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शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

खगोलविदों ने सौर प्रणाली जैसी एक नई ग्रह प्रणाली खोजी

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खगोलविदों ने सौर प्रणाली जैसी एक नई ग्रह प्रणाली खोजी

तारिका प्रणाली एच.डी. जी.जे. 676ए , जो पृथ्वी से 16.4 पारसेक्स या 53.46 प्रकाश वर्ष दूर
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2012_07_10/nai-sour-pranali/


तारिका प्रणाली एच.डी. जी.जे. 676ए, जो पृथ्वी से 16.4 पारसेक्स या 53.46 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है, देखने में हमारी सौर प्रणाली जैसी ही लगती है। इसमें पृथ्वी जैसे ग्रह एक तारे की परिक्रमा करते हैं और गैस के विशालकाय बादल इस तारे से बहुत दूर हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह हमारी ग्रह प्रणाली जैसी एक दुर्लभ सौर प्रणाली है जो वर्तमान में गायब हो रही है।
जर्मनी में गौटिंगेन विश्वविद्यालय के अंतर्गत एक खगोल भौतिकी संस्थान के शोधकर्ता डॉ. गिलेम आंगलाड एस्कुडेस के नेतृत्व में खगोलविदों के एक अंतर्राष्ट्रीय दल ने बोने लाल ग्रहों के बारे में विभिन्न दूरबीनों की मदद से प्राप्त जानकारियों का एक काफ़ी लंबे समय में विश्लेषण किया है।
 वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी से अपेक्षाकृत कम दूरी पर स्थित अन्य प्रणालियों की भी खोज की गई है लेकिन वहाँ अभी तक पृथ्वी जैसे ग्रह दिखाई नहीं दिए हैं। अगर वहाँ पृथ्वी जैसे कई ग्रह मिल जाएंगे तो यह कहना संभव हो सकता है कि हमारी सौर प्रणाली जैसी कई अन्य प्रणालियाँ भी मौजूद हैं। इसका मतलब यह होगा कि एक तारे के चारों ओर कई ग्रहों द्वारा परिक्रमा करना एक आम बात है।

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मंगल पर मानव मिशन अगले 5 से 15 साल में`

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`मंगल पर मानव मिशन अगले 5 से 15 साल में`

चेन्नई : नासा की एक वैज्ञानिक का कहना है कि मंगल पर मानव मिशन अगले पांच से 15 साल में साकार होने की संभावना है। 

अनीता सेनगुप्ता ने पत्रकारों से कहा कि ‘मंगल पर मानव मिशन संभव है और यह सिर्फ कुछ समय की बात रह गई है। मेरे हिसाब से अगर बजट और प्रौद्योगिकी समस्या नहीं रही तो यह पांच से 15 साल में संभव हो सकेगा। 

अनीता की नासा के उस दल में अहम भूमिका थी जिसने ‘क्यूरियासिटी’ रोवर को भेजा था। (एजेंसी) sabhar : http://zeenews.india.com

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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

'प्रतिरोधक तंत्र' से ही होगा कैंसर का इलाज :जेम्स गैलाघर

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अमरीकी शोधकर्ताओं ने कैंसर से लड़ने के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली में बदलाव करने का तरीका खोज लिया है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली बेहद संवेदनशील होने के साथ संतुलित होती है, जो शरीर में घुसपैठ करने वाले विषाणुओं और रोगाणुओं से लड़ती है, लेकिन वह शरीर के अपने उत्तकों यानी टिशूज़ से नहीं लड़ती.

शोध का यह नतीजा ‘नेचर मेडिसिन’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.फिलाडेल्फिया के बाल अस्पताल के शोधकर्ताओं को जानवरों पर किए गए अध्ययन से पता चला है कि प्रतिरोधक प्रणाली के संतुलन में बदलाव करने से कैंसर का एक नया इलाज ढूंढ़ा जा सकता है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक जब रोग प्रतिरोधक प्रणाली शरीर के ही उत्तकों पर असर करने लगती है तो कई गंभीर बीमारियां जैसे टाइप 1 डायबिटीज हो जाती है.

ट्रेग सेल्स शोध का एक नया क्षेत्र

दरअसल, ट्रेग सेल्स कैंसर और ऑटोइम्यून डिजीज में शोध का एक नया और चर्चित क्षेत्र है. ऑटोइम्यून डिजीज का संबंध उन बीमारियों से है, जो रोग प्रतिरोधक प्रणाली से ही शरीर के अंदर के ऊतकों के नष्ट होने के कारण होती हैं.
यह रोग प्रतिरोधक प्रणाली का हिस्सा है. प्रतिरोधी प्रणाली सामान्य तौर पर शरीर को बाहरी हमलों से बचाती है.
शोधकर्ताओं ने प्रतिरोधी प्रणाली को प्रभावी तरीके से नियंत्रित कर ट्रेग फंक्शन को तितर-बितर करने की कोशिश की.
इस अध्ययन के हिस्सा रहे शोधकर्ता डॉ. वायने हैंकॉक ने कहा, ‘हमें ट्रेग फंक्शन को इस तरह से तितर-बितर करने की जरूरत थी जिससे कि वह ऑटोइम्यून रिएक्शन किए बिना एंटी ट्यूमर एक्टीविटी करे.’

दो स्थितियों में किया गया शोध

शोधकर्ताओं ने दो स्थितियों में शोध किए. पहली स्थिति में उन्होंने उन चूहों पर शोध किया जिनमें ट्रेग के लिए ज़रूरी रसायन नहीं था, जबकि दूसरी स्थिति में उन्होंने एक ऐसी दवा का इस्तेमाल किया जो एक सामान्य चूहे में सामान प्रभाव डालता था.
इन दोनों शोध में प्रतिरोधी प्रणाली में बदलाव के कारण फेफड़े के कैंसर में वृद्धि को रोकने में सफलता मिली.
डॉ. हैंकॉक ने कहा, "इससे सही मायने में एक ऐसे नए क्षेत्र ‘कैंसर इम्यूनोथेरेपी’ की ओर बढ़ा जा सकता है जिसमें काफी संभावनाए हैं."
हालांकि, कैंसर के मरीजों के इलाज में इस प्रणाली के इस्तेमाल में अभी काफी समय लगेगा. 

sabhar :जेम्स गैलाघर
स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज  http://www.bbc.co.uk

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सोमवार, 5 अगस्त 2013

अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें

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अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें

क्‍या अंतरि‍क्ष में रहना संभव है। वहां न तो सांस लेने के लि‍ए हवा है और न ही पीने के लि‍ए पानी। इसके बावजूद वैज्ञानि‍कों का मानना है कि एक दि‍न वह ऐसा संभव कर दि‍खाएंगे। इसके लि‍ए आज से नहीं बल्‍कि तकरीबन चार दशक पहले से ही शोधकार्य चल रहा है। कई सारे वैज्ञानि‍कों ने इसका ब्‍लूप्रिंट भी तैयार कि‍या है। इन ब्‍लूप्रिंट के सहारे वह सोचने पर मजबूर करते हैं कि एक दि‍न अंतरि‍क्ष में जीवन संभव होगा। ये जीवन मशीनों के सहारे संभव होगा। नासा 1975 से इस बारे में शोध कर रहा है। इसके अलावा स्‍टैनफोर्ड वि‍श्‍ववि‍द्यालय में इस बारे में रि‍सर्च चल रही है। बताया जा रहा है कि यह रि‍सर्च अगर कामयाब हो गई तो अंतरि‍क्ष में 10 से 14 हजार लोग एक ही मशीनी कालोनी में रह सकेंगे। 
 अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें
अंतरि‍क्ष में गुरुत्‍वाकर्षण की भी समस्‍या है। अंतरि‍क्ष यानों में अक्‍सर व्‍यक्‍ति हवा में तैरते हुए देखे जाते हैं क्‍योंकि वहां पहुंचने पर गुरुत्‍वाकर्षण न होने की वजह से उनके पैर टि‍क नहीं पाते हैं। इस समस्‍या का भी इलाज खोजा गया। 

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अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें
इस कालोनी में पृथ्‍वी की तरह गुरुत्‍वाकर्षण होगा। इसके लि‍ए यह कालोनी एक मि‍नट में एक बार घूमेगी जि‍ससे कि आर्टीफीशि‍यल गुरुत्‍वाकर्षण पैदा होगा। इससे उसमें रहने वाले लोगों के पैर टि‍के रहेंगे और वह जि‍स सामान्‍य तरीके से पृथ्‍वी पर चलते फि‍रते हैं, उसी तरह से वहां भी चलेंगे फि‍रेंगे। 



अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें

जीवन के लि‍ए जि‍तनी जरूरी हवा और पानी है, उतना ही जरूरी सूर्य का प्रकाश भी है। इस समस्‍या का भी समाधान स्‍टैनफोर्ड वि‍श्‍ववि‍द्यालय और नासा में चल रही रि‍सर्च में खोजने की कोशि‍श की गई है। इसके लि‍ए इसमें खास तरह के शीशे लगाए जाएंगे। यह शीशे एक खास एंगल पर लगेंगे जो सूर्य के प्रकाश को प्राकृति‍क तरीके से इस मशीन में लेकर आएंगे। 

अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें


कोशि‍श की जा रही है कि इस मशीनी कालोनी के अंदर रहने वालों को पूरी तरह से पृथ्‍वी जैसा प्राकृति‍क माहौल मि‍ले। वहां पेड़ पौधे तो होंगे ही, छोटे मोटे झरने जैसे भी डि‍जाइन कि‍ए गए हैं। 

Iअंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें

sabhar : www.bhaskar.com 





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रविवार, 4 अगस्त 2013

नई रोशनी लाएंगे स्टेम सेल

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स्टेम कोशिकाओं की मदद से आने वाले दिनों में इंसान में दृष्टिहीनता पूरी तरह ठीक किए जाने की संभावना है. ब्रिटिश वैज्ञानिकों को चूहों में ऐसा करने में सफलता मिली है.
एक नए शोध में कहा गया है कि यह रेटिना की बीमारियों के इलाज में एक अहम कदम है. वैज्ञानिकों ने इसके लिए चूहे के भ्रूण से मूल कोशिकाएं ली. शुरुआती स्टेज वाली इन कोशिकाओं को फिर प्रयोगशाला में इस तरह से कल्चर किया ताकि वे अपरिपक्व फोटोरिसेप्टरों में तब्दील हो जाएं. फोटोरिसेप्टर रेटिना में रोशनी पकड़ने वाले सेल्स होते हैं.
इसके बाद इस तरह की करीब दो लाख कोशिकाओं को चूहे के रेटिना में डाला गया. इनमें से कुछ आंखों की कोशिकाओं में ढल गए और दृष्टि लाने में सफल रहे. आंखों की रोशनी में कितना फर्क पड़ा है, इसे वॉटर मेज परीक्षण से देखा गया. साथ ही ऑप्टोमैट्री की मदद भी ली गई.   
फोटोरिसेप्टरों के खत्म होने से रेटिनाइटिस पिगमेंटोजा और उम्र बढ़ने के साथ आंखों की मांसपेशियों के खराब होने की बीमारी एएमडी होती है. ब्रिटेन के मेडिकल रिसर्च काउंसिल ने एक प्रेस रिलीज में कहा, "भ्रूण की मूल कोशिकाओं से आने वाले दिनों में अनगिनत फोटोरिसेप्टर बनाए जा सकेंगे जिन्हें दृष्टिहीन लोगों के रेटिना में प्रत्यारोपित किया जा सकेगा."
स्टेम सेल ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और कंपनियों में भारी रुचि जगाई है क्योंकि उम्मीद बढ़ी है कि इनसे टिशू बनाए जा सकते हैं. कुछ समस्याएं भी हैं, जैसे इन कोशिकाओं को सुरक्षित तरीके से विशेष कोशिकाओं में ढालना ताकि वह कैंसर वाली कोशिकाएं न बन जाएं. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थेल्मोलॉजी के रॉबिन अली की टीम ने पता लगाया है कि अंधे चूहों की दृष्टि तब लौट सकती है जब उनमें स्वस्थ चूहों से लिए गए रॉड सेल प्रत्यारोपित किए जाएं.
ताजा रिसर्च इसलिए और अहम हो जाती है क्योंकि प्रत्यारोपित कोशिकाओं में दृष्टि के लिए जरूरी अलग अलग नर्व सेल्स हैं और उन्हें दूसरे जानवरों से नहीं लिया गया है. उन्हें लैब में बड़ा किया गया और नई तकनीक के जरिए उन्हें सही कोशिकाओं में तब्दील किया गया. जापानी तकनीक से बनी ये कोशिकाएं इसके बाद रेटिना के आकार में ढल गई.
रॉबिन अली ने बताया, "हाल के सालों में वैज्ञानिक बहुत सहजता के साथ स्टेम सेल पर काम कर रहे हैं और उन्हें अलग अलग तरह की वयस्क कोशिकाओं और ऊतकों में बदल पा रहे हैं. लेकिन काफी लंबे समय तक रेटिना की जटिल संरचना को प्रयोगशाला में बना पाना मुश्किल था. बनाई गई कोशिकाएं विकास की प्रक्रिया में खुद को सही तरीके से नहीं ढाल पा रही थी जो कि सामान्य भ्रूण में हो जाता है. अब अगला कदम होगा कि इस प्रक्रिया को मानवीय कोशिकाओं के साथ किया जाए और इसके क्लीनिकल ट्रायल शुरू हों."
पिछले महीने ही जापान में मानवीय स्टेम सेल के इस्तेमाल की सहमति दी गई थी. इस नए शोध का उद्देश्य है आंखों की एएमडी के लिए प्लरिपोटेंट स्टेम सेल या आईपीएस का इस्तेमाल कर इलाज विकसित करना.
एएम/एमजे (डीपीए)

 sabhar : DW.DE





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अंतरिक्ष में अकेलेपन का साथी बनेगा बोलने वाला रोबोट

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जापान ने दुनिया का पहला बोलने वाला रॉकेट अंतरिक्ष में भेजा है. इस रॉकेट को अंतरिक्षयात्री कोचि वकाटा के साथी के रूप में अंतरिक्ष में भेजा गया है. वकाटा का अंतरिक्ष अभियान नवंबर से शुरू होगा.
किरोबो नाम के इस रोबोट को अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) में काम कर रहे अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सामान लेकर जा रहे एक अनाम रॉकेट से अंतरिक्ष भेजा गया.

13 इंच के किरोबो ने जापान के तानेगाशिमा द्वीप से उड़ान भरी. वह 9 अगस्त को आईएसएस पहुंच जाएगा.
किरोबो एक शोध का हिस्सा है जिसके तहत यह देखा जाना है कि लंबे समय तक अकेले रहने वाले लोगों को मशीनें किस तरह से भावनात्मक सहारा दे सकती हैं.
एच-2बी रॉकेट के लॉंच का जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेन्सी (जाक्सा) द्वारा सीधा प्रसारण किया गया.
यह अनाम रॉकेट आईएसएस पर काम कर रहे छह स्थाई कर्मचारियों के लिए पीने का पानी, खाना, कपड़े और काम के उपकरण लेकर गया है.
किरोबो नाम “क्लिक करेंउम्मीद” और “रोबोट” के लिए जापानी शब्दों से बनाया गया है.

बड़ी छलांग

इस छोटे से क्लिक करेंमानवरूपी रोबोट का वज़न करीब एक किलो है और यह कई तरह की शारीरिक हरकतें कर सकता है. इसके डिज़ाइन की प्रेरणा मशहूर एनिमेटेड कैरेक्टर एस्ट्रो बॉय से ली गई है.
किरोबो को जापानी में बात करने के लिए तैयार किया गया है. वह वटाका के साथ होने वाली अपनी बातचीत का रिकॉर्ड भी रखेगा.
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किरोबो मशीन और आदमी के बीच मध्यस्थ के रूप में काम करेगा और कंट्रोल रूम से मिलने वाले संदेश अंतरिक्षयात्री को देगा
वटाका इस साल आईएसएस के कमांडर का पदभार संभालेंगे.
इसके अलावा किरोबो कंट्रोल रूम से मिलने वाले संदेश भी अंतरिक्षयात्री को देगा.
इस रोबोट को बनाने वाले टोमोटाका टाकाहाशी के अनुसार, “किरोबो वटाका के चेहरे को याद रखेगा ताकि जब वह अंतरिक्ष में मिलें तो वह उन्हें पहचान सके.”
वह कहते हैं, “मैं उम्मीद करता हूं कि यह रोबोट एकक्लिक करेंआदमी और मशीन के बीच मध्यस्थ का काम करेगा. या फिर एक आदमी और इंटरनेट के बीच और कभी-कभी आदमियों के बीच भी.”
टाकाहाशी कहते हैं कि सबसे मुश्किल काम रोबोट को अंतरिक्ष में काम करने योग्य बनाना था.
नौ महीने से ज़्यादा समय तक किरोबो की विश्वसनीयता को परखने के लिए उस पर दर्जनों परीक्षण किए गए.
किरोबो का एक जुड़वा रोबोट मिराटा धरती पर है. वह अपने जोड़ीदार में अंतरिक्ष में होने वाली किसी भी इलेक्ट्रॉनिक गड़बड़ी
पर नज़र रखेगा.
पिछले महीने अभियान के दौरान मिराटा ने कहा था, “मेरे लिए यह एक छोटा कदम है लेकिन रोबोटों के लिए यह एक बड़ी छलांग है.”
यह रोबोट टाकाहाशी, कार निर्माता टोयोटा और विज्ञापन कंपनी डेन्ट्सू का एक संयुक्त क्लिक करेंउद्यम है. sabhar : www.bbc.co.uk

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इंजीनियरों ने शुरू किया मोबाइल आधारित टीवी चैनल

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इंजीनियरों ने शुरू किया मोबाइल आधारित टीवी चैनल

तिरअनंतपुरम : इंजीनियरिंग स्नातकों के एक समूह ने यहां एक ऐसा टीवी चैनल शुरू किया है जिसे मोबाइल फोन के जरिए देखा जा सकता है। यह चैनल स्थानीय समाचारों एवं घटनाओं को प्रोत्साहित करेगा।

समूह के संस्थापकों में से एक अरविंद जीएस ने यहां संवाददाताओं को बताया कि ‘वी 4 यू’ नाम का यह चैनल राजधानी शहर से पहला 2जी, 3जी मोबाइल टीवी चैनल है।

उन्होंने कहा कि दर्शक इस अनूठे चैनल को अपने मोबाइल फोन से दुनिया में कहीं भी देख सकते हैं। चौबीस घंटे का यह चैनल जावा और एंड्रायड जैसे सभी प्लेटफार्मों पर काम करेगा। दर्शक मामूली शुल्क देकर इस चैनल का लाभ उठा सकते हैं। (एजेंसी) sabhar :http://zeenews.india.com

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वैज्ञानिकों ने पशु ऊतक से बनाया कृत्रिम मानव कान

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वैज्ञानिकों ने पशु ऊतक से बनाया कृत्रिम मानव कान
वाशिंगटन : हाल ही में वैज्ञानिकों ने कथित तौर पर पशु ऊतक से हू-ब-हू मानव कान विकसित करने में सफलता पा ली है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वह किसी रोगी की कोशिका से भी पूरे कान को विकसित करने में जल्द ही सफलता पा लेंगे। बीबीसी ने बोस्टन स्थित मैसाचुसेट्स जनरल अस्पताल के शोधकर्ताओं के हवाले से कहा है कि इस प्रकार विकसित किया गया कान एकदम वास्तविक कान के समान लचीला है।

चिकित्सा विज्ञान में ऊतक अभियांत्रिकी उभरती हुई नई पद्धति है, जिसमें मानव के वैकल्पिक अंगों को विकसित किया जाता है, ताकि क्षतिग्रस्त अंगों को बदला जा सके। यह शोध पत्र विज्ञान पत्रिका रॉयल सोसायटी इंटरफेस में प्रकाशित हुआ है। शोधपत्र में कहा गया है कि अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं का दल कृत्रिम कान के निर्माण में लगा हुआ है, ताकि जन्म से ही कान के अविकसित रहने या दुर्घटना में कान खो देने वाले मनुष्यों की मदद की जा सके।

इससे पहले अनुसंधानकर्ताओं ने किसी बच्चे के कान के आकार के कान को एक चूहे पर विकसित करने में सफलता पाई थी। हालिया अनुसंधान में उन्होंने गाय और भेड़ के ऊतकों की मदद से तार की सहायता से कान के आकार की 3डी संरचना पर कृत्रिम कान विकसित करने में सफलता पाई है। (एजेंसी)  sabhar : http://zeenews.india.com

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बुधवार, 31 जुलाई 2013

वो 6 तरकीबें जिनसे दुनिया को मिलेगा भोजन

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भारत में सब के लिए भोजन की गारंटी के कानून पर बहस हो रही है लेकिन सवाल ये भी उठ रहे हैं कि इतनी बड़ी आबादी के लिए खाने का इंतजाम कहां से होगा.
ये सवाल सिर्फ भारत का ही नहीं पूरी दुनिया का है लेकिन कई नए और उभरते हुए शोध से इसका जवाब मिलने की उम्मीद नज़र आ रही है.
अनुमानों के मुताबिक 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब तक पहुंच जाएगी. इतनी बड़ी आबादी के लिए ख़ाने का इंतज़ाम करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन कम से कम 60% बढ़ाना होगा.

सबको मिलेगा भोजन?

फसल आनुवांशिकी के एसोसिएट प्रोफेसर शॉन मेज़ का कहना है कि ये मानने के कई कारण हैं कि पर्याप्त भोजन पैदा करना एक “अहम चुनौती” होगी.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ से कहा, "ये सिर्फ अभी के उत्पादन को दोगुना करना नहीं है क्योंकि पर्याप्त ज़मीन नहीं है. इस का सिर्फ एक हल नहीं है और कभी नहीं हो सकता. जितने पहलू संभव हैं उनकी कोशिश करनी होगी."
वैज्ञानिकों का मानना है कि 6 आइडिया हैं जो मदद कर सकते हैं.

फसल उत्पादन

"ये सिर्फ अभी के उत्पादन को दोगुना करना नहीं है क्योंकि पर्याप्त ज़मीन नहीं है. इस का सिर्फ एक हल नहीं है और कभी नहीं हो सकता. जितने पहलू संभव हैं उनकी कोशिश करनी होगी."
प्रोफेसर शॉन मेज़, एसोसिएट प्रोफेसर, फसल आनुवांशिक
एक टीम ने हाल ही में एक ऐसे रसायन की खोज की है जो फसलों को ऊंचे तापमान से बचा सकेगा.
“क्विनबैक्टीन” नाम का ये रसायन पौधों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाले एक हॉरमोन की नकल करता है जिससे वो गर्मी का मुकाबला कर पाते हैं.
इस शोध की अगुवाई करने वाले अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शॉन कटलर का कहना है कि जब इस रसायन को पौधों पर छिड़का जाता है तो पौधों का मुर्झाना कम होता है, उनका कम पानी खर्च होता है और वो ज़्यादा मुश्किलें झेल पाते हैं.

भोजन की छपाई

तकनीकी कंपनियां रोज़मर्रा के इस्तेमाल में काम आने वाली चीज़ें छापने के ज़्यादा दक्ष तरीके तैयार कर रही हैं.
अब भोजन की छपाई करना वास्तविकता बनता जा रहा है. नासा छपे हुए भोजन के साथ प्रयोग कर रहा है जिससे सुदूर अंतरिक्ष के अभियानों पर भेजे जाने वालों अंतरिक्षयात्रियों को खाना खिलाया जा सकेगा.
मॉर्डन मिडो नाम की एक और कंपनी ने एलान किया है कि ये कृत्रिम मांस छाप सकती है और एक्सटर यूनिवर्सिटी की एक टीम ने तो छपी हुई चॉकलेट तैयार कर ली है.

शून्य से जीवन की शुरुआत

कृत्रिम जीव विज्ञान के क्षेत्र में कृत्रिम जीन को जोड़कर नए जीवन की शुरुआत करना शामिल है. ये अभी शुरुआती दौर में है लेकिन कुछ खोजों का असर बहुत दूर तक हो सकता है.
इसमें प्रकृति को इंजीनियरिंग की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जहां एक-एक कर कृत्रिम जीन को कम्प्यूटर पर कृत्रिम डीएनए से तैयार किया जाता है.
अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी ने हाल ही में खमीर का एक तंतु तैयार किया है, इस में जीव में विटामिन मिला दिए जाते हैं. और जब खमीर से ब्रेड तैयार की जाती है तो उसमें भरपूर विटामिन सी होता है.

वो अनाज जिन्हें भुला दिया गया

गेहूं, चावल और मक्का हमारे भोजन का 60% हिस्सा बनाते हैं. लेकिन मलेशिया में वैज्ञानिक ऐसे अनाजों पर ध्यान दे रहे हैं जिनमें सूखा सहने की शानदार क्षमता है और खराब मिट्टी में भी उगाए जा सकते हैं.
इन लक्षणों को व्यवसायिक फसलों में डालने पर ऐसी फसलें पैदा करने में मदद मिल सकती है जो बदलती जलवायु का ज़्यादा बेहतर ढंग से सामना कर सके.

जीन संवर्धित भोजन

संकर फसलों को उगाने के बजाय जीन संवर्धित फसलों में खाने का आनुवांशिक रंग रूप प्रयोगशाला में बदला जाता है. ब्रितानी सरकार ने हाल ही में एलान किया कि जीन संवर्धित फसलें पारंपरिक पौधों से ज्यादा सुरक्षित हो सकती हैं.
ज़्यादातर सुपरमार्केट जीन संवर्धित भोजन पर पाबंदी लगा चुके हैं लेकिन उन जानवरों का मांस बिकता है जिन्हें जीन संवर्धित फसलें खिलाई गई हैं. शॉन मेज़ का कहना है कि हम ये कहने की हालत में नहीं हैं कि जीन संवर्धित भोजन का इस्तेमाल नहीं करेंगे क्योंकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जब खेती से जुड़ी किसी समस्या का हल पारंपरिक रूप से संभव न हो.

सिकुड़ता हुआ आदमी

“ग्रीनहाउस में पौधा खूब ऊंचा होता है लेकिन इसके बाहर जाने के बाद ये मुर्झा जाता है क्योंकि ये खुद को संभाल नहीं पाता.”

कलाकार और द इनक्रेडिबल श्रिंकिंग मैन की शुरुआत करने वाले आर्न हेंड्रिक्स ने ये तुलना की है. हेंड्रिक्स का कहना है कि उचित पर्यावरणीय परिस्थितियों में मानव सिकुड़ सकता है या लंबे अरसे में छोटा हो सकता है. यानी बदलते पर्यावरण के साथ ख़ुद को ढाल सकता है. sabhar : bbc.co.uk

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शनिवार, 20 जुलाई 2013

मंगल पर जीवन के 'मज़बूत साक्ष्य'

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अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के 'क्यूरियोसिटी रोवर' को मंगल पर गए करीब एक साल हो चुके हैं.
इस दौरान क्यूरियोसिटी रोवर ने जो तथ्य इकट्ठे किए हैं उनसे पता चलता है कि यह लाल ग्रह चार अरब साल पहले जीवन योग्य रहा होगा.

क्लिक करें
साइंस जर्नल में प्रकाशित शोधपत्र के अनुसार क्लिक करेंमंगल ग्रह के वायुमंडल के विस्तृत अध्ययन से पता चला है कि चार अरब साल पहले मंगल ग्रह का वायुमंडल पृथ्वी से ज़्यादा अलग नहीं था.
उस समय क्लिक करेंमंगल का वायुमंडल काफ़ी सघन हुआ करता था. इन नए नतीजों से इस बात को बल मिलता है कि उस समय इस ग्रह की सतह गर्म और आर्द्र रही होगी और यहाँ पानी भी मौजूद रहा होगा. हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि मंगल पर कभी भी किसी प्रकार का जीवन था या नहीं
ओपेन यूनिवर्सिटी की डॉक्टर मोनिका ग्रैडी कहती हैं, “इस अध्ययन से पहली बार यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मंगल ग्रह पर जल और वायुमंडल की कितनी क्षति हुई होगी, उस समय मंगल का वायुमंडल कैसा रहा होगा और क्या उस समय मंगल ग्रह पर जीवन संभव रहा होगा.”
पूरी संभावना है कि समय का साथ मंगल ग्रह का चुम्बकीय क्षेत्र और वायुमंडल नष्ट हो गया और यह ग्रह एक सूखे निर्जन ग्रह में बदल गया.

क्यूरियोसिटी रोवर

क्लिक करेंक्यूरियोसिटी रोवर रोबोट पिछले साल 6 अगस्त को मंगल पर उतरा था.
26 नवंबर 2011 को इस यान को अंतरिक्ष से छोड़ा गया था और क़रीब 24 हज़ार करोड़ मील की दूरी तय कर यह यान मंगल पर उतरा था.
परमाणु ईधन से चलने वाले इस 'क्यूरियोसिटी रोवर' अभियान की लागत है क़रीब 2.5 अरब डॉलर.
इस अभियान के तहत नासा वैज्ञानिकों ने एक अति उन्नत क्लिक करेंघूमती फिरती प्रयोगशालाको मंगल ग्रह पर भेजा है.
इस प्रयोगशाला से मिली जानकारी मंगल ग्रह के इतिहास को समझने में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है.
रोवर की यात्रा के तीन चरण हैं, पहला है मंगल ग्रह में प्रवेश , दूसरा नीचे सतह की ओर आना और तीसरा ज़मीन पर उतरना.
इस मार्स रोवर का वज़न 900 किलो है और यह अपनी क़िस्म के अनोखे कवच में ढँका हुआ है.

 sabhar bbc.co.uk

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शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

कभी देखी है उड़ने वाली मोटर-बाइक

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चेक गणराज्य में तैयार यह बाईक जमीन से कुछ मीटर की ऊँचाई पर पांच मिनट तक चक्कर लगा सकती है.
उड़ने वाली कार अब भी सपना ही है, लेकिन क्या उड़ने वाली बाइक जल्द ही हकीकत बनकर सामने आ सकती है?
क्लिक करेंचेक गणराज्य में शोधकर्ताओं ने 95 किलोग्राम की क्लिक करेंरिमोट से चलने वाली बाइक तैयार की है, जो जमीन से कुछ मीटर की ऊँचाई पर पाँच मिनट तक चक्कर लगा सकती है.

इस बाइक में सामने और पीछे की ओर दो-दो और अगल बगल एक-एक राजधानी प्राग के एक प्रदर्शनी हाल में एक डमी उड़ान के दौरान इस इलेक्ट्रॉनिक प्रोटोटाइप ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी, चारों तरफ घूमा और सफलतापूर्वक उतर गया.
क्लिक करेंबैटरी चालित प्रोपेलर लगे हैं.
प्रोपेलर एक तरह का पंख है जो घूम घूम कर ऊर्जा पैदा करता है.

बेहतरी की उम्मीद

इस मशीन की मदद से दुपहिया यात्रियों के भीड़भाड़ भरे जाम से निजात मिल सकती है, लेकिय यह भी सड़क पर उतरने या हवा में कुलाँचे भरने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है.
इसकी मौजूदा बैटरी की मदद से यह कुछ मिनट तक उड़ान ही भर सकती है और फिर इसे रिचार्ज करना पड़ता है.
'ड्यूरेटिक बाइसिकिल्स' के तकनीकी निदेशक मिलान डूचेक ने बताया, “चूंकि हर दस साल में बैटरी की क्षमता दोगुनी हो जाती है, इसलिए हम उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में बाइक की इतनी क्षमता होगी कि वह खेल, पर्यटन या छोटे कामों के लिए प्रयोग में आ सके.”
इस बाइक को तैयार करने के लिए ड्यूरेटिक ने दो अन्य चेक कंपनियों टेक्नोडैट और एवेक्टोर के साथ काम किया.

पैराशूट वाली बाइक

उम्मीद जताई गई है कि यह बाइक अगले कुछ वर्षों में खेल या पर्यटन के उपयोग में आ सकेगी.
बाइक को उड़ाने की यह पहली कोशिश नहीं है.
इससे पहले अगस्त 2009 में ऑक्सफोर्डशायर के एक आईटी अध्यापक जॉन कार्वर ने एक बाइक तैयार कर उसे “फ्लाइक” नाम दिया. यह एक उड़ान भरने वाला तिपहिया वाहन था.
उन्होंने चैरिटी के उद्देश्य से ब्रिटेन में उड़ान भी भरी.
कार्वर का वाहन नागर विमानन प्राधिकरण में पंजीकृत था और इसमें टू-स्ट्रोक ट्विन प्रोपेलर मोटर के साथ ही पैराग्लाइडर छतरी भी लगी थी. इसमें एक पैराशूट भी लगा था, जो बाइक के हवा में होने के दौरान हमेशा खुला रहता था.
कार्वर की वेबसाइट के मुताबिक बाइक में प्रत्येक दो घंटे बाद ईंधन भरना पड़ता था और यह 25.4 किलोग्राम तक सामान ले जाने में सक्षम हैं और यह उड़ान के दौरान 32 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर सकती है.
पैरा-साइकिल जैसी कंपनियां भी छोटे उपकरणों की बिक्री करती हैं, लेकिन एक बड़ा पैराशूट शहरी यात्रियों के लिए बोझिल हो सकता है.

20वीं शताब्दी की शुरुआत में “फ्लाइंग मशीन” वास्तव में साइकिल ही थीं, जिनमें पंख जोड़ दिए गए थे.
sabhar : bbc.co.uk

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