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रविवार, 18 जुलाई 2021

सूर्य से हमें ज्योति मिलता है चन्द्रमा से अमृतत्त्व

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श्रीमद्भगवद्गीता का आठवां अध्याय और वृहदारण्यकोपिषद् के छठवें अध्याय के दूसरे ब्राह्मण तथा और भी अनेकों आर्ष-ग्रन्थों के अनुसार  सूर्य-चन्द्र लोक में तो युक्तयोगी को भी जाना पड़ता है शरीर छोड़ने के बाद क्रममुक्ति के क्रम में ।

अच्छा , इनका आध्यात्मिक महत्त्व छोड़कर केवलमेव भौतिक-दृष्टि से भी विचार करे तो सूर्य प्रकाश व चन्द्रमा शीतलता प्रदान करने के बाद भी आपसे बिजली व एसी की भांति बिल नहीं लेते ।

कहते हैं जितनी पृथ्वी है , उससे तिगुणा जल है , किन्तु उस सामुद्रिक जल से क्या प्रयोजन , जो न पीने के काम आये , न स्नान के और  वस्त्र-प्रक्षालनादि के ही !

सूर्य की रश्मियां जब उसी सामुद्रिक-जल को खींचकर मेघमण्डल के फिल्टर में डालती है , और वह जब पुनः धरती पर बरसता है तो पीने-नहाने-वस्त्रादि धोने योग्य होता है ।

धरती के अंदर जाने पर उसी जल को ट्यूबवेल, कूप , चापाकल आदि के द्वारा लोग प्रयोग में लाते हैं ।

कुल मिलाकर सूर्य-चन्द्रमा है तो जीवन है , प्राण है , पृथ्वी है ।  किमधिकम् ये कलियुग के प्रत्यक्ष देवता हैं ।

इसी उपकार को ध्यान में रखकर भी जब सूर्य-चन्द्र ग्रहणादि का अवसर हो , उस समय निद्रा-मैथुन-आलस्यादि को त्यागकर उनके कष्ट-निवृत्त्यर्थ जप-ध्यानादि करना चाहिये ।

जिन्हें यह सब बातें अन्धविश्वास लगते हों ,  चलो ! उनकी तुष्टि के लिए असत्य मानें , तब भी जप-ध्यानादि के करने से क्या हानि है !

किन्तु जब यह बातें पूर्णरूपेण सत्य ही है , तो ग्रहणकाल में टांग-फैलाकर सोने से तो हानि ही हानि है ।
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श्री शंकराचार्य वेद वेदांत विज्ञान

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शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

देवताओं का भौतिक अवतरण

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      श्रीमद्भगवद्गीता की रचना संभवतया ईसवी पूर्व 300 और 300 ईसवी के मध्य में हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा--मैं ही बलिदान और बलि तथा वरदान और पवित्र पौधा हूँ। मैं ही पवित्र शब्द, पवित्र भोजन, पवित्र अग्नि और अग्नि को समर्पित वस्तु भी हूँ। मैं ही ब्रह्माण्ड का रचयिता और ईश्वर का स्रोत भी हूँ। मैं अमर हूँ और मृत्यु भी जो कुछ है, वह मैं ही हूँ और जो नहीं है, वह भी मैं ही हूँ।
      मूर्तियों का विशेष आकार होता है। उनमें मनुष्य या  किसी पशु विशेष के गुण होते हैं, किन्तु हर हालत में वे इंसान से परे किसी अलौकिक शक्ति की प्रतीक हैं जो हमारे सामान्य जीवन से परे किसी दूसरे जगत में रहती हैं।
      मूर्तियों की उत्पत्ति कब हुई और उनके विशेष आकार-प्रकार कहाँ से आये ?--यह अभी तक रहस्यमय है। क्या उन्हें बनाने वालों को उन दैवीय शक्तियों ने स्वप्न में दर्शन दिए थे या कि वे गहन ध्यान से उत्पन्न हुईं ?
      विष्णुधर्मोत्तर पुराण में लिखा है कि सतयुग, त्रेता, द्वापर युगों में लोग देवताओं को अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देख सकते थे। कलियुग में उनकी वह देखने की शक्ति समाप्त हो गयी है। इसीलिए उपासना और ध्यान के लिए निराकार की जगह साकार ईश्वर की मूर्तियां बनाई गई हैं।
      विष्णु संहिता में मूर्तियों के प्रयोजन के बारे में स्पष्ट रूप से उल्लेख आया है : बिना आकार के ईश्वर का ध्यान लगाना कैसे संभव हो सकता है ? उनकी कोई आकृति नहीं तो मस्तिष्क कैसे एकाग्र किया जाएगा ? ध्यान प्रायः ही भटक जाएगा या नींद आ जायेगी। इसलिए बुद्धिमान लोग किसी आकार विशेष पर ध्यान लगाएंगे, यह जानते हुए कि वह वास्तविक नहीं, आरोपित है, काल्पनिक है।
      जाबाल उपनिषद के अनुसार--उपासना आरम्भ करने वालों को मूर्तिया सहारा देती हैं, जबकि योगीगण शिव या अन्य किसी देवता की छवि में नहीं, अपनी आत्मा में उतरते हैं, आत्मा के दर्शन करते हैं। मूर्तियां ऐसे लोगों के लिए बनाई गई हैं जो अज्ञानी से अज्ञानी हैं। अर्थात अज्ञानी से अज्ञानी भी लाभ ले सकते हैं। वेदों में मूर्तियों की कोई अवधारणा नहीं है( न तस्य प्रतिमा अस्ति ) ईश्वर की कोई प्रतिमा नहीं है। लेकिन वैदिक ऋषियों ने देवताओं के विवरण को मूर्तियों के स्थान पर शब्दों में सजाया-संभाला है। अग्नि के बारे में कहा गया है कि उसकी लाल वर्ण की सात जीभें हैं, सात चेहरे और चमकते हुए बाल हैं। इंद्र के पास वज्र है।
      वैदिक ऋषि इस संसार में होने वाली सभी घटनाओं को एक-दूसरे से जुड़ी हुई मानते थे। उनके अनुसार शक्ति और क्रिया तथा प्रतीक और प्रतीकात्मकता में कोई अन्तर नहीं। मनुष्य सत्य ी खोज कर सकता है। उसे सक्रिय भी कर सकता है।
      वैदिक रीतियां और वैदिक विधान वास्तव में सृजन का दर्शन कराते हैं। अग्नि की वेदी में उस विराट पुरुष की सुनहरी आकृति रहती है। उस विराट पुरुष को हवि ( यज्ञ की अग्नि में डाला गया पदार्थ ) देने के लिए यज्ञ से उठता हुआ धुआं उड़कर अंतरिक्ष में फिर समस्त ब्रह्माण्ड में चला जाता है। sabhar shivaram Tiwari Facebook wall
#adyatm websires in hindi

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गुरुवार, 15 जुलाई 2021

छाया पुरुष और छाया शरीर

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन 

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

      प्राणमय कोष सूक्ष्म और स्थूल सत्ता के सन्धि स्थल पर विद्यमान है। उसके एक ओर छाया शरीर है और दूसरी ओर है--स्थूल शरीर। प्राणमय कोष का मूलकेंद्र 'नाभि' है। नाभि पर मन को एकाग्र करने पर प्राणमय कोष से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि जिस जीवित या मृत व्यक्ति के रूप का उस अवस्था में ध्यान करेंगे, उस व्यक्ति का छाया शरीर आपके सामने स्पष्ट रूप से आ जायेगा। इस क्रिया को अनुभवी और परिपक्व लोग अपने सामने इच्छित व्यक्ति के चित्र को भी रखकर करते हैं। इससे सफलता शीघ्र मिलती है। छाया शरीर से कोई भी कार्य कराया जा सकता है। यदि जीवित व्यक्ति है तो उसके छाया शरीर पर अपना मानसिक प्रभाव डालकर उसे अपने मन के अनुकूल भी किया जा सकता है। उसकी रोग-व्याधि भी दूर की जा सकती है और उसकी समस्याएं भी दूर की जा सकती हैं। यदि व्यक्ति मृत है तो उससे अज्ञात रहस्यों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसी को छाया पुरुष-सिद्धि भी कहते हैं। इस सिद्धि के द्वारा किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से तत्काल सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है और कुछ सीमा तक मनोनुकूल कार्य भी कराया जा सकता है।
      काशी के शिवाला घाट पर एक महाशय रहते थे। नाम् था--शशि शेखर पांडेय। सुना था पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे लोगों की आत्माओं से उन्होंने संपर्क किया था। उनके कमरे में पड़े छोटे से तख्त पर कई लोगों के फोटो चिपके थे जिनमें जीवित और मृत दोनों व्यक्तियों के थे--महिलाओं और पुरुषों के भी। उन फोटो के माध्यम से वे महाशय उनके छाया पुरुषों से संपर्क करते थे। एक दिन गुरुदेव श्री अरुण कुमार शर्मा का भी चित्र लेकर चिपका लिया तख्त पर।(यह उन दिनों की बात है जब गुरुदेव की तरुण अवस्था थी। कोई नौकरी भी नहीं थी उनकी। गुरुदेव उनके कमरे में गए तो वह बोले--बन्धुवर ! मिठाई खिलाइये।
       क्यों, किसलिए ?
       कल आपको नियुक्ति पत्र मिलने वाला है।
       गुरुदेव को याद आया कि दो माह पहले केंद्रीय सरकार में एक वरिष्ठ पद के लिए आवेदन किया था। साक्षात्कार भी हो चुका था। नौकरी की आशा कम ही थी। एक प्रकार से भूल ही चुके थे गुरुदेव्।
       बात सच निकली। दूसरे ही दिन मिल गया नियुक्ति-पत्र डाक से। सचमुच छाया सिद्धि का चमत्कार था यह।

जीवित और मृत व्यक्ति के छाया शरीर में अन्तर

      जीवित व्यक्ति के छाया शरीर के ईथरिक कणों में होने वाले कम्पन अति तीव्र होते हैं लगभग एक सेकेण्ड में पचास हज़ार बार जबकि मृत व्यक्ति के शरीर में वे कम्पन एक सेकेण्ड में 30-40 हज़ार बार होते हैं। वायुतत्व के प्रभाव से वे कम्पन कभी कम, कभी अधिक भी होते हैं जिससे छाया शरीर का आकार-प्रकार घटता-बढ़ता रहता है और कभी-,कभी बेडौल-सा हो जाता है। जीवित व्यक्ति के छाया शरीर को 'छाया पुरुष' और मृत व्यक्ति के छाया शरीर को 'छाया शरीर' कहते हैं।
       अघोर मार्गीय साधक छाया पुरुष की ही सिद्धि करते हैं। इसके लिए श्मशान का वातावरण ही छाया पुरुष की सिद्धि के लिए उचित व अनुकूल बताया गया है। इसके कई कारण हैं जिनमें मुख्य कारण है--साधक को अपनी इच्छानुकूल छाया पुरुष का वहाँ मिल जाना। कोई भी छाया पुरुष साधक के बन्धन में अधिक देर तक नहीं रह सकता। वह हमेशा बंधन-मुक्त होने के लिए व्याकुल रहता है ताकि उसे सूक्ष्म शरीर प्राप्त हो जाये और उसके बाद पुनर्जन्म हो जाये। यदि साधक उसे मुक्त नहीं करता है तो वह उसकी ऐसी दुर्गति करता है कि बतलाया नहीं जा सकता। इसलिए अघोरी नए- नए छाया पुरुष की खोज में रहते हैं। 

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सोमवार, 12 जुलाई 2021

योग और विज्ञान

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साठ के दशक में योग के सामने कठिन दौर था वैज्ञानिक साबित होने का. क्योंकि अमेरिका के लैब में योग सफल न हुआ तो उसका पश्चिम में प्रवेश निषेध हो जाता. इसी कठिन दौर में हिमालय के एक महान योगी स्वामी राम डॉ एल्मर ग्रीन के बुलावे पर 1969 में अमेरिका जाते हैं.

मैनिन्जर फाउण्डेशन की लेबोरेटरी में उनके योग संबंधी दावों की लंबी जांच पड़ताल चलती है लेकिन स्वामी राम की पराभौतिक शक्तियों के आगे विज्ञान असंभव को संभव मान लेता है. परीक्षण के दौरान उन्होंने16 सेकेण्ड के लिए हृदय गति रोक दी लेकिन वे जिन्दा रहे और सबसे बात करते रहे. उन्होंने अपने हथेली के अलग अलग हिस्से में 11 डिग्री का तापमान अंतर पैदा करके शरीर विज्ञान के असंभव को संभव कर दिखाया.

लेकिन योग का इससे भी बड़ा एक अचंभा उन्होंने कैमरे में कैद किया. और वह था चक्र की शक्ति. शरीर के भीतर षट्चक्रों को विज्ञान कल्पना ही मानता था. लेकिन स्वामी राम ने दावा किया कि वे हर चक्र पर आभामंडल (औरा) पैदा करेंगे जिसे कैमरे में कैद किया जा सकता है. उनके हृदय स्थल (अनाहत चक्र) पर उभरा आभामंडल न सिर्फ कैमरे में कैद हुआ बल्कि विज्ञान के सामने पहली बार योग का षट्चक्र सिद्धांत भी साबित हुआ जो अभी तक विज्ञान में कपोल कल्पना समझा जाता था.

स्वामी राम जैसे महान योगियों के कारण आधुनिक दुनिया में योग ko manyta mili Dr_Abhilasha_Dwivedi Facebook wall

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नाद अनुसंधान

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नाद अर्थात शब्द, अनुसंधान कोई वस्तु जो पहले से विद्यमान है उसे दोबारा  खोजना।  
नाद अनुसंधान अथवा शब्दों को खोजना,
और शब्दों की यह खोज किसी बाह्य जगत में नहीं की जाती है।  बल्कि यह खोज तो स्वयं
के आंतरिक जगत की है।
शास्त्रों में कहा गया है,की जो कुछ भी इस जगत में है वो सब कुछ इस शरीर में है।
अर्थात पंचतत्व से बने सभी पदार्थ जो इस ब्रहमांड में उपस्थित है।वो सभी सूक्ष्म रूप
में इस शरीर में उपस्थित है।
 बाह्य जगत अनेक ध्वनियां जो हमें सुनाई देती है,वो सब ध्वनियाँ हमारे शरीर में भी होती रहती है।  परन्तु वे ध्वनियाँ बड़ी सूक्ष्म होती है,इसलिए सुनाई नहीं देती।योग के द्वारा बुद्धि जब सूक्ष्म होने लगती है तो उसकी पकड़ में सूक्ष्म विषय स्वभाव से ही आने लगे है।इन सूक्ष्म ध्वनियों को सुनने के लिए की जाने वाली यौगिक क्रिया ही नाद अनुसंधान कही गयी है।  
महर्षि गोरखनाथ ने नाद अनुसंधान की उपासना का वर्णन किया है,उन्होंने कहा है की वे सामान्य लोग जो तत्त्व ज्ञान को पाने में असमर्थ रहते है,उनको नाद की उपासना करनी चाहिए।  
घेरण्ड सहिंता में इसका वर्णन नहीं किया गया है।
 लेकिन हठयोग प्रदीपिका के चतुर्थ उपदेश में नाद अनुसंधान का वर्णन किया गया है।
और कहा गया है की - 
"मुक्तासने (सिद्धासन) स्थितो यपगी मुंडा संधाय शाम्भवीम। 
शृणुयाद्दक्षीणे कर्णे नादमंतस्थमेकधी:।।"  
साधक सिद्धासन में बैठ कर शाम्भवी मुद्रा लगाकर एकाग्रचित्त होकर अपने दाहिने कान से शरीरांतर्ग - ध्वनि को सुनने का प्रयास करे। 
कुछ समय अभ्यास के बाद 
"श्रवणपुटनयनयुगल घ्राणमुखाना निरोधन कार्यम्।
शुद्दुसुषुम्नासरणो स्फुटममल: श्रूयते नाद: ।।"  
दोनों कान, दोनों आँख, दोनों नासिका विवर और मुख को दोनों हाथो की अंगुलियों से बंद करके चित्त को एकाग्र करे तो कुछ अभ्यास के बाद साधक को स्पष्ट व पवित्र नाद सुनाई देता है। नाद की सुनने की विभिन्न चार अवस्थाये होती है। जिनमे विभिन्न अलग -अलग अनाहत नाद सुनाई देती है।
प्रारम्भ में यह क्रिया ऐसे ही है जैसे भ्रामरी प्राणायाम। अन्तर  इतना ही है की इस क्रिया में हमें कोई भी ध्वनी नहीं करनी है केवल अंदर की आवाज को सुनना है उस पर ध्यान लगाना है।
  जिनका वर्णन निम्न प्रकार है। 
आरम्भवस्था :
"बृह्मग्रन्थेम्रवेदभेदादानन्द: शून्यसम्भव:।
 विचित्र: कवणको देह्रअनाहत: श्रुय्ते ध्वनि: ।।
दिव्यदेहशच तेजस्वी दिव्यगन्धस्तवरोगवान। 
सम्पूर्णहृदय: शुन्य आरम्भे योगवान भवेत्।।"
आरम्भवस्था में ब्रह्मग्रंथ के भेदन के फलस्वरूप आनंद का अनुभव होता है। और अन्तः शरीर में शून्यसम्भूत असाधारण झंण - झंण रूप अनाहत शब्द सुनाई देता है।  
लाभ :
वह योगी जो इस अवस्था को सिद्ध कर लेता है,वह दिव्य देह वाला ओजस्वी, दिव्यगन्ध, निरोगी, प्रसन्नचित्त तथा शून्यचारी हो जाता है। 
घटावस्था  :
"द्वितीयाया घटिकृत्य वायुभवति मध्यग:। 
दृढ़सनो भवेद्योगी ज्ञानी देवसमस्तया।।
विष्णुग्रन्थेस्ततो भेदात परमानन्द सूचक:। 
अतिशून्य विमर्दशच भेरी शब्दसत्था भवेत।।"
योगी का आसन में दृढ़ होने पर दूसरी घटावस्था में जब विष्णुग्रंथि के भेदन से निबद्ध वायु का सुषुम्ना में संचार होता है,तब अतिशून्य अर्थात कपालकुहर में परमानन्द का सूचक एक वाद्ययंत्र भेरी एवं आद्यातजन्य जैसा शब्द सुनाई देता है। 
लाभ : 
इसकी सिद्धि के फलस्वरूप साधक ज्ञानी व देवतुल्य हो जाता है। 
परिचयावस्था : 
"तृतीय तु विज्ञेयो विहायो मर्दलध्वनि:। 
महाशून्य तदा याति सर्वसिद्धि समाश्रय:।।" 
तृतीय  परिचयावस्था में भ्रूमध्याकाश में ढोल की ध्वनि जैसा नाद सुनाई देता है। इसकी सिद्धि से प्राण सभी सिद्धियो को देने वाले महाशून्य (अंतराकाश या आज्ञाचक्र) में पहुंचता है।
लाभ :
"चितानन्द तदा सहजानन्दसंभव:। 
दोषदु:जजराव्याधिक्षुधानिडाविवर्जित:।।"
इस अवस्था में साधक को दोष-दुःख, जरा ,व्याधि, क्षुधा, निद्रा से रहित सहज आनंद की परमानन्द अवस्था प्राप्त होती है। 
निष्पत्तिवस्था :
 रूद्रग्रंथि का भेदन कर जब प्राण आज्ञाचक्र स्थित शिव के स्थान पर पहुंचता है तो यही अवस्था निष्पत्ति अवस्था कहलाती है, इस अवस्था में साधक को वीणा का झंकृत शब्द सुनाई देता है। 
"रूद्रग्रंथि यदा भित्वा शव्रपीठगतोअनिल:। 
   निष्पत्तो वैणव: क्वणद्विणाम्वणो भवेत।।"
लाभ:
" एकीभुत तदा चित्त राजयोगभिदानकम् । 
सृष्टि संहार कर्ता सौ योगिशवरसमो भवेत् ।।"
इस अवस्था में चित्त सर्वथा एकाग्र होकर समाधि संज्ञक बनता है। और तब इस अवस्था में योगी सृष्टि संहार कर्ता ईश्वर के समान हो जाता है।  
विश्लेषण :
नाद अनुसन्धान में बताई गई उपरोक्त चार अवस्थाएं-
आरम्भावस्था, घटावस्था, परिचयवस्था व निष्पत्ति अवस्था है।
 मानव शरीर में सबसे महत्व की सुषुम्ना नाड़ी है।यह नाड़ी इडा व पिंगला के मध्य होती है तथा  रीढ की हड्डी में गुदा मार्ग से कुछ ऊपर प्रारम्भ होकर सहस्त्रार तक जाती है।समान्यत: प्राण क्रिया इडा व पिंगला से की जाती है।यही प्राण क्रिया सुषुम्ना से करने के लिए योग साधना से सुषुम्ना के अवरोधो को दूर करते है ।और प्राण को चलाते है। जब यह प्राण सुषुम्ना से गुजरता है तो शरीर के विभिन्न हिस्सो में अनेक अति विशिष्ट अति सूक्ष्म ज्ञान प्रदान करने वाली क्रियाए होती है।
नाद अनुसंधान भी ऐसी ही एक क्रिया है,जो सुषुम्ना में प्राण के चलने से होने वाला स्पंदन है। यह स्पंदन सुषुम्ना के श्रवण केंद्र को स्पर्श करने वाले स्थान पर स्थित बिन्दु के उत्तेजित होने से होता है ।
इस नाद अनुसंधान में तीन ग्रंथियो का भेदन कहा गया है,जिनका विस्तार पूर्वक वर्णन निम्न प्रकार है ।
प्राण जब सुषुम्ना में ऊपर की तरफ चलने लगता है,
तो साधक को अनेक आध्यात्मिक, मानसिक व शारीरिक अनुभूतियां होने लगती है ।
प्राण जब सुषुम्ना में ऊपर की तरफ चलता है तो सर्वप्रथम मूलाधार चक्र (सबसे नीचे स्थित चक्र) का जागरण होता है फिर स्वाधिष्ठान व मणिपुर का होता है। इन तीनों चक्रो में सुषुम्ना से आने वाले प्राण पर किसी प्रकार का आवरण नहीं आता।
परन्तु आगे के तीन चक्रो पर एक विशेष प्रकार आवरण आता है ।
अर्थात यह आवरण हृदय की कक्षा में अर्थात अनाहत चक्र में आता है।अनाहत को ही ब्रह्मग्रंथि कहते है ।
इस ब्रह्मग्रंथि का भेदन करने से अर्थात अनाहत चक्र को क्रियाशील करने से आरंभवस्था की प्राप्ति होती है ।
अर्थात इस अनाहत चक्र के क्रियाशील होने पर जब साधक हाथो से इंद्रियो के सब द्वारो को बंद करके चित्त को या मन को अंतर्मुखी करता है। अर्थात स्वयं के अंदर की तरफ ध्यान लगाता है ।तो उसे झण झण रूप अनाहत शब्द सुनाई देता है।इस अवस्था को प्राप्त साधक की देह दिव्य ओज से भर जाती है। उसके शरीर से एक प्रकार की दिव्य गंध आने लगती है।शरीर के रोग दूर हो जाते है उसका चित्त प्रसन्न रहने लगता है।तथा शून्य का आचरण करने वाला अर्थात चित्त की सब वृत्तियाँ और उनकी उथल पुथल दूर हो जाती है।साधक एक भाव में अर्थात सम अवस्था में रहने लगता है।इसके बाद जब प्राण विशुद्धि चक्र (विष्णुग्रंथि) में पहुंचता है तो उसमे उपस्थित आवरण का भेदन होने पर यह जाग्रत होता है ।तब साधक को इंद्रियो के द्वारो को बंद करके आंतरिक ध्यान लगाने से भेरी व आघातजन्य अर्थात हृदय को कपाने वाली ध्वनियाँ जिनको सुनने से शरीर का अंग अंग काँप जाए ऐसी ध्वनियां सुनाई देती है।जैसे ढ़ोल, नगाड़े, युद्ध में बजने वाले अन्य यंत्र तथा होने वाली अनेक भयानक आवाज़े साधक को सुनाई देती है।इन आवाजो को सुनकर भी साधक को शांत चित्त रहना चाहिए,घबराना नहीं चाहिए। ये अवस्था घटावस्था कहलाती है ।
तृतीय परिचय अवस्था में प्राण भ्रूमध्य आकाश में पहुंचता है अर्थात आज्ञाचक्र में पहुंचता है अर्थात वह सभी सिद्धियां प्रदान करने वाले अंतराकाश में पहुंचता है।
पतंजलि योगशुत्र में समाधि का वर्णन करते हुए उसके दो स्वरूप बताये गए है। सम्प्रज्ञात व असम्प्रज्ञात समाधि ।जिनका विस्तार पूर्वक वर्णन योगशुत्र की व्याख्या करते हुए आगे करेंगे ।
यहाँ आवश्यकतानुसार कहता हूँ।
 जब चित्त सब वृत्तियो का निरोध कर लेता है परंतु उसका कारण रहता है या वह अपने कारण में लीन नहीं होता है। वह समाधि सम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है ।सम्प्रज्ञात समाधि की भी चार भूमियाँ या अवस्थाये (वितर्कानुगत,विचारानुगत,आनन्दानुगत तथा अस्मिताानुगत )होती है।
और जब चित्त सब वृत्तियो का निरोध करके स्वय भी अपने कारण में लीन हो जाता है।
 वह असम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है ।
यह समाधि ही योग की,जीव की,आत्मा की अंतिम अवस्था है।
 यह प्रथम आरम्भावस्था सम्प्रज्ञात समाधि की प्रथम अवस्था वितर्कानुगत समाधि कही जा सकती है।
या कह सकते की सम्प्रज्ञात समाधि की वितर्कानुगत समाधि इस प्रथम आरम्भावस्था में प्राप्त हो जाती है। हालांकि यह वितर्कानुगत समाधि प्रथम भूमि है।परंतु फिर भी बड़ी महत्व की है। इस समाधि में साधक के सामने पंच महाभूतों का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है जिससे साधक दिव्य देह वाला ओजस्वी, दिव्यगन्ध, निरोगी, प्रसन्नचित्त तथा शून्यचारी हो जाता है। द्वितीय घटावस्था विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था है इसमें सूक्ष्म भूतो का ज्ञान हो जाता है। तृतीय परिचयावस्था विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि है।इस अवस्था में अहम् अस्मि की वृत्ति रहती है। शेष सभी वृत्तियो का निरोध हो जाता है। जिससे साधक की भूख,प्यास,निद्रा जैसे सभी वृत्तियो का निरोध हो जाता है।और उसे अहम् अस्मि इस भाव में एक परम आनन्द की प्राप्ति होती है। चौथी निष्पत्तिवस्था में साधक जब आज्ञाचक्र को जाग्रत कर लेता है,अथवा ये कहे की रुद्रग्रन्थि का भेदन कर जब प्राण आज्ञाचक्र में कहे गए शिव के स्थान में पहुंचता है।तब साधक द्वारा इंद्रियो के द्वार बंद कर आंतरिक ध्यान लगाने पर उसे वीणा का अति मधुर व सुरीला शब्द सुनाई देता है
निष्पत्ति की यह चतुर्थ अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि की अंतिम भूमि अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अंतिम अवस्था है जहां विवेक ख्याति की प्राप्ति होती है ।
इस अवस्था की प्राप्ति के फलस्वरूप चित्त पूर्ण एकाग्र हो जाता है अर्थात सब वृत्तियो का पूर्ण निरोध होने लगता है। अर्थात यही से अंतिम अवस्था (असम्प्रज्ञात समाधि) की प्राप्ति के लिए के लिए साधक आगे बढ़ जाता है । इस अवस्था में साधक सृष्टि संहार कर्ता ईश्वर के समान हो जाता है ।
विशेष : प्रारम्भ में साधक को जो मेघ, भेरी आदि ध्वनियाँ सुनाई देती है अभ्यास क्रम बढ़ने के साथ ही सुनाई देने वाली इन ध्वनियों में भी सूक्ष्म से सूक्षतम अनेक नाद या शब्द या ध्वनि साधक को सुनाई देने लगती है वे ध्वनियां अनुभव जन्य  होती है,उनका वर्णन नहीं किया जा सकता ।
कहा जा सकता है की जब साधक नाद अनुसंधान की साधना करता है,तब प्रारम्भ में वर्णन की जाने वाली ध्वनियाँ सुनाई देती है।अभ्यास बढ़ने पर ऐसी दिव्य ध्वनियां या नाद सुनाई देने लगती है जो शब्दो में नहीं कही जा सकती है ।
सावधानियाँ : 
एकान्त वास में इसका अभ्यास करें
इस क्रिया से पहले लम्बे समय तक एक आसन में बैठने का अभ्यास कर ले।
इससे पहले कुछ देर अनुलोम विलोम व भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास कर ले।
उन दिनों में गरिष्ठ भोजन न ले।
लम्बी यात्रा से परहेज करें।
अधिक लोक व्यवाहार न करें।
अति विशष्ट निर्देष है की इस अभ्यास से पहले आसन प्राणायाम का अभ्यास
करके शरीर को पूर्ण शुद्ध कर ले।
जिससे की उस ऊर्जा के आने पर शरीर में उसे संभालने की शक्ति हो।
डरावनी ध्वनियां सुनने पर घबराए नहीं धैर्य के साथ उन्हें सुनते रहे।
बिना गुरु के निर्देशन के यह क्रिया न करें।

OSHO

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करी पत्ता/ मीठा नीम

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इसका वैज्ञानिक अथवा वानस्पतिक नाम Murraya Koenigii है।

दोस्तो करी पत्ता से तो आप सभी लोग परिचित ही होंगे। इसे मीठा नीम भी कहते हैं। नीम से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन इसकी पत्तियों का आकार- प्रकार नीम की तरह होने के कारण इसे मीठा नीम कह दिया जाता है। नीम वृक्ष काफी बड़ा होता है जबकि यह झाड़ी नुमा आकर में होता है। नीम के पत्ते बहुत कड़ुए होते हैं, जबकि इसके पत्तों का स्वाद बहुत हल्का कड़ुआ पन लिए हुए होता है।
इसकी खुशबू और स्वाद नमकीन व्यंजनों की रंगत बढ़ा देती है। रसदार सब्जियों में इसका प्रयोग किए जाने की वजह से इसे कड़ी पत्ता कहा जाता है। वैसे इसका प्रयोग सूखे, गीले, रसदार सभी प्रकार के व्यंजनों में किया जाता है।

दक्षिण भारत में लगभग सभी प्रकार के नमकीन व्यंजनों में इसका प्रयोग बहुतायत में किया जाता है। अब उत्तर भारत सहित समूचे भारत में भी इसका प्रयोग होने लगा है।

व्यंजनों में इसकी ताजी पत्तियों को छोंक के रूप में प्रयोग किया जाता है। सांथ ही इसकी पत्तियों को सुखा कर भी रखा जा सकता है। इसकी पत्तियों को तोड़ कर अखबार में फैला कर एक दिन छाया में सुखा लें, दूसरे दिन किसी टोकरी में अखबार के अन्दर बन्द कर 1- 2 घण्टे हल्की धूप में रख दें, जब इसकी पूरी नमी निकल जाए तो बन्द डब्बे में संभाल दें और जरूरत होने पर प्रयोग करते रहें। इसे खुली धूप में न सुखाएं, ऐसा करने से इसका रंग और खुशबू उड़ जाती है तथा स्वाद फीका पड़ जाता है।

यह आजकल आसपास के क्षेत्रों में बहुतायत में उपलब्ध है। वर्षाऋतु में इसके नए पत्ते आते हैं, वर्षा से धुले हुए पत्ते साफ- स्वच्छ रहते हैं, इन्हें काफी समय तक संभाल कर रखा जा सकता है। sabhar Ram prsad bhojan kalp brichh Facebook wall

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लिंगुडे/ ल्यून

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दोस्तो, आप में से कई मित्र शायद इस साग को पहली बार देख रहे होंगे। आप में से कितने लोगों ने इसका स्वाद लिया है? 

दरसल ये fern फर्न (टेरिडोफाईटा) की कलियॉं हैं, जो नम स्थानों में पायी जाती हैं, वनस्पति विज्ञान की भाषा में इसे Diplazium esculentum के नाम से जानते हैं। शहरों में इसकी कुछ प्रजातियों को नमी वाले स्थानों के करीब शो के लिये भी लगाया जाता है। 

आजकल हमारी सब्जी बाजार में यह सरलता से उपलब्ध है। यदि आप लोगों के यहाँ भी ये उपलब्ध हो तो एक बार अवश्य ट्राई करें। 

यह उत्तराखंड के कुमाऊं, गढ़वाल के सांथ ही मिलती जुलती जलवायु के चलते हिमाचल में भी होता है। सम्भवतः यह भारत के सभी पर्वतीय राज्यों पाया जाता होगा। 

इसे कुमाऊं में कहीं लिंगडे, कहीं ल्यून के नाम से जाना जाता है। हरा साग होने के कारण इसकी सरसों के तेल में बहुत ही स्वादिष्ट सब्जी बनती है। स्वाद और पौष्टिकता दोनों ही दृष्टि से इसे ओवर ग्रो होने से पहले ही खा लेना चाहिए। विदेशों में भी इसे बहुत चाव से खाया जाता है, साग के अतिरिक्त इसका अचार भी बनाया जाता है। 

हमारे उत्तराखंड में लिंगुडे की सब्जी को बहुत अच्छा माना जाता है, आजकल वर्षाऋतु में नदियों के किनारे या नमी वाली जगहों में यह बहुतायत में होता है। इसकी खेती नहीं की जाती बल्कि यह प्राकृतिक रूप से उत्तपन्न होता है। 

जंगली मशरूम की ही तरह इसकी कुछ प्रजातियाँ जहरीली या कड़वी भी हो सकती हैं। इसकी जिस प्रजाति के निचले तने में भूरे- काले रंग के गुच्छेदार रेशे होते हैं वह जहरीला- कड़ुआ नहीं होता है सांथ ही गहरे हरे रंग का खाने लायक और धानी हरे रंग का ज़हरीला या कड़ुआ हो सकता है। जहरीले या कड़ुए लिंगुडे को थोड़ा सा चख कर भी पहचाना जा सकता है। इन्हे काटते समय ही चखना पड़ता है वरना पूरी सब्जी का स्वाद बिगड़ सकता है। 

इसकी सब्जी बहुत स्वादिष्ट और पौष्टिक होती है, इसे पहली बार बनाने में थोड़ी असुविधा महसूस होती है, लेकिन थोड़ा उचित प्रयास करने के उपरांत परेशानी महसूस नहीं होती है। 

मेरी समझ में इसको बनाने का जो सबसे सरलतम तरीका आया वो आपसे शेयर कर रहा हूँ। इसकी ऊपरी सतह में भूरे- काले रंग के काफी सारे रेशे होते हैं, सबसे पहले इन्हें धोकर चाकू से रगड़ कर साफ कर लेना चाहिए, इसके पश्चात गरम पानी में थोड़ा नमक डाल कर 5 मिनट उबाल लेना चाहिए। दरसल यह बहुत चिकना होता है, इससे चिकना- तरल पदार्थ रिसता ही रहता है इसलिए इसे छिलने और काटने में बहुत परेशानी होती है। उबाल लेने के उपरांत काफी हद तक इसकी चिकनाहट समाप्त हो जाती है तथा इसके बाहर की झिल्ली बहुत आराम से निकल जाती है। 

उबालने, साफई करने, काटने के बाद इसे छोंक लिया जाता है। सरसों के तेल में कम आंच में हल्के कच्चे प्याज के सांथ छोंकने में यह बहुत स्वादिष्ट होता है, पारंपरिक रूप से इसकी सब्जी में दही भी डाला जा सकता है, दही से इसका स्वाद और अधिक बढ़ जाता है।

राजेन्द्र प्रसाद जोशी,
हल्द्वानी, नैनीताल,
उत्तराखंड

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रविवार, 11 जुलाई 2021

श्री दुर्गासप्तशती पाठ

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श्री दुर्गासप्तशती पाठ (हिंदी अनुवाद सहित सम्पूर्ण)
(प्रथम अध्याय)
।।ॐ नमश्चण्डिकायै।।
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मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा बताते हुए मधु-कैटभ वध का प्रसंग सुनाना...

विनियोगः

ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्ति:, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम् , ॠग्वेदः
स्वरूपम् , श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथम चरित्र जपे विनियोगः।

प्रथम चरित्र के ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता, गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति, रक्त दन्तिका बीज, अग्नि तत्त्व और ऋग्वेद स्वरूप है। श्रीमहाकाली देवता की
प्रसन्नता के लिये प्रथम चरित्र के जप में विनियोग किया जाता है।

ध्यानम्

ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां
सर्वाङ्गभूषावृताम् ।

नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे
महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥ १ ॥

भगवान् विष्णु के सो जाने पर मधु और कैटभ को मारने के लिये कमलजन्मा
ब्रह्माजी ने जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवी का मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शंख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अंगों में दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं । उनके शरीर की कान्ति नीलमणि के समान है तथा वे दस मुख और दस पैरों से युक्त हैं।

ॐ नमश्चण्डिकायै
'ॐ ऐं' मार्कण्डेय उवाच ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी बोले- ॥ १॥ 

सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः ।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥ २॥

सूर्य के पुत्र सावर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सुनो ॥२॥

महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः ।
स बभूव महाभागः सावर्णिनयो रवेः ॥ ३॥

सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामाया के अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, वही प्रसंग सुनाता हूँ॥ ३ ॥

स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्धवः ।
सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ॥ ४॥

पूर्वकालकी बात है, स्वारोचिष मन्वन्तरमें सुरथ नाम के एक राजा थे, जो चैत्रवंशमें उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डलपर
अधिकार था॥ ४॥

तस्य पालयतः सम्यक् प्रजा: पुत्रा निवौरसान्।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा॥ ५ ॥

वे प्रजा का अपने औरस पुत्रोंकी भाँति धर्मपूर्वक पालन करते थे; तो भी उस समय कोलाविध्वंसी नाम के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये॥ ५॥

👉  'कोलाविध्वंसी' यह किसी विशेष कुलके क्षत्रियोंकी संज्ञा है। दक्षिणमें 'कोला' नगरी प्रसिद्ध है, वह प्राचीन काल में राजधानी थी। जिन क्षत्रियों ने उस पर आक्रमण करके उसका विध्वंस किया, वे 'कोलाविध्वंसी' कहलाये।

तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः 
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥ ६ ॥

राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, तो भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे परास्त हो गये॥ ६॥ 

ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् । खैर
आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभि: ॥ ७ ॥

तब वे युद्धभूमि से अपने नगर को लौट आये और केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे (समूची पृथ्वीसे अब उनका
अधिकार जाता रहा), किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने उस समय महाभाग
राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया॥ ७॥

अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दु्बलस्य दुरात्मभिः ।
कोशो बलं चापहतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥ ८ ॥

राजाका बल क्षीण हो चला था; इसलिये उनके दुष्ट, बलवान् एवं दुरात्मा
मन्त्रियों ने वहाँ उनकी राजधानी में भी राजकीय सेना और खजाने को हथिया
लिया॥ ८॥ 

ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः ।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥ ९ ॥

सुरथका प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिये वे शिकार खेलने के
बहाने घोड़े पर सवार हो वहाँ से अकेले ही एक घने जंगलमें चले गये॥ ९॥

स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः ।  प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥ १० ॥

वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा, जहाँ कितने ही हिंसक जीव
[अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर] परम शान्तभाव से रहते थे। मुनि के बहुत-से शिष्य उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १० ॥

तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृत।
इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ॥ ११॥

वहाँ जाने पर मुनि ने उनका सत्कार किया और वे उन मुनिश्रेष्ठके आश्रम पर इधर उधर विचरते हुए कुछ काल तक रहे ॥ ११ ॥ 

सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वा कृष्टचेतन: ।
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ॥१२॥

मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा।
न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ॥ १३॥

मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते।
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ॥ १४॥

अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् ।
असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्धिः सततं व्ययम्॥ १५॥

संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ॥ १६॥

तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः ।
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः ॥ १७॥

फिर ममता से आकृष्टचित्त
होकर वहाँ इस प्रकार चिन्ता करने लगे -'पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने जिसका
पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है । पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करने वाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओं के अधीन होकर न जाने किन भोगों को भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगों के द्वारा सदा खर्च होते रहने के कारण अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा ।' ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर
मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा और उससे पूछा-'भाई! तुम
कौन हो? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-
से दिखायी देते हो?' राजा सुरथ का यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर
वैश्य ने विनीत भाव से उन्हें प्रणाम करके कहा- ॥१२-१९॥

सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे ।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम्॥ १८॥

प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम्॥ १९॥

वैश्य उवाच ॥ २० ॥

वैश्य बोला-॥ २०॥

समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ॥ २१॥

राजन्! मैं धनियों के कुलमें उत्पन्न एक वैश्य हूँ। मेंरा नाम समाधि है॥ २१ ॥

पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ।
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्॥ २२॥

वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः ।
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशला कुशलात्मिकाम् ॥ २३॥

प्रवृत्ति स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः ।
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ॥ २४॥

मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रों से वंचित हूँ। मेरे
विश्वसनीय बन्धुओं ने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दु:खी
होकर मैं वन में चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि मेरे पुत्रों की, स्त्री की और स्वजनों की कुशल है या नहीं। इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है? ॥ २२- २४॥ 

कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः॥ २५ ॥

वे मेरे पुत्र कैसे
हैं? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं? ॥ २५ ॥

राजोवाच ॥ २६॥

राजाने पूछा-॥ २६॥

यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ॥ २७ ॥

तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥ २८॥

जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदिने धनके कारण
तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्तमें इतना स्नेह का बन्धन
क्यों है॥ २७-२८॥

वैश्य उवाच ॥ २९ ॥

वैश्य बोला-॥ २९ ॥

एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः॥ ३० ॥

आप मेरे विषयमें जैसी बात कहते हैं, वह
सब ठीक है॥ ३० ॥

किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मन: ।
यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ॥ ३१ ॥

पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः ।
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥ ३२ ॥

यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु।
तेषां कृते मे नि:श्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥ ३३॥

किंतु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलांजलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हींके प्रति मेरे हृदयमें इतना स्नेह है । महामते ! गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है- इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा
हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है ॥ ३१-३३ ॥ 

करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥ ३४॥

उन लोगोंमें प्रेमका सर्वथा अभाव है; तो भी उनके प्रति जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो
पाता, इसके लिये क्या करू?॥ ३४॥

मार्कण्डेय उवाच ॥ ३५ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं-॥ ३५ ॥

ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ।॥ ३६॥

समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः ।
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्ह तेन संविदम्॥ ३७॥

उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वेंश्यपार्थिवौ ॥ ३८ ॥

ब्रह्मन्! तदनन्तर राजाओंमें श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् वैश्य और राजाने कुछ वार्तालाप आरम्भ किया॥ ३६ - ३८॥

राजोवाच ॥ ३९॥

राजाने कहा-॥३९॥

भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥४०॥

भगवन् ! में आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये॥४० ॥

दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना।
ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्केष्वखिलेष्वपि ॥ ४१ ॥

मेरा चित्त अपने अधीन न होनेके कारण वह बात मेरे मन को बहुत दु:ख देती है। जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है, उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में मेरी ममता बनी हुई है॥ ४१ ॥ 

जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम।
अयं च निकृत: पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥ ४२ ॥

मुनिश्रेष्ठ ! यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, अज्ञानीकी भाँति मुझे उसके लिये दु:ख होता है; यह क्या है? इधर यह वैश्य भी घरसे अपमानित होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने इसे छोड़ दिया है॥ ४२ ॥

स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति।
एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ॥ ४३ ॥

स्वजनोंने भी इसका परित्याग कर दिया है,
तो भी यह उनके प्रति अत्यन्त हार्दिक स्नेह रखता है। इस प्रकार यह तथा में-दोनों ही बहुत दुःखी हैं ॥ ४३ ॥

दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि॥ ४४॥

ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता॥४५॥

जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस
विषयके लिये भी हमारे मनमें ममताजनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग!
हम दोनों समझदार हैं; तो भी हममें जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है?
विवेकशून्य पुरुषकी भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी
देती है॥ ४४-४५ ॥

ऋषिरुवाच ॥ ४६॥

ऋषि बोले-॥ ४६ ॥

ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे ॥ ४७॥

विषयश्च महाभाग याति चैवं पृथक् पृथक्।
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे ॥ ४८ ॥

महाभाग! विषयमार्गका ज्ञान सब जीवोंको
है। इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग-अलग हैं, कुछ प्राणी
दिनमें नहीं देखते और दूसरे रातमें ही नहीं देखते ॥ ४७ - ४८॥

केचिह्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम् ॥ ४९॥

तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रिमें भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं; किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते॥ ४९ ॥

यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः ।
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम् ॥ ५०॥

पशु, पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्योंकी समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियोंकी होती है॥ ५०॥

मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः ।
ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु ॥ ५१ ॥

कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषा: सुतान् प्रति॥ ५२ ॥

लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतोन् किं न पश्यसि।
तथापि ममतावर्त्ते मोहग्ते निपातिताः ॥ ५३ ॥

महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा।
तन्नात्र विस्मयः कार्यों योगनिद्रा जगत्पतेः ॥ ५४॥

महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् sलायची
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ॥ ५५॥

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।
तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्॥ ५६॥

सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ॥ ५७ ॥

संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥ ५८॥

तथा जैसी मनुष्यों की होती है,वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है । यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनोंमें समान ही हैं। समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ ! क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये पुत्रों की अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझ की कमी नहीं है,
तथापि वे संसार की स्थिति (जन्म-मरण की परम्परा) बनाये रखने वाले भगवती
महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराये गये हैं।
इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान् विष्णु की योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हीं से यह जगत् मोहित हो रहा है। वे भगवती महामायादेवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या संसार बन्धन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं ॥ ५१-५८॥

राजोवाच ॥ ५९॥

राजाने पूछा-॥५९ ॥

भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान्॥६०॥
ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज ।
यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ॥ ६१ ॥
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥६२॥

भगवन् ! जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? ब्रह्मन्! उनका आविर्भाव कैसे हुआ? तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं? ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे! उन देवी का जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ॥ ६०-६२॥

ऋषिरुवाच ॥ ६३॥

ऋषि बोले-॥६३ ॥

नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ॥ ६४॥

मे तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम।
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा ॥ ६५॥

उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते। 
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते॥६६॥

आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥ ६७ ॥

विष्णुकर्णमलोद्धूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥ ६८॥

दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम्।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः॥ ६९॥

विबोधनार्थाय हरेहरिनेत्रकृतालयाम्।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ॥ ७०॥

निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥ ७१ ॥

राजन्! वास्तव में तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा
है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है । वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णव में निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान् विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानों के मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभ के नाम से विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजी का वध करने को तैयार हो गये। भगवान् विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया और भगवान् को सोया हुआ देखा, तब एकाग्रचित्त होकर
उन्होंने भगवान् विष्णु को जगाने के लिये उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा का स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत को धारण करने वाली,
संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरूप भगवान् विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवी की भगवान् ब्रह्मा स्तुति करने लगे ॥ ६४-७१ ॥

ब्रह्मोवाच ।।७२।।
ब्रह्माजीने कहा-॥७२॥

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वरषट्कारः स्वरात्मिका॥ ७३ ॥

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता । 
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ॥ ७४॥

त्वमेव संध्या  सावित्री त्वं देवि जननी परा। 
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्॥ ७५॥

त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥ ७६ ॥

तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये । 
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥ ७७॥

 
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी"
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥ ७८॥

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा।
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं हरीस्त्वं बुद्धिर्बोध लक्षणा ॥ ७९॥

लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च । छी, मिळे
खड़गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥ ८० ॥

शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा। 
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥८१ ॥

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी । 
यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वा खिलात्मिके ॥ ८२ ॥

तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा'। 
यया त्वया जगत्स्त्रष्टा जगत्पात्यक्ति यो जगत्॥ ८३॥

सोऽपि निद्रावशं नीत: कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः । 
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥ ८४॥

कारितास्ते यतोऽतस्त्वां क: स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्।
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥ ८५ ॥

मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥ ८६ ॥

बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ।॥ ८७ ॥

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तुम्हीं
वरषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार- इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करती हो । तुमसे ही इस जगत्की सृष्टि होती है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्त में सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि ! इस जगत् की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहार रूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति महामोहरूपा, महादेवी और महासुरी हो । तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्ग धारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ-ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं । तुम सौम्य और सौम्यतर हो- इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर- सबसे परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्हीं हो । सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत्रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या होसकती है? जो इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान् को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तब तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है? मुझको, भगवान् शंकर को तथा भगवान् विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है? देवि ! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान् विष्णु को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान् असुरों को मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो॥ ७३-८७॥

ऋषिरुवाच॥ ८८ ॥

ऋषि कहते हैं-॥८८॥

एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा ॥ ८९ ॥

विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ ।
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः।।
॥ ९०॥

निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥ ९१॥

एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ । 
मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ॥ ९२ ॥

क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ ।
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः ॥ ९३ ॥

पञ्चवर्षसहस्त्राणि बाहुप्रहरणो विभुः।राई
तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ ॥ ९४ ॥

उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्॥ ९५ ॥

राजन्! जब ब्रह्माजी ने वहाँ मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से भगवान् विष्णु को जगाने के लिये तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी
योगनिद्रा की इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवान् के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थल से निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रा से मुक्त होने पर जगत् के स्वामी भगवान् जनार्दन उस एकार्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी थे और क्रोध से लाल आँखें किये ब्रह्माजी को खा जाने के लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान् श्रीहरि ने उठकर उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था; इसलिये वे भगवान् विष्णु से कहने लगे-'हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं। तुम हम लोगों से कोई वर माँगो' ॥ ८९-९५॥

श्रीभगवानुवाच॥ ९६॥

श्रीभगवान् बोले-॥९६॥

भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वर्यावुभावपि ॥ ९७ ॥
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम ॥ ९८ ॥

यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो तो अब
मेरे हाथ से मारे जाओ । बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है । यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है॥ ९७-९८॥

ऋषिरुवाच॥ ९९ ॥
ऋषि कहते हैं-॥९९॥

वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ॥ १०० ॥
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः। 
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ।॥ १०१ ॥

इस प्रकार धोखे में आ जाने पर जब उन्होंने
सम्पूर्ण जगत् में जल-ही-जल देखा, तब कमलनयन भगवान् से कहा-'जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो- जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो' ॥ १००-१०१ ॥

ऋषिरुवाच॥ १०२॥

ऋषि कहते हैं-॥ १०२॥

तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता ।
कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥ १०३ ॥

एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम् । प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः श्रृणु वदामि ते॥ ऐं ॐ॥ १०४ ॥।

तब 'तथास्तु' कहकर शंख, चक्र और गदा
धारण करने वाले भगवान् ने उन दोनों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से
काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट
हुई थीं। अब पुन: तुमसे उनके प्रभावका वर्णन करता हूँ, सुनो॥ १०३-१०४॥

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्मये मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य में 'मधु-कैटभ-वध' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १ ॥

क्रमशः.....

अगले लेख में द्वितीय अध्याय जय माता जी की।
पं देवशर्मा
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शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

शिखा सूत्र का प्राचीन विज्ञान

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सिर के ऊपरी भाग को ब्रह्मांड कहा गया है और सामने के भाग को कपाल प्रदेश। कपाल प्रदेश का विस्तार ब्रह्मांड के आधे भाग तक है। दोनों की सीमा पर मुख्य मस्तिष्क की स्थिति समझनी चाहिए।
ब्रह्मांड का जो केन्द्रबिन्दु है, उसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं। ब्रह्मरंध्र में सुई की नोंक के बराबर एक छिद्र है जो अति महत्वपूर्ण है। सारी अनुभूतियां, दैवी जगत् के विचार, ब्रह्मांड में क्रियाशक्ति और अनन्त शक्तियां इसी ब्रह्मरंध्र से प्रविष्ट होती हैं। हिन्दू धर्म में इसी स्थान पर चोटी (शिखा) रखने का नियम है। ब्रह्मरंध्र से निष्कासित होने वाली ऊर्जा शिखा के माध्यम से प्रवाहित होती है ।

 

वास्तव में हमारी शिखा जहां एक ओर ऊर्जा को प्रवाहित करती है, वहीं दूसरी ओर उसे ग्रहण भी करती है। वायुमंडल मेंबिखरी हुई असंख्य विचार तरंगें और भाव तरंगें शिखा के माध्यम से ही मनुष्य के मस्तिष्क में प्रविष्ट होती हैं। कहने की आवश्यकता नहीं, हमारा मस्तिष्क एक प्रकार से रिसीविंग और ब्रॉडकास्टिंग सेंटर का कार्य शिखारूपी एंटीना या एरियल के माध्यम से करता है। मुख्य मस्तिष्क( सेरिब्रम) के बाद लघु मस्तिष्क(सेरिबेलम) है और ब्रह्मरंध्र के ठीक नीचे अधो मस्तिष्क (मेडुला एबलोंगेटा) की स्थिति है जिसके साथ एक 'मेडुला' नामक अंडाकार पदार्थ संयुक्त है। वह मस्तिष्क के भीतर विद्यमान एक तरल पदार्थ में तैरता रहता है। मेरूमज्जा का अन्त इसी अंडाकार पदार्थ में होता है। यह पदार्थ अत्यन्त रहस्यमय है। आज के वैज्ञानिक भी इसे समझ नहीं सके हैं। बाहर से आने वाली परिदृश्यमान शक्तियां अधो मस्तिष्क से होकर इसी अंडाकार पदार्थ से टकराती हैं और योग्यतानुसार मानवीय विचारों, भावनाओं, अनुभूतियों में स्वत: परिवर्तित होकर बिखर जाती हैं।
योगसाधना की दृष्टि से मुख्य मस्तिष्क आकाश है। मनुष्य जो कुछ देखता है, कल्पना करता है, स्वप्न देखता है--यह सारा अनुभव उसको इसी आकाश में करना पड़ता...है।sabhar Facebook wall piyush sharma

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सोमवार, 5 जुलाई 2021

शक्ति की ही उपासना क्यों

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तंत्र के मत में देवी की उपासना ही एक मात्र शक्ति की उपासना नहीं है गणपत्य सौर और वैष्णव शैव और शाक्त सभी शक्ति के उपासक हैं तंत्र के अनुसार पुरुष निर्गुण है और निर्गुण की उपासना नहीं होती है उपास्य देवता पुरुष होने पर ही वास्तव में वहां भी उसकी शक्ति की ही उपासना होती है शक्ति ही हमारे ज्ञान का विषय होती है शक्तिमान या पुरुष ज्ञान अतीत सत्ता मात्र है वह किसी भी समय किसी के बोध का विषय नहीं होता।
वेद वे तंत्र में ब्रह्म को सच्चिदानंद कहा गया है इसमें सत् अंश पुरुष या निर्गुणभाव तथा चित् और आनन्दांश गुणयुक्त भाव अर्थात है एवं इस प्रकृति के द्वारा ही पुरुषों का परिचय प्राप्त होता है सांख्यदर्शन भी पुरुष और प्रकृति में का ही विचार करता है आप संख्य के मत में दुख के ही अत्यंत विनाश को ही मुक्ति कहते हैं। सुख दुःखादि बुद्धादि के स्वभाव हैं।
स्वभाव किसी प्रकार नष्ट नहीं हो सकता अतः बुद्धि के अतिरिक्त किसी सत्ता को स्वीकार न करने के दुख आदि से मुक्ति लाभ करना असंभव है इसलिए बुद्धि के अतिरिक्त सुख दुख आदि रोहित एक अतिरिक्त वस्तु या आत्मा को स्वीकार करना पड़ता है यह आत्मा ही दुख सुख आदि रहित निर्गुण पुरुष है बुद्धयादि के सुख दुखआदि धर्मपुरूष पर आरोपित होते हैं।
इस आरोपित सुख-दुख आदि धर्म के अवगत होने पर ही मुक्ति लाभ होता है बुद्धि आदि अचेतन पदार्थ हैं चेतन के सानिध्य से इनकी प्रवृत्ति देखने में आती है यह अधिष्ठाता ही पुरूष बुद्धयादि समस्त जड़ पदार्थ योग्य पदार्थ हैं इनका भूख था कि बिना भोग्य सिद्ध नहीं होता है भोग्य पदार्थ मात्र का अनुभव होता है और जो अनुभव कराता है या भोग करता है वही पुरुष है।
परंतु शक्ति का इस प्रकार प्रत्यक्ष दर्शन बड़े भाग्य से ही जीव कर सकता है हम जो सम्मोहित होकर शुद्ध चैतन्य को भूल गए किसी से शौकार्त्त जीवो का हाहाकार आज जगत को विदीर्ण कर रहा है चैतन्य में लक्ष्य न होने के कारण ही प्राण स्पंदित होकर मन को से सचंचल कर रहे हैं और मन का यह चांचल्यविक्षेप आज समस्त जगत को नृत्यशीला बालिका के समान बोध होता है इस चित् स्वरूप में लक्ष्य रखने से ही हम स्थिर होकर निविष्ट चित् से उस चिन्मयी माता को स्पर्श कर सकेंगे इसलिए आज सब काम छोड़कर हमको उसे प्रसन्न करने के लिए कार्य में लगना चाहिए।
         
         श्रणु देवि महाभागे तवाराधनकारणम् । तव साधनतो येन ब्रह्म सायुज्यमश्नुते।।
         त्वं परा प्रकृतिः साक्षाद् ब्रह्मण परमात्मनः। त्वत्तो जातं जगत्सर्व त्वं जगज्जनी शिवे ।।

अर्थात हे देवि तुम्हारी आराधना क्यों करनी चाहिए तथा तुम्हारी आराधना के द्वारा ब्रह्मसायुज्स क्यों प्राप्त होता है इसका कारण सुनो साक्षात ब्रह्म या परमात्मा की तुम ही परा प्रकृति हो अतः केवल तुम्हारे ही साथ उसका साक्षात और नित्य संबंध है हे देवी तुमसे ही ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ है अतः तुम ही अखिल विश्व की एकमात्र जननी हो।
यदि दोनों की उपासना एक ही है तो विभिन्न प्रणाली क्यों प्रचलित हुई जो कुछ सूक्ष्म स्थूल है सभी तो ब्रह्म और प्रकृति विशिष्ट है अब सब कुछ ब्रह्म शरीर है ब्रह्म नाम से जो पहले निर्गुण निराकार था उसे मां संबोधन करते ही मानो वह इंद्रिय बोधगम्य में होने लगा क्रमशः यह समझ में आने लगा कि जो स्थुल है वही सूक्ष्म है तथा जो सूक्ष्म है वही स्थुल है जो निराकार और इंद्रियों के लिए अगम्य  है था वही साकार और इंद्रिय ज्ञान का विषय बन गया जो वाष्पाकार था।
वह घन होकर जन और अन्त मैं तुषाराकार हो गया परंतु इस साकार और निराकार में तत्वतः कुछ भी भेद नहीं है हम सोचते हैं कि वह इन नेत्रों से नहीं देख सकता परंतु इस विश्वरूप में हमें किसी की मूर्ति दिखती है क्या इस रूप में कोई दूसरा है क्या यह वही नहीं है इसे स्थुलरूप में भी वही है। जिसकी इन नेत्रों से धूल मिट्टी समझकर हम अपेक्षा करते हैं एक बार प्राण की जीभ से उसका आशीर्वाद ग्रहण करके देखें तो सही हमें इन धूल के कणों में उसी का दिव्य रूप में सुशोभित दिखेगा। sabhar Facebook sakti upasak agyani 

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शनिवार, 19 जून 2021

हमारा विज्ञानऔर हमारी धरोहर

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जब हमारे देश में बड़ी बड़ी  राइस मील नहीं थी तो धान को घर पर ही कूटकर भूसे को अलग कर चावल प्राप्त किया जाता था... असलियत में वही चावल था जिसे  whole rise कहते हैं... चावल का प्राकृतिक रंग सुनहरा भूरा ही होता है... सुर्ख लाल काला भी होता है लेकिन इंसानी फितरत है उसे सहज प्राकृतिक  चीजों से नफरत होती है...सफेद चमड़ी रंगत की तरह सफेद वस्तुओं से उसका अलग ही आकर्षण होता है |

इसे समझने के लिए आपको चावल  दाने की संरचना को समझना होगा... चावल  ही क्या प्रत्येक खाद्यान्न ज्वार मक्का बाजरा सभी की सरचना  4 स्तरीय होती है... सबसे बाहरी संरचना  जिसे हस्क बोला जाता है या भूसी कहते हैं वह होती है... दूसरा स्तर ब्रेन का होता है जिसे चोकर भी कह देते हैं... इसमें कैल्शियम मैग्नीशियम सहित जरूरी मिनरल होते हैं.. तीसरा स्तर  ग्रेन का होता है... यह चावल या किसी दाने  भूर्ण होता है इसमें विटामिन प्रोटीन अमीनो एसिड प्रचुर मात्रा में होते हैं..  चावल या किसी दाने की जीवनी शक्ति परमात्मा ने इसी हिस्से में डाल दी है यहीं से किसी वृक्ष , पौधे का अंकुर निकलता है.. मोटे तौर पर चौथा व अंतिम स्तर एंडोस्पर्म होता है इसमें केवल स्टार्ट , कार्बोहाइड्रेट होती है यह पूरी तरह सफेद होता है चाहे गेहूं का हो या चावल का हो... इसे हम कह सकते हैं यह चावल के तीसरे स्तर का भोजन होता है अर्थात ग्रेन का....|

समस्या अब यहां से शुरू होती है मिलों में जब से  इंसान ने विज्ञान तकनीक में महारत हासिल की है... प्रोसेसिंग मशीनों की सहायता से चावल के तीन स्तरों को अलग कर दिया जाता है चौथे मृत अंतिम स्तर  endosperm जिसमें केवल कार्बोहाइड्रेट है जो केवल शरीर में शुगर या मोटापा ही बढ़ाएगा उसको कंपनियां  चावल के दाने के रूप में पैक कर बेच रही है जिसे हम हम खाने में  लगाते हैं... अर्थात सफेद चावल यह वही चौथा अंतिम हिस्सा है जिसकी सार्थकता संपूर्ण चावल के तीन स्तरों के साथ ही होती है बगैर इन तीन स्तरों के यह सफेद चावल कुछ भी नहीं है... इसमें ना प्रोटीन होती है ना फाइबर कैल्शियम व विटामिन इसमें केवल स्टार्च  कार्बोहाइड्रेट ही होती है...|

पहले हमारे पूर्वज जो  घर पर ही या खलियान में हाथ कुटा चावल तैयार करते थे वह संपूर्ण चावल होता था केवल  भूसी को अलग करते थे चारों स्तरों से युक्त सुनहरा चावल जिसे ब्राउन राइस कहते हैं... यह सुनहरा चावल ही चावल है.... सफेद चावल तो सच्चे अच्छे सुनहरे चावल  का मृत अंतिम स्तर है जो सही मायने में चावल के भ्रूण  की ऊर्जा के लिए बनी हुई है... ठीक इसी तरह हम इंसानों को उर्जा से ज्यादा पोषण की जरूरत है पोषण मिलता है विटामिन  मिनरल  प्रोटीन से... अब जिस हिस्से में यह पोषण था वह तो हमने वेस्ट  बायो प्रोडक्ट बनाकर अलग कर दिया... हमारे हिस्से में आई बीमारी....वनवासी  आज भी संपूर्ण चावल या सुनहरा चावल इस्तेमाल में लाया जाता है वह बहुत मजबूत होते हैं... जिम जाने वाले नौजवान भी आजकल सुनहरा चावल ही खाते हैं मोटापे कुपोषण से बचने के लिए.... अब डायटिशियन लोगों को जागरूक कर रहे हैं लेकिन कंपनियां अपने स्वार्थ और लालच के लिए तमाम तरीके के एडवरटाइजिंग सफेद चावल के प्रचार प्रसार को लेकर 
करती है आम व्यक्ति यह सब नहीं जानता था क्योंकि वह अपनी प्राचीन परंपराओं बुजुर्गों की आहार शैली को लेकर एकदम अनभिज्ञ है..|

  समझिए चावल का मतलब सुनहरा चावल संपूर्ण चावल या ब्राउन राइस यह पोस्टिक भी है स्वादिष्ट भी है|
 हमारे   पूर्वज इसी को इस्तेमाल में लाते थे |

लेखक : आर्य सागर खारी

विकल्प 
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धान को छिलका सहित आंशिक रूप से उबालने के बाद उसे सुखाकर जो चावल निकाला जाता है उसे उबला चावल (Parboiled rice) कहते हैं। इसके लिये, धान को पहले पानी में कुछ समय के भिग्कर रखा जाता है, फिर उसे उबाला जाता है और अन्ततः सुखा लिया जाता है। इस प्रक्रिया को अपनाने से ढेंका या हाथ से भी चावल निकालने में आसानी होती है। इसके अलावा इस प्रक्रिया के करने से चावल में चमक आती है तथा उसमें पोषक तत्त्व अधिक रह जाते हैं। विश्व का लगभग ५०% उबला चावल खाया जाता है। भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यान्मार, मलेशिया, नेपाल, श्री लंका, गिनिया, दक्षिण, अफ्रीका, इटली, स्पेन, नाइजेरिया, थाईलैण्ड, स्विट्जरलैण्ड और फ्रांस में उबालकर चावल निकालने की विधि प्रचलित है

लेखक : राजीव कुमार, CA, धुरी, पंजाब

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