Sakshatkar.com : Sakshatkartv.com

.

Comments

You might like

Subscribe Us

बुधवार, 6 मई 2026

मन की सुक्ष्म गतिविधियां

0

 1. मन: आत्मा का प्रतिबिंब (सूक्ष्म स्वरूप)

​तात्विक दृष्टि से मन आत्मा का ही प्रतिबिंब है। यहाँ जब हम चेतना की बात करते हैं, तो इसका वह हिस्सा अतिसूक्ष्म है। इस अवस्था में मन अपनी व्यापकता में सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वरूप को समाहित किए रहता है। यह चेतना का वह शुद्ध रूप है जहाँ कोई सीमा नहीं है।

2. मन: जीव का प्रतिबिंब (पिंड स्वरूप)

​इसके विपरीत, जब मन अपनी मूल चेतना (आत्मा) से विमुख हो जाता है, तब वह केवल 'जीव' का प्रतिबिंब बनकर रह जाता है। इस अवस्था में वह विराट ब्रह्मांडीय स्वरूप को त्यागकर 'पिंड' (सीमित शरीर) के स्वरूप में सिमट जाता है।

3. यथार्थ से विस्मृति और भौतिक आसक्ति

​जब चेतना अनंत विषयों को धारण कर लेती है, तब वह अपने वास्तविक और यथार्थ स्वरूप से भटक जाती है। इस प्रक्रिया में:


• वह अपनी सूक्ष्म सत्ता का त्याग कर देती है।


• वह केवल शरीरी सत्ता (भौतिक अस्तित्व) को ही एकमात्र सत्य मान लेती है।


• परिणामस्वरूप, चेतना स्वयं का अस्तित्व भूलकर केवल भौतिक शरीर का प्रतिबिंब बन जाती है।

4. इंद्रियों के अधीन जीवन

​अन्ततः, अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होकर यह जीव केवल इंद्रियों की इच्छाओं की पूर्ति को ही अपना चरम लक्ष्य मान लेता है। पूरा जीवन केवल भौतिक सुखों और मानसिक वृत्तियों के जाल में उलझकर व्यतीत हो जाता है, जहाँ यथार्थ की पहचान ओझल रहती है।

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

vigyan ke naye samachar ke liye dekhe

Ads

 
Design by Sakshatkar.com | Sakshatkartv.com Bollywoodkhabar.com - Adtimes.co.uk | Varta.tv