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रविवार, 22 अगस्त 2021

श्रीकृष्ण हैं बायोटेक्नोलाॅजी के असली जनक

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स्कूल कॉलेजों में हमें यही सिखाया जाता है कि बायोटेक्नॉलाजी को विदेशी वैज्ञानिकों ने खोजा, लेकिन असल में बायोटेक्नोलाॅजी के असली जनक हमारे कान्हा यानि भगवान श्रीकृष्ण थे।  जार्ज मेंडल, वाट्सन और क्रिक नहीं । 

ये सिद्धांत करीब 5000 साल पहले भगवान श्रीकृष्ण ने दिए थे। गीता के कई श्लोकों में इस बात का जिक्र है, जिससे साबित होता है कि बायोटेक के जनक कष्ण थे। गीता के श्लोक बायोटेक के सिद्धांतों को खुद में समेटे हुए हैं। गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक ग्रंथ भी है।

 कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान वैज्ञानिक नजरिए पर आधारित था। इसी ज्ञान आधार पर आज कई वैज्ञानिक अवधारणाओं का जन्म हुआ है। श्रीमद् भागवत गीता के सात श्लोकों में जीवन की उत्पत्ति का पूरा सार मौजूद है।इन्ही श्लोकों के द्वारा कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में ही मानव की उत्पत्ति का विज्ञान दे दिया था।
सामवेद के तीसरे अध्याय के 10वें खंड में पहला व नौवां श्लोक इन पांच तत्व (एटीजीसीयू) की पुष्टि करता है। यानी जीव आत्मा अणु और परमाणु से बनी है। नौवें श्लोक में ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण अणु और परमाणु के रूप में किया है। 

ये हैं गीता के वे सात श्लोक

मय्यासक्तामना: पार्थ योग युजजन्मदाश्रय:।
असंशय समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।

इस श्लोक में शरीर की आंतरिक ऊर्जा के आधार के बारे में बताया गया है। जिसे वैज्ञानिक भाषा में माइटोकोंड्रिया कहते हैं, जिसका अध्ययन सेल बॉयोलॉजी में करते हैं। यही शरीर में ऊर्जा पैदा करने वाला एडीनोसिन ट्राई फॉस्फेट पैदा करता है।

ज्ञानं तेहं सविज्ञामिदं वक्ष्याम्यशेषत:।
यज्ञात्वा नेह भूयोन्यज ज्ञातव्यमविशष्यते।।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया को बताया। पृथ्वी पर निर्जीव से जीव की उत्पत्ति के बारे में जानकारी दी और बताया कि वह कौन से कण थे, जिनसे शरीर का निर्माण हुआ।

मनुष्याणां सहस्त्रेषु कशिचद्यतति सद्धिये।
यततामिप सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वत:।।

तीसरे श्लोक में तत्व ज्ञान को विस्तार से समझाया। आत्मा और मोक्ष पर विस्तार से जानकारी दी। यह भी बताया कि तत्व ज्ञान समझना ही दुष्कर है। इसे जिसने समझ लिया, उसे कुछ और जानने की जरूरत नहीं।

भूमिरापोनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टयां।।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रर्कृंत विद्वि में पराम।
जीवभूतां महाबाहों ययेदं धार्यते जगत्।।

चौथे और पांचवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कई ऐसी बातें कही हैं जिससे सिद्ध होता है कि लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने गुणसूत्र के बारे में भी जानकारी दी थी।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा।

मत्त परतरं नान्यत् किचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। 

छठे और सातवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने उत्पत्ति का आधार आठ तत्वों को बताया। अर्जुन को बताया कि मृत्यु शरीर की होती है, शरीर के अंदर मौजूद तत्वों की नहीं, जिसे आत्मा कहते हैं। 

1940 में वैज्ञानिक एरविन चार्जफ ने कहा था कि डीएनए कभी नहीं बदलता है। चाहे किसी भी रूप में मृत्यु हो, जबकि यही बात गीता में श्रीकृष्ण ने बहुत पहले ही बता दी थी।  

डीएनए- सूत्र का सूत्र में मनियों की तरह गुथा होना (एटीजीसीयू) है। श्रीकृष्ण के अनुसार सूत्र में सूत्र के मनियों के सदृश मुझमें गुथा हुआ है। यानी जीव में विद्यमान है। यह श्लोक डीएनए को ही परिभाषित करता है। श्रीकृष्ण के इसी वाक्य को अगर हम बॉयोकेमेस्ट्री की किसी भी पुस्तक में देखें, तो वहां स्ट्रिंग्स ऑन द रॉल्स इंग्लिश में पढ़ते हैं। इसके अलावा यूएसए की बॉयोकेमेस्ट्री की किताब लेनिनजर में भी यही बताया गया है। 

श्रीकृष्ण ने डीएनए की रासायनिक प्रकृति को मणि रुप में समझाया है। मणि रूप का मतलब डीएनए जो कि केमिकल थ्रेड (धागों) से मिलकर बना है। यहां धागों का मतलब बॉडिंग से है कि किस तरह से निर्जीव पदार्थ आपस में जुड़कर जीवन का निर्माण करते हैं।

आज बस इतना ही .....

अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन

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गुरुवार, 19 अगस्त 2021

विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि

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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 72,73वीं, (प्रकाश-संबंधी छह विधियां ) विधियां क्या है?
विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि  72 ;-

(प्रकाश-संबंधी तीसरी विधि)

 10 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-—

‘’भाव करो कि ब्रह्मांड एक पारदर्शी शाश्‍वत उपस्‍थिति है।‘’

2-यह विधि आंतरिक संवेदनशीलता पर आधारित है।इसलिए पहले अपनी संवेदनशीलता को बढ़ाना पड़ेगा। अपने द्वार-दरवाजे बंद कर लो। कमरे में अँधेरा कर लो, और फिर एक छोटी सी मोमबत्‍ती (त्राटक साधना )जलाओ। और उस मोमबत्‍ती के पास प्रेमपूर्ण मुद्रा में बल्‍कि प्रार्थना पूर्ण भाव दशा में बैठो और ज्‍योति से प्रार्थना करो: ‘’अपने रहस्‍य को मुझ पर प्रकट करो।‘’ स्‍नान कर लो, अपनी आंखों पर ठंडा पानी छिड़क लो और फिर ज्‍योति के सामने अत्‍यंत प्रार्थना पूर्ण भाव दशा में होकर बैठो।

3-ज्‍योति को देखो ओर शेष सब चीजें भूल जाओ। सिर्फ ज्‍योति को देखो। ज्‍योति को देखते रहो।पाँच मिनट बाद तुम्‍हें अनुभव होगा कि ज्‍योति में बहुत चीजें बदल रही है। लेकिन स्‍मरण रहे, यह बदलाहट ज्‍योति में नहीं हो रही है; दरअसल तुम्‍हारी दृष्‍टि बदल रही है।प्रेमपूर्ण भाव दशा में सारे जगत को भूलकर, समग्र एकाग्रता के साथ, भावपूर्ण ह्रदय के साथ ज्‍योति को देखते रहो, तुम्‍हें ज्‍योति के चारों और नए रंग, नई छटाएं दिखाई देंगी। जो पहले कभी नही दिखाई दी थी। वे रंग, वे छटाएं सब वहां मौजूद है; पूरा इंद्रधनुष वहां उपस्‍थिति है।

4-जहां-जहां भी प्रकाश है, वहां-वहां इंद्रधनुष है। क्‍योंकि प्रकाश बहुरंगी है उसमें सब रंग है। लेकिन उन्‍हें देखने के लिए सूक्ष्‍म संवेदना की जरूरत है। उसे अनुभव करो और देखते रहो। यदि आंसू भी बहने लगें तो भी देखते रहो। वे आंसू तुम्‍हारी आंखों को निखार देंगे, ज्‍यादा ताजा बना जायेंगे।कभी-कभी तुम्‍हें प्रतीत होगा कि मोमबत्‍ती या ज्‍योति बहुत रहस्‍यपूर्ण हो गई है। तुम्‍हें लगेगा कि यह वही साधारण मोमबत्ती नहीं है जो मैं आपने साथ लाया था। उसने एक नई आभा एक सूक्ष्‍म दिव्‍यता, एक भगवत्‍ता प्राप्‍त कर ली है। इस प्रयोग को जारी रखो। कई अन्‍य चीजों के साथ भी तुम इसे कर सकते हो।

 5-उदाहरण के लिए,आजकल के बढ़ते तनाव और फैशन ने युवाओं को नशीली दवाओं का आदी बना दिया है।ड्रग या मादक द्रव्‍य का सेवन  करने वालो के लिए चारों  ओर का जगत ..प्रकाश  और रंगों के जगत में बदल जाता है ;जो कि बहुत पारदर्शी और जीवंत मालूम पड़ता है।परंतु यह ड्रग के कारण नहीं है। जगत ऐसा ही है। लेकिन तुम्‍हारी दृष्‍टि धूमिल और मंद पड़ गई है।ड्रग  तुम्‍हारे चारों ओर रंगीन जगत नहीं निर्मित करता है;जगत पहले से ही रंगीन है, उसमें कोई भूल नहीं है। यह रंगों के इंद्रधनुष जैसा है; इसीलिए तुम्‍हें कभी नहीं प्रतीत होता है कि जगत इतना रंग-भरा है। यह सिर्फ तुम्‍हारी आंखों से धुंध को हटा देता है। वह जगत को रंगीन नहीं बनाता। 

 6-तब एक बिलकुल नया जगत तुम्‍हारे सामने होता है। एक मामूली कुर्सी भी चमत्‍कार बन जाती है। फर्श पर पडा जूता नए रंगों से, नई आभा से भर जाता है। सज जाता है; तब यातायात का मामूली शोर गूल भी संगीत पूर्ण हो उठता है। जिन वृक्षों को तुमने बहुत बार देखा होगा और फिर भी नहीं देखा होगा, वे मानों नया जन्‍म ग्रहण कर लेते है। यद्यपि तुम बहुत बार उनके पास  गुजरें हो और तुम्‍हें ख्‍याल है कि तुमने उन्‍हें देखा है। वृक्ष का पत्‍ता-पत्‍ता एक चमत्‍कार बन जाता है।

7-और यथार्थ ऐसा ही है;ड्रग  एक यथार्थ का निर्माण नहीं करता है।  तुम्‍हारी जड़ता को, तुम्‍हारी संवेदनहीनता को मिटा देता है। और तब तुम जगत को ऐसे देखते हो जैसे तुम्‍हें सच में उसे देखना चाहिए।लेकिन ड्रग तुम्‍हें सिर्फ एक झलक दे सकता है।और अगर तुम उस पर निर्भर रहने लगे, देर-अबेर वह भी तुम्‍हारी आंखों से धुंध को हटाने में असमर्थ हो जाएगा। फिर तुम्‍हें उसका अधिक मात्रा की जरूरत पड़ेगी, और मात्रा बढ़ती जायेगी और उसका असर कम होता जायेगा। फिर यदि तुम  उस तरह की चीजें लेना छोड़ दोगे तो जगत तुम्‍हारे लिए पहले से भी ज्‍यादा उदास आरे फीका मालूम पड़ेगा। तब तुम और भी संवेदनहीन हो जाओगे।वास्तव में,अगर तुम कोई बाहरी ,कृत्रिम उपाय काम में लाओगे, तो तुम जड़ हो जाओगे।ड्रग  तुम्‍हें अंतत: जड़ बना देगा; क्‍योंकि उससे तुम्‍हारे विकास नहीं होता है, तुम ज्‍यादा संवेदनशील नहीं होते हो।अगर तुम विकसित होते हो तो यह एक भिन्‍न प्रक्रिया है।तब तुम ज्‍यादा संवेदनशील होगे।और जैसे-जैसे तुम ज्‍यादा संवेदनशील होते हो, वैसे-वैसे जगत दूसरा होता जाता है। 

 8-उदाहरण के लिए,कुछ व्यक्तियों ने ,एकांत में एक नदी के किनारे पत्‍थरों के साथ प्रयोग किया ।वे उन्‍हें फील करने की कोशिश कर रह थे—हाथों से छूकर, चेहरे से लगा कर। जीभ से ,नाक से सूंघकर—वे उन पत्‍थरों  को हर तरह से  फील करने कि कोशिश कर रहे थे। साधारण से पत्‍थर, जो उन्‍हें नदी किनारे मिल गये थे।उन्‍होंने एक घंटे तक यह प्रयोग किया ..

हर व्‍यक्‍ति ने एक पत्‍थर के साथ। और वे कह रहे थे कि एक बहुत अद्भुत घटना घटी। हर किसी ने कहा: ‘’क्‍या यह पत्‍थर मैं अपने पास रख सकता हूं।‘’ मैं इसके प्रेम में पड़ गया हूं।एक साधारण सा पत्‍थर, अगर तुम सहानुभूतिपूर्ण ढंग से उससे संबंध बनाते हो तो तुम प्रेम में पड़ जाओगे। और अगर तुम्‍हारे पास इतनी संवेदनशीलता नहीं है। तो सुंदर से सुंदर व्‍यक्‍ति के पास होकर भी तुम पत्‍थर के पास ही हो; तुम प्रेम में नहीं पड़ सकते हो।तो संवेदनशीलता को बढ़ाना है। तुम्‍हारी प्रत्‍येक इंद्रिय को ज्यादा जीवंत होना है। तो ही तुम इस विधि का प्रयोग कर सकते हो।

 9-‘’भाव करो कि ब्रह्मांड एक पारदर्शी शाश्‍वत उपस्‍थिति है।‘’सर्वत्र प्रकाश है; अनेक-अनेक रूपों और रंगों में प्रकाश सर्वत्र व्‍याप्‍त है। उसे देखो। सर्वत्र प्रकाश है। क्‍योंकि सारी सृष्‍टि प्रकाश की आधारशिला पर खड़ी है। एक पत्‍ते को देखो,  एक फूल को देखो या एक पत्‍थर को देखो।देर-अबेर तुम्‍हें अनुभव होगा कि उससे प्रकाश की किरणें निकल रही है। बस धैर्य से प्रतीक्षा करो। ज्‍यादा जल्‍द मत करो। क्‍योंकि जल्‍दी बाजी में कुछ भी प्रकट नहीं होता। तुम जब जल्‍दी में होते हो तो तुम जड़ हो जाते हो। किसी भी चीज के साथ धीरज से प्रतीक्षा करो। और तुम्‍हें एक अद्भुत तथ्‍य से साक्षात्कार होगा। जो सदा से मौजूद था, लेकिन जिसके प्रति तुम सजग नहीं थे। सावचेत नहीं थे।और जैसे ही तुम्‍हें इस शाश्‍वत अस्‍तित्‍व की उपस्‍थिति अनुभव होगी वैसे ही तुम्‍हारा चित बिलकुल मौन और शांत हो जाएगा।तब तुम उसके एक अंश भर होगे। किसी अद्भुत संगीत में एक स्‍वर भर। फिर कोई चिंता नहीं है। फिर कोई तनाव नहीं है। बूंद समुद्र में गिर गई, खो गई।

10-लेकिन आरंभ में एक बड़ी कल्‍पना की जरूरत होगी। और अगर तुम संवेदनशीलता बढ़ाने के अन्य प्रयोग करते हो, तो वह सहयोगी होगा।तुम कई तरह के प्रयोग कर सकते हो। किसी का हाथ अपने हाथ में ले लो। आंखें बंद कर लो। और दूसरे के भीतर के जीवन को महसूस करो; उसे महसूस करो उसे अपनी और बहने दो; गति करने दो। फिर अपने जीवन को महसूस करो, और उसे दूसरे की और प्रवाहित होने दो। किसी वृक्ष के निकट बैठ जाओ और उसकी छाल को छुओ,स्‍पर्श करो। अपनी आंखें बंद कर लो। और वृक्ष में उठते-जीवन तत्‍व को अनुभव करो। और स्‍पर्श करो।तुम तुरंत बदलाहट अनुभव करोगे।

क्‍या भाव दशा से शरीर में रासायनिक परिवर्तन होते है?-

 06 FACTS;-

1-प्रसन्नता एक सकारात्मक मनोदशा है। हमारी मन:स्थिति जैसी होती है, वैसे ही भौतिक, रासायनिक परिवर्तन भी शरीर में घटते हैं। हमारी मनोदशा काफी कुछ जीवन की परिस्थितियों से जुड़ी होती है। प्रसन्नता या खिन्नता भी इस पर निर्भर होती है कि प्रतिकूल और अनुकूल घटनाओं से हमारा मन कितना उत्तेजित होता है। अधिकतर लोगों की खुशी देर तक नहीं टिकती। ऐसा इसलिए, क्योंकि उनकी यह स्थिति बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों के कारण होती है। सामान्य व्यक्ति की खुशी का आधार संपत्ति, शक्ति, प्रतिभाएं योग्यताएं और समाज से प्राप्त हुईं मान्यताएं, प्रतिष्ठा आदि ही होती हैं। इनके लिए दूसरों पर निर्भरता अनिवार्य है।
2-वास्तव में,हमारी खुशी हमेशा सापेक्ष होती है। अगर आप वाह्य कारणों से खुश होते हैं, तो उदासी भी आएगी ही। आज सुख है तो कल दुख होगा। आज आशा की किरण दिखेगी तो कल खिन्नता व हताशा की भावदशा होगी, किंतु ध्यान में जानी गई आनंदपूर्ण अवस्था की कोई विपरीत दशा नहीं है। साधना इस खुशी को सापेक्ष दृष्टिकोण से परे ले जाना सिखाती है। संसारी व्यक्ति की खुशी एक उन्मादपूर्ण अवस्था है। जो अंदर है, उसे बाहर खोजने चले तो सिवाय अर्थहीन भटकन के कुछ हाथ नहीं लगता। आपके आंतरिक आनंद के स्वामी स्वयं आप हैं। बाहर का कोई परिवर्तन उसमें हेरफेर नहीं कर सकता।

3-उदाहरण स्वरुप एक डाक्‍टर ने कुछ लोगों पर प्रयोग प्रयोग किया  कि क्‍या भाव दशा से शरीर में रासायनिक परिवर्तन होते है। अब उसने  निष्‍कर्ष निकाला कि भाव दशा से शरीर में तत्‍काल रासायनिक परिवर्तन होते है।उसने बारह लोगों के समूह पर यह प्रयोग किया।उसने प्रयोग के आरंभ में उन सबकी पेशाब की जांच की। और सबकी पेशाब साधारण,सामान्‍य पाई गई। फिर हर व्‍यक्‍ति को एक भाव दशा के प्रयोग में रखा गया। एक को क्रोध, हिंसा, हत्‍या, मार-पीट से भरी फिल्‍म दिखाई गई। तीस मिनट तक उसे भयावह फिल्‍म दिखाई गई। वह मात्र फिल्‍म थी। लेकिन वह व्‍यक्‍ति उस भाव दिशा में रहा।

4-दूसरे को एक हंसी खुशी की, प्रसन्नता की फिल्‍म दिखाई गई। वह आनंदित रहा।और उसी तरह से बाहर लोगों पर प्रयोग किया।फिर प्रयोग के बाद उनकी पेशाब की जांच की गई;और अब सबकी पेशाब अलग थी। शरीर में रसायनिक परिवर्तन हुए थे। जो हिंसा और भय की भाव दशा में रहा वह अब बुझा-बुझा, बीमार था। और हंसी-खुशी की प्रसन्नता की फिल्‍म दिखाई गई। वह प्रफुल्‍ल था। उसकी पेशाब अलग थी। उसके शरीर की रासायनिक व्‍यवस्‍था अलग थी।

5-तुम्‍हें बोध नहीं है कि तुम अपने साथ क्या कर रहे हो। जब तुम कोई खून ख़राबे की फिल्‍म देखने जाते हो ,तो तुम नहीं जानते हो कि तुम क्‍या कर रहे हो।वास्तव में, तुम अपने शरीर की रसायनिक व्‍यवस्‍था बदल रहे हो। जब तुम कोई जासूसी उपन्‍यास पढ़ते हो। तुम अपनी हत्‍या स्‍वयं कर रहे हो।क्योकि, तुम उत्‍तेजित हो जाओगे; भयभीत हो जाओगे ,तनाव से भर जाओगे। जासूसी उपन्‍यास का यही तो मजा है। तुम जितने उत्‍तेजित होते हो, तुम उसका उतना ही सुख लेते हो। आगे क्‍या घटित होने वाला है, इस बात को लेकर जितना सस्‍पेंस होगा; तुम उतने ही अधिक उत्‍तेजित होगे।परन्तु इससे तुम्‍हारे शरीर का रसायन बदल रहा है;तुम इस बात से अनभिज्ञ हो।

6-ये सारी विधियां भी तुम्हारे शरीर का रसायन बदलती है। अगर तुम सारे जगत को जीवन और प्रकाश से भरा अनुभव करते हो, तो तुम्‍हारे शरीर का रसायन बदलता है।और यह एक चेन रिएक्‍शन है, इस बदलाहट की एक शृंखला बन जाती है। जब तुम्‍हारे शरीर का रसायन बदलता है और तुम जगत को देखते हो ...तो वही जगत ज्‍यादा जीवंत दिखाई पड़ता है।और जब वह ज्‍यादा जीवंत दिखाई पड़ता है तो तुम्‍हारे शरीर की, रासायनिक व्‍यवस्‍था और भी बदलती है।ऐसे एक शृंखला निर्मित हो जाती है।यदि यह विधि तीन महीने तक प्रयोग की जाए,तो तुम भिन्‍न ही जगत में रहने लगोगे। क्‍योंकि  तब तुम ही भिन्‍न व्‍यक्‍ति हो जाओगे।इसलिए प्रबुद्ध लोग खुशी का अनुभव अपनी अंतरात्मा में करते हैं। साक्षी की अंतर्यात्रा से साधक की भावनाओं में सुनिश्चित रूपांतरण घटता है, क्योंकि वह असली और स्थायी खुशी अनुभव करने लगता है।

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 विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि  73 ;-

(प्रकाश-संबंधी चौथी  विधि)

 18 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-

‘ग्रीष्‍म ऋतु में जब तुम समस्‍त आकाश को अंतहीन निर्मलता में देखो, उस निर्मलता में प्रवेश करो।‘’

2-मन विभ्रम है; मन उलझन है। उसमें स्‍पष्‍टता नहीं है ,निर्मलता नहीं है और मन सदा बादलों से घिरा रहता है। वह कभी  बिना  भ्रम के या शून्य आकाश नहीं होता।तुम अपने मन को शांत-निर्मल नहीं बना सकते हो। ऐसा होना मन के स्‍वभाव में ही नहीं है। मन अस्‍पष्‍ट रहेगा, धुंधला-धुंधला ही रहेगा। अगर तुम मन को पीछे छोड़ सके, अगर तुम मन का अतिक्रमण कर सके, उसके पार जा सके, तो एक स्‍पष्‍टता तुम्‍हें उपलब्‍ध होगी। तुम द्वंद्व रहित हो सकते हो।द्वंद्व रहित मन जैसी कोई चीज होती ही नहीं। न कभी अतीत में थी और न कभी भविष्‍य में होगी। मन का अर्थ ही द्वंद्व है उलझाव है।मन की संरचना को समझने की कोशिश करो और तब यह विधि तुम्‍हें स्‍पष्‍ट हो जाएगी।

3- वास्तव में , मन विचारों की एक प्रक्रिया है, विचारों का एक सतत प्रवाह है—चाहे वे विचार संगत हों या असंगत हो। चाहे वे प्रासंगिक हो या अप्रासंगिक हो। मन सब जगहों से संग्रहित किए गए बहुआयामी प्रभावों का एक लंबा जलूस है। तुम्‍हारा सारा जीवन एक संग्रह है—धूल का संग्रह। और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है।एक बच्‍चा जन्‍म लेता है। बच्‍चे की दृष्‍टि निर्मल है; क्‍योंकि उसके पास मन नहीं है। लेकिन जैसे ही मन प्रवेश करता है, उसके साथ ही द्वंद्व और उलझन भी प्रवेश कर जाती है। बच्‍चा निर्मल है लेकिन उसे ज्ञान, सूचना, संस्‍कृति, धर्म और संस्‍कारों का संग्रह करना ही पड़ेगा। वे जरूरी है। उपयोगी है, उसे अनेक जगहों से, अनेक स्रोतों से इकट्ठा करेगा। और तब उसका मन एक बाजार बन जाएगा—एक मेला, एक भीड़। और क्‍योंकि उसके स्‍त्रोत अनेक है, उलझन और भ्रांति और विभ्रम का होना है। और तुम कितना भी इकट्ठा करो, कुछ भी निश्‍चित नहीं हो पाता है। क्‍योंकि ज्ञान सदा बदलता रहता है और बढ़ता रहता है।

 4-उदाहरण स्वरुप मेडिकल कालेज में  एक प्रोफेसर अपने विषय का भारी विद्वान था। और उसने जो अंतिम काम किया वह यह था कि उसने अपने सारे विद्यार्थियों को जमा किया और कहा: ‘मुझे तुम्‍हें एक और चीज सिखानी है। मैंने तुम्‍हें जो कुछ पढ़ाया है उसका पचास प्रतिशत ही सही है। और शेष पचास प्रतिशत बिलकुल गलत है। लेकिन कठिनाई यह कि मैं नहीं जानता कि कौन सा पचास प्रतिशत सही है और कौन सा पचास प्रतिशत गलत है।’ज्ञान की सारी इमारत ऐसे ही खड़ी है। कुछ भी निश्‍चित नही है। कोई नहीं जानता है; हर कोई अंधेरे में टटोल रहा है। ऐसे ही टटोल-टटोल कर हम शास्‍त्र निर्मित करते है; विचार पद्धतियां बनाते है। और ऐसे ही हजारों-हजारों शास्‍त्र बन गए है। हिंदू कुछ कहते है; ईसाई कुछ और कहते है। मुसलमान कुछ और कहते है। और सब एक दूसरे का खंडन करते है। उनमें कोई सहमति नहीं है। और कोई भी निश्‍चित नहीं है ,असंदिग्‍ध नहीं है। और ये सारे स्‍त्रोत ही तुम्‍हारे मन के स्‍त्रोत है। तुम इनसे ही अपना संग्रह निर्मित करते हो। तुम्‍हारा मन एक कबाड़ खाना बन जाता है।लेकिन  विभ्रम ,उलझन भी अनिवार्य है।

 5-केवल वही व्यक्ति निश्‍चित हो सकता है ;जो बहुत जानता है। तुम जितना अधिक जानोंगे, उतने ही भ्रमित होगे। उलझन ग्रस्‍त होगे। आदिवासी लोग ज्‍यादा निश्‍चिंत थे और उनकी आंखें ज्‍यादा निर्मल मालूम पड़ती है। यह दृष्‍टि की निर्मलता नहीं थे। यह सिर्फ परस्‍पर विरोधी तथ्‍यों के प्रति उनका अज्ञान था। अगर आधुनिक चित ज्‍यादा भ्रमित है तो उसका कारण है कि आधुनिक चित बहुत ज्‍यादा जानता है। अगर तुम ज्‍यादा जानोंगे तो तुम ज्‍यादा भ्रमित होगे। क्‍योंकि अब तुम बहुत कुछ जानते हो। और तुम जितना ज्‍यादा जानोंगे उतने ही ज्‍यादा अनिश्‍चित होगे।केवल मूढ़ ही असंदिग्‍ध होंगे ,मतांध होंगे।वे कभी झिझक में नहीं पड़ते। तुम जितना ही जानोंगे उतना ही अधिक उधेड़बुन में पड़ोगे।वास्तव में ,मन जितना ही बड़ा होगा तुम उतना ही जानोंगे क्योकि  भ्रांति मन का स्‍वभाव है। और  केवल मूढ़ ही निश्‍चित हो सकते है , तो  इसका अर्थ यह नहीं है कि बुद्ध व्यक्ति/ Enlightened One मूढ़ है। कारण स्पष्ट है ...क्‍योंकि वे संदिग्‍ध नहीं है। इस भेद को स्‍मरण रखना है ; बुद्ध न निश्‍चित है न अनिश्‍चित;  उनकी दृष्‍टि स्‍पष्‍ट है।

 6-मन के साथ अनिश्‍चय है; मूढ़ मन के साथ निश्‍चित है; और अ-मन के साथ निश्‍चय-अनिश्‍चिय दोनों विदा हो जाते है।बुद्ध व्यक्ति परम होश है, शुद्ध बोध है ...वे खुले आकाश जैसे है। केवल वही अनिश्‍चित हो सकता है जो निश्‍चित की खोज में है। मन सदा अनिश्‍चित /कन्फ्यूज रहता है और निश्चय /क्‍लैरिटी की तलाश करता है। बुद्ध व्यक्ति ने मन को ही गिरा दिया है अथार्त  मन के साथ सारे विभ्रम को, सारे निश्‍चय-अनिश्‍चय को,सब कुछ को गिरा दिया है। तुम्‍हारी चेतना आकाश जैसी है और तुम्‍हारा मन  बादलों जैसा है। आकाश बादलों से अछूता रहता है। बादल आते है जाते है, लेकिन आकाश पर उनका कोई चिन्‍ह नहीं छूटता है। बादलों की कोई स्‍मृति ,कुछ भी पीछे नहीं रहता है  -आकाश अनुद्विग्न ,शांत रहता है।

 7-तुम्‍हारे साथ भी यहीं बात है, तुम्‍हारी चेतना अनुद्विग्‍न, अक्षुब्‍ध, शांत रहती है। विचार आते है और जाते है, मन उठते है और खो जाते है। ऐसा मत सोचो कि तुम्‍हारे पास एक ही मन है, तुम्‍हारे पास अनेक मन है ; मनों की एक भीड़ है। और तुम्‍हारे मन बदलते रहते है।तुम कम्‍युनिस्‍ट हो; तो तुम्‍हारे पास एक तरह का मन होगा। फिर तुम कम्यूनिज् छोड़कर कम्यूनिज़म विरोधी बन सकते हो। तब तुम्‍हारे पास  सर्वथा विपरीत मन होगा। तुम वस्‍त्रों की भांति अपने मन बदलते रह सकते हो। और तुम बदलते रहते हो; तुम्‍हें इसका पता हो या न हो। ये बादल आते है जाते है।निर्मलता तो तब प्राप्‍त होती है जब तुम अपनी दृष्‍टि को बादलों से हटाते हो। जब तुम आकाश के प्रति बोधपूर्ण होते हो। अगर तुम्‍हारी दृष्‍टि आकाश पर नहीं है तो उसका अर्थ है कि वह बादलों पर लगी है। उसे बादलों से हटाकर आकाश पर केंद्रित करो।यह विधि कहती है: ‘ग्रीष्‍म ऋतु में जब तुम समस्‍त आकाश को अंतहीन निर्मलता में देखो, उस निर्मलता में प्रवेश करो।

8-’आकाश पर ध्‍यान करो। ग्रीष्‍म ऋतु  के दूर-दूर तक रिक्‍त और निर्मल आकाश, पर  मनन करो ,ध्‍यान करो। उस निर्मलता में प्रवेश करो और वह निर्मलता ही हो जाओ ..आकाश जैसी निर्मलता।अगर तुम निर्मल आकाश पर ध्‍यान करोगे तो तुम अचानक महसूस करोगे कि तुम्‍हारा मन विलीन हो रहा है ,विदा हो रहा है। ऐसे अंतराल होंगे जिनमें अचानक तुम्‍हें बोध होगा कि निर्मल आकाश तुम्‍हारे भीतर प्रवेश कर गया है। ऐसे अंतराल होंगे , जिनमें कुछ देर के लिए विचार खो जायेंगे। मानों चलती सड़क अचानक सूनी हो गई है। और वहां कोई नहीं चल रहा है।आरंभ में यह अनुभव कुछ क्षणों के लिए होगा; लेकिन वे क्षण भी बहुत रूपांतरण कारी होगे। फिर धीरे-धीरे मन की गति धीमी होने लगेगी और अंतराल बड़े होने लगेंगे। अनेक क्षणों तक कोई विचार, कोई बादल नहीं होगा। और जब कोई विचार, कोई बादल नहीं होगा तो बाहरी आकाश और भीतरी आकाश एक हो जाएंगे। क्‍योंकि विचार ही बाधा है, विचार ही दीवार निर्मित करते है; विचारों के कारण ही बाहर भीतर का भेद खड़ा होता है ।

9-जब विचार नहीं होते ,तो बाहरी और भीतरी दोनों अपनी सीमाएं खो देते है और एक हो जाते है। वास्‍तव में सीमाएं वहां कभी नहीं थी। सिर्फ विचार के कारण, विचार के अवरोध के कारण सीमाएं मालूम पड़ती थी।आकाश पर ध्‍यान करना बहुत सुंदर है। बस लेट जाओ, ताकि पृथ्‍वी को भूल सको। किसी एकांत सागर तट पर, या कहीं भी जमीन पर पीठ के बल लेट जाओ और आकाश को देखो। लेकिन इसके लिए निर्मल आकाश सहयोगी होगा और आकाश कोअपलक देखते हुए उसकी निर्मलता को, उसके फैलाव को अनुभव करो। और फिर उस निर्मलता में प्रवेश करो, उसके साथ एक हो जाओ। अनुभव करो कि जैसे तुम आकाश ही हो गए हो।आरंभ में अगर तुम सिर्फ कुछ और नहीं करो ..सिर्फ  खुले आकाश पर ही ध्‍यान करो। तो अंतराल आने शुरू हो जाएंगे क्‍योंकि तुम जो कुछ देखते हो वह तुम्‍हारे भीतर प्रवेश कर जाता है ;तुम्‍हें भीतर से उद्वेलित कर देता है ,वह तुममें बिंबित-प्रतिबिंबित हो जाता है।

10-तुम एक मकान देखते हो। उसे मात्र देखते ही तुम्‍हारे भीतर कुछ होने भी लगता है। तुम एक कार को देखते हो, या कुछ भी देखते हो तो  कोई प्रतिबिंब बनने लगता है।और तुम प्रतिक्रिया करने लगते हो तुम जो कुछ देखते हो वह तुम्‍हें ढालता है, गढ़ता है; वह तुम्‍हें बदलता है ,निर्मित करता है। बाह्म सतत भीतर से जुड़ा है।तो खुले आकाश को देखना बढ़िया है। उसका असीम विस्‍तार बहुत सुंदर है। उस असीम के संपर्क में तुम्‍हारी सीमाएं भी विलीन होने लगती है; क्‍योंकि वह असीम आकाश तुम्‍हारे भी प्रतिबिंबित होने लगता है।और अगर तुम आंखों को झपके बिनाअपलक ताक सको तो बहुत अच्‍छा है।  क्‍योंकि अगर तुम पलक झपकते हो तो विचार प्रक्रिया चालू रहेगी। तो बिना पलक झपकाए अपलक देखो ,शून्‍य में देखो; उस शून्‍य में डूब जाओ। भाव करो कि तुम उससे एक हो गए हो। और फिर आकाश तुममें उतर आएगा।पहले तुम आकाश में प्रवेश करते हो फिर आकाश तुम में प्रवेश करता है। तब मिलन घटित होता है। 

11-आंतरिक आकाश बाह्म आकाश से मिलता है और उस मिलन में उपलब्‍धि है। उस मिलन में मन नहीं होता। क्‍योंकि वह मिलन ही तब होता है जब मन नहीं होता। उस मिलन में तुम पहली दफा मन नहीं होते हो और इसके साथ सारी भ्रांति विदा हो जाती है। मन के बिना भ्रांति नहीं हो सकती है ;सारा दुःख  समाप्ति हो जाता है।क्‍या तुमने  कभी इस बात पर ध्‍यान दिया है कि दुःख मन के बिना नहीं हो सकता है क्योकि उसका स्‍त्रोत ही नहीं रहा तो कौन तुम्‍हें दुःख देगा। और उलटी बात भी सही है कि तुम मन के बिना दुःखी नहीं हो सकते हो। तुम मन के रहते आनंदित नहीं रह सकते हो। मन कभी आनंद का स्‍त्रोत नहीं हो सकता है।यदि भीतर और बाहरी आकाश क्षण भर के लिए भी मिलते है और मन विलीन हो जाता है तो तुम एक नए जीवन से भर जाओगे। उस जीवन की गुणवता ही और है। यहीं  मृत्‍यु से अस्‍पर्शित शाश्‍वत जीवन है।

 12-उस मिलन में तुम यहां और अभी होगे ..वर्तमान में होगे। क्‍योंकि अतीत विचार का हिस्‍सा है और भविष्‍य भी विचार का हिस्‍सा है । अतीत और भविष्‍य मन के हिस्‍से है; वर्तमान अस्‍तित्‍व है; वह तुम्‍हारे मन का हिस्‍सा नहीं है। जो क्षण बीत गया वह मन का है, जो क्षण आने वाला है वह मन का है। लेकिन वर्तमान क्षण कभी तुम्‍हारे मन का हिस्‍सा नहीं हो सकते है। बल्‍कि तुम ही इस क्षण के हिस्‍से हो। तुम यहीं हो, ठीक अभी और यहीं हो। लेकिन तुम्‍हारा मन  सदा कहीं और होता है।तो अपने को भार-मुक्‍त करो। उदाहरण के लिए एक सूफी संत की कहानी है।वह एक सुनसान रास्‍ते से यात्रा कर रहा था। रास्‍ता निर्जन हो चला था, तभी उसे एक किसान अपनी बैलगाड़ी के पास दिखाई पडा। बैलगाड़ी कीचड़ में फंस गई थी। रास्‍ता उबड़-खाबड़ था। किसान अपनी गाड़ी में फल भर कर ला रहा था; लेकिन रास्‍ते में कहीं गाड़ी का पिछला तख्‍ता खुल गया था और सेब गिरते गए थे। लेकिन किसान को इसका पता नहीं था। जब गाड़ी कीचड़ मे फंसी तो पहले तो उसने उसे निकालने की भरसक चेष्‍टा कि, लेकिन उसके सब प्रयत्‍न व्‍यर्थ गए। तब उसने सोचा कि मैं गाड़ी को खाली कर लूं तो निकालना आसान हो जाएगा।

 13-उसने जब लौटकर देखा तो मुश्‍किल से दर्जन भर फल बचे थे। सब बोझ पहले ही उतर चूका था। हम उसकी पीड़ा समझ सकते है। उस सूफी ने अपने संस्‍मरणों में लिखा है कि थके-हारे किसान ने एक आह भरी: ‘नरक में गाड़ी फंसी और उतारने को कुछ भी नहीं है।’यही एक आशा बची थी कि गाड़ी खाली हो तो कीचड़ से निकल आएगी। पर अब खाली करने को भी

कुछ नहीं है।सौभाग्‍य से तुम इस तरह नहीं फंसे हो। तुम खाली कर सकते हो। तुम्‍हारी गाड़ी बहुत बोझिल है। तुम मन को खाली कर सकते हो। और जैसे ही मन गया कि तुम उड़ सकते हो। तुम्‍हें पंख लग जाते है।यह विधि ..आकाश की निर्मलता में झांकने और उसके साथ एक होने की विधि—उन विधियों में एक है जिनका बहुत उपयोग किया गया है। अनेक परंपराओं ने इसका उपयोग किया है। और खास कर आधुनिक चित के लिए यह विधि बहुत उपयोगी है। क्‍योंकि पृथ्‍वी पर कुछ भी नहीं बचा है जिस पर ध्‍यान किया जा सके। सौभाग्‍य से सिर्फ आकाश अब भी बचा है;जो ध्‍यान करने के लिए उपलब्‍ध है।तुम यदि अपने चारों ओर देखोगें तो पाओगे कि प्रत्‍येक चीज मनुष्‍य निर्मित है। प्रत्‍येक चीज सीमित हो गई है; सीमा में सिकुड़ गई है।  

 14-तो इस उपयोगी विधि का  प्रयोग करो । लेकिन तीन बातें याद रखने जैसी है। पहली बात ..पलकें मत झपकाये  ,अपलक  देखे । अगर तुम्‍हारी आंखें दुखने लगे और आंसू बहने लगें तो भी चिंता मत करना। वे आंसू भी तुम्‍हारे निर्भार करने में सहयोगी होंगे .. तुम्‍हारी आंखों को ज्‍यादा निर्दोष और ताजा बना जाएंगे। तुम अपलक देखते जाओ।दूसरी बात.. आकाश के बारे में सोच-विचार मत करो। इस बात को ख्‍याल में रख लो कि तुम आकाश के संबंध में सोच विचार करने लग सकते हो। तुम्‍हें आकाश के संबंध में अनेक कविताएं, सुंदर-सुंदर कविताएं याद आ सकती है। लेकिन तब तुम चूक जाओगे। तुम्‍हें आकाश के बारे में सोच-विचार नहीं करना है। तुम्‍हें तो उसमें डूबना है ;उसके साथ एक होना है। अगर तुम उसके संबंध में सोच-विचार करने लगे तो फिर अवरोध निर्मित हो जाएगा। तब तुम आकाश को चूक जाओगे। और अपने ही मन में बंद हो जाओगे।आकाश के संबंध में सोच-विचार मर करो; आकाश के हो जाओ। बस उसमे झांको और उसमें प्रवेश करो और उसे भी अपने में प्रवेश करने दो। अगर तुम आकाश में डूबोगे तो आकाश भी तुममें डूबने लगेगा।

 15-परन्तुआकाश में प्रवेश  कैसे संभव होगा कि तुम आकाश में गति करो?तीसरी बात..  आकाश में गहरे और गहरे अपलक देखते जाओ। मानो तुम उसकी सीमा खोजने की कोशिश कर रहे हो। जहां तक संभव हो, उसकी गहराई में झाँकते जाओ। यह गहराई ही अवरोध को तोड़ देगी। और इस विधि का अभ्‍यास कम से कम चालीस मिनट तक करना चाहिए। उससे कम समय करना बहुत उपयोगी नहीं होगा।जब तुम्‍हें वास्‍तव में लगे कि तुम आकाश के साथ एक हो गए हो तो तुम आंखें बंद कर सकते हो। जब आकाश तुममें प्रवेश कर जाए तो तुम आंखें बद कर सकते हो। तब तुम उसे अपने भीतर देखने में भी सामर्थ्य हो सकते हो। तब बाहर देखना जरूरी नहीं है। तो चालीस मिनट के बाद जब तुम्‍हें लगे कि एकता सध गई ,संवाद सध गया, तुम उसके हिस्‍से हो गये। और अब मन नहीं है, तो तुम आंखें बंद कर सकते हो और भीतर आकाश को अनुभव कर सकते हो।

 16-आकाश निर्मल है, शुद्ध है, अस्‍तित्‍व की शुद्धतम चीज है। कुछ भी उसे अशुद्ध नहीं करता। संसार आते है, और चले जाते है। पृथ्वीयां बनती है,और खो जाती है। लेकिन आकाश निर्मल का निर्मल बना रहता है। तो शुद्धता है; तुम्‍हें उसे प्रक्षेपित नहीं करना है। तुम्‍हें सिर्फ उसे अनुभव करना है,उसके प्रति संवेदनशील होना है। ताकि उसका अनुभव हो सके। निर्मलता तो मौजूद ही है। तुम आकाश को राह दो। तुम उसे जबरदस्‍ती नहीं ला सकते हो। तुम्‍हें उसे सिर्फ प्रेमपूर्वक राह देनी है।सभी ध्‍यान सिर्फ प्रेम पूर्वक राह देने की बात है। सच तो यह है कि तुम्‍हारी जबरदस्‍ती करने की चेष्‍टा से ही तुम्‍हारे सभी दुःख निर्मित हुए है। जबरदस्‍ती कुछ भी नहीं हो सकता है। लेकिन तुम चीजों को घटित होने दे सकते हो। स्‍त्रैण बनो; चीजों को घटित होने दो। निष्‍क्रिय बनो। आकाश पूर्णत: निष्‍क्रिय है, कुछ भी तो नहीं करता है ..बस है। तुम भी निष्‍क्रिय होकर आकाश को देखते रहो। खुले  ,ग्रहण शील ,अपनी और से किसी तरह की भी जल्‍दबाजी किए बिना ...और तब आकाश तुममें उतरेगा।

17-‘ग्रीष्‍म ऋतु में जब तुम समस्‍त आकाश को अंतहीन निर्मलता में देखो, उस निर्मलता में प्रवेश करो।’

 लेकिन अगर ग्रीष्‍म ऋतु न हो तो तुम क्‍या करोगे? अगर आकाश में बादल हों,आकाश साफ न हो ;तो अपनी आंखे बंद कर लो और आंतरिक आकाश को देखो। आंखे बंद कर लो अगर कुछ विचार दिखाई पड़े तो उन्‍हें वैसे ही देखो जैसे कि आकाश में तैरते बादल हो। पृष्‍ठभूमि के प्रति, आकाश के प्रति सजग हो जाओ और बादलों के प्रति उदासीन रहो।हम विचारों से इतने जुड़ रहते है कि बीच के अंतरालों के प्रति कभी ध्‍यान नहीं दे पाते है। एक विचार गुजरता है और इसके पहले कि दूसरा विचार प्रवेश करे, वहां एक अंतराल होता है। उस अंतराल में ही आकाश की झलक है।जब विचार नहीं होता है तो एक शून्यता ,एक खालीपन होता है। अगर आकाश बादलों से आच्‍छादित है ..ग्रीष्‍मऋतु नहीं है और आकाश साफ नहीं है ;तो अपनी आंखें बंद कर लो और पृष्‍ठभूमि पर मन को एकाग्र करो; उस आंतरिक आकाश पर ध्‍यान करो जिस पर विचार आते-जाते है। 

18-विचारों पर बहुत ध्‍यान मत दो; उस आकाश पर ध्‍यान दो जिस पर विचार की भाग-दौड़ होती है।उदाहरण के लिए यदि हम एक  कमरे में बैठे है तो  कमरे को दो ढंगों से देख सकते है। एक कि स्‍थान में बैठे हुए व्यक्ति को देखे और उस स्‍थान के प्रति तटस्‍थ/उदासीन रहें जिसमें हम बैठे हो।अथवा हम अपने दृष्‍टि कोण को बदल ले और कमरे को, उसके खाली स्‍थान को देखे और  स्‍थान में बैठे हुए व्यक्ति के प्रति उदासीन हो जाये।तब सारा परिप्रेक्ष्‍य बदल जाता है।यही आंतरिक जगत में करो; आकाश पर ध्‍यान दो। विचार वहां चल रहे है, उसके प्रति उदासीन हो जाओ। उन पर कोई ध्‍यान मत दो वह है, चल रहे है, देख लो कि ठीक है, विचार चल रहे है। सड़क पर लोग चल रहे है; देख लो और उदासीन रहो। यह मत देखो कि कौन जा रहा है। इतना भर जानों कि कुछ गुजर रहा है। और उस स्‍थान के प्रति सजग होओ जिसमें गति हो रही है। तब ग्रीष्‍म ऋतु का आकाश भीतर घटित होगा।ग्रीष्‍म ऋतु की प्रतीक्षा की जरूरत नहीं है। अन्‍यथा हमारा मन ऐसा है कि वह कोई भी बहाना पकड़ ले सकता है। वह कहेगा कि अभी ग्रीष्‍म ऋतु नहीं है। और यदि ग्रीष्‍म ऋतु भी हो तो वह कहेगा की आकाश निर्मल नहीं है।

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क्या है सुक्ष्म शरीर

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                                                     #

भावशरीर स्थूलशरीर का ही एक भाग है जो मत्यु के बाद उसी के साथथोडे़ समय बाद नष्ट हो जाता है इससे परे सुक्ष्मशरीर है जो जीवात्मा का स्व- शरीर  है aमनुष्य मे यह शरीर चौदह  ससे इक्कीस वर्ष की उम्र तक विकसित  हो जाना चाहिए।
  
इसकेपूर्णविकास न होने पर मनूष्य कमी रह जाती है इसके विकास से बुद्धि तर्क  विचार विकसित होते है इसी शरीर के विकास से संस्कृति का विकास होता है इसमें सन्देह  विचार श्रद्धा विवेक की  सम्भावनाएँ है।

सन्देह और विेचार जनमजात  है श्रद्धा और विवेक रूपान्तरण है sसन्देह से श्रद्धा एवं विचार से ही विवेक उत्पन्न होता है।।
 
विचारकरने वाला अन्धविश्वासी हो जाता है वह हठधर्मी व दुराग्रही  हो जाता हैh विवेक वाले का निर्णय निश्चित व स्पष्ट होता है
जो सक्ष्म शरीर  को विकसित कर लेते  है उनके चेहरे के चारो और आभा मण्डल (ओरा)  दिखाई देता है जो आत्मा का प्रकाश है यह आभा मण्डल सुक्ष्म कणो से बना  होता है oजो आँखो से नही दिखाई देता इसी सुक्ष्म शरीर से स्थुल शरीर का निर्माण होता है
अधिकांश मनुष्य इसी शरीर पर रूक जाते है kउनको यह जीवन  ही सब कुछ मालुम होता है  आगे के जीवन की उनकी कल्पना ही नही होती।  
इस शरीर का सम्बन्ध कुण्डलिनी के "  मणिपुर चक्र"  से  होता है

नोट---  मैं  बहुत कम पढा लिखा व्यक्ति हुँ लिखने त्रिकुटियाँ बहुत होती है उसके लिए क्षमा चाहता हुँ

अशोक वशिष्ठ जी

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शब्द-शक्ति और मन्त्र-विज्ञान

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प्रिय आत्मन्

क्या हमने कभी कल्पना की है कि संसार के करीब  आधे लोग रात में जब सोते रहते हैं तब आधी आबादी
दिन के प्रकाश में अपने कार्य में व्यस्त रहती है। यदि वे 
मनुष्य दिन के अपने जागरण-काल में केवल तीन घंटे भी बातें करते
हैं तो क्या हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि ये कितनी शक्ति इस
प्रकार उत्पन्न करते हैं ? विद्युतीय ध्वनिशास्त्र तथा
इंजीनियरिंग के द्वारा गणना करके यदि देखा जाय तो लोग
केवल तीन घण्टों में लगभग 7000 खरब वाट विद्युत् शक्ति केवल बोल
बोल कर उत्पन्न करते हैं। शब्दों से उत्पन्न यह विद्युत् ऊर्जा
दामोदर नदी घाटी, रिहन्द बांध, भाखड़ा नांगल बांध और
परमाणु सयन्त्रों की सम्मलित शक्ति से कहीं अधिक है। इस
ऊर्जा से सम्पूर्ण विश्व में घण्टों प्रकाश किया जा सकता और
उस ऊर्जा की एक यूनिट का मूल्य मात्र 50 पैसा भी रखा जाय
तो इतनी बिजली का मूल्य लगभग अरबों-खरबों रुपये होगा।
कल्पना कीजिये कि इतनी बिजली और इतना रुपया मनुष्य
केवल होंठ हिलाकर हवा में फूँक मार कर उड़ा देता है।
जिस स्थान पर तामसिक मन और बिचार वाले लोगों की
संख्या अत्यधिक हो जाती है, उनके मुख से निकलने वाले शब्द
भी ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, क्रोध, लोभ, वासना आदि से भरे हुए होते
हैं। वातावरण में पहले घनीभूत होने के बाद उन शब्दों में उत्पन्न
ऊर्जा 'ईथर' में पहुँचती है जिसे ग्रहण कर प्रकृति कृत्याओं(दैवीय
आपदाओं) को जन्म देती है। वे कृत्याएं उस स्थान पर, देश पर
नाना प्रकार के संघर्ष, युद्ध, रक्तपात, आदि कराने लग जाती हैं
जिससे भयंकर जन-धन हानि होती है। सूखा,अकाल, बाढ़,
अतिवृष्टि, महामारी इन्ही कृत्याओं की देन है जिनसे आज का
अज्ञानी मनुष्य अनभिज्ञ है। आचार-विचार, यज्ञ-याग आदि
से वातावरण की शुद्धता होती है--जिसकी महत्ता हमारे
ऋषि-मुनि समझते थे और वे एक प्रकार से समाज, संसार के
वातावरण की शुद्धि करते रहते थे।
वैज्ञानिक डॉक्टर बोएड ने एक ऐसा विचित्र यंत्र बनाया था
कि जिसके सामने यदि हम बोलने के लिए अपना मुंह तक खोलें
तो उसमें उठने वाली तरंगें और कम्पन स्पष्ट देखे जा सकते थे। उस
यंत्र के सामने कोई ज़ोर ज़ोर से बोलने लगे तो यंत्र में लगे कांच के
सामान, लट्टू टूट टूट कर चूर हो कर बिखर जाते थे।
इसी प्रकार उच्चारित शब्दों और ध्वनि का प्रभाव हमारे तन-
मन पर भी पड़ता है। यह प्रभाव विशेष रूप से हमारे कानों और
त्वचा के द्वारा पड़ता है क्योंकि कानों और त्वचा की
संवेदनशीलता लगभग एक सी होती है। शब्दों के लिए कानों की
संवेदनशीलता सर्वाधिक होती है। कान सूक्ष्म विद्युत्गृह का
काम भी करते हैं। मोटे तौर पर यह समझा जा सकता है कि कान
एक प्रकार का माइक्रोफोन होता है। इसकी विशेषता यह
होती है कि 20 से 20000 हज़ार की फ्रीक्वेंसी के सुनाई पड़ने
योग्य कोई शब्द कान में पड़ते ही विद्युत् धारा प्रवाहित होने
लगती है तथा वह सीधे मस्तिष्क तक पहुँचती है। फिर उसके बाद
नाना प्रकार की क्रिया, प्रतिक्रिया को जन्म देती हुई शरीर
के सभी अंगों व ग्रंथियों को सक्रिय एवं विद्युत्युक्त बना देती
है। त्वचा पर पहले ध्वनिचाप का असर पड़ता है, फिर स्नायुतन्तुओं
में बिजली का संचार होता है और मस्तिष्क के स्नायुतन्तुओं में
भी अल्प मात्रा में बिजली का संचार करती है। शब्दों का सबसे
अधिक प्रभाव कानों के स्नायु, अन्य स्नायु, मस्तिष्क, ह्रदय,
अन्तःस्रावी ग्रंथियों, पेट, गुर्दे, लीवर, खून और ऑटोनोमिक
स्नायु पर पड़ता है।
जिस समय हम शब्दों का उच्चारण करते हैं, उस समय सुनने वाले के
मस्तिष्क पर दो प्रकार का प्रभाव पड़ता है।
 1--मुख से शब्द
निकलने के पहले वक्ता के मस्तिष्क से उसी प्रकार की विद्युत्
चुम्बकीय तरंगें निकलती हैं जिन्हें श्रोता का मस्तिष्क ग्रहण
करने की चेष्टा करता है। 
2--उच्चारित शब्द वायु के माध्यम से हमारे कानों के छेदों से होते हुए विद्युत् संचार के रूप में मस्तिष्क
में पहुँचते हैं और हर्ष, शोक, विषाद, घृणा, क्रोध, भय, वासना
आदि के आवेगों को मस्तिष्क में उत्पन्न करते हैं और उन्हीं के
अनुरूप शरीर के अंगों में स्फुरण, संदीपन, उत्तेजना आदि की
क्रियाएँ होने लग जाती हैं। इस प्रकार शब्द प्रेरणा, स्फुरण,
स्फूर्ति, उत्तेजना, संवेदना आदि उतपन्न कर प्रायः शरीर के
अंगों में साधारण अवस्था से अधिक ऊर्जा उत्पन्न कर देते हैं।
कभी-कभी शिथिलता, निष्क्रियता, जड़ता, आदि भी पैदा
कर देते हैं।
स्नायुमण्डल पर शब्दों के विविध प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं।
व्याकुलता, शरीर की क्लान्ति, कम्पन, चित्त की चंचलता, बुरे
भयानक स्वप्न। उन प्रभावों की स्पष्ट विकृतियां होती हैं।
मूर्च्छा, स्मृतिभ्रम, विक्षिप्तता का भी आक्रमण हो सकता
है। शब्दों में काम, क्रोध, भय आदि उत्पन्न होने पर हृदय की
धड़कन बढ़ जाती है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। खून में विशेष
प्रकार का विष (टाक्सिन) उत्पन्न होने लगता है। इसी प्रकार
ख़ुशी देने वाला, आशा प्रदान करने वाला शब्द मस्तिष्क, हृदय
और खून पर अमृत जैसा काम करता है। प्रिय और अप्रिय शब्दों के
अनुसार पेट में भी प्रतिक्रियाएं होती हैं। उनसे भूख और पाचन-
क्रिया बढ़ या घट जाती है। इन्ही सब बातों के द्वारा प्रश्न
तथा बातों के माध्यम से उत्तेजित कर अपराधों का पता लगाने
के लिए 'लाई डिटेक्टर' यंत्र का आविष्कार किया गया है।
प्रश्नों और शब्दों की बौछार से अपराधी के शरीर के अंगों में
होने वाली क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को विद्युत् धारा ग्रहण
कर रहस्य का बहुत कुछ पता लगाया जा सकता है।
क्रोध, घृणा, भयानक शब्दों को सुनकर मनुष्य के उपवृक्क
(एड्रीनल ग्लैण्ड) से एक तीव्र स्राव निकलकर उसके रक्त में मिलने
लग जाता है जिसे एड्रिनल स्राव कहते हैं। उसके निकलते समय
यकृत, लिवर से एक विशेष प्रकार की चीनी (ग्लाईकोजिन)
स्वयं निःसृत होने लग जाती है जिससे मूत्रमेह या मधुमेह जैसी
भयानक बीमारी हो जाती है।
मन्त्रविज्ञान में शब्दों की इन्हीं सब प्रक्रियाओं को ध्यान में
रखकर कल्याण, मनोकामना सिद्धि, उच्चाटन, शत्रु-मारण,
विद्वेषण, मोहन, वशीकरण आदि के लिए विविध शब्द-
प्रक्रियाओं का विधान किया गया है जिन्हें 'मन्त्र' कहते हैं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मन्त्र-शक्ति और मन्त्र-विज्ञान का
यही मूलाधार है।
पशु-पक्षी और पेड़-पौधों में सभी में बिजली होती है। वे हमारे
शब्दों, ध्वनियों से अत्यन्त सूक्ष्म रूप से प्रभावित होते हैं। हम-
आपने प्रायः देखा होगा--फसलों की बुआई, गुड़ाई के समय
किसानों की स्त्रियां गाती रहती हैं। वैज्ञानकों के अनुसार
संगीत के प्रभाव से पैदावार बढ़ती है।इस सम्बन्ध में वैज्ञानिकों
ने एक विशेष प्रयोग किया था। विद्यालय की सभी कक्षाओं
के सामने अशोक आदि के वृक्ष लगाये गए थे। उसी प्रकार से
संगीत शाला के कक्ष के सामने भी वे ही वृक्ष लगाये गए। सबका
समान पालन-पोषण हुआ। लेकिन दो-तीन वर्षों में ही संगीत
कक्ष के सामने के पौधों की वृद्धिदर अन्य कक्षों की तुलना में
अधिक रही। इससे यही सिद्ध होता है कि शब्दों और ध्वनियों
का चमत्कारिक प्रभाव सजीव और निर्जीव पदार्थो पर पड़ता
है जो शब्द-शक्ति या ध्वनि शक्ति की विद्युत् के कारण होता
है।
अध्यात्म भूमि की ओर--
मायारूपी प्रकृति की भूमि में ईश्वर की अद्भुत और रहस्यमयी
शक्तियां क्रियाशील हैं। भिन्न भिन्न देवता उन्हीं शक्तियों
के प्रतीकमात्र हैं। यदि यह कहा जाय कि एक ही मूल शक्ति
भिन्न भिन्न भावों और रूपों में क्रियाशील है तो
अतिशयोक्ति न होगी। उन विभिन्न शक्तियों से संपर्क
स्थापित कर उनसे भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में प्रचुर
सहायता लेकर उसे स्वस्थ, समृद्ध और सुख-साधन संपन्न बनाने का
एकमात्र माध्यम मन्त्र-यंत्र-तंत्र की सहायता से प्रकट होता है
इसमें कोई सन्देह नहीं है।
अगोचर जगत में रात-दिन क्रियाशील शक्ति के प्रतीक देवताओं
की अपनी सीमा और कार्य-सम्पादन क्षेत्र है। ये अपनी सीमा
के प्रवर्तक और अधिष्ठाता हैं। जिस प्रकार रेडियो स्टेशन से
ध्वनि तरंगें और दूरदर्शन केंद्रों से ध्वनि और प्रकाश तरंगें बिना
यंत्रों के प्रकट नहीं होतीं, उसी प्रकार से दैवीय जगत की
क्रियाशील शक्तियां भी हमारे चारों ओर बिखरी हुई हैं
जिनका प्राकट्य उपासना तथा विविधि साधनाओं के
माध्यम से साधक के स्थूल शरीर में या इष्ट प्रतिमा में होता है।
प्राकट्य के पांच माध्यम हैं--सूक्ष्म दैवीय शक्ति का साधक की
काया में प्रकट होने का नाम 'चिन्मय सृष्टि' है। इसी प्रकार
प्रतिमा में आत्मबल और संकल्प शक्ति के माध्यम से दैवीय शक्ति
को आरोपित करने की कला को 'पीठ सृष्टि' कहते हैं। इसके कई
भेद हैं। पीठ का निर्माण प्रतिमा के आलावा किसी योग्य
स्थान विशेष में, शव में, बालक में और नारी में किया जाता है।
तीसरी प्रकार की सृष्टि शुद्ध, पवित्र आत्मा वाले मनुष्य में
होता है जिसे 'आवेश' कहते हैं। उस आवेश के माध्यम से देवता का
प्राकट्य होता है।
चौथे और पांचवें प्रकार के माध्यम 'मन्त्र' और 'यंत्र' भी हैं। मन्त्र
का विधिवत् जप करने से सूक्ष्म दैवीय शक्तियों से साधक का
सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। फलतः उसके मानसपटल पर मन्त्र
के माध्यम से उस देवता की सृष्टि अथवा प्रकटीकरण होता है।
इसे मानसिक सृष्टि भी कहते हैं। चिन्मय सृष्टि और मानसिक
सृष्टि में केवल इतना ही अन्तर समझना चाहिए कि चिन्मय
सृष्टि ह्रदय में और मानसिक सृष्टि मस्तिष्क या मनोभूमि में
होती है। यंत्र में शक्ति के आविर्भाव की कला कुछ भिन्न है। यह
'पीठ विज्ञान' के अंतर्गत है। इसकी रचना प्रचुर इच्छाशक्ति
और संकल्प शक्ति के ऊपर निर्भर है। इसके अभाव के कारण ही
यंत्र असफल होते हैं।
मन्त्र में वर्ण संयोजन है और यंत्र में अंक और बीजाक्षर दोनों का
संयोजन है। जैसा कि हमें ज्ञात होना चाहिए कि शब्द और अंक
भासमान या प्रकाशवान हैं। शब्द और अंक दोनों समान
प्रकाशमय हैं। एक शब्द में जितने वर्ण होते हैं, वे सब प्रकाश को
प्रकट करते हैं। मगर उनका प्रकाश एक-सा नहीं है--भिन्न भिन्न
वर्णों का होता है। यहाँ वर्णों का आशय रंगों से है। वर्ण
(अक्षर)को वर्ण की इसीलिए संज्ञा दी गयी है उसमें वर्ण
(रंग)होते हैं। एक शब्द अपने वर्णों के सामूहिक प्रकाश को व्यक्त
करता है। वह प्रकाश विभिन्न रंगों का एक पुञ्ज समान होता है।
अंकों में भी यही बात समझी जा सकती है। वर्णों की तरह अंकों
की भी संख्या है। एक से नौ तक की संख्या मूल संख्या है। इसके
बाद शून्य है। यह एकाकी अवस्था में व्यर्थ है। किन्तु जब 1 से 9
की संख्या के साथ जुड़ता है तो उसके भीतर वह दस गुनी शक्ति
बढ़ा देता है। किसी भी अंक का प्रकाश शून्य के योग से दस
गुना अधिक हो जाता है। प्रकाश का आविर्भाव कम्पन से और
कम्पन का जन्म ध्वनि से होता है। इससे स्वतः सिद्ध हो जाता
है कि प्रत्येक शब्द और अंक प्रकाशमय, कम्पनमय और ध्वनिमय हैं।
आज बस इतना ही.......
आपके आत्मा में बैठे परमात्मा को मैं नमन करता हूँ ।

अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन

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बुधवार, 18 अगस्त 2021

पांच प्रकार के स्वप्न

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पहले प्रकार का स्वप्न तो मात्र कूड़ा करकट होता है। हजारों मनोविश्लेषक बस उसी कूड़े पर कार्य कर रहे हैं, यह बिलकुल व्यर्थ है। ऐसा होता है क्योंकि सारे दिन में, दिन भर काम करते हुए तुम बहुत कूड़ा कचरा इकट्ठा कर लेते हो। बिलकुल ऐसे ही जैसे शरीर पर आ जमती है धूल और तुम्हें जरूरत होती है स्नान की, तुम्हें जरूरत होती है सफाई की, इसी ढंग से मन इकट्ठा कर लेता है धूल को। लेकिन मन को स्नान कराने का कोई उपाय नहीं। इसलिए मन के पास’ होती है एक स्वचालित प्रक्रिया सारी धूल और कूड़े को बाहर फेंक देने की। पहली प्रकार का स्वप्न कुछ नहीं है सिवाय उस धूल को उठाने के जिसे मन फेंक रहा होता है। यह सपनों का सर्वाधिक बड़ा भाग होता है, लगभग नब्बे प्रतिशत। सभी सपनों का करीब—करीब नब्बे प्रतिशत तो फेंक दी गयी धूल मात्र होता है; मत देना ज्यादा ध्यान उनकी ओर। धीरे धीरे जैसे जैसे तुम्हारी जागरूकता विकसित होती जाती है तुम देख पाओगे कि धूल क्या होती है’।
  
दूसरे प्रकार का स्वप्न एक प्रकार की इच्छा की परिपूर्ति है। बहुतसी आवश्यकताएं होती हैं,. स्वाभाविक आवश्यकताएं, लेकिन पंडित पुरोहितों ने और उन तथाकथित धार्मिक शिक्षकों ने तुम्हारे मन को विषैला बना दिया है। वे नहीं पूरी होने देंगे तुम्हारी आधारभूत आवश्यकताएं भी। उन्होंने पूरी तरह निंदा की है उनकी और वह निंदा तुममें प्रवेश कर गयी है, इसलिए तुम्हारी बहुतसी आवश्यकताओं की भूख तुम्हें बनी रहती है। वे भूखी आवश्यकताएं परिपूर्ति की मांग करती हैं। दूसरी प्रकार का स्वप्न और कुछ नहीं है सिवाय आकांक्षापूर्ति के। पंडित पुरोहितों और तुम्हारे मन को विषाक्त करने वालों के कारण जो कुछ भी तुमने अपने अस्तित्व के प्रति अस्वीकृत किया है, मन किसी न किसी ढंग से उसे सपनों द्वारा पूरा करने की कोशिश करता है। 

फिर होता है तीसरे प्रकार का स्वप्न। यह तीसरे प्रकार का स्वप्न अतिचेतन से आया संकेत है। दूसरे प्रकार का स्वप्न अचेतन से आया संप्रेषण है। तीसरे प्रकार का स्वप्न बहुत विरल होता है, क्योंकि हमने अतिचेतन के साथ सारा संपर्क खो दिया है। लेकिन फिर भी यह उतरता है क्योंकि अतिचेतन तुम्हारा है। हो सकता है कि यह बादल बन चुका हो और आकाश में बढ़ गया हो, विलीन हो गया हो, हो सकता है कि दूरी बहुत ज्यादा हो, लेकिन यह अब भी तुममें लंगर डाले हुए है। अतिचेतन से आया संप्रेषण बहुत विरल होता है। जब तुम बहुत—बहुत जागरूक हो जाते हो केवल तभी तुम इसे अनुभव करने लगोगे। अन्यथा यह उस धूल में खो जाएगा जिसे मन फेंकता है सपनों में, और खो जाएगा उस आकांक्षापूर्ति में जिसके सपने मन बनाये चला जाता है; वे अधूरी दबी हुई चीजें। यह उनमें खो जाएगा। लेकिन जब तुम जागरूक होते हो तो यह बात हीरे के चमकने जैसी होती है—वे सारे कंकड़ जो चारों ओर हैं उनसे नितांत भिन्न। जब तुम अनुभव कर सकते हो और वह स्वप्न पा सकते हो जो कि अतिचेतन से उतर रहा होता है तो उसे देखना, उस पर ध्यान करना; वही तुम्हारा मार्गदर्शन बन जाएगा, वह तुम्हें सद्गुरु तक ले जाएगा, वह तुम्हें ले जाएगा जीवन के उस ढंग तक जो कि तुम्हारे अनुकूल पड़ सकता है, जो तुम्हें ले जाएगा सम्यक् अनुशासन की ओर। वह सपना भीतर एक गहन मार्गदर्शक बन जाएगा। चेतन के साथ तुम ढूंढ़ सकते हो गुरु को, लेकिन वह गुरु और कुछ नहीं होगा सिवाय शिक्षक के। अचेतन के साथ तुम खोज सकते हो गुरु को, लेकिन गुरु एक प्रेमी से ज्यादा कुछ नहीं होगा तुम एक निश्चित व्यक्तित्व के, एक निश्चित ढंग के प्रेम में पड़ जाओगे। केवल अतिचेतन तुम्हें सम्यक् गुरु तक ले जा सकता है। तब वह शिक्षक नहीं होता; जो वह कहता है उससे तुम सम्मोहित नहीं होते; जो वह है उसके साथ अंधे सम्मोहन में नहीं पड़ते हो तुम। बल्कि इसके विपरीत तुम निर्देशित होते हो तुम्हारे परमचेतन के द्वारा कि इस व्यक्ति से तुम्हारा तालमेल बैठेगा और विकसित होने के लिए इस व्यक्ति के साथ एक सही संभावना बनेगी तुम्हारे लिए, कि यह आदमी तुम्हारे लिए आधार भूमि बन सकता है।
  
फिर होते हैं. चौथे प्रकार के स्वप्न जो कि आते हैं पिछले जन्मों से। वे बहुत विरल नहीं होते। वे घटते हैं, बहुत बार आते हैं वे। लेकिन हर चीज तुम्हारे भीतर इतनी गड़बड़ी में है कि तुम कोई भेद नहीं कर पाते। तुम वहां होते नहीं भेद समझने को। पूरब में हमने बहुत परिश्रम किया है इस चौथे प्रकार के स्वप्न पर। इसी स्वप्न के कारण हमें प्राप्त हो गयी पुनर्जन्म की धारणा। इस स्वप्न द्वारा धीरे— धीरे तुम जागरूक होते हो पिछले जन्मों के प्रति। तुम जाते हो पीछे और पीछे की ओर अतीतकाल में। तब बहुत सारी चीजें तुममें परिवर्तित होने लगती हैं, क्योंकि यदि तुम्हें स्मरण आ सकता है, सपने में भी कि तुम क्या थे तुम्हारे पिछले जन्म में, बहुत सी नयी चीजें अर्थहीन हो जाएंगी। सारा ढांचा बदल जाएगा, तुम्हारा रंग ढंग, गेस्टाल्ट बदल जायेगा।

यदि तुमने पिछले जन्म में बहुत सारा धन एकत्रित किया था, यदि तुम देश के सबसे धनी व्यक्ति होकर मरे थे और गहरे में तुम भिखारी थे और फिर तुम वही कर रहे हो इस जीवन में, तो अकस्मात क्रिया कलाप बदल जायेगा। यदि तुम याद रख सको कि तुमने क्या किया था और कैसे वह सब कुछ हो गया ना कुछ; यदि तुम याद रख सको बहुत सारे जन्म कि कितनी बार तुम वही बात फिर फिर कर रहे हो तुम, अटके हुए ग्रामोफोन रेकार्ड की भांति हो, एक दुश्चक्र; फिर तुम उसी तरह आरंभ करते हो और उसी तरह अंत करते हो। यदि तुम याद कर सको तुम्हारे थोड़े से भी जन्म तो तुम एकदम आश्चर्यचकित हो जाओगे कि तुमने एक भी नयी बात नहीं की है। फिर फिर तुमने धन एकत्रित किया; बार बार तुम ज्ञानी बने; फिर फिर तुम प्रेम में पड़े, और फिर फिर चला आया वही दुख जिसे प्रेम ले आता है। जब तुम देख लेते हो यह दोहराव तो कैसे तुम वही बने रह सकते हो? तब यह जीवन अकस्मात रूपांतरित हो जाता है। तुम अब और नहीं रह सकते उसी पुरानी लीक में, उसी चक्र में।
इसीलिये पूरब में लोग पूछते आये हैं बार बार कई शताब्दियों से, ‘जीवन और मृत्यु के इस चक्र से कैसे बाहर आएं। ‘ यह जान पड़ता है वही चक्र। यह जान पड़ती है बार बार की वही कथा -स्व दोहराव।

और फिर होता है पांचवें प्रकार का और जो अंतिम प्रकार का स्वप्न है। चौथी प्रकार का जा रहा होता है पीछे तुम्हारे अतीत में, पांचवीं प्रकार का जा रहा होता है आगे भविष्य में। यह विरल होता है बहुत विरल। यह केवल कभी—कभी ही घटता है। जब तुम होते हो बहुत संवेदनशील, खुले, नमनीय तो अतीत देता है एक छाया और भविष्य भी देता है छाया; यह तुममें प्रतिबिंबित होता है। यदि तुम जागरूक बन सकते हो अपने सपनों के प्रति तो किसी दिन तुम जागरूक हो जाओगे इस संभावना के प्रति भी कि भविष्य तुममें झांकता है। एकदम अकस्मात ही द्वार खुल जाता है और भविष्य का तुममें संप्रेषण हो जाता है।

ये होते हैं पांच प्रकार के स्वप्न। आधुनिक मनोविज्ञान समझता है केवल दूसरे प्रकार को। रूसी मनोविज्ञान समझता है केवल पहले प्रकार को ही। तीन प्रकार बाकी दूसरे तीनों प्रकार करीब करीब अज्ञात ही हैं, लेकिन योग समझता है उन सभी प्रकारों को।

 पतंजलि योगसूत्र
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ओशो

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शिवशंकर भोलेनाथ के वैज्ञानिक अध्यात्म का वैदिक विज्ञान

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शिवशंकर भोलेनाथ के वैज्ञानिक अध्यात्म का वैदिक विज्ञान - 10
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भारत की सभी परम्पराओं और प्रथाओं के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण जरूर मौज़ूद है, जिसकी वजह से ये परम्पराएं और प्रथाएं सदियों से चली आ रहीं हैं. शिवलिंग पर दूध चढ़ाना भी ऐसे ही एक वैज्ञानिक कारण से जुड़ा हुआ है खासतौर पर सावन (श्रावण) के महीने में मौसम बदलने के कारण बहुत सी बीमारियां होने की संभावना रहती है, क्योंकि इस मौसम में वात-पित्त और कफ़ के सबसे ज्यादा असंतुलित होने की संभावना रहती है, ऐसे में दूध का सेवन करने से आप मौसमी और संक्रामक बीमारियों की चपेट में जल्दी आ सकते हैं. इसलिए सावन में दूध का कम से कम सेवन वात-पित्त और कफ की समस्या से बचने का सबसे आसान उपाय है इसलिए पुराने समय में लोग सावन के महीने में दूध शिवलिंग पर चढ़ा देते थे, साथ ही सावन के मौसम में बारिश के कारण जगह-जगह कई तरह की घास-फूस भी उग आती है, जिसका सेवन मवेशी कर लेते हैं, लेकिन यह उनके दूध को ज़हरीला भी बना सकता है. ऐसे में इस मौसम में दूध के इस अवगुण को भी हरने के लिए एक बार फिर भोलेनाथ, शिवलिंग के रूप में समाधान बनकर सामने आते हैं और दूध को शिवलिंग पर अर्पित करके आम लोग मौसम की कई बीमारियों के साथ-साथ दूध के कई अवगुणों से ग्रसित होने से बच पाते हैं.

इन्हीं कारणों से सदियों से शिवलिंग पर दूध चढ़ाया जाता आ रहा है. सतयुग में धरती पर जीवमात्र की रक्षा के लिए भगवान् शिव ने विषपान किया था, शिवलिंग पर जल चढ़ाने की प्रथा के रूप में ,दूध के विष बन जाने की सभी संभावनाओं पर विराम लगाते हुए आज भी भगवान् शिव मनुष्यों की सहायता कर रहे हैं.

इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाना केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी उचित है.

अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन

शिवशंकर भोलेनाथ के वैज्ञानिक अध्यात्म का वैदिक विज्ञान - 11
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 हिन्दू धर्म के कण-कण में, तन-मन में बसते हैं भोले भंडारी भगवान शिव। सृष्टि का निर्माण इनसे, चेतनता का भान इनसे, अपूर्ण की पूर्णता इनसे और अशुद्धि की शुद्धि भी इनसे ही। स्वयं विष पीना और सबमें अमृत बांट देना, यही धर्म, यही कर्म है इनका। 

शिव इस चर-अचर जगत की चेतना का मूल हैं। जगत की सारी अशुद्धि को शुद्ध करना शिव का कर्म है। जगत की सारी अच्छी और बुरी ऊर्जाएं शिव से ही शुद्ध होती हैं ।  जहां शिवलिंग की स्थापना होती है, उस स्थान की सारी नकारात्मकता स्वयमेव नष्ट हो जाती है। शिवलिंग के पास से निकलने वाली सभी बुरी शक्तियां उसके स्पर्श से शुद्ध हो जाती हैं। इसी अवधारणा के साथ शिवलिंग के जलाभिषेक को मान्यता प्राप्त हुई है। माना जाता है कि जब बुरी शक्तियां प्रबल होती हैं, तब उनका ताप बहुत बढ़ जाता है ।

यही शक्ति जब शिवलिंग से टकराती है, तब अपने कर्म के अनुसार वह उसका पूरा ताप हर उसे शुद्ध कर देते हैं। इस क्रम में शक्ति तो शुद्ध हो जाती है, पर उसके ताप को ग्रहण कर शिवलिंग की गर्मी बढ़ जाती है। शिवलिंग पर लगातार जल चढ़ाने से उस अशुद्ध ताप में कमी आती है। दूध और पानी के मिश्रण से शिवलिंग की गर्मी समाप्त होती है और शक्ति में वृद्धि होती है। तब वह पुनः शक्तिशाली होकर दोगुनी क्षमता से विश्व के शुद्धिकरण में संलग्न हो जाते हैं। इस बात को व्यक्तिगत स्तर पर बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। यदि हम भयंकर तनाव, थकान या काम की अधिकता से परेशान हों, तो हमारा दिमाग गर्म हो जाता है। ऐसी हालत में हमारा दिमाग काम करना बंद कर देता है। इसके ठीक विपरीत अगर हमारा दिमाग और मन शांत हो, तो हमारी कार्यक्षमता बढ़ जाती है और हम बेहतर ढंग से काम कर पाते हैं।

 हमारे सभी कर्म स्वाधिष्ठान चक्र में संग्रहित होते हैं। यह चक्र जल तत्व से बना है। जब भी हम कोई बुरा काम करते हैं, तो वह हमारे शरीर के जल चक्र को प्रदूषित करता है। चूंकि जल तत्व पर ही व्यक्ति की व्यक्तिगत, स्वास्थ्य, संपत्ति और आध्यात्मिक उन्नति आधारित होती है, इसलिए जल तत्व के बुरे कर्म ग्रहण करते ही उसके पूरे जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ता है। जाने-अनजाने में गलत काम करके व्यक्ति अपना ही नुकसान कर रहा होता है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति शिवलिंग पर जल चढ़ाता है, तो उसके स्वाधिष्ठान चक्र में प्रदूषित हुआ जल तत्व, शिवलिंग पर जाप के साथ चढ़ाए जा रहे जल से एकाकार हो जाता है। इस तरह शिवलिंग पर जल चढ़ाने के साथ ही जल तत्व की शुद्धि हो जाती है और व्यक्ति का मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक उत्थान होता है।

आज बस इतना ही..

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सृष्टि एक Domain ज्ञान क्षेत्र, विचार- सीमा

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" मन "
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मन !! यह मन ही है जो प्रकृति के संचालन का सूत्रधार है। मन क्या है, इसे समझने का प्रयास करते हैं।
प्रथम हम भौतिक अस्तित्व की बात करते हैं क्योंकि इसके बिना मन की बात करना, बेमानी है। शुरुआत करते हैं सृष्टि से। सृष्टि, यानि सृजन, रचना या कुछ नया पैदा करना, जो कुछ भी पैदा हो उसमें सृष्टि के सभी मूल तत्व रहें, सृष्टि में साथ जुड़ाव भी बना रहे तभी वह सृष्टि का अंग है। आमतौर पर हम प्रकृति ( ब्रह्मांड ) को ही सृष्टि कहकर संबोधित किया करते हैं। सृष्टि, अपने आप में कोई रचना नहीं है बल्कि सृष्टि एक Domain ( ज्ञान क्षेत्र, विचार- सीमा ) है, जिसमें ईश्वर ने भिन्न-भिन्न अवयवों की रचना की है। दरअसल, सृष्टि, ईश्वर की एक जागीर है जिसमें ईश्वर ने भिन्न-भिन्न पदार्थों की भिन्न-भिन्न रूप में रचना की है। पदार्थ के सभी रुपों में दो प्रकार की उर्जा का समावेश किया गया है। एक है potential energy (स्थितिज उर्जा ) तथा दूसरी है , kinetic energy ( गतिज ऊर्जा )। प्रकृति में पदार्थ के मूर्त्त व अमूर्त रुप में दो आयाम बने। एक-- निर्जीव पदार्थ और दूसरा-- सजीव पदार्थ। स्थितिज उर्जा दोनों आयामों में है जो उपस्थिति का आधार है।सजीव पदार्थों में गतिज ऊर्जा, उनके अंदर निहित होती है तथा निर्जीव पदार्थों में गतिज ऊर्जा को बाहरी बल (force) से पैदा किया जाता है। यह तो हुई सृष्टि में की रचनाओं के भौतिक आयाम की बात।
            इस भौतिक अस्तित्व के बाद ही, जीव-जगत के प्राणी, मानव के मन की बात आती है। मानव मन को समझना बहुत ही मुश्किल काम है। इस संदर्भ में श्री गुलाब कोठारी जी ने बहुत ही सुन्दर और सरल भाषा में, मन का विशद विष्लेषण किया है, उन्हीं का साभार उध्दरण लेते हुए, हम इसे समझने का प्रयास करते हैं।
           
           जीवन का आधार है मन। मन है तो इच्छा है, इच्छा है तो गति है, लक्ष्य है, कार्यकलाप हैं। मन, क्या है, इसका स्वरुप व कार्य, क्या हैं। मन में ही ऐसा क्या है जिसे समझने की जरूरत है।
मन के बारे में सबसे बड़ा सत्य तो यह है कि जो मन हमें
भासित होता है, अनुभूत होता है, वह शुद्ध मन नहीं है बल्कि उसका प्रतिबिम्ब है। मूल मन पर प्रकृति व हमारे कर्मों के आवरण हैं, जो कुछ भी हमें समझ में आता है वह वास्तव में बिल्कुल भिन्न है।

          वेदानुसार, सृष्टि में प्रत्येक इकाई षोडषी ( सोलह तत्वों से युक्त मानी गई है यानि कि षोडषी पुरुष का रुप है )। पुर में रहने वाले जीव चैतन्य को ही पुरुष कहा गया है। मनुष्य भी षोडषी पुरुष है। सृष्टि का मूल, अव्यय ( Eternal ) पुरुष ही है। अव्यय पुरुष में आनंद, विज्ञान, मन,प्राण और वाक्, ये पांच कलाएं हैं। सभी विशुद्ध रूप में हैं, शुद्ध आनंद ही ब्रह्म है, शुद्ध विज्ञान ही बुद्धि है तथा इसी बुद्धि का प्रतिबिंब, हमारी बुद्धि है और ये विज्ञान बुद्धि ही सृष्टि विस्तार का कारण बनती है।

            मन को केन्द्र में रखकर, प्राणों द्वारा, वाक् रुप सृष्टि का निर्माण होता है। सम्पूर्ण सृष्टि में मन यही अव्यय रुप में, निर्गुण भाव में। एक ही है, यही जब अक्षर रुप में विस्तृत होता है तो प्रकृति ( सत, रज, तम ) से घिरकर ने रुप में आता है तो अहम पैदा होता है और यही अहम , जीव को ईश्वर से अलग करता है, यह मन का त्रिगुणयुक्त रुप है। शुद्ध मन जिसे शवोवसीयस मन कहते हैं, उसे जानने की क्षमता, साधारण मनुष्य में नहीं होती।
गीता में भी कहा गया है कि अव्यय ही सृष्टि का आलंबन है, इसका अर्थ भी मूल निर्गुण मन से है। सभी में यह स्थित रहता है। " जो मुझ में है सो तुझ में है "। जीवन में हमारी भूमिकाओं का आधार मन है।

           मन ही की तरह हमारी बुद्धि भी त्रिगुण से आवृत्त रहती है।
अभ्यास व संकल्प से इसे प्रज्ञा रुप में जाना जा सकता है। मन को चंचल कहा गया है। वस्तुत: ये मन ही है जो हमारी इन्द्रियों का राजा कहा गया है। ये मन ही है जिसके कारण हमारी इन्द्रियां, विभिन्न विषयों से प्रतिपल जुड़ती रहती हैं और इसीलिए, इन्द्रिय निग्रह की बात कही जाती है। मन में अनेक भाव पैदा होते रहते हैं। मन की एक विचित्र भूमिका है, करता कुछ है और रमता कहीं और है, इसीलिए इसको जानना, समझना व नियन्त्रण में रखना एक दुश्कर कार्य है लेकिन आवश्यक भी माना है क्योंकि मन ही बन्धन एवं मुक्ति का कारण बनता है। इसी के नियमन से तो मूल मन को जाना जा सकता है। अनंत प्राण व अनंत वाक्, इस मन से जुड़े रहते हैं इसीलिए ये नाना प्रकार का दिखाई देता रहता है।

           मन ही हमारी पहचान बनाता है, इच्छाओं की जन्मभूमि है, मन ही कान्ति है, मन ही भावभूमि है। पूर्ण मनोयोग ही सफलता की कुंजी है। अतएव मन को एकाग्र करना अति आवश्यक है। इससे ध्यान, धारणा व समाधि का मार्ग स्वत: , प्रशस्त होता है। अव्यय मन-- जिसमें कभी चंचलता रुपायित नहीं होती,। तक पहुंचा जा सकता है।। अव््यय मन ही अपने निर्गुण भाव के साथ, आत्मा कहलाता है।

           मन, प्राण, वाक् सदा साथ रहते हैं, अविनाभाव (non-restrictive ) है। हमारे स्थूल, सुक्ष्म व कारण शरीर का संचालन इसी सिद्धांत से होता है। अव्यय से निकला मन सदैव फिर से अव्यय रुप, आनंदमय मन में लीन होने को लेकर व्यग्र रहता है।

इच्छाएं मन में पैदा होती हैं और कैसे पैदा होती हैं कोई नहीं जानता, पैदा की भी नहीं जा सकती। इच्छाएं, या तो पूरी की जा सकती हैं या फिर दबाई जा सकती हैं। दबाने का निषेध है इसीलिए ही भाव परिवर्तन की सलाह दी जाती है। जबरन दबाई गई इच्छाएं, विकार उत्पन्न कर सकती हैं।

            मन का आधार है अन्य। अन्य ही मन को त्रिगुण भाव में बांधता है। हमारा भोजन, वातावरण, स्वजन, परिजन मित्र आदि , हमारे मन का पोषण करते हैं तथा हमारी उपासना, स्वाध्याय व चिंतन, मन को समझने में सहायक होते हैैं।
              हमारे शरीर की फट चक्र व्यवस्था, प्राण संग्रह करती है, विसर्जन किया करती है व हमारे सुक्ष्म शरीर के माध्यम से, स्थूल व कारण शरीर का पोषण करती है। कारण शरीर तक पहुंचने का मार्ग भी स्थूल शरीर ही है। स्थूल से सुक्ष्म में होते हुए कारण शरीर तक पहुंच सकते हैं।
            मन को समझना और उसमें सकारात्मक भाव बनाए रखना ही उत्थान का मार्ग है। राग व द्वेष भी मन के ही भाव हैं। व्यष्टि व समष्टि का दृष्टिकोण ही जीवन को परिभाषित करता है।
              हर इच्छा के साथ नया मन पैदा होता है और इच्छापूर्ति के साथ ही विलीन भी होता रहता है। हमारे शरीर में प्राण,अपान, उद्यान, व्यान, समान आदि पांचों प्राण, मन के आधार पर ही कार्य करते हैं। तात्पर्य यह है कि यह मन ही है जो प्रकृति में समस्त प्रकार के संचालन का सूत्रधार है।।

            साभार, आदरणीय श्री गुलाब कोठारी जी ।।

               अब इसी संदर्भ में आदरणीय स्वामी श्री स्वामीगीतानंद जी के कथन पर भी चर्चा कर ली जाए।।

               स्वामी जी का कथन है कि मन , बुद्धि , चित् व अहंकार , मन के ही बहुत से चेहरे हैं। अलग-अलग नहीं हैं। मेरे विचार से यह कथन आंशिक रूप से ही सही हो सकता है, पूर्णतया तौर पर नहीं।
            मन का विश्लेषण तो उपर दे ही दिया गया है, आगे की बात करते हैं।
       मन, कर्ता है, जिसके पास स्थूल शरीर है तथा स्थूल शरीर में पांच कर्मेन्द्रियां व पांच ज्ञानेन्द्रियां हैं जिनके माध्यम से, मन सभी कर्मों का निष्पादन करता है।।
         चित् क्या है। चित्, मन को ही कहा गया है यानि कि चित् , मन का वह पटल है जहां किए हुए कर्म, संस्कार रुप में संचित होते हैं।।
           अहंकार , जब मन प्रकृति ( संत, रज, तम ) से घिरकर, त्रिगुणभाव ग्रहण कर लेता है तो अहम ( अहंकार ) भाव पैदा होता है और यही अहम भाव , जीव को ईश्वर से अलग करता है।।
        एक प्रकार से चित् और अहम, भासित मन के धरातल के भौतिक अवयव हैं।।

            बुद्धि !! विवेक को कहा गया है। यही एक ऐसा अवयव है जो मनुष्य को जीव-जगत के अध्यक्ष प्राणियों से अलग करता है तथा ये , मन से सर्वथा भिन्न है। जीवात्मा के चार आयाम हैं ---- शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा ।।।

         आत्मा ही सर्वेसर्वा है।
  इसे यों समझिए :::
         -- शरीर, रथ है।
         -- मन, रथ के घोड़े      
             हैं।
         -- बुद्धि, सारथी है।
                     तथा
         -- आत्मा, रथी है।

           तात्पर्य यह है कि हम चार स्तर पर जीवन जीते हैं।
 शरीर, मन, बुद्धि, व आत्मा ।
 व्यवहार में इनको अलग-अलग नहीं देखा जाता, सब एकरस होकर कार्य करते हैं।
 जिसकोओ हम, मन , समझ रहे हैं वह त्रिगुणयुक्त मन है, आत्मा नहीं है। हमारा भासित मन, अव्यय मन का बिंब रुप है। उस अव्यय मन को ही आत्मा कहा गया है, भासित मन को नहीं।
 मन और बुद्धि , अलग हैं। बुद्धि, मन की नियन्त्रक है।।
कई बार ऐसा होता है कि हम बिना विवेक के कोई कार्य सम्पादित कर देते हैं और वो ग़लत हो जाता है , तो कह देते हैं कि क्या मूर्खता की, क्योंकि उस कार्य सम्पादन में बुद्धि का योग नहीं था।।

    मन, बुद्धि, अहम वजह आत्मा आदि के संबंध में , सुधीजनों में बहुत सी भ्रान्तियां है, इसीलिए, इस लेख में खुलासा करने का प्रयास किया गया है फिर भी यदि कोई अतिशयोक्ति या विसंगतियां रह गई हों तो क्षमा करना।।

              ।। इति ।।

Subhas Chander  Yadav

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अदृश्य निर्गुण ब्रह्म

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अदृश्य निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम सगुणोपासना द्वारा मन को एकाग्र करने के पश्चात् ही सौरम्भिका-न्याय से निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति सम्भव है ।

वर्षा ऋतु में मरुस्थल में सूर्य की किरणों को मृग जल समझकर प्राप्त करने के लिए दूर तक निकल जाता है ।

किन्तु जैसे-जैसे भागता है , जल आगे-आगे दिखाई देता है ।
 
अन्त में वर्षा के कारण उसे कहीं-न-कहीं जल अवश्य मिल जाता है , इसी प्रकार साधक भी निराकार-निर्विशेष ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए परमात्मा की स्थूल रूप प्रतिमा का पूजन-ध्यान करके अन्त में निर्गुण ब्रह्म को प्राप्त करता है ; जिससे उसका जन्म सफल हो जाता है , इसे "सौरम्भिका-न्याय" कहते हैं ।

सौर माने सूर्य की किरणें , उनमें अम्भ = अध्यस्त जल सौराम्भ है ।  न्याय का तात्पर्य कथन में है ।

जीव शरीरादि को मैं तथा शरीर से सम्बन्धित गृह-स्त्री-पुत्रादि में ममता करके राग-द्वेष से युक्त होता है , किन्तु उसका यह अहंकार निवृत्त भी हो जाये , तब भी दश इन्द्रियाँ-प्राणादि मैं नहीं हूँ , क्योंकि मैं तो इनका द्रष्टा हूँ ।

पंचकोश , पंचप्राण , तीन अवस्थादियों में ममता करने वाले को व्यवहारिक जीव कहते हैं ।  

व्यवहारिक जीव में पंचभूतों के सत्त्वांश से पंच-ज्ञानेन्द्रियां उत्पन्न होती हैं , आकाशादि के सात्त्विक अंश से मन-बुद्धि उत्पन्न हुई -- इन सत्रह तत्त्वों वाला सूक्ष्म शरीर है , यह जड़ है ।

जड़ होने पर भी जैसे अग्नि में तपाया हुआ लोहा अग्नि के समान ही लाल तथा जलाने वाला हो जाता है और अग्नि लोहे के रूप को प्राप्त करती है ,  इसी प्रकार चैतन्य के सम्पर्क से जड़ चैतन्य और चैतन्य जड़-सा हो जाता है ;  एक-दूसरे के अध्यास को अन्योऽन्याध्यास कहते हैं -- यही जड़-चेतन की गांठ है ।

इनके पारस्परिक अध्यास से साक्षी-चैतन्य से युक्त आनन्दमय-कोश कहलाता है -- यह कारण-शरीर है ; यही कर्मों का फल भोगने के लिए सूक्ष्म देह देहान्तर को तथा लोकान्तर में जाता हुआ , जीव सुख-दुःख भोगता है ।

जब तीनों शरीरों में अहंबुद्धि रूपी अध्यास निवृत्त होता है , तब "ये मेरे नहीं है , मैं उनका नहीं हूँ"  ऐसा चिन्तन करके सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थित होता है ।  तब इसे साक्षी-आत्मा कहते हैं ।

जब अंतःकरण-चतुष्टय के साथ मिलकर सुखी-दुःखी होता है , तब भोक्ता जीव कहा जाता है , अतः सुख-दुःख में आसक्त होने वाला भोक्ता-जीव तथा द्रष्टा-मात्र साक्षी दो प्रकार से कहा जाता है ।

जैसे सूर्य के रूप में गर्मी , छाया तथा प्रकाश रहता है , वैसे ही एक कर्मों को भुक्ताने वाला ईश्वर , दूसरा भोक्ता जीव , तीसरा शुद्ध निरूपाधिक ब्रह्म ।

जब भेद उत्पन्न करने वाले अज्ञान का नाश हो जाता है , तब भेदबुद्धि मिथ्या हो जाती है ।

चैतन्य एक होने पर भी उपाधि-भेद से तीन प्रकार का प्रतीत होता है , वास्तव में ब्रह्म में एकता है ।

जैसे एक पुरूष छाता लगाता है , तब उसे छत्री पुरुष कहते हैं , जब त्याग देता है तब अछत्री कहलाता है ; तो जैसे उस पुरुष में छाते की उपाधि से भेद है , पुरूष में नहीं ,  वैसे ही जीव और ईश्वर में अंतःकरण तथा मायाकृत भेद है , किन्तु माया तथा अंतःकरण से रहित विशुद्ध ब्रह्म ही है ।

अतः समाधि-साधन-सम्पन्न सगुण ब्रह्म का आश्रय लेकर व्यक्ति निष्काम कर्मोपासना करता है , तब उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है ;  तब परमार्थ का चिन्तन करते हुए निर्गुण ब्रह्म के साथ ऐक्य अनुभव करता है ।

जैसे केले में से कपूर प्राप्त करने के लिए उसके छिलके को अलग उतार देने पर अन्त में केले का सार कपूर प्राप्त होता है , वैसे मुमुक्षु भी पंचकोशों को अपने से भिन्न करके सार रूप आत्मा को प्राप्त करता है ।

श्री शंकराचार्य वेद वेदांत विज्ञान sabhar satsangh Facebook wall

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मंगलवार, 17 अगस्त 2021

कर्म फल प्रक्रिया एवं कर्म से मुक्ति का उपाय

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मनुष्य हर दिन के जीवन में नए कर्म इकट्ठे करता रहता है तो फिर क्या वह इस कर्म से कभी मुक्त ही नहीं हो सकता? अक्सर लोगों के मन में जिज्ञासा होती है कि, कर्म व क्रियाकलापों के अंतहीन चक्र से बाहर कैसे निकला जाए? क्या कुछ ऐसे क्रियाकलाप हैं, जो मुक्ति के मार्ग पर दूसरी गतिविधियों की तुलना में ज्यादा सहायक होते हैं? 
जो व्यक्ति बिल्कुल कुछ नहीं करता, वह कार्मिक याद्दाश्त और कार्मिक चक्रों से पूरी तरह मुक्त होता है। जब तक आप अपने कार्मिक यादों से जुड़े रहते हैं, तब तक अतीत खुद को दोहराता रहता है। कर्म का मतलब क्रियाकलाप के साथ उसकी यादें भी है। 
जब तक आप अपनी यादों के शासन में रहेंगे, तब तक ये आपको कुछ न कुछ करने के लिए मजबूर करती रहेंगी। अगर आप खुद को अपनी पिछली स्मृतियों से पूरी तरह से अलग कर लें, केवल तभी आप शांत व स्थिर होकर बैठ सकते हैं।
बिना कर्म के कोई याद्दाश्त नहीं होती, इसी तरह से बिना याद्दाश्त के कोई कर्म नहीं होता। जब तक आप अपनी यादों के शासन में रहेंगे, तब तक ये आपको कुछ न कुछ करने के लिए मजबूर करती रहेंगी। अगर आप खुद को अपनी पिछली स्मृतियों से पूरी तरह से अलग कर लें, केवल तभी आप शांत व स्थिर होकर बैठ सकते हैं। इस बारे में आप एक प्रयोग करके देख सकते हैं, आप कोशिश कीजिए कि आप लगातार दस मिनट तक बिना कुछ भी किए स्थिर रहें। इस दौरान आपके भीतर न तो कोई विचार आना चाहिए, न कोई भावनाएं और न ही कोई गतिविधि होनी चाहिए। अगर फिलहाल आपके लिए यह करना संभव नहीं हो रहा, अगर आपके मन में हजार चीजें चल रही हैं और आप स्थिर होकर नहीं बैठ सकते तो गतिविधि आपके लिए बेहद जरूरी हो जाती है। यह चीज ज्यादातर लोगों पर लागू होती है। 
जब तक आपको कुछ करने की जरूरत है और आप गतिविधि के साथ अपनी पहचान बनाए रखते हैं, तब तक वह कार्मिक रिकॉर्डर उस गतिविधि को आपके लिए रिकॉर्ड करके रखता है और इसके परिणाम कई गुणा होंगे। 
अगर आज ऐसा कुछ नहीं हुआ, जो आपसे चिपका रह सके तो फिर अतीत में हुई कार्मिक स्मृतियां या कर्म बंधन आपसे अलग होने लगते हैं।
जब तक आप उस स्थिति में नहीं पहुँच जाते, तब तक आप काम से किसी तरह का पहचान या जुड़ाव बनाए बिना उसे एक भेंट की तरह कीजिए। अगर कुछ करने की जरूरत है, तो आप उसे कीजिए, वर्ना सहज रूप से बैठे रहिए। अगर आप बिना खुद को महत्व दिए कोई भी काम करेंगे तो फिर आपको उस कर्म के फल नहीं भोगने पड़ेंगे। आत्म-संतुष्टि व आत्म-महत्व के चलते किए गए कामों से ही कर्म इकठ्ठे होते हैं। अगर आप पूरी तरह से जीवंत व सक्रिय हैं और कोई नए कर्म इकठ्ठा नहीं कर रहे, तो आपके पुराने कर्म टूटकर गिरने शुरू हो जाते हैं। कर्म की यही प्रकृति है। पुराने कर्म आपसे केवल तभी तक चिपके रह सकते हैं, जब तक आप कार्मिक गोंद की नई परतें तैयार करते रहते हैं। अगर आज ऐसा कुछ नहीं हुआ, जो आपसे चिपका रह सके तो फिर अतीत में हुई कार्मिक स्मृतियां या कर्म बंधन आपसे अलग होने लगते हैं।
अगर आप हर काम को एक समपर्ण या भेंट की तरह करते हैं तो फिर आपके कर्म बंधन धीरे-धीरे खुलने शुरू हो जाते हैं। जब तक आप कुछ भी न करने की स्थिति तक नहीं पहुँच जाते, तब तक आप चाहे जो कुछ भी करें, उसे अपने भीतर एक समर्पण या भेंट के तौर पर करें। अर्पण की भीतरी स्थति में, आपको कृपा मिलनी शुरू हो जाएगी।
हम कर्म से तभी बनते हैं जब कर्म के प्रति हमारा कर्ता का भाव होता है, क्योंकि कर्म, कर्ता पर ही लागू होते हैं। अगर हम कर्म करते हुए भी साक्षी बने रहें और कर्म को परमात्मा द्वारा कराया जा रहा है, यह भावना अपने मन में स्थापित कर लें तो फिर हम कर्म बंधनों से नहीं बंधेंगे, पिछले जिन कर्मों से हम बंधे हुए हैं उन से भी मुक्त हो पाएंगे तथा जन्म जन्म के कर्म बंधनों से मुक्त होकर दैनिक जीवन में कर्म फलों से मिल रही परेशानियों से को पर कर मोक्ष की राह पर चल पाएंगे।

अज्ञात

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सोमवार, 16 अगस्त 2021

maha avatar baba ji

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These beautiful pictures were taken by one of the members of our group on a Kriya Yoga retreat to India in 2017.  It was taken at the Gorakhnath temple in Haridwar. It came up in my Facebook memories today and I would like to share an experience I had on this trip.                                                             I shared this story once before a couple of years ago so I decided to share it again. On this trip to the holy city of Haridwar, our group was led by Kriya Yoga Master, Yogiraj Gurunath Siddhanath. Yogiraj is a Nath Yogi. The word Siddha in his name means “Perfected Being.” The Naths are a very ancient tradition who trace their origin all the way back to Lord Shiva who is regarded as Adinath, which means, the first Nath yogi.                  Yogiraj Siddhanath’s disciples simply call him Gurunath. While in Haridwar Gurunath took us to the famous Gorakhnath temple. The temple was named after probably the most famous Nath saint called Gorakhnath (also called Gorakshanath). Before we entered the temple Gurunath explained that Mahavatar Babaji incarnated as Gorakhnath in the year 70 BC.  He also said that Mahavatar Babaji is none other than Lord Shiva himself. Therefore whenever Gurunath and other Nath yogis talk about Mahavatar Babaji they refer to him as Shiva Goraksha Babaji. So the Gorakhnath temple is a very important and holy place for the Nath yogis. If you look very closely at the first picture you will see that there is a little old man standing in the background, within the red circle. We then entered the temple and were sitting there for a while. Suddenly I heard something that sounded like a bit of a commotion going on in the back of the temple. When I looked around I could see that the people in the temple were doing the pranam to someone, but I could not see who it was.  Then I saw a very old man, hunched over, slowly shuffling to the front of the temple. I say this with all respect, but when I saw him, my first thought was that this feels and looks like a scene from the movie, “The hunchback of Notre Dame.” There was something otherworldly about the old man. He then went over and talked with Gurunath for a while and eventually slowly shuffled out of the temple again.  After he left Gurunath told us that he was a saint and that he was very, very old and that he came to bring us the special blessings of Lord Shiva. A friend of mine went on another occasion also on a pilgrimage with Gurunath to the same Gorakhnath temple in Haridwar. She told me that when they were there, before they entered the temple, Gurunath told them that Mahavatar Babaji will be there in some form or the other during the aarti. They then had a similar experience with the old Sadhu entering the temple during the aarti.  Afterwards Gurunath told them that Babaji entered this old man to give darshan to his devotees. This experience gave me goosebumps. How mysterious and strange are the ways of the Divine ! Om Kriya Babaji Namah Aum ! Sabhar Italy bhakt Facebook wall

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साधना क्या है

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साधना का मतलब होता है की आप किसी चीज पर नियंत्रण प्राप्त करो। साधना मतलब स्वयं को तैयार करना। साधना मतलब साधकर रखना। साधना मतलब ऐसी ऊर्जा पैदा करना जो आपके सारे मार्ग खोल दे। अब इस बात को विस्तृत रूप से समझते है।

साधना एक प्रक्रिया है। एक प्रकार से ये समझ सकते है कि आप किसी कार्य को करना चाहते है भगर उस कार्य के विषय मे पूर्ण रूप से जानकारी नही है तो कार्य नही होगा। उसी प्रकार से आध्यत्म और ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया भी साधना है। साधना से आप अपने अंदर वो ऊर्जा पैदा कर सकते हो जिससे आप किसी भी चीज पर नियंत्रण प्राप्त कर सकते हो। प्रकृति के पांच तत्व पर या फिर किसी व्यक्ति पर या फिर किसी कार्य पर या अदृश्य शक्तियो पर या फिर आप अपने शरीर पर भी नियंत्रण प्राप्त कर सकते है।

साधना का मतलब है आप अपने आपको असीम ऊर्जा के लिए तैयार करो। असीम ऊर्जा ऐसै ही नही मिलती। उज़के लिए स्वयं के अंदर पात्रता होनी चाहिए। वही पात्रता पैदा करने का कार्य साधना करती है। साधना का मतलब अपने आप को तपाना। स्वयं को उस काबिल बनाना की वो परमसत्ता से हमारा जुड़ाव हो जाए। नीति नियमो का पालन करके स्वयं को तैयार करना ही साधना है।

साधना का मतलब है साधकर रखना। अब इस बात को हम इस प्रकार बोल सकते है कि स्वयं को उस काबिल बनाये की आप अपने मन को साधकर रख सके। अपने विचारों को साधकर रख सके। अपने शरीर को साधकर रख सके। मतलब की अपने मन शरीर और विचारों को जो दिशा आप देना चाहे दे सकते है।

साधना का मतलब है कि ऊर्जा को पैदा करना। अब ये कैसे संभव है कि ऊर्जा पैदा हो जाये। तो जब व्यक्ति नीति नॉयमो का पालन करता है जब वो मंत्र का उच्चारण करता है। जब वो किसी स्तोत्र का पाठ करता है। जब व्यक्ति स्वयं की आत्म ऊर्जा को जगृत करता है जब वो ध्यान करता है तब ये सभी घर्षण से उज़के अंदर एक अमूल्य ऊर्जा पैदा होती है और उसी ऊर्जा को कार्यान्वित करके वो अपने जीवन के सारे कार्य कर सकता है और दूसरे लोगो के भी कार्य कर सकता है।

साधना एक दिन की या एक महीने की प्रक्रिया नही है। वो तो आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है। जैसे जैसे व्यक्ति ये जप तप ध्यान की प्रक्रिया बढ़ाता है वैसी ही उसकी ऊर्जा भी बढ़ती जाती है और वही ऊर्जा उसके समग्र जीवन को बदलती है।

इस ऊर्जा का उपयोग सद्धक इष्ट देवता की कृपा के लिए कर सकता है। मोक्ष के लिए भी कर सकता है। ज्ञान के लिए भी कर सकता है। सभी प्रकार के देवीदेवता की कृपा प्राप्त करने के लिए या उन्हें साधने के लिए कर सकता है। सभी इत्तरयोनि को आपने आधीन करने के लिए कर सकता है या वो जिस कार्य मे चाहे उसमे उपयोग कर सकता है।

साधना एक समग्र प्रक्रिया है। ये हमारे समग्र जीवन को बदलने की क्षमता रखता है। किसी नॉयम का पालन करना साधना है। तप या व्रत करना भी साधना है। किसी मंत्र का जप करना भी साधना है। योग या प्राणायाम या ध्यान के माध्यम से स्वयं के अंदर ऊर्जा पैदा करना भी साधना है। मन को विचारों को और शरीर को अपने अनुकूल बनाना और जो चाहे कार्य करवाना भी साधना है। यह एक विस्तृत विषय है।

जितने भी मंत्र है या यँत्र है या क्रियाए है वो सभी तब तक सिद्ध नही होते जब आप अपने आपको तैयार नही करते जब तक आप साधन के माध्यम से स्वयं को उस काबिल नही बनाते हो। पहले स्वयं के अंदर ऊर्जा पैदा करना ही साधना का मूल उद्द्देष्य है।

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रविवार, 15 अगस्त 2021

तंत्र-अध्यात्म और काम-(प्रवचन-01)

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तंत्र और योग मौलिक रूप से भिन्न हैं। वे एक ही लक्ष्य पर पहुंचते हैं लेकिन मार्ग केवल अलग-अलग ही नहीं, बल्कि एक दूसरे के विपरीत भी हैं। इसलिए इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है। योग की प्रक्रिया तत्व-ज्ञान प्रणाली-विज्ञान भी है योग विधि भी है। योग दर्शन नहीं है। तंत्र की भांति योग
भी किया, विधि, उपाय पर आधारित है। योग में करना होने की ओर ले जाता है लेकिन विधि भिन्न है। योग में व्यक्ति को संघर्ष करना पड़ता है; वह योद्धा का मार्ग है। तंत्र के मार्ग पर संघर्ष बिल्कुल नहीं है। इसके विपरीत उसे भोगना है लेकिन होशपूर्वक बोधपूर्वक।

योग होशपूर्वक दमन है तंत्र होशपूर्वक भोग है।

तंत्र कहता है कि तुम जो भी हो परम-तत्व उसके विपरीत नहीं है। यह विकास है तुम उस परम तक विकसित हो सकते हो। तुम्हारे और सत्य के बीच कोई विरोध नहीं है। तुम उसके अंश हो इसलिए प्रकृति के साथ संघर्ष की, तनाव की, विरोध की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हें प्रकृति का उपयोग करना है; तुम जो भी हो उसका
उपयोग करना है ताकि तुम उसके पार जा सको।


    

योग में पार जाने के लिए तुम्हें स्वयं से संघर्ष करना पड़ता है। योग में संसार और मोक्ष तुम जैसे हो और जो तुम हो सकते हो दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं। दमन करो, उसे मिटाओ जो तुम हो: ताकि तुम वह हो सको जो तुम हो सकते हो। योग में पार जाना मृत्यु है। अपने वास्तविक स्वरूप के जन्म के लिए तुम्हें मरना होगा।

तंत्र की दृष्टि में, योग एक गहरा आत्मघात है। तुम्हें अपने प्राकृतिक रूप अपने शरीर अपनी वृत्तियों अपनी इच्छाओं को- सब कुछ को मार देना होगा नष्ट कर देना होगा। तंत्र कहता है ”तुम जैसे हो, उसे वैसे ही स्वीकार करो।” तंत्र गहरी से गहरी स्वीकृति है। अपने और सत्य के बीच संसार और निर्वाण के बीच कोई अंतराल मत
बनाओ। तंत्र के लिए कोई अंतराल नहीं है मृत्यु जरूरी नहीं है। तुम्हारे पुनर्जन्म के लिए किसी मृत्यु की जरूरत नहीं है बल्कि अतिक्रमण की आवश्यकता है। इस अतिक्रमण के लिए स्वयं का उपयोग करना है।

उदाहरण के लिए- काम है सेक्स है। वह बुनियादी ऊर्जा है जिसके माध्यम से तुम पैदा हुए हो। तुम्हारे अस्तित्व के तुम्हारे शरीर के बुनियादी कोश काम के हैं। यही कारण है कि मनुष्य का मन काम के इर्द गिर्द ही घूमता रहता है। योग में इस ऊर्जा से लड़ना अनिवार्य है। वहां लड़कर ही तुम अपने भीतर एक भिन्न केंद्र को निर्मित
करते हो। जितना तुम लड़ते हो उतना ही तुम उस भिन्न केंद्र से जुड़ते जाते हो। तब काम तुम्हारा केंद्र नहीं रह जाता। काम से संघर्ष- निश्चित ही होशपूर्वक- तुम्हारे भीतर अस्तित्व का एक नया केंद्र निर्मित कर देता है। तब काम तुम्हारी ऊर्जा नहीं रह जाएगा। काम से लड़कर तुम अपनी ही ऊर्जा निर्मित कर लोगे एक अलग प्रकार की ही ऊर्जा, एक अलग प्रकार का अस्तित्व-केंद्र पैदा होगा।

तंत्र के लिए काम-ऊर्जा का उपयोग करो उससे लड़ो मत। उसे रूपांतरित करो। उसे शत्रु मत समझो उससे मित्रता बनाओ। वह तुम्हारी ही ऊर्जा है; वह पाप नहीं है वह बुरी नहीं है। प्रत्येक ऊर्जा तटस्थ है। उसका उपयोग तुम्हारे हित में किया जा सकता है और तुम्हारे विरुद्ध भी किया जा सकता है। तुम उसे अवरोधक भी बना सकते हो और सीढ़ी भी बना सकते हो। उसका उपयोग हो सकता है। सही ढंग से उपयोग करने पर मित्र बन जाती है। गलत उपयोग पर वह तुम्हारी शत्रु हो जाती है। वह दोनों ही नहीं है। ऊर्जा तटस्थ है।

साधारण आदमी जिस तरह यौन का काम का उपयोग करता है वह उसका शत्रु बन जाता है उसे नष्ट कर देता है उसकी शक्ति का क्षय करता है। योग की दृष्टि ठीक इसके विपरीत है – साधरण मन के विपरीत। साधारण चित्त अपनी ही वासनाओं से विनष्ट होता जाता है।

इसलिए योग कहता है ”वासना छोड़ो और वासना-शून्य हो जाओ।” वासना से लड़ो और अपने भीतर एक संघटन, इनटेग्रेशन पैदा करो जो वासना रहित हो। तंत्र कहता है ”वासना के प्रति जागो।” उससे संघर्ष मत करो। वासना में पूरी सजगता के साथ प्रवेश करो और जब तुम पूरी होश से वासना में प्रवेश करते हो तुम उसका अतिक्रमण कर जाते हो। तब तुम उसमें होकर भी उसमें नहीं होते। तुम उसमें से गुजरते हो लेकिन अजनबी बने रहते हो, अछूते रह जाते हो।

योग बहुत अधिक आकर्षित करता है क्योंकि योग साधारण चित्त के बिल्कुल विपरीत है। इसलिए साधारण चित्त योग की भाषा समझ सकता है। तुम यह जानते हो कि किस भांति काम तुम्हें विनष्ट कर रहा है इसने तुम्हें किस तरह नष्ट कर दिया है किस तरह तुम इसके इर्द गिर्द गुलामों की भांति, कठपुतलियों की भांति घूमते रहते हो। अपने अनुभव से तुम यह जानते हो। इसलिए जब योग कहता है ”इससे संघर्ष करो” तुम तत्काल इस भाषा को समझ जाते हो। यही आकर्षण है योग का सुगम आकर्षण है।

तंत्र इतनी सरलता से आकर्षित नहीं करता। यह मुश्किल लगता है कि कैसे इच्छा के बिना उसके द्वारा अभिभूत हुए प्रवेश किया जा सकता है? कामवासना में पूरी होश से किस प्रकार प्रवृत्त हुआ जा सकता है? साधरण चित्त भयभीत हो जाता है। यह खतरनाक लगता है ऐसा नहीं कि यह खतरनाक है। जो कुछ भी तुम काम के संबंध में जानते हो, वह तुम्हारे लिए खतरा उत्पन्न करता है। तुम अपने को जानते हो तुम जानते हो कि तुम किस प्रकार स्वयं को धोखा दे सकते हो। तुम भलीभांति जानते हो कि तुम्हारा मन चालाक है। तुम वासना में काम वासना में सभी वासनाओं में प्रवृत्त हो सकते हो और अपने को धोखा दे सकते हो कि तुम पूरी होश के साथ उसमें प्रवृत हो रहे हो। यही कारण है कि तुम्हें खतरे का अहसास होता है। खतरा तंत्र में नहीं है तुम में है तुम में है।

और योग का आकर्षण भी तुम्हारे कारण है। तुम्हारे साधारण मन तुम्हारा काम-दमित, काम का भूखा कामांध चित्त इसका कारण है। क्योंकि साधारण मन काम के संबंध में स्वस्थ नहीं है इसलिए योग के लिए आकर्षण है। एक बेहतर मनुष्यता जिसका काम के प्रति स्वस्थ नैसर्गिक सहज स्वाभाविक दृष्टिकोण होगा… हम सामान्य और प्रकृत नहीं है। हम सर्वथा असामान्य हैं अस्वस्थ और विक्षिप्त हैं। लेकिन क्योंकि सभी हम जैसे हैं इसलिए हमें इसका अहसास नहीं होता। पागलपन इतना सामान्य है कि शायद पागल न होना असामान्य प्रतीत होता है। हमारे बीच एक बुद्ध असामान्य हैं एक जीसस असामान्य है। वे इनसे अन्यथा मालूम होते है। यह सामान्यता एक रोग है। इसी सामान्य चित्त में योग का आकर्षण पैदा होता है।

यदि काम को उसकी स्वाभाविकता से ग्रहण करो यदि उसके गिर्द पक्ष या विपक्ष का कोई दर्शनशास्त्र न खड़े करो, ऐसे ही देखो जैसे अपने हाथ-पांव को देखते हो, एक स्वाभाविक चीज की तरह उसे उसकी समग्रता से स्वीकार करो, तन तंत्र आकर्षित करेगा, और तभी केवल तंत्र ही बहुत से लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

लेकिन तंत्र के दिन आ रहे हैं। देर-अबेर पहली बार जन-साधारण में तंत्र का विस्फोट होने वाला है। पहली बार जमाना परिपक्व हुआ है–काम को प्राकृतिक रूप में ग्रहण करने के लिए परिपक्व। और संभव है कि यह विस्फोट पहले पश्चिम में हो, क्योंकि फ्रायड, जुंग और रेख ने पृष्ठभूमि तैयार कर दी है। उन्हें तंत्र के बारे में कुछ पता नहीं था लेकिन उन्होंने तंत्र के विकास के लिए बुनियादी भूमि तैयार कर दी है।

पाश्चात्य मनोविज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि मनुष्य की बुनियादी बीमारी कहीं न कहीं काम से संबंधित है उसका बुनियादी पागलपन काम-केंद्रित। इसलिए जब तक मनुष्य काम-अभिमुख है वह स्वाभाविक सामान्य नहीं हो सकता। काम के प्रति अपनी इस मनोवृत्ति के कारण ही मनुष्य गलत हो गया है। किसी भी भाव या विचार की जरूरत नहीं है और तभी तुम स्वाभाविक हो सकते हो। अपनी आंखों के बारे में तुम्हारा क्या विचार है? क्या वे दुष्ट हैं या दिव्य? क्या तुम अपनी आंखों के पक्ष में हो या विपक्ष में? कोई भी पक्षपात नहीं। इसीलिए तुम्हारी आंखों सामान्य हैं। कोई भी रवैया अपना लो सोचों कि आंखों बुरी हैं तब उनसे देखना मुश्किल हो जाएगा। तब देखना किसी समस्या का रूप ले लेगा जैसे अभी काम है यान है। तब तुम देखना चाहोगे। तुम देखने की इच्छा करोगे, देखने के लिए व्यग्र हो जाओगे। लेकिन जब तुम देखोगे, स्वयं को अपराधी समझोगे; जब भी देखोगे लगेगा कि कुछ गलत हो गया है। कुछ पाप हो गया है। और तब तुम दृष्टि के यंत्र को ही नष्ट कर देना चाहोगे; आंखों को ही नष्ट कर देना चाहोगे। और जितना ही नष्ट करना चाहोगे, उतना ही तुम आंख-केंद्रित हो जाओगे। तब एक विसंगति उत्पन्न होगी, तुम ज्यादा से ज्यादा देखना भी चाहोगे और ज्यादा से ज्यादा अपराधी भी अनुभव करोगे।

काम-केंद्र के साथ भी यही दुर्घटना घटी है।

तंत्र कहता है ”तुम जो भी हो उसे स्वीकार करो। यही मूलस्वर है।” समग्र स्वीकार और केवल समग्र स्वीकार के माध्यम से ही तुम विकास कर सकते हो। तब उस ऊर्जा का उपयोग करो जो तुम्हारे पास है। पर उसका उपयोग कैसे करोगे? पहले उन्हें स्वीकार करो फिर खोजो कि ये शक्तियां क्या हैं? काम क्या है? तथ्य क्या है? हम उससे परिचित नहीं हैं। हम काम के बारे में जो कुछ भी जानते हैं वह दूसरों ने हमें सिखाया है। हम काम-भोग से गुजरे भी होंगे, लेकिन दमित मन से, अपराध भाव से, जल्दी-जल्दी, जैसे कोई बोझ उतारना है हल्का होना है। काम-भोग कोई प्रिय कृत्य नहीं है। तुम प्रसन्नता अनुभव नहीं करते लेकिन तुम छोड़ भी नहीं सकते। जितना ही तुम उसे छोड़ना चाहते हो उतना ही वह आकर्षक होता जाता है। जितना ही तुम उसे नकारते हो उतना ही वह तुम्हें निमंत्रित करता मालूम होता है।

तुम काम वासना को नकार नहीं सकते, लेकिन नकारने की नष्ट करने की मनोवृत्ति उस मन को ही उस होश को ही, उस संवेदनशीलता को ही नष्ट कर देती है जो काम वासना को समझ सकती है। इसलिए तुम बिना किसी संवेदना के ही काम भोग करते रहते हो। और तब तुम उसे समझ नहीं पाते। केवल गहरी संवेदनशीलता ही किसी चीज को समझ सकती है; उसके प्रति गहरा भाव, गहरी सहानुभूति और उसमें गहरी गति ही किसी चीज को समझ सकती है। तुम काम को केवल तभी समझ सकते हो जब तुम उसके पास ऐसे जाओ जैसे कवि फूलों के पास जाता है। अगर फूलों के साथ अपराध अनुभव करो तो तुम फुलवारी से आंखों बंद किये गुजर जाओगे; तुम बड़ी जल्दबाजी में होओगे- एक विक्षिप्त जल्दबाजी। किसी कदर निकल भागने की फिक्र लगी रहेगी। फिर तुम सजग, होशपूर्ण कैसे रह सकते हो।

इसलिए तंत्र कहता है ”तुम जो भी हो उसे स्वीकार करो।” तुम अनेक बहु-आयामी ऊर्जाओं के महान रहस्य हो, उसे स्वीकार करो। और प्रत्येक ऊर्जा के साथ गहरी संवेदनशीलता, और सजगता से, प्रेम और बोध के साथ यात्रा करो। उसके साथ यात्रा करो… तब ऊर्जा प्रत्येक वासना के अतिक्रमण का वाहन बन जाती है। तब प्रत्येक
ऊर्जा सहयोगी हो जाती है। और तब संसार ही निर्वाण हो जाता है।

योग निषेध है तंत्र विधेय है। योग द्वैत की भाषा में सोचता है इसलिए यह योग शब्द है। योग का अर्थ है-दो चीजों को जोड़ना। उनका जोड़ा बनाना। लेकिन वहां चीजें दो हैं वहां द्वैत है। तंत्र कहता है ”द्वैत नहीं है। और अगर द्वैत है तो तुम उसे एक नहीं कर सकते। कितना भी प्रयत्न करो दो रहेंगे ही, कितना भी दो के दो रहेंगे ही। संघर्ष जारी रहेगा; द्वैत बना रहेगा।”

अगर संसार और परमात्मा दो हैं तो वे एक में नहीं जोड़े जा सकते। और अगर वे यथार्थ में दो नहीं है दो की तरह सिर्फ भागते हैं तो ही वे एक हो सकते हैं। अगर तुम्हारा शरीर और आत्मा दो है तो उनको जोड़ने का उपाय नहीं है। दो वे रहेंगे।

तंत्र कहता है ”द्वैत नहीं है वह मात्र आभास है।” इसलिए आभास को मजबूत बनाने की जरूरत क्या है? इस आभास को मजबूत होने में सहयोग क्यों दिया जाए? इसी क्षण इसे समाप्त करो और एक हो जाओ। और एक होने के लिए स्वीकार चाहिए संघर्ष नहीं। स्वीकार एक करता है। संसार को स्वीकारो शरीर को स्वीकारो; उस सबको
स्वीकारो जो उसमें निहित है। अपने भीतर दूसरा केंद्र मत निर्मित करो। क्योंकि तंत्र की दृष्टि में वह दूसरा केंद्र अहंकार के सिवाय कुछ नहीं है। स्मरण रहे तंत्र की दृष्टि में वह अहंकार ही है। इसलिए अहंकार को मत खड़ा करो सिर्फ बोध रखो कि तुम क्या हो।

और अगर लड़ोगे तो अहंकार वहां होगा ही। इसलिए ऐसा योगी खोजना मुश्किल है जो अहंकारी न हो। सच में मुश्किल है। योगी निरहंकारिता की बात किये जाते हैं लेकिन वे निरहंकारी नहीं हो सकते। उनकी पद्धति ही अहंकार निर्मित करती है। और संघर्ष वह पद्धति है प्रक्रिया है। अगर लड़ोगे तो निश्चित ही- अहंकार को पैदा करोगे। जितना तुम लड़ोगे उतना अहंकार बलवान होगा। और अगर लड़ाई में जीत गए तो तुम्हारा अहंकार परम हो जाएगा।

तंत्र कहता है ”संघर्ष नहीं।” और तब अहंकार की संभावना नहीं। लेकिन अगर हम तंत्र की मानें तो बहुत सी समस्याएं खड़ी हो जाएंगी। क्योंकि अगर हम लड़ते नहीं तो हमारे लिए भोग ही रह जाता है। हमारे लिए ”संघर्ष नहीं’’ का मतलब होता है भोग। और तब हम भयभीत हो जाते हैं। जन्मों-जन्मों हम भोग में डूबे रहे और कहीं नहीं
पहुंचे। लेकिन हमारा जो भोग है वह तंत्र का भोग नहीं है। तंत्र कहता है ”भोगो, लेकिन होश के साथ।”

अगर तुम क्रोधित हो तो तंत्र यह नहीं कहेगा कि क्रोध मत करो। वह कहेगा कि पूरी तरह क्रोध करो लेकिन साथ ही उसके प्रति सजग भी रहो। तंत्र क्रोध के खिलाफ नहीं है। तंत्र आध्यात्मिक नींद आध्यात्मिक मूर्च्छा के खिलाफ है। होश रखो और क्रोध करो। और तंत्र का यही गुहा रहस्य है कि अगर तुम होशपूर्ण रहे तो क्रोध रूपांतरित हो जाता है क्रोध करुणा बन जाता है। इसलिए तंत्र के अनुसार क्रोध तुम्हारा शत्रु नहीं है; क्रोध बीज रूप में करुणा है। क्रोध की ऊर्जा ही करुणा बन जाती है। और अगर तुम उससे लड़ते हो तो करुणा की संभावना समाप्त हो जाती है।

इसलिए अगर तुम दमन में सफल हुए तो मृत हो जाओगे। दमन के कारण क्रोध तो नहीं रहेगा लेकिन उसी कारण करुणा भी जाती रहेगी। क्योंकि क्रोध ही करुणा बनता है। अगर तुम काम के दमन में सफल हो गए–जो कि संभव है–तो काम तो नहीं रहेगा, लेकिन उसके साथ प्रेम भी नहीं रहेगा। क्योंकि काम के मर जाने पर वह ऊर्जा ही नहीं बचती जो प्रेम में विकसित होती है। तुम काम-रहित तो हो जाओगे, पर साथ ही प्रेम-रहित भी ह ो जाओगे। और तब तो असली बात ही चूक गए क्योंकि प्रेम के बिना भगवत्ता नहीं है। और प्रेम के बिना मुक्ति नहीं है और प्रेम के बिना स्वतंत्रता नहीं है।

तंत्र का कहना है कि इन्हीं ऊर्जाओं को रूपांतरित करना है। इसी बात को दूसरे ढंग से भी कहा जा सकता है। यदि तुम संसार के विरुद्ध हो तो निर्वाण संभव नहीं है क्योंकि संसार को ही तो निर्वाण में रूपांतरित करना है। तब तुम उन्हीं बुनियादी शक्तियों के ही खिलाफ हो गए जो कि शक्तियों के स्रोत हैं।

इसलिए तंत्र की कीमिया कहती है कि लड़ो मत सभी शक्तियां जो भी तुम्हें मिली हैं उन्हें मित्र बना लो। उनका स्वागत करो। तुम इसे अहोभाग्य समझो कि तुम्हारे पास क्रोध है कि तुम्हारे पास काम-वासना है कि तुम्हारे पास लोभ है। अपने को धन्यभागी समझो क्योंकि वे अप्रकट स्रोत हैं। और उन्हें रूपांतरित किया जा सकता
है और उन्हें प्रकट किया जा सकता है। और जब काम-वासना रूपांतरित होती है तो प्रेम बन जाती है। विष खो जाता है कुरूपता खो जाती है।

बीज कुरूप है लेकिन वही जब जीवित होता है अंकुरित होता है पुष्पित होता है तब उसका सौंदर्य प्रकट होता है। बीज को मत फेंकना क्योंकि तब तुम उसके साथ फूलों को भी फेंक रहे हो। वे अभी उनमें नहीं हैं अभी प्रकट नहीं हैं कि तुम उन्हें देख सको। वे अप्रकट है लेकिन हैं। बीज का उपयोग करो ताकि तुम फूलों को प्राप्त कर
सको। इसलिए पहले स्वीकृति, एक अति संवेदनशील बोध और होश- तब भोग की अनुमति है।

एक बात और जो कि वास्तव में बहुत ही हैरानी की है लेकिन वह तंत्र की गहरी से गहरी खोजों में से एक है। और वह है: जिसे भी तुम शत्रु मान लेते हो चाहे वह लोभ हो क्रोध हो, घूणा हो, या काम हो, जो भी हो तुम्हारा मानना ही उन्हें शत्रु बना देता है। उन्हें परमात्मा का वरदान समझो और कृतज्ञ हृदय से उनके पास जाओ।

उदाहरण के लिए तंत्र ने काम-ऊर्जा को रूपांतरित करने की अनेक विधियां विकसित की हैं। काम-वासना में ऐसे प्रवेश करते जाओ जैसे कोई परमात्मा के मंदिर में प्रवेश करता है। काम कृत्य को ऐसे लो जैसे कि वह प्रार्थना है जैसे कि वह ध्यान है। उसकी पवित्रता को अनुभव करो। इसीलिए खजुराहो पुरी, कोर्णाक सभी मंदिरों में मैथुन की मूर्तियां बनी हैं। मंदिर की दीवारों पर काम-क्रीडा के चित्र बे-तुके लगते हैं- खासकर ईसाइयत, इस्लाम और जैन धर्म की आंखों में। उन्हें यह बात परस्पर विरोधी मालूम होती है कि मैथुन के चित्रों का मंदिर से क्या संबंध हो सकता है? खजुराहो के मंदिर की बाहरी दीवारों पर संभोग की, मैथुन की हर संभव मुद्रा पत्थरों में अंकित है।
क्यों? मन्दिर में कम से कम उनका कोई स्थान नहीं है मनों में हो सकता हैं। ईसाइयत इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकती कि चर्च की दीवारों पर खजुराहो जैसे चित्र खुदे हों। असंभव!

आधुनिक हिंदू भी इस बात के लिए अपने को अपराधी अनुभव करते हैं। इसका कारण है कि आधुनिक हिंदू–मानस भी ईसाइयत के द्वारा निर्मित हुआ है। वे हिंदू-ईसाई है और वे बदत्तर हैं–क्योंकि ईसाई होना तो ठीक है लेकिन हिंदू-ईसाई होना बेहूदा है। वे अपराधी अनुभव करते हैं। एक हिंदू नेता पुरुषोतमदास टंडन ने तो यहां तक सलाह दी कि इन मंदिर को ध्वस्त कर देना चाहिए। वे हमारे नहीं हैं। सच ही वे हमारे नहीं मालूम पड़ते क्योंकि बहुत दिनों से, सदियों से तंत्र हमारे हृदयों से निर्वासित रहा। तंत्र हमारी मुख्य धारा नहीं रहा। योग मुख्य धारा रहा। और योग खजुराहो की बात सोच भी नहीं सकता। इसे नष्ट कर देना चाहिए।

तंत्र कहता है कि संभोग में ऐसे प्रवेश करो जैसे कोई पवित्र मंदिर में प्रवेश कर रहा हो। इसी कारण पवित्र मंदिरों की दीवारों पर उन्होंने संभोग के चित्र अंकित किए उन्होंने कहा कि काम-भोग में ऐसे उतरो जैसे तुम मंदिर में प्रवेश करते हो। इसलिए जब तुम किसी पवित्र मंदिर में प्रवेश करते हो वहां संभोग के चित्र इसलिए हैं कि
तुम्हारा मन दोनों में संबंधित हो जाए दोनों का साहचर्यगत संबंध स्थापित हो जाए ताकि तुम यह अनुभव कर सको कि संसार और परमात्मा दो विरोधी तत्व नहीं है बल्कि एक हैं वे परस्पर विरोधी नहीं। वे ध्रुवीय विपरीताएं हैं जो एक दूसरे की सहायता करती हैं। और इस ध्रुवीयता के कारण ही अस्तित्व में हैं। अगर यह ध्रुवीयता नष्ट हो
जाए तो सारा संसार ही नष्ट हो जाएगा। इसलिए इस गहरी एकतात्मकता को देखो। केवल ध्रुवीय बिंदुओं की मत देखो, उस आंतरिक धारा को देखो जो सबको एक करती है।

तंत्र के लिए सब कुछ पवित्र है। स्मरण रखो कि तंत्र के लिए सब कुछ पवित्र है; कुछ भी अपवित्र नहीं है। इसे इस भांति देखो। एक अधार्मिक आदमी के लिए सब कुछ अपवित्र है। तथाकथित धार्मिक आदमी के लिए कुछ चीजें पवित्र हैं और कुछ अपवित्र। तंत्र के लिए सब कुछ पवित्र है।

कुछ समय पहले एक ईसाई पादरी मेरे पास आया था। उसने कहा कि ईश्वर ने संसार को बनाया। इसलिए मैंने पूछा, ”पाप को किसने बनाया?” उसने कहा, ”शैतान ने।” तब मैंने पूछा, ”शैतान को किसने बनाया।” तब वह पादरी विबूचन में पड़ गया। उसने कहा ”परमात्मा ने ही शैतान को बनाया।”

शैतान पाप को पैदा करता है और परमात्मा शैतान को। तब असली पापी कौन है–परमात्मा या शैतान? लेकिन द्वैतवादी धारणा इसी प्रकार की विसंगतियों की ओर ले जाती है।

तंत्र के लिए ईश्वर और शैतान दो नहीं हैं। वास्तव में, तंत्र में कुछ ऐसा ही नहीं जिसे शैतान कहा जा सके। तंत्र में सब कछ पवित्र है सब कुछ भागवत है! और यही सही दृष्टि बिंदु है गहनतम दृष्टि-बिंदु है। अगर इस संसार में
कुछ चीज भी अपवित्र है तो प्रश्न उठता है कि वह कहां से आती है और वह कैसे संभव है।

इसलिए दो ही विकल्प हैं। पहला है नास्तिक का विकल्प जो कहता है कि सब कुछ अपवित्र है। यह भी सही है। वह भी अद्वैतवादी है। उसे संसार में कहीं भी पवित्रता दिखाई नहीं देती। और दूसरा है तंत्र का विकल्प–सब कुछ पवित्र है। वह भी अद्वैतवादी है। लेकिन इन दोनों के मध्य में जो तथाकथित धार्मिक लोग हैं वे वास्तव में धार्मिक नहीं हैं–न तो वे धार्मिक हैं और न ही अधार्मिक- क्योंकि वे सदा द्वंद्व में जीते हैं। उनका पूरा धर्मशास्त्र दोनों द्वारों को मिलाने की कोशिश कर रहा है और वे कभी मिलते नहीं।

अगर एक भी कोशिका, एक भी अणु अपवित्र है तो सारा संसार अपवित्र हो जाता है। क्योंकि वह अकेला अणु इस पवित्र संसार में कैसे रह सकता है? यह कैसे संभव है! उसे सबका सहारा मिला है। होने के लिए अस्तित्व के लिए उसे समस्त का सहारा चाहिए। और अगर अपवित्र तत्व को पवित्र तत्वों का सहारा मिला है तो दोनों में क्या अंतर हुआ? इसलिए जगत या तो समग्ररूपेण पवित्र है बेशर्त या वह अपवित्र है। मध्य की कोई स्थिति नहीं है।

तंत्र कहता है कि सब कुछ पवित्र है। यही कारण है कि हम उसे समझ नहीं पाते। वह गहनतम अद्वैतवादी दृष्टि है–अगर हम इसे दृष्टि कह सकें तो। पर यह दृष्टिकोण है नहीं क्योंकि दृष्टिकोण द्वैतवादी ही होगा। तंत्र किसी चीज के विरुद्ध नहीं, इसलिए वह दृष्टिकोण नहीं है। वह अनुभूत एकत्व है एक ऐसा एकत्व जिसे जिया गया है।

ये दो मार्ग हैं- योग और तंत्र। हमारे अपंग चित्र के कारण तंत्र प्रभावी नहीं हो सका। लेकिन जब कोई भीतर से स्वस्थ होता है जब भीतर अराजकता नहीं होती तंत्र का अपना सौंदर्य है। और तभी वह वही समझ सकता है कि तंत्र क्या है? हमारे अशांत चित्त के कारण योग का आकर्षण है। योग हमें आसानी से आकर्षित कर लेता है।

स्मरण रहे कि अंत में तुम्हारा चित्त ही किसी चीज आकर्षक या विकर्षक बनाता है। तुम ही निर्णायक कारक हो।

ये दोनों अलग-अलग मार्ग हैं। मैं यह नहीं कहता हूं कि योग के द्वारा कोई पहुंच नहीं सकता। योग के मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है लेकिन उस योग से नहीं जो आज प्रचलित है। जो योग आज प्रचलित है वह वास्तव में योग नहीं लेकिन वह तुम्हारे से रुग्ण चित्त की व्याख्या है। परम को उपलब्ध होने के लिए योग भी एक प्रामाणिक मार्ग
हो सकता है लेकिन वह तभी संभव है जब कि तुम्हारे चित्त स्वस्थ हो जब वह रुग्ण और बीमार न हो तब योग का रूप ही कुछ और होता है।

उदाहरण के लिए महावीर का मार्ग योग है; लेकिन वे काम का दमन नहीं करते। उन्होंने काम को जाना है उसे जीया है उसे भली भांति परिचित हैं वह उनके लिए व्यर्थ हो गया है इसलिए वह विदा हो गया है। बुद्ध का मार्ग योग है लेकिन वे भी संसार से गुजरे हैं; वह उससे भली भांति परिचित हैं। वह उससे लड़ नहीं रहे।

तुम जिसे जान लेते हो उससे मुक्त हो जाते हो। वह फिर सूखे पत्तों की भांति पेड़ से गिर जाता है। वह त्याग नहीं है उसमें लड़ाई नहीं है। बुद्ध के चेहरे को देखो वह लड़ने वाले का चेहरा नहीं है। वे लड़ नहीं रहे हैं। वे कितने शांत हैं शांति के प्रतीक हैं और फिर अपने योगियों को देखो; लड़ाई उनके चेहरों पर अंकित है। गहरे में वहां बड़ा

शोरगुल है क्षोभ है अशांति है मानो वे ज्वालामुखी पर बैठे हों। उनकी आंखों में झांको और तुम्हें इसका पता चलेगा कि उन्होंने अपने समस्त रोगों को किसी गहराई में दबा रखा है। वे उनके पार नहीं गए।

एक स्वस्थ संसार में, जहां प्रत्येक व्यक्ति अपना प्रामाणिक जीवन जीता है जहां कोई किसी का अनुकरण नहीं करता, बस अपने ही ढंग से जीता है योग और तंत्र दोनों ही मार्ग संभव हैं। वहां व्यक्ति उस गहरी संवेदनशीलता को उपलब्ध हो सकता है जो वासनाओं का अतिक्रमण करती है वहां वह उस बिंदु पर पहुंच सकता है जहां कामनाएं व्यर्थ होकर गिर जाती हैं। योग से भी वह संभव है। लेकिन मेरे देखे उसी संसार में योग कारगर होगा जहां तंत्र भी कारगर होगा इसे स्मरण रखें।

हमें स्वस्थ और स्वाभाविक चित्त की जरूरत है। जिस संसार में स्वाभाविक मनुष्य होगा वहां योग और तंत्र दोनों ही वासनाओं के अतिक्रमण में सहयोगी होंगे। हमारे रुग्ण समाज में न तो योग और न तंत्र हमारा मार्ग दर्शन कर सकता है कयोंकि अगर हम योग को चुनते हैं तो इसलिए नहीं कि हमारी कामनाएं व्यर्थ हो गई हैं। नहीं
कामनाएं तो अब भी अर्थपूर्ण हैं। वे गिरी नहीं उन्हें बलपूर्वक हटाना है। अगर हम योग को चुनते हैं तो उसे दमन की विधि के रूप में ही चुनते हैं।

और यदि तंत्र को चुनते है तो सिर्फ चालाकी के रूप में धोखे के रूप में ताकि हम भोग में उतर सकें। इसलिए अस्वस्थ चित्त के साथ न तो योग काम दे सकता है और न ही तंत्र। वे दोनों ही हमें धोखे में ले जाएंगे। आरंभ करने के लिए तो स्वस्थ चित्त की विशेष रूप यौन के तल पर स्वस्थ चित्त की जरूरत है। तब तुम्हें तुम्हारा मार्ग चुनने में कोई कठिनाई नहीं हैं। तुम योग चुन सकते हो; तुम तंत्र चुन सकते हो।

बुनियादी तौर से दो प्रकार के लोग है: स्त्री और पुरुष–जैविक अर्थों में नहीं, मानिसक रूप में। जो मानसिक तौर से पुरुष हैं–आक्रमक हिंसक बहिर्मुखी योग उनका मार्ग है। जो बुनियादी तौर से स्त्रैण है–ग्रहणशील, निष्क्रिय और अहिंसक–तंत्र उनका मार्ग है।

इसे ठीक से ध्यान में रख ले। तंत्र के लिए मां काली तारा देवी अनेक देवियां, भैरवियां बहुत महत्वपूर्ण है योग में तुम्हें कहीं किसी देवी का नाम नहीं सुनाई देगा। तंत्र में देवियां ही देवियां हैं और योग में देव ही देव। योग बाहर जाती हुई ऊर्जा है और तंत्र भीतर जाती हुई ऊर्जा है। इसलिए आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में कह सकते हैं कि योग बहिर्मुखी है और तंत्र अंतर्मुखी। इस लिए यह व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। अगर तुम अंतर्मुखी हो तब संघर्ष लड़ाई तुम्हारे लिए नहीं है। अगर तुम बहिर्मुखी व्यक्ति हो तब संघर्ष तुम्हारा मार्ग है।

लेकिन हम उलझे हुए हैं सिर्फ उलझन हैं सब अस्तव्यस्त है सब गड़बड़ है। इसी कारण किसी से सहायता नहीं मिलती। उलटे, सब गड़बड़ हो जाता है। योग तुम्हें निक्षुब्ध करेगा तंत्र तुम्हें अशांत करेगा हर औषधि तुम्हारे लिए एक नई बीमारी पैदा करेगी क्योंकि चुनाव करनेवाला ही रोगी है विकृत है उसका चुनाव ही रुग्ण है रोग-
ग्रस्त है।

इसलिए मेरा यह मतलब नहीं कि योग के द्वारा तुम पहुंच ही नहीं सकते। मैं तंत्र पर सिर्फ इसलिए जोर देता हूं क्योंकि हम समझ पायेंगे कि तंत्र क्या है?

 osho


sabhar https://oshostsang.wordpress.com

 

 


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