग कर देना चाहिए और   प्रत्येक प्रकार के दर्शनशास्त्र से भी मुक्त हो जाना चाहिए।यहां से आगे कोई गुरु नहीं होना चाहिए, अन्यथा वह गुरु ही दर्पण बन जाएगा।यहां से आगे तुम पूरी तरह से अकेले हो। किसी को अब पथ-प्रदर्शक के रूप में साथ नहीं रखना चाहिए, अन्यथा वह पथ-प्रदर्शक ही दर्पण बन जाएगा।यहां से आगे एकांत पूर्ण और समग्र होता है। अकेलापन नहीं, वरन एकांत।अकेलापन सदा दूसरों से संबंधित होता है,जबकि एकांत स्वयं से संबंधित है।  

 9-हमें अकेलापन तभी लगता है जब किसी की कमी की अनुभूति, साथी के न होने की अनुभूति होती है। हमें एकांत की अनुभूति तब होती है, जब हमें अपने होने की अनुभूति होती है। यहां से व्यक्ति को एकांत में हो जाना है.. अकेला नहीं।शब्दों अवधारणाओं, सिद्धांतों, दर्शनशास्त्रों, नीतिशास्त्रों, गुरुओं, शास्त्रों ,ईसाइयत, हिंदू ,बुद्ध, ईसा, श्री कृष्ण, महावीर सभी से अलग होकर; पूर्ण एकांत में हो जाना है। अन्यथा वहां पर जो भी उपस्थित होगा, दर्पण बन जाएगा।अगर तुम एकाकी हो.. तो  

यही कसौटी है, क्योंकि अब ऐसा कुछ भी नहीं है जिसमें तुम प्रतिबिंबित हो सको। पांचवें शरीर के लिए उचित शब्द है–ध्यान। ध्यान का अभिप्राय है.. किसी भी प्रकार के मनन से हट कर पूरी तरह से  एकाकी होना ..अ-मन होना। अगर मन किसी भी रूप में रह गया, तो वह दर्पण बन जाएगा और तुम उसमें प्रतिबिंबित हो जाओगे।अब व्यक्ति को बिना विचारों के, बिना मनन के, अ-मन होना चाहिए।

6-छठवां ब्रह्म शरीर;-

05 POINTS;-

1-आगे है छठवां  ब्रह्म शरीर। अब तुम चेतना की सीमा पार कर लेते हो।चेतन और अचेतन , पदार्थ और मन  के भेद मिट जाते हैं। छठवां ब्रह्म शरीर ब्रह्मांड के स्वप्न देखता है ;चेतना  और इनसानों के बारे में स्वप्न नहीं देखता ।अब कोई भी वस्तु सम्मिलित नहीं है ..तुम चेतना का अतिक्रमण कर जाते हो। ऐसा नहीं कि तुम अचेतन हो जाते हो बल्कि अचेतन संसार चेतन हो जाता है। अब प्रत्येक चीज जीवित और चेतन होती है। यहां तक कि जिसे हम पदार्थ कहते हैं, वह भी पदार्थ 

नहीं, बल्कि चेतन हो जाता है।छठवें शरीर में ब्रह्मांडीय सत्यों के स्वप्नों का साक्षात होता है। ब्रह्म और माया के सिद्धांत, अद्वैतवाद ,अनंत की अवधारणाएं ..ये सभी छठवें प्रकार के स्वप्नों में प्रत्यक्ष हो जाते हैं। जिन लोगों ने ब्रह्मांडीय आयाम में स्वप्न देखे उन्होंने महान व्यवस्थाओं की रचना की। यहां भी प्रतीकों में भेद है लेकिन कोई बहुत अधिक अंतर नहीं है। स्मृति अब प्रतीकों में बंधी हुई नहीं रहती। 

 2-भाषा एक आमंत्रण बन जाती है ;किसी की ओर संकेत भर करती है। हमने निजता को, चेतना को ,समय और आकाश को पार कर लिया है, लेकिन अब भी भाषा पॉजिटिव है।छठवें प्रकार का मन होने के आयाम में स्वप्न देखता है, न होने के आयाम में नहीं;वह पॉजिटिव अस्तित्व के स्वप्न देखता है... अनअस्तित्व के नहीं। अब भी वहां पर अस्तित्व के प्रति पकड़ है और अनअस्तित्व से भय है। पदार्थ और मन एक हो चुके हैं ;किंतु अस्तित्व और अनअस्तित्व एक नहीं हुए हैंअथार्त होना और न 

होना एक नहीं हुआ है। वे अभी तक भिन्न हैं और यह अंतिम अवरोध है।छठवें शरीर में अब कोई दर्पण नहीं है ...अब ब्रह्म है ;तुम खो गए हो अथार्त तुम नहीं बचे ..स्वप्न देखने वाला नहीं बचा। किंतु स्वप्न अब भी स्वप्न देखने वाले के बिना हो सकता है और जब स्वप्न देखने वाले के बिना स्वप्न होता है तो वह प्रामाणिक यथार्थ की भांति प्रतीत होता है। वहां मन या सोच-विचार करने वाला कोई भी नहीं है। 

3-जो कुछ भी जान लिया जाता है तो वह ज्ञान बन जाता है। सृजन की वे पुराण-कथाएं  Sliding  करती हैं।वहां निर्णय करने वाला कोई नहीं होता स्वप्न देखने वाला कोई नहीं होता।किंतु वह मन जो नहीं है, वह अभी भी है। वह मन जो विलीन हो गया है, अब भी है–निजी मन की भांति नहीं, वरन ब्रह्मांडीय समग्रता की भांति। तुम नहीं हो, परंतु ब्रह्म है। इसीलिए कहा जाता है कि यह संसार ब्रह्म का, छठवें शरीर का स्वप्न है। यह सारा संसार, यह सारा ब्रह्मांड स्वप्न है माया है। लेकिन हमारा व्यक्तिगत

 स्वप्न नहीं बल्कि समग्र का स्वप्न। समग्र स्वप्न देख रहा है। तुम नहीं हो लेकिन समग्र है।अब एकमात्र अंतर होगा क्या यह पॉजिटिव है? यदि यह पॉजिटिव है, तो यह छलावा है, स्वप्न है क्योंकि परम अर्थों में केवल Negation/नकार होता है। परम अर्थों में जब सभी कुछ अरूप पर ,मूल-स्रोत पर वापस आ गया है। तब प्रत्येक चीज है भी और फिर भी नहीं है। 

 4-बस पॉजिटिव ही बचा है और  इसके भी पार जाना होगा।इसलिए अगर छठवें शरीर में पॉजिटिव  खो जाए तो तुम सातवें में प्रविष्ट हो जाओगे। छठवें की वास्तविकता ही सातवें का द्वार है। अगर वहां कुछ भी पॉजिटिव  नहीं है–न कोई पुराण कथा, न कोई प्रतिमा–तब स्वप्न समाप्त हो चुका है। तब वहां वही  नित्य और स्थायी तत्त्व  है। अब वहां किसी चीज का अस्तित्व 

नहीं है.. सिर्फ अस्तित्व है , स्रोत है। वृक्ष नहीं है, पर बीज है ;जिसे  सबीज समाधि कहा जाता है। प्रत्येक चीज खो चुकी है और अपने मूल-स्रोत ..ब्रह्मांडीय बीज  में वापस आ गई है  किंतु फिर भी बीज है। तो यह समाधि है–सबीज ..बीज सहित।अथार्त वृक्ष नहीं है.. लेकिन बीज है। 

5-किंतु बीज से स्वप्न देख सकना अब भी संभव है इसलिए बीज को भी नष्ट करना पड़ेगा।सातवें में न तो स्वप्न है और न वास्तविकता। तुम वास्तविकता को वहां तक देख सकते हो जहां तक स्वप्न देखना संभव हो। अगर स्वप्नों की कोई संभावना न हो, तब न तो यथार्थ बचता है और न ही भ्रम ;इसलिए सातवां केंद्र है। अब स्वप्न और वास्तविकता एक हो गए हैं ..कोई अंतर नहीं है। या तो तुम ‘ना-कुछ’ का स्वप्न देखते हो या तुम ‘ना-कुछ’ को जानते हो, किंतु यह ‘ना-कुछपन’ वही का वही बना रहता 

है। अगर तुम किसी चीज की अनुपस्थिति के बारे में स्वप्न देखो, तो वह स्वप्न वैसा ही होगा जैसी कि अनुपस्थिति अपने आप में है। केवल किसी पॉजिटिव चीज के बारे में वास्तविक अंतर होता है। इसलिए छठवें शरीर तक अंतर होता है। 

7-सातवां शरीर, निर्वाण शरीर ;-

02 POINTS;-

1-इसके बाद  सातवां निर्वाण शरीर है जो पॉजिटिविटी की सीमा पार कर लेता है और शून्यता में छलांग लगा लेता है। सातवें शरीर के पास अपने स्वयं के स्वप्न हैं, अनअस्तित्व के , ना-कुछ के या शून्यता के स्वप्न। ‘हां’ पीछे छूट गई है और ‘न’ भी अब निष्किय हो जाती है। यह ना-कुछ होना भी अब कुछ नहीं है बल्कि अब और भी असीम हो गया है। क्योंकि एक अर्थ में  पॉजिटिव  कभी असीम नहीं हो सकता। हम कितना भी विचार कर लें, कल्पना कर लें..  परन्तु पॉजिटिव   होने में तो सीमा 

होगी ही। केवल न–होना ही सीमा रहित आयाम हो सकता है।इस तरह सातवें शरीर के अपने स्वप्न होते हैं।अब कोई प्रतीक 

या रूप नहीं है ..केवल अरूप है। अब कोई ध्वनि नहीं है बल्कि सन्नाटा है। अब मौन का यह स्वप्न संपूर्ण अनंत है तो ये सात शरीर हैं और सातों शरीरों के अपने स्वप्न हैं।मनोविज्ञान अभी स्वप्नों के बारे में जानने से काफी दूर है। इसे  केवल भौतिक और   भाव शरीर के स्वप्नों के बारे में ही पता है। 


2-अब एक बात समझना  है कि ये सात शरीर और स्वप्नों के ये सात आयाम वास्तविकता के सात रूपों को जानने में रुकावट बन सकते हैं।सातवें शरीर में केवल ‘ना-कुछपन’ बचता है। यहां बीज भी अनुपस्थित है। यह निर्बीज बीजरहित समाधि है।

अब यहां पर स्वप्नों की कोई संभावना नहीं है।इस प्रकार से ये सात प्रकार के स्वप्न और सात प्रकार की वास्तविकताएं हैं। वे आपस में गुंथे हुए हैं और इसी के कारण इतनी उलझन है। किंतु अगर तुम सातों के मध्य अंतर कर लो अथार्त इसके बारे में तुम्हारे पास स्पष्ट समझ  हो तो इससे काफी मदद मिल जाएगी। । लेकिन भाव शरीर के स्वप्नों की व्याख्या भी भौतिक शरीर के स्वप्नों की भांति की जाती है। 

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स्वप्न और  विज्ञान भैरव तंत्र विधि 75;- 


 08 FACTS;-

1-''जागते हुए सोते हुए, स्‍वप्‍न देखते हुए, अपने को प्रकाश समझो।’'  पहले जागरण से शुरू करो। योग और  तंत्र मनुष्‍य के मन के जीवन को तीन भागों में बाँटता है .. जाग्रत,सुषुप्‍ति और स्‍वप्‍न। ये तुम्‍हारी चेतना के नहीं,तुम्‍हारे मन के भाग है।तीन के नाम है परन्तु चेतना चौथी है—तुरीय। वे बादल है जिनके नाम हो सकते है ..कोई जागता हुआ बादल है, कोई सोया हुआ बादल है और कोई स्‍वप्‍न देखता हुआ बादल है। और जिस आकाश में वह घूमते है,वह अनाम है, उसे मात्र तुरीय कहां जाता है।  तुम तब तक किसी मनुष्‍य को सच में नहीं जान सकते जब तक तुम यह नहीं जानते कि वह अपने स्‍वप्‍नों में क्‍या करता है।क्‍योंकि वह जागते समय में जो भी करता है वह अभिनय या झूठ हो सकता है  क्‍योंकि  बहुत मजबूरी में करता है। वह स्‍वतंत्र नहीं है; समाज है, नियम है, नैतिक व्‍यवस्‍था है।वह निरंतर अपनी कामनाओं के साथ संघर्ष करता है, उनका दमन करता है। उनमें हेर-फेर करता है। समाज के ढांचे के अनुरूप उन्‍हें बदलता है। और समाज तुम्‍हें कभी तुम्‍हारी समग्रता में स्‍वीकार नहीं करता है। वह चुनाव करता है,काट-छांट करता है।  


2- संस्‍कृति का यही अर्थ है  क्‍योंकि संस्‍कृति चुनाव है। प्रत्‍येक संस्‍कृति एक संस्‍कार है जिसमें   कुछ चीजें स्‍वीकृत है और कुछ चीजें अस्‍वीकृत है। कहीं भी तुम्‍हारे समग्र अस्‍तित्‍व को, तुम्‍हारी निजता को स्‍वीकृति नहीं दी जाती है।इसीलिए  जाग्रत अवस्‍था में तुम झूठे, नकली ,कृत्रिम और दमित होने के लिए मजबूर हो। तुम जागते हुए  सहज या प्रामाणिक नहीं हो सकते, अभिनेता भर हो सकते हो। तुम   अंत: प्ररेणा से नहीं चलते,इसीलिए   केवल अपने स्‍वप्‍नों में तुम प्रामाणिक हो सकते हो। तुम अपने स्‍वप्‍नों में जो चाहे कर सकते हो। उससे किसी को लेना-देना नहीं है। वहां  तुम्‍हारे सिवाय कोई भी उसमें प्रवेश नहीं कर सकता 


 है।सपने तुम्‍हारे बिलकुल निजी है क्‍योंकि उनका किसी से कोई लेना देना नहीं है। इसलिए तुम स्‍वतंत्र हो सकते हो।तो जब तक तुम्‍हारे सपनों को नहीं जाना जाता, तुम्‍हारे असली चेहरे से भी परिचित नहीं हुआ जा सकता है। सपनों में प्रवेश करना अनिवार्य है ;लेकिन सपने भी बादल ही है। यद्यपि ये बादल निजी है, कुछ स्‍वतंत्र है;  फिर भी बादल ही तो है। उनके भी पार जाना है।ये तीन अवस्‍थाएं है: जाग्रत सुषुप्‍ति और स्‍वप्‍न। फ्रायड के साथ सपनों पर काम शुरू हुआ। अब सुषुप्‍ति पर,गहरी नींद पर काम होने लगा है।  


 3-यह अभी वैज्ञानिक ढंग से नहीं जाना गया है कि  नींद में यथार्थत:क्‍या  घटित होता है।और अगर हम नींद को नहीं जान सकते तो मनुष्‍य को जानना बहुत कठिन होगा। क्‍योंकि मनुष्‍य अपने जिंदगी का एक तिहाई हिस्‍सा नींद से गुजारता है। इतना बड़ा हिस्‍सा है ..यह।जागरण की अवस्‍था में तुम समाज के साथ होते हो। स्‍वप्‍न के अवस्‍था में तुम अपनी कामनाओं के साथ होते हो। और गहरी नींद में तुम प्रकृति के गहन गर्भ में होते हो। योग और तंत्र का कहना है कि इन तीनों के पार जाने पर ही तुम ब्रह्म में प्रवेश कर सकते हो। इन तीनों से गुजरना होगा , पार जाना होगा,इनका अतिक्रमण करना होगा।यह विधि 


अतिक्रमण  की विधि  है।‘जागते हुए, सोते हुए,स्‍वप्‍न देखते हुए, अपने को प्रकाश समझो।’ ये विधि बहुत कठिन है क्‍योंकि तुम सचेतन रूप से कोई स्‍वप्‍न नहीं पैदा कर सकते हो? लेकिन कुछ विधियां है जिनके द्वारा स्‍वप्‍न निर्मित किए जा सकते है। और ये विधि अतिक्रमण करने में बहुत सहयोगी है। क्‍योंकि अगर तुम स्‍वप्‍न निर्मित कर सकते हो तो तुम उसका अतिक्रमण भी कर सकते हो। लेकिन आरंभ तो जाग्रत अवस्‍था से  ही करना होगा।जागते समय ,चलते समय, खाते समय,काम करते समय ...अपने को प्रकाश रूप में स्‍मरण रखो। मानो तुम्‍हारा ह्रदय में एक ज्‍योति जल रही है और तुम्‍हारा शरीर उस ज्‍योति का प्रभामंडल भर है। 


 4-कल्‍पना करो कि तुम्‍हारे ह्रदय में एक लपट जल रही है। और तुम्‍हारा शरीर उस लपट के चारों और प्रभामंडल के अतिरिक्‍त कुछ नहीं है; तुम्‍हारा शरीर उस लपट के चारों और फैला प्रकाश है। इस कल्‍पना को, इस भाव को ,अपने मन ओर चेतना की गहराई में उतरने दो। इसे आत्‍मसात करो ...थोड़ा समय लगेगा। लेकिन यदि तुम यह स्‍मरण करते रहे,कल्‍पना करते रहे,तो धीरे-धीरे तुम इसे पूरे दिन स्‍मरण रखने में समर्थ हो जाओगे। जागते हुए, सड़क पर चलते हुए,  तुम एक चलती फिरती ज्‍योति हो जाओगे। शुरू-शुरू में किसी दूसरे को इसका बोध नहीं होगा; लेकिन अगर तुमने यह स्‍मरण जारी रखा तो तीन महीनों में दूसरों को भी इसका बोध होने लगेगा। और जब दूसरों को आभास होने लगे तो तुम निश्‍चिंत हो  सकते हो। किसी से कहना नहीं है। सिर्फ ज्‍योति का  भाव करना है कि तुम्‍हारा शरीर उसके चारों और फैला प्रभामंडल है। यह स्‍थूल शरीर नहीं  ...विद्युत , प्रकाश शरीर है। अगर तुम धैर्य पूर्वक लगे रहे तो  करीब-करीब तीन महीनों में दूसरों को बोध होने लगेगा कि तुम्‍हें कुछ घटित हो रहा हे। 


 5-वे तुम्‍हारे चारों और एक सूक्ष्म प्रकाश महसूस करेंगें। जब तुम निकट जाओगे,उन्‍हें एक तरह की अलग उष्‍मा महसूस होगी। तुम यदि उन्‍हें स्‍पर्श करोगे तो उन्‍हें उष्‍मा स्‍पर्श महसूस होगी। उन्‍हें पता चल जायेगा कि तुम्‍हें कुछ अद्भुत घटित हो रहा है। पर किसी से कहो मत और जब दूसरों को पता चलने लगे तो तुम आश्‍वस्‍त हो सकते हो और तब तुम दूसरे चरण में प्रवेश कर सकते हो ..उसके पहले नहीं। दूसरे चरण में इस विधि को स्‍वप्‍नावस्‍था में ले चलना है। अब तुम स्‍वप्‍न जगत में इसका प्रयोग शुरू कर सकते हो। यह अब यथार्थ है, अब यह कल्‍पना ही नहीं है। कल्‍पना के द्वारा तुम ने सत्‍य को जान  लिया है कि  सब कुछ प्रकाश से बना है ,प्रकाश मय है। तुम प्रकाश हो;  क्‍योंकि पदार्थ का कण-कण प्रकाश है..हालांकि तुम्‍हें इसका बोध नहीं है। वैज्ञानिक कहते है कि पदार्थ इलेक्ट्रॉन से बना है और प्रकाश ही सब का स्‍त्रोत है। इस सत्‍य को आत्‍मसात करो और जब तुम  घनीभूत प्रकाश हो जाओ तो उसे दूसरे चरण में, स्‍वप्‍न में ले जा सकते हो। 


 6- तो नींद में उतरते हुए ज्‍योति को स्‍मरण करते रहो ,देखते रहो, भाव करते रहो कि मैं प्रकाश हूं। और इसी स्‍मरण के साथ नींद में उतर जाओ, ताकि  नींद में भी यही स्‍मरण जारी रहे ।आरंभ में कुछ ही स्‍वप्‍न ऐसे होंगे जिनमें तुम्‍हें भाव होगा कि तुम्‍हारे भीतर ज्‍योति है या तुम प्रकाश हो। पर धीरे-धीरे स्‍वप्‍न में भी तुम्‍हें यह भाव बना रहने लगेगा और जब यह भाव स्‍वप्‍न में प्रवेश कर जाएगा तो सपने विलीन होने लगेंगे ,खोने लगेंगे और कम से कम होने लगेंगे। तब गहरी नींद की मात्रा बढ़ने लगेगी।  और जब स्‍वप्‍न विदा हो जाते है, तभी इस भाव को सुषुप्‍ति में ,गहन नींद में  लाया जा सकता है ..उसके पहले नहीं। जब सपने विदा हो गए है और तुम अपने को ज्‍योति की भांति स्‍मरण रखते हो तो तुम नींद के द्वार पर हो।अब तुम इस भाव के साथ नींद


 में प्रवेश कर सकते हो और यदि तुम एक बार नींद में इस भाव के साथ उतर गये  कि मैं ज्‍योति हूं तो तुम्‍हें नींद में भी बोध बना रहेगा।तब नींद केवल तुम्‍हारे शरीर को घटित होगी ..तुम्‍हें नहीं।


7-श्री कृष्‍ण गीता में यही कहते है कि योगी कभी नहीं सोते; जब दूसरे सोते है तब भी वे जागते है। ऐसा नहीं है कि उनके शरीर को नींद नही आती। उनके शरीर तो सोते है ..लेकिन शरीर ही। शरीर को विश्राम की जरूरत है क्‍योंकि शरीर यंत्र है। चेतना को विश्राम की कोई जरूरत नहीं है।शरीर को ईंधन चाहिए , विश्राम चाहिए। यही कारण है कि शरीर जन्‍म लेता है, युवा होता है, वृद्ध होता है और मर जाता है। चेतना न कभी जन्‍म लेती है,न कभी बूढी होती है,और न कभी मरती है। उसे न ईंधन की जरूरत है और न विश्राम की। यह शुद्ध ,नित्‍य-शाश्‍वत ऊर्जा।अगर तुम इस ज्‍योति के, प्रकाश के बिंब को नींद के भीतर ले जा सके तो तुम फिर कभी नहीं सोओगे। सिर्फ तुम्‍हारा शरीर विश्राम करेगा और जब शरीर सोया है तो तुम यह जानते रहोगे। और   तब यह घटित होता है कि तुम तुरीय हो, चतुर्थ हो। स्‍वप्‍न और सुषुप्‍ति मन के अंश है और तुम तुरीय ..चतुर्थ हो गए हो। 


 8-तुरीय वह आकाश है जिसमे से बादल   गुजरता है, लेकिन उनमें से कोई बादल नहीं है। वास्तव में, अगर तुम जाग्रत हो  और  फिर तुम स्‍वप्‍न देखने लगते हो ..तो तुम दोनों नहीं हो सकते। अगर तुम जाग्रत हो तो तुम स्‍वप्‍न नहीं देख सकते। और अगर तुम स्‍वप्‍न हो तो तुम सुषुप्ति में नहीं उतर सकते हो, क्योकि वहां कोई सपने   नहीं होते। तुम एक यात्रा हो और ये अवस्‍थाएं पड़ाव है ..तभी तुम यहां से वहां जा सकते हो और फिर वापस आ सकते हो। सुबह तुम फिर जाग्रत अवस्‍था में वापस आ जाओगे। ये अवस्‍थाएं है; और जो  इन अवस्‍थाओं से गुजरता है वह तुम हो। लेकिन वह तुम चतुर्थ हो और इसी चतुर्थ को आत्‍मा ,अमृत तत्‍व , शाश्‍वत जीवन कहते है। जागते हुए,सोते हुए,स्‍वप्‍न देखते हुए, अपने को प्रकाश समझो।यह बहुत सुंदर विधि है।लेकिन  जाग्रत अवस्‍था से आरंभ करो और स्‍मरण रहे कि जब दूसरों को इसका बोध होने लगे तभी तुम सफल हुए। उन्‍हें बोध होगा। और तब तुम स्‍वप्‍न में और फिर निद्रा में प्रवेश कर सकते हो। और अंत में तुम उसके प्रति जागोगे जो तुम हो ...तुरीय।


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बुधवार, 15 दिसंबर 2021

अंगूर के साथ-साथ उसके बीज भी खा जाइएवैज्ञानिकों अंगूर के बीज में एक ऐसा रसायन खोजा है, जो उम्र को बढ़ाने वाली कोशिकाओं को मार देता

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 Aगर आपको बूढ़ा नहीं होना है. ज्यादा दिन युवा रहना है तो अंगूर के साथ-साथ उसके बीज भी खा जाइए. असल में वैज्ञानिकों अंगूर के बीज में एक ऐसा रसायन खोजा है, जो उम्र को बढ़ाने वाली कोशिकाओं को मार देता है. वैज्ञानिकों ने यह प्रयोग चूहों पर किया, जो सफल रहा. चूहों की जिंदगी और युवावस्था में 9 फीसदी का इजाफा हुआ है. वो ज्यादा चुस्त, दुरुस्त हुए और शरीर में बनने वाले ट्यूमर्स भी कम हुए हैं. 

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अंगूर के बीज में मिलने वाला यह रसायन अगर कीमौथैरेपी के साथ दिया जाए तो यह कैंसर के इलाज में कारगर साबित हो सकता है. यह स्टडी हाल ही में nature metabolism नामक जर्नल में प्रकाशित हुई है. वैज्ञानिकों का दावा है कि यह रसायन भविष्य में लोगों को बुढ़ापे और कैंसर से बचाने वाली इलाज पद्धत्तियों का मुख्य हिस्सा बन सकती है. 

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जैसे-जैसे हम बूढ़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे हमारे शरीर में सेन्सेंट कोशिकाओं (Senscent Cells) की मात्रा बढ़ने लगती है. यह कोशिकाएं उम्र संबंधी बीमारियों को बढ़ावा देने लगती हैं. जैसे- दिल, फेफड़े संबंधी बीमारियां, टाइप-2 डायबिटीज और हड्डियों से संबंधित बीमारियां जैसे- ऑस्टियोपtist

शंघाई स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ चाइनीज एकेडमी के साइंटिस्ट किसिया शू और उनके साथियों ने अंगूर के बीज में मौजूद इस रसायन के फायदों पर रिसर्च किया है. इस रसायन का नाम है प्रोसाइनीडिन सी1 (Procyanidin C1). इसे PCC1 भी कहते हैं. जब इस रसायन का असर सेन्सेंट कोशिकाओं पर देखा गया तो किसिया शू समेत अन्य वैज्ञानिक हैरान रह गए. 

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किसिया शू कहते हैं कि सेन्सेंट कोशिकाओं (Senscent Cells) के ऊपर जब हमने कम कंसेंट्रेशन का प्रोसाइनीडिन सी1 (Procyanidin C1) रसायन डाला तो देखा कि इसने कोशिकाओं को सूजन बढ़ाने वाली प्रक्रिया को रोक दिया. जैसे ही कंसेंट्रेशन बढ़ाया गया इसने सेन्सेंट कोशिकाओं को खत्म कर दिया. जबकि, युवा कोशिकाएं सही सलामत थीं.

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इस रसायनिक प्रक्रिया की पुख्ता जांच करने लिए किसिया शू ने दो साल की उम्र वाले 171 चूहों में  प्रोसाइनीडिन सी1 (Procyanidin C1) रसायन डाला. दो साल के चूहे यानी 70 साल का इंसान. उन्होंने देखा कि बाकी चूहों की तुलना में इन चूहों की उम्र में 9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. साथ ही वो ज्यादा चुस्त और फुर्तीले हो गए. उनके शरीर से बुढ़ापे की कोशिकाएं खत्म हो चुकी थीं. सिर्फ युवा कोशिकाएं ही बची थीं. (फोटोः गेटी)


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किसिया शू और उनकी टीम ने 171 चूहों पर चार हफ्ते तक हर हफ्ते दो डोज प्रोसाइनीडिन सी1 (Procyanidin C1) रसायन डाला. उन्हें कई तरह की फिजिकिल एक्टिविटी से गुजारा गया. रसायन लेने वाले चूहों ने उन चूहों की तुलना में ज्यादा बेहतर परफॉर्म किया जिन्हें रसायन नहीं दिया गया था. उनकी भागने की गति ज्यादा थी. संवेदनशीलता बढ़ गई थी. 

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कीमोथैरेपी की वजह से ट्यूमर के अंदर की कोशिकाओं की उम्र तेजी से बढ़ने लगती है. ऐसे में प्रोसाइनीडिन सी1 (Procyanidin C1) रसायन ऐसे ट्यूमर में मौजूद उम्र बढ़ाने वाली कोशिकाओं को मार देता है. इससे कीमोथैरेपी की ताकत और बढ़ जाती है. साथ ही अगर इसे मिटोजैनट्रोन (Mitoxantrone) के साथ दिया जाए तो कई तरह के कैंसर इलाज में मदद मिलेगी. जैसे- ब्रेस्ट कैंसर, नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा, एक्यूट माइलोब्लास्टिक ल्यूकीमिया और अन्य प्रकार के कैंसर. 

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किसिया शू ने प्रोसाइनीडिन सी1 (Procyanidin C1) का प्रयोग उस चूहे पर भी किया जिसमें इंसानों को होने वाले प्रोस्टेट कैंसर की कोशिकाएं थीं. मिटोजैनट्रोन और प्रोसाइनीडिन सी1 के मिश्रण ने प्रोस्टेट ट्यूमर को 75 फीसदी घटा दिया. जबकि, सिर्फ कीमोथैरेपी से यह 44 फीसदी घटता है. यानी अगर दोनों तरीकों से इलाज किया जाए तो प्रोस्टेट कैंसर से भी निजात दिलाई जा सकती है.


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स्विट्जरलैंड स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ लाउसेन के साइंटिस्ट डोरियन जीगलर ने कहा कि अच्छी बात ये है कि प्रोसाइनीडिन सी1 (Procyanidin C1) स्वस्थ कोशिकाओं पर असर नहीं डालता. इसलिए इसे भविष्य में एंटी-एजिंग थैरेपीज में उपयोग किया जा सकता है. अगली स्टडी यह करनी होगी कि क्या यह रसायन जिस तरह चूहों को युवा बना रहा है. कैंसर का इलाज कर रहा है, वो इंसानों में भी सफल होता है या नहीं. 

Sabhar aajtak.in 


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