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मंगलवार, 9 मई 2017

मंत्र विज्ञान का रहस्य

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मन्त्र विज्ञान

मन को मनन करने की शक्ति या एकाग्रता प्राप्त करके जप के द्वारा सभी भयों का नाश करके पूरी तरह रक्षा करने वाले शब्दों को मंत्र कहते है।  अर्थार्थ मनन करने पर जो रक्षा करे उसे मंत्र कहते है।  जो शब्दों का समूह या कोई शब्द विशेष जपने पर मन को एकाग्र करे और प्राण रक्षा के साथ साथ अभीष्ट फल प्रदान करें वे मंत्र होते है।मंत्र शब्द संस्कृत भाषा से है।  संस्कृत के आधार पर मंत्र शब्द का अर्थ सोचनाधारणा करना समझना व् चाहना  होता है।  मन्त्र जप हमारे यहां सर्वसामान्य है।  मन में कहने की प्रणाली दीर्घकाल से चली आ रही है।  केवल हिन्दुओ में ही नहीं वरन बौध्दजैन सिक्ख आदि सभी धर्मों में मंत्र जप किया जाता है।  मुस्लिम भाई भी तस्बियां घुमाते है।सही अर्थ में मंत्र जप का उद्देश्य अपने इष्ट को स्मरण करना है।  श्रीरामचरित्र मानस में नवधा भक्ति का जिकर भी आता है।  इसमें रामजी शबरी को कहते है की 'मंत्र जप मम दृढ विस्वास पंचम भक्ति सो वेद प्रकासा '  अर्थार्थ  मंत्र जप और मुझमे पक्का विश्वास रखो।भगवन श्रीकृष्ण जी ने  गीता के १० वें अध्याय के २५ वें श्लोक में 'जपयज्ञ'को अपनी विभूति बताया है।  जपयज्ञ सब के लिए आसान है।  इसमें कोई ज्यादा खर्च नही कोई कठोर नियम नही। यह जब चाहो तब किया जा सकता है। हमारे शरीर में ७ केंद्र होते है।  उनमे से नीचे के में घृणा ईर्ष्याभयस्पर्धा ,काम आदि होते है।  लेकिन मंत्र जप के प्रभाव से जपने वाले का भय निर्भयता में घृणा प्रेम में  और काम राम में बदल  जाता है। प्रथम केंद्र मूलाधार होता है।
Kendron Par Mantra ka PrabhavMantra Vigyan




दूसरा स्वाधिष्ठान केंद्र होता है इसमें चिंता निश्चिंता में बदलती है।  तीसरा केंद्र मणिपुर  है।  जिससे रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है।  क्षमा शक्ति विकसित होती है।  




सात बार ओम या हरिओम मंत्र का गुंजन करने से मूलाधार केंद्र में स्पंदन होता है जिससे रोगो के कीटाणु नष्ट होते है।  क्रोध के हमारी जीवनी शक्ति का नाश होता है।  वैज्ञानिकों का कहना है की यदि एक घंटे तक क्रोध करनेवाले व्यक्ति के श्वासों के कण इकट्ठे करके अगर इंजेक्शन बनाया जाये तो उस इंजेक्शन से २० लोगो को मारा जा सकता है। 




यदि एक घंटे के क्रोध से २० लोगो की मृत्यु हो सकती है  तो एक घंटे के हरिनाम कीर्तन से असंख्यों लोगों को आनंद व् मन की शांति मिलती है।  मंत्र शक्ति में  आश्चर्य नही तो क्या है।

मंत्रशक्ति के द्वारा ये सब संभव है। 
स्रोत : http://bhindobhains.blogspot.in
Mantra2
   मंत्र का अर्थ है, एक शुद्ध ध्वनि। आज आधुनिक विज्ञान ने साबित कर दिया है कि समूचा अस्तित्व ऊर्जा का स्पंदन  है, स्‍पंदन का स्‍तर अलग अलग होता है। जहां भी कोई स्पंदन होता है, वहां ध्वनि होनी ही है।

हर रूप के साथ जुड़ी है ध्वनि

रूप या आकार अलग-अलग तरह के होते हैं और हर रूप के साथ एक ध्वनि जुड़ी होती है और हर ध्वनि के साथ एक रूप जुड़ा होता है। जब आप कोई ध्वनि मुंह से निकालते हैं, तो उसके साथ एक रूप बनता  है। ध्वनियों को एक खास तरह से इस्तेमाल करने का एक पूरा विज्ञान है, जिससे सही तरीके के रूप बनाया जा सके।
मंत्र कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका आप उच्चारण करते हैं, यह वह चीज है जो आप बनना चाहते हैं क्योंकि पूरा अस्तित्व ध्वनियों का एक जटिल संगम है। उसमें से हमने कुछ ध्वनियों को पहचाना जो ब्रह्मांड के हर आयाम को खोलने वाली कुंजियों की तरह हैं।
हम एक खास क्रम में ध्वनि निकालकर शक्तिशाली रूप बना सकते हैं। इसे ‘नाद योग’ कहा जाता है। अगर ध्वनि पर आपका अधिकार है, तो उससे जुड़े रूप पर भी आपका अधिकार होगा।
साउंड्स ऑफ ईशा’ ने मंत्रों पर एक प्रस्तुति तैयार की है जिसका नाम है- ‘वैराग्य’ उन्होंने दस-दस मिनट के पांच मंत्रों को एक साथ पेश किया है। आप कुछ समय तक इन मंत्रों को सुनकर देख सकते हैं कि किस मंत्र को आप अपने सबसे करीब महसूस करते हैं। फिर आप उसका विस्तृत संस्करण प्राप्त कर सकते हैं और उसके साथ समय बिता सकते हैं। फिलहाल आप सिर्फ इन मंत्रों को सुनिए। संगीत की क्‍वालिटी या धुन आदि के आधार पर उन्हें पसंद या नापसंद करने की कोशिश न करें। ये ध्वनियां आपके इतने करीब हो जाएं जितनी आपकी सांस। कुछ समय बाद, बिना उन मंत्रों को सुने भी, उस मंत्र की तरंगे आपके भीतर गुंजित होने लगेंगी। यह आपके लिए अद्भुत रूप से असरकारी हो सकता है।
मंत्र कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका आप उच्चारण करते हैं, यह वह चीज है जो आप बनना चाहते हैं क्योंकि पूरा अस्तित्व ध्वनियों का एक जटिल संगम है। उसमें से हमने कुछ ध्वनियों को पहचाना जो ब्रह्मांड के हर आयाम को खोलने वाली कुंजियों की तरह हैं। जब तक आप खुद चाभी नहीं बन जाते, वह आपके लिए नहीं खुलेगा। मंत्र बनने का मतलब है कि आप चाभी बन रहे हैं, चाभी बन कर ही आप ताले को खोल सकते हैं, वरना कोई और उसे आपके लिए खोलेगा और आपको उसकी सुननी पड़ेगी। देखिए आपको मुझे झेलना पड़ रहा है क्योंकि आपने अभी उसे खोला नहीं है।
बुधवार को हम आपके लिए पेश करेंगे संगीत की बहार, यह एक मौका होगा खुद को खोने का और अपने अंतर से जुड़़ने का
नए आयामों की चाबी हैं मंत्र
Monks chanting duing our Puja ceremony. Photo by Didrik Johnck.
मंत्रों का प्रयोग तो हम सदियों से करते आए हैं, लेकिन बिना जाने बूझे इन मंत्रों का उच्चारण फायदे की जगह नुकसान पहुंचा सकता है। क्या हैं मंत्र, उनके पीछे कौन सा विज्ञान छिपा है, बता रहे हैं सद्‌गुरु…मंत्र का आशय ध्वनि से होता है। आजकल आधुनिक विज्ञान इस पूरी सृष्टि को एक कंपन मानता है। अब जहां कही भी कंपन होगा, वहां ध्वनि तो होगी ही। इसका मतलब है कि यह संपूर्ण सृष्टि एक प्रकार की ध्वनि या कई ध्वनियों का एक जटिल मिश्रण है। यह भी कह सकते हैं कि संपूर्ण सृष्टि विभिन्न प्रकार के मंत्रों का मेल है। इन में से कुछ मंत्रों या ध्वनियों की पहचान हो चुकी है, जो अपने आप में चाभी की तरह हैं। अगर हम उनका एक खास तरह से इस्तेमाल करें तो वे जीवन के अलग आयाम को खोलने में सक्षम हैं, जिनका अनुभव हम अपने भीतर कर सकते हैं।
मंत्र कई तरह के होते है। हर मंत्र शरीर के किसी निश्चित हिस्से में एक खास तरह की उर्जा जागृत करता है। बिना जागरुकता के किसी आवाज को केवल बार-बार दुहराने से दिमाग में सुस्ती छा जाती है। किसी भी ध्वनि के लगातार उच्चारण से मन सुस्त हो जाता है। जब आप पूरी जागरुकता के साथ उसकी सही समझ के साथ मंत्रोच्चारण करते हैं तो वह एक शक्तिशाली साधन बन सकता है। एक विज्ञान के रूप में, यह एक शक्तिशाली आयाम है। लेकिन आज जिस तरह से बिना किसी आधार या बिना आवश्यक तैयारी के लोगों को मंत्र दिए जा रहे हैं इससे बहुत नुकसान हो सकता है।
कुछ मंत्रों या ध्वनियों की पहचान हो चुकी है, जो अपने आप में चाभी की तरह हैं। अगर हम उनका एक खास तरह से इस्तेमाल करें तो वे जीवन के अलग आयाम को खोलने में सक्षम हैं, जिनका अनुभव हम अपने भीतर कर सकते हैं।
हर मंत्र शरीर के अलग-अलग हिस्से में एक खास तरह की उर्जा पैदा करता है। मंत्रों का आधार हमेशा से संस्कृत भाषा रही है। संस्कृत भाषा ध्वनि की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। लेकिन जब अलग-अलग लोग इसे बोलते हैं तो हर व्यक्ति अपने एक अलग अंदाज में बोलता है। अगर एक बंगाली कोई मंत्र बोल रहा है तो वह अपने अंदाज में बोलेगा। इसी तरह एक तमिल भाषी उसी चीज को दूसरे ढंग से कहेगा। अगर कोई अमेरिकी इनका उच्चारण करेगा तो वह बिल्कुल ही अलग होगा। इन मंत्रों के सटीक उच्चारण की अगर सही ट्रेनिंग न दी जाए तो अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग, जब अपने अंदाज में मंत्रों को बोलेंगे तो उच्चारण के बिगडऩे का खतरा रहता है। हालांकि इस तरह की ट्रेनिंग बेहद थका देने वाली होती है। इसे सीखने के लिए जिस धैर्य, लगन और जितने समय की जरूरत होती है, वह आजकल लोगों के पास है ही नही। इसके लिए जबरदस्त लगन और काफी वक्त की जरूरत होती है।
दरअसल, अध्यात्म की दिशा में मंत्र एक बहुत अच्छी शुरुआत हो सकते है। सिर्फ एक मंत्र ही लोगों के जीवन में बहुत कुछ कर सकता है। मंत्र किसी चीज की रचना के लिए एक प्रभावशाली शक्ति बन सकते हैं, लेकिन ऐसा तभी हो सकता है कि जब वे ऐसे स्रोत से आएं, जहाँ यह समझ हो कि ध्वनि ही सबकुछ है। जब हम कहते हैं कि ‘ध्वनि ही सबकुछ है’ तो हमारा मतलब इस सृष्टि से होता है। अगर मंत्र वैसे स्रोत और समझ के उस स्तर से आएं तथा उनका संचारण अगर पूरी तरह शुद्ध हो तो मंत्र एक प्रभावशाली शञ्चित बन सकते हैं।
साभार :http://isha.sadhguru.org


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गुरुवार, 4 मई 2017

टेलीपैथी और सम्मोहन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

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टेलीपैथी के लिए चित्र परिणाम    

टैलीपैथी  क्या  है हमारे  पुराणों  में वर्णित  है की देवता लोग  आपस  में बातचीत  बिना कुछ  कहे  कर लेते थे |  और  वो  सोचते थे  तो  दूसरे  लोगो  के पास  सन्देश  पहुंच  जाता था ,धर्म और विज्ञान ने दुनिया के कई तरह के रहस्यों से पर्दा उठाया है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी के इस युग में अब सब कुछ संभव होने लगा है। मानव का ज्ञान पहले की अपेक्षा बढ़ा है। लेकिन इस ज्ञान के बावजूद व्यक्ति की सोच अभी भी मध्ययुगीन ही है। वह इतना ज्ञान होने के बावजूद भी मूर्ख, क्रूर, हिंसक और मूढ़ बना हुआ है।
खैर, आज हम विज्ञान की मदद से हजारों किलोमीटर दूर बैठे किसी व्यक्ति से मोबाइल, इंटरनेट या वीडियो कालिंग के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं, लेकिन प्राचीन काल में ऐसा संभव नहीं था तो वे कैसे एक दूसरे से संपर्क पर पाते थे? मान लीजिये आप समुद्र, जंगल या रेगिस्तान में भटक गए हैं और आपके पास सेटेलाइट फोन है भी तो उसकी बैटरी डिस्चार्च हो गई है ऐसे में आप कैसे लोगों से संपर्क कर सकते हैं?
दरअसल, बगैर किसी उपकरण की मदद से लोगों से संपर्क करने की कला को ही टेलीपैथी कहते हैं। जरूरी नहीं कि हम किसी से संपर्क करें। हम दूरस्थ बैठे किसी भी व्यक्ति की वार्ता को सुन सकते हैं, देख सकते हैं और उसकी स्थिति को जान सकते हैं। इसीलिये टेलीपैथी को हिन्दी में दूरानुभूति कहते हैं। टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था। कहते हैं कि जिस व्यक्ति में यह छठी ज्ञानेंद्रिय होती है वह जान लेता है कि दूसरों के मन में क्या चल रहा है। यह परामनोविज्ञान का विषय है जिसमें टेलीपैथी के कई प्रकार बताए जाते हैं।
'टेली' शब्द से ही टेलीफोन, टेलीविजन आदि शब्द बने हैं। ये सभी दूर के संदेश और चित्र को पकड़ने वाले यंत्र हैं। आदमी के मस्तिष्क में भी इस तरह की क्षमता होती है। कोई व्यक्ति जब किसी के मन की बात जान ले या दूर घट रही घटना को पकड़कर उसका वर्णन कर दे तो उसे पारेंद्रिय ज्ञान से संपन्न व्यक्ति कहा जाता है। महाभारतकाल में संजय के पास यह क्षमता थी। उन्होंने दूर चल रहे युद्ध का वर्णन धृतराष्ट्र को कह सुनाया था।
भविष्य का आभास कर लेना भी टेलीपैथिक विद्या के अंतर्गत ही आता है। किसी को देखकर उसके मन की बात भांप लेने की शक्ति हासिल करना तो बहुत ही आसान है। चित्त को स्थित कर ध्यान से देखने और सुनने की क्षमता बढ़ाएंगे तो सामने वाले के मन की आवाज भी सुनाई देगी। इसके लिए नियमित अभ्यास की आवश्यकता है।
दरअसल टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के आदान-प्रदान को भी कहते हैं। इस विद्या में हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता, यानी इसमें देखने, सुनने, सूंघने, छूने और चखने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जाता। यह हमारे मन और मस्तिष्क की शक्ति होती है। 

टेलीपैथी सिखने के सामान्यत: तीन तरीके हैं:
पहला : ध्यान द्वारा
दूसरा : योग द्वारा
तीसरा : आधुनिक तकनीक
ध्यान द्वारा : लगातार ध्यान करते रहने से चित्त स्थिर होने लगता है। चित्त के स्थिर और शांति होने से साक्षीभाव घटित होता है। यह संवेदनशिल अवस्था टेलीपैथी के लिये जरूरी होती है। ध्यानसंपन्न व्यक्ति किसी के भी मन की बात समझ सकता है। कितने ही दूर बैठे व्यक्ति की स्थिति और वार्तालाप का वर्णन कर सकता है।
योग द्वारा : योग में मन: शक्ति योग के द्वारा इस शक्ति हो हासिल किया जा सकता है। ज्ञान की स्थिति में संयम होने पर दूसरे के चित्त का ज्ञान होता है। यदि चित्त शांत है तो दूसरे के मन का हाल जानने की शक्ति हासिल हो जाएगी। योग में त्राटक विद्या, प्राण विद्या के माध्यम से भी आप यह विद्या सिख सकते हैं।
अगले पन्ने पर आधुनिक तरीका...
टेलीपैथी का आधुनिक तरीका : तरीके भले ही आधुनिक हो लेकिन इसके सर्वप्रथम आपको ध्यान का अभ्यास तो करना ही होगा तभी यह तरीका कारगर सिद्ध होगा। टेलीपैथी उस प्रक्रिया को कहा जाता है जिसके जरिए बिना किसी भौतिक माध्यम की सहायता के एक इंसान दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क को पढ़ने अथवा उसे अपने विचारों से अवगत कराने में कामयाब होता है।
आधुनिक तरीके के अनुसार ध्यान से देखने और सुनने की क्षमता बढ़ाएंगे तो सामने वाले के मन की आवाज भी सुनाई देगी। इसके लिए नियमित अभ्यास की आवश्यकता है। इस विद्या में सम्मोहन का भी सहरा लिया जाता है। सम्मोहन के माध्यम से हम अपने चेतन मन को सुलाकर अवचेतन मन को जाग्रत करते हैं और फिर इस अवचेतन मन के माध्यम से हम दूसरे व्यक्ति के मन बात, विचार आदि पढ़ लेते हैं और यदि वह हजारों किलोमीटर भी बैठा है तो इस मन के माध्यम से व्यक्ति को वह उसके सामने ही नजर आता है।
अगले पन्ने पर क्या होता है अवचेतन मन...
चेतन मन और अचेतन मन : हमारे मन की मुख्यतः दो अवस्थाएं (कई स्तर) होती हैं-
चेतन मन और 2. अवचेतन मन (आदिम आत्मचेतन मन): सम्मोहन के दौरान अवचेतन मन को जाग्रत किया जाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति की शक्ति बढ़ जाती है लेकिन उसका उसे आभास नहीं होता, क्योंकि उस वक्त वह सम्मोहनकर्ता के निर्देशों का ही पालन कर रहा होता है।
1. चेतन मन : इसे जाग्रत मन भी मान सकते हैं। चेतन मन में रहकर ही हम दैनिक कार्यों को निपटाते हैं अर्थात खुली आंखों से हम कार्य करते हैं। विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क का वह भाग जिसमें होने वाली क्रियाओं की जानकारी हमें होती है। यह वस्तुनिष्ठ एवं तर्क पर आधारित होता है।
2. अवचेतन मन : जो मन सपने देख रहा है वह अवचेतन मन है। इसे अर्धचेतन मन भी कहते हैं। गहरी सुसुप्ति अवस्था में भी यह मन जाग्रत रहता है। विज्ञान के अनुसार जाग्रत मस्तिष्क के परे मस्तिष्क का हिस्सा अवचेतन मन होता है। हमें इसकी जानकारी नहीं होती।
अगले पन्ने पर जानिये अवचेतन मन की शक्ति क्या है...
अवचेतन मन की शक्ति : हमारा अवचेतन मन चेतन मन की अपेक्षा अधिक याद रखता है एवं सुझावों को ग्रहण करता है। आदिम आत्मचेतन मन न तो विचार करता है और न ही निर्णय लेता है। उक्त मन का संबंध हमारे सूक्ष्म शरीर से होता है।
यह मन हमें आने वाले खतरे या उक्त खतरों से बचने के तरीके बताता है। इसे आप छठी इंद्री भी कह सकते हैं। यह मन लगातार हमारी रक्षा करता रहता है। हमें होने वाली बीमारी की यह मन 6 माह पूर्व ही सूचना दे देता है और यदि हम बीमार हैं तो यह हमें स्वस्थ रखने का प्रयास भी करता है। बौद्धिकता और अहंकार के चलते हम उक्त मन की सुनी-अनसुनी कर देते हैं। उक्त मन को साधना ही सम्मोहन है।
अवचेतन को साधने का असर : सम्मोहन द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण (टेलीपैथिक), दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, अदृश्य वस्तु या आत्मा को देखना और दूरस्थ दृश्यों को जाना जा सकता है। इसके सधने से व्यक्ति को बीमारी या रोग के होने का पूर्वाभास हो जाता है।
कैसे साधें इस अवचेतन मन को, जानिये तरीका...
कैसे साधें इस मन को :
पहला तरीका : वैसे इस मन को साधने के बहुत से तरीके या विधियां हैं, लेकिन सीधा रास्ता है कि प्राणायाम से सीधे प्रत्याहार और प्रत्याहार से धारणा को साधें। जब आपका मन स्थिर चित्त हो, एक ही दिशा में गमन करे और इसका अभ्यास गहराने लगे तब आप अपनी इंद्रियों में ऐसी शक्ति का अनुभव करने लगेंगे जिसको आम इंसान अनुभव नहीं कर सकता। इसको साधने के लिए त्राटक भी कर सकते हैं। त्राटक भी कई प्रकार से किया जाता है। ध्यान, प्राणायाम और नेत्र त्राटक द्वारा आत्म सम्मोहन की शक्ति को जगाया जा सकता है।
दूसरा तरीका : शवासन में लेट जाएं और आंखें बंद कर ध्यान करें। लगातार इसका अभ्यास करें और योग निद्रा में जाने का प्रयास करें। योग निद्रा अर्थात शरीर और चेतन मन इस अवस्था में सो जाता है लेकिन अवचेतन मन जाग्रत रहता है। समझाने के लिए कहना होगा कि शरीर और मन सो जाता है लेकिन आप जागे रहते हैं। यह जाग्रत अवस्था जब गहराने लगती है तो आप ईथर माध्‍यम से जुड़ जाते हैं और फिर खुद को निर्देश देकर कुछ भी करने की क्षमता रखते हैं।
तीसरा तरीका : कुछ लोग अंगूठे को आंखों की सीध में रखकर, तो कुछ लोग स्पाइरल (सम्मोहन चक्र), कुछ लोग घड़ी के पेंडुलम को हिलाते हुए, कुछ लोग लाल बल्ब को एकटक देखते हुए और कुछ लोग मोमबत्ती को एकटक देखते हुए भी उक्त साधना को करते हैं, लेकिन यह कितना सही है यह हम नहीं जानते।
अगले पन्ने पर चौथा तरीका जानिये..
चौथा तरीका कल्पना : कल्पना करें कि आप कोई बात किसी व्यक्ति को कहने के लिए सोचें और उस तक वह बात पहुंच जाए। बार बार कल्पना करें और अपनी बात को दोहराएं। दोहराने का यह अभ्यास जब गहराएगा तो उस व्यक्ति तक आपके मस्तिष्क की तरंगे पहुंचने लगेगी। यदि आप उसे यहां बुलाना चाहते हैं तो कल्पना में उसका चित्र देखकर उसके बुलाने का संदेश भेजें। धीरे धीरे जब यह प्रयोग कामयाब होने लगेगा तो आपका विश्वास भी बढ़ता जाएगा।
इसी तरह आप किसी भी व्यक्ति के होने की स्थिति की पहले कल्पना करते हैं जब वह कल्पना प्रगाड़ होने लगती है तब सही सूचना देने लगती है। कुछ भी बोलने से पहले दिमाग में कुछ तरंगें बनती हैं। जापानी वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने इसे डीकोड करना जान लिया है और उनके परिणाम 90 प्रतिशत तक सफल हैं। वैसे, उनका यह प्रयोग सिर्फ जापानी भाषा तक ही सीमित है। लेकिन आश्चर्य नहीं कि इस टेक्नोलॉजी का उपयोग दूसरी भाषाओं में भी संभव होगा।
ब्रेन कंप्यूटर विशेषज्ञ प्रो. यामाजाकी तोषिमासा के नेतृत्व में एक टीम ने इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना और संचार इंजीनियर इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित वर्कशॉप में इसका लाइव प्रदर्शन भी किया। उन्होंने साबित किया कि बोले जाने से दो सेकेंड पहले उनकी मशीन उस बात को समझ लेती है जो बोली जाने वाली है। यह टीम दिमाग के एक खास हिस्से की गतिविधियों पर काम कर रही है जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ब्रोका कहते हैं। यह हिस्सा भाषा प्रक्रिया और बोलने से संबंधित है।
विचारों से बनता भविष्य : भगवान बुद्ध कहते हैं कि आज आप जो भी हैं, वह आपके पिछले विचारों का परिणाम है। विचार ही वस्तु बन जाते हैं। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही भविष्य का निर्माण करते हैं। यही बात 'दि सीक्रेट' में भी कही गई है और यही बात धम्मपद, गीता, जिनसूत्र और योगसूत्र में कही गई है। इसे आज का विज्ञान आकर्षण का नियम कहता है।
संसार को हम पांचों इंद्रियों से ही जानते हैं और कोई दूसरा रास्ता नहीं। जो भी ग्रहण किया गया है, उसका मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उस प्रभाव से ही 'चित्त' निर्मित होता है और निरंतर परिवर्तित होने वाला होता है। इस चित्त को समझने से ही आपके जीवन का खेल आपको समझ में आने लगेगा। अधिकतर लोग अब इसे समझकर अच्‍छे स्थान, माहौल और लोगों के बीच रहने लगे हैं। वे अपनी सोच को बदलने के लिए ध्यान या पॉजिटिव मोटिवेशन की क्लासेस भी जाने लगे हैं।
वैज्ञानिक कहते हैं कि मानव मस्तिष्क में 24 घंटे में लगभग 60 हजार विचार आते हैं। उनमें से ज्यादातर नकारात्मक होते हैं। नकारात्मक विचारों का पलड़ा भारी है तो फिर भविष्य भी वैसा ही होगा और यदि मिश्रित विचार हैं तो मिश्रित भविष्य होगा। अधिकतर लोग नकारात्मक फिल्में, सीरियल और गाने देखते रहते हैं इससे उनका मन और मस्तिष्क वैसा ही निर्मित हो जाता है। वे गंदे या जासूसी उपन्यास पढ़कर भी वैसा ही सोचने लगते हैं। आजकल तो इंटरनेट हैं, जहां हर तरह की नकारात्मक चीजें ढूंढी जा सकती हैं। न्यूज चैनल दिनभर नकारात्मक खबरें ही दिखाते रहते हैं जिन्हें देखकर सामूहिक रूप से समाज का मन और मस्तिष्क खराब होता रहता है।
जैसी मति वैसी गति : 3 अवस्थाएं हैं- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। उक्त 3 तरह की अवस्थाओं के अलावा हमने और किसी प्रकार की अवस्था को नहीं जाना है। जगत 3 स्तरों वाला है- एक स्थूल जगत जिसकी अनुभूति जाग्रत अवस्था में होती है। दूसरा, सूक्ष्म जगत जिसका स्वप्न में अनुभव करते हैं तथा तीसरा, कारण जगत जिसकी अनुभूति सुषुप्ति में होती है।
उक्त तीनों अवस्थाओं में विचार और भाव निरंतर चलते रहते हैं। जो विचार धीरे-धीरे जाने-अनजाने दृढ़ होने लगते हैं वे धारणा का रूप धर लेते हैं। चित्त के लिए अभी कोई वैज्ञानिक शब्द नहीं है लेकिन मान लीजिए कि आपका मन ही आपके लिए जिन्न बन जाता है और वह आपके बस में नहीं है, तब आप क्या करेंगे? धारणा बन गए विचार ही आपके स्वप्न का हिस्सा बन जाते हैं। आप जानते ही हैं कि स्वप्न तो स्वप्न ही होते हैं उनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं फिर भी आप वहां उस काल्पनिक दुनिया में उपस्थित होते हैं।
इसी तरह बचपन में यदि यह सीखा है कि आत्मा मरने के बाद स्वर्ग या नर्क जाती है और आज भी आप यही मानते हैं तो आप निश्‍चित ही एक काल्पनिक स्वर्ग या नर्क में पहुंच जाएंगे। यदि आपके मन में यह धारणा बैठ गई है कि मरने के बाद व्यक्ति कब्र में ही लेटा रहता है तो आपके साथ वैसा ही होगा। हर धर्म आपको एक अलग धारणा से ग्रसित कर देता है। हालांकि यह तो एक उदाहरण भर है। धर्म आपके चित्त को एक जगह बांधने के लिए निरंतर कुछ पढ़ने या प्रार्थना करने के लिए कहता है।
वैज्ञानिकों ने आपके मस्तिष्क की सोच, कल्पना और आपके स्वप्न पर कई तरह के प्रयोग करके जाना है कि आप हजारों तरह की झूठी धारणाओं, भय, आशंकाओं आदि से ग्रसित रहते हैं, जो कि आपके जीवन के लिए जहर की तरह कार्य करते हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि भय के कारण नकारात्मक विचार बहुत तेजी से मस्तिष्क में घर बना लेते हैं और फिर इनको निकालना बहुत ही मुश्किल होता है 

साभार  डेलीहंट 
सम्मोहन (Hypnosis) वह कला है जिसके द्वारा मनुष्य उस अर्धचेतनावस्था में लाया जा सकता है जो समाधि, या स्वप्नावस्था, से मिलती-जुलती होती है, किंतु सम्मोहित अवस्था में मनुष्य की कुछ या सब इंद्रियाँ उसके वश में रहती हैं। वह बोल, चल और लिख सकता है; हिसाब लगा सकता है तथा जाग्रतावस्था में उसके लिए जो कुछ संभव है, वह सब कुछ कर सकता है, किंतु यह सब कार्य वह सम्मोहनकर्ता के सुझाव पर करता है।कभी कभी यह सम्मोहन बिना किसी सुझाव के भी काम करता है और केवल लिखाई और पढ़ाई में भी काम करता है जैसे के फलाने मर्ज की दवा यहाँ मिलती है इस प्रकार के हिप्नोसिस का प्रयोग भारत में ज्यादा होता है
 विकिपीडिया से
सम्मोहन  विद्या  भारत की  प्राचीनतम  और सर्वश्रेष्ठ  विद्या है  इसे  त्रिकाल विद्या के  नाम से  जाना जाता है | दरअसल यौगिक क्रियाओं का उद्देश्य मन को पूर्ण रूप से एकाग्र करके समाधि में लीन कर देना है और इस लीन करने की शक्ति का जो अंश प्राप्त होता है, उसी को सम्मोहन कहते हैं। सम्मोहन की शक्ति प्राप्त करने के.अनेक तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं।  ..

सम्मोहन का अर्थ आमतौर पर वशीकरण से लगाया जाता है। वशीकरण अर्थात किसी को वश में करने की विद्या, ‍ज‍बकि यह सम्मोहन की प्रतिष्ठा को गिराने वाली बात है। मन के कई स्तर होते हैं। उनमें से एक है आदिम आत्म..चेतन मन। आदिम आत्म चेतन मन न तो विचार करता है और न ही निर्णय लेता है। उक्त मन का संबंध हमारे सूक्ष्म शरीर से होता है। यह मन हमें आने वाले खतरे या उक्त खतरों से बचने के तरीके बताता है। इसे आप छटी...यह मन लगातार हमारी रक्षा करता रहता है। हमें होने वाली बीमारी की यह मन छह माह पूर्व ही सूचना दे देता है और यदि हम बीमार हैं तो यह हमें स्वस्थ रखने का प्रयास करता है। बौद्धिकता और अहंकार के चलते हम उक्त..क्या होगा इस मन को साधने से :
यह मन आपकी हर तरह की मदद करने के लिए तैयार है, बशर्ते आप इसके प्रति समर्पित हों। यह किसी के भी अतीत और भविष्य को जानने की क्षमता रखता है। आपके साथ घटने वाली घटनाओं  को टालने के उपाय खोज लेंगे। आप स्वयं की ही नहीं दूसरों की बीमारी दूर करने की क्षमता भी हासिल कर सकते हैं।  सम्मोहन द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण (टेलीपैथिक), दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, अदृश्य वस्तु या आत्मा को.कैसे साधें इस मन को :
प्राणायम से साधे प्रत्याहार को और प्रत्याहार से धारणा को। जब आपका मन स्थिर चित्त हो, एक ही दिशा में गमन करे और इसका अभ्यास गहराने लगे तब आप अपनी इंद्रियों में ऐसी शक्ति का अनुभव... ध्यान, प्राणायाम और नेत्र त्राटक द्वारा सम्मोहन की शक्ति को जगाया जा सकता है। त्राटक उपासना को हठयोग में दिव्य साधना से संबोधित किया गया है। आप उक्त साधना के बारे में जानकारी प्राप्त कर किसी योग्य.. नियमित सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और योगनिंद्रा करते हुए ध्यान करें। ध्यान में विपश्यना और नादब्रह्म का उपयोग करें। प्रत्याहार का पालन करते हुए धारणा को साधने का प्रयास करें। संकल्प के प्रबल होने से..धारणा को साधने में आसानी होगी है। संकल्प सधता है अभ्यास के महत्व को समझने से। इसके संबंध में ज्यादा जानकारी के लिए मिलें किसी योग्य योग शिक्षक या सम्मोहनविद से।  
स्रोत.webdunia.com

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बुधवार, 3 मई 2017

फेसबुक ला रहा है नई तकनीक, दिमाग जो सोचेगा वही टाइप हो जाएगा

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नई दिल्ली: फेसबुक इन दिनों एक नए तरीके की तकनीक पर काम कर रही है, जिसमें फेसबुक पर लिखने से आपको निजात मिल जाएगी. इस तकनीक में आप जो सोचेंगे वही टाइप होना शुरू हो जाएगा. फेसबुक इंक ने अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन के पूर्व प्रमुख के नेतृत्व में चलाए गए गोपनीय प्रोजेक्ट से पर्दा हटाते हुए बताया कि कंपनी अब विचार व स्पर्श द्वारा संचार की दिशा में शोध कर रही है. 
हाल ही में लॉन्च बिल्डिंग-8 शोध तकनीक का इस्तेमाल करते हुए फेसबुक द्वारा ब्रेन सेंसिंग पर काम किया जा रहा है.
इसके तहत फेसबुक इस्तेमाल करने वालों को टाइपिंग के झंझट से मुक्ति मिल जाएगी और वह दिमाग में जो सोचेगा वही टाइप हो जाएगा.
पेंटागन की डिफेंस एडवांस रिसर्च प्रोजेक्ट एजंसी (डीएआरपीए) के पूर्व निदेशक व फेसबुक की हेड ऑफ सीक्रेटिव बिल्डिंग-8 के उपाध्यक्ष रेजिना डुगन ने कंपनी के एफ-8 सम्मेलन में कहा कि हम बिल्डिंग-8 पर काम कर रहे हैं. 
उन्होंने कहा, 'भविष्य क्रांतिकारी तकनीकी से भरा हुआ है, जो बिना टाइपिंग के हमें लोगों से संवाद करने योग्य बनाएगी.'    
इस शोध पर फेसबुक में 60 लोगों की टीम काम कर रही है.
sabhar : zeenews.com 

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नया स्मार्ट चश्मा, एक ही लैंस करेगा विभिन्न लैंसों का काम

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वॉशिंगटन: वैज्ञानिकों ने ऐसे स्मार्ट ग्लासेस (चश्मा) विकसित किए हैं जिनके लैंस तरल आधारित हैं और उनका लचीलापन हर उस वस्तु पर फोकस करने में मदद करेगा जिसे भी ग्लासेस पहनने वाला व्यक्ति देख रहा होगा.यूटा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित इन ग्लासेस को कुछ इस तरह विकसित किया गया कि वह आंख की प्राकृतिक पुतली की तरह काम करेंगे यानी वह हर उस वस्तु पर फोकस कर सकेंगे जिसे भी व्यक्ति देख रहा है चाहे वह वस्तु दूर की हो या फिर पास की. उम्र बढ़ने के साथ हमारी आंखों के लैंस कड़क होते जाते हैं और विभिन्न दूरी पर फोकस करने की अपनी क्षमता और लचीलापन खो देते हैं.
इसलिए चश्मा लगाने की जरूरत पड़ती है. लेकिन तब मुश्किल और बढ़ जाती है जब हम विभिन्न दूरी पर फोकस करने की क्षमता खो देते हैं और ऐसी स्थिति में हमें अलग-अलग दूरी पर देखने के लिए विभिन्न लैंसों की जरूरत पड़ती है.
नए विकसित चश्मों में ग्लिसरिन से बने लैंस होते हैं जिन्हें दो लचीली झिल्लियों के बीच रखा जाता है. इन लैंसों को फ्रेम में लगा दिया जाता है. ये झिल्लियां फोकस मिलाने के लिए मुड़ जाती हैं. लैंस का लचीलापन और मुड़ने की क्षमता के चलते एक ही लैंस बहुलैंस का काम कर सकता है. यह शोध ऑप्टिक्स एक्सप्रेस जर्नल में प्रकाशित हुआ.
ज़ी न्यूज़ डेस्क 

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सोमवार, 1 मई 2017

फेसबुक ऐसे बदल देगा आपके जीवन का सच

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Facebook, one of the most popular searches of this century, has made it clear that its mission is to open the reality of reality.
The company wants that the gadgets which are already in the hands of people, can show them the world of reality reality and for that they do not have to wait for any high tech gear to be installed.
Introducing its annual developers conference in Silicon Valley, Facebook CEO Mark Zuckerberg said that the camera of smartphones is an early platform filled with reality. With this help, which can be adjusted to social media

Zuckerberg said, "I'm confident that we will now go ahead with this Augmented Reality platform." He predicted that this technique will be fitted in the eye glasses in the future. Zuckerberg told how to use digital plants, animals, masks and much more. Your browser's version of this program looks like People in Pokémon go show animated creatures in real surroundings of their surroundings In the words of Zuckerberg, "Augmented Reality will put real and digital in an entirely new way." So far, Facebook was focusing on developing Virtual Reality and developing it as a new computing platform. He is specially on the use of Rift Headgear, which makes Facebook's own Oculus Unit
Tools experts of Augmented Reality liked it but it will take time to reach the hands of their common users. Jackdow Research analyst Ian Dawson explains, "Facebook has come into the world of advanced realities and related technologies, now it seems that they are serious about it and will try to challenge applications like Snapchat."
Snapchat came with a feature Chat with a variety of animated characters such as masks on face also came with Snapchat. Snapchat inscribed "Paint the World Around You in 3D" right at the same time. In addition to jumping in the technology of Facebook, now in the reality of the big companies, there was a great deal of competition among the big companies. Sabhar: dw.de
RP / MJ (AFP)

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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

परमात्मा और विज्ञान

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मनुष्य की इच्छा सदियों से ये रही है की उसे वह सर्वशक्तिमान हो जाए वह प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ले | इसके लिए वह परमात्मा और विज्ञान का सहारा लेता है | वह कौन है कहाँ से आया है कहा जायेगा मरने के बाद कहा जाएगा क्या मरने बाद भी अस्तित्व है समस्याएं क्यों आती है धीरे धीरे मनुष्य अपनी जिज्ञासा विज्ञान के माध्यम से जानना शुरू की ठीक यही जिज्ञासा मेरे मन में भी थी किया जो धर्म में बताया गया है किया वह कपोल कल्पित है या उनमे कुछ सच्चाई भी है इसके लिए मैंने एक ब्लॉग बहुत पहले शुरू किया था की मानव का विकास विज्ञान और अध्यात्म के द्वारा पर मैंने सोचा की पहले विज्ञान का अध्ययन किया जाये और उसके बाद इसे अध्यात्म की कसौटी पर रखा जाए इसके लिए मैंने विज्ञान इंडिया डॉट कॉम - अनंतवार्ता डॉट काम शुरू किया इस साइट पे आप को विज्ञान और अध्यात्म से जुडी रोचक जान कारी आप को मिलेगी अब बाते विज्ञान की करते है विज्ञान अवधारणाओं को नहीं मानता जब तक वह किसी तथ्य को कसौटी पर परख़ नहीं लेता तबतक मानता नहीं और सत्य भी जब तक आप किसी भी चीज को सामने नहीं देखेंगे तो आप ही नहीं मानेंगे तो क्या विभिन्या धर्मो में जो बताया गया है क्या वह असत्य है केवल कपोल कल्पना नहीं ऐसा नहीं है आध्यात्मिक बाते जो कही गयी है उसे आज विज्ञान भी सिद्द कर रहा है | इसके लिए हम आगे की पोस्टो में चर्चा करेंगे विज्ञान ईश्वर को नहीं मानता वो मानता है की पूरी प्रक्रिति एक मशीन है इसके सब कलपुर्जो को समझ लेंगे जिस प्रकार गाडी चलाते वैसे इसे भी ऑपरेट कर सकते है | और अध्यात्म कहता है की सब कुछ परमात्मा है सबके भीतर भी है और बहार भी है साकार भी है और निराकार भी है विज्ञान के तरफ यदि बड़े बड़े वैज्ञानिक है तो अध्यात्म की तरफ योगी सन्यासी और विचारक जो ये कहते है की सब कुछ परमात्मा की इच्छा पर है सृस्टि एक माया जब परमात्मा की इच्छा होती है तभी सृष्टि का सृजन , परमात्मा अनंत है उसकी इच्छा भी अनंत इसलिए सृष्टियाँ भी अनंत इस लिए कहा गया है की हरी अनंत हरी कथा अनंता अब विज्ञान भी अनंत सृस्टि की संभावना मान रहा है आगे की चर्चा अगली पोस्ट में

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मंगलवार, 28 मार्च 2017

थ्री डी प्रिंट वाले शारीरिक अंगों के दौर में पहुंचा भारत

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गुड़गांव: थ्री डी प्रिंट वाले शारीरिक अंग अब भारत में हकीकत का रूप ले चुके हैं और यह निश्चित रूप से देश के चिकित्सकीय परिदृश्य को बदलकर रख सकता है। एक स्कूल शिक्षिका के साहस ने भारत में एक ऐसी चिकित्सकीय क्रांति को जन्म दिया है, जिसपर ज्यादा लोगों का ध्यान ही नहीं गया। यह चिकित्सकीय क्रांति बरेली से गुड़गांव तक फैल गई है।
नोएडा स्थित मेट्रो अस्पताल के एक चिकित्सक ने कहा, ‘थ्री डी प्रिंटिंग एक ऐसा आगामी नवोन्मेष है, जो निजी जरूरत के अनुरूप उपचार देने की पेशकश करता है।’ इसी तकनीक को पूरे-पूरे अंग बदलने के लिए जीवित उतकों पर भी आजमाया जा रहा है लेकिन इसमें अभी वक्त लगेगा। जरा सोचिए कि आप अपने खुद के गुर्दे की एक प्रति निकालें और अपने खराब गुर्दे को बदलवा लें।
इस माह की शुरुआत में गुड़गांव स्थित मेदांता : द मेडिसिटी के युवा चिकित्सकों के एक दल ने एक महिला की खराब हो चुकी रीढ़ को बदलकर पहली बार थ्री डी प्रिंटेड टाइटेनियम इंप्लांट लगा दिया। इस सर्जरी ने महिला को एक नया जीवन दे दिया। सर्जरी के महज चार दिन बाद महिला चलने-फिरने लगी थी। चिकित्सकों का कहना है कि यदि सर्जरी के लिए पारंपरिक तरीके अपनाए गए होते तो उसे चलने में महीनों लग जाते।
मेदांता के संस्थापक डॉ नरेश त्रेहन ने कहा, ‘थ्री डी प्रिंटिंग प्रौद्योगिकी ने जिंदगियां बचाने के लिए शरीर के अंगों के पुनर्निर्माण का एक नया आयाम खोल दिया है।’ पिछले माह 32 वर्षीय महिला के लिए चलना और बोलना बहुत मुश्किल हो गया था क्योंकि टीबी के कारण उनकी गर्दन की कशेरूक क्षतिग्रस्त होने लगी थी। रीढ़ की हड्डी में संकुचन शुरू होने पर वह अपनी टांगों के प्रति संवेदना खोने लगीं। इससे जीवन मुश्किल हो गया था।
भारत में अपनी तरह की इस पहली सर्जरी ने इस महिला में लगभग सामान्य जीवन बिता पाने की उम्मीद जगा दी है। तीन फरवरी को 10 घंटे तक सर्जरी करवाने वाली यह महिला अपनी पहचान नहीं बताना चाहती। उन्होंने कहा, ‘मैं अब ठीक हूं लेकिन पहले मुझे बहुत समस्या होती थी। मैं चल नहीं सकती थी। दर्द के कारण मैं रात को सो नहीं पाती थी, कुछ भी नहीं कर पाती थी। अब मैं बेहतर महसूस कर रही हूं।’
इस जटिल चिकित्सकीय समस्या के सामने आने पर 10 स्वास्थ्य विशेषज्ञों के एक दल ने पहली बार गर्दन में संक्रमित जोड़ को हटाकर अत्याधुनिक थ्री डी प्रिंटेड टाइटेनियम इंप्लांट लगाने का फैसला किया। इसका अन्य विकल्प यह रहता कि मरीज की ही टांग की एक हड्डी का इस्तेमाल किया जाता लेकिन चिकित्सकीय दल का कहना है कि इस स्थिति में मरीज को सर्जरी के बाद छह माह से अधिक समय तक बिस्तर पर ही रहना होता।
मेंदांता के प्रमुख सर्जन डॉ वी आनंद नाइक ने कहा, ‘हमने गर्दन से नीचे पक्षाघात का शिकार हो रही मरीज की क्षतिग्रस्त रीढ़ में थ्री डी प्रिंटेड कशेरूक लगाया। देश में ऐसा पहली बार किया गया और दुनिया में संभवत: यह तीसरी बार था।’ ऐसी एक सर्जरी पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में हुई थी और एक सर्जरी वर्ष 2015 में चीन में हुई थी।
एक्स-रे और उच्च विभेदन क्षमता वाले कैट-स्कैन का इस्तेमाल करके क्षतिग्रस्त रीढ़ का थ्री डी कंप्यूटर मॉडल बनाया गया। इसके बाद कंप्यूटर पर उचित डिजाइन तैयार किया गया और बरेली में इसे थ्रीडी प्रिंटर में भेजा गया। इस तरह मरीज के लिए टाइटेनियम इंप्लांट तैयार किया गया।
तीन सेमी लंबे इस धात्विक चिकित्सकीय उत्पाद में 154 ग्राम उच्च स्तरीय टाइटेनियम लगा है और इसकी कीमत एक लाख रूपए से कम है। लगभग पूरे दिन चली इस सर्जरी में इसे सिर और धड़ के बीच में लगाया गया और रीढ़ की हड्डी पर पड़ने वाले दबाव से मरीज को राहत दिलाई गई।
मेदांता में इस थ्री डी इंप्लांट के प्रमुख डिजाइनर डॉ राहुल जैन ने कहा, ‘इस इंप्लांट को डिजाइन करना काफी मुश्किल था क्योंकि रीढ़ की संरचना जटिल है। टाइटेनियम के इंप्लांट पूरी तरह सुरक्षित हैं क्योंकि ये जैव अपघटनीय हैं और यह भी सुनिश्चित किया गया कि यह रीढ़ की हड्डी से टकराए नहीं।’
भाषा sabhar :http://zeenews.india.com/

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रविवार, 29 नवंबर 2015

वैज्ञानिकों ने विकसित किया इलेक्ट्रॉनिक पौधा, विज्ञान के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत

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लंदन: वैज्ञानिकों ने पौधे के संवहन तंत्र में सर्किट लगाकर एक इलेक्ट्रॉनिक पौधे का निर्माण किया है। इससे विज्ञान के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत हो सकती है।
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स्वीडन के लिकोंपिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के दल ने पौधों के अंदर लगाए गए तारों, डिजिटल लॉजिक और प्रदर्शनकारी तत्वों को दिखाया गया है, जो आर्गेनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के नए अनुप्रयोगों और वनस्पति विज्ञान में नए उपकरण विकसित करने में मददगार हो सकते हैं।
उमीआ प्लांट साइंस सेंटर के निदेशक और प्लांट रिप्रोडक्शन बायलॉजी के प्रोफेसर ओव निल्सन ने कहा, इससे पहले वैज्ञानिकों के पास जीवित पौधे में विभिन्न अणुओं के सकेंद्रण को मापने के लिए कोई अच्छा उपकरण नहीं था, लेकिन इस शोध के बाद हम पौधों का विकास करने वाले उन विभिन्न पदार्थो की मात्रा को प्रभावित करने में सक्षम हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा, पौधों में रासायनिक मार्गो पर नियंत्रण से प्रकाश संश्लेषण आधारित ईंधन सेल, सेंसर्स (ज्ञानेंद्रियों) और वृद्धि नियामकों के लिए रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही ऐसे उपकरण भी तैयार किए जा सकते हैं, जो पौधों की आंतरिक क्रियाओं को व्यवस्थित कर सकें।
उन्होंने कहा, यह सफलता वनस्पति विज्ञान और ऑर्गेनिक साइंस के विविध क्षेत्रों के विलय की ओर पहला कदम है। हमारा उद्देश्य उर्जा की मदद से पर्यावरण और वनस्पति विज्ञान के नए रास्तों को खोजना है। यह अध्ययन साइंस एडवांसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
sabhar :http://zeenews.india.com/

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शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

घर बैठे चला रहे हैं अपना 'चैनल'

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मुख्य रूप से वीडियो देखने और मनोरंजन का साधन मानी जाने वाली यूट्यूब वेबसाइट का इस्तेमाल अब शिक्षा के प्रचार प्रसार में भी हो रहा है.
खाना बनाना, गीत संगीत से लेकर सिलाई कढ़ाई तक के कामों को आप वीडियो देख कर ऑनलाईन सीख सकते हैं.
यूट्यूब के माध्यम से लोगों के मोबाईल पर पहुंच कर, कुछ 'शिक्षक' न सिर्फ़ आधारभूत शिक्षा ही दे रहे हैं बल्कि एक बेरोज़गार को रोज़गार भी दिला रहे हैं.

एग्ज़ाम फ़ीवर

Image copyrightsangathan palghar school
यू-ट्यूब पर ज़्यादातर वीडियो मनोरंजन आधारित होते हैं लेकिन शिक्षाप्रद वीडियो भी अब यहां आपको नज़र आने लगे होंगे.
ये वीडियो लोगों को सिर्फ़ शिक्षित ही नहीं कर रहे बल्कि उनको बेहतर स्किल भी दे रहे हैं और ऐसे ही कुछ नि:शुल्क यू-ट्यूब वीडियो चैनल आजकल लोकप्रिय हो रहे हैं.
ऐसा ही एक चैनल है 'एग्ज़ाम फ़ीवर' जिसे रोशनी मुखर्जी चलाती हैं और इस चैनल के 83 हज़ार सब्सक्राइबर हैं.
झारखंड के धनबाद ज़िले में पली-बढ़ी रोशनी मुखर्जी को बचपन से ही पढ़ाई से लगाव था और बैंगलूरू की एक आई टी कंपनी में विश्लेषक के तौर पर काम कर रही रोशनी ने 2011 में यू-ट्यूब पर 'एक्ज़ाम फ़ीवर' के नाम से चैनल बनाया.
लगभग हर दिन रोशनी इस चैनल पर दो वीडियो अपलोड करती हैं और अपने चैनल पर आने वाले छात्रों को विभिन्न विषयों के बारे में जानकारी देती हैं.
Image copyrightroshni mukherji
रोशनी कहती हैं, "पढ़ाना मेरा पैशन है और आईटी सेक्टर में रहने के कारण मुझे पता था की इंटरनेट के माध्यम से ही कुछ करना है, आप मेरे चैनल को एक ऑनलाईन ट्यूशन कह सकते हैं."
आर्थिक पहलू पर बात करते हुए रोशनी कहती हैं, "एक्ज़ाम फ़ीवर मेरा जुनून है बिज़नेस नहीं पर इसे चलाने के लिए भी लागत लगती है इसलिए मैंने आर्थिक मदद के लिए एक नया ऑप्शन बनाया है."

के श्रीप्रिया कनिगोल्ला

कोयंबटूर में रहने वाली गृहणी श्रीप्रिया कनिगोल्ला बचपन से ही चित्रकला और कारीगरी में दिलचस्पी थी जिसमें शामिल है फैब्रिक पेंटिंग, माला बनाना, फूल बनाना.
अपनी शिल्प कला को युट्यूब चैनल में डालने के लिए पांच साल पहले प्रोत्साहन दिया उनके 16 वर्षीय बेटे ने, "मुझे तो कैमरा भी चलाना नहीं आता था लेकिन अब मैंने वीडियो की एडिटिंग के लिए सॉफ्टवेयर सीख लिया है और सारे वीडियो मैं खुद ही बनाती और अपलोड करती हूँ."
श्रीप्रिया के चैनल के लगभग 40 हज़ार सब्सक्रिप्शन हैं और अब तक उन्होंने 240 वीडियो अपलोड किए, उनकी कोशिश रहती है कि वो हर हफ़्ते करीबन 2 वीडियो यूट्यूब पर अपलोड करें.
2010 में शुरू किए इस चैनल के लिए वो कहती हैं, "पेंटिंग करना और क्राफ्ट बनाना मेरा शौक है और मुझे ख़ुशी है की लोग इसका लाभ उठा रहे हैं. कितने लोग इस कला के वीडियो को देखकर स्कूलों में सिखा रहे हैं. मुझे ख़ुशी है की मैं लघु उद्योग को बढ़ावा दे रही हूँ."
2012 में उनकी यूट्यूब के साथ पार्टनरशिप हुई और कुछ पैसे मिलना भी शुरू हो गए हैं और उनके अधिकतर दर्शक जर्मनी, अर्जेंटीना से है जो अक्सर इस कला से जुड़े सवाल पूछते रहते है.

मेक मी जीनियस

2010 में कुछ छात्रों द्वारा शुरू किया गया युट्यूब चैनल 'मेक मी जीनियस' बच्चों के लिए दिलचस्प एनीमेशन के ज़रिए विज्ञान के वीडियो अपलोड करता है.
5 साल से जारी इस चैनल के लगभग 70 हज़ार सब्सक्रिप्शन हैं.
हालांकि ये छात्र अपनी पहचान गुप्त रखना चाहते हैं क्योंकि वो इसे प्रसिद्धि के लिए नहीं कर रहे हैं.
नाम न बताने की शर्त पर इस चैनल के संस्थापक कहते हैं, "न हमें फ़ेम चाहिए, न पैसा. बस मैं इतना कह सकता हूँ कि हम कुल 5 लोग हैं."
इन छात्रों का लक्ष्य है की वो निस्वार्थ और मुफ़्त एजुकेशन दें और हर हफ़्ते वीडियो डालने वाले इस ग्रुप को अब यूट्यूब के विज्ञापन से पैसे मिलने लगे हैं.
sabhar :http://www.bbc.com/

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गुरुवार, 10 सितंबर 2015

डायरेक्टर्स ऑफ बोर्ड की बैठक में 2025 तक रोबोट भी ले सकता है हिस्सा

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नई दिल्ली : विज्ञान कथाओं के दायरे से निकलकर अब रोबोट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मशीनें कॉरपोरेट निदेशक मंडल में जगह पा सकती हैं। इसके अलावा बहुत उम्मीद है कि पहले रोबोटिक फार्मासिस्ट, 3डी-प्रिंटेड कार और इंप्लांटेबल मोबाइल फोन समेत 11 नई आधुनिक प्रौद्योगिकी 2015 में वास्तविकता बन सकती है।

डायरेक्टर्स ऑफ बोर्ड की बैठक में 2025 तक रोबोट भी ले सकता है हिस्सा
विश्व आर्थिक मंच के साफ्टवेयर एवं समाज के भविष्य पर वैश्विक एजेंडा परिषद द्वारा किए गए 800 कार्यकारियों के सर्वेक्षण में कहा गया ‘करीब आधे उत्तरदाताओं को उम्मीद है कि पहली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मशीन किसी कंपनी के निदेशक मंडल में 2025 तक होगी जबकि पहला 3डी-प्रिंटेड लीवर 2024 तक प्रवेश करेगा।’ इस सर्वेक्षण में कहा गया कि विश्व क्रांतिकारी बदलाव के दौर से गुजर रहा है और नयी प्रौद्येागिकी जल्दी ही वास्तविकता बन जाएगी जो कुछ साल पहले तक विज्ञान कथाओं तक सीमित थी।

सर्वेक्षण में शामिल 90 प्रतिशत लोगों ने कहा कि 2025 तक कम से कम 10 प्रतिशत लोग इंटरनेट से जुड़े कपड़े पहनेंगे। 75 प्रतिशत लोगों का मानना है कि अमेरिका में पहला रोबोट फार्मासिस्ट होगा जबकि 63 प्रतिशत का मानना है कि पहला ट्रैफिक लाइट मुक्त शहर होगा जबकि 45 प्रतिशत का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मशीन निदेशक मंडल में शामिल होगी।
sabhar http://zeenews.india.com/

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