मोड़ कर रख सकेंगे टीवी






वैज्ञानिकों ने क्वांटम डॉट तकनीक विकसित की है, जिसकी मदद से लचीले टीवी स्क्रीन बनाए जा सकेंगे। अब आप 3-डी टीवी को भूल जाइए। रिसर्चर्स ने प्रकाश छोड़ने वाले ऐसे क्रिस्टल तैयार किए हैं, जिनकी मदद से बेहद पतले टीवी स्क्रीन बनाना संभव होगा। इन क्रिस्टल को क्वांटम डॉट्स(क्यूडी) नाम दिया गया है।

क्या हैं क्वांटम डॉट : क्वांटम डॉट रूपी क्रिस्टल का आकार हमारे एक बाल के एक लाखवें हिस्से के बराबर है। इन्हें बेहद सस्ते सेमी-कंडक्टर मटेरियल से बनाया गया है, जो अल्ट्रावॉयलेट या बिजली के संपर्क में आने पर प्रकाश छोड़ते हैं। इनके आकार में फेरबदल कर प्रकाश के रंग को नियंत्रित किया जा सकता है।

बनेंगे स्क्रीन : वैज्ञानिकों ने बेहद लचीली प्लास्टिक शीट पर इन्हें प्रिंट कर एक बेहद पतला डिस्प्ले बोर्ड बनाने में सफलता प्राप्त की है। यह डिस्प्ले बोर्ड ही एक स्क्रीन की तरह काम करेगा। लचीली प्लास्टिक से बने होने के कारण इसे किसी भी आकार में न सिर्फ ढाला जा सकेगा, बल्कि मोड़ कर कहीं भी रखा जा सकेगा।

कब तक आएगा : वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि क्वांटम डॉट टीवी सेट अगले वर्ष के अंत तक बाजार में होंगे। हालांकि इनके लचीले वर्जन को आने में अभी कुछ साल और लग जाएंगे। वास्तव में क्वांटम डॉट टीवी आज के फ्लैट टीवी सरीखे ही होंगे, लेकिन रंग और छरहरेपन के मामले में इनसे बेहतर होंगे।

आगे क्या : लचीले डिस्प्ले बोर्ड को कमरे के परदों और वॉलपेपर पर भी प्रिंट किया जा सकता है। इसकी मदद से उनका स्क्रीन की तरह इस्तेमाल हो सकेगा। हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक प्लास्टिक शीट के बजाए किसी अन्य मटेरियल पर इनके इस्तेमाल से पहले कई प्रयोग और करने होंगे। sabhar : bhaskar.com

 

नासा ने खोजा पृथ्वी का जुड़वां ग्रह !





पृथ्वी के बाहर जीवन की चाह फिर से परवान चढ़ रही है. दुनिया की सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था नासा ने बिलकुल पृथ्वी जैसा ग्रह खोज निकाला है. वह अपने सूर्य का चक्कर लगाता है. न बहुत ठंडा, न बहुत गर्म और पानी की पूरी संभावना.

कोई तीन साल पहले अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने नए ग्रहों की तलाश में केपलर नाम का टेलीस्कोप पृथ्वी से बाहर अनजान दुनिया की खोज में भेजा था. दो साल की मेहनत के बाद वैज्ञानिकों को वे तस्वीरें मिल गईं, जो अब तक की सबसे उत्साहित करने वाली बताई जा रही हैं. ऐसे ग्रह का पता चल रहा है, जो पृथ्वी से ढाई गुना बड़ा होगा. तापमान 22 डिग्री के आस पास यानी पानी न तो जमेगा और न ही खौलेगा. दिन वसंत ऋतु के किसी दिन की तरह खुशगवार होगा. उसकी स्थिति ऐसी जगह है, जहां पानी होने की पूरी संभावना दिख रही है यानी उस ग्रह में वह सारे गुण हैं, जो पृथ्वी में हैं और जिसके आधार पर जीवन की कल्पना की जा सकती है. केपलर को सम्मान देते हुए ग्रह का नाम रखा गया है, केपलर-22बी.
घर के बाहर घर
नए ग्रहों की तलाश के मामले में बड़ा योगदान देने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के ज्यॉफ मार्सी का कहना है, "यह मानव इतिहास की महान खोज मानी जाएगी. यह खोज बताती है हम होमोसेपियन (मनुष्य का बायोलॉजिकल नाम) पृथ्वी के बाहर घर की तलाश कर रहे हैं और ऐसी जगह पहुंच चुके हैं, जो हमें अपने घर की याद दिला रहा है."
नया ग्रह अपने प्रमुख सितारे की उसी तरह परिक्रमा कर रहा है, जैसा पृथ्वी सूर्य की करता है. उसका तारा सूर्य जितना ही बड़ा लग रहा है. केपलर-22बी को इसकी परिक्रमा करने में पृथ्वी से करीब 10 महीने कम लगभग 290 दिन का वक्त लगा है. बस इस ग्रह का आकार थोड़ा बड़ा है. यह पृथ्वी से करीब 2.4 गुना बड़ा है. फिर भी हमारे सौरमंडल के बाहर मिले दूसरे ग्रहों से इसका आकार छोटा है और यहां पानी होने की पूरी संभावना दिख रही है. ग्रह पानी और पत्थरों से बना हो सकता है और इसकी बनावट पृथ्वी और गैस तथा द्रव से बने नेप्च्यून ग्रहों के बीच की बताई जा रही है.
कैसे कहूं, क्या है
इस खोज से उत्साहित सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी की अंतरिक्ष विज्ञानी और नासा के केपलर अभियान की उप प्रमुख नताली बतालहा का कहना है, "हम पृथ्वी और नेप्च्यून ग्रहों के बीच के किसी ग्रह के बारे में ज्यादा नहीं बात कर सकते हैं क्योंकि हमारे सौरमंडल में ऐसा कोई ग्रह नहीं है. हम नहीं कह सकते हैं कि किस हिस्से में पानी होगा, कहां पत्थर होगा और किन इलाकों में बर्फ जमा होगी. हम जब तक इस बारे में जानकारी इकट्ठी नहीं कर लेते, तब तक कुछ नहीं बता पाएंगे."
लेकिन जानकारी इकट्ठी करना इतना आसान नहीं होगा. यह ग्रह हमारे सौरमंडल से कोई 600 प्रकाश वर्ष दूर है. एक प्रकाश वर्ष की दूरी तय करने में अनुमानित 10,000 अरब साल का वक्त लग जाता है. यानी मौजूदा वक्त की सबसे तेज उड़ान भरने वाला अंतरिक्ष यान केपलर-बी22 तक पहुंचने में कोई सवा दो करोड़ साल लगाएगा. मौजूदा वक्त में भले ही यह नामुमकिन लग रहा हो लेकिन विज्ञान अद्भुत आविष्कारों का गवाह रहा है और कब कौन सा आविष्कार कौन से दरवाजे खोल दे, कोई नहीं कह सकता.
मुश्किल से मिलता ग्रह
केपलर को बेहद जटिल प्रक्रिया के बाद गोल्डीलॉक्स जोन में इस ग्रह के बारे में पता चला. यह टेलीस्कोप सिर्फ उन्हीं ग्रहों की निशानदेही करता है, जो अपने तारों का चक्कर लगा रहे हों. किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने से पहले उस ग्रह के तीन चक्कर पूरे होने जरूरी हैं यानी तीन मौका ऐसा आना चाहिए, जब वह अपने मुख्य ग्रह के सामने से गुजरे. इस खोज को अलग अलग तीन जगहों की सहमति मिलनी चाहिए. केपलर की रिसर्च में 2326 ग्रहों की स्टडी की गई, जिसमें 10 ग्रह ऐसे निकले, जो पृथ्वी के आकार के हैं और अपने तारों का चक्कर लगाते दिखे.
केपलर की एक उड़ान ने वैज्ञानिकों को पृथ्वी के जुड़वां ग्रह तक तो पहुंचा दिया. अब कल्पना की दूसरी उड़ान उन्हें उस धरातल पर उतार भी सकती है.
रिपोर्टः रॉयटर्स, एपी/ए जमाल
संपादनः महेश झा
sabhar :http://www.dw-world.de

पृथ्वी के बाहर जीवन की चाह फिर से परवान चढ़ रही है. दुनिया की सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था नासा ने बिलकुल पृथ्वी जैसा ग्रह खोज निकाला है. वह अपने सूर्य का चक्कर लगाता है. न बहुत ठंडा, न बहुत गर्म और पानी की पूरी संभावना.

 
कोई तीन साल पहले अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने नए ग्रहों की तलाश में केपलर नाम का टेलीस्कोप पृथ्वी से बाहर अनजान दुनिया की खोज में भेजा था. दो साल की मेहनत के बाद वैज्ञानिकों को वे तस्वीरें मिल गईं, जो अब तक की सबसे उत्साहित करने वाली बताई जा रही हैं. ऐसे ग्रह का पता चल रहा है, जो पृथ्वी से ढाई गुना बड़ा होगा. तापमान 22 डिग्री के आस पास यानी पानी न तो जमेगा और न ही खौलेगा. दिन वसंत ऋतु के किसी दिन की तरह खुशगवार होगा. उसकी स्थिति ऐसी जगह है, जहां पानी होने की पूरी संभावना दिख रही है यानी उस ग्रह में वह सारे गुण हैं, जो पृथ्वी में हैं और जिसके आधार पर जीवन की कल्पना की जा सकती है. केपलर को सम्मान देते हुए ग्रह का नाम रखा गया है, केपलर-22बी.
घर के बाहर घर
नए ग्रहों की तलाश के मामले में बड़ा योगदान देने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के ज्यॉफ मार्सी का कहना है, "यह मानव इतिहास की महान खोज मानी जाएगी. यह खोज बताती है हम होमोसेपियन (मनुष्य का बायोलॉजिकल नाम) पृथ्वी के बाहर घर की तलाश कर रहे हैं और ऐसी जगह पहुंच चुके हैं, जो हमें अपने घर की याद दिला रहा है."
नया ग्रह अपने प्रमुख सितारे की उसी तरह परिक्रमा कर रहा है, जैसा पृथ्वी सूर्य की करता है. उसका तारा सूर्य जितना ही बड़ा लग रहा है. केपलर-22बी को इसकी परिक्रमा करने में पृथ्वी से करीब 10 महीने कम लगभग 290 दिन का वक्त लगा है. बस इस ग्रह का आकार थोड़ा बड़ा है. यह पृथ्वी से करीब 2.4 गुना बड़ा है. फिर भी हमारे सौरमंडल के बाहर मिले दूसरे ग्रहों से इसका आकार छोटा है और यहां पानी होने की पूरी संभावना दिख रही है. ग्रह पानी और पत्थरों से बना हो सकता है और इसकी बनावट पृथ्वी और गैस तथा द्रव से बने नेप्च्यून ग्रहों के बीच की बताई जा रही है.
कैसे कहूं, क्या है
इस खोज से उत्साहित सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी की अंतरिक्ष विज्ञानी और नासा के केपलर अभियान की उप प्रमुख नताली बतालहा का कहना है, "हम पृथ्वी और नेप्च्यून ग्रहों के बीच के किसी ग्रह के बारे में ज्यादा नहीं बात कर सकते हैं क्योंकि हमारे सौरमंडल में ऐसा कोई ग्रह नहीं है. हम नहीं कह सकते हैं कि किस हिस्से में पानी होगा, कहां पत्थर होगा और किन इलाकों में बर्फ जमा होगी. हम जब तक इस बारे में जानकारी इकट्ठी नहीं कर लेते, तब तक कुछ नहीं बता पाएंगे."
लेकिन जानकारी इकट्ठी करना इतना आसान नहीं होगा. यह ग्रह हमारे सौरमंडल से कोई 600 प्रकाश वर्ष दूर है. एक प्रकाश वर्ष की दूरी तय करने में अनुमानित 10,000 अरब साल का वक्त लग जाता है. यानी मौजूदा वक्त की सबसे तेज उड़ान भरने वाला अंतरिक्ष यान केपलर-बी22 तक पहुंचने में कोई सवा दो करोड़ साल लगाएगा. मौजूदा वक्त में भले ही यह नामुमकिन लग रहा हो लेकिन विज्ञान अद्भुत आविष्कारों का गवाह रहा है और कब कौन सा आविष्कार कौन से दरवाजे खोल दे, कोई नहीं कह सकता.
मुश्किल से मिलता ग्रह
केपलर को बेहद जटिल प्रक्रिया के बाद गोल्डीलॉक्स जोन में इस ग्रह के बारे में पता चला. यह टेलीस्कोप सिर्फ उन्हीं ग्रहों की निशानदेही करता है, जो अपने तारों का चक्कर लगा रहे हों. किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने से पहले उस ग्रह के तीन चक्कर पूरे होने जरूरी हैं यानी तीन मौका ऐसा आना चाहिए, जब वह अपने मुख्य ग्रह के सामने से गुजरे. इस खोज को अलग अलग तीन जगहों की सहमति मिलनी चाहिए. केपलर की रिसर्च में 2326 ग्रहों की स्टडी की गई, जिसमें 10 ग्रह ऐसे निकले, जो पृथ्वी के आकार के हैं और अपने तारों का चक्कर लगाते दिखे.
केपलर की एक उड़ान ने वैज्ञानिकों को पृथ्वी के जुड़वां ग्रह तक तो पहुंचा दिया. अब कल्पना की दूसरी उड़ान उन्हें उस धरातल पर उतार भी सकती है.
रिपोर्टः रॉयटर्स, एपी/ए जमाल
संपादनः महेश झा
 
 

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