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शुक्रवार, 12 जून 2026

मंत्र कीलक का अर्थ

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1. "कीलक" का अर्थ

"कीलक" (कील या ताला) शब्द तंत्र और मंत्रशास्त्र में मिलता है। इसका आशय किसी मंत्र या स्तोत्र की शक्ति पर लगे प्रतीकात्मक बंधन से लिया जाता है, जिसे उचित साधना, दीक्षा और गुरु के मार्गदर्शन से खोला जाता है।

सबसे प्रसिद्ध उदाहरण दुर्गा सप्तशती का कीलक स्तोत्र है, जहाँ "कीलक" का उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है।

2. क्या "कामाख्या कीलक" नाम से कोई प्रमाणित ग्रंथ है?

वर्तमान में उपलब्ध प्रमुख तांत्रिक ग्रंथों—जैसे कालिका पुराण, योगिनी तंत्र और कुलार्णव तंत्र—में "कामाख्या कीलक" शीर्षक से कोई सर्वमान्य और प्रसिद्ध स्वतंत्र अध्याय या मंत्र व्यापक रूप से प्रमाणित नहीं है।

इसलिए यह कहना कि "कामाख्या का वास्तविक कीलक किसी गुप्त श्लोक में नहीं, बल्कि समर्पण और गुरु-प्रदत्त साधना में निहित है" अधिकतर आध्यात्मिक और परंपरागत व्याख्या है, न कि किसी एक शास्त्र का प्रत्यक्ष उद्धरण।

3. कामाख्या का महत्व

कामाख्या मंदिर को 51 या 52 शक्तिपीठों में अत्यंत प्रमुख माना जाता है। शाक्त और तांत्रिक परंपरा में इसे देवी की योनि-शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो सृष्टि की मूल ऊर्जा का द्योतक है।

4. प्रणाम मंत्र

आपके द्वारा उद्धृत मंत्र—

कामाख्ये वरदे देवि नीलपर्वतवासिनि।
त्वं देवि जगतां मातः योनिमुद्रे नमोऽस्तु ते॥

यह मंत्र कामाख्या देवी की स्तुति में प्रचलित है और अनेक साधक इसका जप करते हैं।

5. क्या कीलक-भेदन केवल आंतरिक प्रक्रिया है?

तांत्रिक परंपराओं में दो प्रकार की व्याख्याएँ मिलती हैं—

  • बाह्य (अनुष्ठानिक) – गुरु से दीक्षा, न्यास, मंत्र-जप, यंत्र, होम आदि।

  • आंतरिक (आध्यात्मिक) – अहंकार, भय, संशय और आसक्ति का क्षय तथा पूर्ण समर्पण।

कई तांत्रिक आचार्य मानते हैं कि वास्तविक सिद्धि इन दोनों के समन्वय से प्राप्त होती है।


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मंगलवार, 9 जून 2026

कामसूत्र, कोकशास्त्र और चौरासी आसन: प्राचीन भारत के वो गुप्त रहस्य जो आज भी आपको हैरान

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 कामसूत्र, कोकशास्त्र और चौरासी आसन: प्राचीन

भारत के वो गुप्त रहस्य जो आज भी आपको हैरान

कर देंगे!


क्या आप भी 'पद्मिनी' और 'चित्रिणी' जैसी सम्मोहक स्त्रियों को कामसूत्र का हिस्सा मानते हैं? क्या आपको लगता है कि कामसूत्र सिर्फ बेडरूम के आसनों की एक किताब है? अगर हाँ, तो आप एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं।


​आज हम इतिहास के पन्नों को पलटकर प्राचीन भारत के उस गुप्त विज्ञान की परतें खोलेंगे, जहाँ अध्यात्म, मनोविज्ञान, शरीर विज्ञान और कामुक ऊर्जा का एक अद्भुत मिलन होता है। आइए जानते हैं उस कड़वे और मादक सच को, जिसे लोग अक्सर अनजाने में घालमेल कर देते हैं।


​पाठकों के बीच सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि वे कामशास्त्र से जुड़ी हर बात को 'कामसूत्र' मान लेते हैं। लेकिन सच यह है कि ये दोनों अलग-अलग युगों में लिखे गए दो बेहद अलग ग्रंथ हैं:

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​महर्षि वात्स्यायन का 'कामसूत्र' (समय: लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व से दूसरी सदी ईस्वी)

​आज से लगभग 1800-2000 साल पहले महर्षि वात्स्यायन ने 'कामसूत्र' की रचना की थी। यह केवल सेक्स गाइड नहीं है, बल्कि सुखी नागरिक जीवन, स्त्री-पुरुष मनोविज्ञान और कलाओं का एक दार्शनिक ग्रंथ है। वात्स्यायन ने इसमें स्त्रियों को किसी 'पद्मिनी' या 'शंखिनी' में नहीं बांटा, बल्कि उनके आंतरिक काम-वेग और शारीरिक अनुकूलता के आधार पर तीन बेहद व्यावहारिक भेद किए:—

​मृगी: अत्यंत कोमल शरीर और शांत काम-वेग वाली स्त्री।

​बड़वा: मध्यम वेग और सामान्य शरीर वाली संतुलित स्त्री।

​हस्तिनी: अत्यधिक तीव्र काम-वेग और सुदृढ़ शरीर वाली ऊर्जावान स्त्री।


​कामसूत्र के सैकड़ों साल बाद, ( लगभग 11बीं़-12बीं सदी) मध्यकाल में कवि कोकोक ने 'रतिरहस्य' नाम का ग्रंथ लिखा, जिसे उनके नाम पर 'कोकशास्त्र' कहा गया। कोकोक ने वात्स्यायन के सूत्रों को और अधिक सरल, व्यावहारिक और थोड़ा और मादक बनाया। जो ४ भेद आज दुनिया भर में सबसे ज़्यादा चाव से पढ़े जाते हैं, वे इसी कोकशास्त्र की देन हैं:


​पद्मिनी: जिसके शरीर से कमल की प्राकृतिक खुशबू आती है, जो सात्विक और सर्वश्रेष्ठ है।

​चित्रिणी: जो दुबली-पतली, चंचल और संगीत-नृत्य जैसी कलाओं की दीवानी होती है।

​शंखिनी: जो बोल्ड, लंबी, तीखे स्वभाव वाली और अपनी इच्छाओं को खुलकर बोलने वाली होती है।

​हस्तिनी: जो भारी शरीर, मोटे होंठ और समंदर जैसे गहरे काम-वेग वाली होती है।


​क्या है कामसूत्र के 84 आसनों का रहस्य? ​जब भी कामसूत्र का नाम आता है, लोगों के मन में तरह-तरह के आसनों की तस्वीरें तैरने लगती हैं। लेकिन यहाँ भी एक बहुत बड़ा कौतूहल है।

​मूल कामसूत्र में वात्स्यायन ने मुख्य रूप से 64 कलाओं और संभोग की कुछ मूलभूत स्थितियों का वर्णन किया था। लेकिन समय के साथ, जब इस विज्ञान का विकास हुआ और इसमें योगशास्त्र तथा तंत्र विज्ञान का समावेश हुआ, तब चौरासी (84) आसनों की अवधारणा सामने आई।


ये 84 आसन केवल शारीरिक कसरत या वासना की तृप्ति के साधन नहीं हैं। प्राचीन आचार्यों के अनुसार, मानव शरीर में चौरासी लाख योनियों के प्रतीक स्वरूप कुछ मुख्य ऊर्जा केंद्र होते हैं। इन 84 आसनों का उद्देश्य स्त्री और पुरुष के शरीर की रीढ़ की हड्डी में छिपी कुंडलिनी ऊर्जा और काम-ऊर्जा  को जगाकर उसे 'उर्ध्वरेता' यानी ऊपर की ओर उठाना है। सरल शब्दों में कहें तो, ये आसन दो शरीरों के मिलन को एक ऐसी साधना बना देते हैं जहाँ चरम सुख (Orgasm) केवल शारीरिक न रहकर आत्मिक आनंद (Spiritual Ecstasy) में बदल जाता है।


आजकल ज्यादातर लोग ‘चौरासी आसन’ को सुनते ही इसे केवल कामुकता या कामसूत्र से जोड़कर देखते हैं। लेकिन इसका असली सच जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

मूल कामसूत्र में 84 आसनों का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। वात्स्यायन के कामसूत्र में यौन-मुद्राओं और कामकला का वर्णन है, पर “चौरासी आसन” जैसी कोई अवधारणा नहीं मिलती। वास्तव में, 84 आसनों की परंपरा हठयोग और नाथ संप्रदाय से आई है। यह मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण ग्रंथों में मिलती है:

गोरक्ष शतक — योगिराज बाबा गोरखनाथ द्वारा रचित

हठयोग प्रदीपिका — स्वामी स्वात्माराम द्वारा लिखित (15वीं शताब्दी)

इन ग्रंथों में कहा गया है कि84 प्रमुख आसन हैं, जिनमें से कुछ विशेष आसन (जैसे सिद्धासन, पद्मासन, सिंहासन और भद्रासन) अत्यंत महत्वपूर्ण माने गए हैं।


प्राचीन योगाचार्यों ने काम-ऊर्जा (रेतस या Sexual Energy) को मात्र नष्ट करने या दबाने की बात नहीं की। उन्होंने इसे रूपांतरित (Transmutation) करने का मार्ग बताया।

इन 84 आसनों, विभिन्न मुद्राओं, बंधों और प्राणायाम के माध्यम से इस ऊर्जा को जागृत कर कुंडलिनी के रूप में शरीर के विभिन्न चक्रों से गुजारकर सहस्रार चक्र तक ले जाना ही हठयोग का मूल उद्देश्य है। इसका अंतिम लक्ष्य है — ऊर्ध्वरेतस की अवस्था, ओजस का निर्माण, और परम आनंद व समाधि की प्राप्ति। 84 आसन कामुकता का साधन नहीं, बल्कि काम-ऊर्जा को आध्यात्मिक


ऊर्जा में बदलने का वैज्ञानिक और साधना-पूर्ण माध्यम हैं।


​जब कामशास्त्र की स्त्रियाँ साहित्य की 'नायिका' बनती हैं...​अब बात करते हैं उस सुंदर और कलात्मक पहलू की, जो हमें प्राचीन महलों और हिंदी साहित्य के रीतिकाल के चित्रों में देखने को मिलता है। जब कोकशास्त्र की ये कामुक स्त्रियाँ (जैसे चित्रिणी या पद्मिनी) प्रेम और विरह के अलग-अलग दौर से गुजरती हैं, तो हमारा साहित्य (काव्यशास्त्र) इन्हें 'अष्ट-नायिका' (8 मुख्य अवस्थाओं) के रूप में पूजने लगता है:


​अभिसारिका: जब वही कलाप्रेमी और चंचल 'चित्रिणी' लोक-लाज और समाज की परवाह किए बिना, रात के अंधेरे में तड़पती हुई अपने प्रेमी से मिलने भागती है।


​वासकसज्जा: जब वही कोमल 'पद्मिनी' अपने बेडरूम को फूलों से सजाकर, इध-उधर इत्र छिड़ककर, कामदेव की प्रतीक्षा में आँखें बिछाए बैठी होती है।


​खण्डिता: जब नायक रात भर किसी दूसरी स्त्री के पास रहकर सुबह घर लौटता है, और नायिका की आँखों में प्रेम की जगह लाल-लाल क्रोध और ईर्ष्या की ज्वाला भड़क उठती है।


​प्रोषितपतिका: जिसका पति या प्रेमी कमाने के लिए परदेस चला गया हो और वह उसकी याद में सूनी आँखों से विरह की आग में जल रही हो।


​साहित्य में स्वभाव के आधार पर इन्हें 'मुग्धा' (भोली-भाली नवयौवना), 'म्या' (मर्यादित और समझदार) और 'प्रौढ़ा' (चतुर और बेडरूम की कलाओं में पूरी तरह अनुभवी) भी कहा गया है। 


​प्राचीन भारत का यह विज्ञान हमें सिखाता है कि काम (Sexuality) कोई पाप या छुपाने वाली अश्लील चीज़ नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक अनिवार्य और पवित्र हिस्सा है। जहाँ कामसूत्र हमें मन का मनोविज्ञान सिखाता है, कोकशास्त्र हमें शरीर की श्रेणियाँ बताता है, 84 आसन हमें ऊर्जा का संतुलन सिखाते हैं, वहीं साहित्य (नायिका-भेद) हमें उस प्रेम की भावनाओं की सुंदरता से रूबरू कराता है। यानी वासना से उपासना तक का सफर करा देता है। ​यह पूरा सफर शरीर की वासना से शुरू होकर आत्मा की उपासना पर जाकर खत्म होता है। अब आप खुद को और अपने पार्टनर को टटोलिए—आप किस श्रेणी के प्रेमी हैं और आपकी कामुक ऊर्जा किस स्तर पर है? साभार Facebook 

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