हमारा विज्ञानऔर हमारी धरोहर

जब हमारे देश में बड़ी बड़ी  राइस मील नहीं थी तो धान को घर पर ही कूटकर भूसे को अलग कर चावल प्राप्त किया जाता था... असलियत में वही चावल था जिसे  whole rise कहते हैं... चावल का प्राकृतिक रंग सुनहरा भूरा ही होता है... सुर्ख लाल काला भी होता है लेकिन इंसानी फितरत है उसे सहज प्राकृतिक  चीजों से नफरत होती है...सफेद चमड़ी रंगत की तरह सफेद वस्तुओं से उसका अलग ही आकर्षण होता है |

इसे समझने के लिए आपको चावल  दाने की संरचना को समझना होगा... चावल  ही क्या प्रत्येक खाद्यान्न ज्वार मक्का बाजरा सभी की सरचना  4 स्तरीय होती है... सबसे बाहरी संरचना  जिसे हस्क बोला जाता है या भूसी कहते हैं वह होती है... दूसरा स्तर ब्रेन का होता है जिसे चोकर भी कह देते हैं... इसमें कैल्शियम मैग्नीशियम सहित जरूरी मिनरल होते हैं.. तीसरा स्तर  ग्रेन का होता है... यह चावल या किसी दाने  भूर्ण होता है इसमें विटामिन प्रोटीन अमीनो एसिड प्रचुर मात्रा में होते हैं..  चावल या किसी दाने की जीवनी शक्ति परमात्मा ने इसी हिस्से में डाल दी है यहीं से किसी वृक्ष , पौधे का अंकुर निकलता है.. मोटे तौर पर चौथा व अंतिम स्तर एंडोस्पर्म होता है इसमें केवल स्टार्ट , कार्बोहाइड्रेट होती है यह पूरी तरह सफेद होता है चाहे गेहूं का हो या चावल का हो... इसे हम कह सकते हैं यह चावल के तीसरे स्तर का भोजन होता है अर्थात ग्रेन का....|

समस्या अब यहां से शुरू होती है मिलों में जब से  इंसान ने विज्ञान तकनीक में महारत हासिल की है... प्रोसेसिंग मशीनों की सहायता से चावल के तीन स्तरों को अलग कर दिया जाता है चौथे मृत अंतिम स्तर  endosperm जिसमें केवल कार्बोहाइड्रेट है जो केवल शरीर में शुगर या मोटापा ही बढ़ाएगा उसको कंपनियां  चावल के दाने के रूप में पैक कर बेच रही है जिसे हम हम खाने में  लगाते हैं... अर्थात सफेद चावल यह वही चौथा अंतिम हिस्सा है जिसकी सार्थकता संपूर्ण चावल के तीन स्तरों के साथ ही होती है बगैर इन तीन स्तरों के यह सफेद चावल कुछ भी नहीं है... इसमें ना प्रोटीन होती है ना फाइबर कैल्शियम व विटामिन इसमें केवल स्टार्च  कार्बोहाइड्रेट ही होती है...|

पहले हमारे पूर्वज जो  घर पर ही या खलियान में हाथ कुटा चावल तैयार करते थे वह संपूर्ण चावल होता था केवल  भूसी को अलग करते थे चारों स्तरों से युक्त सुनहरा चावल जिसे ब्राउन राइस कहते हैं... यह सुनहरा चावल ही चावल है.... सफेद चावल तो सच्चे अच्छे सुनहरे चावल  का मृत अंतिम स्तर है जो सही मायने में चावल के भ्रूण  की ऊर्जा के लिए बनी हुई है... ठीक इसी तरह हम इंसानों को उर्जा से ज्यादा पोषण की जरूरत है पोषण मिलता है विटामिन  मिनरल  प्रोटीन से... अब जिस हिस्से में यह पोषण था वह तो हमने वेस्ट  बायो प्रोडक्ट बनाकर अलग कर दिया... हमारे हिस्से में आई बीमारी....वनवासी  आज भी संपूर्ण चावल या सुनहरा चावल इस्तेमाल में लाया जाता है वह बहुत मजबूत होते हैं... जिम जाने वाले नौजवान भी आजकल सुनहरा चावल ही खाते हैं मोटापे कुपोषण से बचने के लिए.... अब डायटिशियन लोगों को जागरूक कर रहे हैं लेकिन कंपनियां अपने स्वार्थ और लालच के लिए तमाम तरीके के एडवरटाइजिंग सफेद चावल के प्रचार प्रसार को लेकर 
करती है आम व्यक्ति यह सब नहीं जानता था क्योंकि वह अपनी प्राचीन परंपराओं बुजुर्गों की आहार शैली को लेकर एकदम अनभिज्ञ है..|

  समझिए चावल का मतलब सुनहरा चावल संपूर्ण चावल या ब्राउन राइस यह पोस्टिक भी है स्वादिष्ट भी है|
 हमारे   पूर्वज इसी को इस्तेमाल में लाते थे |

लेखक : आर्य सागर खारी

विकल्प 
---------
धान को छिलका सहित आंशिक रूप से उबालने के बाद उसे सुखाकर जो चावल निकाला जाता है उसे उबला चावल (Parboiled rice) कहते हैं। इसके लिये, धान को पहले पानी में कुछ समय के भिग्कर रखा जाता है, फिर उसे उबाला जाता है और अन्ततः सुखा लिया जाता है। इस प्रक्रिया को अपनाने से ढेंका या हाथ से भी चावल निकालने में आसानी होती है। इसके अलावा इस प्रक्रिया के करने से चावल में चमक आती है तथा उसमें पोषक तत्त्व अधिक रह जाते हैं। विश्व का लगभग ५०% उबला चावल खाया जाता है। भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यान्मार, मलेशिया, नेपाल, श्री लंका, गिनिया, दक्षिण, अफ्रीका, इटली, स्पेन, नाइजेरिया, थाईलैण्ड, स्विट्जरलैण्ड और फ्रांस में उबालकर चावल निकालने की विधि प्रचलित है

लेखक : राजीव कुमार, CA, धुरी, पंजाब

6G सिर्फ मोबाइल फोंस को नहीं बल्कि आम ज़िंदगी को एडवांस और फास्ट बनाएगा


6जी सिर्फ तेज इंटरनेट ही नहीं बल्कि इससे बहुत ही ज्यादा व्यापक तकनीक लेकर आएगा। 6G सिर्फ मोबाइल फोंस को नहीं बल्कि आम ज़िंदगी को एडवांस और फास्ट बनाएगा। VR और AR नॉमर्ल दिनचर्या को अहम हिस्सा बनकर सामने आएंगे तथा कम्यूनिकेशन के साथ ही इंटेलिजेंस और IOT यानि इंटरनेट ऑफ थिंग्स के क्षेत्र में बड़ी क्रांति होगी। ऐसा भी माना जा सकता है कि 6G आने के बाद रोबोट्स का चलन भी सार्वजनिक किया जा सकता है। जिस तरीके से आज स्मार्टफोन और स्मार्ट टीवी के अलावा स्मार्ट होम अप्लायंस जैसे फ्रिज, लाईट, फैन्स, सीसीटीवी, स्पीकर इत्यादि घर का हिस्सा बनते जा रहे हैं, इसी तरह 6G तकनीक रोबोट्स को भी नॉमर्ल लाइफ का हिस्सा बना सकती है।

वासना क्या है और प्रार्थना क्या है?

**

मेरे देखे, एक ही सीढ़ी के दो छोर: जैसे बीज और वृक्ष; जैसे अंडा और मुर्गी। वासना ही एक दिन पंख पा लेती है इसलिए मेरे मन में वासना की कोई निंदा नहीं है।
मेरे मन में निंदा है ही नहीं; किसी भी बात की निंदा नहीं है। मेरे मन में सर्व स्वीकार है क्योंकि मैं देखता हूं, जब सब परमात्मा को स्वीकार है तो उसमें से कुछ भी अस्वीकार करना परमात्मा को अस्वीकार करना है।

मैंने सुना है, सूफी फकीर बायजीद एक पड़ोसी से बहुत परेशान था। सालभर से उसके पड़ोस में था। वह बड़ा उपद्रवी था पड़ोसी। जब बायजीद ध्यान करने बैठता तब वह ढोल बजाने लगता; या बायजीद नमाज पढ़ता तो वह गालियां बकने लगता। बायजीद शिष्यों को समझाता तो वह कुछ उपद्रव मचा देता। कूड़ा—करकट इकट्ठा करके बायजीद के झोंपड़े में फेंक देता।

एक रात बायजीद प्रार्थना करा, प्रार्थना करके उठ रहा था, परमात्मा की झलक से भरा था। झलक इतनी स्पष्ट थी कि उसने कहा, हे प्रभु! इतनी कृपा की है कि मुझे आज झलक दी है, इतना और कर दो कि इस पड़ोसी से छुटकारा करो। और पता है परमात्मा की क्या आवाज बायजीद को सुनाई पड़ी? उसने कहा, बायजीद, इस आदमी को मैं पचास साल से बर्दाश्त कर रहा हूं और तू तो अभी साल ही भर हुआ…..! और पचास साल तो इस जिंदगी के! पिछली जिंदगियों का तो हिसाब ही मत रख। अगर मैं इसे बर्दाश्त कर रहा हूं और मैंने आशा नहीं छोड़ी और मैं आशा बांधे हूं कि यह भी बदलेगा। तू भी आशा न छोड़।

परमात्मा अगर वासना के विपरीत होता तो वासना होती ही नहीं। महात्मा विपरीत है इसलिए मैं कहता हूं, महात्मा गलत है। परमात्मा विपरीत नहीं है वासना के। हर बच्चे को वासना से सजाकर भेजता है, वासना भरकर भेजता है।

वासना ऊर्जा है, शुद्ध ऊर्जा है, संपदा है। कहां लगाओगे इस पर सब कुछ निर्भर करेगा। यही वासना धन में लग जाएगी तो धन—कुबेर हो जाओगे। यही वासना पद के पीछे पड़ जाएगी तो किसी देश के राष्ट्रपति हो जाओगे। यही वासना परमात्मा की दिशा में लग जाएगी तो प्रार्थना हो जाएगी।

वासना शुद्ध ऊर्जा है। वासना तटस्थ है। वासना अपने आप में कोई लक्ष्य लेकर नहीं आयी है, लक्ष्य तुम्हें तय करना है। फिर तुम्हारी ऊर्जा उसी दिशा में बहनी शुरू हो जाती है। स्त्री को प्रेम करोगे तो वासना घर बसाएगी। परमात्मा को प्रेम करोगे, मंदिर बनेगा। परिवार को प्रेम करोगे तो छोटा—सा परिवार होगा सारे संसार के विरोध में। सारे संसार को प्रेम करोगे तो कोई विरोध में न होगा। सारा संसार तुम्हारा घर होगा। तुम पर निर्भर है।

वासना प्रार्थना का बीज है। और जब तक वासना प्रार्थना नहीं बन जाती है तब तक तुम्हें संसार में लौट—लौटकर आना पड़ेगा क्योंकि तुमने पाठ सीखा नहीं। फिर भेज दिए जाओगे कि और जाओ, फिर उसी कक्षा में भर्ती हो जाओ। जब तक तुम उत्तीर्ण न हो जाओ…..। और उत्तीर्ण होने की कसौटी क्या है? जिस दिन तुम्हारी सारी वासना रूपांतरित हो जाए प्रार्थना में, जिस दिन परमात्मा के अतिरिक्त तुम्हें कुछ और दिखाई न पड़े। तुम चाहो तो परमात्मा को। फिर चाहे तुम किसी से भी संबंध जोड़ो, किसी को भी चाहो लेकिन हर चाहत में परमात्मा की ही चाहत हो। तुम्हारी पत्नी में परमात्मा दिखाई पड़े, तुम्हारे बेटे में परमात्मा दिखाई पड़े, तुम्हारे मित्र में परमात्मा दिखाई पड़े, तुम्हारे शत्रु में परमात्मा दिखाई पड़े।

इसलिए जीसस ने कहा है, शत्रु को भी प्रेम करना अपने जैसा। यह मत भूल जाना कि उसमें भी परमात्मा छिपा है। एक क्षण को भी यह बात विस्मरण मत करना, नहीं तो उतनी प्रार्थना चूक जाएगी; उतने तुम प्रार्थना से नीचे गिर जाओगे।

मिट्टी में वासना के कारण ही प्राण पड़ गए हैं, रेगिस्तान में मरुद्यान उगा है। इस जीवन में तुम्हें जितनी हरियाली दिखाई पड़ती है, सब वासना की है। पक्षी गीत गाते हैं, वे वासना के गीत हैं। कोयल अपने प्रेमी को पुकार रही है। मोर अपने प्रेमी के लिए नाच रहा है। वे जो उसने सुंदर पंख फैलाए हैं वे वासना के पंख हैं। वह मोर—पंखों का जो सौंदर्य है वह वासना का ही सौंदर्य है। फूल खिले हैं, पूछो वैज्ञानिक से; वे सब वासना के ही फूल हैं। उन फूलों में वृक्षों के रजकण हैं, वीर्यकण हैं। तितलियां अपने पैरों में लगाकर उन्हें पहुंचा देगी उनकी मंजिल तक।

अगर तुम गौर से देखोगे तो तुम चकित हो जाओगे। तुम जब गुलाब के फूल तोड़कर परमात्मा के चरणों पर चढ़ाते हो तो तुमने गुलाब की वासना परमात्मा के पैरों पर चढ़ायी चढ़ानी थी अपनी वासना।

_नाम सुमिर मन बाँवरे_

*ओशो*

केंचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट

Kuch Facts 

केंचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost) पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है।
इसको  बनाने मे कम  से कम  40-45 दिन का समय लगता हैं 
नही से ये कच्चा गोबर ही रेहता हैं 

वर्मी कम्पोस्ट में बदबू नहीं होती है और मक्खी एवं मच्छर नहीं बढ़ते जिससे वातावरण स्वस्थ रहता है। इससे सूक्ष्म पोषित तत्वों के साथ-साथ नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश मिलता है।

आप के यंहा अलग अलग तरह के packets available होंगे कुछ सस्ते तो कुछ म्हेंगे..

दोनो मे फर्क समझे 
सस्ता या महेंगे से फर्क  नही पड़ता सिर्फ आप quality को समझे ..

pure Vermicompost - 
कभी भी हाथों मे  नही  चिपकेगा 
उसका रंग  Dark Brown होगा 
उसमे से बदबू नही आयेगी - इसका मतलब पानी में घोल कर भी नही 
इसमे earthworm नही होना चाहिये अगर है  तो वो सिर्फ  दिखाने के लिए हैं क्यो  की हर एक earthworm किसान  के लिए important हैं.. उसमे earthworm eggs ज़रूर आ सकते हैं क्योकी छलनी का size इतना होता हैं ..
अगर आप धूप मे  देखो तो उसमे शिशे  जैसी झलक नही होनी  चाहिये 
उसको आप हथेली  पर  मसल कर  देखे तब भी वो मिट्टी की तरह  चिपकना  नही चाहिये 

ये कुछ तरिके हैं आप पता लगा सकते हैं की Vermicompost pure हैं य नही ..

इसमे Naalo Ka wasteg (kichad )
मिट्टी 
कच्चा गोबर  ( 40 दिन से कम )
city Compost 
ये सब मिलावट  की जाती हैं 

एक फोटो साझा की हैं.. sabhar shusil hindu Facebook wall

काशी एक यंत्र है एक असाधारण यंत्र!!

क्यूं कहते हैं कि "काशी जमीन पर नहीं है, वह शिव के त्रिशूल के ऊपर है!"
Jai ho....
           Jai Mhakal....
क्योंकि #काशी #एक_यंत्र है एक असाधारण यंत्र!!

मानव शरीर में जैसे नाभी का स्थान है, वैसे ही पृथ्वी पर वाराणसी का स्थान है.. शिव ने साक्षात धारण कर रखा है इसे!

शरीर के प्रत्येक अंग का संबंध नाभी से जुड़ा है और पृथ्वी के समस्त स्थान का संबंध भी वाराणसी से जुड़ा है।
धरती पर यह एकमात्र ऐसा यंत्र है!!

काशी की रचना सौरमंडल की तरह की गई है,
इस यंत्र का निर्माण एक ऐसे विशाल और भव्य मानव शरीर को बनाने के लिए किया गया, 
जिसमें भौतिकता को अपने साथ लेकर चलने की मजबूरी न हो, और जो सारी आध्यात्मिक प्रक्रिया को अपने आप में समा ले।

आपके अपने भीतर ११४ चक्रों में से ११२ आपके भौतिक शरीर में हैं, लेकिन जब कुछ करने की बात आती है, तो केवल १०८ चक्रों का ही इस्तेमाल आप कर सकते हैं।

इसमें एक खास तरीके से मंथन हो रहा है। यह घड़ा यानी मानव शरीर इसी मंथन से निकल कर आया है, इसलिए मानव शरीर सौरमंडल से जुड़ा हुआ है और ऐसा ही मंथन इस मानव शरीर में भी चल रहा है। 

सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास से 108 गुनी है। आपके अपने भीतर 114 चक्रों में से 112 आपके भौतिक शरीर में हैं, लेकिन जब कुछ करने की बात आती है, तो केवल 108 चक्रों का ही इस्तेमाल आप कर सकते हैं। 
अगर आप इन 108 चक्रों को विकसित कर लेंगे, तो बाकी के चार चक्र अपने आप ही विकसित हो जाएंगे। हम उन चक्रों पर काम नहीं करते। 
शरीर के 108 चक्रों को सक्रिय बनाने के लिए 108 तरह की योग प्रणालियां हैं।

पूरे काशी यानी बनारस शहर की रचना इसी तरह की गई थी। यह पांच तत्वों से बना है, और आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि शिव के योगी और भूतेश्वर होने से, उनका विशेष अंक पांच है।

इसलिए इस स्थान की परिधि पांच कोश है। इसी तरह से उन्होंने सकेंद्रित कई सतहें बनाईं। 
यह आपको काशी की मूलभूत ज्यामिति बनावट दिखाता है। गंगा के किनारे यह शुरू होता है, और ये सकेंद्रित वृत परिक्रमा की व्याख्या दिखा रहे हैं। सबसे बाहरी परिक्रमा की माप 168 मील है।

यह शहर इसी तरह बना है और विश्वनाथ मंदिर इसी का एक छोटा सा रूप है। 

असली मंदिर की बनावट ऐसी ही है। यह बेहद जटिल है। इसका मूल रूप तो अब रहा ही नहीं।
वाराणसी को मानव शरीर की तरह बनाया गया था। यहां 72 हजार शक्ति स्थलों यानी मंदिरों का निर्माण किया गया। 

एक इंसान के शरीर में नाड़िय़ों की संख्या भी इतनी ही होती है। इसलिए उन लोगों ने मंदिर बनाये, और आस-पास काफी सारे कोने बनाये - जिससे कि वे सब जुड़कर 72,000 हो जाएं।

यहां 468 मंदिर बने, क्योंकि चंद्र कैलेंडर के अनुसार साल में 13 महीने होते हैं, 

13 महीने और 9 ग्रह, 4 दिशाएं - इस तरह से तेरह, नौ और चार के गुणनफल के बराबर 468 मंदिर बनाए गए। तो यह नाडिय़ों की संख्या के बराबर है। 

यह पूरी प्रक्रिया एक विशाल मानव शरीर के निर्माण की तरह थी। इस विशाल मानव शरीर का निर्माण ब्रह्मांड से संपर्क करने के लिए किया गया था। 

इस शहर के निर्माण की पूरी प्रक्रिया ऐसी है, मानो एक विशाल इंसानी शरीर एक वृहत ब्रह्मांडीय शरीर के संपर्क में आ रहा हो। 
काशी बनावट की दृष्टि से सूक्ष्म और व्यापक जगत के मिलन का एक शानदार प्रदर्शन है। 

कुल मिलाकर, एक शहर के रूप में एक यंत्र की रचना की गई है।

रोशनी का एक दुर्ग बनाने के लिए, और ब्रह्मांड की संरचना से संपर्क के लिए, यहां एक सूक्ष्म ब्रह्मांड की रचना की गई। 

ब्रह्मांड और इस काशी रूपी सूक्ष्म ब्रह्मांड इन दोनों चीजों को आपस में जोड़ने के लिए 468 मंदिरों की स्थापना की गई। 

मूल मंदिरों में 54 शिव के हैं, और 54 शक्ति या देवी के हैं। अगर मानव शरीर को भी हम देंखें, तो उसमें आधा हिस्सा पिंगला है और आधा हिस्सा इड़ा। दायां भाग पुरुष का है और बायां भाग नारी का। 

यही वजह है कि शिव को अर्धनारीश्वर के रूप में भी दर्शाया जाता है - आधा हिस्सा नारी का और आधा पुरुष का।

आपके स्थूल शरीर का 72% हिस्सा पानी है, 12% पृथ्वी है, 6%वायु है और 4%अग्नि। बाकी का 6% आकाश है। सभी योगिक प्रक्रियाओं का जन्म एक खास विज्ञान से हुआ है, जिसे भूत शुद्धि कहते हैं। इसका अर्थ है अपने भीतर मौजूद तत्वों को शुद्ध करना। 
अगर आप अपने मूल तत्वों पर कुछ अधिकार हासिल कर लें, तो अचानक से आपके साथ अद्भुत चीजें घटित होने लगेंगी।

यहां एक के बाद एक 468 मंदिरों में सप्तऋषि पूजा हुआ करती थी और इससे इतनी जबर्दस्त ऊर्जा पैदा होती थी कि हर कोई इस जगह आने की इच्छा रखता था। यह जगह सिर्फ आध्यात्मिकता का ही नहीं, बल्कि संगीत, कला और शिल्प के अलावा व्यापार और शिक्षा का केंद्र भी बना। 

इस देश के महानतम ज्ञानी काशी के हैं। 
शहर ने देश को कई प्रखर बुद्धि और ज्ञान के धनी लोग दिए हैं।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, 'पश्चिमी और आधुनिक विज्ञान भारतीय गणित के आधार के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता था।’ 

यह गणित बनारस से ही आया। इस गणित का आधार यहां है। 

जिस तरीके से इस शहर रूपी यंत्र का निर्माण किया गया, वह बहुत सटीक था। 

ज्यामितीय बनावट और गणित की दृष्टि से यह अपने आप में इतना संपूर्ण है, कि हर व्यक्ति इस शहर में आना चाहता था। क्योंकि यह शहर अपने अन्दर अद्भुत ऊर्जा पैदा करता था।

इसीलिए, आज भी यह कहा जाता है कि "काशी जमीन पर नहीं है। वह शिव के त्रिशूल के ऊपर है....radhe radhe.. oli amit on Facebook..

काम और ध्यान

🥸

जब दो प्रेमी काम से निकट आते हैं, जब वे संभोग से गुजरते हैं, तब सच में ही वे परमात्मा के मंदिर के निकट से गुजर रहे हैं। वहीं परमात्मा काम कर रहा है, उनकी उस निकटता में। वहीं परमात्मा की सृजन शक्ति काम कर रही है।

और मेरी अपनी दृष्टि यह है कि मनुष्य को समाधि का, ध्यान का जो पहला अनुभव मिला हो कभी भी मनुष्य के इतिहास में, तो वह संभोग के क्षण में मिला है और कभी नहीं। संभोग के क्षण में ही पहली बार यह स्मरण आया है आदमी को कि इतने आनंद की वर्षा हो सकती है। और जिन्होंने सोचा, जिन्होंने मेडिटेट किया, जिन लोगों ने काम के संबंध पर और मैथुन पर चिंतन किया और ध्यान किया, उन्हें यह दिखाई पड़ा कि काम के क्षण में, मैथुन के क्षण में, संभोग के क्षण में मन विचारों से शून्य हो जाता है। एक क्षण को मन के सारे विचार रुक जाते हैं। और वह विचारों का रुक जाना और वह मन का ठहर जाना ही आनंद की वर्षा का कारण होता है।

तब उन्हें सीक्रेट मिल गया, राज मिल गया कि अगर मन को विचारों से मुक्त किया जा सके किसी और विधि से भी, तो भी इतना ही आनंद मिल सकता है। और तब समाधि और योग की सारी व्यवस्थाएं विकसित हुईं, जिनमें ध्यान और सामायिक और मेडिटेशन और प्रेयर, इनकी सारी व्यवस्थाएं विकसित हुईं। इन सबके मूल में संभोग का अनुभव है। और फिर मनुष्य को अनुभव हुआ कि बिना संभोग में जाए भी चित्त शून्य हो सकता है। और जो रस की अनुभूति संभोग में हुई थी, वह बिना संभोग के भी बरस सकती है। फिर संभोग क्षणिक हो सकता है, क्योंकि शक्ति और ऊर्जा का वह निकास और बहाव है। लेकिन ध्यान सतत हो सकता है। तो मैं आपसे कहना चाहता हूं कि एक युगल संभोग के क्षण में जिस आनंद को अनुभव करता है, एक योगी चैबीस घंटे उस आनंद को अनुभव करने लगता है।
ओशो👼

मैं मृत्यु सिखाता हूं ओशो

उन्होंने यह भी पूछा है कि ये जो आत्माएं रुक जाती हैं क्या वे किसी के शरीर में प्रवेश करके उसे परेशान भी कर सकती हैं?

 

इसकी भी संभावना है। क्योंकि वे आत्माएं, जिनको शरीर नहीं मिलता है, शरीर के बिना बहुत पीड़ित होने लगती हैं। निकृष्ट आत्माएं शरीर के बिना बहुत पीड़ित होने लगती हैं। श्रेष्ठ आत्माएं शरीर के बिना अत्यंत प्रफुल्लित हो जाती हैं। यह फर्क ध्यान में रखना चाहिए। क्योंकि श्रेष्ठ आत्मा शरीर को निरंतर ही किसी न किसी रूप में बंधन अनुभव करती है और चाहती है कि इतनी हलकी हो जाए कि शरीर का बोझ भी न रह जाए। अंततः वह शरीर से भी मुक्त हो जाना चाहती है, क्योंकि शरीर भी एक कारागृह मालूम होता है। अंततः उसे लगता है कि शरीर भी कुछ ऐसे काम करवा लेता है, जो न करने योग्य हैं। इसलिए वह शरीर के लिए बहुत मोहग्रस्त नहीं होता। निकृष्ट आत्मा शरीर के बिना एक क्षण भी नहीं जी सकती। क्योंकि उसका सारा रस, सारा सुख, शरीर से ही बंधा होता है।

शरीर के बिना कुछ आनंद लिये जा सकते हैं। जैसे समझें, एक विचारक है। तो विचारक का जो आनंद है, वह शरीर के बिना भी उपलब्ध हो जाता है। क्योंकि विचार का शरीर से कोई संबंध नहीं है। तो अगर एक विचारक की आत्मा भटक जाए, शरीर न मिले, तो उस आत्मा को शरीर लेने की कोई तीव्रता नहीं होती, क्योंकि विचार का आनंद तब भी लिया जा सकता है। लेकिन समझो कि एक भोजन करने में रस लेने वाला आदमी है, तो शरीर के बिना भोजन करने का रस असंभव है। तो उसके प्राण बड़े छटपटाने लगते हैं कि वह कैसे प्रवेश कर जाए। और उसके योग्य गर्भ न मिलता हो, तो वह किसी कमजोर आत्मा में—कमजोर आत्मा से मतलब है ऐसी आत्मा, जो अपने शरीर की मालिक नहीं है—उस शरीर में वह प्रवेश कर सकता है, किसी कमजोर आत्मा की भय की स्थिति में।

और ध्यान रहे, भय का एक बहुत गहरा अर्थ है। भय का अर्थ है जो सिकोड़ दे। जब आप भयभीत होते हैं, तब आप सिकुड़ जाते हैं। जब आप प्रफुल्लित होते हैं, तो आप फैल जाते हैं। जब कोई व्यक्ति भयभीत होता है, तो उसकी आत्मा सिकुड जाती है और उसके शरीर में बहुत जगह छूट जाती है, जहां, कोई दूसरी आत्मा प्रवेश कर सकती है। एक नहीं, बहुत आत्माएं भी एकदम से प्रवेश कर सकती हैं। इसलिए भय की स्थिति में कोई आत्मा किसी शरीर में प्रवेश कर सकती है। और करने का कुल कारण इतना होता है कि उसके जो रस हैं, वे शरीर से बंधे हैं। वह दूसरे के शरीर में प्रवेश करके रस लेने की कोशिश करती है। इसकी पूरी संभावना है, इसके पूरे तथ्य हैं, इसकी पूरी वास्तविकता है। इसका यह मतलब हुआ कि एक तो भयभीत व्यक्ति हमेशा खतरे में है। जो भयभीत है, उसे खतरा हो सकता है। क्योंकि वह सिकुड़ी हुई हालत में होता है। वह अपने मकान में, अपने घर के एक कमरे में रहता है, बाकी कमरे उसके खाली पड़े रहते हैं। बाकी कमरों में दूसरे लोग मेहमान बन सकते हैं।

कभी—कभी श्रेष्ठ आत्माएं भी शरीर में प्रवेश करती हैं, कभी—कभी। लेकिन उनका प्रवेश बहुत दूसरे कारणों से होता है। कुछ कृत्य हैं करुणा के, जो शरीर के बिना नहीं किए जा सकते। जैसे समझें कि एक घर में आग लगी है और कोई उस घर को आग से बचाने को नहीं जा रहा है। भीड़ बाहर घिरी खड़ी है, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं होती कि आग में बढ़ जाए। और तब अचानक एक आदमी बढ़ जाता है और वह आदमी बाद में बताता है कि मुझे समझ में नहीं आया कि मैं किस ताकत के प्रभाव में बढ़ गया। मेरी तो हिम्मत न थी। वह बढ़ जाता है और आग बुझाने लगता है और आग बुझा लेता है। और किसी को बचा कर बाहर निकल आता है। और वह आदमी खुद कहता है कि ऐसा लगता है कि मेरे हाथ की बात नहीं है यह, किसी और ने मुझसे यह करवा लिया है। ऐसी किसी घडी में जहां, कि किसी शुभ कार्य के लिए आदमी हिम्मत न जुटा पाता हो, कोई श्रेष्ठ आत्मा भी प्रवेश कर सकती है। लेकिन ये घटनाएं कम होती हैं।

निकृष्ट आत्मा निरंतर शरीर के लिए आतुर रहती है। उसके सारे रस उनसे बंधे हैं। और यह बात भी ध्यान में रख लेनी चाहिए कि मध्य की आत्माओं के लिए कोई बाधा नहीं है, उनके लिए निरंतर गर्भ उपलब्ध हैं।

इसीलिए श्रेष्ठ आत्मायें कभी—कभी सैकड़ों वर्षों के बाद ही पैदा हो पाती हैं। और यह भी जानकर हैरानी होगी कि जब श्रेष्ठ आत्माएं पैदा होती हैं, तो करीब—करीब पूरी पृथ्वी पर श्रेष्ठ आत्माएं एक साथ पैदा हो जाती हैं। जैसे कि बुद्ध और महावीर भारत में पैदा हुए आज से पच्चीस सौ वर्ष पहले। बुद्ध, महावीर दोनों बिहार में पैदा हुए। और उसी समय बिहार में छह और अदभुत विचारक थे। उनका नाम शेष नहीं रह सका, क्योंकि उन्होंने कोई अनुयायी नहीं बनाए। और कोई कारण न था, वे बुद्ध और महावीर की ही हैसियत के लोग थे। लेकिन उन्होंने बड़े हिम्मत का प्रयोग किया। उन्होंने कोई अनुयायी नहीं बनाए। उनमें एक आदमी था प्रबुद्ध कात्यायन, एक आदमी था अजित केसकंबल, एक था संजय विलट्ठीपुत्र, एक था मक्सली गोशाल, और लोग थे। उस समय ठीक बिहार में एक साथ आठ आदमी एक ही प्रतिभा के, एक ही क्षमता के पैदा हो गए। और सिर्फ बिहार में, एक छोटे — से इलाके में सारी दुनिया के। ये आठों आत्माएं बहुत देर से प्रतीक्षारत थीं। और मौका मिल सका तो एकदम से भी मिल गया।

और अक्सर ऐसा होता है कि एक श्रृंखला होती है अच्छे की भी और बुरे की भी। उसी समय यूनान में सुकरात पैदा हुआ थोड़े समय के बाद, अरस्तू पैदा हुआ, प्लेटो पैदा हुआ। उसी समय चीन में कंक्यूशियस पैदा हुआ, लाओत्से पैदा हुआ, मेन्शियस पैदा हुआ, च्चांगत्से पैदा हुआ। उसी समय सारी दुनिया के कोने —कोने में कुछ अदभुत लोग एकदम से पैदा हुए। सारी पृथ्वी कुछ अदभुत लोगों से भर गई।

ऐसा प्रतीत होता है कि ये सारे लोग प्रतीक्षारत थे, प्रतीक्षारत थीं उनकी आत्माएं और एक मौका आया और गर्भ उपलब्ध हो सके। और जब गर्भ उपलब्ध होने का मौका आता है, तो बहुत से गर्भ एक साथ उपलब्ध हो जाते हैं। जैसे कि फूल खिलता है एक। फूल का मौसम आया है, एक फूल खिला और आप पाते हैं कि दूसरा खिला और तीसरा खिला। फूल प्रतीक्षा कर रहे थे और खिल गए। सुबह हुई, सूरज निकलने की प्रतीक्षा थी और कुछ फूल खिलने शुरू हुए। कलियां टूटी, इधर फूल खिला उधर फूल निकला। रात भर से फूल प्रतीक्षा कर रहे थे, सूरज निकला और फूल खिल गए।

ठीक ऐसा ही निकृष्ट आत्माओं के लिए भी होता है। जब पृथ्वी पर उनके लिए योग्य वातावरण मिलता है, तो एक साथ एक श्रृंखला में वे पैदा हो जाते हैं। जैसे हमारे इस युग में भी हिटलर और स्टैलिन और माओ जैसे लोग एकदम से पैदा हुए। एकदम से ऐसे खतरनाक लोग पैदा हुए, जिनको हजारों साल तक प्रतीक्षा करनी पड़ी होगी। क्योंकि स्टैलिन या हिटलर या माओ जैसे आदमियों को भी जल्दी पैदा नहीं किया जा सकता। अकेले स्टैलिन ने रूस में कोई साठ लाख लोगों की हत्या की—अकेले एक आदमी ने। और हिटलर ने —अकेले एक आदमी नें—कोई एक करोड़ लोगों की हत्या की।

हिटलर ने हत्या के ऐसे साधन ईजाद किए, जैसे पृथ्वी पर कभी किसी ने नहीं किए। हिटलर ने इतनी सामूहिक हत्या की, जैसी कभी किसी आदमी ने नहीं की। तैमूरलंग और चंगेजखां सब बचकाने सिद्ध हो गए। हिटलर ने गैस चेंबर्स बनाए। उसने कहा, एक—एक आदमी को मारना तो बहुत महंगा है। एक—एक आदमी को मारो, तो गोली बहुत महंगी पड़ती है। एक—एक आदमी को मारना महंगा है, एक—एक आदमी को कब्र में दफनाना महंगा है। एक—एक आदमी की लाश को उठाकर गांव के बाहर फेंकना बहुत महंगा है। तो कलेक्टिव मर्डर, सामूहिक हत्या कैसे की जाए! लेकिन सामूहिक हत्या भी करने के उपाय हैं। अभी अहमदाबाद में कर दी या कहीं और कर दी, लेकिन ये बहुत महंगे उपाय हैं। एक—एक आदमी को मारो, बहुत तकलीफ होती है, बहुत परेशानी होती है, और बहुत देर भी लगती है। ऐसे एक —एक को मारोगे, तो काम ही नहीं चल सकता। इधर एक मारो, उधर एक पैदा हो जाता है। ऐसे मारने से कोई फायदा नहीं होता।

हिटलर ने गैस चेंबर बनाए। एक—एक चेंबर में पांच—पांच हजार लोगों को इकट्ठा खड़ा करके बिजली का बटन दबाकर एकदम से वाष्पीभूत किया जा सकता है। बस, पांच हजार लोग खड़े किए, बटन दबा और वे गए। एकदम गए और इसके बाद हाल खाली। वे गैस बन गए। इतनी तेज चारों तरफ से बिजली गई कि वे गैस हो गए। न उनकी कब्र बनानी पड़ी, न उनको कहीं मार कर खून गिराना पड़ा।

खून—जून गिराने का हिटलर पर कोई नहीं लगा सकता जुर्म। अगर पुरानी किताबों से भगवान चलता होगा, तो हिटलर को बिलकुल निर्दोष पाएगा। उसने खून किसी का गिराया ही नहीं, किसी की छाती में उसने छुरा मारा नहीं, उसने ऐसी तरकीब निकाली जिसका कहीं वर्णन ही नहीं था। उसने बिलकुल नई तरकीब निकाली, गैस चेंबर। जिसमें आदमी को खड़ा करो, बिजली की गर्मी तेज करो, एकदम वाष्पीभूत हो जाए, एकदम हवा हो जाए, बात खतम हो गई। उस आदमी का फिर नामोल्लेख भी खोजना मुश्किल है, हड्डी खोजना भी मुश्किल है, उस आदमी की चमड़ी खोजना मुश्किल है। वह गया। पहली दफा हिटलर ने इस तरह आदमी उड़ाए जैसे पानी को गर्म करके भाप बनाया जाता है। पानी कहां, गया, पता लगाना मुश्किल है। ऐसे सब खो गए आदमी। ऐसे गैस चेंबर बनाकर उसने एक करोड़ आदमियों को अंदाजन गैस चेंबर में उड़ा दिया।

ऐसे आदमी को जल्दी गर्भ मिलना बड़ा मुश्किल है। और अच्छा ही है कि नहीं मिलता। नहीं तो बहुत कठिनाई हो जाए। अब हिटलर को बहुत प्रतीक्षा करनी पड़ेगी फिर। बहुत समय लग सकता है हिटलर को दोबारा वापस लौटने के लिए। बहुत कठिन है मामला। क्योंकि इतना निकृष्ट गर्भ अब फिर से उपलब्ध हो। और गर्भ उपलब्ध होने का मतलब क्या है? गर्भ उपलब्ध होने का मतलब है, मां और पिता, उस मां और पिता की लंबी श्रृंखला दुष्टता का पोषण कर रही है—लंबी श्रृंखला। एकाध जीवन में कोई आदमी इतनी दुष्टता पैदा नहीं कर सकता है कि उसका गर्भ हिटलर के योग्य हो जाए। एक आदमी कितनी दुष्टता करेगा? एक आदमी कितनी हत्याएं करेगा? हिटलर जैसा बेटा पैदा करने के लिए, हिटलर जैसा बेटा किसी को अपना मां—बाप चुने इसके लिए सैकड़ों, हजारों, लाखों वर्षों की लंबी कठोरता की परंपरा ही कारगर हो सकती है। यानी सैकड़ों, हजारों वर्ष तक कोई आदमी बूचड़खाने में काम करते ही रहे हों, तब नस्ल इस योग्य हो पाएगी, वीर्याणु इस योग्य हो पाएगा कि हिटलर जैसा बेटा उसे पसंद करे और उसमें प्रवेश करे।

ठीक वैसा ही भली आत्मा के लिए भी है। लेकिन सामान्य आत्मा के लिए कोई कठिनाई नहीं है। उसके लिए रोज गर्भ उपलब्ध हैं। क्योंकि उसकी इतनी भीड़ है और उसके लिए चारों तरफ इतने गर्भ तैयार हैं और उसकी कोई विशेष मांगें भी नहीं हैं। उसकी मांगें बड़ी साधारण हैं। वही खाने की, पीने की, पैसा कमाने की, काम— भोग की, इज्जत की, आदर की, पद की, मिनिस्टर हो जाने की, इस तरह की सामान्य इच्छाएं हैं। इस तरह की इच्छाओं वाला गर्भ कहीं भी मिल सकता है, क्योंकि इतनी साधारण कामनाएं हैं कि सभी की हैं। हर मां —बाप ऐसे बेटे को चुनाव के लिए अवसर दे सकता है। लेकिन अब किसी आदमी को एक करोड़ आदमी मारने हैं, किसी आदमी को ऐसी पवित्रता से जीना है कि उसके पैर का दबाव भी पृथ्वी पर न पड़े, और किसी आदमी को इतने प्रेम से जीना है कि उसका प्रेम भी किसी को कष्ट न दे पाए, उसका प्रेम भी किसी के लिए बोझिल न हो जाए, तो फिर ऐसी आत्माओं के लिए तो प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।   
                     
में म्रत्यु सिखाता हूँ ~
प्रवचन 5 ~

ओशो.....♡

महाविधा माँ त्रिपुर भैरवी

समस्त दुःख संतापों से रक्षा करने वाली महाविधा  माँ त्रिपुर भैरवी

त्रिपुर भैरवी साधना दस महाविद्याओं में अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं तीव्र साधनात्मक स्वरूप है, ये माता तारा की तरह उग्र एवं सौम्य दोनों ही रुपों मे हैं। इस साधना से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुरक्षा प्राप्त होेने लगती है और समस्त बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। इस साधना के माध्यम से साधक पूर्ण क्षमतावान एवं वेगवान बन सकता है।
त्रिपुर भैरवी : त्रिपुर भैरवी की उपासना से सभी बंधन दूर हो जाते हैं। यह बंदीछोड़ माता है। भैरवी के नाना प्रकार के भेद बताए गए हैं जो इस प्रकार हैं त्रिपुरा भैरवी, चैतन्य भैरवी, सिद्ध भैरवी, भुवनेश्वर भैरवी, संपदाप्रद भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, कौलेश्वर भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, नित्याभैरवी, रुद्रभैरवी, भद्र भैरवी तथा षटकुटा भैरवी आदि। त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवता हैं।

माता की चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। इन्हें षोडशी भी कहा जाता है। षोडशी को श्रीविद्या भी माना जाता है। यह साधक को युक्ति और मुक्ति दोनों ही प्रदान करती है। इसकी साधना से षोडश कला निपुण सन्तान की प्राप्ति होती है। जल, थल और नभ में उसका वर्चस्व कायम होता है। आजीविका और व्यापार में इतनी वृद्धि होती है कि व्यक्ति संसार भर में धन श्रेष्ठ यानि सर्वाधिक धनी बनकर सुख भोग करता है।

जीवन में काम, सौभाग्य और शारीरिक सुख के साथ आरोग्य सिद्धि के लिए इस देवी की आराधना की जाती है। इसकी साधना से धन सम्पदा की प्राप्ति होती है, मनोवांछित वर या कन्या से विवाह होता है। षोडशी का भक्त कभी दुखी नहीं रहता है।

देवी कथा : नारद-पाञ्चरात्र के अनुसार एक बार जब देवी काली के मन में आया कि वह पुनः अपना गौर वर्ण प्राप्त कर लें तो यह सोचकर देवी अन्तर्धान हो जाती हैं। भगवान शिव जब देवी को को अपने समक्ष नहीं पाते तो व्याकुल हो जाते हैं और उन्हें ढूंढने का प्रयास करते हैं। शिवजी, महर्षि नारदजी से देवी के विषय में पूछते हैं तब नारदजी उन्हें देवी का बोध कराते हैं वह कहते हैं कि शक्ति के दर्शन आपको सुमेरु के उत्तर में हो सकते हैं। वहीं देवी की प्रत्यक्ष उपस्थित होने की बात संभव हो सकेगी। तब भोले शिवजी की आज्ञानुसार नारदजी देवी को खोजने के लिए वहां जाते हैं। महर्षि नारदजी जब वहां पहुंचते हैं तो देवी से शिवजी के साथ विवाह का प्रस्ताव रखते हैं यह प्रस्ताव सुनकर देवी क्रुद्ध हो जाती हैं और उनकी देह से एक अन्य षोडशी विग्रह प्रकट होता है और इस प्रकार उससे छाया विग्रह 'त्रिपुर-भैरवी' का प्राकट्य होता है।

त्रिपुर भैरवी का मंत्र:-
जैसा की इनके कई रूप है, और ये भैरव की पत्नी भी कही  जाती हैं, हर प्रकार के वेद शास्त्रों में इनका अलग -अलग मंत्र है, जो भी आप के अनुभव मे हो सुविधा अनुसार चुन सकते है। 

।। ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:।। ( यामल तंत्र) 

।। ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः।। ( श्री सूक्त) 

।।ह्नीं भुवनेश्वरीयै ह्नीं नम:।। (शैव तंत्र) 

॥ ह सें ह स क रीं ह सें ॥ ( मुंडमाला तंत्रम) 

या

॥ ॐ हसरीं त्रिपुर भैरव्यै नम: ॥( मुंडमाला तंत्रम)

।। ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा ।l ( देवी भागवतः) 

त्रिपुर भैरवी ध्यान –

 उद्यद्भानुसहस्त्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां।
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।
हस्ताब्जैदधतीं त्रिनेत्रविलसद्रक्तारविन्दशियं।
देवीं बद्धहिमांशुरक्तमुकुटां वन्दे समन्दस्मिताम्।। 

त्रिपुर भैरवी का मंत्र को लाल ऊनी आसान पर मुंगे की माला से पंद्रह माला मंत्र का जाप कर सकते हैं। इसमें नित्य एक बार हवन का विधान हैं। 

मूलतः ये नारी प्रधान (फेमिनिस्ट) विधा है,यही एक महाविधा हैं जिनकी साधना महिलाओं में विशेष प्रिय हैं, एक मात्र महिला अघोरी लल्लेश्वरी इनकी ही साधक हैं,नवरात्रों में की जाने वाली कन्या भोज में एक तरह से माँ त्रिपुर भैरवी साधना ही है, खुद गुरुवर राम कृष्ण परमहंस भी अपनी पत्नि माता शारदा देवी का पूजन किया करते थे, कुछ प्रचलित विधियों में कुमारी पूजन, योनि पूजन और देवरति हैं। 
ऋग्वेद में सांकेतिक रूप से पंचचक्रो का विवरण है। इन्हीं पंचचक्रों में से एक है भैरवी चक्र। इन चक्रों की दो प्रकार से पूजा की जाती है। एक दक्षिण मार्ग से और एक वाममार्ग से। 
कुछ किस्से कहानियों और फिल्मों ने कुछ ज्यादा ही भ्रमित कर रखा है, लोग गड़े खजाने तंत्र- मंत्र ,जादू -टोना और ना जाने क्या क्या पाखंड रच रहे हैं। ये विद्या एक ढाल की तरह काम करती हैं, हर दुःख तकलीफ मे साधक का साथ देती हैं, उसकी रक्षा करती हैं। तामसी की मतलब ये नहीं की बेजुबान जनवार की हत्या करो ,बल्कि अंधेरे से उजाले की यात्रा हैं। 
जय श्री हरि: जय माँ त्रिपूर भैरवी 🙏

अर्जुन के फायदे

अर्जुन के फायदे ========== 1. हृदय के रोग : अर्जुन की मोटी छाल का महीन चूर्ण एक चम्मच की मात्रा में मलाई रहित एक कप दूध के साथ सुबह-शाम नियमित सेवन करते रहने से हृदय के समस्त रोगों में लाभ मिलता है, हृदय की बढ़ी हुई धड़कन सामान्य होती है। 2. हड्डी टूटने पर :अर्जुन के पेड़ के पाउडर की फंकी लेकर दूध पीने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है। चूर्ण को पानी के साथ पीसकर लेप करने से भी दर्द में आराम मिलता है। 3. जलने पर : आग से जलने पर उत्पन्न घाव पर अर्जुन की छाल के चूर्ण को लगाने से घाव जल्द ही भर जाता है। 4. खूनी प्रदर : इसकी छाल का 1 चम्मच चूर्ण, 1 कप दूध में उबालकर पकाएं, आधा शेष रहने पर थोड़ी मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करें, इसे दिन में 3 बार लें। 5. शारीरिक दुर्गंध को दूर करने के लिए : अर्जुन और जामुन के सूखे पत्तों का चूर्ण उबटन की तरह लगाकर कुछ समय बाद नहाने से अधिक पसीना आने के कारण उत्पन्न शारीरिक दुर्गंध दूर होगी। 6. मुंह के छाले : अर्जुन की छाल के चूर्ण को नारियल के तेल में मिलाकर छालों पर लगायें। इससे मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं। 7. पेशाब में धातु का आना : अर्जुन की छाल का 40 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिए। 8. ताकत को बढ़ाने के लिए : अर्जुन बलकारक है तथा अपने लवण-खनिजों के कारण हृदय की मांसपेशियों को सशक्त बनाता है। दूध तथा गुड़, चीनी आदि के साथ जो अर्जुन की छाल का पाउडर नियमित रूप से लेता है, उसे हृदय रोग, जीर्ण ज्वर, रक्त-पित्त कभी नहीं सताते और वह चिरंजीवी होता है। 9. श्वेतप्रदर : महिलाओं में होने वाले श्वेतप्रदर तथा पेशाब की जलन को रोकना भी इसके विशेष गुणों में है। 10. पुरानी खांसी : छाती में जलन, पुरानी खांसी आदि को रोकने में यह सक्षम है। 11. हार्ट फेल : हार्ट फेल और हृदयशूल में अर्जुन की 3 से 6 ग्राम छाल दूध में उबालकर लें। 12. तेज धड़कन, दर्द, घबराहट : अर्जुन की पिसी छाल 2 चम्मच, 1 गिलास दूध, 2 गिलास पानी मिलाकर इतना उबालें कि केवल दूध ही बचे, पानी सारा जल जाये। इसमें दो चम्मच चीनी मिलाकर छानकर नित्य एक बार हृदय रोगी को पिलायें। हृदय सम्बंधी रोगों में लाभ होगा। शरीर ताकतवर होगा। 13. पेट दर्द : आधा चम्मच अर्जुन की छाल, जरा-सी भुनी-पिसी हींग और स्वादानुसार नमक मिलाकर सुबह-शाम गर्म पानी के साथ फंकी लेने से पेट के दर्द, गुर्दे का दर्द और पेट की जलन में लाभ होता है। 14. पीलिया : आधा चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण जरा-सा घी में मिलाकर रोजाना सुबह और शाम लेना चाहिए। 15. मुखपाक (मुंह के छाले) : अर्जुन की जड़ के चूर्ण में मीठा तेल मिलाकर गर्म पानी से कुल्ले करने से मुखपाक मिटता है। 16. कान का दर्द : अर्जुन के पत्तों का 3-4 बूंद रस कान में डालने से कान का दर्द मिटता है। 17. मुंह की झांइयां : इसकी छाल पीसकर, शहद मिलाकर लेप करने से मुंह की झाइयां मिटती हैं। ***************************************** नोट - ऊपर बताये गए उपाय और नुस्खे आपकी जानकारी के लिए है। कोई भी उपाय और दवा प्रयोग करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह जरुर ले और उपचार का तरीका विस्तार में जाने। #HariomHealth

गिलोय एक वरदान है


 
गिलोय के रूप में प्रकृति ने हमें ऐसा वरदान दिया है, जिससे न सिर्फ कोविड वायरस के प्रकोप से बचा जा सकता है, बल्कि शरीर में होने वाले विभिन्न रोगों में भी यह औषधि आश्चर्यजनक फायदा देती है

#गिलोय एक ही ऐसी बेल है, जिसे आप सौ मर्ज की एक दवा कह सकते हैं। इसलिए इसे संस्कृत में अमृता नाम दिया गया है। 

मान्यता है कि देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला और इस अमृत की बूंदें जहां-जहां छलकीं, वहां-वहां गिलोय की उत्पत्ति हुई।

#इसका वानस्पिक नाम( Botanical name) टीनोस्पोरा कॉर्डीफोलिया (tinospora cordifolia है। इसके पत्ते पान के पत्ते जैसे दिखाई देते हैं और जिस पौधे पर यह चढ़ जाती है, उसे मरने नहीं देती। इसके बहुत सारे लाभ आयुर्वेद में बताए गए हैं, जो न केवल आपको सेहतमंद रखते हैं, बल्कि आपकी सुंदरता को भी निखारते हैं। 

#गिलोय बढ़ाती है रोग प्रतिरोधक क्षमता

गिलोय एक ऐसी बेल है, जो व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर उसे बीमारियों से दूर रखती है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो शरीर में से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करते हैं। यह खून को साफ करती है, बैक्टीरिया से लड़ती है। लिवर और किडनी की अच्छी देखभाल भी गिलोय के बहुत सारे कामों में से एक है। ये दोनों ही अंग खून को साफ करने का काम करते हैं।

#ठीक करती है बुखार

अगर किसी को बार-बार बुखार आता है तो उसे गिलोय का सेवन करना चाहिए। गिलोय हर तरह के बुखार से लडऩे में मदद करती है। इसलिए डेंगू के मरीजों को भी गिलोय के सेवन की सलाह दी जाती है। डेंगू के अलावा मलेरिया, स्वाइन फ्लू में आने वाले बुखार से भी गिलोय छुटकारा दिलाती है।

#गिलोय के फायदे – डायबिटीज के रोगियों के लिए

गिलोय एक हाइपोग्लाइसेमिक एजेंट है यानी यह खून में शर्करा की मात्रा को कम करती है। इसलिए इसके सेवन से खून में शर्करा की मात्रा कम हो जाती है, जिसका फायदा टाइप टू डायबिटीज के मरीजों को होता है।

#पाचन शक्ति बढ़ाती है

यह बेल पाचन तंत्र के सारे कामों को भली-भांति संचालित करती है और भोजन के पचने की प्रक्रिया में मदद कती है। इससे व्यक्ति कब्ज और पेट की दूसरी गड़बडिय़ों से बचा रहता है।

#बढ़ाती है आंखों की रोशनी

गिलोय को पलकों के ऊपर लगाने पर आंखों की रोशनी बढ़ती है। इसके लिए आपको गिलोय पाउडर को पानी में गर्म करना होगा। जब पानी अच्छी तरह से ठंडा हो जाए तो इसे पलकों के ऊपर लगाएं।

#अस्थमा में भी फायदेमंद

मौसम के परिवर्तन पर खासकर सर्दियों में अस्थमा को मरीजों को काफी परेशानी होती है। ऐसे में अस्थमा के मरीजों को नियमित रूप से गिलोय की मोटी डंडी चबानी चाहिए या उसका जूस पीना चाहिए। इससे उन्हें काफी आराम मिलेगा।

#गठिया में मिलेगा आराम

गठिया यानी आर्थराइटिस में न केवल जोड़ों में दर्द होता है, बल्कि चलने-फिरने में भी परेशानी होती है। गिलोय में एंटी आर्थराइटिक गुण होते हैं, जिसकी वजह से यह जोड़ों के दर्द सहित इसके कई लक्षणों में फायदा पहुंचाती है।

#कम होगी पेट की चर्बी

गिलोय शरीर के उपापचय (मेटाबॉलिजम) को ठीक करती है, सूजन कम करती है और पाचन शक्ति बढ़ाती है। ऐसा होने से पेट के आस-पास चर्बी जमा नहीं हो पाती और आपका वजन कम होता है।

#जवां रखती है गिलोय

गिलोय में एंटी एजिंग गुण होते हैं, जिसकी मदद से चेहरे से काले धब्बे, मुंहासे, बारीक लकीरें और झुर्रियां दूर की जा सकती हैं। इसके सेवन से आप ऐसी निखरी और दमकती त्वचा पा सकते हैं, जिसकी कामना हर किसी को होती है। अगर आप इसे त्वचा पर लगाते हैं तो घाव बहुत जल्दी भरते हैं। त्वचा पर लगाने के लिए गिलोय की पत्तियों को पीस कर पेस्ट बनाएं। अब एक बरतन में थोड़ा सा नीम या अरंडी का तेल उबालें। गर्म तेल में पत्तियों का पेस्ट मिलाएं। ठंडा करके घाव पर लगाएं। इस पेस्ट को लगाने से त्वचा में कसावट भी आती है।

#काढ़ा

चार इंच लंबी गिलोय की डंडी को छोटा-छोटा काट लें। इन्हें कूट कर एक कप पानी में उबाल लें। पानी आधा होने पर इसे छान कर पीएं। अधिक फायदे के लिए आप इसमें लौंग, अदरक, तुलसी भी डाल सकते हैं।

#अन्य फायदे

अरंडी यानी कैस्टर के तेल के साथ गिलोय मिलाकर लगाने से गाउट(जोड़ों का गठिया) की समस्या में आराम मिलता है।इसे अदरक के साथ मिला कर लेने से रूमेटाइड आर्थराइटिस की समस्या से लड़ा जा सकता है।खांड के साथ इसे लेने से त्वचा और लिवर संबंधी बीमारियां दूर होती हैं।आर्थराइटिस से आराम के लिए इसे घी के साथ इस्तेमाल करें।कब्ज होने पर गिलोय में गुड़ मिलाकर खाएं।

#साइड इफेक्ट्स

वैसे तो गिलोय को नियमित रूप से इस्तेमाल करने के कोई गंभीर दुष्परिणाम अभी तक सामने नहीं आए हैं लेकिन चूंकि यह खून में शर्करा की मात्रा कम करती है। इसलिए इस बात पर नजर रखें कि ब्लड शुगर जरूरत से ज्यादा कम न हो जाए। 

#गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को गिलोय के सेवन से बचना चाहिए। पांच साल से छोटे बच्चों को गिलोय न दे।

 हैपी गार्डनिंग । यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है , या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो , तो हमें Email snjmalik14@gmail.com WhatsApp  +919034582897

DISHA-COVID relief initiative ( Providing Medical AID to INDIA)

आदिशक्ति

{{{ॐ}}}

                                                                        #आदिशक्ति

हमारा शरीर एक ऊर्जा परिपथ से संचालित होता है इसका ऊर्जा चक्र निर्धारित है जो प्रकृति ने किया हुआ है इसी ऊर्जा चक्र के कारण उसे सभी कर्म करने होते हैं ऊर्जा चक्र की इस व्यवस्था से हमारे संघर्षशील कर्म के द्वारा तकनीकी द्वारा ऊर्जा चक्र में परिवर्तित किया जा सकता हैa क्या इसे सिद्ध किया जा सकता है जैसा संस्कृत की हुआ है ऐसे तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि यह विवरण अधूरी हैं यह ऐसे शिष्यों को लिखाएं गये या रटाये गए नियम है जो प्रारंभिक सभी तकनीकों को सीख चुके होते हैं।
 जो सभी सिद्धियों के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है। ईष्ट कोई भी हो यदि उसकी आराधना करने वाला उसमें सचमुच डूबता है तो उसी भाव को प्राप्त होगा अर्थात उस भाव की प्रवृत्ति बन जाती है भाव गहन है मानसिक शक्ति है एकाग्र होती है  वह एकाग्र होगी तो शक्तिशाली होगी यह शक्तिशाली हुई तो शरीर कि ऊर्जा तंत्र शक्तिशाली होगा। भाव बिना कोई सिद्धि नहीं होती भाव गहन नहीं है तो विस्मृति नहीं तो सिद्धि भी नहीं कई लाख मंत्र जपने और हजारों यज्ञ साधना करने का भी कोई लाभ नहीं भाव बिना पुजा भी नही है यहां तक कि भाव बिना भौतिक कर्म भी नहीं इसलिए जो आप कर रहे हैं sउसके प्रति विश्वास का प्रबल होना और उस भाव में विलीन हो जाना उस भाव की सिद्धि है यही इसमें वर्गीकरण है।
इसी शारीरिक प्राकृतिक ऊर्जा संरक्षण को तंत्र कहा जाता है इसमें जितनी तकनीकी प्रयुक्त की जाती है वह सभी इसी पर पद की संभावित तकनीक है जो ब्रह्मांड इस तकनीक पर क्रिया कर रहा है एक कान से लेकर जीव तक पृथ्वी से लेकर सूर्य तक न केवल एक ही उर्जा संरचना में बंधे हुए हैं बल्कि क्रियाशीलता की तकनीक भी सब में एक ही है।
यह तकनीकी तंत्र योग सिद्धि साधना सभी में प्रयुक्त की जाती है सैद्धांतिक रूप से सभी एक स्थान पर प्रयोग एक तकनीक भी ने पर प्रक्रिया वही है गणना करने का नियम वही है बस तरीका अलग है लोग राम के ध्यान में डूबता है वह भी अच्छा परिणाम पाता है जो कृष्ण या दुर्गा के भी कोई खुदा का नाम लेकर ध्यान कोई परब्रह्म कह कर उस में लिप्त होना चाहता है इन सब को लाभ होता है।
पर यह सब उसने आदिशक्ति भगवती परांबा का ही विस्तृत रूप है जिसे लोग विभिन्न नाम लेकर उसके भाव में डूबते हैं और हमने वही प्रक्रिया होती हैh लोग मानसिक संतुष्टि से उत्पन्न आत्मबल की बात करने लगते हैं पर यह केवल इतना ही नहीं यह तो ऊर्जा का परिपथ जो हमारे शरीर के अंदर व्याप्त है यह भाव की गहनता है से उस भाव की उर्जा का शक्तिशाली और तीन केंद्रीय करण कर सकता है।
 इससे दिव्य शक्तियां उत्पन्न होने लगती है यह केवल इतना ही है कि हमारे शरीर में भाव जितना गहन होगा उसके ऊर्जा उत्पादन बिंदुओं में उतनी तीव्रता से उर्जा का उत्सर्जन होगा इससे शरीर के गुण परिवर्तित होने लगेंगे और बढ़ी हुई तरंगों को यदि वह व्यक्ति केंद्रीय कृत कर सकता है तो उसमें अतींद्रिय क्षमता विकसित होगी इन तरंगों को बढ़ाकर अंतिम सत्य को अनुभूत करने के लिए अतींद्रिय शक्तियां प्राप्त करना इन सभी पूजा-पाठ तंत्र योग साधना सिद्धि किस विषय से मार्ग कोई भी हो सभी का उद्देश्य उस परमात्मा सदाशिव में जाकर समाप्त हो जाता है और यही आदि शक्ति भी है ।
क्या यह विज्ञान है अब प्रश्न उठता है कि आखिर यह विज्ञान क्या है क्या इसकी कोई तर्कसंगत वैज्ञानिक व्याख्या हो सकती है हालांकि इस विज्ञान का महत्व पूर्ण विवरण लुप्त हो चुका है विश्वशम स्तरीय और पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं है जो आज उपलब्ध है इसका कारण केवल इतना है कि समाज के चोर उचक्के इस महाशक्तिशाली विज्ञान के नियमों एवं जानकारियों का प्रयोग विनाश में करने लगे।
सनातन धर्म की यह व्याख्या प्रकृति का शाश्वत धर्म है आज की भाषा में कहें तो प्रकृति की संपूर्ण ऊर्जा संरचना उसकी उत्पत्ति और क्रिया के सिद्धांत एक सूत्र का विवरण  है oकि ज्ञान जो भारत में प्राचीन काल में ब्रह्म ज्ञान तत्वज्ञान परमात्मा ज्ञान के नाम से प्रसिद्ध था और अति गोपनीय था आज लुप्त हो चुका है उसी परमात्मा के ब्रह्म ज्ञान को जाना अत्यंत जाकर है ।
वह तत्व ही सत्य है वहीं विभू है यह सृष्टि उस तत्व से उत्पन्न होने वाली एक मरीचिका है जीव की इंद्रियों की क्षमता बहुत अल्प है यह झूठे संकेत भेजते हैं इन ठगों की ही माया यह सृष्टि है यह सभी जो तर्कशास्त्र नीति शास्त्र भावुकता कल्याण भाव से भरे मनुष्य के अंदर आस्थाओं से यह बात करते रहे अर्थात एक विकसित संस्कृति हजारों वर्ष तक एक मूर्खता के पीछे दीवानी रही जो मानव भय का परिणाम है।
अर्थात परमात्मा खुदा या गॉड या जो भी आप उसे कह लें लेकिन यह भय नहीं सत्य है वेद इस इसे तत्व परम तत्व परमात्मा पुरूष आदि कहा गया है और इसे शुन्य अर्थात जीरो कहा गया है वही आदिशक्ति है इसी शुन्य से असंख्य के संख्याएं जन्म ले रही हैंk शैवमार्गी इस तत्व को सदाशिव कहते हैं यहां शिव शांति और निष्क्रियता का प्रतीक तत्व है।
यह सृष्टि उसी निष्क्रिय तत्व में बनने वाला एक भंवर है उस उर्जा भंवर की उत्पत्ति कैसे होती है यह किस ऊर्जा संरचना से बनता है यह उस उर्जा संरचना के बनने का कारण क्या है यह सब पहली पोस्टों में भी लिखा जा चुका है और यही जगन्यमाता आदिशक्ति है sabhar sakti upasak agyani Facebook wall

दुनिया का सबसे ताकतवर पोषण पूरक आहार है- सहजन

दुनिया का सबसे ताकतवर पोषण पूरक आहार है- सहजन (मुनगा)। इसकी जड़ से लेकर फूल, पत्ती, फल्ली, तना, गोंद हर चीज उपयोगी होती है। 
           आयुर्वेद में सहजन से तीन सौ रोगों का उपचार संभव है। सहजन के पौष्टिक गुणों की तुलना :- विटामिन सी- संतरे से सात गुना अधिक। विटामिन ए- गाजर से चार गुना अधिक। कैलशियम- दूध से चार गुना अधिक। पोटेशियम- केले से तीन गुना अधिक। प्रोटीन- दही की तुलना में तीन गुना अधिक। 
            स्वास्थ्य के हिसाब से इसकी फली, हरी और सूखी पत्तियों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन-ए, सी और बी-काम्प्लेक्स प्रचुर मात्रा में पाई जाते हैं। इनका सेवन कर कई बीमारियों को बढ़ने से रोका जा सकता है, इसका बॉटेनिकल नाम ' मोरिगा ओलिफेरा ' है। हिंदी में इसे सहजना, सुजना, सेंजन और मुनगा नाम से भी जानते हैं, जो लोग इसके बारे में जानते हैं, वे इसका सेवन जरूर करते हैं। 
          सहजन का फूल पेट और कफ रोगों में, इसकी फली वात व उदरशूल में, पत्ती नेत्ररोग, मोच, साइटिका, गठिया आदि में उपयोगी है। इसकी छाल का सेवन साइटिका, गठिया, लीवर में लाभकारी होता है। सहजन के छाल में शहद मिलाकर पीने से वात और कफ रोग खत्म हो जाते हैं। 
          सहजन की पत्ती का काढ़ा बनाकर पीने से गठिया, साइटिका, पक्षाघात, वायु विकार में शीघ्र लाभ पहुंचता है। साइटिका के तीव्र वेग में इसकी जड़ का काढ़ा तीव्र गति से चमत्कारी प्रभाव दिखाता है। मोच इत्यादि आने पर सहजन की पत्ती की लुगदी बनाकर सरसों तेल डालकर आंच पर पकाएं और मोच के स्थान पर लगाने से जल्दी ही लाभ मिलने लगता है।
            सहजन के फली की सब्जी खाने से पुराने गठिया, जोड़ों के दर्द, वायु संचय, वात रोगों में लाभ होता है। इसके ताजे पत्तों का रस कान में डालने से दर्द ठीक हो जाता है साथ ही इसकी सब्जी खाने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी कटकर निकल जाती है। इसकी जड़ की छाल का काढ़ा सेंधा नमक और हींग डालकर पीने से पित्ताशय की पथरी में लाभ होता है। 
          सहजन के पत्तों का रस बच्चों के पेट के कीड़े निकालता है और उल्टी-दस्त भी रोकता है। ब्लड प्रेशर और मोटापा कम करने में भी कारगर सहजन का रस सुबह-शाम पीने से हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होता है। इसकी पत्तियों के रस के सेवन से मोटापा धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसकी छाल के काढ़े से कुल्ला करने पर दांतों के कीड़े नष्ट होते हैं और दर्द में आराम मिलता है। 
            सहजन के कोमल पत्तों का साग खाने से कब्ज दूर होता है, इसके अलावा इसकी जड़ के काढ़े को सेंधा नमक और हींग के साथ पीने से मिर्गी के दौरों में लाभ होता है। इसकी पत्तियों को पीसकर लगाने से घाव और सूजन ठीक होते हैं। 
          सहजन के बीज से पानी को काफी हद तक शुद्ध करके पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके बीज को चूर्ण के रूप में पीसकर पानी में मिलाया जाता है। पानी में घुल कर यह एक प्रभावी नेचुरल क्लोरीफिकेशन एजेंट बन जाता है। यह न सिर्फ पानी को बैक्टीरिया रहित बनाता है, बल्कि यह पानी की सांद्रता को भी बढ़ाता है।
            कैंसर तथा शरीर के किसी हिस्से में बनी गांठ, फोड़ा आदि में सहजन की जड़ का अजवाइन, हींग और सौंठ के साथ काढ़ा बनाकर पीने का प्रचलन है। यह काढ़ा साइटिका (पैरों में दर्द), जोड़ों में दर्द, लकवा, दमा, सूजन, पथरी आदि में भी लाभकारी है |
            सहजन के गोंद को जोड़ों के दर्द तथा दमा आदि रोगों में लाभदायक माना जाता है। आज भी ग्रामीणों की ऐसी मान्यता है कि सहजन के प्रयोग से वायरस से होने वाले रोग, जैसे चेचक आदि के होने का खतरा टल जाता है। 
           सहजन में अधिक मात्रा में ओलिक एसिड होता है, जो कि एक प्रकार का मोनोसैच्युरेटेड फैट है और यह शरीर के लिए अति आवश्यक है। सहजन में विटामिन-सी की मात्रा बहुत होती है। यह शरीर के कई रोगों से लड़ता है। यदि सर्दी की वजह से नाक-कान बंद हो चुके हैं तो, सहजन को पानी में उबालकर उस पानी का भाप लें। इससे जकड़न कम होती है। सहजन में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है, जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं। इसका जूस गर्भवती को देने की सलाह दी जाती है, इससे डिलवरी में होने वाली समस्या से राहत मिलती है और डिलवरी के बाद भी मां को तकलीफ कम होती है, गर्भवती महिला को इसकी पत्तियों का रस देने से डिलीवरी में आसानी होती है।
           सहजन के फली की हरी सब्जी को खाने से बुढ़ापा दूर रहता है इससे आंखों की रोशनी भी अच्छी होती है। सहजन को सूप के रूप में भी पी सकते हैं,  इससे शरीर का खून साफ होता है। 
            सहजन का सूप पीना सबसे अधिक फायदेमंद होता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। विटामिन सी के अलावा यह बीटा कैरोटीन, प्रोटीन और कई प्रकार के लवणों से भरपूर होता है, यह मैगनीज, मैग्नीशियम, पोटैशियम और फाइबर से भरपूर होते हैं। यह सभी तत्व शरीर के पूर्ण विकास के लिए बहुत जरूरी हैं। 
            कैसे बनाएं सहजन का सूप? सहजन की फली को कई छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेते हैं। दो कप पानी लेकर इसे धीमी आंच पर उबलने के लिए रख देते हैं, जब पानी उबलने लगे तो इसमें कटे हुए सहजन की फली के टुकड़े डाल देते हैं, इसमें सहजन की पत्त‍ियां भी मिलाई जा सकती हैं, जब पानी आधा बचे तो सहजन की फलियों के बीच का गूदा निकालकर ऊपरी हिस्सा अलग कर लेते हैं, इसमें थोड़ा सा नमक और काली मिर्च मिलाकर पीना चाहिए। 
           १. सहजन के सूप के नियमित सेवन से सेक्सुअल हेल्थ बेहतर होती है. सहजन महिला और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से फायदेमंद है। 
           २. सहजन में एंटी-बैक्टीरियल गुण पाया जाता है जो कई तरह के संक्रमण से सुरक्षित रखने में मददगार है. इसके अलावा इसमें मौजूद विटामिन सी इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने का काम करता है। 
          ३. सहजन का सूप पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाने का काम करता है, इसमें मौजूद फाइबर्स कब्ज की समस्या नहीं होने देते हैं। 
          ४. अस्थमा की शिकायत होने पर भी सहजन का सूप पीना फायदेमंद होता है. सर्दी-खांसी और बलगम से छुटकारा पाने के लिए इसका इस्तेमाल घरेलू औषधि के रूप में किया जाता है। 
          ५. सहजन का सूप खून की सफाई करने में भी मददगार है, खून साफ होने की वजह से चेहरे पर भी निखार आता है। 
          ६. डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए भी सहजन के सेवन की सलाह दी जाती है।
प्रस्तुति - जितेन्द्र रघुवंशी, प्रज्ञाकुंज, हरिद्वार

कालानमक

उत्तरी पूर्वी उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक चर्चित एवं विख्यात धान की स्थानीय किसानों की किस्म कालानमक विगत तीन हजार वर्षा से खेती में प्रचलित रही है. सुधरी प्रजातियों अनुपलब्धता के कारण मूलतः स्वाद और सुगन्ध में किसानों की यह धान की किस्म विलुप्त होने के कगार पर थी. इसकी खेती का क्षेत्रफल 50 हजार से घटकर 2 हजार पर आ गया था और पूरा अन्देशा था कि धान की यह दुर्लभ किस्म हमेशा के लिए विलुप्त हो जायेगी. किसानों और उपभोक्ता को कालानमक धान की पहली प्रजाति केएन3 2010 में मिली जिसमें स्वाद और सुगन्ध दोनो ही पाये गये. इसके पश्चात् पहली बौनी प्रजाति बौना कालानमक 101 भारत सरकार द्वारा 2016 में और बौना कालानमक 2017 में अधिसूचना किया गया. दोनों प्रजातियों में उपज 40 से 45 कुन्टल थी फिर भी दाने के गुण में कमी के कारण किसान और उपभोक्ता दोनो पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नही थे. इन्ही कमियों को दूर करके 2019 में पीआरडीएफ संस्था ने कालानमक किरण नामक प्रजाति भारत सरकार से विमोचित कराई. प्रस्तुत लेख में कालामक किरण के विषय में विस्तृत जानकारी दी गई है. कालानमक किरण का उद्भव एवं विकास कालानमक केएन3 और स्वर्णा सब1 के संकरण से एक प्रजनक लाइन पीआरडीएफ-2&14&10&1&1 विकसित की गई. लगातार 3 वर्षो तक 2013 से 2016 तक इसका परीक्षण कृषि विभाग के सम्भागीय कृषि परीक्षण एवं प्रदर्शन केन्द्रों पर कराया गया . यह पाया गया कि इस प्रजनक लाइन की उपज केएन3 की तुलना में 25 से 30 प्रतिशत अधिक रही है. उत्तर प्रदेश कृषि विभाग तथा अखिल भारतीय धान उन्नयन योजना के अन्तर्गत अनेक केन्द्रों पर परीक्षित की गई.   आकारिक गुण एवं विशेषताए लगभग 95 सेमी चाई तथा 35 सेमी लम्बी बालियों वाली यह प्रजाति प्रकाश अवध की संवेदी है. अर्थात् इसकी बाली 20 अक्टूबर के आस-पास ही निकलती है. भारत सरकार के केन्द्रिय प्रजाति विमोचन की 82 मीटिंग में इसको अगस्त 2019 में अधिसूचनांकित की गई थी. इसके 1000 दाने का वनज 15 ग्राम तथा दाना मध्यम पतला होता है.  छोटे दाने वाली धान की यह प्रजाति अत्यधिक सुगन्धित तथा अत्यधिक साबुत चावल देती है.  इसकी कुछ खास बाते है जो अन्य प्रजातियों मे इसको सर्वौत्तम बनाती है वो है इसका लोहा और जस्ता की मात्रा, प्रोटीन का प्रतिशत (10.4) और निम्न ग्लाईसिमीक इंडेक्स (53.1). ग्लाईसिमीक इंडेक्स कम होने के कारण इसको मधुमेह रोगी भी इसको खा सकते है. इसमें एमाइलोज कम (20 प्रतिशत) होता है अतः पकाने पर इसका भात हमेशा मुलायम और स्वादिष्ट रहता है. खेती की विधि कालानमक किरण एक प्रकाश अवध संवेदी प्रजाति है. इसमें बालिया 20 अक्टूबर के आस-पास निकलती है तथा 25 नवम्बर के आस -पास यह कटाई के लिए तैयार होती है. अतः इसकी बुवाई का उचित समय जून का अन्तिम पखवारा (15 से 30 जून) के बीच ही है. एक हैक्टेयर में खेती के लिए 30 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है. जुलाई पहले सप्ताह के बाद बुवाई करने से इसकी पैदावार कम हो जाती है, लेकिन 15 जून से पहले बुवाई करने पर इसकी पैदावार में कोई बढ़ोत्तरी नही होती.  रोपाई की विधि जब पौध 20 से 30 दिन की हो जाये तो इसे उखाड़ कर 20 सेमी कतार से कतार और 15 सेमी पौधे से पौधे की दूरी पर रोपाई कर दी जाये. एक स्थान पर 2 से 3 पौध ही लगावे. खाद की मात्रा कालानमक की बौनी प्रजातियों में 120 ग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 60 किलोग्राम पोटास की आवश्यक्ता होती है. फासफोरस एवं पोटास की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा रोपाई से पहले मिलाकर खेत में ड़ाल दी जाती है.  रोपाई के एक महीने बाद खर पतवार नियन्त्रण के बाद बची हुई 60 किलोग्राम नत्रजन की मात्रा ऊपर से छिड़काव करके ड़ाल दी जा सकती है. फसल प्रबन्धन यदि जस्तें की कमी के लक्षण दिखाई पड़े तो 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 2.5 किलोग्राम चूने को 500 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़क दे. खरपतवार नियन्त्रण के लिए रोपाई के एक माह के अन्दर खुरपी से उगे हुए  खरपतवारों को निकाल दे इसके पश्चात् यदि 2 -3 सेमी पानी भरा रहे तो आगे निराई की आवश्यकता नही पड़ती.  रोपाई के समय खेत तैयार करते समय जो कुछ भी खरपतवार उगे रहते है वे स्वयं ही नष्ट हो जाते है. यदि रासायनिक खरपतवारनाशी का प्रयोग करना पड़े तो रोपाई के 15 से 20 दिन के बाद उसे ड़ाल सकते है.   कालानमक किरण में प्रमुख कीटों और बीमारियों से रोधिता पायी जाती है. अतः उनके लिए किसी भी रासायनिक दवाओं का उपयोग नही करना पड़ता किन्तु गन्धी कीट सीथ ब्लाइट व पर्ण गलन रोग के लिए दवाओं का उपयोग करना पड़ता है. गन्धी कीट का उपचार बीएचसी का बूरकाव करके किया जा सकता है. पर्ण गलन रोग के उपचार के लिए 0.2 प्रतिशत हैक्साकोनाजोल अथवा 1 लीटर प्रोपीकोनाजोल 25 ईसी का छिड़काव करके किया जा सकता है. सुगन्धित होने के करण इसमें तनाछेदक कीट का भी प्रकोप होता है कार्टाप हाइड्रेक्लोराइड 18 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर खेत में  5 से 6 दिन तक 3 से 4 सेमी पानी बनाये रखे.     रासायनिक खरपतवारनाशी जैसे: ब्यूटाक्लोर 2.5 लीटर प्रति हैक्टेयर, अनिलोफास 1.5 लीटर प्रति हैक्टेयर अथवा नोमिनी गोल्ड 250 एमएल प्रति हैक्टेयर अच्छे खरपतवारनाशी है. इनका उपयोग इन पर लिखे हुए अनुशंसा के अनुरूप कर सकते है. कालानमक किरण की जैविक खेती यदि कालानमक किरण का उत्पादन जैविक विधि से करना है तो पहले से तैयार जैविक खेत का ही प्रयोग करें.  बीजोपचार के लिए ट्राइकोडर्मा से बीज शोधित कर ले.  रोपाई करते समय या रोपाई करने से पहले सूडोमोनास के दो प्रतिशत घोल में पौध की जड़े डुबाने के पश्चात् रोपाई करें. 5 टन प्रति हैटेयर गोबर की सड़ी खाद या मुर्गी की खाद डाले. सर्वोत्तम है कि रोपाई के 40 दिन पहले 40 किलोंग्राम ढ़ैचा (सिसबानिया)/हैक्टेयर का बीज मुख्य खेत में बोये. जब पौधे 35 से 40 दिन के हो जाये तो उसको खेत में पलटकर पानी भरकर सड़ा दे. इस हरी खाद के पलटने के एक सप्ताह के अन्दर रोपाई कर सकते है. इसके अतिरिक्त कई और उपादान (पीएसबी, हर्बोजाइम, बीजीए, प्रोम, वर्मीकम्पोस्ट इत्यादि) उपलब्ध है जिनका उपयोग करके पोषक तत्वों की उपलब्धता की जा सकती है.  कीड़े तथा बिमारियों की नियन्त्रण (अमृतपानी, नीमोलीन, नीम आधारित अनेक उत्पाद, जीवामृत आदि) के लिए बाजार में उपलब्ध है.    फसल की कटाई व मड़़ाई चूंकि कालानमक की भूसी का रंग काला होता है अतः इसकी कटाई का समय निधार्रित करना थोड़ा कठिन होता है. सामान्यतया 50 प्रतिशत बाली निकलने के 30 दिन बाद धान की फसल कटाई के लिए तैयार होती है किन्तु कालानमक किरण को 40 से 45 दिन लगते है.  फसल कटाई के बाद, यदि कम्बाइन हार्वेस्टर का उपयोग नही किया जा रहा है तो 3 दिन के अन्दर ही पिटाई करके दाने पौधों से अलग कर लिए जाये और उसको 3 से 4 दिन धूप में अच्छी तरह सुखाकर भण्डारण कर ले. पैदावार कालानमक की औसत पैदावार 45 से 50 कुन्तल होती है. जैविक खेती जिसमें की हरी खाद के साथ-साथ ट्राईकोडर्मा तथा सोडोमान का प्रयोग किया गया हो कि पैदावार 50 से 55 कुन्तल तक हो सकती है. वर्तमान में इस समूह की प्रचलित प्रजातियों से यह ऊपज 27 प्रतिशत से अधिक है. भण्डारण एवं कुटाई धान सुखाने (14% नमी) के बाद प्लास्टिक की बोरियों अथवा टिन की बनी बुखारी में इसका भण्डारण चावल के रूप में न करके धान के रूप में करे जिससे इसकी सुगन्ध एवं पाक गुण ठीक रहते है. कुटाई के लिए अच्छी मशीनों का उपयोग करने से चावल कम टूटता है. कालानमक किरण के दाने व पाक गुण: कालानमक किरण अतिसुगन्धित अधिक प्रोटीन 10.4%, कम ग्लाइसिमिक इंडेक्स सर्करा विहीन और 20% एमाईलोज (चावल पकाने के बाद ठण्डा होने पर भी मुलायम) होता है. 53.1% ग्लाइसिमिक इंडेक्स के कारण मधुमेह के रोगी इसको बेझिझक खा सकते है. तिगुनी आमदनी कालानमक किरण के धान का औसत विक्रय मूल्य 3500 से 4000 रूपया प्रति कुन्तल होता है जोकि सामान्य धान से 3 से 4 गुना है. इससे शुद्ध लाभ रूपया 101250 प्रति हैक्टेयर पाया गया है. इसकी जैविक खेती से उत्पादन में शुद्ध लाभ 127500 होता है जोकि सामान्य धान से 3 गुना से भी अधिक है.  बीज की उपलब्धताः कालानमक किरण का बीज पीआरडीएफ संस्था के मुख्यालय के उपरोक्त पते तथा पीआरडीएफ बीज के विधायन संयन्त्र डी-41, इंडस्ट्रीयल एरिया, खलीलाबाद, जिला संत कबीर नगर मो0 नम्बर 9415173984 से प्राप्त किया जा सकता है.

विश्व मे गोबर के मकानों का प्रचलन

#पश्चिम_से_पूर्व
क्या आप जानते है, इस समय पूरे विश्व मे गोबर के मकानों का प्रचलन बढ़ा है । अमेरिका, इटली, जर्मनी जैसे उन्नत देशो के वैज्ञनिक भी अब गौबर के मकानों के महत्व को समझने लगे है ..... 

यही बात हजारो सालों पहले ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी लिखी है ....  "गौ के पैरों में समस्त तीर्थ व गोबर में साक्षात लक्ष्मी का वास है" । लक्ष्मी का वास कैसे है ...इसका विश्लेषण समझिए ...

गोबर से विशेषकर गाय के गोबर से घर, आंगन, रसोई आदि की जमीन पोतना हर प्रकार से उत्तम है। इससे हम शुद्धता पाते हैं। टी.बी. के वायरस और रोगाणु मर जाते हैं। गर्मी का प्रकोप कम होता है। ठंडक महसूस होती है। गोबर के मकानों में किसी भी का वायरस नही ठहरता ....

झोपड़ी में आपको AC नही लगाना पड़ेगा, प्राकृतिक ठंडक ही इतनी अधिक रहेगी ।। अफ्रीका -अरब् आदि गर्म अरब प्रदेशो में जब AC नही था, उस समय गौबर के मकानों ने ही उनकी गर्मी से रक्षा की थी ...

सरकार इस समय सबको मकान देने की योजनाओं पर कार्य कर रही है ।। और गौ-संवर्धन पर भी कार्य कर रही है । गौ आधारित अर्थव्यवस्था भारत का आदिकाल का इतिहास रहा है, ओर वर्तमान में केंद्र की भाजपा सरकार भी गौरक्षा के कार्य के प्रति कटिबद्ध है ।।

गौबर के मकानों में रहने में वर्तमान में समश्या यह है, की आज का युग विंज्ञान का युग है, एवं कली का युग भी है । घरों में आग लग जाने की घटनाओं से प्राचीन लोग परेशान थे, उस समय तो बिजली थी भी नही .... वर्तमान् में तो बिजली जैसी आधुनिक वस्तुएं भी है ।। दूसरा दीपावली आदि ले अवसरों पर भी भय रहता है ... इस भय के निवारण के लिए छत पर टाइल्स आदि का प्रयोग कर, सुरक्षित रूप से मकान की छत पर घास आदि भरने की आधुनिक व्यवस्था कर, जिससे आग का भय नही हो, ओर साल दो साल में वह घास बदली भी जा सके .....

इसके अलावा गोबर के मकानों में रहने में बड़ी समश्या है, सामाजिक स्टेटस .... लेकिन आप विश्वास करें, बड़े बड़े शहरों में अब गोबर के मकान ही सामाजिक स्टेटस का सिंबल बने हुए है, होटल तक गोबर के मकानों के रूप में बन रहे है ।। अगर गांवो में वृक्ष, फूल, फल पौधे आदि लगाकर, सुंदर तरीके से Mud House बनाये जाए, तो न केवल गौ रक्षा होगी, बल्कि लोगो का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा ....समाज मे dust कम होगा, जिससे हजारो रौग होते है । दिल्ली प्रदूषण का मुख्य कारण यह dust ही तो है ।। और mud house के प्रचलन से गरीबी तो जैसे खत्म ही हो जाएगी .... क्यो की किसी के भी जीवन का मुख्य खर्च, उसे बीमार ..... बहुत बीमार कर देने वाला सीमेंटेड मकान ही होता है ।।।

गोबर में लक्ष्मी का वास कैसे होता है, आप समझ गए होंगे, जो स्वपन आप करोड़ो में पूरा नही कर सकते, वह स्वपन आपका मात्र कुछ हजार में पूरा हो जाता है ।।

आधुनिक गोबर के मकानों को देखें, ओर समझे, की ऐसे मकानों में रहने से आपके मान सम्मान पर कोई आंच नही आने वाली ।।
साभार Facebook wall

शवासन

""

शरीर और मन से तनाव दूर कर साक्षी में प्रवेश करवाने वाला अद्भुत आसन - 

शवासन योग का आरंभिक चरण है। शवासन हमारे शरीर को उस स्थिति में प्रवेश करवाता है जिस स्थिति में ध्यान आसानी से घटित हो सके।

शवासन का मतलब है कि शव या मुरदा जिस आसन या स्थिति में होता है, अपने शरीर को उस स्थिति में ले जाना। जिस भांति मुरदा न श्वास लेता, न कोई हलचल करता, चेहरे पर कोई भाव नहीं होता है, चेहरा निर्भाव होता है, ठीक उसी स्थिति में अपने शरीर को ले जाना शवासन कहलाता है।

मुर्दे के जैसा चेहरा तब होता है जब हमारे चेहरे पर कोई भाव नहीं होता है और मुर्दे जैसा शरीर तब होता है जब हमारे मन में कोई भी विचार नहीं होता है। यानि ध्यान वाली स्थिति। ध्यान वाली स्थिति में हमारा शरीर मुर्दे जैसा शांत और शिथिल हो जाता है। 

जब हमारा ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश होता है, अचेतन में प्रवेश होता है, तब चेहरे से भाव और मन से विचार विलिन होने लगते हैं। भाव और विचारों के विलिन होते ही मन शांत होने लगता है और मन के शांत और शिथिल होते ही शरीर एक स्थिति में प्रवेश करता है। वह शांत और शिथिल हो उस स्थिति में प्रवेश करता है जिस स्थिति में शव होता है। यानि वह शवासन में जाने लगता है। 

फिर इसी बात को दूसरी तरफ से लिया गया कि यदि ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश करने पर, मन के, विचारों के शांत होने पर शरीर शव की स्थिति में चला जाता है, तो क्यों न शरीर को शव वाली स्थिति में ले जाया जाए, ताकि मन शांत और शिथिल हो जाए और ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश संभव हो सके! और यह घटना दोनों ओर से घट सकती है। 

हमारा शरीर और मन सदेव एक-दूसरे का अनुगमन करते आए हैं। मन में विचार आने पर शरीर उस विचार को क्रिया में बदलना शुरु कर देता है। इसी भांति यदि हम शरीर से कुछ कहते हैं तो यह वैसा ही करना शुरू कर देता है। यदि अचेतन में उठे भाव और विचार शरीर को सक्रिय कर देते हैं तो क्यों न हम सचेतन शरीर को कहें, इसे आदेश दें कि शांत हो जाओ, शिथिल हो जाओ, तो यह अवश्य शांत और शिथिल होने लगेगा। जो भी भाव या विचार हम करेंगे, यह वैसी ही प्रतिक्रिया देने लगेगा।

शवासन में जैसे ही हमारा शरीर शांत और विश्राम की अवस्था में प्रवेश करने लगता है, हमारा मन और विचार भी शांत होने लगते हैं। और विचारों के शांत होते ही हम अपने आप पर लौट आते हैं, या कि हम अपने शरीर और मन के प्रति बोधपूर्ण होने लगते हैं। यहां हमें अपने शरीर से अलग होने का बोध होता है। यानि हम अपने शरीर के साक्षी हो जाते हैं। 

जब भी हम विश्राम में जाएं, दौपहर भोजन के बाद या रात सोते समय, तब इस आसन में प्रवेश करें।

लेट जाएँ और शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें। शरीर में कोई तनाव नहीं, कोई हलन- चलन नहीं। अपनी श्वास को नाभि तक चलने दें, श्वास को कोई गति न दें, स्वाभाविक रूप से चलने दें।

अपना सारा ध्यान घुटनों से नीचे दोनों पैरों में केंद्रित करें और भाव करें कि "पैर शिथिल हो रहे हैं.. पैर शिथिल हो रहे हैं.. पैर शिथिल हो रहे हैं।" दो से तीन मिनट तक भाव करने पर पैर अपने से ही भारी होने लगेंगे, शिथिल होने लगेंगे। फिर उपर की ओर बढ़ें और अपना सारा ध्यान जंघाओं पर लाएं और भाव करें कि "दोनों जंघाएं शिथिल हो रही है... जंघाएं शिथिल हो रही है... रिलेक्स हो रही है।" थोड़ी देर में ही दोनों जंघाएं शिथिल हो जाएंगी। अब और उपर बढ़ें, भाव करें कि नाभि और पेट शिथिल हो रहा है। पेट शिथिल हो रहा है... नाभि शिथिल हो रही है। दो से तीन मिनट तक भाव करें और फिर उपर आएं। अब सारा ध्यान सीने पर लाएं और भाव करें कि" सीना शिथिल हो रहा है..सीना शिथिल हो गया है।" थोड़ी ही देर में सीना भी शिथिल हो जाएगा। अब भाव करें कि "कंधे और दोनों हाथ शिथिल हो रहे हैं... कंधे और दोनों हाथ शिथिल हो रहे हैं।" 
हम महसूस करेंगे कि थोड़ी देर में कंधे और हाथ शिथिल हो गये हैं और हिलाने पर भी नहीं हिल रहे हैं। अब अंत में गर्दन, सारा ध्यान गर्दन में लगा दें और भाव करें कि "गर्दन शिथिल हो रही है.. गर्दन शिथिल हो रही है... गर्दन शिथिल हो रही है।" इस तरह दो से धीरे-धीरे हमारा पूरा शरीर शांत और शिथिल होता जाएगा। 

अब इस प्रक्रिया को पुनः उपर से नीचे की ओर दौहराएं। गर्दन के बाद वापस कंधे और हाथ, फिर सीना, पेट, जंघाएं, घुटने और पैर तक वापस अपना ध्यान ले जाएं और दो से तीन मिनट तक हर अंग के शिथिल होने का भाव करें।

पंद्रह से बीस मिनट की इस प्रक्रिया में पूरा शरीर शिथिल और शांत हो जाएगा। और शरीर हमें विश्राम में लेटा हुआ हमसे अलग दिखलाई पड़ेगा, यानि शरीर से अलग होने का या कि साक्षी होने का बोध होगा।
साक्षी का बोध इसलिए होगा कि शरीर के शांत और शिथिल होते ही मन यानी विचार भी शिथिल हो जाते हैं। और विचारों के शिथिल होते ही, हमारी साक्षी चेतना, जो विचारों में उलझी हुई थी, वह विचारों से मुक्त हो स्वयं पर लौट आती है और अपने शरीर को देखने लगती है। अतः हमें अपने साक्षी का बोध होता है।

यहां हमें अपने आसपास की ध्वनियां स्पष्ट सुनाई पड़ने लगेंगी। चौके से बर्तन की आवाज, बच्चों के खेलने की आवाज, पक्षियों की आवाज, सड़क पर यातायात, सब कुछ स्पष्ट सुनाई पड़ने लगेगा। सारी आवाज़ों को साक्षी भाव से सुनते रहना है, बिना किसी प्रतिक्रिया के, यदि जरा सी भी प्रतिक्रिया करेंगे कि बाहर "यह कौन चीख चिल्ला रहा है" तो फिर विचार को प्रवेश मिल जाएगा और हम साक्षी को भूल जाएंगे। अतः हमें बाहर भीतर की सारी आवाजों को सिर्फ सुनना है।
जब तक इस स्थिति में रहना चाहें रहें, फिर धीरे से दो चार गहरी श्वास लें और आंखें खोलकर बाहर आ जाएं।

इस प्रयोग में शरीर का थका हुआ होना उपयोगी होगा। यदि नींद नहीं आती है तो यह प्रयोग नींद लाने का सुगम उपाय है। रात सोते समय करेंगे तो नींद का आना आसान होगा और साक्षी हमारे अचेतन में प्रवेश कर जाएगा जिससे हमें सतत साक्षी का स्मरण बना रहेगा। 

स्वामी ध्यान उत्सव

मानव शरीर का सम्बन्ध प्रकृति से


                        
                      
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      मानव शरीर का सम्बन्ध प्रकृति से है। प्रकृति ने जिस प्रकार मानव शरीर की संरचना की है, वह अपने आप में विस्मयकारी है। शरीर शास्त्र के अनुसार शरीर की रचना का जितना ही अधिक विचार-विश्लेषण किया जाय, उतना ही यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि इसकी संरचना अद्भुत है।
       206 हड्डियों और 600 से भी अधिक मांसपेशियों के ऊपर त्वचा का चोला तना है। हड्डियों, मांसपेशियों और त्वचा--तीनों की संरचना का कौशल आश्चर्यजनक है। हड्डियों जैसी मजबूत और हल्की चीज़ की कल्पना करना भी कठिन है। शरीर का जितना वजन होता है, हड्डियां उसके पांचवें हिस्से से भी कम होती हैं। अपने शरीर का ही भार इन पर कम नहीं होता। जब हम ख़ाली हाथ डुलाते हुए चलते हैं तो उस समय हमारे जांघ की हड्डी के एक-एक वर्ग इंच क्षेत्र पर पांच-पांच सौ किलो का दबाव पड़ रहा होता है। शरीर का भार, धरती का गुरुत्वाकर्षण और हवा का तेज भार-ये तीन दबाव हड्डियां झेल रही होती हैं। इस दबाव को सिर्फ स्टील की धड़ ही बर्दाश्त कर सकती है। सीमेंट और स्टील को मात करने वाली ये मानव अस्थियां कितनी मजबूत फिरभी कितनी हल्की होती हैं।

         -----:मानव अस्थियां:-----

       हड्डियों की बनावट का कौशल और सूझबूझ विचित्र है। आधुनिक इमारतों में गोलाईदार पतली छत बनाई जाती है
क्योंकि अंडाकार खोल पतला होने पर भी मजबूत होता है। मानव मस्तिष्क की रक्षा करने वाली खोपड़ी की हड्डियां गोलाकार प्लेटों की शक्ल में होती हैं। जांघ की हड्डियों पर अधिक ज़ोर पड़ता है तो इन्हें भी एक खोखले बेलन की आकृति दे दी गयी है। जांघ, कूल्हे, बांह और कंधे की हड्डियों का जोड़  ऐसा है जैसे  किसी गोल छल्ले में गेंद फंसा दी जाय ताकि आसानी से घूम भी सकें और फंसी भी रहें। खोपडे, कूल्हे जैसे स्थानों में हड्डी का हिलना-डुलना घातक हो सकता है। इसलिए वहां के जोड़ बहुत मजबूत बने रहते हैं। स्त्री के कूल्हों की हड्डियां पुरुषों से अलग होती हैं। उनमें यह व्यवस्था रहती है कि प्रसव-काल समीप आते ही जोड़ कुछ खुल जाय ताकि आसानी से प्रसव हो सके और शिशु सुरक्षित बाहर आ सके। पसलियों का जोड़ सीने की हड्डी के साथ कुछ इस तरह होता है कि उनके जोड़ को घूम कर और फिसल कर फैलने -
सिकुड़ने में आसानी हो। हड्डियों के इन जोड़ों की व्यवस्था का परिणाम है--हम शरीर को तरह-तरह से घुमा सकते हैं।
      वास्तव में मनुष्य का शरीर ही नहीं, मन, बुद्धि, अंतःकरण--सभी इतने समर्थ होते हैं कि छोटी-छोटी भूलों को सुधार लेना या कहें हल्के-फुल्के आघातों को झेल लेना उनके लिए सरल बात होती है। अनाचार और अपव्यय की अति ही उन्हें कमज़ोर और बीमार बनाती है। अन्यथा प्रतिकूलताओं के बीच में रहते हुए भी मानव शरीर अनुकूलता में बदल सकता है। शरीर की मासपेशियां अपने से हज़ार गुना वजन संभाले रहती हैं। पेट की मांसपेशी खाना खाने के लिए स्वतः फैलती चली जाती है। ह्रदय की मांसपेशी गर्भस्थ शिशु में तीसवें दिन से काम शुरू कर देती है और रात-दिन सेवा में तत्पर रहती है। वह आजीवन क्रियाशील रहती है।
       साधारण कार्य करते हुए प्रत्येक व्यक्ति अपनी मांसपेशियों पर इतना ज़ोर डालता है जितना कि ज़ोर टनों माल उठाते समय किसी क्रेन पर लगातार पड़ता है। अपनी हड्डी और मांसपेशी तो आदमी साधारणतः देख नहीं पाता पर त्वचा पर उसकी नज़र तो रोज़ ही पड़ती है। इस त्वचा को रंगने-पोतने में हज़ारों रुपये खर्च करते हैं पर त्वचा के वास्तविक चमत्कार को कम ही लोग जान पाते हैं और जानने पर भी याद तो और भी कम लोग रख पाते हैं।
     1- बाहरी ताप को झेलने, 2- शरीर के भीतरी ताप को सामान्य बनाये रखने, 3- स्पर्शबोध के द्वारा जानकारी देते रहने और 4- भीतरी अंगों को चोट-चपेट, कीटाणु-विषाणु से बचाये रखने का कार्य हमारी त्वचा निरन्तर करती रहती है। जबकि शरीर के किसी भी हिस्से में यह एक इंच के पांचवें हिस्से से भी अधिक पतली होती है। इतनी नाजुक और पतली त्वचा के भी हिस्से होते हैं। त्वचा का बाहरी हिस्सा जो 'एपिडर्मिस' कहलाता है,एक चतुर चौकीदार होता है। अपने चौकीदार के कर्तव्य को करने के लिए जहाँ जैसी व्यवस्था आवश्यक है, वैसी ही व्यूह रचना उसने कर रखी है। आँख जैसी कोमल स्थान की रक्षा के लिए वह इतनी पतली और मृदु हो गई है एक इंच के दो हजारवें भाग के बराबर ही उसकी तह है। उँगलियों के नाजुक पोरों की रक्षा के लिए तो उसने नाखूनों का ही निर्माण कर डाला है। तलुओं में वह मोटे-तगड़े चौकीदार के रूप में बैठी है। हड्डियों के उन जोड़ों पर जहाँ मोड़ने की जरुरत पड़ती है,यह त्वचा ढीली-ढाली होती है।
       बाहरी त्वचा के नीचे वाली तह किसी विशाल व व्यवस्थित दल के निष्ठावान स्वयं सेवकों की तरह चुपचाप काम करती रहती है। वह नित नए कोष रूपी कार्यकर्त्ता तैयार कर उन्हें व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाती है ताकि समय आने पर वे बाहर मंच की व्यवस्था संभाल सके। दुनियां को गोरे-काले, भूरे-पीले के भेदों में फंसाने वाला 'मेलेनिन' नामक पदार्थ इसी तह में होता है। 'मेलेनिन' पदार्थ की अधिकता से रंग काला हो जाता है। तेज धूप और गर्मी से शरीर की रक्षा के लिए अधिक 'मेलेनिन' की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए गर्म देशों के लोग ज्यादा काले रंग के होते हैं। मोर भी ज्यादा समय यहाँ रहें तो ताम्बई रंग होने लगते हैं। भीतरी त्वचा का कारोबार तो और भी जटिल है। उनमें लाखों बारीक तार अर्थात् स्नायु-तंतु फैले हुए हैं जो प्रत्येक स्पर्श की संवेदना मस्तिष्क तक ले जाते हैं और वहां से आवश्यक सुचना निर्देश लाते हैं। सर्दी-गर्मी, पीड़ा-रोमांच आदि की अनुभूतियों के सन्देशवाहक में बारीक तार कुल मिला कर अपने आप में किसी विशाल दूरभाष केंद्र की छवि पैदा करते हैं। मस्तिष्क  के
'हाइपोथैलेमस' केंद्र से जैसे ही दूरभाष पर खबर मिली कि शरीर का तापमान बढ़ गया है, वैसे ही रक्त-प्रवाह की और त्वचा में स्थित पसीने की ग्रंथियों की गति तेज हो जाती है और रक्त की बढ़ी हुई गर्मी बाहरी त्वचा के रास्ते पसीने के रूप में निकलने लगती है। तापमान गिरने की इस टेलीफोन से खबर मिलने पर रक्त-प्रवाह कम हो जाता है। पसीने की ग्रन्थियां भी अपना काम धीमा कर देती हैं। त्वचा और चर्बी की पर्तें शरीर की गर्मी को बाहर नहीं जाने देती। इस प्रकार किसी वायरलेस-सज्जित, अनुशासित और पुलिस-दल की तरह चौकस, सक्रिय, समर्पित स्वयं सेवकों की तरह निष्काम भाव से सेवारत तथा परिपक्व बुद्धि संचालकों की तरह सूझ-बूझ से काम लेने वाली यह शरीर की व्यवस्था जितनी विशाल है, उतनी ही जटिल भी है।


सनातन सदाशिव निर्गुण एवं सगुण



सनातन सदाशिव निर्गुण एवं सगुण दो स्वरूपों में जाने जाते हैं प्रकृति से शुन्य  जहां प्रकृति नहीं है शिव निर्गुण हैं और जब यह प्रकृति रूप में होते तो हैं तो वह सगुण हैं सत चित एवं आनंद रूप ऐश्वर्य से परिपूर्ण उस परमेश्वर के प्रकृति से युक्त हो जाने पर (उसमें प्रकृति की उत्पत्ति होने पर) शक्ति की उत्पत्ति हुई है शक्ति से नाद एवं नाद से बिंन्दु की उत्पत्ति हुई है समस्त ज्ञान का कारण  निरंजन ब्रह्म है जो साक्षी रूप है साक्षी रूप इसलिए कि वह वही सब कुछ उत्पन्न और नष्ट होने के समय उपस्थित रहता है aऔर प्रत्येक स्थान पर प्रत्येक क्रिया को अनुभूत करता है प्रकृति की विकृति का उद्भव इसी में होता है और इसे ही #तत्व कहते हैं।
प्रकृति एवं पुरुष महाघोर एवं निराकार है सृष्टि के समय वही ब्रह्म प्रकृति एवं पुरुषों दो स्वरूपों में अभिव्यक्त होते हैं प्रकृति पुरुष चणक के आकार का है कोई से प्रकृति कहता है कोई पुरुष ब्रह्मवाक्य सें से अतीत एवं निर्मल समुज्वल घुतियुक्त है ब्रह्म मन से बुद्धि आदि से क्रिया से एवं वाक्य से अतीत है सदाशिव केवल साधकों के हितार्थ एवं ज्ञातार्थ एकत्वाश्रित ब्रह्म की उस पुरुष की अभिलाषा के अनुसार उसी से सब की उत्पत्ति होती है वैसे ही प्रकृति की इच्छा से पुरुष में शेष सभी उत्पत्ति होती हैs पूर्वानंन्दयुता कामार्त्ता मंदोन्मता प्रकृति विपरीता हो जाती है तब सदाशिव ही पुरुष का धारण रूप धारण करके सृष्टि करता है।
जब प्रकृति नहीं होती सदाशिव निर्गुण निर्विकार होते हैं उसमें जब प्रकृति की उत्पत्ति शास्त्रों में इसे विकृति और विपक्ष कहा गया है क्योंकि यह उत्पत्ति नहीं है इसमें नया कुछ नहीं बनता यह सदा शिव का ही एक रूप परिवर्तन होती है तब उस प्रकृति में से सदाशिव के संयोग करने से नाद नाद से शक्ति और शक्ति से बिंदु की उत्पत्ति होती है यही बिंदु भी विश्वात्मा या जीवात्मा है यहां जानना समीचीन होगा कि एक नाद पहले ही उत्पन्न होता है जिससे प्रकृति की उत्पत्ति होती है इसे तत्वज्ञानियो ने परानाद कहा है इन क्रियाओं को उत्तरवर्ती नाद को ब्रह्मनाद या शब्दनाद कहा जाता है ।
यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति की क्रिया है जिसे जानने के लिए विश्व भर के वैज्ञानिक प्रयत्नशील हैं भारत के कौपीन धारियों  को ना जाने यह कब से पता था क्योंकि यह जानना ब्रह्मांड के किसी भी विकसित जीव के मस्तिष्क की पराकाष्ठा है सनातन ऋषियों ने कहा है कि सृष्टि की अनुपस्थिति में वह निराकार परब्रह्म निष्क्रिय समाधि रत था अकेला था दूसरा कोई नहीं था जिससे वह मन बहलाता तब उसने स्वयं को ही परिवर्तित करके एक भंवर रूपी चाक की उत्पत्ति कर दी जिसके बीच में एक स्तंभ थाh उसके शीर्ष पर ज्योति जगमगा रही थी यह इतनी उग्र गति से नाच रहा था कि परमात्मा रूपी अनंत में चकराता फिर रहा था और इसी की प्रतिक्रिया में दूसरा उसी प्रकार का अधोगामी चक्र उत्पन्न हुआ दोनों एक दूसरे की ओर दौड़ पड़े और एक दूसरे में समा गए इससे एक महानाद हुआ और शब्दब्रह्म की उत्पत्ति हुई इससे बिंदुरूप विश्वात्मा की उत्पत्ति हुई इससे सुक्ष्म वमनावतार का जन्म हुआ और उसने अपनी योग माया से प्रकृति को विकसित एवं पोषित किया।
इस निष्क्रिय निराकार निर्गुण तत्व की ये लीला अद्भुत और अवर्णनीय है उसमें कोई क्रियाशीलता नहीं है पर वह सभी क्रियाओं को उत्पन्न करता है उसमें कोई गुण नहीं है oकिंतु सभी गुणों की उत्पत्ति उस से ही होती है वह चेतना से रिक्त है पर समस्त चेतना तमक उत्पत्ति उसी से होती है उसकी कोई आकृति नहीं है पर सभी आकृतियां उसकी उससे ही उत्पन्न होती है उसमें कोई भेद प्रभेद नहीं है पर सभी भेद प्रभेद उसी से उत्पन्न होते हैं उसकी इस लीला का वर्णन कोई कैसे कर सकता है जबकि ज्ञान बुद्धि चेतना और शब्द की उत्पत्ति भी उसी से होती है उस महाविभु लीला को वह स्वयं ही जान सकता है कि वह ऐसा क्यों करता है।
तत्वज्ञानियो महऋषियो ने इस उत्पत्ति को अविद्या कहा है kअर्थात अज्ञानता के कारण ही इस उत्पत्ति को जीव सत्य मानकर इसमें भटकता रहता है और इंद्रियों पर विश्वास करके अपनी अनुभूतियों के माया जाल से बनने वाले जगत में भटकता है सत्य तो यह है कि यह कोई उत्पत्ति है ही नहीं चक्रवात में वायु के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता इसमें भी परमात्मा तत्व के  अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

योग किसको कहते है


           योग मे ही सजॅन है,योग मे ही विसजॅन है, योग मे ही रूपांतरण है, योग मे ही समानता है,योग मे ही जीवन है,योग मे हो चलायमान है,योग मे ही वियोग है,योग मे ही विग्यान है, योग मे ही ग्यान है।
          मानव शरीर मे जो योग क्रिया के माध्यम से मानव मशीन का उपयोग करके स्थूळ शरीर की दसेय ईन्द्रीयो की जो अलग अलग रूप मे शक्तिओ काम करती है वह सभी शक्तिओ को एक स्थान पर एक रूप मे एकत्रित करके कायॅवाहीत करके ध्यान  धारणा के मारफत अपनी आत्मा को ज्योत (ऊजाॅ)  स्वरूप मे दशॅन करना  ये पुरी क्रिया जो करते है उनको योग कहा जाता है ओर निती नियमो के आधिन जो नित्य ये क्रियामे लगे रहते है उनको योगी षुरूष कहा जाता है। आत्मा से परमात्मा तक देखना ईसीको योग कहते है निराकार चैंतन्य को आंतरीक द्रष्टि से  आकार मे देखना ऊसीको योग कहते है।
           मानव शरीर मे अलग-अलग स्थान पर जो अलग-अलग शक्तिया काम करती है उन सभी को क्रम वाईझ जागृत करने के बाद सभी शक्तियो को त्रिभेटी ए एक रूप मे एकत्रित  करके उनको कायॅवाहित करना है। ओर शरीर की भीतर जो प्राण तत्व होता है वह प्राणतत्व को जागृत करने के लीए प्राणायाम का सहारा लेके प्राण तत्व को उजाॅ स्वरूप मे लाकर त्रिभेटी पर उस उजाॅ को आंतर द्रष्टि से देखना पडता है। यह आत्मा को जागृत ईस तरीके से करनी पडती है।
            जब ललाटे त्रिभेटी पर उजाॅ स्वरूप मे ज्योत देखाई देती है। तब ईसी समय मस्तक मे आपको अनहद  सुनाई देता है तब ईस समय अपनी मनको ओर आंतर नजर को प्रकाश मे ओर अनहद नाद मे विलिन कर दो प्रकाश को झांख झांख के देखा करो ऑर मन को अनहदनाद को सुनने मे तल्लिन कर दो। जब आपका मन ओर आंतरीक नजर दोनो तल्लिन हो जाये ईसी समय आपको त्रिभेटी पे अखुट चैंतन्य के भंदार के रूप मे ऊजाॅ का स्रोत ईतना वहेगा कि  सूयॅका उजाला भी कम लगेगा वो ऊजाॅ मे मन ओर आंतर नजर को तल्लिन कर देने से आपकी आत्मा आपके भ्रह्माड को वेध कर अखिल भ्रह्मांड मे विलिन हो जाता है।ईस समय यह समाधि की बिलकुल नजदीक पहोच जाते है। ईसी समय आपकि प्राण शरीर का विकास हो जाता है।ओर ईसके बाद प्रेकटीस जारी रखने से आपका सुक्ष्म शरीर भी अलग हो जाता हो।जब आपका सूक्ष्म शरीर अलग हो जावे  बादमे आत्मा का ड्राईवर संकल्प है। आप जो संकल्प ईसी समय छोडोगे वो संकल्प आपका भ्रह्माड को वेधन करके अखिल भ्रह्मांड मे वो संकल्प की तरंगे जाती है। ओर अखिल भ्रह्मांड मे से सिध्ध होकर रीटॅन होती है। आपके नजर के सामने ही वो संकल्प वास्तविकता मे परिवतॅन हो जाती है। यही  योग क्रिया का सबसे बडा प्रमाण आपको मिल जाता है।सूयॅ की उजाला से बहुत गुणे ज्यादा उजाला आपको दिखता है वही ब्रह्मतत्व है।वही चैंतन्य आत्मा है , वही निरंजन है।वही निराकार है।, वही अविनाशी है, वही भ्रह्मांड का चैंतन्य है।लेकिन अपनी संकल्प शक्ति द्रढ ओर मजबुत करनी पडती है।ऊसकी थोडे समय की एक साधना से संकल्प शक्ति ओर मनोबल दोनो द्रढ मजबूत हो जाती है इसके बिना सिफॅ ऊजाला देखने से कुछ भी नही मिलता  टुंक मे इतना कह सकते है की आत्मा को जीव मे से शिव मे पलटाने के लिए मानव शरीर मे योग क्रिया बहुत महत्व की है।ये शरीर की तमाम सत्ता  बाह्य मन के पास होती है वह सत्ता मन के पास से लेकर आत्मा को सोंपने की जो क्रिया होती है।उनको योग कहते है । शरीर मे सत्ता का पलटा करना है ओर मनको स्थिर करना है ये क्रिया को योग क्रिया कहते है।
           योगासन को योग नही कहते ,योगासन तो सिफॅ शरीर की तंदूरस्ती के लीए होता है।योग क्रिया करने के लिए अनुभवी सद्दगुरू मिलेगा तो ही योगक्रिया शिखा सकते है । नहीतर ये काया को पलटोओ खवरावी देने जैसा हो जायेगा ओर हवा मे हवातिया मारने जैसी हालत आपकी हो जायेगी । योगक्रिया करने से पहले अपने शरीर को निरोगी करना पडता है ।ईसके बिना योगक्रिया नही हो सकती  कोई मानव करभी नही सकता अपान वायु को भी दुरगंध दूर करनी पडती है ।  अपान वायुकी दुरगंध दूर नही होगी तो आपके शरीर का बेलेन्स बिगड जायेगा शायद पागलपन भी आ शकता है।
           योगक्रिया करने के लिए सबसे पहले शरीर मे से  गेस,पित्त,कबज्यात ओर कफ से रहीत करना पडता है। बादमे हर दिन उसकी प्रेकटिस करनी पडती हो। प्रेकटिस करने के लिए आपको जो आसन शरीर को अनुकुल होवे वो आसन ग्रहण करके शांत मनसे थोडी देर बैठे रहो बाद मे अपने शरीर का शिथिलिकरण करदो ईसके बाद मे अपनी सूक्ष्मणा नादी को शरू करदो बाद मे बिलकुल टटार बैठ के अपनी आंतरीक नजर त्रिभेटी पे स्थिर करदो इसके बाद मे एक मिनीट की लंबाइ वाला प्राणायाम करो ।ईतना करनेमे आपको 5 वषॅ तक का समय लगता है।5 वषॅ तक आपको ये हताई हुई योग क्रिया पर सतत हरदिन दो कलाक की प्रकटिस जारी रखना है।तब आपको थोडासा कुदरती चैंतन्य का अनुभव होगा लेकिन इतना याद रखना अपनि शरीर पहले निरोगी करना है। बाद मे ये योगक्रिया की प्रकटिस करना वरना आपको शरीर मे बहुत तकलिफे आ जायेगी ओर आशन भी सिध्ध करना पडेगा यदी कोई भी मानव को यह प्रेकटिस करने की ईच्छा होवेतो मुझे मीलेगा तो उनको जरूर सलाह देके संपुणॅ योगक्रिया का मागॅदशॅन अवश्य करुंगा प्रमाण के साथ करऊगा ।
          हदय के तकलिफ वाले ,बी.पी. की तकलिफ वाले मानव ये योगक्रिया की प्रेकटिस कभी मत करना।।
       
         गगनगीरीजी महाराज
      फोन--9574752091

दस महाविद्याओं का रहस्य

{{{ॐ}}}

                                                             #कमला_रहस्य

दस महाविद्याओं में से प्रत्येक की अंग देवियां है इनकी संख्या अंनगनित है दक्षिण मार्ग की पूजा आधारित तंत्र विधियों में सोलह  आवरण तक की पूजा विधि मिलती है पर इसका अर्थ यह नहीं कि यह यहीं तक सीमित है प्रथम केंद्र की में कर्णिका के बाद कमल में आठ दल हो जाते हैं जिसमें पचास से ऊपर देवी देवताओं की पूजा करनी होती है और फिर दूसरे आवरण में सोलह के तीसरे में बत्तीस चौथे में चौसठ अर्थात हर आवरण मे दल दोगुना होते होते चले जाते हैंa इस प्रकार हजारों से अधिक देवी देवताओं और उनके आयुधों पूजा करनी होती है समस्त शास्त्रीय वाड्गमय मैं ऐसे ही तंत्र साधना कहा गया है किंतु सत्य यह नहीं है यह तंत्र के दक्षिणमार्गी जिसे वैदिक मार्ग भी कहते हैं कर्म कांडों को के आधार पर किया गया रूपांतर है हम पूर्व पोस्टों मे लिखते आये है के तंत्र जिन लोगों की संस्कृति से प्रस्फुटित हुआ है उसमें कर्मकांड प्रचलित नहीं थे यह विद्या वैदिक संस्कारों के अनुरूप नहीं थी इसलिए उन्हें परिवर्द्धित संशोधित कर दिया था।
 कमला लक्ष्मी का ही दूसरा नाम है यह मणिपुर चक्र की देवी है इनका स्थान नाभि के मूल में रीढ़ हड्डी में होता है इनकी उत्पत्ति विष्णु के वक्ष पर स्थित कोलासुर नामक असुरों का वध करने के लिए हुई थी एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय हुई थी sकमला शरीर या इकाई की वह शक्ति है जो बाहरी ऊर्जा तत्व को खींचकर शरीर एवं "विष्णु "का पोषण करती है शरीर की चर्बी का निर्माण इससे ही होता है  इसी उर्जा की प्रवृत्ति से "जीव" भौतिक संग्रह की ओर प्रवृत्त होता है  अन्य देवियों की भांति कमला के भी अनेक रूप हैं।                                                     #दक्षिणमार्ग
वाग्भव, कमला, माया, कामबीज, यह चार अक्षरों वाला मंत्र कमला का बताया गया है इनका स्वरूप इस प्रकार से है कि पूर्णमासी के चंद्रमा जैसे मुख वाली कमल के ऊपर बैटरी वाली बैठी हुई गौरांगी अनेक प्रकार के रत्नो के अलंकर से अलंकृत नितंबो तक रेशमी वस्त्र धारण किए हुए दोनों हाथों में वरद् एवं अभय मुद्रा धारण किए हुए सफेद वर्ण के चार हाथी अपनी सूंडो मे सोने का अमृत घट लेकर उसका अभिषेक कर रहे हैं।
                                                          #तन्त्रपूूजा
 कमला की तंत्र पूजा रेशमी वस्त्र रेशमिया आसन पर उत्तराभिमुखी होकर महानिशा काल में की जाती है साधना स्थल का चुनाव शमशान सूनेघर अपना घर आदि में पूर्ववत की जाती है यंत्र को गोबर से लीपे स्थान में चंदन गोरोचन छागरक्त  गेहूं के आटे से बनाया जाता है तंत्र पूजा में न्यास आदि की आवश्यकता नहीं होती यद्यपि बहुत से साधक षोड़ान्यास करते हैंh तंत्र पूजा में यंत्र की कर्णिका में देवी की स्थापना करके उनकी पूजा की जाती है पूजा से सिद्धि भी मिलती है घी और कमल के फूल से एक हजार आहुति दी जाती है पर तंत्र सिद्धि के लिए पूजा के पश्चात दस हजार मंत्रों का जप रात्रि काल में करना चाहिए जप समाप्त होने पर वह या छाग के मांस और घी की आहूति देनी चाहिए  गोह और छाग दोनों के मांस से हवन करने से लक्ष्मी तो सिद्ध होती है पर धरती के अंदर देखने की दिव्य शक्ति भी प्राप्त हो जाती है और गडे़ खजानों का पता चलता है।
                                                               #कौलसाधना
कौल साधना पद्धति मैं कमला की साधना मे पुर्ववत यंत्र बनाकर पूर्व युवा ठोस मांसल बदन वाली सुंदर युवती को जो पूर्णता गोरी हो लक्ष्मी के रूप में बिठाकर उसकी पूजा करके उसे चावल मछली मदिरा पूरी आदि का भोग चढ़ाया जाता है फिर उसको यह सब अर्पण करके साधक स्वयं भी इन का भोग लगाता है तत्पश्चात बैठकर इक्कीस हजार मंत्रों का जप करता है जप के बाद युवती को भेंट आदि से प्रसन्न करके विदा करता है कौलसाधकों मे आजकल एक अन्य वर्ग भी बन गया हैo जो मछली मांस का उपयोग नहीं करते और मदिरा के स्थान पर विजया यानी के भांग का उपयोग करते हैं खीर मिठाई दूध चावल पूरी मालपुआ मधु आदि का प्रयोग करके भैरवी साधना करते हैं।
                                                                 #तन्त्र_साधनम्_२
 बरगद के वृक्ष के नीचे अमावस्या की रात में पूर्व वक्त अष्टदल कमल युक्त यंत्र बनाएं हल्दी चंदन साली चावल के आटे दूध आदि से इसके सामने उत्तराभिमुखी होकर आसन लगाएं कर्णिका बरगद के दूध और भरत मिलाकर शालि चावल की पीष्टि से बाराह उंगल की प्रतिमा बनाई या बरगद की जड़ की मिट्टी बरगद का दूध और पंचगव्य को मिश्रित करके पिंण्डी बनाएं इस में प्राण प्रतिष्ठा करके ग्यारह सौ मंत्रों के जप करके देवी को गुड खीर मधु और घी अर्पित करें फिर बेल बरगद पान के पत्तों पर खीर मालपुए आदि नैवेध और यहां बैठ कर दो लाख मंत्रों का जप करें बीस हजार से होम करे kजप के समय शरीर रक्षा दिगरक्षा आदि करले बरगद के वृक्ष पर के इतर निवासियों के लिए भी अभिमंत्रित जल से सुरक्षा प्रदान करें पूजा के बाद छाग की बलि दे होम में उसी बरगद के पत्ते पान छाग का मांस घृत और शालि के चावल प्रयुक्त करें निर्धारित संख्या में जप पूर्ण होने तक आहुति दे लक्ष्मी सिद्ध होने पर साधक को धन एवं वृद्ध संपत्ति की प्राप्ति होती है वह इसकी जिद्दी से सुंदर पत्नी प्राप्त होती है और वशीकरण की शक्ति भी प्राप्त होती है।

चतुर्थ क्रिया पीनियल ग्रंथि

 

चतुर्थ क्रिया का अभ्यास करने से आप ललाट, पोन्स, थैलेमस, हाइपोथैलेमस, पीनियल ग्रंथि के अंदर, पिट्यूटरी के सामने और मध्य मस्तिष्क में कुछ विशेष आत्मिक गति को अनुभव करते हैं। आपको लगता है कि प्रकाश  उर्ध्वलोकों से  भूलोक की ओर घूमते हुए आ रहा है । इस चौथे स्तर को असंशक्ति समाधि कहा जाता है, इसका अर्थ है कि आप स्वतंत्र रूप से परमचेतना में विचरण कर रहे हैं और अपने पूरे शरीर में भगवान की प्रत्यक्ष उपस्थिति का अनुभव करते हैं। आप स्वयं को एक दिव्य प्रकाश एवं भगवत अनुभूति का अनुभव करने वाले  देवता के रूप में देखते हैं। आप हजारों ज्योतियों और उनके प्रकाश को देख सकते हैं, यहां तक ​​कि खुली आंखों से, जो आपकी आंतरिक जगत को प्रकाशित करती हैं। आप वास्तव में सहस्रार के ऊपर एक परम प्रकाश को पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशमान करते हुए देख सकते हैं । आपके शरीर में आप सात प्रकार के प्रकाश देख सकते हैं,  सात केंद्रों में से प्रत्येक में दो अग्नि, एक आरोही और दूसरा अवरोही । आप इन ज्योतियों को अपने शरीर के भीतर और बाहर दोनों जगह देख सकते हैं। गुरु का शरीर अंधकार जैसा दिखाई देगा, जिसके चारों तरफ प्रकाश होगा।

~ परमहंस हरिहरानंद जी के लेख के अंश

*Fourth  Kriya* 

By practicing  the  fourth  Kriya  you  feel  some  special  movement  of  the  soul  inside  the  forehead, pons,  thalamus,  hypothalamus,  pineal  gland,  in  front  of  the  pituitary  and  in  the  mid  brain.  You feel  that  the  light  is  rotating  around  from  the  high  heavens  to  the  earth.  This  fourth  level  is  called asamshakti  samadhi,  it  means  you  are  roaming  freely  in  superconsciousness  and  perceive  the living  presence  of  God  in  your  whole  body. You  see  the  Self  as  a  deity  experiencing  divine  illumination  and  the  sensation  of  God.  You  may see  thousands  of  sparks  and  flashes,  even  with  your  eyes  open,  that  light  up  your  inner  world. You  can  also  literally  see  a  super  light  above  the  crown,  lighting  up  the  whole  universe.  In  your body  you  can  see  seven  types  of  light,  two  fires  in  each  of  your  seven  centers,  one  ascending  and the  other  descending.  You  can  see  these  lights  both  inside  and  outside  your  body.  The  body  of the  guru  will  appear  dark,  with  illumination  all  around  it. 

~ Excerpts from writings of Paramahamsa Hariharananda ji

मृत्यु और जीवन

{{{ॐ}}}

                                                        # 

मृत्यु इस पृथ्वी की सबसे बडी माया है इसे भ्रम भी कह सकते है ,और इसी कारण इस लोक को मृत्युलोक भी कहते है । विज्ञान कहता है  कि #क्रोमोजोम्स की मृत्यु ही मनुष्य की मृत्यु है । ये क्रोमोजोम्स एक निश्चित अवधि तक ही सक्रिय रहते है । परन्तु अध्यात्म कहता है कि मनुष्य एक भौतिक ईकाई मात्र नही है ।बल्कि एक अभौतिक पदार्थ है जो मृत्यु के समय शरीर से मिलकर शुन्य मे चला जाता है, एवं समय पाकर पुनः नया शरीर ग्रहण करता है । kक्रोमोजोम्स भी उसी चेतना शक्ति जीवित एवं मृत होते है।
अभी मैने विडियो पर एक संत को यह कहते सुना था कि मृतक को चौदह दिनो तक आराम से मरने दिजिये ।क्या ये लोग ज्ञान बांट रहे है या हलवा बना रहे है आराम से मरो ओर चौदह दिन मरो हमारे यहां मृतक का दाह संस्कार कुछ घण्टे मै हो जाता है चौदह दिन मे तो मृतक मे कीड़े पड जायेगे , यह उन लोगों के ज्ञान की पराकाष्ठा है ,और उनके अनुयायी के तो क्या कहने।
 वास्तव मे सच क्या है सोने से पुर्व जिस प्रकार स्वप्न की छाया पडने लगती है । उसी प्रकार मृत्यु के छ: महिने पुर्व   उसकी छाया पडने लगती है, उस समय जागरूक व्यक्ति मृत्यु की भविष्यवाणी कर सकता है । oपांच छ: घण्टे पहले या एक दो दिन पहले तो इसके स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगते है ।जिससे कई व्यक्ति अपनी मृत्यु की पूर्व सुचना दे देते है। जो नित्य सोते या उठते समय प्रार्थना का प्रयोग करते है, या ध्यान करते है, उन्हें भी अपने मृत्यु के समय का पता चल जाता है । निर्मल चित्त वालों को भी यह पता चल जाता है ।
आत्मा से निकलने पर भी शरीर की ऊर्जा तीन दिन तक उसमे से निकलती रहती है ।जैसे वृक्ष काटने पर भी उसे सुखने मे कई दिन लग जाते है  ह्रदय की धड़कन बन्द होने पर डाक्टर लोग  hमनुष्य को मृत घोषित कर देते है जिससे क्लीनिकलडैथ (शारीरिक मृत्यु) कहा जाता है, किन्तु जब शरीर की सम्पूर्ण ऊर्जा बाहर निकल जाती है तो उसे बायोलोजिकल डेथ ( जैविक मृत्यु )कहा जाता है।
इसमे लगभग तीन दिन लग जाते है। जैविक मृत्यु से पूर्व यदि विशेष विधियों द्वारा आत्मा को शरीर मे पुनः प्रवेश कराया जा सके तो वह पुनः जीवित हो सकता है ,जैसे पौधा जमीन से उखाड देने पर भी थोडे समय बाद पुनः लगाने पर जीवित हो जाता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि जीवात्मा शरीर को छोड देती है, किन्तु शरीर यदि बेकार नही हुआ तो अन्य कोई आत्मा प्रवेश कर जाती है । sजिससे वह मृत शरीर पुनः जीवित हो उठता है ।
कोई जीव जब मृत्यु को प्राप्त करता है तो उसकी चेतना के कारण आत्मा वातावरण मे चली जाती है और वह अपने अनुरूप प्रवृत्ति वाले ऊर्जा शरीर मे कुर्म की पुछ से सम्पर्क करके वहाँ अवतरित हो जाती है।
इस समय आत्मा बीजरूप परमबिन्दू  होती है । उसमे केवल कर्मों के संस्कार होते है, उसका कोई प्रकट अस्तित्व किसी भी रूप मे नही होता ।संस्कार जहां एकत्रित होता है , वह विरल तत्त्व बिन्दू है यही जीवात्मा है। वह सुक्ष्मत्म होता है तो वहां कुछ नही होता ।प्रत्यक्ष भौतिक जगत का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है ।उससे आगे कुछ नही है क्योकि जो नही है वह वास्तव मे है ।
किन्तु वह भौतिक तत्त्व नही है उसकी कोई आकृति कोई स्वरूप नही है वह एक भौतिक तत्त्वों से शुन्य बिन्दू मात्र है। वहा केवल संस्कार हैa और यह संस्कार ही फिर से शरीर धारण करता है ,जब संस्कार ही शुन्य हो जाते है फिर पुनर्जन्म नही हो सकता है

शिव शक्तिएवं चेतन परमात्मा

वह परमात्मा चैतन्य है जो ज्ञान स्वरूप अथवा बोधस्वरूप है। वह तत्व अति सूक्ष्म होने से किसी भी प्रकार से दृश्य नही है

 वह स्वयं कोई क्रिया नही करता किन्तु क्रिया का माध्यम उसकी शक्ति है जो सभी प्रकार की क्रिया का कारण है। यह सम्पूर्ण दृश्य जगत उसी की शक्ति का विलास है।

 बिना शक्ति के शिव भी शव रूप ही है शिव को सीधा नही जाना जा सकता है शक्ति की सहायता से ही शिव की पहिचान होती है जिस प्रकार से अग्नि की पहिचान उसकी दाहिक शक्ति (जलाने की शक्ति) से होती है। यदि उसमे जलाने की शक्ति ही नही है तो उसे अग्नि कैसे कहा जा सकता है? 

जिस प्रकार अग्नि से उसकी दाहशक्ति भिन्न नही है, जिस प्रकार सूर्य से उसका प्रकाश भिन्न नही है जिस प्रकार चंद्रमा से उसकी चांदनी भिन्न नही जिस प्रकार चीनी से उसकी मिठास भिन्न नही है उसी प्रकार शिव से उसकी शक्ति भिन्न नही है।
 शक्ति के बिना अकेला शिव सृष्टि की रचना नही कर सकता है।

अकेली शक्ति भी बिना चेतन (शिव ) सृष्टि की  रचना नही कर सकती अतःयह शक्ति उसका उपकरण है जिसकी सहायता से वह सृष्टि की रचना करता है।

जहा चेतना है वह शक्ति विद्यमान रहती है तथा जहा शक्ति है वह चेतना है ही दोनों अभिन्न है ।

आज विज्ञान केवल शक्ति पर ही अपना ध्यान केंद्रित किये हुवे है तथा इस चेतनतत्व से अनभिज्ञ है जिससे विज्ञान के अपेक्षित परिणाम नही आ रहे चेतन का ज्ञान ही अध्यात्म का विषय है इसके बिना विज्ञान अधूरा है। अधूरा ज्ञान कभी जीवन का आधार नही बन सकता है
ओउम

Virat Yog Sagar

पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक सुन्दर, सुडौल और आकर्षक क्यों

----------
*************************************
                        भाग--02
                       *********
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      शुक्रबिन्दु और रजोबिन्दु में 'प्रोटोन' और 'इलेक्ट्रॉन' की सम्भावना समझनी चाहिए। दोनों की ऊर्जा बराबर एक दूसरे की ओर आकर्षित होती रहती है और जब उनका आकर्षण एक विशेष् सीमा पर जाकर घनीभूत होता है तब उस स्थिति में वहां 'न्यूट्रॉन' की सम्भावना पैदा हो जाती है। फलस्वरूप दोनों प्रकार की ऊर्जाएं और उनमें निहित दोनों प्रकार की विद्युत् चुम्बकीय तरंगें एक दूसरे में मिलकर एक ऐसे विलक्षण 'अणु'  का निर्माण करती हैं जिसे हम 'आणुविक शरीर' या 'एटॉमिक बॉडी' कहते हैं।
      इस आणुविक शरीर में हमारा सारा व्यक्तित्व और संपूर्ण जीवन की घटनाएं व संपूर्ण जीवन का इतिहास छिपा हुआ होता है। यह वह अणुविक शरीर है जिसके निर्माण का आधार पहले ही दिन गर्भ में हो जाता है और जिसमें निर्माण-कार्य पूर्ण होने पर आत्मा प्रवेश करती है। इस अणुविक शरीर की जैसी संरचना है, जैसी स्थिति है, उसी के अनुकूल आत्मा उसमें प्रवेश करती है।
       मनुष्य जाति का जीवन और चेतना आज हर क्षण पतन की ओर अग्रसर होती जा रही है। इसका एकमात्र कारण यह है कि संसार के दम्पति श्रेष्ठ व उच्चकोटि की आत्माओं को उत्पन्न होने का अवसर ही नहीं दे रहे हैं। वे जो अवसर दे रहे हैं, वह निम्नकोटि की आत्माओं के पैदा होने के लिए है। यही कारण है कि अच्छी और उच्चकोटि की आत्माओं का संसार में अभाव हो गया है और दूसरी ओर निम्नकोटि की आत्माओं की संख्या आकाश छूने लगी है।
      यह जरुरी नहीं कि मनुष्य के मर जाने के बाद उसकी आत्मा को तुरन्त जन्म लेने या शरीर पाने का अवसर मिल जाये। साधारण आत्माएं तो 13 दिन के भीतर अपने शरीर को खोज लेती हैं लेकिन जो आत्माएं अत्यन्त निकृष्ट कोटि की होती हैं, वे रुक जाती हैं क्योंकि उनकी निकृष्टता के अनुकूल निकृष्ट गर्भ और अवसर मिलना कठिन होता है। ऐसी ही निकृष्ट आत्माओं को हम 'भूत-प्रेत' कहते हैं। इसी प्रकार बहुत उच्च और श्रेष्ठ कोटि की आत्माएं भी रुक जाती हैं क्योंकि उनके अनुकूल श्रेष्ठ व उच्चकोटि का अवसर उन्हें नहीं मिल पाता। ऐसी ही उत्कृष्ट आत्माओं को हम 'देवता' कहते हैं। यही प्रमुख कारण है अवतार ग्रहण करने योग्य उच्च लोकों की उच्च आत्मा को भूलोक में शीघ्र अवतरित न हो पाने का। पूरा का पूरा कालखंड बीत जाता है, युग परिवर्तन हो जाते हैं, तब कहीं जाकर अवतार होता है।
      पूर्व के समय में मनुष्य रूपी भूत-प्रेत कम थे और देव पुरुष अधिक थे। लेकिन आज भूत-प्रेत मनुष्य के रूप में बहुत अधिक आ गए हैं तथा देव पुरुष कम। श्रेष्ठ आत्माओं के जन्म के लिए आवश्यक बात है प्रेमपूर्ण विवाह का होना। लेकिन आज प्रेमपूर्ण विवाह का सर्वथा अभाव है। सच्चा प्रेम ही आध्यात्मिक जीवन का आधार है। अतः श्रेष्ठ आत्माओं के अवतरण के लिए प्रेममय आध्यात्मिक जीवन की आवश्यकता है।
       स्त्री अखिल विश्वब्रह्माण्ड में चैतन्य और क्रियाशील महाशक्ति का एक विशिष्ट केंद्र है। मगर इस रहस्य से बहुत कम लोग परिचित होंगे कि पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक सुन्दर, सुडौल और आकर्षक क्यों दिखलाई पड़ती है ? उसके व्यक्तित्व के भीतर आखिर ऐसा कौन-सा तत्व है जो आनंद के लिए पुरुष को आकर्षित करता है ? इसका एक कारण है जो बिलकुल साधारण है और जिसकी हम-आप कल्पना तक नहीं कर सकते।
      जिसे हमने 'अणुविक शरीर' अथवा 'एटॉमिक बॉडी' कहा है, उसमें 24 जीवाणु पुरुष के और 24 जीवाणु स्त्री के होते हैं। इन 48 परमाणुओं के मिलन से पहला 'सेल' निर्मित होता है और इस प्रथम सेल से जो प्राण पैदा होता है, उससे स्त्री का शरीर बनता है। 24+24 :48 का यह सन्तुलित सेल होता है। पुरुष का जो सेल होता है और उससे जो प्राण पैदा होता है, वह 47 जीवाणुओं का होता है। उसके सन्तुलन में एक ओर 23 और दूसरी ओर 24 (23+24:47) जीवाणु होते हैं। बस, यहीं से पुरुष के व्यक्तित्व का सन्तुलन टूट जाता है। इसके विपरीत स्त्री का व्यक्तित्व सन्तुलन की दृष्टि से बराबर(24+24:48) है। उसी के परिणाम स्वरूप स्त्री का सौंदर्य, सुडौलता, आकर्षण, सम्मोहन, कला और रस उसके व्यक्तित्व में पैदा हो जाता है।
      पुरुष के व्यक्तित्व में एक ओर 24 जीवाणु हैं और एक ओर 23 जीवाणु हैं, अतः वह असन्तुलित है। उसमें एक जीवाणु की कमी है। उसे माँ से जो जीवाणु मिला, वह 24 का बना हुआ है और पिता से जो मिला, वह 23 का बना हुआ है। बस, इसी असन्तुलन से पुरुषों में जीवनभर बेचैनी बनी रहती है। एक आन्तरिक अभाव खटकता रहता है। क्या करूं, क्या न करूं ? यह कर् लूँ, वह कर लूँ। इस प्रकार की चिन्ता और उधेड़-बिन बराबर बनी रहती है। तात्पर्य यह कि यह एक छोटी-सी घटना अर्थात् एक अणु का अभाव स्त्री-पुरुष के संपूर्ण जीवन में इतना भारी अन्तर ला देता है।
      मगर यह अन्तर स्त्री में सौंदर्य, आकर्षण, सुडौलता, सम्मोहन, कला और रस तो पैदा कर देता है, पर उसको विकसित नहीं कर पाता। क्योंकि जिस व्यक्तित्व में समता होती है, उसके विकास के अवसर कम ही होते हैं। वह जहाँ है, वहीँ रुक जाता है। यही नियम सर्वत्र लागू होता है। सम्भवतया यही एकमात्र ऐसा जैविक कारण है कि हमारे विद्वान् मनीषियों ने समगोत्री कुल और परिवार में स्त्री-पुरुष के विवाह का स्पष्ट निषेध किया है। क्योंकि उनकी जो सन्तान होगी, उसके विकास और गुणवत्ता की विविधता में कमी होगी। इसी विविधता की कमी के कारण ही उसके व्यक्तित्व का बहुआयामी विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसके विपरीत पुरुष का व्यक्तित्व सम नहीं, विषम है और इसी विषमता के कारण उसका बहुआयामी विकास स्वाभाविक रूप से हो जाता है। इसके कारण पुरुष जो कार्य करता है, वह स्त्री कभी नहीं कर पाती। यदि वह कोशिश भी कर ले तो भी पुरुष की तरह वह सफल नहीं हो पाती।
       स्त्री और पुरुष के चार भिन्न-भिन्न विद्युतीय शरीर हैं और उन्हीं चार शरीरों तक दोनों में भेद पाया जाता है। स्त्री-पुरुष के चारों शरीर स्त्री-पुरुष के मिश्रित होते हैं। सभी को भली भाँति ज्ञात होना चाहिए कि शरीर संरचना में माँ से प्राप्त एक्स जीवाणु और पिता से प्राप्त एक्स और वाई जीवाणु के संयोग से माँ के गर्भ में प्रथम दिन जो सेल निर्मित होता है और उससे जो प्राण पैदा होता है, उसी से आने वाले शिशु का शरीर विकसित होता है। माँ के डिम्बाशय से जो डिम्ब निकलता है, उसमें केवल एक्स(X) जीवाणु होते हैं और पिता के शुक्र से जो स्पर्म आते हैं, उनमें एक्स और वाई(Xऔर Y) दो प्रकार के जीवाणु होते हैं। ये जीवाणु एक साथ एक समय में करोड़ों की संख्या में निकलते हैं। मगर माँ के डिम्बाशय के जीवाणु से पिता से प्राप्त केवल एक ही जीवाणु संयोग कर पाता है। शेष नष्ट हो जाते हैं। अब यदि माँ से प्राप्त एक्स 
(X) जीवाणु का संयोग पिता से प्राप्त एक्स(X) जीवाणु से हो गया तो दोनों X+X = - अर्थात् माइनस (ऋणात्मक) विद्युत् आवेशयुक्त रहता है। इसी प्रकार यदि माँ से प्राप्त एक्स(X) जीवाणु का संयोग पिता से प्राप्त वाई  जीवाणु से हो गया तो X+Y = + प्लस (धनात्मक) विद्युत् आवेशयुक्त रहता है। दो X X मिलकर र्ऋणात्मक और X और Y मिलकर धनात्मक सेल की रचना करते हैं। 
      ऋणात्मक सेल से स्त्रैण शरीर की और धनात्मक सेल से पुरुष शरीर की रचना प्रक्रिया आरम्भ होती है। मगर यहाँ एक दूसरा तथ्य भी कार्य करता है। पुरुष शरीर में एक साथ चार शरीर और स्त्री शरीर में भी एक साथ चार शरीर मिश्रित होते हैं। ये चार शरीर निम्न लिखित हैं। पहला शरीर जैसा कि दिखाई देता है--स्थूल या भौतिक या पार्थिव शरीर कहलाता है, दूसरा शरीर जो इसके भीतर होता है, उसे भाव या वासना या आकाशीय या विद्युतीय शरीर कहते हैं। तीसरा शरीर जो भाव शरीर के भीतर छिपा होता है, उसे सूक्ष्म शरीर की संज्ञा दी गयी है और चौथा शरीर जो सूक्ष्म शरीर के भी भीतर होता है, उसे मनोमय शरीर कहते हैं। इस तरह ये चारों शरीर स्त्री और पुरुष के शरीर में मिश्रित रूप से इस तरह रहते हैं जैसे दूध और पानी मिश्रित रहते हैं।
       यदि कोई व्यक्ति पुरुष है तो उसका पहला भौतिक् शरीर जैसा कि दिखलाई पड़ता है, पुरुष शरीर होता है। लेकिन जो उसका दूसरा भाव शरीर है, वह स्त्रैण शरीर(स्त्री का शरीर) है। इसका कारण यह है कि पुरुष शरीर धनात्मक और स्त्री शरीर ऋमात्मक विद्युत् अवेशयुक्त हैं। विज्ञान के नियमानुसार कोई धनात्मक ध्रुव या ऋणात्मक ध्रुव अकेला नहीं रह सकता। यदि अकेला है भी तो कौन जानता है क्योंकि उसकी उपस्थिति का आभास नहीं हो सकता। उसकी उपस्थिति दूसरे ध्रुव के मेल से पता चल पाती है जब दोनों के संयोग से विद्युत् धारा का प्रवाह आरम्भ हो जाता है। विद्युत् एक प्रकार की ऊर्जा है, शक्ति है, एक प्रवाह है और उसकी क्रियाशीलता से ही उसका आभास मिल पाता है। अन्यथा तो शक्ति विहीन वस्तु उस प्रकार निष्क्रिय होती है जैसे प्राणविहीन शव। 
      स्त्री का पहला भैतिक शरीर ऋणात्मक है, यही कारण है कि स्त्री अधिकांश मामलों में(अपवाद को छोड़कर) कामवासना के सन्दर्भ में आक्रामक नहीं हो सकती। वह कभी पुरुष पर बलात्कार नहीं कर सकती। वह बलात्कार झेल सकती है, व्यथा सहन कर सकती है। कामवासना के क्षेत्र में बिना पुरुष की इच्छा या  आवाहन के स्त्री कुछ भी नहीं कर सकती। स्त्री का दूसरा भाव शरीर धनात्मक, तीसरा शरीर फिर ऋणात्मक और चौथा शरीर धनात्मक होता है। 
      ऋणात्मक का मतलब शून्य नहीं समझना चाहिए। विद्युत् विज्ञान की भाषा में इसका अर्थ होता है--संग्राहक(ग्रहण करने वाली)। स्त्री के पास एक ऐसा शरीर है जिसमें असीम शक्ति संग्रहीत है। मगर वह असीम शक्ति क्रियाशील नहीं, निष्क्रिय रहती है। हमारे पुराणों ने इस महत्वपूर्ण सिद्धान्त को बहुत ही रोचक और अर्थवान रूपक के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। देवासुर संग्राम में जब समस्त देवगण अपने सभी प्रयत्नों के बावजूद भी असुरों को परास्त करने में असमर्थ हो गए तो वे सब मिलकर महामाया पराशक्ति के आश्रय में पहुंचे और फिर उन देवों के समवेत अंश से जो एक विलक्षण तेज उत्पन्न हुआ और उससे जो विध्वंसात्मक ऊर्जा पैदा हुई, वह वही महाकाली, कराली, कंकाली, दुर्गा का स्वरुप थी। फिर उस ऊर्जस्वित तेजपुंज के आवेग को रोक पाना किसी देव के वश में भी नहीं था। इसी स्वरुप का सचित्र चित्रण पुराणों और तंत्रग्रंथ 'दुर्गा सप्तशती' में किया गया है। उत्तेजित, आक्रोशित दुर्गा का तेज जब किसी देव के रोके न रुका तो फिर देवों के देव 'महादेव' महाकाली को रोकने के लिए सामने आ गए। फिर भी महादेवी का वेग शीघ्र शान्त नहीं हो पाया और उनके पैर महादेव के ऊपर आ पड़े। महादेव के ऊपर आक्रोशित महाकाली का वह विग्रह इस तथ्य की ओर संकेत है कि जब तक स्त्री की ऋणात्मक शक्ति शान्त है, तबतक वह शान्त है, निष्क्रिय है, लेकिन जैसे ही वह धनात्मक शक्ति के माध्यम से  जबर्दस्ती जाग्रत की जाती है, वैसे ही वह अशान्त, उत्तेजित, आक्रोशित और क्रियाशील हो जाती है। फिर उसकी क्रियाशीलता, उत्तेजना, क्रोध या आवेश शीघ्र शान्त नहीं हो पाता।
       यही कारण है कि स्थूल शरीर की दृष्टि से पुरुष स्त्री की अपेक्षा अधिक ताकतवर है, लेकिन वह कुछ ही क्षणों के लिए है क्योंकि पुरुष का दूसरा शरीर जो स्त्रैण शरीर है, वह नकारात्मक है। यदि उसको स्त्री से लम्बे समय तक संघर्ष करना पड़े तो वह पराजित हो जायेगा। इसका एकमात्र कारण यही है कि स्त्री का दूसरा शरीर जो पुरुष शरीर है, उसमें धनात्मक आवेश विद्यमान है। इसीलिए स्त्री में पुरुष की तुलना में सहनशक्ति अधिक होती है।
      पुरुष और स्त्री में इन चार शरीरों तक भेद रहता है। पांचवां शरीर लिंगभेद से परे है। इसीलिए इसे अलिंग शरीर कहते हैं। क्योंकि आत्मा का कोई लिंग नहीं होता। वह कभी पुरुष शरीर में तो कभी स्त्री शरीर में प्रवेश कर जन्म ग्रहण करती है। कब वह पुरुष शरीर में और कब स्त्री शरीर में प्रवेश करेगी, यह परिस्थितयों, कर्म और प्रारब्ध के ऊपर निर्भर है। यह विषय एक अलग विषय है, इस सम्बन्ध में कभी किसी दूसरी जगह चर्चा अपेक्षित है। यहाँ विषयांतर करने की आवश्यकता नहीं है।
      सफल दाम्पत्य जीवन के लिए आवश्यक है कि स्त्री को ऐसा पति मिले जो उसके भीतर विद्यमान पुरुष शरीर से सामंजस्य रख सके।  उसी प्रकार पुरुष को ऐसी पत्नी मिले जो  पुरुष के भीतर विद्यमान स्त्री शरीर से उचित तालमेल बैठा सके। इसके लिए स्त्री-पुरुष दोनों को अपने-अपने भीतर के विद्युतीय शरीरों को जानना-समझना-पहचानना जरुरी है। और यह तभी संभव है जब वे कुण्डलिनी जागरण के उपाय के रूप में 'बिन्दुसाधना' करते हैं। बिन्दुसाधना वह साधना है जिसमें स्त्री या पुरुष अपने भीतर के विद्युतीय शरीरों से साक्षात्कार करते हैं। उसे जानने-समझने का कार्य करते हैं और उससे सामंजस्य बैठाते हैं।(हमारी प्राचीन भारतीय सनातन संस्कृति में चार आश्रमों की जो व्यवस्था की गयी थी--ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानवप्रस्थ और सन्यास आश्रमों की, उनमें ब्रह्मचर्य आश्रम में 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य शक्ति का संचय करने का विधान किया गया था और गृहस्थ आश्रम को उसके प्रयोग और परीक्षण के लिए व्यवस्थित किया गया था जिसके परिणाम स्वरुप ही 'परिणय' या 'विवाह' की नैतिक और भावनामय परंपरा का सफल निर्वहन करना होता है। परिणय या विवाह का उद्देश्य मात्र कामवासना की तृप्ति ही नहीं है, बल्कि यह एक उच्च गुरुतर उत्तरदायित्व के निर्वाह का परीक्षण काल है। 20-25 वर्षों तक जिस ब्रह्मचर्य तत्व की शक्ति का जो संचय किया गया होगा, उसीका कुण्डलिनी जागरण के क्रम में बिन्दुसाधना की प्रक्रिया का प्रयोग और परीक्षण है, न कि कामवासना की तृप्ति। इस प्रयोजन में यह प्रक्रिया शुद्ध मन, प्राण और भाव से की जाती है, तभी बिन्दुसाधना की सफलता है। साथ ही पितृ ऋण से मुक्ति के लिए उच्चकोटि की आत्मा को स्त्री-पुरुष-समागम के माध्यम से आकर्षित किया जाता है ताकि सृष्टि प्रक्रिया की मर्यादा का पालन  हो सके। उच्च और विशुद्ध भाव से यह ईश्वरीय क्रिया मानकर करने से उच्च आत्माएं आकृष्ट होती हैं और केवल कामवासना के वेग को शान्त करने के लिए स्त्री-पुरुष संसर्ग में  वासनाप्रधान निम्न कोटि की आत्माएं आकृष्ट होती हैं)।
       इन सारे तथ्यों को ध्यान में रखकर भारतीय सनातन समाज में एक विशिष्ट जीवन शैली निर्धारित की गई जिसे 'हिन्दू संस्कृति' या 'सनातन संस्कृति' की संज्ञा दी गयी। इस संस्कृति में सर्वप्रथम स्थूल शरीर को साधन और ब्रह्मचर्य को साध्य बनाया गया था।
       यहाँ मानव शरीर की रचना,  उनसे सम्बंधित तत्वों,  लोकों तथा चक्रों का विवरण नीचे दिया जा रहा है--

1-स्थूल शरीर(physical body): स्थूल जगत् :पृथ्वी तत्व : मूलाधार चक्र।
 2-भाव या वासना शरीर(etheric body): वासना जगत् या प्रेत जगत् या स्वप्न जगत् या भाव जगत्: जल तत्व: स्वाधिष्ठान चक्र।
3-सूक्ष्म शरीर या प्राण शरीर(astral body): सूक्ष्म जगत् : अग्नि तत्व: मणिपूरक चक्र।
4-मनोमय शरीर या मनः शरीर(mental body): मनोमय जगत्: वायुतत्व: अनाहत चक्र।
5-आत्म शरीर(spiritual body) : आत्म- जगत्: आकाश तत्व : विशुद्ध चक्र।
6-ब्रह्म या ब्रह्मांडीय शरीर(cosmic body) : ब्रह्म जगत् या ब्रह्माण्ड जगत् पंचतत्व रहित अवस्था : आज्ञाचक्र।
7-निर्वाण शरीर(bodiless existence): निर्वाण जगत् :शून्यावस्था: सहस्रार चक्र।

                            समाप्त

Featured Post

हमारा विज्ञानऔर हमारी धरोहर

जब हमारे देश में बड़ी बड़ी  राइस मील नहीं थी तो धान को घर पर ही कूटकर भूसे को अलग कर चावल प्राप्त किया जाता था... असलियत में वही...