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शुक्रवार, 1 मई 2026

राजयोग (Raja Yoga) का अर्थ है "योगों का राजा"

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 राजयोग (Raja Yoga) का अर्थ है "योगों का राजा"


। यह महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए 'अष्टांग योग' का ही एक रूप है, जिसका मुख्य लक्ष्य मन पर पूर्ण विजय प्राप्त करना और आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) है।

​जहाँ अन्य योग शरीर या श्वास पर ध्यान केंद्रित करते हैं, राजयोग सीधे चित्त (मन) की वृत्तियों को रोकने पर बल देता है।

​राजयोग के आठ अंग (अष्टांग योग)

​पतंजलि के अनुसार राजयोग की प्राप्ति के लिए इन आठ चरणों का पालन किया जाता है:

​यम: नैतिक अनुशासन (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह)।

​नियम: व्यक्तिगत अनुशासन (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान)।

​आसन: शरीर को स्थिर और सुखदायक अवस्था में रखना।

​प्राणायाम: श्वास की गति पर नियंत्रण।

​प्रत्याहार: इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना।

​धारणा: मन को किसी एक विचार या बिंदु पर केंद्रित करना।

​ध्यान: उस केंद्र बिंदु पर निरंतर एकाग्रता।

​समाधि: वह अवस्था जहाँ साधक और ईश्वर (या परम तत्व) एक हो जाते हैं।

​राजयोग के मुख्य लाभ

​मानसिक शांति: यह तनाव और चिंता को कम कर मन को शांत और स्थिर बनाता है।

​इच्छाशक्ति में वृद्धि: मन पर नियंत्रण होने से संकल्प शक्ति (Willpower) बढ़ती है।

​एकाग्रता: काम और पढ़ाई में फोकस बेहतर होता है।

​भावनात्मक संतुलन: परिस्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया देने के बजाय व्यक्ति शांत रहकर निर्णय लेना सीखता है।


​एक सरल सूत्र: राजयोग का अर्थ केवल आंखें बंद करके बैठना नहीं है, बल्कि जीवन की हर परिस्थिति में अपने मन का मालिक (राजा) बने रहना है।

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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

जनेऊ पहनते के क्या है लाभ, और क्यों पहनते हैं

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 जनेऊ पहनते के क्या है लाभ, और क्यों पहनते हैं


ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम अर्थात ब्राह्मण ब्रह्म ,ईश्वर, तेज से युक्‍त हो।

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। कालांतर में इस संस्कार को दूसरे धर्मों में धर्मांतरित करने के लिए उपयोग किया जाने लगा। हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।

क्यों पहनते हैं जनेऊ : हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। प्राचीनकाल में पहले शिष्य, संत और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। इस दीक्षा देने के तरीके में से एक जनेऊ धारण करना भी होता था। प्राचीनकाल में गुरुकुल में दीक्षा लेने या संन्यस्त होने के पूर्व यह संकार होता था।

यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध भी कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है।

दीक्षा देना : दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व।

अन्य धर्मों में यह संस्कार : हिन्दू धर्म से प्रेरित यह उपनयन संस्कार सभी धर्मों में मिल जाएगा। यह दीक्षा देने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है, हालांकि कालांतर में दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। इस आर्य संस्कार को सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश भिन्न-भिन्न रूप में अपनाया जाता रहा है। मक्का में काबा की परिक्रमा से पूर्व यह संस्कार किया जाता है।

सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। जैन धर्म में भी इस संस्कार को किया जाता है। वित्र मेखला अधोवसन (लुंगी) का सम्बन्ध पारसियों से भी है। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं। बौद्ध धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। यहूदी और इस्लाम धर्म में खतना करके दीक्षा दी जाती है।

जनेऊ पहनने के 9 लाभ

जनेऊ को हर उस हिन्दू को धारण करना चाहिए जो मांस और शराब को छोड़कर सादगीपूर्ण जीवन यापन करना चाहता है। हम यहां जनेऊ पहनने के आपको लाभ बता रहे हैं। जनेऊ के नियमों का पालन करके आप निरोगी जीवन जी सकते हैं।

1.जीवाणुओं-कीटाणुओं से बचाव : जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं, वे मल-मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं।

2.गुर्दे की सुरक्षा : यह नियम है कि बैठकर ही जलपान करना चाहिए अर्थात खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए। इसी नियम के तहत बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए। उक्त दोनों नियमों का पालन करने से किडनी पर प्रेशर नहीं पड़ता। जनेऊ धारण करने से यह दोनों ही नियम अनिवार्य हो जाते हैं।

3.हृदय रोग व ब्लडप्रेशर से बचाव : शोधानुसार मेडिकल साइंस ने भी यह पाया है कि जनेऊ पहनने वालों को हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है। जनेऊ शरीर में खून के प्रवाह को भी कंट्रोल करने में मददगार होता है। ‍चिकित्सकों अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।

4.लकवे से बचाव : जनेऊ धारण करने वाला आदमी को लकवे मारने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दांत पर दांत बैठा कर रहना चाहिए। मल मूत्र त्याग करते समय दांत पर दांत बैठाकर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता।

5.कब्ज से बचाव : जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने का नियम है। ऐसा करने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर भी दबाव पड़ता है, जिनका संबंध सीधे आंतों से है। इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की श‍िकायत नहीं होती है। पेट साफ होने पर शरीर और मन, दोनों ही सेहतमंद रहते हैं।

6.शुक्राणुओं की रक्षा : दाएं कान के पास से वे नसें भी गुजरती हैं, जिसका संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों से होता है। मूत्र त्याग के वक्त दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैं, जिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है। इससे इंसान के बल और तेज में वृद्ध‍ि होती है।

7.स्मरण शक्ति‍ की रक्षा : कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्त‍ि का क्षय नहीं होता है। इससे स्मृति कोष बढ़ता रहता है। कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें एक्ट‍िव हो जाती हैं, जिनका संबंध स्मरण शक्त‍ि से होता है। दरअसल, गलतियां करने पर बच्चों के कान पकड़ने या ऐंठने के पीछे भी मूल कारण यही होता था।

8.आचरण की शुद्धता से बढ़ता मानसिक बल : कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है। पवित्रता का अहसास होने से आचरण शुद्ध होने लगते हैं। आचरण की शुद्धत से मानसिक बल बढ़ता है।

9.बुरी आत्माओं से रक्षा : ऐसी मान्यता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी आत्माएं नहीं फटकती हैं। इसका कारण यह है कि जनेऊ धारण करने वाला खुद पवित्र आत्मरूप बन जाता है और उसमें स्वत: ही आध्यात्म‍िक ऊर्जा का विकास होता है।

अलगे पन्ने पर कान में ही क्यों लपेटते हैं जनेऊ

क्यों कान पर लपेटते हैं जनेऊं : मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।

कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है। कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है। जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है। वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।

विद्यालयों में बच्चों के कान खींचने के मूल में एक यह भी तथ्य छिपा हुआ है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है। इसलिए भी यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।

जनेऊ का धार्मिक महत्व : यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है। जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है।

धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है। शास्त्रों अनुसार आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में माना गया है। अत: उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। आचमन अर्थात मंदिर आदि में जाने से पूर्व या पूजा करने के पूर्व जल से पवित्र होने की क्रिया को आचमन कहते हैं। इस्लाम धर्म में इसे वजू कहते हैं।

द्विज : स्वार्थ की संकीर्णता से निकलकर परमार्थ की महानता में प्रवेश करने को, पशुता को त्याग कर मनुष्यता ग्रहण करने को दूसरा जन्म कहते हैं। शरीर जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से वैसा ही होता है, जैसा अन्य जीवों का। आदर्शवादी जीवन लक्ष्य अपना लेने की प्रतिज्ञा करना ही वास्तविक मनुष्य जन्म में प्रवेश करना है। इसी को द्विजत्व कहते हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म।

सामाजिक महत्व : आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है। धारण करने के बाद उसे बताता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का। अब एक-एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धागों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36= 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है। अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2= 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी (1 और 1) के मिलने से बना है। 1+1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है। जब हम अपने दोनों पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।

यज्ञोपवीत धारण करने के नियम

यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है।

लड़की भी पहन सकती है जनेऊ : वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

कब पहने जनेऊ : जिस दिन गर्भ धारण किया हो उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद अधिकतर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उनको विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायिगी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।

यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।।

अर्थात : अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही इसे उतारें।

किसी भी धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि करने के पूर्व जनेऊ धारण करना जरूरी है।

विवाह तब तक नहीं होता जब तक की जनेऊ धारण नहीं किया जाता है।

जब भी मूत्र या शौच विसर्जन करते वक्त जनेऊ धारण किया जाता है।

यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।

यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।

जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।

यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।

देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।

अंत में जानिए आखिर जनेऊ क्या है, कैसे बनती और धारण करते हैं

जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्‍यरूप से तीन धागे होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने।

पांच गांठ : यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।

जनेऊ की लंबाई : यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

जनेऊ धारण वस्त्र : जनेऊ धारण करते वक्त बालक के हाथ में एक दंड होता है। वह बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है। गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन करके उसके शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होती है। मेखला और कोपीन पहनी जाती है।

मेखला, कोपीन, दंड : मेखला और कोपीन संयुक्त रूप से दी जाती है। कमर में बांधने योग्य नाड़े जैसे सूत्र को मेखला कहते हैं। मेखला को मुंज और करधनी भी कहते हैं। कपड़े की सिली हुई सूत की डोरी, कलावे के लम्बे टुकड़े से मेखला बनती है। कोपीन लगभग 4 इंच चौड़ी डेढ़ फुट लम्बी लंगोटी होती है। इसे मेखला के साथ टांक कर भी रखा जा सकता है। दंड के लिए लाठी या ब्रह्म दंड जैसा रोल भी रखा जा सकता है। यज्ञोपवीत को पीले रंग में रंगकर रखा जाता है।

जनेऊ धारण : बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड लेकर, कोपीन और पीला दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है।

गायत्री मंत्र : यज्ञोपवीत गायत्री मंत्र से शुरू होता है। गायत्री- उपवीत का सम्मिलन ही द्विजत्व है। यज्ञोपवीत में तीन तार हैं, गायत्री में तीन चरण हैं। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ प्रथम चरण, ‘भर्गोदेवस्य धीमहि’ द्वितीय चरण, ‘धियो यो न: प्रचोदयात्’ तृतीय चरण है। गायत्री महामंत्र की प्रतिमा- यज्ञोपवीत, जिसमें 9 शब्द, तीन चरण, सहित तीन व्याहृतियां समाहित हैं।

यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।

आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

ऐसे करते हैं संस्कार : यज्ञोपवित संस्कार प्रारम्भ करने के पूर्व बालक का मुंडन करवाया जाता है। उपनयन संस्कार के मुहूर्त के दिन लड़के को स्नान करवाकर उसके सिर और शरीर पर चंदन केसर का लेप करते हैं और जनेऊ पहनाकर ब्रह्मचारी बनाते हैं। फिर होम करते हैं। फिर विधिपूर्वक गणेशादि देवताओं का पूजन, यज्ञवेदी एवं बालक को अधोवस्त्र के साथ माला पहनाकर बैठाया जाता है। फिर दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके देवताओं के आह्‍वान के साथ उससे शास्त्र शिक्षा और व्रतों के पालन का वचन लिया जाता है।

फिर उसकी उम्र के बच्चों के साथ बैठाकर चूरमा खिलाते हैं फिर स्नान कराकर उस वक्त गुरु, पिता या बड़ा भाई गायत्री मंत्र सुनाकर कहता है कि आज से तू अब ब्राह्मण हुआ अर्थात ब्रह्म ,,सिर्फ ईश्वर को मानने वाला,, को माने वाला हुआ।

इसके बाद मृगचर्म ओढ़कर मुंज (मेखला) का कंदोरा बांधते हैं और एक दंड हाथ में दे देते हैं। तत्पश्चात्‌ वह बालक उपस्थित लोगों से भीक्षा मांगता है। शाम को खाना खाने के पश्चात्‌ दंड को साथ कंधे पर रखकर घर से भागता है और कहता है कि मैं पढ़ने के लिए काशी जाता हूं। बाद में कुछ लोग शादी का लालच देकर पकड़ लाते हैं। तत्पश्चात वह लड़का ब्राह्मण मान लिया जाता है।

जनेऊ संस्कार का समय : माघ से लेकर छ: मास उपनयन के लिए उपयुक्त हैं। प्रथम, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पूर्णमासी एवं अमावस की तिथियां बहुधा छोड़ दी जाती हैं। सप्ताह में बुध, बृहस्पति एवं शुक्र सर्वोत्तम दिन हैं, रविवार मध्यम तथा सोमवार बहुत कम योग्य है। किन्तु मंगल एवं शनिवार निषिद्ध माने जाते हैं।

मुहूर्त : नक्षत्रों में हस्त, चित्रा, स्वाति, पुष्य, घनिष्ठा, अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, श्रवण एवं रवती अच्छे माने जाते हैं। एक नियम यह है कि भरणी, कृत्तिका, मघा, विशाखा, ज्येष्ठा, शततारका को छोड़कर सभी अन्य नक्षत्र सबके लिए अच्छे हैं।

पुनश्च: : पूर्वाषाढ, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, ज्येष्ठा, पूर्वाफाल्गुनी, मृगशिरा, पुष्य, रेवती और तीनों उत्तरा नक्षत्र द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दसमी, एकादसी, तथा द्वादसी तिथियां, रवि, शुक्र, गुरु और सोमवार दिन, शुक्ल पक्ष, सिंह, धनु, वृष, कन्या और मिथुन राशियां उत्तरायण में सूर्य के समय में उपनयन यानी यज्ञोपवीत यानी जनेऊ संस्कार शुभ होता है।

जनेऊ धारण के नियम

मल-मूत्र विसर्जन के दौरान जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका मूल भाव यह है कि जनेऊ कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। यह बेहद जरूरी होता है।

अगर जनेऊ का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।

घर में जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी जनेऊ संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।

जनेऊ शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।

बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिए।

जनेऊ का वैज्ञानिक महत्व

1. बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से ऐसे स्वप्न नहीं आते।

जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।

जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति सफाई नियमों में बंधा होता है। वयह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है।

4. जनेऊ को दायें कान पर धारण करने से कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है।

दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।

कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।

कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह रेखा नियंत्रित रहती है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।🌹🌹🌹 जय श्री राम🌹🌹🌹


                   🙏 हे महादेव ॥🙏

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कामवासना (Sexual energy) को भारतीय दर्शन और मनोविज्ञान में एक अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा

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 कामवासना (Sexual energy) को भारतीय दर्शन और मनोविज्ञान में एक अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा


माना गया है। सात्विक दृष्टिकोण का अर्थ है—शुद्धता, संतुलन और ऊर्ध्वगमन (ऊपर की ओर उठाना)। काम का सात्विक उपयोग इसे केवल शारीरिक भोग से हटाकर सृजन और आध्यात्मिक उन्नति की ओर मोड़ने की प्रक्रिया है।

​इसके मुख्य सात्विक उपयोग निम्नलिखित हैं:

​1. सृष्टि का सृजन और निरंतरता

​सात्विक दृष्टि में कामवासना का प्राथमिक उद्देश्य उत्तम संतान की उत्पत्ति है। इसे एक "यज्ञ" की तरह देखा जाता है, जहाँ संभोग का उद्देश्य केवल इंद्रिय सुख न होकर, समाज को एक सजग और संस्कारी नई पीढ़ी देना होता है।

​2. प्रेम और आत्मीयता की प्रगाढ़ता

​जब कामवासना में स्वार्थ या केवल शरीर का आकर्षण नहीं होता, तो वह प्रेम (Love) में बदल जाती है। पति और पत्नी के बीच यह ऊर्जा आपसी विश्वास, मित्रता और मानसिक जुड़ाव को गहरा करने का माध्यम बनती है। यह दो व्यक्तियों के बीच के "अहंकार" को मिटाकर उन्हें एक-दूसरे के प्रति समर्पित बनाती है।

​3. ओज और मेधा में परिवर्तन (Transmutation)

​योग शास्त्र के अनुसार, काम ऊर्जा को यदि संयमित रखा जाए, तो यह 'ओज' (Body Vitality) और 'मेधा' (Intellectual power) में परिवर्तित हो जाती है।

​ब्रह्मचर्य और संयम: इसका अर्थ पूर्ण दमन नहीं, बल्कि ऊर्जा का समझदारी से उपयोग है।

​यह मानसिक एकाग्रता, साहस और बौद्धिक क्षमता को बढ़ाती है।

​4. कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति

​महान कलाकार, लेखक और विचारक अपनी इस आंतरिक ऊर्जा को सृजनात्मक कार्यों में लगाते हैं। जब व्यक्ति कामवासना को एक कला (जैसे संगीत, लेखन या चित्रकला) का रूप देता है, तो वह सात्विक श्रेणी में आता है क्योंकि वह संसार को सौंदर्य और प्रेरणा प्रदान कर रहा होता है।

​5. आध्यात्मिक उन्नति (Sublimation)

​कामवासना को 'मूलाधार चक्र' की ऊर्जा माना जाता है। साधना के माध्यम से जब इस ऊर्जा को ऊपर की ओर (सहस्रार चक्र की ओर) प्रवाहित किया जाता है, तो यह आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करती है। सात्विक उपयोग में व्यक्ति अपनी वासना को 'उपासना' में बदल देता है।

योगदा सन्यासी के प्रवचन से

चित्र नैनो बनाना से साभार डॉ  आनंद दीक्षित Facebook 


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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

विद्युतमानस यंत्र एक अत्यंत सूक्ष्म तांत्रिक यंत्र

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 विद्युतमानस यंत्र एक अत्यंत सूक्ष्म तांत्रिक यंत्र


माना जाता है, जिसका संबंध मन, ऊर्जा और विचार तरंगों को नियंत्रित करने से जोड़ा जाता है। “विद्युत” अर्थात ऊर्जा और “मानस” अर्थात मन—इन दोनों के संयोग से यह यंत्र साधक के मानसिक क्षेत्र को स्थिर, तेज और प्रभावशाली बनाने का माध्यम बनता है। तांत्रिक परंपरा में इसे मानसिक विद्युत शक्ति को जाग्रत करने वाला साधन कहा गया है, जो व्यक्ति के विचारों को दिशा देने और आकर्षण शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है।


यह यंत्र मुख्यतः मन को केंद्रित करने, ध्यान में स्थिरता लाने, संकल्प शक्ति बढ़ाने और सूक्ष्म अनुभूति को जाग्रत करने के लिए उपयोग किया जाता है। कुछ साधनाओं में इसे वशीकरण, आकर्षण और संवाद शक्ति को प्रबल करने के लिए भी प्रयोग किया जाता है, क्योंकि यह विचार तरंगों को प्रभावी बनाने की क्षमता से जोड़ा जाता है। जो व्यक्ति लगातार मानसिक अशांति, भ्रम या निर्णय लेने में कमजोरी अनुभव करता है, उसके लिए यह यंत्र सहायक माना जाता है।


इसके लाभों की बात करें तो यह मन को स्थिर करता है, ध्यान में गहराई लाता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है और व्यक्ति की आंतरिक ऊर्जा को संतुलित करता है। साधक के भीतर एक प्रकार की तेजस्विता और आकर्षण उत्पन्न होने लगता है, जिससे उसके शब्द और विचार अधिक प्रभावशाली बनते हैं। आध्यात्मिक साधना में यह यंत्र अंतर्ज्ञान को भी जाग्रत करने में सहायक माना गया है।

लेकिन हर शक्ति के साथ सावधानी आवश्यक होती है। यदि इस यंत्र का उपयोग गलत उद्देश्य या असंयमित मन से किया जाए तो मानसिक असंतुलन, अधिक विचारों का दबाव या बेचैनी उत्पन्न हो सकती है। बिना गुरु मार्गदर्शन के गहरी तांत्रिक साधना में इसका प्रयोग करना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि यह मन के सूक्ष्म स्तर पर कार्य करता है और गलत प्रयोग से विपरीत परिणाम भी मिल सकते हैं।


यह यंत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयुक्त माना जाता है जो साधना, ध्यान, तंत्र या मनोवैज्ञानिक शक्ति को विकसित करना चाहते हैं। सामान्य व्यक्ति भी इसे रख सकता है, लेकिन केवल शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा के उद्देश्य से ही इसका उपयोग करना चाहिए।


इसे रखने का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। विद्युतमानस यंत्र को घर के पूजा स्थल, ध्यान कक्ष या अध्ययन स्थान में रखा जाना चाहिए, जहाँ शांति और पवित्रता बनी रहे। इसे सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए, बल्कि लकड़ी या धातु के आसन पर स्थापित करना उचित होता है। साधना के समय इसे अपने सामने रखकर ध्यान करना अधिक प्रभावी माना जाता है।


अंततः यह यंत्र केवल धातु या रेखाओं का बना हुआ एक चित्र नहीं है, बल्कि यह मन की ऊर्जा को दिशा देने वाला एक माध्यम है। सही भावना, संयम और श्रद्धा के साथ इसका उपयोग किया जाए तो यह साधक के जीवन में अद्भुत परिवर्तन ला सकता है, अन्यथा यह केवल एक सामान्य यंत्र बनकर रह जाता है।


नमामीशमीशान 

#विद्युतमानस_यंत्र #तांत्रिक_साधना #मनशक्ति #आकर्षण_शक्ति #ध्यान_साधना #नमामीशमीशान #namamishan साभार Facebook 


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शनिवार, 25 अप्रैल 2026

खाली जगह” से कणों का जन्म: आधुनिक भौतिकी का चौंकाने वाला सच?

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 “खाली जगह” से कणों का जन्म: आधुनिक भौतिकी का चौंकाने वाला सच?


हाल ही में वैज्ञानिकों ने प्रयोगों में पहली बार यह स्पष्ट रूप से देखा कि कण वास्तव में खाली जगह यानी वैक्यूम से उत्पन्न हो सकते हैं। पहली नजर में यह दावा किसी जादू जैसा लगता है लेकिन इसके पीछे क्वांटम भौतिकी के गहरे सिद्धांत काम कर रहे हैं।


क्या खाली जगह सच में खाली है?


भौतिकी में जिसे हम खाली स्थान कहते हैं उसे क्वांटम वैक्यूम कहा जाता है। लेकिन यह पूरी तरह खाली नहीं होता बल्कि इसमें लगातार सूक्ष्म ऊर्जा उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। इन उतार-चढ़ावों से क्षणिक कण (virtual particles) बनते और मिटते रहते हैं यानी शून्य भी एक सक्रिय अवस्था है,जिसमें ऊर्जा छिपी रहती है।


कण कैसे पैदा होते हैं?

इस घटना को समझाने के लिए वैज्ञानिक Schwinger Effect का सहारा लेते हैं। इसमें बहुत शक्तिशाली विद्युत या ऊर्जा क्षेत्र वैक्यूम को अस्थिर बना देता है और वहाँ से कण-एंटी कण जोड़ी उत्पन्न होती है। पहले यह केवल सिद्धांत था लेकिन अब प्रयोगों में इसके संकेत स्पष्ट रूप से देखे गए हैं।


गहराई से विश्लेषण

1. ऊर्जा से पदार्थ (Energy → Matter)

यह खोज दिखाती है कि ऊर्जा को सही परिस्थितियों में सीधे पदार्थ में बदला जा सकता है। यह E=mc² के सिद्धांत की पुष्टि करती है।

2. ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंध

यह घटना हमें शुरुआती ब्रह्मांड की झलक देती है। जब पूरा ब्रह्मांड अत्यधिक ऊर्जा से भरा था और वहीं से पहला पदार्थ बना  यानी कुछ नहीं से कुछ बनने की प्रक्रिया वास्तव में संभव है लेकिन ऊर्जा के माध्यम से।

3. प्रयोगात्मक उपलब्धि

इस खोज का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह सिर्फ गणितीय सिद्धांत नहीं रहा बल्कि प्रयोगों में देखा और मापा जा चुका है। यह आधुनिक भौतिकी के लिए एक बड़ा कदम है।


एक जरूरी स्पष्टता

यह समझना जरूरी है कि कण सच में कुछ नहीं से नहीं बनते बल्कि पहले से मौजूद ऊर्जा से बनते हैं यानी ऊर्जा संरक्षण का नियम (Conservation of Energy) अभी भी लागू होता है


वैज्ञानिक महत्व

यह खोज भविष्य में कई क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है:

* क्वांटम कंप्यूटिंग

* ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology)

* डार्क एनर्जी और डार्क मैटर के अध्ययन

यह हमें ब्रह्मांड के सबसे बुनियादी सवालों के करीब ले जाती है।


निष्कर्ष

खाली जगह से कणों का निकलना यह साबित करता है कि ब्रह्मांड में शून्य वास्तव में खाली नहीं है यह ऊर्जा और संभावनाओं से भरा हुआ है यानि जिसे हम कुछ नहीं समझते हैं,वही शायद सब कुछ बनने की शुरुआत है। साभार factwala Facebook wall


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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

5000 साल पुरानी “मोहेंजो-दड़ो की सील” – क्या आप जानते हैं

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 5000 साल पुरानी “मोहेंजो-दड़ो की सील” – क्या आप जानते हैं









ये राज़?ये तस्वीर की एक प्राचीन सील की है…

इतनी छोटी चीज़, लेकिन इसके अंदर छिपी है पूरी सभ्यता की कहानी!रोचक तथ्य जो आपको हैरान कर देंगे:

. 2600–1900 BCE की निशानी

ये सील सिंधु घाटी सभ्यता के समय की है — यानी आज से लगभग 4000–5000 साल पुरानी!

. रहस्यमयी भाषाइस पर जो चिन्ह बने हैं, वो अभी तक पूरी तरह पढ़े नहीं जा सके हैं।आज तक कोई भी इन्हें पूरी तरह डिकोड नहीं कर पाया! जानवर क्यों बने हैं? सील पर बने जानवर (जैसे बैल/बकरी) सिर्फ सजावट नहीं थे ये व्यापार, पहचान या परिवार के “लोगो” की तरह इस्तेमाल होते थे। बिजनेस कार्ड जैसा इस्तेमालइन सीलों को मिट्टी पर दबाकर “स्टैंप” की तरह इस्तेमाल किया जाता था जैसे आज हम सिग्नेचर या ब्रांड लगाते हैं!ट्रेडिंग सुपरपावर ऐसी सीलें तक मिली हैं —मतलब उस समय भारत का इंटरनेशनल व्यापार चलता था!

. पीछे का उभार क्यों?पीछे जो गोल उभरा हुआ हिस्सा है, वो पकड़ने या पहनने के लिए होता था यानी ये पोर्टेबल आइडेंटिटी टूल था! सोचिए… जब दुनिया में कई जगह सभ्यता शुरू भी नहीं हुई थी,तब भारत में लोग ब्रांडिंग, ट्रेड और सिस्टम से जी रहे थे!इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं… इन छोटी-छोटी चीज़ों में छुपा है।मोहेंजो-दड़ो की सील — सच और रोमांच एक साथ

ये सीलें सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600–1900 BCE) की हैं।यानि सच में ~4000–4500 साल पुरानी — इसमें कोई शक नहीं।. भाषा रहस्य — अभी भी अनसुलझा

सीलों पर जो लिपि है, उसे Indus Script कहा जाता है।

आज तक कोई भी इसे पूरी तरह पढ़ नहीं पाया — ये बात 100% सही है।लेकिन ध्यान रहे:कुछ विद्वान इसे भाषा मानते हैं,कुछ कहते हैं ये सिर्फ symbols (प्रतीक) भी हो सकते हैं।

 जानवरों का मतलब — पूरी तरह तय नहीं

आपने कहा “लोगो या परिवार चिन्ह” — ये संभावना है, लेकिन पक्का नहीं।सीलों पर अक्सर दिखते हैं:एक-सींग वाला “यूनिकॉर्न” (असल में काल्पनिक)

बैल, हाथी, गैंडाकुछ कहते हैं व्यापारिक पहचान कुछ इसे धार्मिक/प्रतीकात्मक महत्व मानते हैं

. “बिजनेस कार्ड” — आधा सहीसील का इस्तेमाल मिट्टी पर छाप लगाने के लिए होता था — ये सही है।लेकिन:ये सिर्फ “signature” नहीं, बल्कि माल की पहचान / सीलिंग (sealings) के लिए भी थाजैसे आज के official stamp + brand mark का कॉम्बिनेशन इंटरनेशनल ट्रेड मेसोपोटामिया (आज का इराक क्षेत्र) में भी ऐसी सीलें मिली हैं।इसका मतलब:सिंधु सभ्यता का व्यापार बाहर तक फैला था पीछे का उभार (Boss) — सही समझपीछे जो गोल उभार होता है:उसे “boss” कहते हैं इसे पकड़ने या धागे में पहनने के लिए इस्तेमाल किया जाता थासिंधु सभ्यता अकेली नहीं, बल्कि दुनिया की कई उन्नत सभ्यताओं में से एक थी।

 “पशुपति सील” — सिंधु घाटी की सबसे चर्चित और रहस्यमयी सील की — जिसे अक्सर “पशुपति सील” कहा जाता है। ये सील क्या दिखाती है?

यह सील मोहेंजो-दड़ो से मिली है।एक सींग वाला मानव/देवता जैसा आकृति योग मुद्रा (पद्मासन जैसी) में बैठा हुआचारों तरफ जानवर — हाथी, बाघ, गैंडा, भैंसानीचे हिरण जैसे पशु इसी वजह से इसे “पशुओं का स्वामी” यानी पशुपति कहा गया क्या ये भगवान शिव हैं?

बहुत लोग इसे भगवान शिव का प्राचीन रूप मानते हैं — लेकिन यहाँ सावधानी जरूरी है। क्यों लोग शिव से जोड़ते हैं:

योग मुद्रा → शिव “योगेश्वर” माने जाते हैं

जानवरों से घिरा → “पशुपति” (पशुओं के स्वामी)

सिर पर सींग → कुछ लोग इसे त्रिशूल/मुकुट से जोड़ते हैं

प्रकृति पर नियंत्रण / संतुलन चार दिशाओं का प्रतीक अलग-अलग शक्तियों का संकेत

 सत्य नहीं  सबसे दिलचस्प बात यह सील दिखाती है कि:उस समय लोग योग जैसी मुद्रा जानते थेऔर शायद प्रकृति/पशुओं से जुड़े देवताओं की पूजा करते थे यह सील सिंधु सभ्यता की धार्मिक सोच की झलक देती हैशिव से मिलती-जुलती बातें हैं लेकिन इसे सीधे “भगवान शिव” कहना अभी प्रमाणित नहीं हैदेवी पूजा (Mother Goddess)सिंधु सभ्यता में बहुत सी मिट्टी की स्त्री मूर्तियाँ मिली हैं ये उर्वरता (fertility) और प्रकृति की देवी हो सकती हैंआज के हिंदू धर्म में शक्ति / दुर्गा / पार्वती की पूजा

ये वही देवी हैं — इसका पक्का प्रमाण नहीं

. वृक्ष पूजा (Tree Worship)

कई सीलों में पेड़ (खासकर पीपल जैसा) दिखता है।

आज भी पीपल का पेड़ पवित्र माना जाता है

 इससे लगता है कि प्रकृति पूजा बहुत पुरानी परंपरा है पशु और पवित्रताबैल, गाय, और अन्य जानवरों को महत्व दिया गयाकुछ सीलों में विशेष पशु बार-बार दिखते हैं समानता:

हिंदू धर्म में गाय और नंदी (शिव का वाहन) का महत्व

नंदी = वही बैल” कहना अभी साबित नहीं अग्नि पूजा के संकेतकालीबंगन में अग्नि कुंड (fire altars) मिले हैं

समानता:हिंदू धर्म में यज्ञ और अग्नि पूजायह एक मजबूत कड़ी मानी जाती है. योग के शुरुआती प्रमाण“पशुपति सील” जैसी आकृतियाँ योग मुद्रा में दिखती हैं

समानता:

आज का योग, तपस्या, ध्यान संभव है कि योग की जड़ें बहुत प्राचीन हों


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रविवार, 5 अप्रैल 2026

जीवन की सलाह

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 योग,भोग और रोग ये तीन अवस्थाएं है।

2. लकवा - सोडियम की कमी के कारण होता है ।

3. हाई वी पी में - स्नान व सोने से पूर्व एक गिलास जल का सेवन करें तथा स्नान करते समय थोड़ा सा नमक पानी मे डालकर स्नान करे ।

4. लो बी पी - सेंधा नमक डालकर पानी पीयें ।


5. कूबड़ निकलना- फास्फोरस की कमी ।

6. कफ - फास्फोरस की कमी से कफ बिगड़ता है , फास्फोरस की पूर्ति हेतु आर्सेनिक की उपस्थिति जरुरी है । गुड व शहद खाएं

7. दमा, अस्थमा - सल्फर की कमी ।

8. सिजेरियन आपरेशन - आयरन , कैल्शियम की कमी ।

9. सभी क्षारीय वस्तुएं दिन डूबने के बाद खायें ।

10. अम्लीय वस्तुएं व फल दिन डूबने से पहले खायें ।

11. जम्भाई- शरीर में आक्सीजन की कमी ।

12. जुकाम - जो प्रातः काल जूस पीते हैं वो उस में काला नमक व अदरक डालकर पियें ।

13. ताम्बे का पानी - प्रातः खड़े होकर नंगे पाँव पानी ना पियें ।

14. किडनी - भूलकर भी खड़े होकर गिलास का पानी ना पिये ।

15. गिलास एक रेखीय होता है तथा इसका सर्फेसटेन्स अधिक होता है । गिलास अंग्रेजो ( पुर्तगाल) की सभ्यता से आयी है अतः लोटे का पानी पियें, लोटे का कम सर्फेसटेन्स होता है ।

16. अस्थमा , मधुमेह , कैंसर से गहरे रंग की वनस्पतियाँ बचाती हैं ।

17. वास्तु के अनुसार जिस घर में जितना खुला स्थान होगा उस घर के लोगों का दिमाग व हृदय भी उतना ही खुला होगा ।

18. परम्परायें वहीँ विकसित होगीं जहाँ जलवायु के अनुसार व्यवस्थायें विकसित होगीं ।

19. पथरी - अर्जुन की छाल से पथरी की समस्यायें ना के बराबर है ।

20. RO का पानी कभी ना पियें यह गुणवत्ता को स्थिर नहीं रखता । कुएँ का पानी पियें । बारिस का पानी सबसे अच्छा , पानी की सफाई के लिए सहिजन की फली सबसे बेहतर है ।

21. सोकर उठते समय हमेशा दायीं करवट से उठें या जिधर का स्वर चल रहा हो उधर करवट लेकर उठें ।

22. पेट के बल सोने से हर्निया, प्रोस्टेट, एपेंडिक्स की समस्या आती है ।

23. भोजन के लिए पूर्व दिशा , पढाई के लिए उत्तर दिशा बेहतर है ।

24. HDL बढ़ने से मोटापा कम होगा LDL व VLDL कम होगा ।

25. गैस की समस्या होने पर भोजन में अजवाइन मिलाना शुरू कर दें ।

26. चीनी के अन्दर सल्फर होता जो कि पटाखों में प्रयोग होता है , यह शरीर में जाने के बाद बाहर नहीं निकलता है। चीनी खाने से पित्त बढ़ता है ।

27. शुक्रोज हजम नहीं होता है फ्रेक्टोज हजम होता है और भगवान् की हर मीठी चीज में फ्रेक्टोज है ।

28. वात के असर में नींद कम आती है ।

29. कफ के प्रभाव में व्यक्ति प्रेम अधिक करता है ।

30. कफ के असर में पढाई कम होती है ।


31. पित्त के असर में पढाई अधिक होती है ।

33. आँखों के रोग - कैट्रेक्टस, मोतियाविन्द, ग्लूकोमा , आँखों का लाल होना आदि ज्यादातर रोग कफ के कारण होता है ।

34. शाम को वात -नाशक चीजें खानी चाहिए ।

35. प्रातः 4 बजे जाग जाना चाहिए ।

36. सोते समय रक्त दवाव सामान्य या सामान्य से कम होता है ।

37. व्यायाम - वात रोगियों के लिए मालिश के बाद व्यायाम , पित्त वालों को व्यायाम के बाद मालिश करनी चाहिए । कफ के लोगों को स्नान के बाद मालिश करनी चाहिए ।

38. भारत की जलवायु वात प्रकृति की है , दौड़ की बजाय सूर्य नमस्कार करना चाहिए ।

39. जो माताएं घरेलू कार्य करती हैं उनके लिए व्यायाम जरुरी नहीं ।

40. निद्रा से पित्त शांत होता है , मालिश से वायु शांति होती है , उल्टी से कफ शांत होता है तथा उपवास(लंघन) से बुखार शांत होता है ।

41. भारी वस्तुयें शरीर का रक्तदाब बढाती है , क्योंकि उनका गुरुत्व अधिक होता है ।

42. दुनियां के महान वैज्ञानिक का स्कूली शिक्षा का सफ़र अच्छा नहीं रहा, चाहे वह 8 वीं फेल न्यूटन हों या 9 वीं फेल आइस्टीन हों ,

43. माँस खाने वालों के शरीर से अम्ल-स्राव करने वाली ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं ।

44. तेल हमेशा गाढ़ा खाना चाहिएं सिर्फ लकडी वाली घाणी का , दूध हमेशा पतला पीना चाहिए ।

45.छिलके वाली दाल-सब्जियों से कोलेस्ट्रोल हमेशा घटता है ।

46. कोलेस्ट्रोल की बढ़ी हुई स्थिति में इन्सुलिन खून में नहीं जा पाता है । ब्लड शुगर का सम्बन्ध ग्लूकोस के साथ नहीं अपितु कोलेस्ट्रोल के साथ है ।

47.मिर्गी दौरे में अमोनिया या चूने की गंध सूँघानी चाहिए ।

48.सिरदर्द में एक चुटकी नौसादर व अदरक का रस रोगी को सुंघायें ।

49. भोजन के पहले मीठा खाने से बाद में खट्टा खाने से शुगर नहीं होता है ।

50.भोजन के आधे घंटे पहले सलाद खाएं उसके बाद भोजन करें ।

51. अवसाद में आयरन , कैल्शियम , फास्फोरस की कमी हो जाती है । फास्फोरस गुड और अमरुद में अधिक है

52. पीले केले में आयरन कम और कैल्शियम अधिक होता है । हरे केले में कैल्शियम थोडा कम लेकिन फास्फोरस ज्यादा होता है तथा लाल केले में कैल्शियम कम आयरन ज्यादा होता है । हर हरी चीज में भरपूर फास्फोरस होती है, वही हरी चीज पकने के बाद पीली हो जाती है जिसमे कैल्शियम अधिक होता है ।

53. छोटे केले में बड़े केले से ज्यादा कैल्शियम होता है ।

54.रसौली की गलाने वाली सारी दवाएँ चूने से बनती हैं ।

55. हेपेटाइट्स A से E तक के लिए चूना बेहतर है ।

56. एंटी टिटनेस के लिए हाईपेरियम 200 की दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दे ।

57. ऐसी चोट जिसमे खून जम गया हो उसके लिए नैट्रमसल्फ दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दें । बच्चो को एक बूंद पानी में डालकर दें ।

58. मोटे लोगों में कैल्शियम की कमी होती है अतः त्रिफला दें । त्रिकूट ( सोंठ+कालीमिर्च+ मघा पीपली ) भी दे सकते हैं ।

59. अस्थमा में नारियल दें । नारियल फल होते हुए भी क्षारीय है ।दालचीनी + गुड + नारियल दें ।

60. चूना बालों को मजबूत करता है तथा आँखों की रोशनी बढाता है ।


61. दूध का सर्फेसटेंसेज कम होने से त्वचा का कचरा बाहर निकाल देता है ।

62. गाय की घी सबसे अधिक पित्तनाशक फिर कफ व वायुनाशक है ।

63. जिस भोजन में सूर्य का प्रकाश व हवा का स्पर्श ना हो उसे नहीं खाना चाहिए

64. गौ-मूत्र अर्क आँखों में ना डालें ।

65. गाय के दूध में घी मिलाकर देने से कफ की संभावना कम होती है लेकिन चीनी मिलाकर देने से कफ बढ़ता है।

66.मासिक के दौरान वायु बढ़ जाता है , 3-4 दिन स्त्रियों को उल्टा सोना चाहिए इससे गर्भाशय फैलने का खतरा नहीं रहता है । दर्द की स्थति में गर्म पानी में देशी घी दो चम्मच डालकर पियें ।

67.रात में आलू खाने से वजन बढ़ता है ।

68.भोजन के बाद बज्रासन में बैठने से वात नियंत्रित होता है ।

69.भोजन के बाद कंघी करें कंघी करते समय आपके बालों में कंघी के दांत चुभने चाहिए । बाल जल्द सफ़ेद नहीं होगा ।

70.अजवाईन अपान वायु को बढ़ा देता है जिससे पेट की समस्यायें कम होती है

71.अगर पेट में मल बंध गया है तो अदरक का रस या सोंठ का प्रयोग करें

72. कब्ज होने की अवस्था में सुबह पानी पीकर कुछ देर एडियों के बल चलना चाहिए ।

73. रास्ता चलने, श्रम कार्य के बाद थकने पर या धातु गर्म होने पर दायीं करवट लेटना चाहिए ।

74. जो दिन मे दायीं करवट लेता है तथा रात्रि में बायीं करवट लेता है उसे थकान व शारीरिक पीड़ा कम होती है ।

75. बिना कैल्शियम की उपस्थिति के कोई भी विटामिन व पोषक तत्व पूर्ण कार्य नहीं करते है ।

76.स्वस्थ्य व्यक्ति सिर्फ 5 मिनट शौच में लगाता है ।

77.भोजन करते समय डकार आपके भोजन को पूर्ण और हाजमे को संतुष्टि का संकेत है ।

78.सुबह के नाश्ते में फल , दोपहर को दही व रात्रि को दूध का सेवन करना चाहिए ।

79. रात्रि को कभी भी अधिक प्रोटीन वाली वस्तुयें नहीं खानी चाहिए । जैसे - दाल , पनीर , राजमा , लोबिया आदि ।

80. शौच और भोजन के समय मुंह बंद रखें , भोजन के समय टी वी ना देखें ।

81.मासिक चक्र के दौरान स्त्री को ठंडे पानी से स्नान , व आग से दूर रहना चाहिए ।

82. जो बीमारी जितनी देर से आती है , वह उतनी देर से जाती भी है ।

83. जो बीमारी अंदर से आती है , उसका समाधान भी अंदर से ही होना चाहिए ।

84.एलोपैथी ने एक ही चीज दी है , दर्द से राहत । आज एलोपैथी की दवाओं के कारण ही लोगों की किडनी , लीवर , आतें , हृदय ख़राब हो रहे हैं । एलोपैथी एक बिमारी खत्म करती है तो दस बिमारी देकर भी जाती है ।

85. खाने की वस्तु में कभी भी ऊपर से नमक नहीं डालना चाहिए , ब्लड-प्रेशर बढ़ता है ।

86 .रंगों द्वारा चिकित्सा करने के लिए इंद्रधनुष को समझ लें , पहले जामुनी , फिर नीला ..... अंत में लाल रंग ।

87 .छोटे बच्चों को सबसे अधिक सोना चाहिए , क्योंकि उनमें वह कफ प्रवृति होती है , स्त्री को भी पुरुष से अधिक विश्राम करना चाहिए

88. जो सूर्य निकलने के बाद उठते हैं , उन्हें पेट की भयंकर बीमारियां होती है , क्योंकि बड़ी आँत मल को चूसने लगती है ।

89.बिना शरीर की गंदगी निकाले स्वास्थ्य शरीर की कल्पना निरर्थक है , मल-मूत्र से 5% , कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ने से 22 %, तथा पसीना निकलने लगभग 70 % शरीर से विजातीय तत्व निकलते हैं ।

90. चिंता , क्रोध , ईर्ष्या करने से गलत हार्मोन्स का निर्माण होता है जिससे कब्ज , बबासीर , अजीर्ण , अपच , रक्तचाप , थायरायड की समस्या उतपन्न होती है ।

91.गर्मियों में बेल , गुलकंद , तरबूजा , खरबूजा व सर्दियों में सफ़ेद मूसली , सोंठ का प्रयोग करें ।

92. प्रसव के बाद माँ का पीला दूध बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता को 10 गुना बढ़ा देता है । बच्चो को टीके लगाने की आवश्यकता नहीं होती है ।

93. रात को सोते समय सर्दियों में देशी मधु लगाकर सोयें त्वचा में निखार आएगा

94. दुनिया में कोई चीज व्यर्थ नहीं , हमें उपयोग करना आना चाहिए।

95.जो अपने दुखों को दूर करके दूसरों के भी दुःखों को दूर करता है , वही मोक्ष का अधिकारी है ।

96.सोने से आधे घंटे पूर्व जल का सेवन करने से वायु नियंत्रित होती है , लकवा , हार्ट-अटैक का खतरा कम होता है ।

97.स्नान से पूर्व और भोजन के बाद पेशाब जाने से रक्तचाप नियंत्रित होता है।

98 .तेज धूप में चलने के बाद , शारीरिक श्रम करने के बाद , शौच से आने के तुरंत बाद जल का सेवन निषिद्ध है

99. त्रिफला अमृत है जिससे वात, पित्त , कफ तीनो शांत होते हैं । इसके अतिरिक्त भोजन के बाद पान व चूना ।

100. इस विश्व की सबसे मँहगी दवा लार है , जो प्रकृति ने तुम्हें अनमोल दी है ,इसे ना थूके।

🙏🙏

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गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

अंगूर के बीज से निकला PCC1: उम्र बढ़ाने वाली संभावित

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 अंगूर के बीज से निकला PCC1: उम्र बढ़ाने वाली संभावित दवा

हाल ही में चीनी शोधकर्ताओं ने पाया है कि अंगूर के बीजों से प्राप्त एक प्राकृतिक यौगिक PCC1 (प्रोसायनिडिन C1) वृद्ध (सेनेसेन्ट) कोशिकाओं को लक्षित करके चूहों में उम्र बढ़ाता है। इस शोध में PCC1 को लैब माउसों में दिया गया, जिससे उनके शरीर से वृद्ध कोशिकाएँ चुनिंदा रूप से नष्ट हो गईं और चूहों का जीवनकाल बढ़ गया

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। प्रयोगशाला में PCC1 देने वाले चूहों ने स्वस्थ अवस्था (healthspan) के साथ लंबी उम्र देखी; इन चूहों ने बचे हुए जीवनकाल में लगभग 60% तक विस्तार दिखाया और कुल आयु में करीब 9–10% की वृद्धि हुई

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। इसी शोध से उम्मीद जगी है कि भविष्य में मानवों में भी ऐसी दवाएँ उम्र बढ़ने की प्रक्रियाओं को कम कर सकेंगी।

प्रमुख खोजें

PCC1 क्या है: प्रोसायनिडिन C1 अंगूर के बीज से प्राप्त एक फ्लावोनॉयड यौगिक है, जिसे प्राकृतिक उत्पादों की स्क्रीनिंग में पहचाना गया। यह वृद्ध कोशिकाओं पर काम करके उन्हें नष्ट करता है और स्वस्थ कोशिकाओं को सुरक्षित रखता है

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चूहों पर प्रभाव: चूहों में PCC1 देने से वृद्ध कोशिकाओं की संख्या कम हुई। उपचारित समूह के चूहों की औसत आयु 9–10% बढ़ी, और इलाज शुरू करने के बाद जो बचा जीवनकाल था उसमें लगभग 60% का उछाल देखा गया

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। साथ ही इन चूहों में ग्रिप ताकत, चलने की गति, संतुलन तथा धीरज जैसी कार्यक्षमताएँ भी बेहतर हुईं

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स्वास्थ्य एवं अंग कार्य: PCC1 से गुर्दे, जिगर, फेफड़े और प्रोस्टेट जैसे अंगों में सेनेसेन्ट कोशिकाओं की संख्या कम हुई

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। इसका मतलब है कि अंगों की उम्र संबंधी गिरावट धीमी हो सकती है।

भावी मानव परीक्षण: चीन की Lonvi Biosciences नामक कंपनी PCC1 आधारित कैप्सूल विकसित कर रही है और मानवों में परीक्षण की तैयारी की जा रही है

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। कंपनी का दावा है कि अगर यह सुरक्षित साबित हुई तो जीवन को 120–150 वर्ष तक बढ़ाया जा सकेगा।

शोध के परिणाम (चूहों में)

चीनी टीम ने तीन तरह के माउस प्रयोग किए। विकिरण या रासायनिक एक्सपोज़र से वृद्ध कोशिकाएँ पैदा करने के बाद PCC1 देने पर देखा कि चूहों की शरीर पर बूढ़ेपन के लक्षण (जैसे सफेद बाल) उलट गए और उनका तंदरुस्त अवस्था में बचे जीवनकाल बढ़ गया

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। वृद्ध चूहों को हर दो सप्ताह PCC1 का इंजेक्शन देने पर उनके शरीर से सक्रिय रूप से वृद्ध कोशिकाएँ हट गईं और मांसपेशियों की ताकत व सहनशीलता बढ़ी

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। कुल मिलाकर उपचारित चूहों की शेष जीवन-अवधि में 60% की वृद्धि और कुल आयु में 9–10% वृद्धि दर्ज की गई

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। ये प्रयोग दिखाते हैं कि PCC1 न केवल जीवनकाल बढ़ाता है बल्कि उम्र से जुड़ी कमजोरी और सूजन भी कम कर सकता है।

भविष्य में मानव पर असर और सावधानियाँ

चीन सरकार आज लोंगेविटी (लंबी उम्र) अनुसंधान को राष्ट्रीय प्राथमिकता दे रही है और कई बायोटेक स्टार्टअप इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं

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। Lonvi Biosciences ने PCC1 कैप्सूल के मानव परीक्षण की तैयारी शुरू की है

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। कंपनी का कहना है कि PCC1 वृद्ध कोशिकाओं को साफ करके उम्र से जुड़ी बीमारियों की जोखिम घटा सकती है। हालांकि, कई विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि चूहों में मिले नतीजे सीधे मानवों पर लागू नहीं होंगे

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Buck Institute जैसे शोधकर्ताओं का कहना है कि चूहों की जैविक प्रक्रियाएँ मनुष्यों से अलग होती हैं, इसलिए बड़े पैमाने पर क्लिनिकल ट्रायल आवश्यक हैं

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। अभी तक PCC1 पर सिर्फ पशु प्रयोग हुए हैं; मानवों में कोई प्रामाणिक परीक्षण या स्वीकृति नहीं मिली

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। वैज्ञानिकों के अनुसार वृद्धावस्था का इलाज संभव है लेकिन इसके लिए सुरक्षित खुराक, साइड इफ़ेक्ट और दीर्घकालिक असर की पड़ताल जरूरी है।


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सोमवार, 15 दिसंबर 2025

भाव और ऊर्जा का ह्रास: चेतना, श्वास और प्राण का सूक्ष्म विज्ञान

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मनुष्य केवल मांस, अस्थि और रक्त का पिंड नहीं है, बल्कि वह भाव, ऊर्जा और चेतना का एक जीवित तंत्र है। हमारे भीतर उठने वाला प्रत्येक भाव (Emotion) केवल मानसिक घटना नहीं होता, वह ऊर्जा की एक तरंग है—एक ऐसा कंपन, जो हमारे श्वास-प्रणाल और प्राण-तंत्र को सीधे प्रभावित करता है।

जैसे विद्युत का नंगा तार मात्र स्पर्श से शरीर को झकझोर देता है, वैसे ही तीव्र भाव चेतना के उस सेतु को हिला देता है, जो हमें विश्व-ऊर्जा (Cosmic Energy) से जोड़ता है।

भाव का उदय और कंपन का जन्म

जब हृदय में कोई तीव्र भाव—क्रोध, भय, वासना, ईर्ष्या या अत्यधिक आसक्ति—उत्पन्न होता है, तो सबसे पहले सूक्ष्म कंपन (Vibration) जन्म लेता है। यह कंपन केवल मन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि—

  • श्वास की प्राकृतिक लय को तोड़ देता है

  • हृदय की धड़कनों को अनियमित करता है

  • मस्तिष्क की तरंगों को अशांत करता है

इस क्षण से मनुष्य सचेत अवस्था से प्रतिक्रियात्मक अवस्था में चला जाता है।

श्वास-विकृति और प्राण-ऊर्जा का क्षय

भारतीय योग और तंत्र परंपरा में श्वास को प्राण का द्वार माना गया है।
जहाँ श्वास नियंत्रित है, वहाँ प्राण सुरक्षित है।
जहाँ श्वास विकृत है, वहाँ ऊर्जा का रिसाव प्रारंभ हो जाता है।

भाव के वशीभूत होते ही—

  • श्वासें तीव्र, उथली और असंतुलित हो जाती हैं

  • श्वास-त्याग अधिक और श्वास-ग्रहण कम हो जाता है

  • प्राण शरीर से बाहर बहने लगता है

यही कारण है कि अत्यधिक भावुक व्यक्ति जल्दी थक जाता है, निर्णय-शक्ति खो देता है और भीतर से खाली महसूस करने लगता है।

चित्त का दुर्बल होना और आत्मिक शक्ति का ह्रास

जब जीवात्मा लंबे समय तक किसी भाव के अधीन रहती है, तो उसका चित्त (Mind-Stuff) धीरे-धीरे दुर्बल होने लगता है।
चित्त की दुर्बलता का अर्थ है—

  • ध्यान में अस्थिरता

  • स्मृति का क्षय

  • इच्छाशक्ति का पतन

  • आत्मविश्वास का क्षरण

यही स्थिति आगे चलकर मानसिक तनाव, अवसाद और अस्तित्वगत शून्यता को जन्म देती है।

भाव और ऊर्जा का संतुलन: समाधान का मार्ग

भावों का दमन समाधान नहीं है; भावों का साक्षी बनना ही ऊर्जा-संरक्षण का मार्ग है।

1. श्वास-साक्षी अभ्यास

जब कोई तीव्र भाव उठे—

  • उसे रोको नहीं

  • प्रतिक्रिया मत दो

  • केवल श्वास पर ध्यान टिकाओ

कुछ ही क्षणों में कंपन शांत होने लगता है।

2. भाव से दूरी, अनुभव से निकटता

भाव को “मैं” न बनाओ।
कहो—
“यह भाव मुझमें है, पर मैं यह भाव नहीं हूँ।”

3. मौन और संयम

अनावश्यक बोलना, बहस और भावुक अभिव्यक्ति भी प्राण-क्षय का कारण बनती है।
मौन ऊर्जा-संचय का सबसे सरल साधन है।

निष्कर्ष: भाव से परे चेतना

भाव जीवन का सत्य है, पर भाव में बह जाना बंधन है।
जब मनुष्य भाव को अनुभव करता है लेकिन उसका दास नहीं बनता, तभी वह अपनी रक्षित प्राण-ऊर्जा को सुरक्षित रख पाता है।

जहाँ भाव नियंत्रित है, वहाँ श्वास संतुलित है।
जहाँ श्वास संतुलित है, वहाँ प्राण अक्षुण्ण है।
और जहाँ प्राण अक्षुण्ण है—
वहाँ चेतना स्वतंत्र है।

यही ऊर्जा का संरक्षण और आत्मिक उत्कर्ष का मार्ग है।

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काम ऊर्जा को प्रेम ऊर्जा में रूपांतरित करने के उपाय

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 काम ऊर्जा को प्रेम ऊर्जा में कैसे बदले 'काम ऊर्जा' (sexual energy) को 'प्रेम ऊर्जा' (love energy) में कैसे रूपांतरित किया जा सकता है—विभिन्न आध्यात्मिक, योगिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोणों के माध्यम 

काम ऊर्जा को प्रेम ऊर्जा में रूपांतरित करने के उपाय






काम ऊर्जा से प्रेम ऊर्जा में रूपांतरण

काम ऊर्जा (यौन ऊर्जा) को जीवन-रचनात्मकता की मूलभूत शक्ति माना जाता है। योग, तंत्र और आध्यात्मिक परंपराओं में इसे सूक्ष्म जीवन-बल की तरह देखा गया है, जिसे साधना द्वारा नियंत्रित करके उच्चतर प्रेममयी या आध्यात्मिक ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। यह ऊर्जा मानव भावनाओं और रचनात्मकता का स्रोत मानी जाती है। आधुनिक मनोविज्ञान में भी कामवासना (यौन प्रवृत्ति) को एक मूल प्रेरक बल माना जाता है, जिसे परिष्कृत कर कला, शोध या समाजसेवा जैसी ऊँची गतिविधियों में लगाया जा सकता है

योगिक दृष्टिकोण

योगिक परंपरा में ब्रह्मचर्य को कामऊर्जा नियंत्रण की सर्वोच्च कुंजी माना जाता है। ब्रह्मचर्य का मतलब कामवासना पर संयम है, जिससे काम ऊर्जा उच्च आध्यात्मिक ऊर्जाओं (ओजस शक्ति) में परिवर्तित होती है  योग ग्रंथों के अनुसार, कामवासना रचनात्मक शक्ति है; यदि इसे ध्यान और साधना द्वारा उच्चतर चक्रों की ओर निर्देशित किया जाए, तो यह दिव्य ऊर्जा में बदल जाती हैयोग में कुण्डलिनी जागरण भी काम ऊर्जा परिवर्तन का एक मार्ग है। कुंडलिनी योग अभ्यास से मुण्ड (शिखा चक्र) तक ऊर्जा चढ़ती है और दोहरी ऊर्जा (शिव और शक्ति) संतुलित होती है, जिससे सहवास और रचनात्मकता में मधुर परिवर्तन आता हैमुख्य सिद्धांत: ब्रह्मचर्य में कामवासना को बंद करके उसे उच्च कार्यों में लगाना; कुंडलिनी एवं चक्र साधना से यौन ऊर्जा का आध्यात्मिक ऊर्जाओं में रूपांतरणव्यवहारिक उपाय: ब्रह्मचर्य का अभ्यास (सेक्सुअल संयम), कुंडलिनी योगाभ्यास (मणिपद्म, केगल, प्राणायाम सहित), प्राणायाम (जीवन-ऊर्जा श्वास-नियंत्रण) – ये उपाय मन-शरीर-आत्मा को संरेखित करते हैं प्राणायाम से शरीर में प्राण-नाड़ी जागृत होती है और ऊर्जा का संतुलन होता हैध्यान एवं साधना से कामवासना की ऊर्जा को हृदय या शीर्ष चक्र की ओर ले जाकर प्रेमभाव उत्पन्न किया जाता है।

लाभ: संयम से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और ऊर्जा जीवन के अन्य क्षेत्रों (रचनात्मकता, अध्ययन, सेवा) में लगाई जा सकती है

 निष्क्रिय ब्रह्मचर्य से स्नेहपूर्ण भावनाएं विकसित होती हैं, कुंडलिनी जागरण से आत्मविश्वास एवं आध्यात्मिक अनुभूति बढ़ती हैइन साधनों से कामऊर्जा सुधरी शक्ति बनकर व्यक्ति की भलाई और सामाजिक चेतना में बदले 

चित्र: यौन ऊर्जा के परिष्करण की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति (कच्चे तेल से ऊर्जा उत्पादन की तरह)

तंत्र की दृष्टि में काम ऊर्जा को कच्चे तेल की भाँति माना गया है जिसे उचित साधना द्वारा परिष्कृत करके अत्यधिक उपादेय शक्ति बनाया जा सकता है। सिद्ध गुरुओं के अनुसार, यौन ऊर्जा को शरीर के अंत:स्थ ‘फ़ैक्टरी’ में उठाकर आग (ऊष्मा) के माध्यम से परिष्कृत करना तांत्रिक परम्परा का मुख्य उपक्रम है तंत्रिक योग में आसन, मुद्रा और बंध प्रयोग कर काम ऊर्जा को बुदबुदकर ऊपर की ओर ले जाया जाता है, जहाँ वह और अधिक संजीवनी एवं सूक्ष्म ऊर्जा बनती हैमुख्य सिद्धांत: तंत्र में कामवासना को दिव्य शक्ति (शक्ति/शिव का मेल) माना जाता है; सबलिमेशन (ऊर्ज़ा की ऊपर की ओर चढ़ाई) द्वारा काम ऊर्जा को प्रेम या आध्यात्मिक अनुभवों में बदला जाता हैव्यवहारिक उपाय: तांत्रिक ध्यान (जैसे कुशल ध्यान, मंत्रों से आत्मा केंद्रित करना), तांत्रिक यौन साधना (जहाँ संभव हो), और ऊर्जा-कुंडली अभ्यास। काम-साधना के दौरान हृदय-केन्द्र पर ध्यान केंद्रित करके प्रेम की अनुभूति बढ़ाई जाती है शिवनाथन व सिद्ध गुरुओं के अनुसार वशिष्ठ मुद्रा, उड्डीयान बंध एवं तांत्रिक मनोभाव जैसे संकल्पों से काम ऊर्ज़ा का नियमन संभव है।

लाभ: तंत्र साधना से काम ऊर्जा रचनात्मक व आध्यात्मिक साधनों को शक्ति देती है। ऊर्जा का सही प्रवाह गहन प्रेम संबंधों और जीवन शक्ति दोनों को बढ़ाता हैसंत कैलिस्टस की सीखानुसार ‘काम ऊर्जा को प्रेम में मोड़ना’ (करवाना) आत्मा को शुद्ध प्रेम की अनुभूति से जोड़ देता हैइस प्रक्रिया में यौन उत्तेजना प्रेममय सहानुभूति, आनंद व आलिंगन जैसी उच्च भावनाओं में परिवर्तित होती है। तंत्र विद्या से न केवल यौन ऊर्जा का उपयोग व्यक्तिगत आत्म-विकास में होता है, बल्कि यह जोड़ों में गहरे भावनात्मक बंधन और रचनात्मक चमक भी लाती है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

मनोविज्ञान में सब्लिमेशन वह प्रक्रिया है जिसमें अवांछित यौन प्रवृत्तियाँ ऊँचे सामाजिक या रचनात्मक गतिविधियों में बदल जाती हैंफ्रायड के अनुसार यह परिपक्वता का गुण है, जहां यौन इच्छाएं कला, विज्ञान, या संवेदनशील मानव संबंधों में निवेशित की जाती हैं इसी तरह मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण में आत्म-नियंत्रण और ध्यान-प्रक्रियाएँ (जैसे माइंडफुलनेस, स्व-प्रेक्षण) काम ऊर्जा को सकारात्मक रूप से पुनर्निर्देशित करती हैं।

मुख्य सिद्धांत: यौन ऊर्जा को मिट्टी की निचली परत से निकालकर उच्चतर मानसिक या भावनात्मक क्षेत्र में लगाना (जैसे रचनात्मक या कल्याणात्मक कार्य)

फ्रायड ने कहा कि कामवासना से जुड़ी ऊर्जा को सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण कार्यों (जैसे कला, शोध, साहित्य) में मोड़कर सर्वोच्च संस्कृतिक उपलब्धि सम्भव होती हैव्यवहारिक उपाय: उत्क्रमण और ध्यान-सदृश आत्म-चिंतन तकनीकें। उदाहरणत: व्यक्तिगत या सामूहिक सेवा, लेखन-कलात्मक परियोजनाओं में लगना, खेलकूद या व्यायाम करना कामवासना को सकारात्मक रूप से उपयोग करने का मार्ग है। ध्यान में हो रहे कामेच्छा-लालसाओं को ‘विचार-वेदना से अलग बैठकर’ निरीक्षण करने से उन्हें निराकार ‘प्रेम स्पंदन’ (स्पन्दा) में बदला जा सकता है

चिकित्सा व परामर्श (थैरेपी) के माध्यम से व्यक्ति अपनी यौन-आग को समझकर उसे तनाव या असुरक्षा के बजाय आत्म-सम्मान और आत्मनियंत्रण में लगाता है।

लाभ: आत्म-नियंत्रण से आंतरिक शक्ति बढ़ती है और व्यक्ति अधिक स्थिर व रचनात्मक बनता है। काम ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग तनाव और चिंता घटाता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है अस्साजिओली के अनुसार यौन-सबलिमेशन से उत्पन्न प्रेम ऊर्जा व्यक्तिगत प्रेम से आगे बढ़कर उदारता, सहानुभूति और मानवीय कल्याण के काम में लगती है यह सामाजिक संबंधों को विस्तृत कर “सभी मनुष्यों के प्रति भ्रातृत्वपूर्ण प्रेम” पैदा करती है मानसिक स्तर पर काम ऊर्जा का सही उपयोग जीवन में उत्साह और उद्देश्य की भावनाआधुनिक सेल्फ-हेल्प और रिलेशनशिप थ्योरी

आधुनिक सेल्फ-हेल्प और संबंध विज्ञान इस विषय को शरीर-विज्ञान और मनोवैज्ञानिक स्तर पर समझते हैं। उदाहरणतः न्यूरोविज्ञान में काम ऊर्जा को ड्राइव और पुरस्कार प्रणाली से जोड़ा गया है, और इसे नियंत्रित करने से जीवन में संतुलनआजकल के मनोवैज्ञानिक सलाहकार ध्यान, व्यायाम, रचनात्मक हाबीट जैसे उपाय सुझाते हैं ताकि यौन ऊर्जा को भावनात्मक जुड़ाव और व्यक्तिगत सफलता में लगाया जा सकता मुख्य सिद्धांत: काम ऊर्जा को दबाना नहीं, बल्कि माइंडफुल तरीके से संतुलित करना। यौन ऊर्जा को खुली बातचीत और जागरूक अभ्यास (जैसे तनु-या-करिरा (तांत्रिक सेक्स), साथी के साथ ध्यान) द्वारा सकारात्मक संबंधों की ओर मोड़ा जाता  आधुनिक संबंध सिद्धांतों में यह माना जाता है कि भावनात्मक अंतरंगता और खुली संचार यौन ऊर्जा को गहरे प्रेम-बंधन में बदलते हैं


व्यवहारिक उपाय: साथी के साथ ईमानदार संवाद (जैसे सेक्स-एजुकेशन या इमागो संवाद), नियमित संचारी स्पर्श (हाथ पकड़ना, गले मिलना आदि), ध्यान और योग से तनाव निवारण। जॉन गॉटमैन जैसे विद्वानों का कहना है कि नियमित स्नेहपूर्ण स्पर्श से ऑक्सीटोसिन हार्मोन रिलीज होता है, जो यौन आकर्षण के साथ-साथ भरोसा और सुरक्षा की भावना बढ़ाता है

 इस प्रकार काम ऊर्जा न सिर्फ शारीरिक उत्तेजना बल्कि भावनात्मक निकटता भी प्रदान करती है।

लाभ: जागरूक संबंध-प्रक्रियाओं से जोड़ों में विश्वास और संभोग-संतोष बढ़ता है। बची हुई काम ऊर्जा रचनात्मकता, पेशेवर सफलता या शैक्षिक उपलब्धि में लगाकर जीवन-परिपूर्णता मिलती है

सेल्फ-हेल्प विशेषज्ञ बताते हैं कि स्वयं को अनुशासित कर अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाने से मानसिक स्थिरता, ऊर्जा स्तर में वृद्धि और कार्यक्षमता बढ़ती है स्वस्थ काम ऊर्जा के साथ लोग कम तनावग्रस्त होते हैं, आत्म-सम्मान और आत्मा के साथ कनेक्शन बढ़ता 

दृष्टिकोण मुख्य सिद्धांत व्यवहारिक उपाय संभावित लाभ

योगिक ब्रह्मचर्य से काम ऊर्जा का ऊर्ध्वचालित करना

dlshq.org


कुण्डलिनी जागरण से चक्र संतुलन

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ब्रह्मचर्य (सेलिबेसी) अभ्यास;

कुण्डलिनी योग, प्राणायाम

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मानसिक एकाग्रता और ऊर्जा संचय;

आध्यात्मिक उन्नति और सत्ववृद्धि

तंत्र/ध्यान काम ऊर्जा को दिव्य/प्रेम ऊर्जा में परिष्कृत करना

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तांत्रिक ध्यान-उपासना;

जोड़ों में प्रणय साधना, असन-बंध भावनात्मक गहराई और सहानुभूति;

रचनात्मकता और आत्म-साक्षात्कार में वृद्धि

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मनोवैज्ञानिक यौन प्रवृत्ति को सामाजिक/रचनात्मक ऊर्जा में बदलना

सब्लिमेशन (उत्क्रमण) तकनीकें;

कला, शारीरिक व्यायाम, सेवा कार्य आत्म-नियंत्रण, रचनात्मकता और मानसिक संतुलन;

आधुनिक संबंध काम ऊर्जा को संवाद और अंतरंगता से 

हर दृष्टिकोण में काम ऊर्ज़ा को प्रेम ऊर्जा में रूपांतरित करने के हेतु विभिन्न तकनीकें बताई गई हैं, जिनसे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।







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रविवार, 7 दिसंबर 2025

भैरव-भैरवी तंत्र: चेतना और ऊर्जा के अद्वैत का रहस्य

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जब हम शक्ति को केवल पूजा की प्रतिमा तक सीमित कर देते हैं, तब तंत्र का असली स्वरूप हमारी दृष्टि से ओझल हो जाता है। तंत्र में भैरव-भैरवी का संसार केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि **चेतना और ऊर्जा के परम मिलन** का प्रतीक है। यह वह रहस्य है जहाँ **जीवन और मृत्यु, भय और आनंद, शून्य और ज्वाला** एक बिंदु पर जाकर विलीन हो जाते हैं।

भैरव और भैरवी: अस्तित्व के दो छोर


तंत्र कहता है:

भैरव** — पूर्ण शून्य, जहाँ मन थम जाता हैभैरवी** — प्रचंड ऊर्जा, जो निरंतर नृत्यरत है


ये दोनों अलग नहीं, बल्कि एक ही सत्य के **द्वैत रूप** हैं। साधक का लक्ष्य इन्हें विरोधी नहीं, **एकात्म** रूप में अनुभव करना है।


ऊर्जा-योग: जहाँ शरीर साधन और चेतना साक्षी


भैरव-भैरवी साधना केवल संबंध नहीं, बल्कि **ऊर्जा का योग** है। इस मार्ग में:


* इच्छाएँ  ध्यान  में रूपांतरित होती हैं

* ऊर्जा उत्कर्ष  की ओर मुड़ती है

* साधक अहं को त्याग देता है


यह मिलन शरीर का नहीं, बल्कि **प्राण और चैतन्य** का होता है — जहाँ साधक स्वयं को खोकर वास्तव में **स्वयं को पाता** है।

श्मशान: भय से पार जाने की प्रयोगशाला**


श्मशान इसलिए तांत्रिक भूमि माना गया है क्योंकि वहाँ:


* मृत्यु **साक्षात उपस्थित** होती है

* अहं और डर **छिन्न-भिन्न** हो जाते हैं

* मन शून्य की शांति को **स्वीकार** करता है


वहीं साधक सीखता है कि भय को **दबाना नहीं**, बल्कि **पार करना** होता है।

काम ऊर्जा: पतन नहीं, उत्कर्ष का साधन**


तंत्र का गूढ़ सिद्धांत —

काम सबसे शक्तिशाली ऊर्जा है।**


साधारण मनुष्य इसे क्षणिक सुख में खो देता है, पर तंत्र इसे **मोक्ष की दिशा** में मोड़ता है। इस साधना में:

आनंद साधन नहीं**, परिणाम हैऊर्जा का संचार ऊपर** की ओर होता है

पुरुष-स्त्री नहीं, **अद्वैत चेतना** शेष रहती है


इसी अवस्था को तंत्र **परमानंद** कहता है, जहाँ अनुभव ही सत्य होता है।

तंत्र: शरीर को अस्वीकार नहीं, स्वीकार करता है**


यह मार्ग कहता है:


* शरीर **बंधन नहीं**, माध्यम है

* काम **पाप नहीं**, ऊर्जा है

* भय **रोक नहीं**, द्वार हैi


साधना का अंतिम लक्ष्य **सिद्धि** नहीं, **स्वरूप की पहचान** है।


समापन: अंतर्मन का भैरव-भैरवी जागरण**


तंत्र मानता है कि वास्तविक मुक्ति तब मिलती है जब —


* भीतर का **भैरव जागे** (अचल चेतना)

* भीतर की **भैरवी प्रकट हो** (गतिशील ऊर्जा)


इस मिलन में न कोई बंधन, न पाप-पुण्य का विचार केवल अनुभव यही तंत्र का वह गहन सत्य है जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता —केवल जिया जा  सकता है भैरव भैरवी तंत्र का संसार उन लोगों के लिए नहीं है जो शक्ति को सिर्फ पूजा की मूर्ति मानते हैं. यह वह रहस्य है जहाँ चेतना और ऊर्जा, मृत्यु और जीवन, भय और आनंद – सब एक बिन्दु पर मिलते हैं. भैरव वह शून्य है जहाँ मन बुझ जाता है, भैरवी वह ज्वाला है जहाँ ऊर्जा प्रचंड रूप में नाचती है. दोनों अलग नहीं, एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं, और तंत्र का उद्देश्य इन दोनों का विलय है.भैरव भैरवी के मिलन को तंत्र में साधारण संबंध नहीं, बल्कि ऊर्जा-योग कहा गया है. यह वह क्षण है जब शरीर साधन बनता है और चेतना साक्षी. इसमें सुख की खोज नहीं, ऊर्जा की दिशा बदलने का प्रयत्न होता है. इच्छा को ध्यान में, अग्नि को साहस में, स्पंदन को मौन में बदल दिया जाता है. साधक इस मिलन में खोता नहीं, स्वयं को पाता है, क्योंकि यह मिलन शरीर का नहीं, प्राण और चैतन्य का होता है.शमशान इस साधना की भूमि इसलिए है क्योंकि वहाँ मृत्यु, भय, इच्छा, और शून्यता एक ही समय में जीवित होती हैं. भैरव का मौन और भैरवी का नर्तन वहाँ एकदूसरे को पूर्ण करते हैं. इसी वातावरण में साधक भय को पार करताहै,इच्छा को रूपांतरित करता है और ऊर्जा को ऊपर उठाता है. कहा गया है कि जब अग्नि और श्वास एक गति में चलती हैं तो साधक “स्वयं से मुक्त” हो जाता है.तंत्र मानता है कि मानव की सबसे शक्तिशाली ऊर्जा काम है. साधारण व्यक्ति इसे खो देता है, तांत्रिक इसे साधता है. भैरव भैरवी साधना में संभोग मोक्ष की दिशा में प्रयुक्त होता है, जहाँ वीर्यपात नहीं, ऊर्जा-पात होता है. शरीर का आनंद नहीं, चेतना का उत्कर्ष अनुभव होता है. इसी अवस्था को तंत्र में रहस्यमय परमानंद कहा गया, जहाँ न पुरुष बचता है, न स्त्री, सिर्फ एक कंपन, एक नीरवता, एक अखंड अनुभव.भैरव भैरवी का रहस्य यही है कि यह साधना शरीर को ठुकराती नहीं, उसे साधन बनाती है. काम को रोकती नहीं, उसे ऊपर उठाती है. भय को मिटाती नहीं, उसे पार कराती है. साधक इस मार्ग पर चलकर सिद्धि नहीं, अपने स्वरूप को खोजता है. जब चेतना साक्षी हो जाए और ऊर्जा नृत्य बन जाए, तब मनुष्य देवत्व के उस द्वार पर पहुँचता है जहाँ नाम और रूप अर्थहीन हो जाते हैं.तंत्र कहता है कि इस ब्रह्मांड में सबसे बड़ी मुक्ति वही है जहाँ भीतर का भैरव जागे और भीतर की भैरवी स्वीकार हो. उस मिलन में न बंधन है, न पाप, न पुण्य, सिर्फ अनुभव. यही तंत्र का वह गूढ़ सत्य है जिसे शब्दों में कहा नहीं जा सकता, सिर्फ जिया जा सकता है.


 


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