आत्मा के रहस्य
एक दो लेख पारे पर ले लेते हैं | उसके बाद पुनः साधक विषय पर आएंगे | ये साधक विषय जरूरी है जो आपको जिम्मेदारी का बोध कराएगा | अभी पारे पर बात करते हैं | पिछले साल जो लेख छोड़ा था उसी को आगे बढ़ाएंगे | लेकिन पहले एक प्रश्न को समझते हैं | जो कई बार पूछा गया है | यदि किसी धातु के केंद्र में परिवर्तन नहीं होगा तो वाह्य परिवर्तन कैसे संभव है ? वैसे तो इस प्रश्न का जवाब मैंने कई बार लिखा है | लेकिन आप लेखों की ध्यान से पढ़ते नहीं हैं | बड़े स्तर के डाक्टर और इंजीनियर भी 10 साल बाद कहते हैं अब बात समझ आई है | तो आप ठीक से समझकर पढ़ा करें | लेकिन चलिए प्रश्न आया है तो इसे एक नए आयाम से समझते हैं | ये सही है यदि किसी धातु या मनुष्य के केंद्र में परिवर्तन नहीं होगा तो वो वास्तविक परिवर्तन नहीं होगा | लेकिन ये पूरा सत्य नहीं है | जी हाँ ये पूरा सत्य नहीं है | लेकिन रस विद्या इसी एक सत्य पर टिकी है कि केंद्र में परिवर्तन करके ही मनुष्य या धातु में परिवर्तन किया जा सकता है | ये भी सत्य है |
क्योंकि रस विद्या के वैज्ञानिकों ने हजार साल पहले लोह वेध या धातु वेध और देह वेध का पारा बनाया | इसे मनुष्य और धातु के केंद्र तक पहुंचाया गया | और जैविक चेतना में समूल परिवर्तन किया गया | लोग अजर अमर हो गए | पारे के अंदर स्वर्ण बीज और अभ्रक सत्व को जारित किया गया | इसके बाद इसे मनुष्य के केंद्र तक भेजा गया, जिससे मनुष्य अजर अमर हो गया | दूसरा धातु के केंद्र तक भेजा गया इससे ताम्र, चांदी और सीसे का स्वर्ण में परिवर्तन हुआ | ये सब प्रमाणिक सत्य है | जो आपको रस ग्रंथों में मिल जाएगा | रसविदों ने ये भी बताया किसी भी धातु का बीज बनाएं; उसे अन्य धातुओं के केंद्र में रोपित करके अन्य धातुओं में बदला जा सकता है | ये कोई जादू नहीं है बल्कि विशुद्ध विज्ञान है | क्योंकि रस सिद्धों की लंबी सूची रस ग्रंथों में मिल जाती है | एक समय तक तो जैसे अन्य शैव, शाक्त, वैष्णव पंथ हैं वैसे है रस विद्या भी एक मार्ग थी ब्रह्म प्राप्ति के लिए | रस याने पारा | पारे से जगत और ब्रह्म दोनों की सिद्धि मिलती है |
लेकिन समय साथ-साथ ये विज्ञान विलुप्त तो नहीं हुआ लेकिन सीमित जरूर हो गया | कारण ये विज्ञान उस मार्ग के लोगों के लिए था जो उस मार्ग रस विद्या का अनुसरण करते हैं | इसको लेकर अवधारणा बिल्कुल साफ थी | एक तो जन्म जन्मांतर के चक्कर से बचना | दूसरा जब तक मुक्ति सुनिश्चित न हो जाए इसी मनुष्य शरीर में रहा जाए | तीसरा जीवन को आनंद मय बनाकर जिया जाए | अब जो आयुर्वेद के साथ हुआ है उनके उपयोगी जूस आदि तो पाँच सितारा वाले चोरी कर ले गए | अब आयुर्वेद छूँछा गन्ना रह गया है | जिसकी आधे से ज्यादा निर्भरता सिर्फ पारे से बनी औषधियों पर रह गई है | और अगर पारा बंद हो गया तो आयुर्वेद कंगाल हो जाएगा | बस यही रस विद्या के साथ हुआ | कुछ तो सोना चांदी बनाने वाले चोरी कर लाए | अन्य कुछ 100 औरतें खड़ी रहे ...........| एक रस सिंदूर ही सम्हाल लेगा | ये अलग बात है इसमें कितने सफल हैं ? लेकिन कोशिश होती रहती है | अब आयुर्वेद में तय मानकों के आधार पर ही सब कुछ हो रहा है | रोगी से इसका बहुत वास्ता नहीं होता है |
वर्तमान समय में जो लोग भी कीमिया कर रहे हैं | उन्हें केंद्र से कुछ मतलब होता नहीं है | पारे की भस्म ताम्र में डालेंगे सोना बना जाएगा | हो किसी का नहीं रहा है | कारण समझकर कोई काम करता ही नहीं है | अपने प्रश्न पर आते है “केंद्र में परिवर्तन करना” | सबसे पहले आपको केंद्र locate करना होगा | ये आप कैसे करेंगे ? ये किसी को पता नहीं है | मेरे लेख यदि आपने समझदारी से पढ़े होते तो जवाब वहाँ मिल जाता | क्योंकि रस विद्या की जड़ तो यही है केंद्र में परिवर्तन करना है | तभी परिवर्तन संभव है | तो जो लोग भी कीमिया करते हैं उन्हें केंद्र सबसे पहले मालूम होना चाहिए क्या ? कैसे और कहाँ ??
पहले हम इस केंद्र को ही समझते हैं | जो हजार साल पहले शोध हुआ उन्हीं के तरीके से समझते हैं | और वर्तमान के तरीके से भी समझते हैं | रस विदों ने केंद्र को कैसे समझा ? और रसायन शास्त्रियों ने इसे कैसे व्याख्या किया है | रसायन शास्त्र का अर्थ है chemistry | जो विज्ञान के छात्र रहे हैं उन्हें ये chemistry पता होगी | पारे से काम और पारे पर काम ये है रस विद्या | रस विद्या का क्रमिक विकास नहीं हुआ है | जैसा की chemistry का हुआ है | रस विद्या उन लोगों की देन है जो अदृश्य में भी झांक सकते थे | गोविंदपाद, रसेश्वर जैसे सिद्ध महात्मा | गोविंदपादाचार्य तो आदि शंकर के गुरु रहे हैं | तो रस विद्या खोजी नहीं गई | सीधी ही उपलब्ध करा दी गई | केमिस्ट्री का क्रमिक विकास हुआ है | केमिस्ट्री में आज भी शोध जारी हैं | हर महीने दो महीने में कुछ नया खोज लेते हैं | रस विद्या पूर्ण है जिसे किसी शोध की आवश्यकता नहीं है |
Hydrogen oxygen के साथ मिलेगी पानी बन जाएगा सीधा सूत्र है | पूरा रसायन शास्त्र सूत्रों पर ही आधारित है | रस विद्या में कोई सूत्र होता ही नहीं है | इसे तो समझने के लिए भी आपको महात्मा की दृष्टि चाहिए होती है | यही वजह है chemistry, physics में बहुत बड़े वैज्ञानिक हुए हैं जिन्होंने atom bomb बना दिया लेकिन सोना नहीं बना पाए हैं | कुछ तो वजह होगी | आज के समय में सभी अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं लेकिन रस विद्या किसी को समझ ही नहीं आती है | क्योंकि रसायन शास्त्र अभी सतह पर है | या यूं कहें सतह से अंदर की ओर गतिमान है | जबकि रस विद्या जहां से मनुष्य बनाने का पहला पुर्जा लगता हैं वहाँ से शुरू होती है | मनुष्य का assemble और dismantle रस विद्या है | इस एक लाइन को और तरीके से समझते हैं | यदि किसी मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति करनी है तो क्या करना होगा ? एक-एक करके सभी कर्मों को समाप्त करना | जब कोई कर्म बाकी ही नहीं बचा तो सिर्फ आत्मा ही बचेगी | यही है dismantle | और फिर से मनुष्य का निर्माण करना ये है रस विद्या | बने हुए मनुष्य में परिवर्तन करना है ये भी रस विद्या है |
रसायन शास्त्र वर्तमान समय में मनुष्य या अन्य कोई जीव बना ही नहीं सकता है | हाँ चिकित्सा कर सकता है | लेकिन बना नहीं सकता है | लेकिन रस विद्या है मनुष्य निर्माण की कीमिया | रस विद्या है धातु निर्माण की कीमिया | ये सीधा ही परमात्मा के क्षेत्र में हस्तक्षेप है | यहाँ हम मनुष्य और धातु साथ ही तुलना करते हुए चलेंगे जिससे बात ठीक से समझ आ जाएगी | मनुष्य को अजर अमर करने से क्या अर्थ है ? जहां से मनुष्य के जन्म जन्मांतर तय होते हैं वहाँ जाकर परिवर्तन करना | मनुष्य के शरीर में जहां मनुष्य के कर्म संचित होते हैं | मैंने इसके लिए मनुष्य की hard drive शब्द प्रयोग किया था | जहां मनुष्य के वो कर्म संचित होते हैं जो तय करते हैं अगला जन्म और जीवन क्या कैसा होगा ? वहाँ परिवर्तन करना | अभ्रक दीर्घायु बनाता हैं | स्वर्ण रोग, वृद्धावस्था के कारकों को नष्ट करता है | लेकिन इन्हें वहाँ पहुंचाया कैसे जाएं जहां मनुष्य के कर्म संचित हैं ? इसके लिए पारे का प्रयोग किया गया | पारा, अभ्रक सत्व और स्वर्ण बीज को एक आत्मा बना दिया गया | पारे का स्वभाव है की वो केंद्र की ओर ही जाएगा | उसके घनत्व के कारण | बस उसे प्रोग्राम करना होता है |
इस बात को ठीक से समझना | महात्मा ये जानते हैं | मानते नहीं हैं जानते हैं | मनुष्य में एक से अधिक केंद्र होते हैं | एक बात को और यहाँ समझ लेते हैं रस विद्या मनुष्य, पेड़, पहाड़, और अन्य सभी जीवों, धातुओं को एक ही तरीके से समझते हैं | सभी के अंदर जैविक चेतना है | अगर जैविक चेतना नहीं होगी तो मरे हुए में परिवर्तन संभव नहीं होगा | तो धातु और मनुष्य दोनों को रस विद्या जैविक ही मानता है | दोनों में ही चेतना है यही कारण है उनमें परिवर्तन संभव हो पाता है | जिन लोगों में वनस्पतियों से पारा निकाला होगा उन्होंने पारे में जैविक चेतना देखी होगी | आप धातु मानना बंद कर देंगे | यही वजह है महात्मा पारे का मारण नहीं करते हैं | क्योंकि उसमें मनुष्य के समान ही चेतना है |
लेकिन विज्ञान में जिंदा और मरों के लिए अलग ही परिभाषा है | जो अपने समान संतान उत्पत्ति कर सके, जिनमें वृद्धि और विकास हो वो जीवित हैं | ये बड़ा फरक है | ये बड़ी वजह है विज्ञान सोना नहीं बना पाया है | जो कुछ भी वो कर रहे है वो नौटंकी ज्यादा है | लागत ज्यादा होती है | और हाथ भी कुछ नहीं आता है | मैं किसी धातु का चित्र दे दूंगा जिससे आपको रसायन विज्ञान का केंद्र समझ में आ जाएगा | बस अभी ये समझना है रसायन विज्ञान सतह पर है | इसे अभी लंबी यात्रा करनी होगी वास्तविक केंद्र को समझने के लिए | रसायन शास्त्र के केंद्र (nucleus) अलग है जिसमें न्यूट्रॉन, प्रोटॉन होते हैं | इलेक्ट्रॉन इस nucleus के चारों ओर चक्कर लगाते हैं | धातु का प्रत्येक टुकड़ा अणुओं से बना है | हर अणु परमाणुओं से बना है | परमाणु में केंद्र होता है | ये रसायन शास्त्र है | अब एक ताम्र के टुकड़े में लाखों परमाणुओं में केंद्र को कैसे locket करेंगे ? हर केंद्र में परिवर्तन करना होगा तब हर परमाणु स्वर्ण में बदलेगा | उसके बाद छोटा टुकड़ा स्वर्ण बनेगा |
रस विद्या ये मानती है किसी भी जीव के अंदर दो केंद्र होते हैं | हम मनुष्य का ही उदाहरण ले लेते हैं | प्रथम केंद्र है आत्मा जो सभी जीवों में होती है | इस आत्मा में कोई तरीके से परिवर्तन संभव ही नहीं है | बस ये जब अज्ञान से घिरी होती है तो जीव होती है और जब मुक्त होती है तब ब्रह्म होती है | तो मनुष्य के अंदर प्रथम केंद्र है आत्मा जो पूर्णतः अपरिवर्तनशील है | मनुष्य दो ही चीजों से मिलकर बना है प्रथम आत्मा दूसरा उसके ऊपर कर आवरण | इस आवरण को ही जीव कहते हैं |
जीव+आत्मा मिलकर बनती है जीवात्मा | यहाँ एक तो आत्मा केंद्र हो गई | सब आत्मा के ही चारों ओर घटित हो रहा है | लेकिन आत्मा जीव को संचालित नहीं करती है | बस एक अज्ञान का पिंजड़ा है | जिसमें आत्मा कैद है | दूसरा केंद्र हुआ जीव का | जीव जो कुछ भी करता है उसके जन्म जन्मांतर उसी से तय होते हैं | लेकिन आखिर ये कर्म जीव के अंदर कहीं तो संचित होते होंगे | इसे ही जीव का केंद्र कहा जाता है | यदि इसी जैविक केंद्र में कोई परिवर्तन कर दिया जाए तो समूल जीव बदल जाएगा | एक पापी मनुष्य महात्मा हो जाता है | रत्नाकर डाकू वाल्मीकि हो गया | ये आत्मा में परिवर्तन नहीं हुआ है | बल्कि ये जीव के अंदर के केंद्र में परिवर्तन हुआ है | क्योंकि वो मनुष्य शरीर अभी है | लेकिन बदल गया है | तंत्र, मंत्र, योग, ध्यान, ज्ञान ये सभी मनुष्य के जीव के केंद्र में घटित हो रहे हैं | तो परिवर्तन भी जैविक शरीर में ही होता है | ये जैविक शरीर का परिवर्तन ही कीमिया है | आपने कमल के फूल को गुलाब बना दिया ये कीमिया है | लेकिन ये घटित तो शरीर में हुई है |
तो शरीर के मूल केंद्र में जो भी घटित होता है उसका मौलिक केंद्र आत्मा से कुछ लेना देना नहीं होता है | तो एक केंद्र जीव के अंदर हुआ | दूसरा केंद्र स्वयं आत्मा है | ताम्र का स्वर्ण में परिवर्तन ये जैविक परिवर्तन है | बाहर या जगत में परिवर्तन हो रहा है | जगत में चीजें बदल रही हैं | लेकिन मौलिक केंद्र आत्मा स्थिर है | तो ताम्र का स्वर्ण बनाने के लिए ताम्र के जैविक केंद्र में परिवर्तन करना होता है | ये तत्व निर्माण की प्रक्रिया हिंदुओं में सनातन है | सिर्फ ताम्र, सीसा या चांदी से सोना नहीं बल्कि समूल प्रकृति में परिवर्तन का विज्ञान हमारे ऋषियों के पास था | यहाँ तक कि वो नया ब्रह्मांड भी बना सकते थे | कपालियों तो गंधक, नमक और पारे के माध्यम से शब्द बेध का पारा बना दिया था | शब्द ब्रह्म को कहा जाता है | नए ब्रह्मांड रचना का सूत्र है | तो हम केंद्र सनातन काल से ही जानते हैं | जगत और केंद्र ये तो हमेशा सत्संग का हिस्सा रहा है |
अब एक श्लोक से बात को समझते हैं | ये रस मंजरी से है मैं इसे हिन्दी में लिख देता हूँ | “पारद बंधन को धन्य है, क्योंकि ये मृत होकर पूरी पृथ्वी को प्राण दे सकता है | यह सिद्ध होकर पृथ्वी को जरा मरण से मुक्ति दे सकता है” | एक है जीव का बंधन जो नारकीय है | दूसरी ओर जब पारा बंधन में पड़ता है तब लगभग सभी रस ग्रंथों की यही परिभाषा है पारे को लेकर | मूर्छित होने पर रोगों को हरता है | बद्ध होने पर मुक्ति देता है, और भली भांति मृत होने पर मनुष्य को अजर अमर बना देता है | एक तरफ है जीव का बंधन | जहां हमेशा जीव को बंधन से मुक्त करने के लिए सैकड़ों विधान कहे गए हैं | वहीं ऋषि कहते हैं पारद को पहले आप बंधन में डालें तभी कोई कार्य सिद्धि संभव है | ये बात तो सिर्फ किसी जीवित के लिए ही कहा सकता है | तो पारे को धातु न मानते हुए ऋषि जैविक चेतना मानते हैं | जैसे मनुष्य एक जैविक चेतना है और आत्मा प्रथक है ठीक वैसे ही पारा भी है |
पारा वो जो बंधन में हैं | तो जगत है | और पारा वो जो स्वतंत्र है | जो स्वतंत्र पारा है वही शिव है | यही समझ हमारी अन्य धातुओं को लेकर भी है | यही वजह है हम धातुओं ठीक वैसे ही परिवर्तन कर पाते हैं जैसे मनुष्य के भीतर होता है | धातु और मनुष्य के अंदर का परिवर्तन अलग नहीं है बल्कि अलग परिस्थितियों में है | अगर ताम्र का स्वर्ण में, और स्वर्ण का प्लेटिनम में परिवर्तन होता है | यही तो सिद्धार्थ से बुद्ध और बुद्ध से ब्रह्म होने की प्रक्रिया है | तो सबसे पहले केंद्र का ज्ञान हमें सनातन काल से ही है तभी तो जगत, आत्मा और ब्रह्म हुआ जाता है | मनुष्य और धातु को रस विद्या एक ही दृष्टि से देखती है | इसीलिए रस विद्या में जो पारा बनाया गया वो लोह वेध और देह वेध के लिए एक ही था | एक तरह के पारे से धातु और मनुष्य दोनों के केंद्र में परिवर्तन किया गया है |
एक अन्य और उदाहरण को समझते हैं | “काष्ठ औषधियाँ सीसे में विलीन होती हैं, सीसा रांगे में विलीन होता है, राँगा ताम्र में विलीन होता है, ताम्र चांदी में विलीन होता है, चांदी स्वर्ण में विलय होती है | और स्वर्ण पारे में विलीन होता है” | जैसे योगीजन शिव में लय होकर मुक्ति को प्राप्त होते हैं | उसी प्रकार से अभ्रक भक्षी पारद में स्वर्ण आदि सभी धातुएँ विलय होती हैं | अतः जिस प्रकार से सभी प्राणी परमात्मा में विलय हो जाते हैं | उसी प्रकार से पारे में सभी धातुएँ विलय हो जाती हैं | इस दो उदाहरणों से ये बात तो समझ में आ जाती है कि पारे या अन्य धातुओं को लेकर रसाचार्यों की क्या समझ रही है | ये सभी सिद्ध पारे को पूर्णतयः चैतन्य तत्व मानते हैं | जो सब प्रकार के बंधन से मुक्त है वो पारा है |
आगे कहा गया है इसलिए जो भी योगी जीवन मुक्ति चाहते हैं वो पहले गंधक योग से पारे को बंधन में डालें | पारा शिव, गंधक पार्वती तत्व कहा गया है | ये तो दोनों ही केंद्र हैं | ये समझने जैसा है | शिव परमात्मा हैं पार्वती जगत हैं | तो परमात्मा तो स्वयं केंद्र है ही | पार्वती जगत हैं तो जगत का भी अपना एक केंद्र होगा ? क्योंकि परमात्मा जगत का संचालन नहीं करता है | जगत का अपना autonomous system है | लेकिन आखिर ये जगत भी तो कही से संचालित होगा | उसी को केंद्र कहा जाता है | तो एक तो परमात्मा केंद्र है ही | दूसरा जगत का अपना भी केंद्र हो गया | ये सिद्धांत काम करता है | पूरी रस विद्या का आधार यही है |
पारा याने मुक्त, पारा याने शिव, पारा याने परमात्मा | जो हमेशा अपरिवर्तनशील है | पारा ही क्यों कोई अन्य धातु क्यों नहीं | क्योंकि पारा स्वयं केंद्र है उसका बहाव हमेशा केंद्र की ओर ही होता है | ये जाएगा ही केंद्र की | तो इसे केंद्र ढूँढने में कोई दिक्कत नहीं होती है | जैसे पानी का स्वभाव है पानी नीचे की ओर बहेगा | नदी सागर से ही जाकर मिलेगी | नदी का स्वभाव है | वैसे ही पारे का स्वभाव है वो केंद्र की ओर ही बहेगा | यही कारण पारा ज्ञानियों, ध्यानियों, तांत्रिक, मंत्रिकों की प्रथम पसंद रहा है | अघोर पंथ, नाथ संप्रदाय में भी देखिए | मत्सेन्द्र नाथ, गोरखनाथ जैसों को | इन्हें सोने से क्या लेना देना ? लेकिन यहाँ भी पारा मिलेगा |
मनुष्य शरीर में कई केंद्र होते हैं | रस विद्यकारों या जिन्हें अजर अमर होना था, उन्होंने उस केंद्र को पकड़ा जहां मनुष्य के सभी कर्म संचित होते हैं | उसमें से जो नहीं चाहिये उसे नष्ट करना था और उपयोगी को जोड़ना था | ये तो कोई मुश्किल काम नहीं है | मुश्किल काम है उस जगह को सही तरह से locket करना | आखिर ये जगह मनुष्य शरीर में कहाँ है | और वहाँ तक कैसे पहुंचा जाए | तो बस पारे को प्रोग्राम करना है | पारे को प्रोग्राम करना आसान है | जिसमें रस सिद्ध सफल हुए | उसके बाद कई पंथों ने इस प्रयोग को अमल में लाया | ज्ञानियों के लिए मस्तिष्क केंद्र है | भक्ति मार्गी के लिए हृदय केंद्र है | तांत्रिक के लिए काम केंद्र है | नाथ संप्रदाय वालों के लिए endocrine ग्लैंड्स केंद्र हैं | बस पारे को प्रोग्राम किया पारा स्वयं ही वहाँ आवश्यक सामग्री लेकर पहुँच जाता है |
तो पारे को केंद्र ढूँढना नहीं है | बल्कि उलट कई बार इसकी दिशा रोकनी होती है | पहले से इसे प्रोग्राम करके बताना होता है कौन से केंद्र पर जाना है | यही बात रसचार्यों ने कहीं है पहले पारे को बंधन में डालो तभी कोई कार्य सिद्धि संभव है | अगर कोई आपके बंधन में है तो उससे जो चाहे सो करवा लेंगे | तो सभी अपनी जरूरत के अनुसार पारे को बंधन में डाल लेते हैं | किसी को आयुर्वेद करना है तो उसके लिए एक standard बना दिया गया है | पहले इसके अष्ट संस्कार करो | उसके बाद इससे औषधि निर्माण कर्म करना है | अगर किसी को धातु कीमिया करना है तो उस योग्य बंधन में डालना होगा |
प्रश्न है केंद्र में परिवर्तन कैसे | हजार साल पहले जो रस विद्या कार थे उन्होंने केंद्र शब्द का प्रयोग नहीं किया है | लेकिन उन्होंने जिस पारे को बनाने की विधि कीमिया के लिए कही है | वो काम करता है | इसे एक उदाहरण से समझते हैं | यदि पारे को षड्गुण अंतरधूम गंधक जारित कर दिया जाए तो | ये शतांश वेध करता है | यदि हजार गुना गंधक जारित करे तो ये सहस्रांश वेध करता है | इसी प्रकार से कोटी वेधी और शब्द वेधी पारा भी बनाया | थोड़ा दिमाग लगाइए | मैं पीछे विश्वामित्र द्वारा बनाए गए षड्गुण गंधक जारित रस सिंदूर को कह चुका हूँ | जिसमें साफ लिखा है | ये ताम्र, सीसे और चांदी में शतांश से वेध करता है | आप इससे क्या समझते हैं ? ये सभी calculated है | ये वैदिक गणित से calculated है | 99 ग्राम ताम्र पर 1 ग्राम पारद भस्म डालनी है |
इसका अर्थ है 99 ग्राम ताम्र में जितने भी परमाणु है उनके nucleus का वेध ये 1 ग्राम भस्म कर देगी | पारा केंद्र की ओर ही जाएगा | और प्रत्येक परमाणु का रंजन हो जाएगा | इसमें आपको केंद्र नहीं ढूँढना है | आपने जो पारा बनाया है वो केंद्र को ढूंढ ही लेगा | और पूरा गणित करके आपको पहले बता दिया गया है | कि 1 ग्राम पारा 99 ग्राम ताम्र एक सभी परमाणुओं को रंजित कर देगा | पुराने समय में कही रस ग्रंथों में केंद्र शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है | और अगर बता भी देते तो आप इसे किस प्रकार से ढूंढ पाते | एक ध्यानी पूरा जीवन लगा देता है अपने ही जीवन का केंद्र ढूँढने में | तो ऋषियों ने वो पारा बनाया जो स्वयं ही सीधा केंद्र तक पहुंचेगा | 999 ग्राम ताम्र पर 1 ग्राम से वेध या 9999 ग्राम ताम्र पर एक ग्राम पारे से वेध इसे अगले लेख में समझेंगे |
अभी मात्र इतना ही समझ लीजिए आत्मा यदि शुद्ध है तो शुद्ध आत्मा से ही मिलेगी | जैसे किसी के शरीर या सिर में दर्द है | आप paracetamol लेते हैं तो क्या होता है ? सिर दर्द ठीक हो गया लेकिन औषधि ने किया क्या ? कैसे औषधि को पता चला सिर कहाँ है इसमें दर्द कहाँ है | वो औषधि का काम है | शरीर के जिस हिस्से के लिए प्रोग्राम किया गया है वो वहीं जाकर काम करेगी | आपको इसके लिए अलग से कुछ नहीं करना होता है | अन्य सभी औषधियाँ भी ऐसी ही हैं | वो जहां के लिए बनाई गई हैं वही जाकर काम करती हैं |
ऐसे ही पारा भी बनाया जाता है | केंद्र रसायन शास्त्र ढूँढता है | रस विद्या में इसे ढूँढना नहीं है | क्योंकि जहां पारे को भेजना है वो जगह तो आँखों से देखा भी नहीं जा सकता है | और हजार साल पहले जब से पारा अजर अमर होने के लिए प्रयोग हो रहा है ?? तब क्या स्थिति रही होगी | कोई तकनीकी नहीं है आप आज भी नहीं देख सकते हैं मनुष्य के कर्म कहाँ संचित होते हैं | सारी जिंदगी ध्यान साधना करते निकल जाता है | इसीलिए फॉर्मूला शब्द प्रयोग किया जाता है | मंत्र भी एक फॉर्मूला है | गायत्री, पंचाक्षरी, गुरु मंत्र यही मंत्र क्यों जगत के बाहर ले जाते हैं | वशीकरण का अलग मंत्र, सरस्वती का अलग | ये सभी फॉर्मूले ही है कुछ पाने के लिए या कुछ खोने के लिए | रस विद्या सिर्फ पारे का विज्ञान है | रसायन शास्त्र में सभी धातुएँ, उपधातुएं आती हैं | ये बड़ा फर्क है |
साभार tatvmadrshi Facebook

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