वैज्ञानिकों ने विकसित किया इलेक्ट्रॉनिक पौधा, विज्ञान के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत

लंदन: वैज्ञानिकों ने पौधे के संवहन तंत्र में सर्किट लगाकर एक इलेक्ट्रॉनिक पौधे का निर्माण किया है। इससे विज्ञान के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत हो सकती है।
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स्वीडन के लिकोंपिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के दल ने पौधों के अंदर लगाए गए तारों, डिजिटल लॉजिक और प्रदर्शनकारी तत्वों को दिखाया गया है, जो आर्गेनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के नए अनुप्रयोगों और वनस्पति विज्ञान में नए उपकरण विकसित करने में मददगार हो सकते हैं।
उमीआ प्लांट साइंस सेंटर के निदेशक और प्लांट रिप्रोडक्शन बायलॉजी के प्रोफेसर ओव निल्सन ने कहा, इससे पहले वैज्ञानिकों के पास जीवित पौधे में विभिन्न अणुओं के सकेंद्रण को मापने के लिए कोई अच्छा उपकरण नहीं था, लेकिन इस शोध के बाद हम पौधों का विकास करने वाले उन विभिन्न पदार्थो की मात्रा को प्रभावित करने में सक्षम हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा, पौधों में रासायनिक मार्गो पर नियंत्रण से प्रकाश संश्लेषण आधारित ईंधन सेल, सेंसर्स (ज्ञानेंद्रियों) और वृद्धि नियामकों के लिए रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही ऐसे उपकरण भी तैयार किए जा सकते हैं, जो पौधों की आंतरिक क्रियाओं को व्यवस्थित कर सकें।
उन्होंने कहा, यह सफलता वनस्पति विज्ञान और ऑर्गेनिक साइंस के विविध क्षेत्रों के विलय की ओर पहला कदम है। हमारा उद्देश्य उर्जा की मदद से पर्यावरण और वनस्पति विज्ञान के नए रास्तों को खोजना है। यह अध्ययन साइंस एडवांसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
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घर बैठे चला रहे हैं अपना 'चैनल'



मुख्य रूप से वीडियो देखने और मनोरंजन का साधन मानी जाने वाली यूट्यूब वेबसाइट का इस्तेमाल अब शिक्षा के प्रचार प्रसार में भी हो रहा है.
खाना बनाना, गीत संगीत से लेकर सिलाई कढ़ाई तक के कामों को आप वीडियो देख कर ऑनलाईन सीख सकते हैं.
यूट्यूब के माध्यम से लोगों के मोबाईल पर पहुंच कर, कुछ 'शिक्षक' न सिर्फ़ आधारभूत शिक्षा ही दे रहे हैं बल्कि एक बेरोज़गार को रोज़गार भी दिला रहे हैं.

एग्ज़ाम फ़ीवर

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यू-ट्यूब पर ज़्यादातर वीडियो मनोरंजन आधारित होते हैं लेकिन शिक्षाप्रद वीडियो भी अब यहां आपको नज़र आने लगे होंगे.
ये वीडियो लोगों को सिर्फ़ शिक्षित ही नहीं कर रहे बल्कि उनको बेहतर स्किल भी दे रहे हैं और ऐसे ही कुछ नि:शुल्क यू-ट्यूब वीडियो चैनल आजकल लोकप्रिय हो रहे हैं.
ऐसा ही एक चैनल है 'एग्ज़ाम फ़ीवर' जिसे रोशनी मुखर्जी चलाती हैं और इस चैनल के 83 हज़ार सब्सक्राइबर हैं.
झारखंड के धनबाद ज़िले में पली-बढ़ी रोशनी मुखर्जी को बचपन से ही पढ़ाई से लगाव था और बैंगलूरू की एक आई टी कंपनी में विश्लेषक के तौर पर काम कर रही रोशनी ने 2011 में यू-ट्यूब पर 'एक्ज़ाम फ़ीवर' के नाम से चैनल बनाया.
लगभग हर दिन रोशनी इस चैनल पर दो वीडियो अपलोड करती हैं और अपने चैनल पर आने वाले छात्रों को विभिन्न विषयों के बारे में जानकारी देती हैं.
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रोशनी कहती हैं, "पढ़ाना मेरा पैशन है और आईटी सेक्टर में रहने के कारण मुझे पता था की इंटरनेट के माध्यम से ही कुछ करना है, आप मेरे चैनल को एक ऑनलाईन ट्यूशन कह सकते हैं."
आर्थिक पहलू पर बात करते हुए रोशनी कहती हैं, "एक्ज़ाम फ़ीवर मेरा जुनून है बिज़नेस नहीं पर इसे चलाने के लिए भी लागत लगती है इसलिए मैंने आर्थिक मदद के लिए एक नया ऑप्शन बनाया है."

के श्रीप्रिया कनिगोल्ला

कोयंबटूर में रहने वाली गृहणी श्रीप्रिया कनिगोल्ला बचपन से ही चित्रकला और कारीगरी में दिलचस्पी थी जिसमें शामिल है फैब्रिक पेंटिंग, माला बनाना, फूल बनाना.
अपनी शिल्प कला को युट्यूब चैनल में डालने के लिए पांच साल पहले प्रोत्साहन दिया उनके 16 वर्षीय बेटे ने, "मुझे तो कैमरा भी चलाना नहीं आता था लेकिन अब मैंने वीडियो की एडिटिंग के लिए सॉफ्टवेयर सीख लिया है और सारे वीडियो मैं खुद ही बनाती और अपलोड करती हूँ."
श्रीप्रिया के चैनल के लगभग 40 हज़ार सब्सक्रिप्शन हैं और अब तक उन्होंने 240 वीडियो अपलोड किए, उनकी कोशिश रहती है कि वो हर हफ़्ते करीबन 2 वीडियो यूट्यूब पर अपलोड करें.
2010 में शुरू किए इस चैनल के लिए वो कहती हैं, "पेंटिंग करना और क्राफ्ट बनाना मेरा शौक है और मुझे ख़ुशी है की लोग इसका लाभ उठा रहे हैं. कितने लोग इस कला के वीडियो को देखकर स्कूलों में सिखा रहे हैं. मुझे ख़ुशी है की मैं लघु उद्योग को बढ़ावा दे रही हूँ."
2012 में उनकी यूट्यूब के साथ पार्टनरशिप हुई और कुछ पैसे मिलना भी शुरू हो गए हैं और उनके अधिकतर दर्शक जर्मनी, अर्जेंटीना से है जो अक्सर इस कला से जुड़े सवाल पूछते रहते है.

मेक मी जीनियस

2010 में कुछ छात्रों द्वारा शुरू किया गया युट्यूब चैनल 'मेक मी जीनियस' बच्चों के लिए दिलचस्प एनीमेशन के ज़रिए विज्ञान के वीडियो अपलोड करता है.
5 साल से जारी इस चैनल के लगभग 70 हज़ार सब्सक्रिप्शन हैं.
हालांकि ये छात्र अपनी पहचान गुप्त रखना चाहते हैं क्योंकि वो इसे प्रसिद्धि के लिए नहीं कर रहे हैं.
नाम न बताने की शर्त पर इस चैनल के संस्थापक कहते हैं, "न हमें फ़ेम चाहिए, न पैसा. बस मैं इतना कह सकता हूँ कि हम कुल 5 लोग हैं."
इन छात्रों का लक्ष्य है की वो निस्वार्थ और मुफ़्त एजुकेशन दें और हर हफ़्ते वीडियो डालने वाले इस ग्रुप को अब यूट्यूब के विज्ञापन से पैसे मिलने लगे हैं.
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डायरेक्टर्स ऑफ बोर्ड की बैठक में 2025 तक रोबोट भी ले सकता है हिस्सा

नई दिल्ली : विज्ञान कथाओं के दायरे से निकलकर अब रोबोट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मशीनें कॉरपोरेट निदेशक मंडल में जगह पा सकती हैं। इसके अलावा बहुत उम्मीद है कि पहले रोबोटिक फार्मासिस्ट, 3डी-प्रिंटेड कार और इंप्लांटेबल मोबाइल फोन समेत 11 नई आधुनिक प्रौद्योगिकी 2015 में वास्तविकता बन सकती है।

डायरेक्टर्स ऑफ बोर्ड की बैठक में 2025 तक रोबोट भी ले सकता है हिस्सा
विश्व आर्थिक मंच के साफ्टवेयर एवं समाज के भविष्य पर वैश्विक एजेंडा परिषद द्वारा किए गए 800 कार्यकारियों के सर्वेक्षण में कहा गया ‘करीब आधे उत्तरदाताओं को उम्मीद है कि पहली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मशीन किसी कंपनी के निदेशक मंडल में 2025 तक होगी जबकि पहला 3डी-प्रिंटेड लीवर 2024 तक प्रवेश करेगा।’ इस सर्वेक्षण में कहा गया कि विश्व क्रांतिकारी बदलाव के दौर से गुजर रहा है और नयी प्रौद्येागिकी जल्दी ही वास्तविकता बन जाएगी जो कुछ साल पहले तक विज्ञान कथाओं तक सीमित थी।

सर्वेक्षण में शामिल 90 प्रतिशत लोगों ने कहा कि 2025 तक कम से कम 10 प्रतिशत लोग इंटरनेट से जुड़े कपड़े पहनेंगे। 75 प्रतिशत लोगों का मानना है कि अमेरिका में पहला रोबोट फार्मासिस्ट होगा जबकि 63 प्रतिशत का मानना है कि पहला ट्रैफिक लाइट मुक्त शहर होगा जबकि 45 प्रतिशत का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मशीन निदेशक मंडल में शामिल होगी।
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75 वर्ष से हवा के दम पर जिंदा प्रहलाद जानी



गुजरात के मेहसाणा जिले में रह रहे 83 वर्षीय प्रहलादजानी उर्फ माताजी चुनरी वाले (पुरुष साधक) पिछले 75 साल से बिना कुछ खाए-पिए रहने तथा दैनिक क्रियाओं को भी योग की शक्ति से रोक देने की वजह से चिकित्सा विज्ञान के लिए एक चुनौती बन गए हैं। इस वक्त उनकी उम्र 83 वर्ष है।

प्रहलाद जानी स्वयं कहते हैं कि यह तो दुर्गा माता का वरदान हैं, 'मैं जब 12 साल का था, तब कुछ साधू मेरे पास आए। कहा, हमारे साथ चलो, लेकिन मैंने मना कर दिया। करीब छह महीने बाद देवी जैसी तीन कन्याएं मेरे पास आयीं और मेरी जीभ पर अंगुली रखी। तब से ले कर आज तक मुझे न तो प्यास लगती है और न भूख।'
 
चराड़ा गांव निवासी प्रहलाद भाई जानी कक्षा तीन तक पढे़ लिखे हैं। जानी का दावा है कि दैवीय कृपा तथा योग साधना के बल पर वे करीब 75 वर्ष से बिना कुछ खाए पिए-जिंदा हैं।  
 
मल मूत्र भी नहीं बनता : इतना ही नहीं मल-मूत्र त्यागने जैसी दैनिक क्रियाओं को योग के जरिए उन्होंने रोक रखा है। स्टर्लिंग अस्पताल के न्यूरोफिजिशियन डॉ. सुधीर शाह बताते हैं कि जानी के ब्लैडर में मूत्र बनता है, लेकिन कहां गायब हो जाता है इसका पता करने में विज्ञान भी अभी तक विफल ही रहा है।
 
क्या कहता है विज्ञान?
डॉक्टरों का मानना है कि कोई भी वयस्क व्यक्ति बिना खाना खाए 30 से 40 दिन तक जीवित रह सकता है। लेकिन बिना पानी के पांच दिन से ज्यादा जिन्दा रहना सम्भव ही नहीं है। अभी तक उपलब्ध आंकणों के अनुसार 1981 में उत्तरी आयरलैण्ड में कैदियों ने भूख हड़ताल की थी, जिसमें 10 कैदियों की मृत्यु हो गई थी। उन कैदियों में सिर्फ एक व्यक्ति ही 73 दिन बिना खाए-पिए जिंदा रह पाया था।
 
कुल मिलाकर विज्ञान और आध्यात्म के बीच फंसी ये पहेली सुलझने के बजाय और उलझती जा रही है। प्रहलादभाई के मुताबिक दूसरे देशों के कई डॉक्टर भी उन्हें अपने यहां बुलाकर रिसर्च करना चाहते हैं, लेकिन वो अपना देश छोड़कर बाहर नहीं जाना चाहते।
सीसीटीवी की निगाह में रखा कई दिन : भारत के डॉक्टर 2003 और 2005 में भी प्रहलाद जानी की अच्छी तरह जांच-परख कर चुके हैं। इन जाचों के अगुआ रहे अहमदाबाद के न्यूरॉलॉजिस्ट (तंत्रिकारोग विशेषज्ञ) डॉ. सुधीर शाह ने कहा, 'उनका कोई शारीरिक ट्रांसफॉर्मेशन (कायाकल्प) हुआ है। वे जाने-अनजाने में बाहर से शक्ति प्राप्त करते हैं। उन्हें कैलरी (यानी भोजन) की जरूरत ही नहीं पड़ती। हमने तो कई दिन तक उनका अवलोकन किया, एक-एक सेकंड का वीडियो लिया। उन्होंने न तो कुछ खाया, न पिया, न पेशाब किया और न शौचालय गए।'

22 अप्रैल 2011 को प्रहलाद जानी डॉक्टरी जाँच-परख के लिए एक बार फिर अहमदाबाद के एक अस्पातल में 15 दिनों तक भर्ती थे। इस बार भारतीय सेना के रक्षा शोध और विकास संगठन का शरीरक्रिया। विज्ञान संस्थान DIPAS जानना चाहता था कि प्रहलाद जानी के शरीर में ऐसी कौन सी क्रियाएं चलती हैं कि उन्हें खाने-पीने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती।
 
तीस डॉक्टरों की एक टीम ने तरह-तरह की डॉक्टरी परीक्षाएं कीं। मैग्नेटिक रिजोनैंस इमेजींग मशीन से उन के शरीर को स्कैन किया। हृदय और मस्तिष्क क्रियाओं को तरह तरह से मापा। रक्त परीक्षा की, दो वीडियो कैमरों के द्वारा चौबीसो घंटे प्रहलाद जानी पर नजर रखी। जब भी वे अपना बिस्तर छोड़ते, एक वीडियो कैमरा साथ-साथ चलता। तत्पश्चात यह पाया कि प्रहलाद जानी का दावा एकदम सच है। वे सचमुच बिना खाना और पानी के न सिर्फ जिंदा हैं बल्कि पूरी तरह से स्वस्थ भी हैं।
 
इस दौरान हर आधे से एक घंटे में प्रहलाद जानी को फिजीशियन, कार्डियोलॉजिस्ट, गेस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट,एंडोक्रिनोलॉजिस्ट, डायबिटोलॉजिस्ट, यूरो सर्जन, आंख के डॉक्टर और जेनेटिक के जानकार डॉक्टरों की टीम के जरिए चेक किया जाता रहा और उनकी रिपोर्ट तैयार की जाती रही।
 
डॉ. शाह बताते हैं कि पहली बार माताजी का मुंबई के जे.जे. अस्पताल में परीक्षण किया गया था, लेकिन इस रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका। वे बताते हैं कि यह माताजी कभी बीमार नहीं हुए, उनकी शारीरिक क्रियाएं सभी सामान्य रूप से क्रियाशील हैं। चिकित्सक समय-समय पर उनका परीक्षण भी करते हैं, लेकिन ब्लड प्रेशर, हार्ट बीट आदि सभी सामान्य ही पाई गई हैं। चिकित्सकीय परीक्षण के दौरान डिस्कवरी चैनल ने भी उन पर एक लघु फिल्म तैयार की है। इसके अलावा डॉ. शाह ने भी माताजी के तथ्यों को केस स्टडी के रूप में अपनी वेबसाइट पर डालकर दुनिया के चिकित्सकों को इस पहेली को सुलझाने की चुनौती दी है, लेकिन फिलहाल तक कोई भी इस पहेली को नहीं सुलझा पाया है।
 
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. उर्मन ध्रूव बताते हैं कि जानी का शरीर पूरी तरह स्वस्थ है, चिकित्सा विज्ञान के समक्ष वे अब तक अबूझ पहेली बने हुए हैं। उनकी एक भी कोशिका में चर्बी का कोई अंश नहीं है। इसे दैवीय कृपा नहीं कहा जा सकता, लेकिन उनके शरीर में ऊर्जा का कोई अतिरिक्त स्रोत जरूर है। वैज्ञानिक इसे करिश्मा कहने से फिलहाल बच रहे हैं पर इतना जरूर मानते हैं कि प्रहलाद जानी आम इंसान से अलग हैं।
 
10 दिन की पड़ताल के बाद तीन सौ डॉक्टरों की टीम ने रिपोर्ट दी कि-
1. 10 दिन तक प्रह्लादभाई ने कुछ नहीं खाया, यहां तक की पानी भी नहीं पीया
2. 10 दिन बाद भी उनके शरीर के सभी अंग पहले की तरह काम कर रहे हैं
3. दिल की धड़कनों में कोई खास बदलाव नहीं आया
4. पेट की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में भी कुछ गड़बड़ी नहीं
5. दिमाग के एमआरआई में भी कुछ खास नहीं निकला
6. सीने का एक्स-रे भी सामान्य रहा
7. 10 दिन भूखे रहने पर कोई असर नहीं
8. हीमोग्लोबीन के स्तर में कोई खास फर्क नहीं पड़ा।
 
परिणाम आने की प्रतीक्षा : 
इस बार डीएनए विश्लेषण के लिए आवश्यक नमूने भी लिए गए। शरीर के हार्मोनों, एंज़ाइमों और ऊर्जादायी चयापचय (मेटाबॉलिज़्म) क्रिया संबंधी ठेर सारे आंकड़े जुटाए गए। उनका अध्ययन करने और उन्हें समझने-बूझने में दो महीने तक का समय लग सकता है।
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी इसमें रुचि दिखाई थी। यदि माताजी के ऊर्जा का स्रोत का पता चल जाता है तो शायद यह अंतरिक्ष यात्रियों एवं सेना के जवानों के लिए कारगर साबित होगा। यदि जानी के ऊर्जा स्रोत का पता चल जाता है तो चिकित्सकों का दावा है कि इससे अंतरिक्ष यात्रियों तथा सेना के जवानों की खाद्य समस्या हल हो सकती है साथ ही अकाल एवं भुखमरी जैसी समस्या को भी समाप्त किया जा सकता है।

अगर इसके पीछे प्रहलादभाई के शरीर में मौजूद कोई खास जीन काम कर रहा है तो उसे जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से खोजना होगा। अगर ऐसा हो गया तो-
1. दुनियाभर में भुखमरी की समस्या से निपटा जा सकता है।
2. इंसान के बीमार शरीर को स्वस्थ किया जा सकता है।
3. बुढ़ापे को रोकने में मदद मिल सकती है।
4. बर्फीले पहाड़ों पर रह रहे सैनिकों को मदद मिलेगी।
5. अंतरिक्ष यात्रा पर गए लोगों को खाने का सामान साथ नहीं ले जाना पड़ेगा।
 
अंत में जानिए भूखे रहने का रहस्य...


प्रहलाद जानी अपनी आयु के आठवें दशक में भी नियमित रूप से योगाभ्यास करते हैं और ध्यान लगाते हैं। योगी-ध्यानी व्यक्तियों में चमत्कारिक गुणों की कहानियों पर भारत में लोगों को आश्चर्य नहीं होता, पर विज्ञान उन्हें स्वीकार नहीं करता।

आज भी भारत की धरती पर ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने कई वर्षों से भोजन नहीं किया, लेकिन वे सूर्य योग के बल पर आज भी स्वस्थ और जिंदा हैं। भूख और प्यास से मुक्त सिर्फ सूर्य के प्रकाश के बल पर वे जिंदा हैं।
 
प्राचीनकाल में ऐसे कई सूर्य साधक थे, जो सूर्य उपासना के बल पर भूख-प्यास से मुक्त ही नहीं रहते थे बल्कि सूर्य की शक्ति से इतनी ऊर्जा हासिल कर लेते थे कि वे किसी भी प्रकार का चमत्कार कर सकते थे। उनमें से ही एक सुग्रीव के भाई बालि का नाम भी लिया जाता है। बालि में ऐसी शक्ति थी कि वह जिससे भी लड़ता था तो उसकी आधी शक्ति छीन लेता था।
 
वर्तमान युग में प्रहलाद जानी इस बाद का पुख्ता उदाहरण है कि बगैर खाए-पीए व्यक्ति जिंदगी गुजार सकता है। गुजरात में मेहसाणा जिले के प्रहलाद जानी एक ऐसा चमत्कार बन गए हैं जिसने विज्ञान को चौतरफा चक्कर में डाल दिया है। वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर ऐसा कैसे संभव हो रहा है? sabhar :http://www.aajtak24.in/

 

तो क्या रोबोट भी हो जाएंगे धार्मिक..?

तो क्या रोबोट भी हो जाएंगे धार्मिक..?

वैज्ञानिकों में इस बात को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि क्या कृत्रिम बुद्धि से बने एंड्रॉयड्‍स (रोबो) भी धार्मिक हो सकते हैं। उनका कहना है कि संभव है कि एक दिन रोबो की कोई धर्म अपना लें और इसका अर्थ है कि वे मानवता की सेवा कर सकते हैं और इसे नष्ट करने की कोशिश नहीं करेंगे। लेकिन इसका उल्टा भी सच हो सकता है और संभव है कि धार्मिक होने से उनकी ताकत में बढ़ोतरी हो जाए।

मैसाचुसेट्‍स इंस्टीट्‍यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के मर्विन मिंस्की का कहना है कि किसी दिन कम्प्यूटर्स भी नीति शास्त्र को विकसित कर सकते हैं, लेकिन इस बात को लेकर चिंताएं हैं कि इन मशीनों को लेकर सारी दुनिया में धार्मिक संघर्ष भी पैदा हो सकता है।  
 
डेलीमेल डॉटकॉम के लिए एल्ली जोल्फागारीफार्ड का कहना है कि वैज्ञानिक मानते हैं कि कृत्रिम बुद्धि (आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस) दशकों की अपेक्षा वर्षों में एक वास्तविकता हो सकती है। हाल ही में एलन मस्क ने चेतावनी दी है कि आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस मनुष्यता के लिए परमाणु हथियारों की तरह से घातक हो सकती है।

डेलीमेल डॉटकॉम में डिलन लव ने हाल ही में एक सारगर्भित रिपोर्ट पेश की थी जिसमें ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई थी। लेकिन मॉर्मन ट्रांसह्यूमनिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष, लिंकन कैनन ने लव से कहा कि कम्प्यूटर साइंस में ऐसे कोई नियम नहीं हैं कि सॉफ्टवेयर के लिए धार्मिक विश्वास रखना संभव होगा।

उनका कहना था कि धर्म विरोधियों के मध्य कुछ ऐसी भोलीभाली आवाजें हैं जो कि एक मशीनी बुद्धि और धार्मिक विश्वासों के बीच तकनीकी असंगति की कल्पना करते हैं। इंस्टीट्‍यूट फॉर एथिक्स एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज से जुड़े एक स्कॉलर, जॉन मेसरली, का कहना है कि ' मैं मानता हूं कि आप कृत्रिम बुद्धि को लगभग किसी भी चीज पर विश्वास करने के लिए प्रोग्राम कर सकते हैं। वहीं कैनन का कहना है कि धार्मिक सुपरइंटेलीजेंस या तो सबसे अच्‍छी या सबसे खराब सिद्ध हो सकती है। उनका मानना है कि धर्म मात्र एक ताकत है और इसका उपयोग अच्‍छे या बुरे के लिए किया जा सकता है।

पर जानकारों का कहना है कि धर्म पहले से ही अपने आप में सहिष्णु नहीं है और जिस धर्म के पास सुपरइंटेलीजेंस होगी, वह तो और भी कम ‍सहिष्णु होगा। इन सवालों के बीच एक और प्रश्न उठा है कि क्या कृत्रिम बुद्धि की भी कोई आत्मा (सोल) हो सकती है? जबकि स्वीडिश दार्शनिक निक बॉस्ट्रम का कहना है कि 'सबसे बड़ा डर इस बात का है कि जैसे-जैसे रोबो अधिक स्मार्ट होते जाएंगे, वे एक ऐसा रास्ता चुनेंगे जोकि उनके अस्तित्व को निरंतर बने रहने को सुनिश्चित करता हो और इसका अर्थ मनुष्यता का विनाश हो सकता है।' पर प्रसिद्ध कॉमेडियन ड्रंकन ट्रसेल और रेवरेंड क्रिस्टोफर बेनेक मानते हैं कि धर्म के कारण रोबो मनुष्यता के साथ-साथ रह सकते हैं।

पिछले महीने ही एलन मस्क ने एक हजार रोबोटिक्स विशेषज्ञों को चेताया कि स्वचालित हथियार कल के कलाश्निकोव साबित होंगे। इससे पहले प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग भी कह चुके हैं कि जो हथियार सार्थक मानवीय नियंत्रण से बाहर हो सकते हों, उन पर तत्काल प्रतिबंध लगा देना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु हथियारों की तरह सभी रोबो हथियार सहज, सुलभ तरीकों से उपलब्ध हो सकते हैं और इनका कच्चा माल हासिल करना भी मुश्किल नहीं होगा। और अंतत: यह तकनीक वैश्विक हथियारों की दौड़ को बढ़ावा दे सकती है तथा ऐसे हथियार हत्याओं जैसे काम के लिए आदर्श साबित होंगे।
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टेलीपैथी' तकनीक पर काम रहा है फेसबुक


मल्‍टीमीडिया डेस्‍क। क्‍या हो, यदि आप अपने फेसबुक पेज की वॉल पर कुछ पोस्‍ट करने के बारे में सोचे यह वह आपके टाइप किए बगैर ही पोस्‍ट हो जाए। यह हवा-हवाई बात नहीं है, बल्कि फेसबुक के संस्‍थापक मार्क जकरबर्ग की योजना का हिस्‍सा है।
वो एक नई तकनीक पर काम कर रहे हैं। दरअसल मार्क फेसबुक को टेलीपैथी से जोड़ना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि लोगों को अपने फेसबुक पेज पर कुछ भी पोस्‍ट करने, लाइक करने या शेयर करने के लिए कम्‍प्‍यूटर, लैपटॉप, स्‍मार्टफोन या टैबलेट की जरूरत ही न पड़े। यह सब केवल सोचने से हो जाए।
मार्क अपने फेसबुक पेज पर नियमित रूप से लोगों के सवालों के जवाब देते हैं। हाल ही में उनसे एक सवाल पूछा गया कि भविष्‍य का फेसबुक कैसा होगा। इस पर उन्‍होंने अपनी टेलीपैथी योजना के बारे में बताया।
मार्क के मुताबिक वो चाहते हैं कि लोग अपनी भावनाओं को टेलीपैथी के जरिए फेसबुक पर शेयर कर सकें। इसके लिए काफी उन्‍नत तकनीक की जरूरत पड़ेगी, जिस पर कंपनी रिसर्च कर रही है।
उन्‍होंने बताया कि इसके लिए अत्‍यधिक उन्‍नत तकनीक के साथ ही खास किस्‍म के डिवाइसेस की जरूरत भी पड़ेगी, जो इंसानी भावनाओं तथा विचारों को शब्‍दों की शक्‍ल देकर फेसबुक वॉल पर पोस्‍ट कर सके।
गौरतलब है कि हाल ही में भारत में फेसबुक यूजर्स की संख्‍या 12.5 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है। वहीं पूरी दुनिया में यह आंकड़ा अरबों में पहुंच चुका है
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बेंगलुरू में बन रहा ऐसा रोबोट, 'मां' जैसा रखेगा ख्याल




बेंगलुरू। जिस तरह मां अपने बच्चे का पूरा ख्याल रखती है, उसी तरह भारत में अनोखा रोबोट बन रहा है, जो अपने मालिक की हर जरूरत को पूरा करेगा। बेंगलुरू स्थित तकनीकी फर्म नोशन इंक ने इस 'मदर' रोबोट को ईव नाम दिया है। यह 2018 से बाजार में उपलब्ध हो जाएगा। इसमें आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस होगी, यानी यह अपने दिमाग का इस्तेमाल कर सकेगा। कंपनी के सीईओ रोशन श्रवण के अनुसार, ईव में मातृत्व का भाव है।
ऐसा होगा यह अनोखा रोबोट
  • ईव का आकार गोल और वजन करीब 100 ग्राम है।
  • यह मशीन 15 मिनट तक उड़ान भरकर 2 किमी दूरी तय करने की क्षमता रखती है।
  • आर्टिफिशियल इंजेलिजेंस की मदद से यह इनसानों की तरह रोज-रोज के कामों और संदर्भों को समझ सकता है।
  • आर्टिफिशियल इंजेलिजेंस का फायदा यह होगा कि आम इनसान भी इस मशीन से बात करके अपनी जरूरत के अनुसार एप्लिकेशन बना सकेंगे। उन्हें लंबे प्रोग्राम लिखने की जरूरत नहीं होगी।
  • कंप्युटर के साथ बात करने की कोडिंग की समस्याएं यहां हल कर ली गई हैं।
  • डिवाइस में इसके मालिक के जीवन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी होगी, लेकिन इसे कहीं साझा नहीं किया जाएगा, क्योंकि यह मशीन किसी सर्वर से नहीं जुड़ी होगी।
  • ईव से जुड़े दो अहम पहलुओं - मुवमेंट और विजन पर माइक्रोसॉफ्ट काम कर रहा है।
  • इसमें मल्टीपल रोटेटिंग कैमरे होंगे। इनकी मदद से 360 डिग्री विजन प्राप्त हो सकेगा।
  • कोई आपको विजिटिंग कार्ड देता है तो यह उसका विवरण अपनी मेमोरी में फीड कर लेगा और जरूरत पड़ने पर तुरंत बता देगा।
  • आप कार चला रहे हैं तो यह डैशबोर्ड पर बैठकर हर हलचल को रिकॉर्ड करेगा।
अभी कांच को नहीं समझ पाती है ईव
श्रवण ने बताया कि अभी कुछ तकनीकी खामियों पर काम किया जा रहा है। मसलन- यह रोबोट अभी यह नहीं समझ पा रहा है कि कांच के आरपास नहीं जाया जा सकता है। कोशिश की जा रही है कि यह रोबोट अपने-आप खुद को चार्ज भी कर ले।
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तकनीकी का जादू








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बुढ़ापे का इलाज रोबॉट्स टेक्नॉलजी

50 सालों में रोबॉट्स से सेक्स करने लगेंगे इंसान, प्यार में भी पड़ सकते हैं: एक्सपर्ट


इंसान जल्द ही रोबॉट्स के साथ यौन संबंध बना सकेंगे। यह दावा एक वैज्ञानिक ने किया है। उनका कहना है कि आने वाले 50 सालों के अंदर रोबॉट से सेक्स हकीकत बन जाएगा।

यूनिवर्सिटी ऑफ संडरलैंड से ताल्लुक रखने वालीं डॉक्टर हेलन ड्रिस्कल ने कहा कि टेक्नॉलजी अडवांस होने से मशीनों के साथ हमारे इंटरैक्ट करने का तरीका भी बदल जाएगा। सेक्स की साइकॉलजी और रिलेशनशिप का ज्ञान रखने वालीं डॉक्टर ड्रिस्कल ने कहा, 'सेक्स टेक्नॉलजी तेजी से प्रगति कर रही है और 2070 तक शारीरिक रिश्ते बनने लगेंगे।'

डॉक्टर ने कहा, 'आप अभी से ही ऑनलाइन एक इंसान जैसे सेक्स टॉय को ऑर्डर कर सकते हैं। आने वाले सालों में रोबॉटिक, मोशन सेसिंग और इंटरैक्टिव टेक्नॉलजी और बेहतर हो जाएगी। इस टेक्नॉलजी की मदद से ये पुतलों जैसे सेक्स टॉय जिंदा हो जाएंगे।'

डॉक्टर ड्रिस्कल ने कहा, 'हो सकता है कि लोग अपने वर्चुअल रिऐलिटी पार्टनर्स से मोहब्बत करने लगें।' गौरतलब है कि हाल ही में आई फिल्म 'हर' (Her) में भी इस विषय को उठाया गया था, जिसमें कैरक्टर ऑपरेटिंग सिस्टम से प्यार करने लगता है।

डॉक्टर ने कहा, 'बहुत संभव है कि लोग अपने ऐसे रोबॉट पार्टनर से प्यार करने लगें। क्योंकि लोग तो कई बार ऐसे काल्पनिक पात्रों से प्यार करने लगते हैं, जिनसे वे कभी मिल नहीं सकते।'

इस कंपनी को अब रोबॉट ही चलाएंगे

अब तक हम यह कल्पना ही करते रहे हैं कि एक दिन इंसान के सभी काम रोबॉट करेगा, लेकिन चीन में यह सच होने वाला है। चीन के दोंगगुयान की कंपनी शानगियिंग प्रिसिसन टेक्नॉलजी में किसी भी काम के लिए आने वाले दिनों में इंसान की जरूरत ही नहीं होगी । एक वर्कशॉप के दौरान सेलफोन बनाने वाली कंपनी ने बताया कि 10 प्रॉड्क्शन लाइनस में 60 रोबॉट तैनात किए गए हैं। हर लाइन में सिर्फ तीन कर्मचारी काम की चेकिंग के लिए रखे गए हैं।

लेकिन आने वाले दिनों में कंपनी में ट्रकों का संचालन, वेयरहाउसिंग और मशीनरी काम समेत सारा काम कंप्यूटर द्वारा संचालित रोबॉट्स के जरिए ही होगा। इन रोबोटों को दिशानिर्देश देने के लिए कुछ ही इंसानी कर्मचारियों की जरूरत होगी। टेक्निकल स्टाफ के लोग अपनी सीट पर बैठे ही सेंट्रल कंट्रोल सिस्टम के जरिए कंपनी के पूरे काम पर निगरानी रखेंगे।

पीपल्स डेली के मुताबिक कुछ महीने पहले कंपनी में पूरे काम के लिए 650 कर्मचारी थे, लेकिन एक रोबॉट छह से आठ लोगों तक का काम कर सकता है। ऐसे में फिलहाल कंपनी में सिर्फ 60 कर्मचारी ही बचे हैं। शानगियिंग प्रिसिसन टेक्नॉलजी के जनरल मैनेजर लुओ विकियांग ने बताया कि आने वाले दिनों में हमें सिर्फ 20 लोगों की ही जरूरत होगी।

कंपनी के प्रेसिडेंट शेन किक्सिंग के मुताबिक यह 'रोबॉट रिप्लेस ह्यूमन प्रोग्राम' का पहला चरण है। भविष्य में कंपनी में रोबॉट्स की संख्या 1,000 के करीब होगी और कंपनी का 80 फीसदी काम रोबोट के जरिए ही होगा। प्रशिक्षित कर्मियों के मुकाबले यह रोबॉट काफी तेजी से काम कर सकेंगे। कंपनी की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक रोबॉट्स को काम पर लगाए जाने के बाद से डिफेक्ट रेट में काफी कमी आई है। इसके अलावा प्रॉडक्शन भी आठ हजार पीस से बढ़कर 21 हजार तक जा पहुंचा है।

इंसानों के साथ भी शारीरिक रिश्ते बना सकेंगे रोबॉट, पैदा करेंगे बच्चे!


दन
आपने रजनीकांत की रोबॉट फिल्म तो देखी होगी। इसमें रोबॉट बने रजनीकांत का उसके साथी मजाक बनाते हैं कि वह सेक्स नहीं कर सकता, इसलिए वह इंसानों जैसा नहीं है। लेकिन जरा सोचिए क्या हो, अगर रोबॉट भी सेक्स करने लगें और बच्चे पैदा करने लगें। हालांकि इंजीनियर और नोवेलिस्ट जॉर्ज जैरकैडाकिस का मानना है कि अगले 20-30 साल में ऐसा संभव है। जॉर्ज के मुताबिक, भविष्य में रोबॉट न सिर्फ दूसरे रोबॉट के साथ सेक्स कर सकेंगे, बल्कि इंसानों के साथ भी शारीरिक रिश्ते बना सकेंगे।

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस इंजीनियर जॉर्ज का मानना है कि ऐसा करने से बेहतर रोबॉट पैदा होंगे। उनके मुताबिक, रोबॉट के इंसानों के साथ संबंध बनाने से हाइब्रिड प्रजाति विकसित होगी। रोबॉट और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के विशेषज्ञों के अनुसार, यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं है बल्कि वर्तमान में ही ऐसे रिसर्च और तकनीक उपलब्ध हैं, जिससे ऐसा संभव हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों को भी इसके बुरे प्रभाव को लेकर चिंता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर रोबॉट इंसानों से ज्यादा पैदा होने लगे, तो वह समय बुरे सपने से कम नहीं होगा।

बच्चे पैदा नहीं, प्रिंट होंगे: रोबॉट के विकास से जुड़े वैज्ञानिकों की अगर मानें तो यह रोबॉट बच्चे पैदा नहीं प्रिंट करेंगे। शेफील्ड यूनिवर्सिटी के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और रोबॉटिक्स के प्रफेसर नोएल शार्की के अनुसार, रोबॉट 3-डी तकनीक का इस्तेमाल कर बच्चों को जन्म दे सकते हैं। नोएल के अनुसार, रोबॉट अपने सॉफ्टवेयर में बदलाव लाकर सेक्स के दौरान अपनी खूबियों को बढ़ा या एक्सचेंज कर सकते हैं। उनके बच्चों में इन खूबियों का मिश्रण देखने को मिल सकता है। इन रोबॉट के पास कार्बन और सिलिकन से बना डिजिटल दिमाग होगा।


वायरस से भी होगी सुरक्षा: विशेषज्ञों का तो यहां तक मानना है कि रोबॉट द्वारा सेक्स करने से उनके सॉफ्टवेयर वायरस से भी बचे रहेंगे। ठीक उसी तरह जैसे सेक्स करने से मनुष्यों को कई संक्रमित बीमारियां नहीं होतीं।

बुढ़ापे का इलाज: वैज्ञानिकों के अनुसार इन रोबॉट-इंसानों के हाइब्रिड की दिशा में हो रही रिसर्च से बुढ़ापे के बारे में भी और जानकारी मिल सकती है। यह रिसर्च इंसानी शरीर को जानने की दिशा में लाभदायक होगी और यह जाना जा सकेगा कि बुढ़ापे के लिए जिम्मेदार अल्टशाइमर्त्स बीमारी का असर इंसानी दिमाग पर किस तरह और कितना होता है। प्रफेसर वार्विक ने कहा कि रोबॉट का एक दूसरे से सेक्स करना और रोबॉट पैदा करना सामाजिक स्वीकार्यता पर भी निर्भर करेगा। 20 साल के बाद जब यह पूरी तरह से संभव हो जाएगा तब इस तकनीक को स्वीकार करने मे नैतिक दिक्कते आएंगी। वैसे वैज्ञानिकों की इस रिसर्च से काफी उम्मीदें हैं। वैज्ञानिका जॉर्ज डायसन का मानना है कि ऐसे रोबॉट शनि के चांद एनक्लेडस से मंगल ग्रह पर बर्फ लाने में मदद कर सकते हैं।

गुजरात में बनाया जा रहा सुपर ह्यूमन 'रजनीकांत'

रजनीकांत के सुपर ह्यूमन जोक्स अब रिऐलिटी में तब्दील होने वाले हैं। फिल्म 'रोबॉट' में रजनीकांत के एक ख्वाब को जल्द ही आप जल्द ही साकार होते देखेंगे। देश का पहला सुपर ह्यूमन रोबॉट लैब से निकलकर असली दुनिया में कदम रखने वाला है।

गुजरात फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी का दावा है कि यहां देश का पहला इंटरैक्टिव और मल्टी परपस रोबॉटिक सूट और रोबॉट बनाया जा रहा है, ठीक वैसा ही जैसा रजनीकांत की फिल्म में आपने देखा था। इस रोबॉटिक सूट को पहनकर कोई भी इंसान 200 किलोग्राम का वजन भी आसानी से उठा सकेगा।

दरअसल, इंस्टीट्यूट ऑफ बिहेविरल साइंस और गुजरात फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी का रिसर्च सेंटर एक्सॉनेट साथ मिलकर एक ऐसे प्रॉजेक्ट पर काम कर रहे हैं, जिसका नाम बायोरोबॉटिक्स रखा गया है।

गुजरात फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी के अधिकारियों का कहना है कि प्रोटोटाइप तैयार किया जा चुका है। अब इसके ब्रेन इंटरफेस और सिक्यॉरिटी सिस्टम पर काम किया जा रहा है। उनका मानना है कि पिछले साल शुरू हुआ यह प्रॉजेक्ट 2017 तक पूरा कर लिया जाएगा। योजना यह भी कि डीआरडीओ के साथ मिलकर भविष्य में इसका इस्तेमाल डिफेंस सेक्टर को भी मजबूत करने के लिए किया जाए।

क्या है यह रोबॉट
दरअसल, इन रोबॉटिक सूट्स या फ्रेम्स को 'एक्सोस्केलिटन' कहते हैं और इसमें लगे मोटर्स और अत्याधुनिक सेंसर्स किसी भी इंसान की क्षमता को कई गुना बढ़ा देते हैं। अगर आपने हॉलिवुड फिल्म 'आयरनमैन' देखी है, तो यह सूट काफी हद तक वैसा ही होगा। ये रोबॉट्स न सिर्फ देखेंगे, बल्कि इनमें सुनने और समझने की भी क्षमता होगी।

किन कामों में होगा मददगार
इन सूट्स और रोबॉट्स की मदद रोजाना के काम में तो लिया ही जा सकेगा, साथ ही ये भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय फायरफाइटर्स का काम भी करेंगे। इसके अलावा, केमिकल लीक पर काबू पाने के लिए और बम डिस्पोज करने में भी इनकी मदद ली जा सकेगी। इतना ही नहीं, इनका इस्तेमाल अस्पतालों, फैक्ट्रियों और घरों में भी किया जा सकेगा। आपको जानकर हैरानी होगी कि रोबॉटिक सूट्स को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि लंबी सर्जरी करने वाले डॉक्टर्स इसे पहनकर आसानी से बिना थके सर्जरी कर पाएंगे।


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अंतरिक्ष में मिला 'घोस्ट पार्टिकल', एलियन्स के होने का सबूत

ज़ी मीडिया ब्यूरो
लंदन :  शोधकर्ताओं ने अंतरिक्ष से जुटाए गए मलबे में एक छाया की तरह का 'घोस्ट पार्टिकल' खोजा है, इससे अंतरिक्ष में एलियन की मौजूदगी की संभावना बढ़ गई है।
बकिंघम एवं शेफील्ड यूनिवर्सिटी में एस्ट्रोबॉयलोजी केंद्र के शोधकर्ताओं ने एक छोटा सा अंश खोजा है और इसका नाम उन्होंने 'लिविग बैलून' दिया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका उपयोग कभी एलियन के सूक्ष्म शारीरिक बनावट को ले जाने के लिए किया गया होगा। शोधकर्ताओं का दावा है कि 'घोस्ट पार्टिकल' यह साफ इशारा करता है कि अंतरिक्ष में एलियन की मौजूदगी है।
शोधकर्ता मिल्टन वेनराइट को कहना है कि ढूंढा गया पार्टिकल जाली वाले दुपट्टे से मिलता-जूलता है जिसकी चौड़ाई मनुष्य के बाल जैसी है। इसे पृथ्वी के समताप मंडल (स्ट्रेटस्फीयर) के 27 किलोमीटर ऊपर पाया गया। यह पार्टिकल अपने प्रकृति में जैविक है औऱ यह कार्बन एवं ऑक्सीजन से बना है।  
वेनराइट के मुताबिक वे इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि इस अंतरिक्ष के वातावरण में यह 'घोस्ट पार्टिकल' एक 'लिविंग बैलून' है जिसे एक एलियन एक जगह से दूसरे जगह जाने में इस्तेमाल कर सकता है। वेनराइट का मानना है कि इस तरह का पार्टिकल अब तक नहीं मिला है। (एजेंसी इनपुट के साथ)

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मिला हमेशा जवान रहने का नुस्खा

एक प्रोफेसर का दावा है कि उसने दक्षिण जापान के लोगों की लंबी उम्र का राज ढूंढ निकाला है. यह राज एक खास पौधे के अर्क में छुपा है, जिसे स्थानीय लोग "गेटो" के नाम से जानते हैं.
ओकिनावा की रियूक्यूस यूनिवर्सिटी में कृषि विज्ञान के प्रोफेसर शिंकिचि तवाडा ने दक्षिण जापान के लोगों की लंबी उम्र का राज ढूंढ निकाला है. तवाडा को विश्वास है कि गहरे पीले-भूरे से रंग का दिखने वाला एक खास पौधे "गेटो" का अर्क इंसान की उम्र 20 फीसदी तक बढ़ा सकता है. तवाडा कहते हैं, "ओकिनावा में कई दशक से लंबी उम्र तक जीने का दर दुनिया में सबसे ज्यादा रहा है और मुझे लगता है कि इसका कारण जरूर यहां के परंपरागत खान पान में ही छुपा है."
काइको उहारा 64 साल की हैं लेकिन अपनी उम्र से कहीं कम की दिखती हैं. इसका राज वह गेटो को बताती हैं. काइको अपनी दुकान में ऐसे सौंदर्य उत्पाद भी बेचती हैं जिनमें गेटो ही मुख्य घटक होता है, "मैं गेटो का काढ़ा पीती हूं, जो मुझे तरो ताजा कर देता है, और मैं इस पौधे के अर्क को पानी में घोल कर लगाती हूं जिससे झुर्रियां भी कम होती हैं."
दक्षिण जापान में जीते हैं लोग काफी लंबी उम्र
पौधे में छुपा है रहस्य
तवाडा पिछले 20 साल से अदरक के परिवार के एक खास पौधे का अध्ययन कर रहे हैं जिसे स्थानीय लोग "गेटो" के नाम से जानते हैं. इसे विज्ञान की भाषा में एल्पिनिया जेरूंबेट, पिंक पोर्सिलेन लिली या शेल जिंजर के नाम से भी जाना जाता है. तवाडा को लगता है कि उनके इतने लंबे शोध का फल अब मिल गया है. कुछ समय पहले ही कीड़ों पर किये एक प्रयोग में उन्हें उत्साहजनक नतीजे मिले जब उन्होंने देखा कि जिन कीड़ों को रोज गेटो की खुराक दी जा रही थी, उनकी उम्र अन्य कीड़ों के मुकाबले 22.6 प्रतिशत ज्यादा रही.
बड़ी हरी पत्तियों, लाल फलों और सफेद फूलों वाला यह पौधा सदियों से ओकिनावा के खानपान का खास हिस्सा रहा है और अब भी जंगली पौधे की तरह उगता है. तवाडा कहते हैं कि पहले लोगों को भले ही यह नहीं पता था कि इसमें रेसवेराट्रॉल नाम का एंटीऑक्सिडेंट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. लेकिन वे यह जरूर जानते थे कि यह पौधा उनकी सेहत के लिए फायदेमंद है. तकाडा बताते हैं, "परंपरागत रूप से ओकिनावा के लोग जानते थे कि जाड़ों में बनाया जाने वाला एक खास व्यंजन, मुची, जिसे चावल के पेस्ट को गेटो की पत्ती में लपेट कर बनाया जाता था, सर्दी से बचाने के साथ साथ ताकत भी देती थी."
दुनिया का सबसे बुजुर्ग आदमी जापान का है
'फास्ट फूड की बढ़ती ललक'
लेकिन ओकिनावा में भी चीजें बहुत बदल गई हैं. परंपरागत खानपान की चीजें जिसमें स्थानीय सब्जियों, मछलियों और समुद्री शैवालों की अधिकता होती थी, उनकी जगह अब स्टेकहाउस और बर्गर बेचने वाली दुकानें लेती जा रही हैं. ओकिनावा द्वीप समूह की राजधानी नाहा की सड़कें ऐसी दुकानों से भरती जा रही हैं.
ओकिनावा की महिलाएं आज भी बहुत लंबा जीवन जी रही हैं. सत्तासी साल की औसत आयु वाली इन महिलाओं की जीने की दर अब भी जापान में सबसे लंबी उम्र की सूची में काफी ऊपर है. लेकिन पुरूष 79.4 वर्ष की औसत आयु के साथ इस सूची में नीचे आ गए हैं और राष्ट्रीय औसत से भी कम है. और तो और इस द्वीप समूह में पुरूषों में मोटापे की दर जापान में सबसे ऊंची है. तवाडा कहते हैं, "आजकल लोग फास्टफूड बहुत खाते हैं, लंबे जीवन की प्रत्याशा कम हो रही है. समय आ गया है कि अपने क्षेत्र के खानपान की परंपराओं से दुबारा जुड़ा जाए."
गेटो का बढ़ता कोरोबार
गेटो के स्वास्थ्य से जुड़े फायदे धीरे धारे लोगों को पता चल रहे हैं. तवाडा के रिसर्च के इर्द गिर्द एक पूरा कुटीर उद्योग विकसित हो रहा है. शहर के थोड़ा बाहर इसामु कीना ने पूरे खेत में गेटो उगाया है. उनकी कंपनी रिच ग्रीन इस क्षेत्र में गेटो की सबसे बड़ी उत्पादक है. इसामु कहते हैं, "हमें ओकिनावा पर सीमित रहने की कोई जरूरत नहीं है. हम इसे दुनिया के कोने कोने तक पहुंचाना चाहते हैं."
वहीं अपनी प्रयोगशाला में काम करते तवाडा को लगता है कि लोगों ने अब इस पौधे के महत्व को समझना शुरू कर दिया है. उन्हें लगता है कि आने वाले समय में यह ओकिनावा और पूरी दुनिया को भी काफी बदल देगा, "आज गेटो का इस्तेमाल सिर्फ सुंदरता बढ़ाने के लिए किया जा रहा है. लेकिन यह इसका सिर्फ एक उपयोग है और मुझे लगता है कि जल्द ही गेटो का इस्तेमाल दवाइयों और अन्य क्षेत्रों में होने लगेगा. मैं उम्मीद करता हूं कि एक दिन गेटो पूरे द्वीप की अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाएगा."
आरआर/आईबी (एएफपी)

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जब सबको पता होगा हमारे बारे में

कल्पना कीजिए एक दुनिया की जहां निजता जैसी कोई चीज नहीं होगी. मच्छर के साइज का एक रोबोट आए और बिना किसी अदालती आदेश के आपका डीएनए चुरा ले जाए. ऐसा कुछ सच होने वाला है. शुरुआत हो चुकी है.
आप खरीदारी के लिए जाएं और दुकानों को पहले से ही पता हो कि आपकी खरीदने की आदतें कैसी हैं. भविष्य की दुनिया की ऐसी कई तस्वीरें हार्वर्ड के कुछ प्रोफेसरों ने दावोस के विश्व आर्थिक फोरम में खींची. यहां दुनिया भर से आए राजनीतिक और आर्थिक जगत के चोटी के प्रतिनिधियों को बताया गया कि अब व्यक्तिगत निजता जैसी कोई धारणा नहीं रही. हार्वर्ड के कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर मार्गो सेल्टजर ने कहा, "आपका आज में स्वागत है. हम उस दुनिया में पहुंच चुके हैं. जिस निजता को हम अब तक जानते आए हैं, वह अब संभव नहीं है."
जेनेटिक्स के क्षेत्र में शोध करने वाले एक अन्य हार्वर्ड प्रोफेसर सोफिया रूस्थ ने कहा कि इंसान की व्यक्तिगत जेनेटिक सूचना का सार्वजनिक क्षेत्र में जाना अब अपरिहार्य हो गया है. रूस्थ ने बताया कि खुफिया एजेंटों को विदेशी राजनेताओं की जेनेटिक जानकारी चुराने को कहा जा रहा है ताकि उनकी बीमारियों और जिंदा रहने के समय के बारे में पता चल सके. ये जानकारियां राजनीति को निर्धारित कर सकती हैं. ऐसे सोचिए कि अगर तब मोहम्मद अली जिन्ना की बीमारी के बारे में पता होता तो शायद भारत का विभाजन नहीं होता.
जेनेटिक जानकारियां लोगों के लिए समस्या भी पैदा कर सकती हैं. सेल्टजर एक ऐसे विश्व की कल्पना करती हैं जहां सरकारों या इंश्योरेंस कंपनियों के मच्छर के आकार वाले रोबोट लोगों का डीएनए जुटाएगें या चुराएंगे. इस तरह निजता का हनन आम बात हो जाएगा. सेल्टजर कहती हैं, "ऐसा नहीं है कि यह होगा, ऐसा हो रहा है, हम आज जासूसी करने वाले राज्य में रह रहे हैं."
राजनीतिशास्त्री जोसेफ नाय ने कंप्यूटर में जानकारी को इंक्रिप्ट करने और सरकार को हर सूचना को देखने की अनुमति देने पर चल रही बहस के बारे में कहा, "सरकारें संचार में पिछला दरवाजा खुला रखने की बात कर रही हैं ताकि आतंकवादी जासूसी होने के डर के बिना संवाद न कर सकें." नाय ने कहा कि समस्या यह है कि अगर सरकारें ऐसा कर सकती हैं तो अपराधी भी कर सकते हैं. उन्होंने सवाल पूछा, "आप किससे ज्यादा चिंतित हैं, बिग ब्रदर से या बदमाश चचेरे भाई से?"
भविष्य की इस निराशावादी तस्वीर के बावजूद संतोष की बात यह है कि तकनीक इंसान को जितना खतरा पहुंचा रही है, उससे ज्यादा फायदा भी दे रही है. भविष्य के मुद्दों पर शोध करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक का सकारात्मक पहलू निजताओं के हनन से कहीं ज्यादा है.
एमजे/आरआर (वार्ता) sabhar :http://www.dw.de/

मंगल पर 'एलियन की जांघ की हड्डी' धरती से बाहर जीवन का सबूत?

लंदन नासा के क्यूरियॉसिटी रोवर को मंगल की सतह पर अकेले चक्कर काटते हुए 2 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है। हाल ही में इस रोवर द्वारा खींची गई एक तस्वीर से एलियन्स के वजूद में यकीन रखने वाले बेहद उत्साहित हैं। उन्हें मंगल की सतह पर कुछ ऐसा दिखा है, जिसे वे इस बात का सबूत बता रहे हैं कि हमारे अलावा इस ब्रह्मांड में कोई और भी है। मंगल की सतह पर कुछ ऐसा दिखा है, जिसे 'एलियन की जांघ की हड्डी' बताया जा रहा है। 

एलियन की तलाश और उनकी मौजूदगी को साबित करने की कोशिश में नई-नई थिअरीज पेश करने वाले लोग नासा के क्यूरियॉसिटी रोवर की खींची इस तस्वीर के आधार पर दावा कर रहे हैं कि मंगल ग्रह पर भी किसी वक्त जीवन रहा होगा। उनका दावा है कि रोवर के मैस्टकैम से 14 अगस्त को ली गई इस तस्वीर से साफ होता है कि किसी वक्त मंगल की सतह पर बड़े जानवर और शायद डायनॉसॉर तक घूमा करते थे। हालांकि, वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि नहीं की है कि हडड 

'नॉर्दर्न वॉइसेज ऑनलाइन' नाम के पोर्टल पर एक अज्ञात शख्स ने लिखा है, 'इस तस्वीर में दिख रही हड्डी से साफ होता है कि मंगल पर किसी वक्त कुछ तो रहता था।' पॉप्युलर साइट 'यूएफओ ब्लॉगर' ने तो इस तस्वीर की तुलना धरती पर पाए गए सरीसृप प्रजाति के फॉसिल्स की तस्वीरों से भी की है। वे दिखाना चाहते हैं कि तस्वीर में दिख रही चीज़ किसी जानवर की हड्डियों के अवशेष हैं। 

बहुत सारे लोगों को लगता है कि मंगल ग्रह पर जीवन है। पिछले साल कुछ वैज्ञानिकों ने यह थिअरी सामने रखी थी कि आज से करीब 6 करोड़ 60 लाख साल पहले धरती पर डायनॉसॉर का खात्मा करने वाला जो उल्कापिंड गिरा था, उसके टुकड़े जीवन बनाने के लिए उपयोगी तथ्वों को मंगल तक ले गए होंगे। मगर साइंटिस्ट्स का यह भी मानना है कि मंगल करोड़ों सालों से वीरान है और यहां पानी भी नहीं। ऐसे में यहां जीवन की संभावना का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। 


वैज्ञानिकों का मानना है कि यह हड्डी नहीं, बल्कि पत्थर का कोई ऐसा टुकड़ा है जो हड्डी की तरह दिख रहा है। बावजूद इसके बहुत से लोग इस तस्वीर को मंगल पर जीवन होने का सबूत मानते हुए तरह-तरह की थिअरीज़ गढ़ने में जुटे हुए हैं। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही कुछ लोगों ने चांद की सतह की एक तस्वीर पर परछाई देखी थी और दावा किया था कि वह एक एलियन था। मगर बाद में नासा ने इस दावे को खारिज करते हुए इसे लोगों की कल्पना की देन करार दिया था।
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ऐसे आप खुद बिजली पैदा कर सकेंगे

वैज्ञानिकों ने विश्व के सबसे पतले इलेक्ट्रिक जेनरेटर का किया एक्सपेरिमेंट
पीटीआई, न्यू यॉर्क
अनुसंधानकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने सबसे दुबला जेनरेटर विकसित किया है, जो देखने में ट्रांसपैरेंट, बेहद हल्का, मोड़ा जा सकनेवाला और खींचकर लंबा किए जा सकने की क्षमता से लैस होगा। कोलंबिया इंजीनियरिंग ऐंड जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के रिसर्चर्स ने इसे पीजोइलेक्ट्रिसिटी नाम दिया है और पहली बार इसका एक्सपेरिमेंटल ऑब्जर्वेशन किया है। ये कमाल है मॉलेब्डेनम डाइसल्फाइड (MoS2) का। वैज्ञानिकों ने इसे एटॉमिक रूप से बेहद पतले मैटीरियल में डाला और इसका पीजोट्रॉनिक इफेक्ट देखा। वैज्ञानिकों ने पाया कि ये एक विशेष तरह के इलेक्ट्रिक जनरेटर की तरह काम कर रहा है। रिसर्चर्स ने पावर प्रोडक्शन कर इसका डिमॉन्सट्रेशन भी किया।
क्या है पीजोइलेक्ट्रिक इफेक्ट
एक खास बात और इस जेनरेटर में कि पीजोइलेक्ट्रिक इफेक्ट को इससे पहले केवल थिऑरिटिकली ही समझा गया था। पीजोइलेक्ट्रिसिटी एक ऐसा इफेक्ट है, जिसमें किसी मैटीरियल को खींचने या दबाने से बिजली पैदा होती है। इस प्रयोग से मॉलेब्डेनम डाइसल्फाइड की खासियत का भी पता चला, जिसे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में भी यूज किया जा सकता है। कोलंबिया इंजीनियरिंग के प्रफेसर जेम्स होन ने बताया कि चूंकि ये मैटीरियल काफी हलका है, ऐसे में इसे वियरेबल डिवाइस भी बनाया जा सकता है, जो आपके शरीर की ऊर्जा को बिजली में बदल देगा, जिससे आप अपना मोबाइल चार्ज करने जैसे तमाम काम कर सकेंगे।
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2014 में साइंस' के टॉप 10 आविष्कार

साइंस पत्रिका ने साल 2014 में सामने आईं ढेरों नई खोजों और आविष्कारों में से चुनी हैं ये 10 खास चीजें. इसमें चूहों में मिले चिरयौवन के राज से लेकर डायनासोर से जुड़े खुलासे शामिल हैं.

Orbiter Philae on the comet 67P/Churyumov-Gerasimenko
चांद पर पहला कदम रखने जैसा बड़ा कदम
साल 2014 की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि रही यूरोपीय स्पेस एजेंसी के रोजेटा मिशन के नाम. 12 नवंबर को रोजेटा मिशन में ऑर्बिटर फिले को कॉमेट 67पी/चूरियूमोव-गेरासिमेंको पर सफलतापूर्वक लैंड कराया गया. फिले पर कुल 20 वैज्ञानिक उपकरण लगे हैं जो वहां धरती पर जीवन की उत्पत्ति और ब्रह्मांड की रचना से जुड़े सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं.

Indonesien cave painting in Sulawesi

इंसानों की बनाई सबसे पहली पेंटिंग
अक्टूबर 2014 में साइंस में छपी रिपोर्ट में बताया गया कि इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप में चूना पत्थर की गुफा में करीब 40,000 साल पुरानी पेंटिंग मिली है. इसे मानव इतिहास की सबसे पुरानी पेंटिंग माना जा रहा है. इससे पहले तक सबसे पुरानी पेंटिंग यूरोप में मिली मानी जाती थी.
DNA

पहला सेमी-सिंथेटिक जीव
कैलिफोर्निया के स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने एक बैक्टीरिया ई. कोलाई के डीएनए को बढ़ाने में सफलता पाई. उन्होंने एक सूक्ष्मजीव के डीएनए में दो सिंथेटिक बेस पेयर जोड़ने में कामयाबी पाई. यह बेस पेयर जेनेटिक्स की दुनिया के अक्षर जैसे हैं जिनके क्रम से ही किसी जीव के लक्षण बनते हैं. इस प्रयोग के माध्यम से उन्होंने एक जीते जागते जीव के जीनोटाइप में परिवर्तन ला दिया.

Reconstruction of Archaeopteryx
डायनासोर से चिड़िया
कई रिसर्चरों ने चिड़ियों और डायनासोरों के बीच संबंधों पर काम किया. ऐसी एक खोज में पाया गया कि जैसे जैसे डायनासोरों में हल्की हड्डियां विकसित होने लगीं, वे खाना और आश्रय ढूंढने में बेहतर होने लगे. विकास के क्रम में आगे चलकर पंख विकसित हुए और वे उड़ कर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने लगे और इस तरह पक्षी बने.
An insulin injection.

डायबिटीज का इलाज
रिसर्चरों ने ऐसी थेरेपी विकसित की जिसमें इंसुलिन पैदा कर सकने वाली बीटा कोशिकाओं का पुनर्निर्माण किया जा सके. बीटा कोशिकाएं ही इंसान के पैंक्रियाज य अग्नाशय में पर्याप्त इंसुलिन पैदा करवाती हैं जिससे ब्लड शुगर का स्तर सामान्य बना रहे. टाइप 1 डायबिटीज के मरीजों में बीटा कोशिकाएं नहीं पाई जातीं और इसीलिए उन्हें इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं. इस खोज से डायबिटीज का इलाज मिलने की उम्मीद जगी है.
lab mouse

चिरयौवन का स्रोत
रिसर्चरों ने एक युवा चूहों के रक्त से जीडीएफ11 नाम का एक प्रोटीन अलग किया और उसे बूढ़े चूहों में इंजेक्ट कर दिया. नतीजे चौंकाने वाले थे. बूढ़े चूहों में मांसपेशियों और मस्तिष्क का फिर से विकास होने लगा. इस तरह रक्त और प्लाज्मा की मदद से वैज्ञानिक चूहों में याददाश्त को सुधारने में सफल रहे. अब इस तरह के परीक्षण किए जा रहे हैं जिससे रक्त प्लाज्मा ट्रीटमेंट कर अल्जाइमर्स जैसी बीमारियां रोकी जा सके.
Synapses

मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग
2014 में ऑप्टोजेनेटिक्स के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई. रिसर्चरों ने अनुवांशिक रूप से बदले गए खास चूहों के दिमाग में लेजर लाइटों की बीम फेंक कर उनकी बुरी यादों को अच्छी यादों में बदल दिया. अब स्टैनफोर्ड के वैज्ञानिक इस तरीके का इस्तेमाल कर कई तरह की दिमागी परेशानियों को दूर करने के उपाय खोज रहे हैं.
16 TrueNorth Chips

कंप्यूटर चिप में इंसानी दिमाग के गुण
आईबीएम के इंजीनियरों ने न्यूरोमॉर्फिक चिप्स बनाने में कामयाबी पाई, जो इंसानी दिमाग की नकल कर सकने वाली एक सेमीकंडक्टर डिवाइस होती है. ट्रूनॉर्थ नाम की एक नई तरह की चिप पैटर्नस् को पहचानने और अलग तरह की चीजों के बीच भेद कर पाने में बहुत अच्छी साबित हुई है.

Science intelligent mini-robots
रेंगने वाले रोबोट
कई कंप्यूटर वैज्ञानिकों ने रोबोटों में 'स्वॉर्म इंटेलिजेंस' को बेहतर बनाने पर काम किया है. इसका अर्थ है बिना इंसानी मदद के कई सारे रोबोटों के बीच एक दूसरे के साथ मिलकर कुछ बना पाने की क्षमता.

Science mini-Satellites Archive 2009
छात्रों के सैटेलाइट
इस तस्वीर में छात्र अपने खुद बनाई मिनी-सैटेलाइट पर काम पूरा कर रहे हैं. साल 2014 में ही करीब 75 ऐसी सैटेलाइटों को धरती के पास वाले ऑर्बिट में भेजा गया. इनमें से हर सैटेलाइट किसी खास शोध को करने में बहुत अच्छी रही लेकिन इनमें बहुत सारे उपकरणों को लगाने की संभावना नहीं.

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पहला मेंढक जो अंडे नहीं बच्चे देता है

वैज्ञानिकों को इंडोनेशियाई वर्षावन के अंदरूनी हिस्सों में एक ऐसा मेंढक मिला है जो अंडे देने के बजाय सीधे बच्चे को जन्म देता है.

Der Israelische Scheibenzüngler

एशिया में मेंढकों की एक खास प्रजाति 'लिम्नोनेक्टेस लार्वीपार्टस' की खोज कुछ दशक पहले इंडोनेशियाई रिसर्चर जोको इस्कांदर ने की थी. वैज्ञानिकों को लगता था कि यह मेंढक अंडों की जगह सीधे टैडपोल पैदा कर सकता है, लेकिन किसी ने भी इनमें प्रजनन की प्रक्रिया को देखा नहीं था. पहली बार रिसर्चरों को एक ऐसा मेंढक मिला है जिसमें मादा ने अंडे नहीं बल्कि सीधे टैडपोल को जन्म दिया. मेंढक के जीवन चक्र में सबसे पहले अंडों के निषेचित होने के बाद उससे टैडपोल निकलते हैं जो कि एक पूर्ण विकसित मेंढक बनने तक की प्रक्रिया में पहली अवस्था है. टैडपोल का शरीर अर्धविकसित दिखाई देता है.
इसके सबूत तब मिले जब बर्कले की कैलिफोर्निया यूनीवर्सिटी के रिसर्चर जिम मैकग्वायर इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप के वर्षावन में मेंढकों के प्रजनन संबंधी व्यवहार पर रिसर्च कर रहे थे. इसी दौरान उन्हें यह खास मेंढक मिला जिसे पहले वह नर समझ रहे थे. गौर से देखने पर पता चला कि वह एक मादा मेंढक है, जिसके साथ करीब एक दर्जन लिसलिसे से बच्चे हैं.मैकग्वायर की यह रिसर्च साइंस पत्रिका 'प्लोस वन' में छपी है. वह बताते हैं, "दुनिया भर लगभग सभी मेंढकों में यानि करीब 6,000 से ज्यादा प्रजातियों में बाहरी निषेचन ही होता है. लेकिन यह मेंढक उन 10 या 12 प्रजातियों में से है जिनमें आंतरिक निषेचन होता है. उनमें से भी यह एकलौता ऐसा है जो बच्चे को जन्म देता है. जबकि बाकी मेंढक निषेचित अंडे देते हैं."
अफ्रीकी देशों में पाए जाने वाले कुछ मेंढकों में भी आंतरिक निषेचन होता है और वे फ्रॉगलेट को जन्म देते हैं जो कभी टैडपोल अवस्था से नहीं गुजरते. यूनीवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से जारी बयान के मुताबिक कुछ मेंढक अंडों को पीछे की थैली में या मुंह के अंदर थैली में रखते हैं. पहले मेंढकों की दो ऐसी प्रजातियां भी मिली हैं जो बच्चे निकलने तक अंडों को खुद अपने ही पेट में रखते थे. अब खत्म हो चुकी मेंढक की इस किस्म में वे अपने निषेचित अंडों को खुद ही निगल जाते और तैयार हो जाने पर उन्हें मुंह से ही फ्रॉगलेट के रूप में बाहर निकालते थे. sabhar :http://www.dw.de/


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