कामदेवकला
**#कामदेवकला
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**ॐ कामद'काम' का शास्त्रीय अर्थ: वासना नहीं, सृजन-शक्ति
'काम' का अर्थ केवल शारीरिक वासना नहीं है। वेद कहते हैं – *"कामस्तदग्रे समवर्तताधि"* – सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहले 'काम' उत्पन्न हुआ। यह वह दिव्य संकल्प है जिससे ब्रह्म ने "एकोऽहं बहुस्याम्" सोचा – मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ।
इसलिए **कामदेवकला** वे देवी हैं जो सृजन, सौन्दर्य, आकर्षण, प्रेम, कला, रस की 64 कलाओं के रूप में स्थित हैं। कामदेव पुरुष-तत्त्व हैं – इच्छा। कामदेवकला स्त्री-तत्त्व हैं – इच्छा को रूप देने वाली कला। बिना कला के काम पशु-वृत्ति है, कला के साथ काम 'शृंगार-रस' बन जाता है।
### 2. कामदेव की 5 पुष्प-बाण और 64 कलाएँ
कामदेव के 5 बाण प्रसिद्ध हैं – अरविन्द, अशोक, चूत, नवमल्लिका, नीलोत्पल। ये 5 इन्द्रियों को मोहित करते हैं। पर इन बाणों को चलाने की 'कला' कामदेवकला देती हैं।
**कामसूत्र** और **ललित-कला ग्रन्थों** में 64 कलाएँ गिनाई गई हैं। ये केवल शृंगार नहीं, जीवन को सुन्दर बनाने की विद्या हैं:
**कुछ प्रमुख कलाएँ**: गीत, वाद्य, नृत्य, आलेख्य, विशेषक-च्छेद्य, तण्डुल-कुसुम-बलि-विकार, पुष्पास्तरण, दशन-वसन-अंगराग, मणि-भूमिका-कर्म, शयन-रचना, उदक-वाद्य, चित्र-योग, माल्य-ग्रथन, केश-शेखर-योजन, नेपथ्य-प्रयोग... आदि।
सार: खाना बनाना कला है, घर सजाना कला है, बोलना कला है, प्रेम करना कला है। जहाँ 'सौन्दर्य-बोध' है, वहाँ कामदेवकला हैं।
### 3. शास्त्रों में कामदेवकला स्वरूप
**ललिता सहस्रनाम**: *"कामेश्वरी कामकला कामदेव-निषेविता"* – देवी ललिता स्वयं 'कामकला' हैं। श्रीचक्र के मध्य-बिन्दु को 'कामकला' कहते हैं – शिव-शक्ति का सम्मिलन-बिन्दु, जहाँ से सृष्टि का स्पन्दन शुरू होता है।
**सौन्दर्य लहरी श्लोक 19**: *"मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो..."* – आदि शंकराचार्य कामकला-यन्त्र का वर्णन करते हैं। यह ब्रह्माण्ड की रचना का ज्यामितीय रूप है।
**तन्त्र**: 10 महाविद्याओं में 'कमला' और 'त्रिपुरसुन्दरी' कामदेवकला की अधिष्ठात्री हैं। 'कामेश्वरी' नाम से इनकी उपासना होती है। कृष्ण की रासलीला में गोपियाँ कामदेवकला का ही मूर्त रूप हैं – प्रेम को भक्ति बना दिया।
**दुर्गा सप्तशती**: *"या देवी सर्वभूतेषु कामरूपेण संस्थिता"* – जो देवी सब प्राणियों में काम-रूप से स्थित हैं। बीज में वृक्ष बनने की कामना, नदी में सागर से मिलने की कामना, जीव में शिव से मिलने की कामना – सब कामदेवकला हैं।
### 4. कामदेवकला के 4 आयुध: सृजन के उपकरण
देवी को चतुर्भुजा दिखाते हैं:
| आयुध | प्रतीक | कला का पक्ष |
| --- | --- | --- |
| **1. इक्षु-धनुष** | ईख का धनुष – मन | मन को साधो तो प्रेम मधुर, न साधो तो चुभता है |
| **2. पुष्प-बाण** | 5 फूलों के बाण | 5 इन्द्रियाँ – रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द से सम्मोहन |
| **3. पाश** | प्रेम-रज्जु | आकर्षण, बाँधने वाली अनुराग-शक्ति |
| **4. अंकुश** | अंकुश | मर्यादा, निग्रह। काम उच्छृंखल न हो जाए |
**रहस्य**: कामदेव के बाण फूल के हैं, लोहे के नहीं। अर्थात् प्रेम चोट नहीं करता, जोड़ता है। पर अंकुश बताता है – प्रेम में भी 'मर्यादा' हो। वही कामदेवकला है।
### 5. कामदेवकला मंत्र: सौन्दर्य और सृजन की साधना
**मूल मंत्र**: ॐ कामदेवकलायै नमः – 12 अक्षर। 12 राशियाँ, 12 महीने – सम्पूर्ण वर्ष सौन्दर्यमय हो।
**विनियोग**: ॐ अस्य श्री कामदेवकला महामन्त्रस्य, कामदेव ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, श्री कामदेवकला देवता, सौन्दर्य-सृजन-प्रेम-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोग:।
**सात्त्विक प्रयोग**:
1. **समय**: शुक्रवार, वसन्त-पंचमी, पूर्णिमा। सूर्योदय या प्रदोष काल।
2. **स्थान**: स्वच्छ, सुगन्धित। गुलाब, मोगरा का फूल। गुलाबी वस्त्र।
3. **जाप**: 108 बार। भाव: हृदय-चक्र से गुलाबी-स्वर्ण प्रकाश निकलकर पूरे शरीर को सुन्दर, सृजनशील बना रहा है।
4. **अनुष्ठान**: 16 दिन – षोडशी कला के लिए। कलाकार, कवि, डिजाइनर, दम्पति, निस्संतान के लिए विशेष।
**लाभ**: व्यक्तित्व में आकर्षण, वैवाहिक जीवन में मधुरता, कला-कौशल में निखार, सन्तान-प्राप्ति, नीरसता का नाश, सौन्दर्य-बोध जागता है।
**कड़ी सावधानी**: यह मंत्र 'वशीकरण' के लिए नहीं है। कामदेवकला 'प्रेम' देती हैं, 'वासना' नहीं। पर-स्त्री/पुरुष के लिए प्रयोग महापाप है। देवी कुपित होकर सौन्दर्य, बुद्धि, यश तीनों हर लेती हैं।
### 6. कामदेवकला का आधुनिक सन्देश: प्रेम को कला बनाओ
आज 'काम' है, 'कला' नहीं। परिणाम – रिश्ते टूट रहे हैं, तलाक बढ़ रहे हैं, डिप्रेशन बढ़ रहा है।
**कामदेवकला 3 सूत्र देती हैं**:
1. **देह से देव तक**: केवल देह का आकर्षण 6 महीने चलता है। मन का आकर्षण 6 साल। आत्मा का आकर्षण 6 जन्म। काम को 'रति' से 'प्रीति' तक, प्रीति से 'भक्ति' तक ले जाओ।
2. **उपभोग नहीं, उपयोग**: फूल को तोड़ो मत, पौधे को सींचो। पत्नी को 'ऑब्जेक्ट' नहीं, 'देवी' मानो। पति को 'एटीएम' नहीं, 'राम' मानो। यही कामदेवकला है।
3. **सृजन करो**: प्रेम का अन्तिम फल 'सन्तान' या 'कला' है। जिस प्रेम से कुछ सुन्दर न जन्मे, वह काम नहीं, वासना है।
**सोशल-मीडिया युग में**: फिल्टर से चेहरा सुन्दर नहीं होता, संस्कार से होता है। 64 कला सीखो – खाना बनाना, कविता लिखना, घर सजाना, मधुर बोलना। ये 'रियल फिल्टर' हैं।
### 7. कामदेवकला स्तुति
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कामेश्वरी कामकला कामरूपा मनोहरा।
शृंगाररससम्पूर्णा कामदेवकलां भजे॥
इक्षुकोदण्डसम्पन्ना पुष्पबाणलसत्करा।
पाशांकुशधरा वन्दे कामदेवकलां पराम्॥
```
*जो कामेश्वरी, कामकला-स्वरूपा, मन को हरने वाली, शृंगार-रस से पूर्ण हैं, उन कामदेवकला को भजता हूँ।*
**उपसंहार: जीवन को उत्सव बनाओ**
कामदेवकला हमें सिखाती हैं कि जीवन 'युद्ध' नहीं, 'रास' है। कृष्ण ने युद्ध भी किया, रास भी रचाया। दोनों में कुशल वही है जो 'कला' जानता है।
जिस दिन तुम फूल देखकर मुस्कुरा दो, बारिश में भीग जाओ, पत्नी के बाल सँवार दो, माँ के पैर दबा दो, बच्चे के साथ बच्चे बन जाओ – समझ लेना कामदेवकला तुममें उतर आईं।
**ॐ कामदेवकलायै नमः।**
हे सौन्दर्य की देवी! हमें वासना नहीं, उपासना दो। हमारे प्रेम को हवस नहीं, उत्सव बना दो। हमारे जीवन को 64 कलाओं से सजा दो..!!
साभार स्वर्णवंशी_राइटर_एडिटर Facebook
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