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शनिवार, 7 सितंबर 2013

मानव अंग बनाने की प्रौद्योगिकी विकसित करेगा जापान

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मानव अंग  बनाने की प्रौद्योगिकी विकसित करेगा जापान
Photo: RIA News

जापान की सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस बात की घोषणा की है कि उसकी अगले 10 सालों में

जापान की सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस बात की घोषणा की है कि उसकी अगले 10 सालों में कृत्रिम बहुउद्देशीय स्टेम कोशिकाओं से मानव शरीर के अंग उगाने-बनाने के लिए व्यावहारिक प्रौद्योगिकी विकसित करने की एक योजना है। इन अंगों में फेफड़े, जिगर और अन्य तथाकथित "त्रिआयामी अंग" शामिल हैं। अक्तूबर माह में जापानी सरकार ने नोबेल पुरस्कार विजेता सिन्गई यामानाका को अगले दस साल तक वित्तीय सहायता देने का फैसला किया था। ग़ौरतलब है कि यामानाका ही दुनिया के पहले ऐसे अग्रणी वैज्ञानिक हैं जिन्होंने स्टेम कोशिकाओं से मानव अंग बनाने की खोज की थी। इस काम के लिए जापानी सरकार देश के बजट से 20 से 30 अरब येन (25.5-38.5 करोड़ डॉलर) आवंटित करेगी। जापान दुनिया का पहला ऐसा देश है जिसकी सरकार ने लंबी अवधि के दौरान ऐसी वैज्ञानिक गतिविधियों के लिए एक राजकीय कार्यक्रम अपनाया है sabhar :http://hindi.ruvr.ru
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2012_11_02/japani-manav-ang/

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सोमवार, 2 सितंबर 2013

छठी पीढ़ी का विमान

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छठी पीढ़ी का विमान

रूस में छठी पीढ़ी के विमान के विकास पर काम आरंभ हो गया है| लगता है यह चालकरहित विमान ही होगा| कृत्रिम बुद्धि के बल पर ही इस विमान का संचालन होगा|

आजकल रूस में पांचवीं पीढ़ी के विमान T-50 के परीक्षण पूरे हो रहे हैं| इस विमान की बॉडी कोम्पोज़िट सामग्रियों से बनाई गई है और इसकी वायु-गतिकीय संरचना ऐसी है कि उड़ान के समय यह रडारों के लिए प्रायः अदृश्य रहता है| नई पीढ़ी का विमान किस दृष्टि से इससे आगे होना चाहिए? चालकरहित उड्डयन विशेषज्ञ देनीस फेदुतीनोव कहते हैं:
“विशेषज्ञ इस बात पर एकमत हैं कि छठी पीढ़ी के विमान चालकरहित होंगे| हमें दो कदम आगे चलना चाहिए, पांचवीं पीढ़ी के विमान का विकास-कार्य पूरा होने का इंतज़ार किए बिना ही आगे बढ़ना चाहिए| कई देशों में इस दिशा में काम हो रहा है| अमरीका में बोईंग कंपनी ‘फेंटम रे’ प्रोजेक्ट पर तथा ‘नॉर्थरोप ग्रूमन’ कंपनी X-47B प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं| इस साल गर्मियों में ‘नॉर्थरोप ग्रूमन’ कंपनी ने पहली बार यह प्रदर्शित किया है कि इस श्रेणी का विमान पुलट के बिना ही विमानवाहक पोत से उड़ सकता है और उस पर उतर भी सकता है|”
विशेषज्ञ यह मानते हैं कि छठी पीढ़ी के विमान के विकास का काम विभिन्न दिशाओं में आगे बढ़ सकता है| यह काम शुरू से भी शुरू किया जा सकता है या फिर T-50 के विकास में पाई गई तकनीकी उपलब्धियों का उपयोग नई पीढ़ी के विमान के लिए भी किया जा सकता है| कम से कम कुछ कल-पुर्जे तो दोनों पीढ़ियों के विमानों में एक जैसे होंगे|
आजकल सारे संसार में चालकरहित विमानों का उपयोग बढ़ रहा है, कई सशस्त्र टकरावों में इन्हें आजमाया जा चुका है| वैसे अभी तक नियमतः ये विमान टोह लेने और रणभूमि पर नज़र रखने का ही काम करते रहे हैं| हां अब बमवर्षक विमान भी बन रहे हैं जो पायलट के बिना ही सामरिक कार्यभार पूरा कर सकते हैं| किंतु पायलट रहित विध्वंसक विमान के मामले में यह कार्यभार निभाने के लिए कहीं अधिक समय चाहिए| ‘उड़ान’ पत्रिका के मुख्य संपादक आंद्रेई फोमिन कहते हैं:
“धरती पर बम से निशाने पर वार करना एक बात है, लेकिन उड़ान के समय तेज़ी से बदलती परिस्थितियों में पायलट के बिना बम छोड़ने या न छोड़ने का फैसला करना बिलकुल दूसरी बात है| आज के पांचवीं पीढ़ी के विमानों में भी कृत्रिम बुद्धि की प्रणाली काफी विकसित है| यह प्रणाली न सिर्फ पायलट को सुझाव देती है बल्कि ज़रूरत होने पर उड़ान की दिशा बदलने तथा शास्त्रों का उपयोग करने का निर्णय ले सकती है| लेकिन अभी भी केबिन में पायलट की ज़रूरत है| अगले कई दशकों तक बमवर्षकों पर पायलट का काम बना रहेगा|”
हो सकता है कि अगले दशक में छठी पीढ़ी का विध्वंसक विमान बन जाएगा| इसमें पांचवीं पीढ़ी के विध्वंसक विमान के तथा नवीनतम बमवर्षक चालकरहित विमानों के गुणों का समावेश होगा| sabhar :http://hindi.ruvr.ru

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इसरो, टाटा मोटर्स ने हाइड्रोजन से चलने वाली बस बनाई

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बेंगलूर: टाटा मोटर्स लिमिटेड तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने देश में पहली बार हाइड्रोजन चालित आटोमोबाइल बस विकसित की है. दोनों संस्थानों ने कई साल के अनुसंधान के बाद यह बस विकसित की है. इस बस का प्रदर्शन आज जतमिलनाडु के महेंद्रगिरि स्थित इसरो के केंद्र लिक्विड प्रोपल्सन सिस्टम्स सेंटर में किया गया.
इसके के अधिकारियों ने बताया कि यह सीएनजी से चलने वाली बस की तरह ही है. इसमें उच्च दाब में भी हाइड्रोजन की बोतल बस की छत पर होती हैं और इससे किसी तरह का प्रदूषण नहीं होता. हाइड्रोजन सेल क्रायोजेनिक प्रौद्योगिकी का एक उपउत्पाद है जिसे इसरो पिछले कई साल से विकसित कर रही है. उन्होंने कहा, यह पूरी तरह से क्रायोजेनिक प्रौद्योगिकी नहीं है, यह तरलीकृत हाइड्रोजन हैंडलिंग है जिसमें इसरों को विशेषज्ञता है.
इसरो तथा टाटा मोटर्स ने हाइड्रोजन से चलने वाली बस के विकास के लिए 2006 में समझौता किया था. इसरो के मानद सलाहकार वी जी गांधी तथा टाटा मोटर्स के उप महाप्रबंधक डा एम राजा ने यह घोषणा की. इसके अनुसार दोनों संगठनों ने भारत मे पहली बार ऐसी इंधन सेल बस बनाई है जो हाइड्रोजन से चलती है. गांधी ने यहां पीटीआई से कहा, भविष्य के परिवहन के लिहाज से यह आटोमोबाइल उद्योग के लिए बड़ा कदम है. इस वाहन से किसी तरह का प्रदूषण नहीं होगा. sabhar http://www.palpalindia.com

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बिना ड्राइवर वाली टैक्सी कार बनाएगा गूगल

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लंदन. एक से बढ़कर एक अद्भूत पर प्रैक्टिकल आविष्कारों को अंजाम देने में लगा इंटरनेट किंग गूगल अब बिना ड्राइवर वाली टैक्सी कार बनाने में जुटा है.ये रोबो-टैक्सी. यात्रियों को डिमांड पर इच्छित स्थान से पिक करेगी और गंतव्य तक छोड़ेगी.

रोबो-टैक्सी के विकास में गूगल एक्स टीम लगी है जिसने गूगल ग्लास को ईजाद किया है.गूगल की इस कार में कैमरा, सेंसर, राडार और साफ्टवेयर जोड़ा जाएगा जिससे कार पर कंट्रोल किया जा सकेगा.ब्रिटेन की सड़कों पर इस कार की टेस्टिंग की अनुमति दी जा चुकी है.

गूगल ने 2010 में सेल्फ ड्राइविंग कार प्रोजेक्ट शुरू किया था.गूगल का यह सेल्फ ड्राइविंग सिस्टम टोयटा प्रायस और लेकस आरएएक्स कार में लगाया जा चुका है. sabhar : http://www.palpalindia.com

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बस, एक गोली और पासवर्ड याद रखने के झंझट से मुक्ति

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लॉस एंजिलिस. अगर आप अपने बैंक खाते, एटीएम, पैन कार्ड आदि का पासवर्ड भूल जाते हैं और इसकी वजह से आपको काफी मानसिक तनाव से गुजरना पड़ता है तो घबराएं नहीं. बस, एक गोली खाएं और पासवर्ड याद रखने के झंझट से मुक्ति पाएं.
अमरीका के कैलिफोर्निया प्रांत की एक कंपनी ने अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके एक ऎसी छोटी से गोली ईजाद की है जो आपके सभी पासवर्ड याद रखेगी. यह गोली पासवर्ड याद रखने के अलावा आपके शरीर का तापमान, शारीरिक गतिविधियों और आराम का ब्योरा भी रखती है. इस गोली के अंदर रेत के एक दाने के आकार के बराबर सिलिकन से बनी सूक्ष्म चिप होती है.
इस गोली को निगलने के बाद आपको किसी तरह का पासवर्ड याद रखने की जरूरत नहीं महसूस होगी. यह गोली खाद्य पदार्थो में मिलने वाले तत्वों से बनाई गई है और खाने के साथ-साथ यह भी बाद में पच जाती है.
इस गोली में किसी प्रकार की बैटरी नहीं होती है, बल्कि इसमें एक स्विच लगा होता है जो हमारे पेट में मौजूद एसिड से गीला होकर ऊर्जा प्राप्त करता है और चिप खास सिग्नल को पकड़ने लगती है. इसके साथ ही एक पैच भी आता है जो चिप से मिलने वाले डाटा को ट्रांसमिट करता है.
हमारा शरीर तब चिप से मिली सूचना को ट्रांसमिट करता है जिसे ब्लूटूथ वाले मोबाइल फोन पर देखा जा सकता है. यह पैच ही सभी डाटा केा स्टोर करता है. अमरीकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन और यूरोपीय नियामकों ने 2010 में ही इस गोली को अपनी हरी झंडी दिखा दी थी. अभी तक हांलाकि यह गोली बाजार में आधिकारिक रूप से उतरी नहीं है, लेकिन जल्द ही इसे बाजार में उतारा जा सकता है. sabhar : http://www.palpalindia.com

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शनिवार, 31 अगस्त 2013

रहस्यमयी एंटीमैटर पकड़ने का दावा

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रहस्यमयी एंटीमैटर पकड़ने का दावा

तकनीकी कमाल दिखाते हुए वैज्ञानिकों ने 16 मिनटों तक एंटीमैटर (प्रतिपदार्थ) को रिकार्ड समय तक इकट्ठा किए रखा.
उनका दावा है कि इससे एंटीमैटर के रहस्यों पर से पर्दा हट सकता है. एंटीमैटर रहस्यमयी पदार्थ है जिसे डॉन ब्राउन के उपन्यास और फिल्म 'एंजल्स एंड डेमन्स' में सर्वविनाशक हथियार के तौर पर दिखाया गया है. एंटीमैटर को रखना आसान नहीं क्योंकि कण और प्रतिकण एक-दूसरे से हुई टक्कर से पैदा ऊर्जा में खत्म हो जाते हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार 14 अरब साल पहले बिग बैंग के समय पदार्थ और एंटीमैटर बराबर मात्रा में उपलब्ध थे.
अगर यह संतुलन बना रहता तो ब्राह्मांड आज जिस रूप में है उस आकार में नहीं रहता. अनजाने कारणों से प्रकृति में पदार्थ के लिए अनुकूलता है और एंटीमैटर आज दुर्लभ हो गया है. भौतिक शास्त्र के लिए यह बड़ी पहेली है. वैज्ञानिकों का कहना है कि हाइड्रोजन के अणुओं के साथ कम ऊर्जा के परीक्षण इस रहस्य को सुलझाने में अहम कदम साबित हो सकते हैं.
जेनेवा में प्रयोग करने वाली यूरोपीय ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च के अल्फा टीम के प्रवक्ता जैफरी हैंग्स्ट ने कहा, 'हम एंटीहाइड्रोजन परमाणुओं को हजार सेकंडों तक पकड़ कर रख सकते हैं. उनके अध्ययन के लिए यह समय और उनकी कम मात्रा भी पर्याप्त है. वैज्ञानिकों के अनुसार आधे ग्राम एंटी मैटर की शक्ति 20 हिरोशिमा जैसे परमाणु बनों के बराबर होती है लेकिन इसे बनाने में अरबों वर्ष लग जाएंगे.' sabhar : http://www.samaylive.com

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चश्मे से छुटकारा जल्द

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चश्मे से छुटकारा जल्द

क्या आप भी उन लोगों में से एक हैं जो चश्मे का इस्तेमाल करने से आजिज आ चुके हैं?
यदि ऐसा है तो चिंता न करें. वैज्ञानिकों ने एक ऐसा क्रांतिकारी तरीका ईजाद किया है जो लाखों लोगों को चश्मा पहनने की मजबूरी से हमेशा के लिए छुटकारा दिला सकता है.

वैज्ञानिकों ने जो नई चिकित्सा पद्धति विकसित की है उसके तहत आंखों के अंदर एक तरह का छोटा-सा प्लास्टिक प्रतिरोपित कर चश्मे की जरूरत को खत्म किया जा सकता है. 'जेड कामरा' नाम की इस शैली के प्रायोगिक परीक्षणों में काफी अच्छे परिणाम मिले हैं.

डेली टेलीग्राफ के अनुसार इस शैली में लेजर की मदद से कॉर्निया (आंखों के बाहरी लेंस) में एक हल्का सा छेद कर काफी महीन परत डाल दी जाती है. इससे आंखों में प्रवेश करने वाली रोशनी की मात्रा को नियंत्रित करने में सहूलियत होगी और स्पष्ट और साफ देखा जा सकेगा. ब्रिटेन में इस तरह का इलाज शुरू हो चुका है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक 70 साल से ज्यादा उम्र के लोग, जिनकी दूर या पास की नजर काफी कम है, उन्हें इस नए इलाज का ज्यादा फायदा नहीं मिल सकेगा क्योंकि उनके कैट्रैक्ट्स को बदले जाने की जरूरत होती है.

इस तकनीक में एक आंख के प्लास्टिक प्रतिरोपण पर 2,800 पाउंड्स खर्च आएगा लेकिन 90 प्रतिशत मरीजों को दोनों आंखों के इलाज की जरूरत होगी जिस पर 4,600 पाउंड खर्च आएगा.

हालांकि ब्रिटेन के प्रमुख नेत्र चिकित्सक डॉ. लैरी बेंजामिन ने चेतावनी भी दी है कि यह बहुत दिलचस्प इलाज साबित होगा लेकिन हर किसी के लिए उपयुक्त साबित नहीं होगा जैसे कि पायलट, जिनकी रात को देखने की नजर बहुत महत्व रखती है. ऐसे में उनके लिए इसकी अनुमति नहीं दी जा सकेगी. sabhar:http://www.samaylive.com

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प्रयोगशाला में विकसित हुआ इंसानी दिमाग़

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human_brain_miniature

वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में छोटे आकार का ‘मानव मस्तिष्क’ विकसित किया है.
मटर के बराबर का ये अंग ठीक उतना बड़ा है जितना नौ हफ़्ते के भ्रूण में पाया जाता है. लेकिन इसमें सोचने की क्षमता नहीं है.

वैज्ञानिकों ने कुछ असामान्य बीमारियों की जानकारी हासिल करने के लिए इस ‘मस्तिष्क’ की मदद ली है.समझा जाता है कि ये तंत्रिका से जुड़ी बीमारियों के इलाज में मददगार साबित होगा.
इस शोध के बारे में विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में लेख छपा है.

कोशिकाएं

तंत्रिका विज्ञान से जुड़े वैज्ञानिकों ने नई खोज को चौंका देनेवाला और दिलचस्प बताया है.
मानव मस्तिष्क शरीर में पाए जाने वाले सभी अंगों में सबसे अधिक जटिल माना जाता है.
'ऑस्ट्रियन अकादमी ऑफ़ साइंसेस' के वैज्ञानिक अब मानव मस्तिष्क के शुरूआती आकार को विकसित करने में कामयाब हो गए हैं.
वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग के लिए या तो मूल भ्रूणीय को‏‏‏शिकाओं या वयस्क चर्म कोशिकाओं को चुना. इनकी मदद से भ्रूण के उस हिस्से को तैयार किया गया जहां दिमाग़ और रीढ़ की हड्डी का हिस्सा विकसित होता है.
मानव मस्तिष्क की निर्माण प्रक्रिया
इन कोशिकाओं को 'जेल' की छोटी बूंदों में रखा गया और फिर इन्हें घूमने वाले बायोरिएक्टर में डाला गया ताकि उन्हें पोषण और ऑक्सीजन हासिल होती रहे.
ये कोशिकाएं विकसित होकर ख़ुद को दिमाग़ के अलग-अलग हिस्सों में बांटने में कामयाब रही हैं. इसमें दिमाग़ का बाहरी आवरण, आंख के पीछे का पर्दा और बहुत कुछ मामलों में हिप्पोकैम्पस जैसे हिस्से मौजूद पाए गए हैं.
हिप्पोकैम्पस वयस्कों में याददाश्त से संबंधित हैं. ये मस्तिष्क पिछले साल भर से जीवित हैं.
वैज्ञानिकों का मानना है कि मस्तिष्क के विकास से दवाओं के रिसर्च में भी मदद मिलेगी. अब इन दवाओं का परीक्षण चूहों और दूसरे जानवरों के बदले इन्हीं पर हो सकेगा.

इससे पहले शोधकर्ता मस्तिष्क की कोशिकाओं का विकास कर पाए थे लेकिन ये पहली बार है जब वो इंसानी दिमाग़ को विकसित करने के इतने क़रीब पहुंचे हैं.
जेमस गैलागर
बीबीसी स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता
 sabhar: www.bbs.co.uk

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'फेस मशीन' पढ़ लेगी चेहरे की ख़ुशी और ग़म

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फेस मशीन
बीबीसी संवाददाता समांथा फेनविक ने चेहरा पढ़ने वाली मशीन के प्रयोग में हिस्सा लिया

आपका चेहरा आपके बारे में क्या कह रहा है?
किसी के लिए ये बताना शायद मुश्किल हो लेकिन एक नई तकनीक के बारे में दावा किया जा रहा है कि वो चेहरा देखकर पहचान लेगी कि आप ख़ुश हैं, उदास हैं या बोर हो रहे हैं.

लेकिन कंपनी इसके लिए पहले आपकी अनुमति लेती है. इसके बाद बायोमेट्रिक ट्रैकिंग के लिए विशेष वेबकैम से आपके चेहरे के भावों को रिकार्ड करती है.इससे ऑनलाइन विज्ञापन कंपनियों को पता चल सकेगा कि आप उनके क्लिक करेंविज्ञापन पेज को देखकर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं?
इस तकनीक का इस्तेमाल अभी बड़े बजट के विज्ञापनों को लांच करने से पहले लोगों के रुझान को जानने के लिए किया जाता है.

अनौपचारिक प्रयोग

बीबीसी ने इस तकनीक का विकास करने वाले रीयलआइज़ के साथ मिलकर अपने रेडियो-4 के श्रोताओं पर प्रोग्राम ‘यू एंड योर्स’ की रिलीज से पहले अनौपचारिक प्रयोग किए.
"यह कंप्यूटर प्रोग्राम देखने में सक्षम है कि लोगों की भौंहें, मुंह और आंखें कैसे गति करती है? वैश्विक स्तर पर छह भावनाएं होती हैं, जो सबके लिए समान होती है. इसके ऊपर भौगोलिक क्षेत्र और उम्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. हमने कंप्यूटर्स को लोगों के चेहरे पर आने वाली भावनाओं को पढ़ने में सक्षम बनाने के लिए प्रशिक्षित किया है."
मिखेल जैट्मा, प्रबंध निदेशक रियलआइज
इस प्रयोग में रेडियो-4 के 150 श्रोताओं की भावनाओं का पता लगाया गया, जिसमें रेडियो प्रोग्राम की बेहतरीन धुनों को सुनने के दौरान हंसने और मुंह बनाने की उनकी छोटी-छोटी भावनाओं को दर्ज किया गया.
प्रोग्राम सुनने वालों को द आर्चर्स और सेलिंग बाय की लोकप्रिय धुनों के साथ-साथ गॉड सेव द क्वीन की धुन भी सुनाई गई ताकि पता लगे कि श्रोता कैसे उनकी तुलना करते हैं.

चेहरा पढ़ती मशीन

रियलआइज़ के प्रबंध निदेशक मिखाइल जैट्मा ने बीबीसी को बताया कि “यहक्लिक करेंकंप्यूटर प्रोग्राम देखने में सक्षम है कि लोगों की भौंहें, मुंह और आंखें कैसे गति करती है? वैश्विक स्तर पर छह भावनाएं होती हैं, जो सबके लिए समान होती है. इनके ऊपर भौगोलिक क्षेत्र और उम्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता.”
मिखाइल जैट्मा कहते हैं कि “हमने कंप्यूटरों को लोगों के चेहरे पर आने वाली भावनाओं को पढ़ने में सक्षम बनाने के लिए प्रशिक्षित किया है.
हम उम्मीद करते हैं कि यह तकनीक क्लिक करेंभविष्य में विज्ञापनों को उपयुक्त, कम खीझ और दबाव वाला बनाने में सहायक होगी.”
लोगों के चेहरे के भावों से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक द आर्चर्स और सेलिंग बाय के लिए प्रारंभ में ख़ुशी की दर ज़्यादा थी, जब लोगों ने धुनों को पहचानना शुरु किया.

इस प्रयोग में ख़ुशी के अतिरिक्त उलझन, गुस्से, आश्चर्य और अरुचि की भावनाओं का भी मूल्यांकन किया गया.
समांथा फेनविक
बीबीसी संवाददाता
sabhar : www.bbb.co.uk

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आनुवंशिक कोड में परिवर्तन जीवों की उम्र बढ़ाए

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आनुवंशिक कोड में परिवर्तन जीवों की उम्र बढ़ाए

जापान के राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने बताया है कि जीवों के आनुवंशिक कोड में परिवर्तन करके उनकी उम्र बढ़ाई जा सकती है। जापानी वैज्ञानिकों ने राइबोसोम के अध्ययन पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। राइबोसोम जीवित कोशिकाओं का एक ऐसा घटक है जो एमिनो एसिड से प्रोटीन का संश्लेषण करता है।

वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि राइबोसोम का अस्थिर व्यवहार ही जीवों का बुढ़ापा बढ़ने का कारण बनता है। वैज्ञानिकों ने आनुवंशिक कोड में परिवर्तन करके इस अस्थिरता को दूर करने का एक रास्ता भी खोज लिया है। उन्होंने फफूंदीय ख़मीर के जीवन को दो दिन से बढ़ाकर तीन दिन तक करने के काम में सफलता पाई है। वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष भी निकाला है कि इसी तरह से मानव जीवन को लम्बा करने के लिए भी नए तरीके खोजे जा सकते हैं। sabhar :http://hindi.ruvr.ru
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/news/2013_08_30/viv-umr-barhae/

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बुधवार, 28 अगस्त 2013

प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज

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दुनिया जहान से बेखबर कुछ खोजने और दुनिया को देने की सनक वैज्ञानिकों में सदियों से रही है। उसी का नतीजा है कि आज हम ये सारे सुख भोग रहे हैं और आराम की जिंदगी जीते हैं। लेकिन कुछ जुनूनी अपनी जिंदगी को दांव लगाकर लगे हुए हैं खोज में।
 
शोधकर्ता हर चरम परिस्थिति में काम करने के लिए तैयार रहते हैं। इसके लिए उन्होंने बनाई हैं कुछ प्रयोगशालाएं, जो आम जगहों से दूर ऐसे हालातों में हैं जहां चल रहा है निरंतर शोध।
 
कैसे खतरनाक हालातों में ये काम कर पाते होंगे। आईए जानते हैं कुछ ऐसी ही प्रयोगशालाओं के बारे में, जो असामान्य वातावरण वाले स्थानों पर बनी हैं और वहां क्या होता है काम। 
 प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज
सबसे गहरे पानी में स्थित लैब
अमेरिका के फ्लोरिडा में नोआ एक्वारिस रीफ बेस एकमात्र ऑपरेशनल अंडरवाटर लैब है। पिछले दो दशकों में शोधकर्ता यहां इकोलॉजी और रीफ का अध्ययन कर रहे हैं। इसके अलावा तरिक्षयात्रियों को भारहीनता जैसे कुछ अनुभव दिलाने के लिए नासा भी इसका प्रयोग करता है।
...................................प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज

सर्वाधिक तापमान पैदा करने वाली लैब 
अमेरिका के शहर न्यूयॉर्क में स्थित ब्रूकहैवन नेशनल लैबोरेट्री में 4 ट्रिलियन डिग्री सेल्सियस तापमान पैदा किया जा चुका है। फरवरी 2010 में लेटिविस्टिक 
हैवी आयन कोलाइडर (आरएचआईसी) की मदद से इंसान द्वारा पैदा किया गया यह सर्वाधिक तापमान सूर्य के केंद्र की तुलना में 2,50,000गुना अधिक था। इसके लिए सोने के आयनों को प्रकाश की गति से टकराया गया था। आरएचआईसी दुनिया की एक मात्र फैसिलिटी है, जहां प्रोटॉन के घूमने का परीक्षण करने के लिए पोलराइज्ड प्रोटॉन की टक्कर कराई जाती है। इसके अलावा सबसे अधिक एनर्जी वाले प्रोटॉन को भी यहीं देखा गया है।
 
प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज
सबसे बड़ी पार्टिकजिक्स लैल फिब 
जिनेवा के पास यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) स्विट्जरलैंड में 250 एकड़ और फ्रांस में 1,125 एकड़ जगह में बनी है। यह जगह हाल में लार्ज ह्रेडन कोलाइडर (एलएचसी) के महाप्रयोग के कारण चर्चा में रही है। एलएचसी को 150 मीटर की गहराई में एक सुरंग के अंदर लगाया गया है, जो कि 27 किमी तक फैली है। यहां 113 देशों के 10,000 से अधिक वैज्ञानिक और इंजीनियर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही 2,400 लोगों का फुल-टाइम स्टाफ भी है। इसकी स्थापना 1994 में हुई थी और दुनिया की प्रमुख टेक्नोलॉजी जैसे वर्ल्ड वाइड वेब का कास यहीं से हुआ।
प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज

सबसे ठंडी फिजिक्स लैब 
अंटार्कटिका की जमी हुई मोटी बर्फ की परत के नीचे आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जरवेट्री स्थापित है। यह धरती की सबसे ठंडी फिजिक्स लैब और दुनिया की सबसे बड़ी न्यूट्रिनो ऑब्जरवेट्री है। यहां रोजाना शोध से करीब एक टेराबाइट डाटा जमा होता है, जिसमें से 100 गीगाबाइट डाटा विश्लेषण के लिए भेजा जाता है। 
 
प्रयोगशालाएं, जहां मौत के डर से बे-खौफ करते हैं वैज्ञानिक खोज

सबसे ऊंची जगह पर प्रयोगशाला 
पाल के सागरमाथा नेशनल पार्क में समुद्र तल से 16,568 फीट की ऊंचाई पर पिरामिड लैबोरेट्री बनी है। यह तीन मंजिला पिरामिड के आकार वाली लैब ग्लास, स्टील और एल्युमिनियम से बनी है। यहां जियोलॉजी, क्लाइमेट, एन्वायर्नमेंट्री और ह्यूमन फिजियोलॉजी के बारे में रिसर्च की जाती है। इसे तीन हिस्सों में बांटा गया है। दो तलों में कई लैब और वेयरहाउस हैं और तीसरे तल में डाटा प्रोसेसिंग और टेलीकम्युनिकेशन्स की व्यवस्था की गई  sabhar : bhaskar.com

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