सोमवार, 17 मई 2021
रविवार, 16 मई 2021
अर्जुन के फायदे
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मई 16, 2021 in
अर्जुन के फायदे
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1. हृदय के रोग : अर्जुन की मोटी छाल का महीन चूर्ण एक चम्मच की मात्रा में मलाई रहित एक कप दूध के साथ सुबह-शाम नियमित सेवन करते रहने से हृदय के समस्त रोगों में लाभ मिलता है, हृदय की बढ़ी हुई धड़कन सामान्य होती है।
2. हड्डी टूटने पर :अर्जुन के पेड़ के पाउडर की फंकी लेकर दूध पीने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है। चूर्ण को पानी के साथ पीसकर लेप करने से भी दर्द में आराम मिलता है।
3. जलने पर : आग से जलने पर उत्पन्न घाव पर अर्जुन की छाल के चूर्ण को लगाने से घाव जल्द ही भर जाता है।
4. खूनी प्रदर : इसकी छाल का 1 चम्मच चूर्ण, 1 कप दूध में उबालकर पकाएं, आधा शेष रहने पर थोड़ी मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करें, इसे दिन में 3 बार लें।
5. शारीरिक दुर्गंध को दूर करने के लिए : अर्जुन और जामुन के सूखे पत्तों का चूर्ण उबटन की तरह लगाकर कुछ समय बाद नहाने से अधिक पसीना आने के कारण उत्पन्न शारीरिक दुर्गंध दूर होगी।
6. मुंह के छाले : अर्जुन की छाल के चूर्ण को नारियल के तेल में मिलाकर छालों पर लगायें। इससे मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं।
7. पेशाब में धातु का आना : अर्जुन की छाल का 40 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिए।
8. ताकत को बढ़ाने के लिए : अर्जुन बलकारक है तथा अपने लवण-खनिजों के कारण हृदय की मांसपेशियों को सशक्त बनाता है। दूध तथा गुड़, चीनी आदि के साथ जो अर्जुन की छाल का पाउडर नियमित रूप से लेता है, उसे हृदय रोग, जीर्ण ज्वर, रक्त-पित्त कभी नहीं सताते और वह चिरंजीवी होता है।
9. श्वेतप्रदर : महिलाओं में होने वाले श्वेतप्रदर तथा पेशाब की जलन को रोकना भी इसके विशेष गुणों में है।
10. पुरानी खांसी : छाती में जलन, पुरानी खांसी आदि को रोकने में यह सक्षम है।
11. हार्ट फेल : हार्ट फेल और हृदयशूल में अर्जुन की 3 से 6 ग्राम छाल दूध में उबालकर लें।
12. तेज धड़कन, दर्द, घबराहट : अर्जुन की पिसी छाल 2 चम्मच, 1 गिलास दूध, 2 गिलास पानी मिलाकर इतना उबालें कि केवल दूध ही बचे, पानी सारा जल जाये। इसमें दो चम्मच चीनी मिलाकर छानकर नित्य एक बार हृदय रोगी को पिलायें। हृदय सम्बंधी रोगों में लाभ होगा। शरीर ताकतवर होगा।
13. पेट दर्द : आधा चम्मच अर्जुन की छाल, जरा-सी भुनी-पिसी हींग और स्वादानुसार नमक मिलाकर सुबह-शाम गर्म पानी के साथ फंकी लेने से पेट के दर्द, गुर्दे का दर्द और पेट की जलन में लाभ होता है।
14. पीलिया : आधा चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण जरा-सा घी में मिलाकर रोजाना सुबह और शाम लेना चाहिए।
15. मुखपाक (मुंह के छाले) : अर्जुन की जड़ के चूर्ण में मीठा तेल मिलाकर गर्म पानी से कुल्ले करने से मुखपाक मिटता है।
16. कान का दर्द : अर्जुन के पत्तों का 3-4 बूंद रस कान में डालने से कान का दर्द मिटता है।
17. मुंह की झांइयां : इसकी छाल पीसकर, शहद मिलाकर लेप करने से मुंह की झाइयां मिटती हैं।
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नोट - ऊपर बताये गए उपाय और नुस्खे आपकी जानकारी के लिए है। कोई भी उपाय और दवा प्रयोग करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह जरुर ले और उपचार का तरीका विस्तार में जाने।
#HariomHealth
बुधवार, 12 मई 2021
गिलोय एक वरदान है
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मई 12, 2021 in
गिलोय के रूप में प्रकृति ने हमें ऐसा वरदान दिया है, जिससे न सिर्फ कोविड वायरस के प्रकोप से बचा जा सकता है, बल्कि शरीर में होने वाले विभिन्न रोगों में भी यह औषधि आश्चर्यजनक फायदा देती है
#गिलोय एक ही ऐसी बेल है, जिसे आप सौ मर्ज की एक दवा कह सकते हैं। इसलिए इसे संस्कृत में अमृता नाम दिया गया है।
मान्यता है कि देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला और इस अमृत की बूंदें जहां-जहां छलकीं, वहां-वहां गिलोय की उत्पत्ति हुई।
#इसका वानस्पिक नाम( Botanical name) टीनोस्पोरा कॉर्डीफोलिया (tinospora cordifolia है। इसके पत्ते पान के पत्ते जैसे दिखाई देते हैं और जिस पौधे पर यह चढ़ जाती है, उसे मरने नहीं देती। इसके बहुत सारे लाभ आयुर्वेद में बताए गए हैं, जो न केवल
आपको सेहतमंद रखते हैं, बल्कि आपकी सुंदरता को भी निखारते हैं।
#गिलोय बढ़ाती है रोग प्रतिरोधक क्षमता
गिलोय एक ऐसी बेल है, जो व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर उसे बीमारियों से दूर रखती है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो शरीर में से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करते हैं। यह खून को साफ करती है, बैक्टीरिया से लड़ती है। लिवर और किडनी की अच्छी देखभाल भी गिलोय के बहुत सारे कामों में से एक है। ये दोनों ही अंग खून को साफ करने का काम करते हैं।
#ठीक करती है बुखार
अगर किसी को बार-बार बुखार आता है तो उसे गिलोय का सेवन करना चाहिए। गिलोय हर तरह के बुखार से लडऩे में मदद करती है। इसलिए डेंगू के मरीजों को भी गिलोय के सेवन की सलाह दी जाती है। डेंगू के अलावा मलेरिया, स्वाइन फ्लू में आने वाले बुखार से भी गिलोय छुटकारा दिलाती है।
#गिलोय के फायदे – डायबिटीज के रोगियों के लिए
गिलोय एक हाइपोग्लाइसेमिक एजेंट है यानी यह खून में शर्करा की मात्रा को कम करती है। इसलिए इसके सेवन से खून में शर्करा की मात्रा कम हो जाती है, जिसका फायदा टाइप टू डायबिटीज के मरीजों को होता है।
#पाचन शक्ति बढ़ाती है
यह बेल पाचन तंत्र के सारे कामों को भली-भांति संचालित करती है और भोजन के पचने की प्रक्रिया में मदद कती है। इससे व्यक्ति कब्ज और पेट की दूसरी गड़बडिय़ों से बचा रहता है।
#बढ़ाती है आंखों की रोशनी
गिलोय को पलकों के ऊपर लगाने पर आंखों की रोशनी बढ़ती है। इसके लिए आपको गिलोय पाउडर को पानी में गर्म करना होगा। जब पानी अच्छी तरह से ठंडा हो जाए तो इसे पलकों के ऊपर लगाएं।
#अस्थमा में भी फायदेमंद
मौसम के परिवर्तन पर खासकर सर्दियों में अस्थमा को मरीजों को काफी परेशानी होती है। ऐसे में अस्थमा के मरीजों को नियमित रूप से गिलोय की मोटी डंडी चबानी चाहिए या उसका जूस पीना चाहिए। इससे उन्हें काफी आराम मिलेगा।
#गठिया में मिलेगा आराम
गठिया यानी आर्थराइटिस में न केवल जोड़ों में दर्द होता है, बल्कि चलने-फिरने में भी परेशानी होती है। गिलोय में एंटी आर्थराइटिक गुण होते हैं, जिसकी वजह से यह जोड़ों के दर्द सहित इसके कई लक्षणों में फायदा पहुंचाती है।
#कम होगी पेट की चर्बी
गिलोय शरीर के उपापचय (मेटाबॉलिजम) को ठीक करती है, सूजन कम करती है और पाचन शक्ति बढ़ाती है। ऐसा होने से पेट के आस-पास चर्बी जमा नहीं हो पाती और आपका वजन कम होता है।
#जवां रखती है गिलोय
गिलोय में एंटी एजिंग गुण होते हैं, जिसकी मदद से चेहरे से काले धब्बे, मुंहासे, बारीक लकीरें और झुर्रियां दूर की जा सकती हैं। इसके सेवन से आप ऐसी निखरी और दमकती त्वचा पा सकते हैं, जिसकी कामना हर किसी को होती है। अगर आप इसे त्वचा पर लगाते हैं तो घाव बहुत जल्दी भरते हैं। त्वचा पर लगाने के लिए गिलोय की पत्तियों को पीस कर पेस्ट बनाएं। अब एक बरतन में थोड़ा सा नीम या अरंडी का तेल उबालें। गर्म तेल में पत्तियों का पेस्ट मिलाएं। ठंडा करके घाव पर लगाएं। इस पेस्ट को लगाने से त्वचा में कसावट भी आती है।
#काढ़ा
चार इंच लंबी गिलोय की डंडी को छोटा-छोटा काट लें। इन्हें कूट कर एक कप पानी में उबाल लें। पानी आधा होने पर इसे छान कर पीएं। अधिक फायदे के लिए आप इसमें लौंग, अदरक, तुलसी भी डाल सकते हैं।
#अन्य फायदे
अरंडी यानी कैस्टर के तेल के साथ गिलोय मिलाकर लगाने से गाउट(जोड़ों का गठिया) की समस्या में आराम मिलता है।इसे अदरक के साथ मिला कर लेने से रूमेटाइड आर्थराइटिस की समस्या से लड़ा जा सकता है।खांड के साथ इसे लेने से त्वचा और लिवर संबंधी बीमारियां दूर होती हैं।आर्थराइटिस से आराम के लिए इसे घी के साथ इस्तेमाल करें।कब्ज होने पर गिलोय में गुड़ मिलाकर खाएं।
#साइड इफेक्ट्स
वैसे तो गिलोय को नियमित रूप से इस्तेमाल करने के कोई गंभीर दुष्परिणाम अभी तक सामने नहीं आए हैं लेकिन चूंकि यह खून में शर्करा की मात्रा कम करती है। इसलिए इस बात पर नजर रखें कि ब्लड शुगर जरूरत से ज्यादा कम न हो जाए।
#गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को गिलोय के सेवन से बचना चाहिए। पांच साल से छोटे बच्चों को गिलोय न दे।
हैपी गार्डनिंग । यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है , या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो , तो हमें Email snjmalik14@gmail.com WhatsApp +919034582897
मंगलवार, 11 मई 2021
आदिशक्ति
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मई 11, 2021 in
{{{ॐ}}}
#आदिशक्ति
हमारा शरीर एक ऊर्जा परिपथ से संचालित होता है इसका ऊर्जा चक्र निर्धारित है जो प्रकृति ने किया हुआ है इसी ऊर्जा चक्र के कारण उसे सभी कर्म करने होते हैं ऊर्जा चक्र की इस व्यवस्था से हमारे संघर्षशील कर्म के द्वारा तकनीकी द्वारा ऊर्जा चक्र में परिवर्तित किया जा सकता हैa क्या इसे सिद्ध किया जा सकता है जैसा संस्कृत की हुआ है ऐसे तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि यह विवरण अधूरी हैं यह ऐसे शिष्यों को लिखाएं गये या रटाये गए नियम है जो प्रारंभिक सभी तकनीकों को सीख चुके होते हैं।
जो सभी सिद्धियों के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है। ईष्ट कोई भी हो यदि उसकी आराधना करने वाला उसमें सचमुच डूबता है तो उसी भाव को प्राप्त होगा अर्थात उस भाव की प्रवृत्ति बन जाती है भाव गहन है मानसिक शक्ति है एकाग्र होती है वह एकाग्र होगी तो शक्तिशाली होगी यह शक्तिशाली हुई तो शरीर कि ऊर्जा तंत्र शक्तिशाली होगा। भाव बिना कोई सिद्धि नहीं होती भाव गहन नहीं है तो विस्मृति नहीं तो सिद्धि भी नहीं कई लाख मंत्र जपने और हजारों यज्ञ साधना करने का भी कोई लाभ नहीं भाव बिना पुजा भी नही है यहां तक कि भाव बिना भौतिक कर्म भी नहीं इसलिए जो आप कर रहे हैं sउसके प्रति विश्वास का प्रबल होना और उस भाव में विलीन हो जाना उस भाव की सिद्धि है यही इसमें वर्गीकरण है।
इसी शारीरिक प्राकृतिक ऊर्जा संरक्षण को तंत्र कहा जाता है इसमें जितनी तकनीकी प्रयुक्त की जाती है वह सभी इसी पर पद की संभावित तकनीक है जो ब्रह्मांड इस तकनीक पर क्रिया कर रहा है एक कान से लेकर जीव तक पृथ्वी से लेकर सूर्य तक न केवल एक ही उर्जा संरचना में बंधे हुए हैं बल्कि क्रियाशीलता की तकनीक भी सब में एक ही है।
यह तकनीकी तंत्र योग सिद्धि साधना सभी में प्रयुक्त की जाती है सैद्धांतिक रूप से सभी एक स्थान पर प्रयोग एक तकनीक भी ने पर प्रक्रिया वही है गणना करने का नियम वही है बस तरीका अलग है लोग राम के ध्यान में डूबता है वह भी अच्छा परिणाम पाता है जो कृष्ण या दुर्गा के भी कोई खुदा का नाम लेकर ध्यान कोई परब्रह्म कह कर उस में लिप्त होना चाहता है इन सब को लाभ होता है।
पर यह सब उसने आदिशक्ति भगवती परांबा का ही विस्तृत रूप है जिसे लोग विभिन्न नाम लेकर उसके भाव में डूबते हैं और हमने वही प्रक्रिया होती हैh लोग मानसिक संतुष्टि से उत्पन्न आत्मबल की बात करने लगते हैं पर यह केवल इतना ही नहीं यह तो ऊर्जा का परिपथ जो हमारे शरीर के अंदर व्याप्त है यह भाव की गहनता है से उस भाव की उर्जा का शक्तिशाली और तीन केंद्रीय करण कर सकता है।
इससे दिव्य शक्तियां उत्पन्न होने लगती है यह केवल इतना ही है कि हमारे शरीर में भाव जितना गहन होगा उसके ऊर्जा उत्पादन बिंदुओं में उतनी तीव्रता से उर्जा का उत्सर्जन होगा इससे शरीर के गुण परिवर्तित होने लगेंगे और बढ़ी हुई तरंगों को यदि वह व्यक्ति केंद्रीय कृत कर सकता है तो उसमें अतींद्रिय क्षमता विकसित होगी इन तरंगों को बढ़ाकर अंतिम सत्य को अनुभूत करने के लिए अतींद्रिय शक्तियां प्राप्त करना इन सभी पूजा-पाठ तंत्र योग साधना सिद्धि किस विषय से मार्ग कोई भी हो सभी का उद्देश्य उस परमात्मा सदाशिव में जाकर समाप्त हो जाता है और यही आदि शक्ति भी है ।
क्या यह विज्ञान है अब प्रश्न उठता है कि आखिर यह विज्ञान क्या है क्या इसकी कोई तर्कसंगत वैज्ञानिक व्याख्या हो सकती है हालांकि इस विज्ञान का महत्व पूर्ण विवरण लुप्त हो चुका है विश्वशम स्तरीय और पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं है जो आज उपलब्ध है इसका कारण केवल इतना है कि समाज के चोर उचक्के इस महाशक्तिशाली विज्ञान के नियमों एवं जानकारियों का प्रयोग विनाश में करने लगे।
सनातन धर्म की यह व्याख्या प्रकृति का शाश्वत धर्म है आज की भाषा में कहें तो प्रकृति की संपूर्ण ऊर्जा संरचना उसकी उत्पत्ति और क्रिया के सिद्धांत एक सूत्र का विवरण है oकि ज्ञान जो भारत में प्राचीन काल में ब्रह्म ज्ञान तत्वज्ञान परमात्मा ज्ञान के नाम से प्रसिद्ध था और अति गोपनीय था आज लुप्त हो चुका है उसी परमात्मा के ब्रह्म ज्ञान को जाना अत्यंत जाकर है ।
वह तत्व ही सत्य है वहीं विभू है यह सृष्टि उस तत्व से उत्पन्न होने वाली एक मरीचिका है जीव की इंद्रियों की क्षमता बहुत अल्प है यह झूठे संकेत भेजते हैं इन ठगों की ही माया यह सृष्टि है यह सभी जो तर्कशास्त्र नीति शास्त्र भावुकता कल्याण भाव से भरे मनुष्य के अंदर आस्थाओं से यह बात करते रहे अर्थात एक विकसित संस्कृति हजारों वर्ष तक एक मूर्खता के पीछे दीवानी रही जो मानव भय का परिणाम है।
अर्थात परमात्मा खुदा या गॉड या जो भी आप उसे कह लें लेकिन यह भय नहीं सत्य है वेद इस इसे तत्व परम तत्व परमात्मा पुरूष आदि कहा गया है और इसे शुन्य अर्थात जीरो कहा गया है वही आदिशक्ति है इसी शुन्य से असंख्य के संख्याएं जन्म ले रही हैंk शैवमार्गी इस तत्व को सदाशिव कहते हैं यहां शिव शांति और निष्क्रियता का प्रतीक तत्व है।
यह सृष्टि उसी निष्क्रिय तत्व में बनने वाला एक भंवर है उस उर्जा भंवर की उत्पत्ति कैसे होती है यह किस ऊर्जा संरचना से बनता है यह उस उर्जा संरचना के बनने का कारण क्या है यह सब पहली पोस्टों में भी लिखा जा चुका है और यही जगन्यमाता आदिशक्ति है sabhar sakti upasak agyani Facebook wall
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021
दुनिया का सबसे ताकतवर पोषण पूरक आहार है- सहजन
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अप्रैल 23, 2021 in
दुनिया का सबसे ताकतवर पोषण पूरक आहार है- सहजन (मुनगा)। इसकी जड़ से लेकर फूल, पत्ती, फल्ली, तना, गोंद हर चीज उपयोगी होती है।
आयुर्वेद में सहजन से तीन सौ रोगों का उपचार संभव है। सहजन के पौष्टिक गुणों की तुलना :- विटामिन सी- संतरे से सात गुना अधिक। विटामिन ए- गाजर से चार गुना अधिक। कैलशियम- दूध से चार गुना अधिक। पोटेशियम- केले से तीन गुना अधिक। प्रोटीन- दही की तुलना में तीन गुना अधिक।
स्वास्थ्य के हिसाब से इसकी फली, हरी और सूखी पत्तियों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन-ए, सी और बी-काम्प्लेक्स प्रचुर मात्रा में पाई जाते हैं। इनका सेवन कर कई बीमारियों को बढ़ने से रोका जा सकता है, इसका बॉटेनिकल नाम ' मोरिगा ओलिफेरा ' है। हिंदी में इसे सहजना, सुजना, सेंजन और मुनगा नाम से भी जानते हैं, जो लोग इसके बारे में जानते हैं, वे इसका सेवन जरूर करते हैं।
सहजन का फूल पेट और कफ रोगों में, इसकी फली वात व उदरशूल में, पत्ती नेत्ररोग, मोच, साइटिका, गठिया आदि में उपयोगी है। इसकी छाल का सेवन साइटिका, गठिया, लीवर में लाभकारी होता है। सहजन के छाल में शहद मिलाकर पीने से वात और कफ रोग खत्म हो जाते हैं।
सहजन की पत्ती का काढ़ा बनाकर पीने से गठिया, साइटिका, पक्षाघात, वायु विकार में शीघ्र लाभ पहुंचता है। साइटिका के तीव्र वेग में इसकी जड़ का काढ़ा तीव्र गति से चमत्कारी प्रभाव दिखाता है। मोच इत्यादि आने पर सहजन की पत्ती की लुगदी बनाकर सरसों तेल डालकर आंच पर पकाएं और मोच के स्थान पर लगाने से जल्दी ही लाभ मिलने लगता है।
सहजन के फली की सब्जी खाने से पुराने गठिया, जोड़ों के दर्द, वायु संचय, वात रोगों में लाभ होता है। इसके ताजे पत्तों का रस कान में डालने से दर्द ठीक हो जाता है साथ ही इसकी सब्जी खाने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी कटकर निकल जाती है। इसकी जड़ की छाल का काढ़ा सेंधा नमक और हींग डालकर पीने से पित्ताशय की पथरी में लाभ होता है।
सहजन के पत्तों का रस बच्चों के पेट के कीड़े निकालता है और उल्टी-दस्त भी रोकता है। ब्लड प्रेशर और मोटापा कम करने में भी कारगर सहजन का रस सुबह-शाम पीने से हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होता है। इसकी पत्तियों के रस के सेवन से मोटापा धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसकी छाल के काढ़े से कुल्ला करने पर दांतों के कीड़े नष्ट होते हैं और दर्द में आराम मिलता है।
सहजन के कोमल पत्तों का साग खाने से कब्ज दूर होता है, इसके अलावा इसकी जड़ के काढ़े को सेंधा नमक और हींग के साथ पीने से मिर्गी के दौरों में लाभ होता है। इसकी पत्तियों को पीसकर लगाने से घाव और सूजन ठीक होते हैं।
सहजन के बीज से पानी को काफी हद तक शुद्ध करके पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके बीज को चूर्ण के रूप में पीसकर पानी में मिलाया जाता है। पानी में घुल कर यह एक प्रभावी नेचुरल क्लोरीफिकेशन एजेंट बन जाता है। यह न सिर्फ पानी को बैक्टीरिया रहित बनाता है, बल्कि यह पानी की सांद्रता को भी बढ़ाता है।
कैंसर तथा शरीर के किसी हिस्से में बनी गांठ, फोड़ा आदि में सहजन की जड़ का अजवाइन, हींग और सौंठ के साथ काढ़ा बनाकर पीने का प्रचलन है। यह काढ़ा साइटिका (पैरों में दर्द), जोड़ों में दर्द, लकवा, दमा, सूजन, पथरी आदि में भी लाभकारी है |
सहजन के गोंद को जोड़ों के दर्द तथा दमा आदि रोगों में लाभदायक माना जाता है। आज भी ग्रामीणों की ऐसी मान्यता है कि सहजन के प्रयोग से वायरस से होने वाले रोग, जैसे चेचक आदि के होने का खतरा टल जाता है।
सहजन में अधिक मात्रा में ओलिक एसिड होता है, जो कि एक प्रकार का मोनोसैच्युरेटेड फैट है और यह शरीर के लिए अति आवश्यक है। सहजन में विटामिन-सी की मात्रा बहुत होती है। यह शरीर के कई रोगों से लड़ता है। यदि सर्दी की वजह से नाक-कान बंद हो चुके हैं तो, सहजन को पानी में उबालकर उस पानी का भाप लें। इससे जकड़न कम होती है। सहजन में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है, जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं। इसका जूस गर्भवती को देने की सलाह दी जाती है, इससे डिलवरी में होने वाली समस्या से राहत मिलती है और डिलवरी के बाद भी मां को तकलीफ कम होती है, गर्भवती महिला को इसकी पत्तियों का रस देने से डिलीवरी में आसानी होती है।
सहजन के फली की हरी सब्जी को खाने से बुढ़ापा दूर रहता है इससे आंखों की रोशनी भी अच्छी होती है। सहजन को सूप के रूप में भी पी सकते हैं, इससे शरीर का खून साफ होता है।
सहजन का सूप पीना सबसे अधिक फायदेमंद होता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। विटामिन सी के अलावा यह बीटा कैरोटीन, प्रोटीन और कई प्रकार के लवणों से भरपूर होता है, यह मैगनीज, मैग्नीशियम, पोटैशियम और फाइबर से भरपूर होते हैं। यह सभी तत्व शरीर के पूर्ण विकास के लिए बहुत जरूरी हैं।
कैसे बनाएं सहजन का सूप? सहजन की फली को कई छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेते हैं। दो कप पानी लेकर इसे धीमी आंच पर उबलने के लिए रख देते हैं, जब पानी उबलने लगे तो इसमें कटे हुए सहजन की फली के टुकड़े डाल देते हैं, इसमें सहजन की पत्तियां भी मिलाई जा सकती हैं, जब पानी आधा बचे तो सहजन की फलियों के बीच का गूदा निकालकर ऊपरी हिस्सा अलग कर लेते हैं, इसमें थोड़ा सा नमक और काली मिर्च मिलाकर पीना चाहिए।
१. सहजन के सूप के नियमित सेवन से सेक्सुअल हेल्थ बेहतर होती है. सहजन महिला और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से फायदेमंद है।
२. सहजन में एंटी-बैक्टीरियल गुण पाया जाता है जो कई तरह के संक्रमण से सुरक्षित रखने में मददगार है. इसके अलावा इसमें मौजूद विटामिन सी इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने का काम करता है।
३. सहजन का सूप पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाने का काम करता है, इसमें मौजूद फाइबर्स कब्ज की समस्या नहीं होने देते हैं।
४. अस्थमा की शिकायत होने पर भी सहजन का सूप पीना फायदेमंद होता है. सर्दी-खांसी और बलगम से छुटकारा पाने के लिए इसका इस्तेमाल घरेलू औषधि के रूप में किया जाता है।
५. सहजन का सूप खून की सफाई करने में भी मददगार है, खून साफ होने की वजह से चेहरे पर भी निखार आता है।
६. डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए भी सहजन के सेवन की सलाह दी जाती है।
प्रस्तुति - जितेन्द्र रघुवंशी, प्रज्ञाकुंज, हरिद्वार
मंगलवार, 20 अप्रैल 2021
कालानमक
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अप्रैल 20, 2021 in
उत्तरी पूर्वी उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक चर्चित एवं विख्यात धान की स्थानीय किसानों की किस्म कालानमक विगत तीन हजार वर्षा से खेती में प्रचलित रही है. सुधरी प्रजातियों अनुपलब्धता के कारण मूलतः स्वाद और सुगन्ध में किसानों की यह धान की किस्म विलुप्त होने के कगार पर थी. इसकी खेती का क्षेत्रफल 50 हजार से घटकर 2 हजार पर आ गया था और पूरा अन्देशा था कि धान की यह दुर्लभ किस्म हमेशा के लिए विलुप्त हो जायेगी. किसानों और उपभोक्ता को कालानमक धान की पहली प्रजाति केएन3 2010 में मिली जिसमें स्वाद और सुगन्ध दोनो ही पाये गये. इसके पश्चात् पहली बौनी प्रजाति बौना कालानमक 101 भारत सरकार द्वारा 2016 में और बौना कालानमक 2017 में अधिसूचना किया गया. दोनों प्रजातियों में उपज 40 से 45 कुन्टल थी फिर भी दाने के गुण में कमी के कारण किसान और उपभोक्ता दोनो पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नही थे. इन्ही कमियों को दूर करके 2019 में पीआरडीएफ संस्था ने कालानमक किरण नामक प्रजाति भारत सरकार से विमोचित कराई. प्रस्तुत लेख में कालामक किरण के विषय में विस्तृत जानकारी दी गई है. कालानमक किरण का उद्भव एवं विकास कालानमक केएन3 और स्वर्णा सब1 के संकरण से एक प्रजनक लाइन पीआरडीएफ-2&14&10&1&1 विकसित की गई. लगातार 3 वर्षो तक 2013 से 2016 तक इसका परीक्षण कृषि विभाग के सम्भागीय कृषि परीक्षण एवं प्रदर्शन केन्द्रों पर कराया गया . यह पाया गया कि इस प्रजनक लाइन की उपज केएन3 की तुलना में 25 से 30 प्रतिशत अधिक रही है. उत्तर प्रदेश कृषि विभाग तथा अखिल भारतीय धान उन्नयन योजना के अन्तर्गत अनेक केन्द्रों पर परीक्षित की गई.  आकारिक गुण एवं विशेषताए लगभग 95 सेमी चाई तथा 35 सेमी लम्बी बालियों वाली यह प्रजाति प्रकाश अवध की संवेदी है. अर्थात् इसकी बाली 20 अक्टूबर के आस-पास ही निकलती है. भारत सरकार के केन्द्रिय प्रजाति विमोचन की 82 मीटिंग में इसको अगस्त 2019 में अधिसूचनांकित की गई थी. इसके 1000 दाने का वनज 15 ग्राम तथा दाना मध्यम पतला होता है. छोटे दाने वाली धान की यह प्रजाति अत्यधिक सुगन्धित तथा अत्यधिक साबुत चावल देती है. इसकी कुछ खास बाते है जो अन्य प्रजातियों मे इसको सर्वौत्तम बनाती है वो है इसका लोहा और जस्ता की मात्रा, प्रोटीन का प्रतिशत (10.4) और निम्न ग्लाईसिमीक इंडेक्स (53.1). ग्लाईसिमीक इंडेक्स कम होने के कारण इसको मधुमेह रोगी भी इसको खा सकते है. इसमें एमाइलोज कम (20 प्रतिशत) होता है अतः पकाने पर इसका भात हमेशा मुलायम और स्वादिष्ट रहता है. खेती की विधि कालानमक किरण एक प्रकाश अवध संवेदी प्रजाति है. इसमें बालिया 20 अक्टूबर के आस-पास निकलती है तथा 25 नवम्बर के आस -पास यह कटाई के लिए तैयार होती है. अतः इसकी बुवाई का उचित समय जून का अन्तिम पखवारा (15 से 30 जून) के बीच ही है. एक हैक्टेयर में खेती के लिए 30 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है. जुलाई पहले सप्ताह के बाद बुवाई करने से इसकी पैदावार कम हो जाती है, लेकिन 15 जून से पहले बुवाई करने पर इसकी पैदावार में कोई बढ़ोत्तरी नही होती. रोपाई की विधि जब पौध 20 से 30 दिन की हो जाये तो इसे उखाड़ कर 20 सेमी कतार से कतार और 15 सेमी पौधे से पौधे की दूरी पर रोपाई कर दी जाये. एक स्थान पर 2 से 3 पौध ही लगावे. खाद की मात्रा कालानमक की बौनी प्रजातियों में 120 ग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 60 किलोग्राम पोटास की आवश्यक्ता होती है. फासफोरस एवं पोटास की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा रोपाई से पहले मिलाकर खेत में ड़ाल दी जाती है. रोपाई के एक महीने बाद खर पतवार नियन्त्रण के बाद बची हुई 60 किलोग्राम नत्रजन की मात्रा ऊपर से छिड़काव करके ड़ाल दी जा सकती है. फसल प्रबन्धन यदि जस्तें की कमी के लक्षण दिखाई पड़े तो 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 2.5 किलोग्राम चूने को 500 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़क दे. खरपतवार नियन्त्रण के लिए रोपाई के एक माह के अन्दर खुरपी से उगे हुए खरपतवारों को निकाल दे इसके पश्चात् यदि 2 -3 सेमी पानी भरा रहे तो आगे निराई की आवश्यकता नही पड़ती. रोपाई के समय खेत तैयार करते समय जो कुछ भी खरपतवार उगे रहते है वे स्वयं ही नष्ट हो जाते है. यदि रासायनिक खरपतवारनाशी का प्रयोग करना पड़े तो रोपाई के 15 से 20 दिन के बाद उसे ड़ाल सकते है. कालानमक किरण में प्रमुख कीटों और बीमारियों से रोधिता पायी जाती है. अतः उनके लिए किसी भी रासायनिक दवाओं का उपयोग नही करना पड़ता किन्तु गन्धी कीट सीथ ब्लाइट व पर्ण गलन रोग के लिए दवाओं का उपयोग करना पड़ता है. गन्धी कीट का उपचार बीएचसी का बूरकाव करके किया जा सकता है. पर्ण गलन रोग के उपचार के लिए 0.2 प्रतिशत हैक्साकोनाजोल अथवा 1 लीटर प्रोपीकोनाजोल 25 ईसी का छिड़काव करके किया जा सकता है. सुगन्धित होने के करण इसमें तनाछेदक कीट का भी प्रकोप होता है कार्टाप हाइड्रेक्लोराइड 18 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर खेत में 5 से 6 दिन तक 3 से 4 सेमी पानी बनाये रखे. रासायनिक खरपतवारनाशी जैसे: ब्यूटाक्लोर 2.5 लीटर प्रति हैक्टेयर, अनिलोफास 1.5 लीटर प्रति हैक्टेयर अथवा नोमिनी गोल्ड 250 एमएल प्रति हैक्टेयर अच्छे खरपतवारनाशी है. इनका उपयोग इन पर लिखे हुए अनुशंसा के अनुरूप कर सकते है. कालानमक किरण की जैविक खेती यदि कालानमक किरण का उत्पादन जैविक विधि से करना है तो पहले से तैयार जैविक खेत का ही प्रयोग करें. बीजोपचार के लिए ट्राइकोडर्मा से बीज शोधित कर ले. रोपाई करते समय या रोपाई करने से पहले सूडोमोनास के दो प्रतिशत घोल में पौध की जड़े डुबाने के पश्चात् रोपाई करें. 5 टन प्रति हैटेयर गोबर की सड़ी खाद या मुर्गी की खाद डाले. सर्वोत्तम है कि रोपाई के 40 दिन पहले 40 किलोंग्राम ढ़ैचा (सिसबानिया)/हैक्टेयर का बीज मुख्य खेत में बोये. जब पौधे 35 से 40 दिन के हो जाये तो उसको खेत में पलटकर पानी भरकर सड़ा दे. इस हरी खाद के पलटने के एक सप्ताह के अन्दर रोपाई कर सकते है. इसके अतिरिक्त कई और उपादान (पीएसबी, हर्बोजाइम, बीजीए, प्रोम, वर्मीकम्पोस्ट इत्यादि) उपलब्ध है जिनका उपयोग करके पोषक तत्वों की उपलब्धता की जा सकती है. कीड़े तथा बिमारियों की नियन्त्रण (अमृतपानी, नीमोलीन, नीम आधारित अनेक उत्पाद, जीवामृत आदि) के लिए बाजार में उपलब्ध है. फसल की कटाई व मड़़ाई चूंकि कालानमक की भूसी का रंग काला होता है अतः इसकी कटाई का समय निधार्रित करना थोड़ा कठिन होता है. सामान्यतया 50 प्रतिशत बाली निकलने के 30 दिन बाद धान की फसल कटाई के लिए तैयार होती है किन्तु कालानमक किरण को 40 से 45 दिन लगते है. फसल कटाई के बाद, यदि कम्बाइन हार्वेस्टर का उपयोग नही किया जा रहा है तो 3 दिन के अन्दर ही पिटाई करके दाने पौधों से अलग कर लिए जाये और उसको 3 से 4 दिन धूप में अच्छी तरह सुखाकर भण्डारण कर ले. पैदावार कालानमक की औसत पैदावार 45 से 50 कुन्तल होती है. जैविक खेती जिसमें की हरी खाद के साथ-साथ ट्राईकोडर्मा तथा सोडोमान का प्रयोग किया गया हो कि पैदावार 50 से 55 कुन्तल तक हो सकती है. वर्तमान में इस समूह की प्रचलित प्रजातियों से यह ऊपज 27 प्रतिशत से अधिक है. भण्डारण एवं कुटाई धान सुखाने (14% नमी) के बाद प्लास्टिक की बोरियों अथवा टिन की बनी बुखारी में इसका भण्डारण चावल के रूप में न करके धान के रूप में करे जिससे इसकी सुगन्ध एवं पाक गुण ठीक रहते है. कुटाई के लिए अच्छी मशीनों का उपयोग करने से चावल कम टूटता है. कालानमक किरण के दाने व पाक गुण: कालानमक किरण अतिसुगन्धित अधिक प्रोटीन 10.4%, कम ग्लाइसिमिक इंडेक्स सर्करा विहीन और 20% एमाईलोज (चावल पकाने के बाद ठण्डा होने पर भी मुलायम) होता है. 53.1% ग्लाइसिमिक इंडेक्स के कारण मधुमेह के रोगी इसको बेझिझक खा सकते है. तिगुनी आमदनी कालानमक किरण के धान का औसत विक्रय मूल्य 3500 से 4000 रूपया प्रति कुन्तल होता है जोकि सामान्य धान से 3 से 4 गुना है. इससे शुद्ध लाभ रूपया 101250 प्रति हैक्टेयर पाया गया है. इसकी जैविक खेती से उत्पादन में शुद्ध लाभ 127500 होता है जोकि सामान्य धान से 3 गुना से भी अधिक है. बीज की उपलब्धताः कालानमक किरण का बीज पीआरडीएफ संस्था के मुख्यालय के उपरोक्त पते तथा पीआरडीएफ बीज के विधायन संयन्त्र डी-41, इंडस्ट्रीयल एरिया, खलीलाबाद, जिला संत कबीर नगर मो0 नम्बर 9415173984 से प्राप्त किया जा सकता है.
रविवार, 11 अप्रैल 2021
विश्व मे गोबर के मकानों का प्रचलन
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अप्रैल 11, 2021 in
#पश्चिम_से_पूर्व
क्या आप जानते है, इस समय पूरे विश्व मे गोबर के मकानों का प्रचलन बढ़ा है । अमेरिका, इटली, जर्मनी जैसे उन्नत देशो के वैज्ञनिक भी अब गौबर के मकानों के महत्व को समझने लगे है .....
यही बात हजारो सालों पहले ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी लिखी है .... "गौ के पैरों में समस्त तीर्थ व गोबर में साक्षात लक्ष्मी का वास है" । लक्ष्मी का वास कैसे है ...इसका विश्लेषण समझिए ...
गोबर से विशेषकर गाय के गोबर से घर, आंगन, रसोई आदि की जमीन पोतना हर प्रकार से उत्तम है। इससे हम शुद्धता पाते हैं। टी.बी. के वायरस और रोगाणु मर जाते हैं। गर्मी का प्रकोप कम होता है। ठंडक महसूस होती है। गोबर के मकानों में किसी भी का वायरस नही ठहरता ....
झोपड़ी में आपको AC नही लगाना पड़ेगा, प्राकृतिक ठंडक ही इतनी अधिक रहेगी ।। अफ्रीका -अरब् आदि गर्म अरब प्रदेशो में जब AC नही था, उस समय गौबर के मकानों ने ही उनकी गर्मी से रक्षा की थी ...
सरकार इस समय सबको मकान देने की योजनाओं पर कार्य कर रही है ।। और गौ-संवर्धन पर भी कार्य कर रही है । गौ आधारित अर्थव्यवस्था भारत का आदिकाल का इतिहास रहा है, ओर वर्तमान में केंद्र की भाजपा सरकार भी गौरक्षा के कार्य के प्रति कटिबद्ध है ।।
गौबर के मकानों में रहने में वर्तमान में समश्या यह है, की आज का युग विंज्ञान का युग है, एवं कली का युग भी है । घरों में आग लग जाने की घटनाओं से प्राचीन लोग परेशान थे, उस समय तो बिजली थी भी नही .... वर्तमान् में तो बिजली जैसी आधुनिक वस्तुएं भी है ।। दूसरा दीपावली आदि ले अवसरों पर भी भय रहता है ... इस भय के निवारण के लिए छत पर टाइल्स आदि का प्रयोग कर, सुरक्षित रूप से मकान की छत पर घास आदि भरने की आधुनिक व्यवस्था कर, जिससे आग का भय नही हो, ओर साल दो साल में वह घास बदली भी जा सके .....
इसके अलावा गोबर के मकानों में रहने में बड़ी समश्या है, सामाजिक स्टेटस .... लेकिन आप विश्वास करें, बड़े बड़े शहरों में अब गोबर के मकान ही सामाजिक स्टेटस का सिंबल बने हुए है, होटल तक गोबर के मकानों के रूप में बन रहे है ।। अगर गांवो में वृक्ष, फूल, फल पौधे आदि लगाकर, सुंदर तरीके से Mud House बनाये जाए, तो न केवल गौ रक्षा होगी, बल्कि लोगो का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा ....समाज मे dust कम होगा, जिससे हजारो रौग होते है । दिल्ली प्रदूषण का मुख्य कारण यह dust ही तो है ।। और mud house के प्रचलन से गरीबी तो जैसे खत्म ही हो जाएगी .... क्यो की किसी के भी जीवन का मुख्य खर्च, उसे बीमार ..... बहुत बीमार कर देने वाला सीमेंटेड मकान ही होता है ।।।
गोबर में लक्ष्मी का वास कैसे होता है, आप समझ गए होंगे, जो स्वपन आप करोड़ो में पूरा नही कर सकते, वह स्वपन आपका मात्र कुछ हजार में पूरा हो जाता है ।।
आधुनिक गोबर के मकानों को देखें, ओर समझे, की ऐसे मकानों में रहने से आपके मान सम्मान पर कोई आंच नही आने वाली ।।
गुरुवार, 8 अप्रैल 2021
शवासन
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अप्रैल 08, 2021 in
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शरीर और मन से तनाव दूर कर साक्षी में प्रवेश करवाने वाला अद्भुत आसन -
शवासन योग का आरंभिक चरण है। शवासन हमारे शरीर को उस स्थिति में प्रवेश करवाता है जिस स्थिति में ध्यान आसानी से घटित हो सके।
शवासन का मतलब है कि शव या मुरदा जिस आसन या स्थिति में होता है, अपने शरीर को उस स्थिति में ले जाना। जिस भांति मुरदा न श्वास लेता, न कोई हलचल करता, चेहरे पर कोई भाव नहीं होता है, चेहरा निर्भाव होता है, ठीक उसी स्थिति में अपने शरीर को ले जाना शवासन कहलाता है।
मुर्दे के जैसा चेहरा तब होता है जब हमारे चेहरे पर कोई भाव नहीं होता है और मुर्दे जैसा शरीर तब होता है जब हमारे मन में कोई भी विचार नहीं होता है। यानि ध्यान वाली स्थिति। ध्यान वाली स्थिति में हमारा शरीर मुर्दे जैसा शांत और शिथिल हो जाता है।
जब हमारा ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश होता है, अचेतन में प्रवेश होता है, तब चेहरे से भाव और मन से विचार विलिन होने लगते हैं। भाव और विचारों के विलिन होते ही मन शांत होने लगता है और मन के शांत और शिथिल होते ही शरीर एक स्थिति में प्रवेश करता है। वह शांत और शिथिल हो उस स्थिति में प्रवेश करता है जिस स्थिति में शव होता है। यानि वह शवासन में जाने लगता है।
फिर इसी बात को दूसरी तरफ से लिया गया कि यदि ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश करने पर, मन के, विचारों के शांत होने पर शरीर शव की स्थिति में चला जाता है, तो क्यों न शरीर को शव वाली स्थिति में ले जाया जाए, ताकि मन शांत और शिथिल हो जाए और ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश संभव हो सके! और यह घटना दोनों ओर से घट सकती है।
हमारा शरीर और मन सदेव एक-दूसरे का अनुगमन करते आए हैं। मन में विचार आने पर शरीर उस विचार को क्रिया में बदलना शुरु कर देता है। इसी भांति यदि हम शरीर से कुछ कहते हैं तो यह वैसा ही करना शुरू कर देता है। यदि अचेतन में उठे भाव और विचार शरीर को सक्रिय कर देते हैं तो क्यों न हम सचेतन शरीर को कहें, इसे आदेश दें कि शांत हो जाओ, शिथिल हो जाओ, तो यह अवश्य शांत और शिथिल होने लगेगा। जो भी भाव या विचार हम करेंगे, यह वैसी ही प्रतिक्रिया देने लगेगा।
शवासन में जैसे ही हमारा शरीर शांत और विश्राम की अवस्था में प्रवेश करने लगता है, हमारा मन और विचार भी शांत होने लगते हैं। और विचारों के शांत होते ही हम अपने आप पर लौट आते हैं, या कि हम अपने शरीर और मन के प्रति बोधपूर्ण होने लगते हैं। यहां हमें अपने शरीर से अलग होने का बोध होता है। यानि हम अपने शरीर के साक्षी हो जाते हैं।
जब भी हम विश्राम में जाएं, दौपहर भोजन के बाद या रात सोते समय, तब इस आसन में प्रवेश करें।
लेट जाएँ और शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें। शरीर में कोई तनाव नहीं, कोई हलन- चलन नहीं। अपनी श्वास को नाभि तक चलने दें, श्वास को कोई गति न दें, स्वाभाविक रूप से चलने दें।
अपना सारा ध्यान घुटनों से नीचे दोनों पैरों में केंद्रित करें और भाव करें कि "पैर शिथिल हो रहे हैं.. पैर शिथिल हो रहे हैं.. पैर शिथिल हो रहे हैं।" दो से तीन मिनट तक भाव करने पर पैर अपने से ही भारी होने लगेंगे, शिथिल होने लगेंगे। फिर उपर की ओर बढ़ें और अपना सारा ध्यान जंघाओं पर लाएं और भाव करें कि "दोनों जंघाएं शिथिल हो रही है... जंघाएं शिथिल हो रही है... रिलेक्स हो रही है।" थोड़ी देर में ही दोनों जंघाएं शिथिल हो जाएंगी। अब और उपर बढ़ें, भाव करें कि नाभि और पेट शिथिल हो रहा है। पेट शिथिल हो रहा है... नाभि शिथिल हो रही है। दो से तीन मिनट तक भाव करें और फिर उपर आएं। अब सारा ध्यान सीने पर लाएं और भाव करें कि" सीना शिथिल हो रहा है..सीना शिथिल हो गया है।" थोड़ी ही देर में सीना भी शिथिल हो जाएगा। अब भाव करें कि "कंधे और दोनों हाथ शिथिल हो रहे हैं... कंधे और दोनों हाथ शिथिल हो रहे हैं।"
हम महसूस करेंगे कि थोड़ी देर में कंधे और हाथ शिथिल हो गये हैं और हिलाने पर भी नहीं हिल रहे हैं। अब अंत में गर्दन, सारा ध्यान गर्दन में लगा दें और भाव करें कि "गर्दन शिथिल हो रही है.. गर्दन शिथिल हो रही है... गर्दन शिथिल हो रही है।" इस तरह दो से धीरे-धीरे हमारा पूरा शरीर शांत और शिथिल होता जाएगा।
अब इस प्रक्रिया को पुनः उपर से नीचे की ओर दौहराएं। गर्दन के बाद वापस कंधे और हाथ, फिर सीना, पेट, जंघाएं, घुटने और पैर तक वापस अपना ध्यान ले जाएं और दो से तीन मिनट तक हर अंग के शिथिल होने का भाव करें।
पंद्रह से बीस मिनट की इस प्रक्रिया में पूरा शरीर शिथिल और शांत हो जाएगा। और शरीर हमें विश्राम में लेटा हुआ हमसे अलग दिखलाई पड़ेगा, यानि शरीर से अलग होने का या कि साक्षी होने का बोध होगा।
साक्षी का बोध इसलिए होगा कि शरीर के शांत और शिथिल होते ही मन यानी विचार भी शिथिल हो जाते हैं। और विचारों के शिथिल होते ही, हमारी साक्षी चेतना, जो विचारों में उलझी हुई थी, वह विचारों से मुक्त हो स्वयं पर लौट आती है और अपने शरीर को देखने लगती है। अतः हमें अपने साक्षी का बोध होता है।
यहां हमें अपने आसपास की ध्वनियां स्पष्ट सुनाई पड़ने लगेंगी। चौके से बर्तन की आवाज, बच्चों के खेलने की आवाज, पक्षियों की आवाज, सड़क पर यातायात, सब कुछ स्पष्ट सुनाई पड़ने लगेगा। सारी आवाज़ों को साक्षी भाव से सुनते रहना है, बिना किसी प्रतिक्रिया के, यदि जरा सी भी प्रतिक्रिया करेंगे कि बाहर "यह कौन चीख चिल्ला रहा है" तो फिर विचार को प्रवेश मिल जाएगा और हम साक्षी को भूल जाएंगे। अतः हमें बाहर भीतर की सारी आवाजों को सिर्फ सुनना है।
जब तक इस स्थिति में रहना चाहें रहें, फिर धीरे से दो चार गहरी श्वास लें और आंखें खोलकर बाहर आ जाएं।
इस प्रयोग में शरीर का थका हुआ होना उपयोगी होगा। यदि नींद नहीं आती है तो यह प्रयोग नींद लाने का सुगम उपाय है। रात सोते समय करेंगे तो नींद का आना आसान होगा और साक्षी हमारे अचेतन में प्रवेश कर जाएगा जिससे हमें सतत साक्षी का स्मरण बना रहेगा।
स्वामी ध्यान उत्सव
मानव शरीर का सम्बन्ध प्रकृति से
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अप्रैल 08, 2021 in
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन
पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन
मानव शरीर का सम्बन्ध प्रकृति से है। प्रकृति ने जिस प्रकार मानव शरीर की संरचना की है, वह अपने आप में विस्मयकारी है। शरीर शास्त्र के अनुसार शरीर की रचना का जितना ही अधिक विचार-विश्लेषण किया जाय, उतना ही यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि इसकी संरचना अद्भुत है।
206 हड्डियों और 600 से भी अधिक मांसपेशियों के ऊपर त्वचा का चोला तना है। हड्डियों, मांसपेशियों और त्वचा--तीनों की संरचना का कौशल आश्चर्यजनक है। हड्डियों जैसी मजबूत और हल्की चीज़ की कल्पना करना भी कठिन है। शरीर का जितना वजन होता है, हड्डियां उसके पांचवें हिस्से से भी कम होती हैं। अपने शरीर का ही भार इन पर कम नहीं होता। जब हम ख़ाली हाथ डुलाते हुए चलते हैं तो उस समय हमारे जांघ की हड्डी के एक-एक वर्ग इंच क्षेत्र पर पांच-पांच सौ किलो का दबाव पड़ रहा होता है। शरीर का भार, धरती का गुरुत्वाकर्षण और हवा का तेज भार-ये तीन दबाव हड्डियां झेल रही होती हैं। इस दबाव को सिर्फ स्टील की धड़ ही बर्दाश्त कर सकती है। सीमेंट और स्टील को मात करने वाली ये मानव अस्थियां कितनी मजबूत फिरभी कितनी हल्की होती हैं।
-----:मानव अस्थियां:-----
हड्डियों की बनावट का कौशल और सूझबूझ विचित्र है। आधुनिक इमारतों में गोलाईदार पतली छत बनाई जाती है
क्योंकि अंडाकार खोल पतला होने पर भी मजबूत होता है। मानव मस्तिष्क की रक्षा करने वाली खोपड़ी की हड्डियां गोलाकार प्लेटों की शक्ल में होती हैं। जांघ की हड्डियों पर अधिक ज़ोर पड़ता है तो इन्हें भी एक खोखले बेलन की आकृति दे दी गयी है। जांघ, कूल्हे, बांह और कंधे की हड्डियों का जोड़ ऐसा है जैसे किसी गोल छल्ले में गेंद फंसा दी जाय ताकि आसानी से घूम भी सकें और फंसी भी रहें। खोपडे, कूल्हे जैसे स्थानों में हड्डी का हिलना-डुलना घातक हो सकता है। इसलिए वहां के जोड़ बहुत मजबूत बने रहते हैं। स्त्री के कूल्हों की हड्डियां पुरुषों से अलग होती हैं। उनमें यह व्यवस्था रहती है कि प्रसव-काल समीप आते ही जोड़ कुछ खुल जाय ताकि आसानी से प्रसव हो सके और शिशु सुरक्षित बाहर आ सके। पसलियों का जोड़ सीने की हड्डी के साथ कुछ इस तरह होता है कि उनके जोड़ को घूम कर और फिसल कर फैलने -
सिकुड़ने में आसानी हो। हड्डियों के इन जोड़ों की व्यवस्था का परिणाम है--हम शरीर को तरह-तरह से घुमा सकते हैं।
वास्तव में मनुष्य का शरीर ही नहीं, मन, बुद्धि, अंतःकरण--सभी इतने समर्थ होते हैं कि छोटी-छोटी भूलों को सुधार लेना या कहें हल्के-फुल्के आघातों को झेल लेना उनके लिए सरल बात होती है। अनाचार और अपव्यय की अति ही उन्हें कमज़ोर और बीमार बनाती है। अन्यथा प्रतिकूलताओं के बीच में रहते हुए भी मानव शरीर अनुकूलता में बदल सकता है। शरीर की मासपेशियां अपने से हज़ार गुना वजन संभाले रहती हैं। पेट की मांसपेशी खाना खाने के लिए स्वतः फैलती चली जाती है। ह्रदय की मांसपेशी गर्भस्थ शिशु में तीसवें दिन से काम शुरू कर देती है और रात-दिन सेवा में तत्पर रहती है। वह आजीवन क्रियाशील रहती है।
साधारण कार्य करते हुए प्रत्येक व्यक्ति अपनी मांसपेशियों पर इतना ज़ोर डालता है जितना कि ज़ोर टनों माल उठाते समय किसी क्रेन पर लगातार पड़ता है। अपनी हड्डी और मांसपेशी तो आदमी साधारणतः देख नहीं पाता पर त्वचा पर उसकी नज़र तो रोज़ ही पड़ती है। इस त्वचा को रंगने-पोतने में हज़ारों रुपये खर्च करते हैं पर त्वचा के वास्तविक चमत्कार को कम ही लोग जान पाते हैं और जानने पर भी याद तो और भी कम लोग रख पाते हैं।
1- बाहरी ताप को झेलने, 2- शरीर के भीतरी ताप को सामान्य बनाये रखने, 3- स्पर्शबोध के द्वारा जानकारी देते रहने और 4- भीतरी अंगों को चोट-चपेट, कीटाणु-विषाणु से बचाये रखने का कार्य हमारी त्वचा निरन्तर करती रहती है। जबकि शरीर के किसी भी हिस्से में यह एक इंच के पांचवें हिस्से से भी अधिक पतली होती है। इतनी नाजुक और पतली त्वचा के भी हिस्से होते हैं। त्वचा का बाहरी हिस्सा जो 'एपिडर्मिस' कहलाता है,एक चतुर चौकीदार होता है। अपने चौकीदार के कर्तव्य को करने के लिए जहाँ जैसी व्यवस्था आवश्यक है, वैसी ही व्यूह रचना उसने कर रखी है। आँख जैसी कोमल स्थान की रक्षा के लिए वह इतनी पतली और मृदु हो गई है एक इंच के दो हजारवें भाग के बराबर ही उसकी तह है। उँगलियों के नाजुक पोरों की रक्षा के लिए तो उसने नाखूनों का ही निर्माण कर डाला है। तलुओं में वह मोटे-तगड़े चौकीदार के रूप में बैठी है। हड्डियों के उन जोड़ों पर जहाँ मोड़ने की जरुरत पड़ती है,यह त्वचा ढीली-ढाली होती है।
बाहरी त्वचा के नीचे वाली तह किसी विशाल व व्यवस्थित दल के निष्ठावान स्वयं सेवकों की तरह चुपचाप काम करती रहती है। वह नित नए कोष रूपी कार्यकर्त्ता तैयार कर उन्हें व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाती है ताकि समय आने पर वे बाहर मंच की व्यवस्था संभाल सके। दुनियां को गोरे-काले, भूरे-पीले के भेदों में फंसाने वाला 'मेलेनिन' नामक पदार्थ इसी तह में होता है। 'मेलेनिन' पदार्थ की अधिकता से रंग काला हो जाता है। तेज धूप और गर्मी से शरीर की रक्षा के लिए अधिक 'मेलेनिन' की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए गर्म देशों के लोग ज्यादा काले रंग के होते हैं। मोर भी ज्यादा समय यहाँ रहें तो ताम्बई रंग होने लगते हैं। भीतरी त्वचा का कारोबार तो और भी जटिल है। उनमें लाखों बारीक तार अर्थात् स्नायु-तंतु फैले हुए हैं जो प्रत्येक स्पर्श की संवेदना मस्तिष्क तक ले जाते हैं और वहां से आवश्यक सुचना निर्देश लाते हैं। सर्दी-गर्मी, पीड़ा-रोमांच आदि की अनुभूतियों के सन्देशवाहक में बारीक तार कुल मिला कर अपने आप में किसी विशाल दूरभाष केंद्र की छवि पैदा करते हैं। मस्तिष्क के
'हाइपोथैलेमस' केंद्र से जैसे ही दूरभाष पर खबर मिली कि शरीर का तापमान बढ़ गया है, वैसे ही रक्त-प्रवाह की और त्वचा में स्थित पसीने की ग्रंथियों की गति तेज हो जाती है और रक्त की बढ़ी हुई गर्मी बाहरी त्वचा के रास्ते पसीने के रूप में निकलने लगती है। तापमान गिरने की इस टेलीफोन से खबर मिलने पर रक्त-प्रवाह कम हो जाता है। पसीने की ग्रन्थियां भी अपना काम धीमा कर देती हैं। त्वचा और चर्बी की पर्तें शरीर की गर्मी को बाहर नहीं जाने देती। इस प्रकार किसी वायरलेस-सज्जित, अनुशासित और पुलिस-दल की तरह चौकस, सक्रिय, समर्पित स्वयं सेवकों की तरह निष्काम भाव से सेवारत तथा परिपक्व बुद्धि संचालकों की तरह सूझ-बूझ से काम लेने वाली यह शरीर की व्यवस्था जितनी विशाल है, उतनी ही जटिल भी है।
सनातन सदाशिव निर्गुण एवं सगुण
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अप्रैल 08, 2021 in
सनातन सदाशिव निर्गुण एवं सगुण दो स्वरूपों में जाने जाते हैं प्रकृति से शुन्य जहां प्रकृति नहीं है शिव निर्गुण हैं और जब यह प्रकृति रूप में होते तो हैं तो वह सगुण हैं सत चित एवं आनंद रूप ऐश्वर्य से परिपूर्ण उस परमेश्वर के प्रकृति से युक्त हो जाने पर (उसमें प्रकृति की उत्पत्ति होने पर) शक्ति की उत्पत्ति हुई है शक्ति से नाद एवं नाद से बिंन्दु की उत्पत्ति हुई है समस्त ज्ञान का कारण निरंजन ब्रह्म है जो साक्षी रूप है साक्षी रूप इसलिए कि वह वही सब कुछ उत्पन्न और नष्ट होने के समय उपस्थित रहता है aऔर प्रत्येक स्थान पर प्रत्येक क्रिया को अनुभूत करता है प्रकृति की विकृति का उद्भव इसी में होता है और इसे ही #तत्व कहते हैं।
प्रकृति एवं पुरुष महाघोर एवं निराकार है सृष्टि के समय वही ब्रह्म प्रकृति एवं पुरुषों दो स्वरूपों में अभिव्यक्त होते हैं प्रकृति पुरुष चणक के आकार का है कोई से प्रकृति कहता है कोई पुरुष ब्रह्मवाक्य सें से अतीत एवं निर्मल समुज्वल घुतियुक्त है ब्रह्म मन से बुद्धि आदि से क्रिया से एवं वाक्य से अतीत है सदाशिव केवल साधकों के हितार्थ एवं ज्ञातार्थ एकत्वाश्रित ब्रह्म की उस पुरुष की अभिलाषा के अनुसार उसी से सब की उत्पत्ति होती है वैसे ही प्रकृति की इच्छा से पुरुष में शेष सभी उत्पत्ति होती हैs पूर्वानंन्दयुता कामार्त्ता मंदोन्मता प्रकृति विपरीता हो जाती है तब सदाशिव ही पुरुष का धारण रूप धारण करके सृष्टि करता है।
जब प्रकृति नहीं होती सदाशिव निर्गुण निर्विकार होते हैं उसमें जब प्रकृति की उत्पत्ति शास्त्रों में इसे विकृति और विपक्ष कहा गया है क्योंकि यह उत्पत्ति नहीं है इसमें नया कुछ नहीं बनता यह सदा शिव का ही एक रूप परिवर्तन होती है तब उस प्रकृति में से सदाशिव के संयोग करने से नाद नाद से शक्ति और शक्ति से बिंदु की उत्पत्ति होती है यही बिंदु भी विश्वात्मा या जीवात्मा है यहां जानना समीचीन होगा कि एक नाद पहले ही उत्पन्न होता है जिससे प्रकृति की उत्पत्ति होती है इसे तत्वज्ञानियो ने परानाद कहा है इन क्रियाओं को उत्तरवर्ती नाद को ब्रह्मनाद या शब्दनाद कहा जाता है ।
यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति की क्रिया है जिसे जानने के लिए विश्व भर के वैज्ञानिक प्रयत्नशील हैं भारत के कौपीन धारियों को ना जाने यह कब से पता था क्योंकि यह जानना ब्रह्मांड के किसी भी विकसित जीव के मस्तिष्क की पराकाष्ठा है सनातन ऋषियों ने कहा है कि सृष्टि की अनुपस्थिति में वह निराकार परब्रह्म निष्क्रिय समाधि रत था अकेला था दूसरा कोई नहीं था जिससे वह मन बहलाता तब उसने स्वयं को ही परिवर्तित करके एक भंवर रूपी चाक की उत्पत्ति कर दी जिसके बीच में एक स्तंभ थाh उसके शीर्ष पर ज्योति जगमगा रही थी यह इतनी उग्र गति से नाच रहा था कि परमात्मा रूपी अनंत में चकराता फिर रहा था और इसी की प्रतिक्रिया में दूसरा उसी प्रकार का अधोगामी चक्र उत्पन्न हुआ दोनों एक दूसरे की ओर दौड़ पड़े और एक दूसरे में समा गए इससे एक महानाद हुआ और शब्दब्रह्म की उत्पत्ति हुई इससे बिंदुरूप विश्वात्मा की उत्पत्ति हुई इससे सुक्ष्म वमनावतार का जन्म हुआ और उसने अपनी योग माया से प्रकृति को विकसित एवं पोषित किया।
इस निष्क्रिय निराकार निर्गुण तत्व की ये लीला अद्भुत और अवर्णनीय है उसमें कोई क्रियाशीलता नहीं है पर वह सभी क्रियाओं को उत्पन्न करता है उसमें कोई गुण नहीं है oकिंतु सभी गुणों की उत्पत्ति उस से ही होती है वह चेतना से रिक्त है पर समस्त चेतना तमक उत्पत्ति उसी से होती है उसकी कोई आकृति नहीं है पर सभी आकृतियां उसकी उससे ही उत्पन्न होती है उसमें कोई भेद प्रभेद नहीं है पर सभी भेद प्रभेद उसी से उत्पन्न होते हैं उसकी इस लीला का वर्णन कोई कैसे कर सकता है जबकि ज्ञान बुद्धि चेतना और शब्द की उत्पत्ति भी उसी से होती है उस महाविभु लीला को वह स्वयं ही जान सकता है कि वह ऐसा क्यों करता है।
तत्वज्ञानियो महऋषियो ने इस उत्पत्ति को अविद्या कहा है kअर्थात अज्ञानता के कारण ही इस उत्पत्ति को जीव सत्य मानकर इसमें भटकता रहता है और इंद्रियों पर विश्वास करके अपनी अनुभूतियों के माया जाल से बनने वाले जगत में भटकता है सत्य तो यह है कि यह कोई उत्पत्ति है ही नहीं चक्रवात में वायु के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता इसमें भी परमात्मा तत्व के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
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