अघोरी के चमत्कार
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अघोरियों के चमत्कारों और उनकी सिद्धियों के बारे में अनेक लेख पढ़े होंगे। मगर किसी ने यह सोचा है कि ये सिद्धियां उनके पास आती कैसे हैं जिनके बल पर वे अलौकिक चमत्कार करते हैं।
तांत्रिक साधना का एक सशक्त पक्ष परामनोविज्ञान पर आधारित है। उस पक्ष के अंतर्गत कई साधना और सम्प्रदाय हैं जिनमें एक है--'अघोर सम्प्रदाय'। 'घोर' शब्द का मतलब 'संसार' है, 'अ' नकारात्मक है अर्थात् जो संसारी नहीं है, वह 'अघोरी' है। इसी अघोरी शब्द का बिगड़ा रूप 'औघड़' है। यह अति प्राचीन सम्प्रदाय है। लेकिन इससे भली-भांति लोग परिचित हुए बाबा कीनाराम के समय से। गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन बाबा कीनाराम 'अघोर' संप्रदाय के उच्चकोटि के सिद्ध महात्मा और सन्त थे जिनकी समाधि वाराणसी के 'शिवाला' मोहल्ले में आज भी दर्शनीय है। शरीर, संसार, समाज की मर्यादा के बन्धनों के कारण 'मन में जड़ता' आ जाती है। इस जड़ता को दूर करने के लिए 'मन का स्वतंत्र होना' ज़रूरी है।
इस सम्प्रदाय में मल-मूत्र का सेवन, अन्य नशीली वस्तुओं का प्रयोग, नग्न विचरण, गाली-गलौज आदि अक्सर देखने-सुनने को मिलता है। इन सवसे मन की वृत्तियाँ उन्मुक्त होने लगती हैं और मन की जड़ता दूर होने लगती है।
मन की दो मुख्य अवस्थाएं हैं--चेतन और अचेतन। अचेतन मन में अकल्पनीय और अविश्वसनीय शक्तियां विद्यमान रहती हैं। वे शक्तियां जब अचेतन मन की सीमा लांघकर चेतन मन में प्रकट होती हैं तो उनके चमत्कार भरे कौतुक साधारण लोगों को हतप्रभ कर देते हैं। साधारणतया जीवित मनुष्य चेतन मन के द्वारा कार्य करता है। लेकिन मरने के बाद जब शरीर का बन्धन टूट जाता है तो उस स्थिति में वह अचेतन मन की अवस्था में क्रियाशील हो उठता है। इसीलिए प्रेतात्माओं में मनुष्य से ज्यादा शक्ति, सामर्थ्य और कार्य क्षमता होती है। अगर किसी जीवित व्यक्ति के अचेतन मन से इस प्रकार की किसी प्रेतात्मा का स्थायी सम्बन्ध जुड़ जाय तो वह मनुष्य चेतन मन के स्थान पर अचेतन मन के द्वारा कार्य करने लग जायेगा और वह जो कार्य करेगा, वह हतप्रभ करने वाला, अलौकिक होगा, चमत्कारपूर्ण होगा और होगा मानवेतर शक्ति संपन्न। इसी को हम साधारण रूप से 'सिद्धि' के नाम से पुकारते हैं।
अघोर साधना और उसकी जैसी अन्य तांत्रिक साधनाओं के शास्त्रविहीन सिद्धांतों को विज्ञान के मूलभूत तथ्यों से बहुत बल मिलता है। चेतन मन के विचार तरंगों को केंद्रित कर जिस अवस्था की प्राप्ति होती है, उसी को साधना में ज्ञान की संज्ञा दी गयी है। अचेतन मन की विचार तरंगों को केंद्रित करने पर जिस अवस्था की प्राप्ति होती है, उसे योग में 'सविकल्प समाधि' कहते हैं। इसी प्रकार उसके दूसरे रूप के अन्तर्गत जिसे 'अमन की अवस्था' कहते हैं, उसमें उठने वाली तरंगों को केंद्रित करने पर साधक को जिस स्थिति की अनुभूति होती है, उसे 'निर्विकल्प समाधि' कहते हैं।
निर्विकल्प समाधि की स्थिति में केंद्रित हुई विचार तरंगें 'अल्फ़ा' तरंगों का रूप धारण कर लेती हैं। उस समय अधिक मात्रा में मस्तिष्क से वे निकलतीं हैं और उनकी गति भी अधिक तीव्र होती है। किन्तु सविकल्प समाधि की स्थिति में उनकी मात्रा और गति शून्य होती है। उस समय व्यक्ति से प्रचुर मात्रा में बीटा, अल्फ़ा और डेल्टा नामक तरंगें निकलती हैं। यदि ये तीनों तरंगे आपस में मिल जाएँ तो शरीर को पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति प्रभावित नहीं कर पाती है।
कुछ वर्ष पूर्व वाराणसी में नगवा घाट पर एक ऐसे ही साधक रहते थे। रात्रि में शून्यमार्ग से वे विचरण किया करते थे। सन्त टैरेसा जब अपनी उपासना के समय ध्यानावस्थित होती थीं तो कभी-कभी पृथ्वी के ऊपर उठ जाती थीं। यह ऊपर उठने की शक्ति कभी-कभी प्रकृति की ओर से भी उपहार सरूप लोगों को उपलब्ध हो जाती है जिसका रहस्य स्वयं उन्हें पता नहीं होता। 1952 में मैसाच्युसेट्स के बार नामक स्थान पर श्रीमती 'चेनसी' का शरीर अचानक धीरे-धीरे उठकर फर्श और छत के बीच अधर में लटक गया था। इसी प्रकार हवा में उड़ने की शक्ति 'डा.डी होम' नामक व्यक्ति में भी थी। 1868 में लन्दन में एक विशेष समारोह में वे फर्श से उठकर अचानक छत से जा लगे और खिड़की से निकलकर उड़ते हुए तीसरी मंजिल में पहुँच गए थे।
सविकल्प समाधि की अवस्था में यदि 'अल्फ़ा' तरंगों का सम्बन्ध केवल 'बीटा' तरंग से जुड़ जाय तो हज़ारों मील दूर बैठे व्यक्ति के विचारों और इच्छाओं का तुरंत ज्ञान प्राप्त हो सकता है।
इसी प्रकार के एक अघोरी महात्मा मानसरोवर से पधारे थे। वे दूर और समीप के लोगों के विचार, भाव और इच्छाओं को तुरन्त जान-समझ लेते थे। यही नहीं 3-4 घण्टे बाद कौन-सा विचार उत्पन्न होगा, कौन-सा भाव और कौन-सी इच्छा उत्पन्न होगी--यह भी जान-समझ लेते थे और बतला दिया करते थे। और जो बतला देते थे, वही होता भी था। इसी प्रकार यदि प्रखर और तीव्रगामी 'अल्फ़ा' तरंगों के साथ 'डेल्टा' तरंग मिल जाये तो दूर बैठे किसी भी व्यक्ति के विचारों को जानने-समझने के आलावा उसके स्वरूप का भी वर्णन करना सम्भव है।
पूना के 'बल्लभ शास्त्री निर्विकार' अपने समय के बहुत बड़े वैद्य थे। 1949 में वाराणसी में काशीलाभ के लिए आये थे। उस समय उनकी उम्र 90 वर्ष की थी। अपनी माँ का चित्र बनवाना चाहते थे। मगर वह जिस प्रकार माँ के रूप का वर्णन कर रहे थे, उसके अनुसार कोई चित्र नहीं बन पा रहा था। बड़े ही दु:खी थे महाशय। माँ का कोई चित्र या फोटोग्राफ भी नहीं था। उन्ही दिनों वाराणसी के प्रसिद्ध महात्मा हरिहर बाबा के निकट एक अघोरी सन्यासी पधारे थे। उनके नेत्रों में विचित्र प्रकार की प्रखर ज्योति थी जो अँधेरे में भी चमकती थी। वे यदि जलते हुए दीपक की ओर ताक लेते थे तो वह तुरंत बुझ जाता था। उन्हें जब निर्विकार महोदय की समस्या पता चली तो वे उनको बुलवा कर बोले--आप अपनी माँ के स्वरूप का मन में ध्यान करिये।
निर्विकार महोदय ने वैसा ही किया। जब वे ध्यान करने लगे तो सन्यासी महोदय उनके हृदय पर नेत्र स्थिर कर सामने रखे कागज पर पेन्सिल से चित्र को हू-ब-हू उतारने लगे। कुछ ही मिनटों में उनकी माँ का रेखाचित्र तैयार हो गया। निर्विकार महोदय बहुत प्रसन्न हुये अपनी माँ के रेखाचित्र बन पाने से निर्विकार महोदय अति प्रसन्न हो गए। वे उस सन्यासी की कुछ सेवा करना चाहते थे पर उस साधक ने किसी सेवा को स्वीकार नहीं किया।
अघोरी सन्यासियों द्वारा अपने मल-मूत्र को इच्छानुसार खाद्य या पेय पदार्थ के रूप में परिवर्तन कर देना कम आश्चर्य की बात नहीं है। एक अंग्रेज अघोरी सन्यासी था। वह द्वितीय विश्वयुद्ध के समय फ़ौज में उच्च पदाधिकारी था। एक बार घमासान युद्ध हो रहा था। उनके तरफ के बहुत सारे जवान मारे गए थे। स्वयं वह भी घायल होकर युद्धभूमि में बेहोश पड़ा था--दो दिन, दो रातों तक। बेहोशी टूटने पर उसने देखा--चारों ओर गहरी निस्तब्धता छाई हुई थी। चारों ओर बिखरी लाशें ही लाशें, उनके बीच में पड़ा वह अकेला। किसी तरह वह उठकर बैठा तो देखता क्या है कि एक लम्बी औरत जिसके शरीर का रंग बिलकुल काला था, बाल बिखरे हुए थे और बिलकुल नग्न थी, अपने हाथ में एक बड़ा-सा खड्ग लिए हुए थी। बड़े ही इत्मीनान से लाशों के बीच में घूम घूम कर उनके चेहरों की ओर देख रही थी। कभी किसी लाश को उठाकर खड्ग से उसकी गर्दन काट देती और मुण्ड को अपनी झोली में रख लेती। बड़ा ही भयंकर और आश्चर्यजनक दृश्य था। पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ। सोचा--सब भ्रम है। वह ऑंखें मल-मल कर उसे बार-बार देखता। सहसा वह लाशों को कुचलती हुई पास आ गयी और उसे गौर से देखने लगी। भय से रोमांचित हो उठा वह। उस औरत की लाल अंगारों सी दहकती ऑंखें उस अन्धकार में भी चमक रहीं थीं। सहसा एक अट्टहास गूंज उठा वहां और वह औरत बाल पकड़कर उसे दूर तक खींचती हुई ले गयी और फिर उसी स्थिति में वह बेहोश हो गया।
इस बार जब उस अंग्रेज फौजी अफसर की बेहोशी टूटी तो उसने अपने आपको हज़ारों मील दूर हिमालय की एक गुफा में पाया। वह गुफा एक अघोरी साधू की थी। कुछ दिन वह उसी गुफा में रहा, फिर वाराणसी चला आया। उसके जीवन में अचानक परिवर्तन हो गया। वह स्वयं उस परिवर्तन को नहीं समझ पाता था। वह इस प्रश्न के उत्तर को भी न पा सका कि हज़ारों मील दूर हिमालय की उस गुफा में वह कैसे पहुँच गया था। एक विचित्र और अविश्वसनीय घटना थी जिसने उसे फौजी अफसर से एक अघोरी सन्यासी बना दिया। इतना ही नहीं, उसमें अलौकिक शक्ति भी भर दी थी। वह अपने मल-मूत्र को इच्छित खाद्य पदार्थों में परिवर्तन कर दिया करता था। फलों को हवा में हाथ हिलाकर प्राप्त कर लेना तो उसके लिए वहुत ही सरल था।
एकबार मूसलाधार वर्षा हो रही थी। श्मशान में लगी एक चिता वर्षा के कारण जल नहीं पा रही थी। पहले आजकल की तरह छाया वाले शवदाह-ग्रह नहीं होते थे। वह सन्यासी अपने स्थान से उठा और जाकर चिता पर पेशाब करने लगा। लोगों ने तत्काल तीव्र विरोध किया, तबतक वह पेशाब कर चुका था। लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि जो चिता जल नहीं पा रही थी, अब धू-धू कर जलना शुरू हो गयी। ऐसा लगा कि घड़ों घी पड़ गया चिता में। वर्षा के बावजूद चिता से लम्बी लम्बी लपटें निकल रहीं थीं।
एक बार उस सन्यासी ने मुझे (पूज्य गुरुदेव को) श्मशान में पडा गुलाब का एक ताज़ा खिला हुआ फूल दिया और बोला--रख लो अपने पास। वर्षों तक वह फूल मेरी अलमारी में पड़ा रहा परन्तु न वह मुरझाया और न ही वह म्लान हुआ। बराबर खिला रहा और महकता रहा।
यह सब चमत्कार आप कैसे करते हैं ?
यह पूछने पर उसने मुझे (गुरुदेव को) बतलाया कि इस सम्बन्ध में वह कुछ जानते-समझते नहीं। वह केवल सोचते भर हैं कि ऐसा होना चाहिए और वह हो जाता है। इसके पीछे क्या रहस्य है ?--उसको पता नहीं।
साधारण मनुष्य में इच्छा तो होती है पर उसमें शक्ति नहीं होती। एक इच्छा को पूर्ण करने के लिए शारीरिक, मानसिक, व्यावहारिक, क्रियात्मक--सभी प्रकार की शक्तियों का प्रयोग करना पड़ता है, तब कहीं जाकर इच्छा पूर्ण होती है। मगर योगियों में ये सारी शक्तियाँ उनकी इच्छा के साथ-साथ उत्पन्न हो जाती हैं जिसके फलस्वरूप तत्काल इच्छानुसार परिणाम सामने आ जाता है।
इच्छा और उसकी शक्ति दो अलग-अलग वस्तुएं हैं। दोनों को जोड़ती हैं अल्फ़ा और बीटा तरंगें। किसी काम की इच्छा होती है। इच्छा के साथ-ही-साथ मन में बीटा तरंगे उत्पन्न होने लगती हैं। यदि उसी समय अल्फ़ा तरंगें प्रवाहित होने लग जाएँ तो बीटा तरंगें उसमें घुल-मिल कर वे शक्तियां उत्पन्न करने लग जाती हैं जिनके द्वारा इच्छा क्रियान्वित और साकार होना शुरू हो जाती। यही रहस्य होता है अघोरियों, साधू-सन्यासियों, तांत्रिकों और योगियों के द्वारा किये गए चमत्कारों के पीछे जो उनके लिए साधारण सी बात है। यही चमत्कार है-यही सिद्धि हैं। साभार पुजारी मनीष भारद्वाज Facebook
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