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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

साधना का महत्व जो सिद्धि की तरफ जाती हैं

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 जो नाड़ी के मर्म को जानते हैं, वे प्राण वायु के रहस्य को भी भली-भांति समझते हैं। नाड़ी के शुद्धिकरण का सबसे सीधा और प्रभावी माध्यम प्राण वायु यानी हमारी श्वास ही है।

हमारी सोच और भावनाओं का सीधा तार श्वासों से जुड़ा होता है। प्राण वायु के दो प्रमुख केंद्र हैं—एक सहस्रार और दूसरा मूल (मूलाधार)। जिस प्रकार विचार और भावनाएं मन की उपज हैं, ठीक उसी प्रकार श्वास की गति और लय भी पूरी तरह मन की गतिविधियों से संचालित होती है।

जब नाड़ियों में विकार बढ़ते हैं, तब वे श्वास को इन दोनों मूल केंद्रों से भटकाकर अनियंत्रित कर देते हैं। जब तक मन शांत और सहज न हो, तब तक श्वास अपनी स्वाभाविक और प्राकृतिक लय में नहीं लौट सकती। दूसरी तरफ, जब तक नाड़ियों से विकारों का शमन न हो जाए, तब तक मन भी कभी समत्व और स्थिरता को प्राप्त नहीं कर सकता।

​इन विकारों से पार पाने के दो मार्ग हैं:


• कर्म इंद्रियों की साधना: मन की चंचलता को अनसुना करके निरंतर शुभ और सत्कर्म में लगे रहना। मनुष्य जैसा कर्म निरंतर करता है, वही धीरे-धीरे उसका संस्कार और स्वभाव बन जाता है।


• सूक्ष्म इंद्रियों का नियमन: संकल्प और हठ के माध्यम से इंद्रियों की चपलता को शांत करना। मनुष्य जैसा विचार लगातार करता है, उसका आचरण भी वैसा ही ढल जाता है और अंततः वह वैसा ही बन जाता है।

यदि लक्ष्य नाड़ियों के विकारों से पूर्ण मुक्ति का है, तो सबसे पहले श्वास पर से हर तरह का दबाव हटाकर उसे बिल्कुल सहज और स्वतंत्र छोड़ना होगा। जब प्राण वायु अपनी सहज गति में बहती है, तो वह भीतर की हर अशुद्धि और विकार पर चोट करती है। इस तरह भटकती हुई श्वास पुनः अपने मूल केंद्रों से एकाकार हो जाती है। साभार Facebook साधन साधना और सिद्धिया



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