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सोमवार, 25 अगस्त 2014

जापान करेगा इबोला का इलाज

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अफ्रीकी देशों में इबोला महामारी के बढ़ते संकट के बीच जापान ने कहा है कि उसने इबोला का इलाज ढूंढ निकाला है और विश्व स्वास्थ्य संगठन की मांग पर दवाएं मुहैया कराने के लिए तैयार है.



जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव योशिहिदे सूगा ने सोमवार को पत्रकारों से कहा कि कंपनी फुजीफिल्म होल्डिंग्स कॉरपोरेशन की एक शाखा ने इंफ्लुएंजा की दवा तैयार की है, जिसे इबोला के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. फैवीपीरावीर नाम की इस दवा को मार्च में ही जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने मंजूरी दे दी थी.
फुजीफिल्म के प्रवक्ता ताकाओ आओकी ने बताया कि इबोला और इंफ्लुएंजा एक ही तरह के वायरस से फैलते हैं, इसलिए दोनों वायरस पर इस दवा का असर दिख सकता है. उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला में चूहों पर टेस्ट किए जा चुके हैं और नतीजे सकारात्मक रहे हैं.
कंपनी का कहना है कि उसके पास 20,000 मरीजों के लिए दवा मौजूद है और वह डब्ल्यूएचओ के जवाब का इंतजार कर रही है. साथ ही कंपनी अमेरिका की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के साथ भी संपर्क साधे हुए है. फुजीफिल्म का कहना है कि डब्ल्यूएचओ के जवाब से पहले अगर लोगों ने निजी तौर पर दवा की मांग शुरू की, तो वह उसके लिए भी तैयार है.
हाल ही में अमेरिका में जेडमैप नाम की दवा से दो लोगों का इलाज हुआ है. इस दवा को सैन डिएगो मैप नाम की कंपनी ने विकसित किया है और यह अभी भी प्रयोग के स्तर पर ही इस्तेमाल की जा रही है. इसी तरह की कई दवाएं दुनिया भर में विकसित की जा रही हैं और इबोला के मामले में डब्ल्यूएचओ का कहना है कि लोगों की जान बचाने के लिए किसी भी तरह की एक्सपेरिमेंटल दवा का इस्तेमाल नैतिक है.
अफ्रीका में इबोला का प्रकोप सबसे ज्यादा देखा जा रहा है. इस साल यह खतरनाक वायरस 1,400 लोगों की जान ले चुका है.
आईबी/एमजे (एएफपी)

sabhar :DW.DE

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रविवार, 24 अगस्त 2014

एचआईवी का टीका बनाने के करीब पहुंचे वैज्ञानिक

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एचआईवी का टीका बनाने के करीब पहुंचे वैज्ञानिक

न्यूयॉर्क: शोधकर्ताओं ने विशेष एचआईवी एंटीबॉडिज (रोग-प्रतिकारक) के नए गुणों का खुलासा करने में सफलता पाई है, जिसे ब्रॉडली न्यूट्रालाइजिंग एंटीबॉडिज (बीएनए) कहा जाता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि इस खुलासे से हम एचआईवी का टीका बनाने के एक कदम और पास पहुंच गए हैं। बीएनए का विकास एचआईवी के टीके का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। एचआईवी से संक्रमित कुछ ही लोगों में बीएनए का निर्माण होता है। बीएनए की सहायता से टीका बनाना प्रमुख उद्देश्य है। इसकी सहायता से टीकाकरण के बाद वही सुरक्षा एचआईवी से मिलेगी, जैसा अन्य बीमारियों में टीकाकरण के बाद मिलता है।
अमरीका में बॉस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर थॉमस केप्लर ने कहा, इस परिणाम से स्पष्ट होता है कि बीएनए टीके का विकास संभव है। उल्लेखनीय है कि एंडिबॉडी प्रतिरक्षण बी कोशिकाओं से बनती है। जब बी कोशिकाएं किसी एंटीजेंस (रोगाणु) के संपर्क में आती है, तो उसकी रचना में परिवर्तन आ जाता है, जो एंटिजेंस के लिए घातक होता है। इस परिवर्तन को इंडेल" कहा जाता है।
शोधकर्ताओं ने एक विशेष बीएनए का अध्ययन किया, जिसे सीएच 31 कहते हैं। इसमें काफी ज्यादा मात्रा में इंडेल पाया गया। जिसका अर्थ है कि इसमें रोगाणुओं से लड़ने की असीम क्षमता है। इस प्रकार, सीएच 31 के विकास में इंडेल की महत्वपूर्ण भूमिका उजागर हुई। केप्लर ने कहा, सीएच31 की एचआईवी से लड़ने की क्षमता को आंका गया, तो पता चला कि वही सीएच 31 ऎसा कर पाने में सक्षम थे, जिनमें इंडेल मौजूद थे और अधिक मात्रा में थे।
एजेंसी 
sabhar :http://zeenews.india.com/

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ढूंढ़ने में मददगार कोशिका की खोज

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clip

इनसान के मस्तिष्क में एक ऐसी कोशिका होती है, जो उसे किसी अपरिचित माहौल में अपनी जानी-पहचानी चीजों को ढूंढ़ने में मदद करती है. वैज्ञानिकों ने इनसान के दिमाग में एक नये प्रकार की कोशिका को खोज निकाली है, जो इनसान की रुचि और उसके अनुकूल चीजों को ढूंढ़ने में उसकी मदद करता है. पेनसिलवालिया यूनिवर्सिटी, ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी, यूसीएलए और थॉमस जैफरसन यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम ने मिल कर यह खोज की है. साइंस डेली में छपी एक खबर में बताया गया है कि हम जब किसी अपरिचित माहौल में खुद की रुचि से जुड़ी चीजों को ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं तो इसमें ग्रिड सेल हमारी मदद करता है.
हमारे ढूंढ़ने का तरीका इसी सेल के व्यवहार पर निर्भर करता है. इस प्रकार से चीजों को ढूंढ़ने को विज्ञान की भाषा में पाथ नेविगेशन कहा जाता है. ड्रेक्सेल्स स्कूल ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, साइंस एंड हेल्थ सिस्टम्स में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर जोशुआ जैकब का कहना है कि ग्रिड पैटर्न के बारे में बताना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि यह दृढ़ होता है. इस रिसर्च के दौरान दिमाग की कई तरह से रिकॉर्डिग की गयी, जिसमें 14 भागीदारों को शामिल किया गया.
इसमें बहुत सी चीजों को छिपा कर रखा गया और वहां मौजूद लोगों से अपनी रुचि के मुताबिक चीजों को ढूंढ़ने के लिए कहा गया. इस दौरान इन लोगों के मस्तिष्क और उनकी कोशिकाओं को रिकॉर्ड किया गया. रिसर्च टीम ने अध्ययन किया कि चीजों को ढूंढ़ने के दौरान भागीदारों के न्यूरॉन की गतिविधि कैसी रही.sabhar :http://www.prabhatkhabar.com/

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बुधवार, 20 अगस्त 2014

रूसी वैज्ञानिकों ने गम्भीर रोगों के इलाज के लिए दुनिया का पहला 'स्मार्ट' नैनोकण

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रूसी वैज्ञानिकों ने गम्भीर रोगों के इलाज के लिए दुनिया का पहला 'स्मार्ट' नैनोकण

रूसी वैज्ञानिकों ने चिकित्सा के क्षेत्र में नैनोरोबोटों की खोज करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। ये नैनोरोबोट शरीर मेंजैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं का उपयोग कर रोग का ठीक-ठीक निदान कर सकेंगे। इस नई प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके रोगों केनिदान और गम्भीर रोगों के उपचार के नए तरीकों की खोज की जा सकेगी।


प्रोख़रोफ़ सामान्य भौतिकी संस्थान, शेम्याकिन और अवचेन्निकोफ़ जैव-आर्गेनिक रसायन संस्थान तथा मास्को के भौतिकी तकनीकी संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा मिलकर किए जा रहे इस अनुसन्धान की रिपोर्ट प्रमुख वैज्ञानिक पत्रिका ’नेचर नैनोटैक्नोलौजी’ में प्रकाशित हुई है।
अपने काम के बारे में बताते हुए वैज्ञानिकों ने लिखा है कि उनका यह अनुसन्धान जैवमोलेक्यूल की सहायता से बीमारी का पता लगाने के सिद्धान्त पर आधारित है। यदि इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में तार्किक तत्त्वों की मदद से करेण्ट के द्वारा या वोल्टेज़ के द्वारा क्रिया की जाती है तो जैव रासायनिक प्रणालियों में कोई ऐसा निश्चित तत्त्व सामने आएगा जो जैविक प्रणालियों पर उपचारात्मक प्रभाव दिखा सकता है। इस स्थिति में नैनोकणों की विशेष रूप से चयनित रचना बाहरी परत के माध्यम से कुछ निश्चित कार्यों को पूरा करेगी।
वैज्ञानिकों ने इन नैनोकणों को कैंसर कोशिकाओं के साथ लक्षित परिणाम प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल करके दिखाया। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इस अतिरिक्त नियंत्रण के फलस्वरूप स्वस्थ ऊतकों और अंगों पर कम से कम प्रभाव डालते हुए कैंसर की कोशिकाओं का अधिक सटीक रूप से विनाश किया जा सकेगा।

sabhar: http://hindi.ruvr.ru/


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दिमाग़ की उत्तेजना दिल के लिए फायदेमंद!

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मनुष्य का दिमाग

जेम्स गैलाघर
हेल्थ एडिटर, बीबीसी न्यूज़ वेबसाइट

दिमाग़ के एक हिस्से की उत्तेजना दिल के लिए फायदेमंद हो सकती है.
'प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंस' में प्रकाशित इस रिसर्च पेपर के अनुसार दिमाग़ का जो हिस्सा शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करता है, उसके उत्तेजित होने से दिल का दौरा पड़ने के बाद मरीज़ की हालत सुधर सकती है.

'द स्ट्रोक एसोसिएशन' ने कहा है कि रिसर्च से दिलचस्प नतीजे निकले हैं. देखा गया है कि दिल के दौरे से लोगों की याद्दाश्त चली जाती है, उनकी गतिविधियों और बातचीत करने की क्षमता पर भी असर पड़ता है.अध्ययन में चूहे के दिमाग़ पर तेज़ रोशनी डाली गई. ये चूहे उन जानवरों की तुलना में तेजी से दौड़ने लगे जिन पर यह प्रयोग नहीं आज़माया गया था.
ख़ून के थक्के से दिमाग़ की कोशिकाओं को ऑक्सीजन और शुगर की आपूर्ति बंद हो जाती है और वे कोशिकाएँ नष्ट होने लगती हैं. स्ट्रोक होने की सूरत में नुक़सान कम हो इसके लिए जल्द से जल्द इलाज ज़रूरी होता है.

उत्तेजना

मनुष्य का दिमाग
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन की रिसर्च टीम ने जानवरों पर परीक्षण करके इस बात का पता लगाने की कोशिश की कि क्या दिमाग़ को उत्तेजित करने से उनके दिल में कोई सुधार आता है या नहीं.
शोधकर्ताओं को ये विश्वास है कि उत्तेजना से होने वाला असर इस बात पर निर्भर करेगा कि दौरा पड़ने के बाद दिमाग़ में कितने अंदरूनी बदलाव होते हैं. उन्होंने मस्तिष्क की कोशिकाओं को जोड़ने वाले तरल पदार्थ का स्तर बढ़ा हुआ पाया.
रिसर्च टीम के लीडर प्रोफेसर गैरी स्टीनबर्ग ने कहा है कि दिल का दौरा पड़ने की स्थिति में मरीज के दिमाग की कोशिकाओं को बचाने के लिए दवा का चुनाव एक चुनौती था. sabhar :http://.bbc.co.uk/

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रविवार, 16 फ़रवरी 2014

नई क़िस्म की सूर्य-बैटरियों के निर्माण की तक्नोलौजी खोज ली गई

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नई क़िस्म की सूर्य-बैटरियों के निर्माण की तक्नोलौजी खोज ली गई

आस्ट्रेलिया की फ़्लींडेर्स यूनिवर्सिटी में प्लास्टिक लेमिनेशन करके लचीली सूर्य-बैटरियों के निर्माण की ऐसी नई तकनीक खोज ली गई

आस्ट्रेलिया की फ़्लींडेर्स यूनिवर्सिटी में प्लास्टिक लेमिनेशन करके लचीली सूर्य-बैटरियों के निर्माण की ऐसी नई तकनीक खोज ली गई है जो कहीं अधिक सस्ती है। इस आविष्कार से नई पर्यावरण शुद्ध ऊर्जा की ओर आगे बढ़ना आसान हो जाएगा।
हालाँकि प्लास्टिक की सूर्य-बैटरियों के क्षेत्र में पिछले पन्द्रह साल से अनुसंधान किए जा रहे हैं, लेकिन फिर भी इस दिशा में आजकल उपयोग में लाई जा रही तकनीक बड़ी महँगी पड़ती है। परम्परागत् रूप से प्लास्टिक पैनल बनाने की तकनीक में एक के बाद एक विभिन्न सामग्रियों की परतें एक-दूसरे के ऊपर चढ़ाई जाती हैं। लेकिन समय के साथ-साथ ये सामग्रियाँ घिस जाती हैं और सूर्य-बैटरियाँ काम करना बन्द कर देती हैं।
नई तकनीक के अनुसार दो विद्युत-संचरण परतों पर विभिन्न सामग्रियों की परत चढ़ाने के बाद ऊपर से उस पर प्लास्टिक लेमिनेशन किया जा सकेगा। इस लेमिनेशन के फलस्वरूप सामग्रियों का घिसना और आपस में मिलना रूक जाएगा और सूर्य-बैटरी कहीं अधिक कुशलता से काम कर सकेगी।
लेमिनेशन का यह काम प्रिंटिंग मशीन से भी किया जा सकेगा। इससे बड़े पैमाने पर जल्दी काम करना संभव होगा और सूर्य-बैटरियों की लागत-क़ीमत भी बहुत कम हो जाएगी। sabhar http://hindi.ruvr.ru/

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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

कृत्रिम हाथ असली हाथ जैसा

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 रोम. किसी दुर्घटना में अपना हाथ गंवा चुके लोगों के लिए वैज्ञानिक एक खुशखबरी लाए हैं. शोधकर्ताओं ने एक ऐसा कृत्रिम हाथ बनाने में कामयाबी हासिल करली हैं जो काफी कुछ असली हाथ जैसा हैं. यानि यह कृत्रिम हाथ चीज़ों को पकड़ने के साथ-साथ उन्हें महसूस भी कर सकेगा. यूरोपीय शोधकर्ताओं ने अपनी इस सफलता की घोषणा करते हुए कहा है कि पहली बार एक बायोनिक हाथ के जरिए एक व्यक्ति मुट्ठी में पकड़ी गई चीज की बनावट और आकार समझने में कामयाब रहा है. यानी कृत्रिम हाथ भी अब महसूस करने में मदद कर सकेगा. इटली में बायोनिक हाथ पर एक महीने तक ट्रायल चला. इस कामयाबी ने शोधकर्ताओं में नया जोश भर दिया है.
अब तक कृत्रिम हाथ का इस्तेमाल करने वाले को वस्तु के पकड़े जाने का कोई एहसास नहीं होता था. साथ ही कृत्रिम हाथ को नियंत्रित करना मुश्किल होता है, मतलब यह कि कृत्रिम हाथ का इस्तेमाल करने वाला वस्तु को पकड़ने की कोशिश में उसे नुकसान पहुंचा सकता है.
शोध में शामिल सिलवेस्ट्रो मिचेरा के मुताबिक, जब हमने ये कृत्रिम हाथ सेंसर की मदद से उस व्यक्ति के हाथ पर लगाया तो हम उस हाथ में अहसास उसी समय बहाल कर सके और वह अपने बायोनिक हाथ को नियंत्रित भी कर पा रहा था. इस शोध का नेतृत्व मिचेरा और स्टानिसा रास्पोविच ने किया है.
डेनमार्क के 36 वर्षीय डेनिस आबो सोरेंसन पर इसका ट्रायल किया गया, सोरेंसन पटाखे से जुड़ी एक दुर्घटना में अपना बायां हाथ खो चुके हैं. सोरेंसन के मुताबिक, जब मैंने वस्तु पकड़ी, मैं यह महसूस कर सकता था कि वह मुलायम है या कठोर, गोल है या चौकोर. पिछले 9 सालों में जिन चीजों को मैं महसूस नहीं कर पाया था उसे अब मैंने महसूस किया.
सोरेंसन की बाजू पर भारी मैकेनिकल हाथ लगाया गया है, जिसकी उंगलियों में बहुत सारे एडवांस सेंसर लगे हुए हैं. हाथ के ऊपरी हिस्से में सर्जरी के जरिए कई तार लगाए गए हैं जो सेंसर के जरिए वहां तक सिगनल पहुंचाते हैं. पिछले एक दशक में सोरेंसन की नसों का इस्तेमाल नहीं हुआ था इसके बावजूद वैज्ञानिक सोरेंसन के छूने की भावना को दोबारा सक्रिय करने में कामयाब रहे.
रोम के जमेली अस्पताल में पिछले साल इसका ट्रायल किया गया. इस दौरान सोरेंसन की आंखों में पट्टी बांधी गई और कानों में इयरप्लग्स लगाए गए. ट्रायल के दौरान सोरेंसन नारंगी और बेसबॉल के बीच फर्क बता पाए. वह यह भी बताने के लायक थे कि वह मुलायम चीज पकड़े हुए हैं या कोई कठोर वस्तु या फिर प्लास्टिक की कोई चीज.
सोरेंसन मजाक करते हैं कि जब उनके बच्चों ने उन्हें बहुत सारे वायरों के साथ देखा तो उन्हें द केबल गाय कहकर बुलाने लगे. सुरक्षा कारणों की वजह से सोरेंसन में किया गया प्रत्यारोपण 30 दिन के बाद हटा लिया गया. लेकिन जानकारों का मानना है कि इलेक्ट्रोड्स बिना किसी परेशानी के कई साल शरीर में रह सकते हैं. इस मामले में और अधिक परीक्षण चल रहे हैं. शोधकर्ता कृत्रिम हाथ की संवेदी क्षमताओं को बढ़ाने और उसे पोर्टेबल बनाने के लिए काम कर रहे हैं.
इस बीच सोरेंसन अपना पुराना कृत्रिम हाथ का इस्तेमाल करने लगे हैं. बांह की मांसपेशियों को खींचने या फिर छोड़ने पर कृत्रिम हाथ हरकत करता है लेकिन वह चीजों को महसूस करने की इजाजत नहीं देता. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि बायोनिक हाथ पर और शोध करने से लाभकारी परिणाम मिल सकते हैं और कृत्रिम हाथ इस्तेमाल करने के लिए मजबूर लोगों के लिए नई उम्मीद जगेगी./
यह पहली बार हुआ है जब किसी विकलांग को नकली हाथ में संवेदना का एहसास हुआ है"
प्रोफ़ेसर सिल्वेस्त्रो मिकेरा
इटली में डेनमार्क के एक व्यक्ति को सर्जरी के बाद ऐसा हाथ लगाया गया है जो उसकी बाजू के ऊपरी हिस्से की नसों से जुड़ा है.
प्रयोगशाला में हुए परीक्षण में उन्हें आंख पर पट्टी बांधकर चीजें थमाई गईं और इस हाथ की मदद से वह इन चीजों के आकार और कड़ेपन को जानने में सफल रहे.डेनिस आबो ने एक दशक पहले आतिशबाज़ी में अपना हाथ गंवा दिया था. उन्होंने इस बायोनिक हाथ को 'अद्भुत' बताया है.
इस बारे में साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन ने विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है.
एक अंतरराष्ट्रीय दल ने इस शोध परियोजना में हिस्सा लिया था, जिसमें इटली, स्विटरज़रलैंड और जर्मनी के रोबोटिक्स विशेषज्ञ शामिल थे.

परियोजना

"इकोल पॉलीटेक्नीक फ़ेडेरेल डी लुसाने और स्कूओला सुपीरिओर सेंट अन्ना, पीसा के प्रोफ़ेसर सिल्वेस्त्रो मिकेरा ने कहा, "यह पहली बार हुआ है जब किसी विकलांग को नकली हाथ में संवेदना का अहसास हुआ है."स बायोनिक हाथ में न केवल एडवांस वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है बल्कि ऐसे इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर लगाए गए हैं जो मस्तिष्क को संदेश भेजते हैं.
मिकेरा और उनकी टीम ने इस कृत्रिम हाथ में ऐसे संवेदक लगाए जो किसी चीज को छूने पर उसके बारे में सूचना देते हैं.
कम्प्यूटर एल्गोरिदम के इस्तेमाल से वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रिकल संकेतों को एक ऐसी उत्तेजना में बदला जिसे संवेदी तंत्रिकाएं समझ सकें.
रोम में ऑपरेशन के दौरान मरीज़ के बाजू के ऊपरी हिस्से की तंत्रिकाओं में चार इलेक्ट्रोड जोड़े गए. ये इलेक्ट्रोड कृत्रिम हाथ की उंगलियों के संवेदकों से जुड़े थे जो छूने और दवाब के फीडबैक को सीधे मस्तिष्क को भेजते हैं.

प्रयोगशाला

कृत्रिम हाथ
36 साल के आबो ने एक महीने प्रयोगशाला में बिताए. प्रयोगशाला में पहले तो इस बात की जाँच की गई कि इलेक्ट्रोड काम कर रहे हैं या नहीं. फिर यह देखा गया कि ये बायोनिक हाथ से पूरी तरह जुड़े हैं या नहीं.
उन्होंने कहा, "मज़ेदार बात यह है कि इसके सहारे मैं मुझे बिना देखे ही छूने से चीज़ों का अहसास हो जाता है. मैं अंधेरे में भी इसका इस्तेमाल कर सकता हूं."
यह बायोनिक हाथ अभी शुरुआती चरण में है और सुरक्षा कारणों से आबो का एक और ऑपरेशन करना पड़ा ताकि संवेदकों को हटाया जा सके.
बायोनिक हाथ को विकसित करने वाली टीम अब इस प्रयास में जुटी है कि इसे छोटा कैसे बनाया जाए ताकि इसे घर में इस्तेमाल किया जा सके.
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस हाथ के व्यावसायिक इस्तेमाल में एक दशक तक का समय लग सकता है. उनका कहना है कि इससे भविष्य में कृत्रिम अंगों का रास्ता साफ़ होगा जो वस्तुओं और तापमान का पता बता सकेंगे.

बहरहाल आबो को उनका पुराना कृत्रिम हाथ मिल गया है और वह भविष्य में इसे बायोनिक हाथ से बदलने को तैयार हैं. sabhar :http://www.bbc.co.uk/   sabhar :http://www.palpalindia.com

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चांद पर एलियन्स

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लंदन. गूगल मैप के जरिये एक शोधकर्ता ने चंद्रमा की सतह का अध्ययन किया तो अचानक उसे चंद्रमा की सतह पर ऐसा रहस्यमय त्रिकोणीय स्पेसशिप के दिखाई दिया, जो एलियन्स के स्पेसशिप जैसा दिखता है.
शोधकर्ता ने अपने इस वीडियो को ऑनलाइन खोज को प्रोत्साहित करने के लिए यूट्यूब पर wowforreel के नाम से पोस्ट किया है. यूट्यूब पर पोस्ट किए अपने वर्णन में इस शोधकर्ता ने कहा है कि आज तक एलियन्स के संदर्भ में हुई यह खोज अद्वितीय और अद्भुत है.
शोधार्थी ने दावा किया कि उसे चंद्रमा पर दिखाई देने वाला त्रिकोणीय स्पेसशिप बिलकुल सुपर सीक्रेट स्टेल्ट एयरक्राफ्ट की उस टेक्नोलॉजी के समान था, जिसका दावा टेक एंड गेजेट्स न्यूज में किया जाता है. हालांकि उसने यह भी कहा कि चंद्रमा पर दिखाई देने वाली आकृति धरती पर बने अब तक के सबसे बड़े एयरक्राफ्ट से कई गुणा बड़ी है.sabhar :http://www.palpalindia.com/

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अब चंद घंटों में बना लीजिए घर

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 आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिस मकान को बनने में ना जाने कितना-कितना समय लग जाता है इस नई वैज्ञानिक क्रांति के बाद वह महज 24 घंटों में ही बनकर तैयार हो जाएगा. दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से संबद्ध प्रोफेसर बाहरोख खॉसनेविस के दल ने एक ऐसे जाइंट 3डी प्रिंटर का निर्माण किया है जो 2,500 स्क्वैर फुट के मकान का निर्माण महज 24 घंटों में कर पाने में सक्षम है. बाहरोख का कहना है कि इस प्रिंटर के जरिए आप परत दर परत एक घर का निर्माण कर सकते हैं और वो भी मात्र एक दिन में. इतना ही नहीं प्रोफेसर बाहरोख का यह भी दावा है कि इस 3डी प्रिंटर की सहायता से ना सिर्फ एक घर बल्कि आप कॉलोनी भी बसा सकते हैं. इसके अलावा प्रोफेसर का यह भी दावा है कि इससे अलग - अलग डिजाइन और स्ट्रक्चर के मकान भी बनाए जा सकते हैं.
अत्याधिक नवीन तकनीक के साथ निर्मित हुआ यह 3डी प्रिंटर एक ऐसी क्रांति कहा जा सकता है जिसके बारे में कुछ वर्षों पहले तक सोचा भी नहीं जा सकता था. अगर यह 3डी प्रिंटर इन सब दावों पर खरा उतरता है तो आपातकाल के समय निवास स्थानों का निर्माण किया जा सकता है और वो भी अपेक्षाकृत कम खर्च के 
sabhar :http://www.palpalindia.com/

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सोमवार, 20 जनवरी 2014

नासा ने ली हैंड ऑफ गॉड की तस्वीर

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यूएस स्पेस एजेंसी नासा के न्युक्लियर स्पेक्ट्रोस्कोफिक टेलिस्कोप एरे ने पल्सर विंड नेबुला जिसे हैंड ऑफ गॉड के नाम से भी जाना जाता है की नई तस्वीर ली है.
टेलिस्कोप से ली गई इस तस्वीर में नेबुला को दिखाया गया है जो कि 17,888 लाइट-ईयर्स दूर है. इसे एक मृत स्पिनिंग स्टार ने रोशनी दी है जिसका नाम है पीएसआर 1509-58 इस पल्सर की कुल लम्बाई19 किलोमीटर है लेकिन यह हर एक सैकंड में सात बार घूमता है. जैसे ही यह स्पिन होता है यह उन कणों को फैंकता है जो स्टार की मृत्यु के दौरान उछले थे. यह कण मैगनेटिक फील्ड से जाकर मिलते हैं जिससे एक्स-रे में ग्लो आ जाता है.
नासा के लिए इस ऑबजेक्ट को घेरे हुए सबसे बड़ी रहस्यमय बात यह है क्या यह पल्सर के कण चीजों के साथ मिलने के बाद ऎसे दिखाई देता है या फिर यह वास्तव में हाथ का आकार ही है.
नूसटार ने पहली बार इस चित्र को हाई एनेर्जी एक्स रे में खींचा है जो कि नीले रंग में दिखाई दे रहा है. नासा के चंद्रा एक्स-रे ऑब्जरवेट्री द्वारा पहले ली गई इमेज लोअर एनर्जी एक्स र-रे में ली गई है जो कि हरे और लाल रंग में दिखाई गई है.sabhar :http://www.palpalindia.com/

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नौकरियां छीन लेंगे क्या रोबोट

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रोबोटअगर आपको डर लगता है कि रोबोटों का वक़्त आने वाला है तो डरने की ज़रूरत नहीं. वो पहले से ही हमारे बीच मौजूद हैं.

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के प्रतिनिधि पहले ही हमारी ज़िंदगी के हर पहलू में शामिल हैं- वह हमारे इनबॉक्स को स्पैम मुक्त रखते हैं, वह इंटरनेट के प्रयोग में मदद करते हैं, वह हमारे हवाई जहाज़ चलाते हैं और अगर गूगल को सफ़लता मिली तो जल्द ही वे हमारे लिए हमारी गाड़ियां भी चलाएंगे.
सिलिकॉन वैली के सिंगुलैरिटी विश्वविद्यालय में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के प्रमुख, नील जैकबस्टीन ने बीबीसी से कहा, "आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बसी हुई है."
वे कहते हैं, "इसका इस्तेमाल दवाइयों, कानून, डिज़ाइन बनाने में और पूरी तरह स्वचालित उद्योग में होता है."
और हर दिन अल्गोरिद्म पहले से ज़्यादा चतुर होती जा रही है.
इसका मतलब यह है कि आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी चाहत- ऐसी मशीन की खोज, जो इंसानों जितनी ही बुद्धिमान हो- पूरा होने के बेहद करीब हो सकती है.
जैकबस्टीन का अनुमान है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस 2020 के दशक के मध्य तक इंसानी बुद्धिमत्ता से आगे निकल जाएगी. लेकिन इससे सवाल उठता है- मशीनी बुद्धि के प्रभाव वाला समाज कैसा होगा और हमारी इसमें भूमिका क्या होगी?

रोबोट नौकरियां चुराएंगे?

वैसे शुरुआत में हमें थोड़ा ठहर कर देखना होगा.
दुनिया की सबसे बड़ी कॉन्ट्रैक्ट इलेक्ट्रॉनिक निर्माता, चीनी कंपनी हॉन हाए ने ऐलान किया है कि वह एक रोबॉट बनाने वाली फ़ैक्ट्री बनाएगी और अगले तीन साल में पाँच लाख कर्मचारियों की जगह रोबोट ले लेंगे.
रोबोट
लेकिन नौकरी नहीं रहने का मतलब होगा पगार का न मिलना और ऐसे समाज के लिए यह बहुत बड़ी बात होगी जो अपना जीवन चलाने के लिए पगार पर निर्भर रहने का आदी है.
जैकबस्टीन कहते हैं, "आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से उल्लेखनीय रूप से बेरोज़गारी बढ़ेगी लेकिन यह ग़रीबी के बराबर नहीं होगी."
जैकबस्टीन भी मानते हैं, "आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और तेज़ी से विकसित हो रही दूसरी तकनीकों से भारी मात्रा में संपत्ति पैदा होगी. हमें उसके बंटवारे को लेकर अपने सामाजिक ताने-बाने को बदलने को तैयार होना होगा."
वह उम्मीद ज़ाहिर करते हैं कि इंसान और मशीन पूरी तरह शांति से एक दूसरे के साथ मिलकर काम करेंगे.
वह कहते हैं, "किसी भी समस्या के समाधान का सबसे अच्छा तरीका होगा कि उसे एक इंसान और एक कंप्यूटर एक साथ मिलकर हल करें."
"विकसित रूप में, एआई अणु के विखंडन से भी ज़्यादा ख़तरनाक और विस्फ़ोटक हो जाएगी. अभी से ही स्वायत्त ड्रोन और लड़ाई में काम आने वाले रोबोट्स के रूप में इसका हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है."
जेम्स बैरेट, लेखक और डॉक्यूमेंट्री-निर्माता
लेखक और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता जेम्स बैरेट आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बारे में बिल्कुल अलग राय रखते हैं. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के घातक हमले के बारे में वह इतने चिंतित हैं कि उन्होंने इस पर एक किताब लिख डाली है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव का मतलब है मनुष्य के प्रभुत्व का ख़त्म हो जाना.

इंसान जैसे रोबोट

बैरेट ने बीबीसी से कहा, "विकसित आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एक दोनों तरह से इस्तेमाल होने वाली तकनीक है, अणु के विखंडन की तरह. यह शहरों को प्रकाश भी दे सकती है और उन्हें भस्म भी कर सकती है. विकसित रूप में, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस अणु के विखंडन से भी ज़्यादा ख़तरनाक और विस्फ़ोटक हो जाएगी. अभी से ही स्वायत्त ड्रोन और लड़ाई में काम आने वाले रोबोट्स के रूप में इसका हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है."
वह कहते हैं, "किसी भी अन्य विज्ञान से ज़्यादा यह हमें अपने अंदर झांकने को कहती है- वे चीज़ें क्या हैं जिन्हें हम बुद्धिमत्ता, अंतरआत्मा, भावनाएं कहते हैं? लेकिन अपने अंदर झांककर हम अतार्किक हिंसा, तकनीकी लापरवाही के प्रति अपने झुकाव को बेहतर ढंग से देख पाते हैं."
अगर पेंटागन के शोध विभाग डार्पा की दिसंबर में आयोजित प्रतियोगिता के आधार पर देखें तो रोबोटिक क्रांति अभी काफ़ी दूर है.
ऑनलाइन पोस्ट किए गए वीडियो से दिखता है कि रोबोट इंसानों से बहुत धीमे हैं, अक्सर अपने पैरों पर संतुलन बनाए रखने में नाकाम रहे और कुछ तो किसी भी चुनौती को पूरा नहीं कर पाए.
यकीनन रोबोटों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर एक तरह की अतिउत्सुकता है. गूगल ने हाल ही में आठ रोबोटिक कंपनियों को ख़रीदा है तो फ़ेसबुक की अपनी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस प्रयोगशाला है.
गूगल रोबोट
कयास इस बात को लेकर लग रहे हैं कि गूगल अपने अधिग्रहणों से क्या करना चाहता है.
बैरेट को लगता है कि गूगल रोबोट बहुत शानदार हो सकते हैं.
वह कहते हैं, "इंसान के स्तर की बुद्धिमत्ता तक पहुंचने का एक रास्ता है. एक उच्च स्तर का निजी सहायक जो सिर्फ़ एक स्मार्टफ़ोन नहीं होगा- बल्कि इसका एक इंसान जैसा शरीर भी होगा. इंसान के जैसा क्यों? ताकि यह आपकी गाड़ी चला सके, आपके उपकरणों का इस्तेमाल कर सके, बच्चे को खिला सके और ज़रूरत पड़े तो आपके बॉडीगार्ड का भी काम करे."

रोबोटों से मुकाबला

अगर रोबोट्स का उभरना अपरिहार्य है- हालांकि इसमें कुछ साल की देरी है- तो फिर यह भी तार्किक है कि इंसान अंततः फ़ैसले लेने की प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे, मतलब यह कि कृत्रिम बुद्धिमान उपकरण ही दूसरे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को नियंत्रित करेंगे.
जैकबस्टीन कहते हैं कि हमारे लैपटॉप और कंप्यूटर में यही हो रहा है.
दिमाग में सिलकॉन
रोबोट का मुकाबला करने के लिए इंसान को उनके जैसा बनना होगा.
वह कहते हैं, "एंटी वायरस सॉफ़्टवेयर दरअसल एक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक है जो दूसरे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, जिन्हें हम वायरस और वॉर्म्स कहते हैं, उन्हें ढूंढने के लिए इस्तेमाल की जाती है."
वे कहते हैं, "हमें रोबोट्स को नियंत्रण में रखने के लिए उसी तरह की कई परत वाली प्रणाली तैयार करनी होगी जैसी कि इंसानों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में है. हम ख़तरों पर नज़र रखना और ऐसी प्रणाली तैयार करना चाहते हैं जो ग़लत व्यवहार को रोके."
जैकबस्टीन रोबोटों के कब्ज़ा करने को लेकर आशान्वित हैं लेकिन वह यह भी जानते हैं बहुत से इसे एक बुरे सपने की तरह देखते हैं.
वह कहते हैं, "कुछ लोग पूछते हैं, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की संभावनाओं को जानने के बाद भी आप रात को सो कैसे सकते हैं? लेकिन मैं रातों को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की वजह से नहीं इंसानी मूर्खताओं की वजह से जगा रहता हूं."
उनके हिसाब से इंसान रोबोटों के साथ तभी मुकाबले में बना रहेगा जब वह उनकी तरह हो जाए.
वह कहते हैं, "हमारे दिमाग में करीब 50,000 साल से कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है और अगर लैपटॉप या स्मार्टफ़ोन में पांच साल में कोई अपग्रेड नहीं होता तो आपको उनके बारे में चिंता होने लगती है."

हमारे पास अब भी सिरी और गूगल नाउ जैसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता है और वह हमारे स्मार्टफ़ोन के ज़रिए लगातार वेब से कनेक्ट रहती है तो यह कल्पना करना बहुत बड़ी बात नहीं होगी कि भविष्य में हमारी खोपड़ी में भी सिलिकॉन लगाए जाएंगे.
और यही अकेला तरीका है रोबोटों से मुकाबला करने का. sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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