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शनिवार, 30 अगस्त 2014

दिमाग की तरंगों से फ्रांस भेजा संदेश

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मोबाइल या इंटरनेट को भूल जाइए, जल्द आप मस्तिष्क के जरिए दोस्तों और सहकर्मियों को संदेश भेज सकेंगे। वैज्ञानिकों ने तकनीक के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए मस्तिष्क से संदेश भेजने का सफल प्रयोग किया है।
इस प्रयोग में एक भारतीय व्यक्ति ने फ्रांस में मौजूद अपने साथी को मस्तिष्क की तरंगों के जरिए संदेश भेजा है। स्पेन के तीन और फ्रांस के एक वैज्ञानिक संस्थान के शोधकर्ता इस प्रयोग पर काम कर रहे हैं।
प्लस वन जर्नल में प्रकाशित शोध रिपोर्ट के मुताबिक यह प्रयोग मस्तिष्क तंरग संवेदी मशीन पर आधारित था। इससे पहले मस्तिष्क तंरगों से कंप्यूटर गेम खेलने और हेलीकॉप्टर को नियंत्रित करने जैसे प्रयोग हुए हैं, लेकिन पहली बार इसका इस्तेमाल दो मस्तिष्कों के बीच संदेश भेजने में किया गया।
ऐसे किया प्रयोगजब हम कुछ सोचते हैं, तो मस्तिष्क में मौजूद न्यूरॉन धीमी विद्युत तरंगों को जन्म देता है। इलेक्ट्रोएनसेफ्लोग्राफी (ईईजी) मशीन इन विद्युत तरंगों को रिकॉर्ड करने में सक्षम होती है। प्रयोग के दौरान भारतीय ने दो शब्द सोचे ‘होला’ और ‘सिआ’। होला फ्रेंच शब्द है, जिसका अर्थ है हैलो। वहीं स्पैनिश शब्द सिआ अभिवादन में इस्तेमाल होता है। ईईजी ने इसे रिकॉर्ड किया और एक कंप्यूटर ने अपनी बाइनरी भाषा में बदल दिया। यह संदेश इंरटनेट से रिसीवर के पास पहुंचा। रिसीवर के मस्तिष्क से जुड़ी मशीन ने संदेश को डिकोड कर दिया, जिससे वह इसे सफलतापूर्वक समझ सका।

sabhar : http://www.livehindustan.com/

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गुरुवार, 28 अगस्त 2014

अन्यग्रहवासियों से मुलाक़ात ज़रूर होगी : रूसी अंतरिक्ष-यात्री

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अन्यग्रहवासियों से मुलाक़ात ज़रूर होगी : रूसी अंतरिक्ष-यात्री

अंतरिक्ष में पृथ्वी की परिधि पर उपस्थित अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष-स्टेशन में काम कर रहे रूसी अंतरिक्ष-यात्री गेन्नादी पदालका का कहना

अंतरिक्ष में पृथ्वी की परिधि पर उपस्थित अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष-स्टेशन में काम कर रहे रूसी अंतरिक्ष-यात्री गेन्नादी पदालका का कहना है कि भविष्य में मानव की मुलाक़ात दूसरे ग्रह के निवासियों से ज़रूर होगी।
चीन के प्रमुख टेलीविजन चैनल पर दर्शकों के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि इस ब्रह्माण्ड में अकेले सिर्फ़ मानवजाति ही रहती हो।
गेन्नादी पदालका ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने पहले से ही अन्यग्रहवासी से मुलाक़ात होने पर उसके साथ सम्पर्क और व्यवहार की हिदायतें तैयार कर रखी हैं। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि ये हिदायतें कैसी हैं।
sabhar :http://hindi.ruvr.ru/

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नैनोकण निकालेंगे तर्कसंगत निष्कर्ष

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नैनोकण निकालेंगे तर्कसंगत निष्कर्ष

रूसी विशेषज्ञ अब मेडिकल नैनोरोबोट बनाने की कगार पर पहुँच गए हैं| उन्होंने नैनो और सूक्ष्मकणों को जैव-रासयनिक प्रतिक्रियाओं (बायोकेमिकल रिएक्शनों) की मदद से तर्कसम्मत निष्कर्ष निकालना सिखा दिया है| यह नई पीढी के डाक्टरी उपकरणों की मदद से जैव-प्रक्रियाओं का विश्वसनीय संचालन करने का रास्ता है| ऐसे उपकरण आवश्यक औषधियां ठीक समय पर और ऐन सही ठिकाने पर शरीर में पहुंचाएंगे|

ये नैनोरोबोट निर्धारित ठिकाने पर “जादुई गोलियां” “दागेंगे”| स्नाइपरों की तरह बिलकुल सही निशाना लगाने वाली जैव-संरचनाओं (बायोस्ट्रक्चरों) को ही वैज्ञानिक ऐसी “जादुई गोलियां” कहते हैं| ये मानव-शरीर में अणुओं के स्तर पर बिलकुल सही समय पर और सही स्थान पर आवश्यक औषधि पहुंचा सकती हैं| इस प्रकार मानव-शरीर का “संचालन” किया जा सकेगा और उसमें आनेवाली समस्याएं शीघ्रातिशीघ्र हल की जा सकेंगी, साथ ही इस प्रकार मानव-शरीर पर कोई कुप्रभाव भी नहीं पड़ेगा| |
रूसी वैज्ञानिकों के दल ने वस्तुतः ऐसे “स्नाइपरी” डाक्टरी उपकरण बना लिए हैं| रूसी विज्ञानं अकादमी के बायो-ऑर्गनिक कैमिस्ट्री इन्स्टीट्यूट और सामान्य भौतिकी इन्स्टीट्यूट तथा मास्को के भौतिकी-तकनीकी इन्स्टीट्यूट के विशेषज्ञ जैव-अणुओं की सहायता से गणनाओं की विधि विकसित कर रहे हैं जिसे बायोकम्प्यूटिंग का नाम दिया गया है| इसकी मदद से नैनोरोबोटों को यह सिखाया जा सकेगा कि कैसी स्थिति होने पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए|
रूसी टीम ने जो रास्ता अपनाया है उसकी खासियत यह है कि यहाँ बायोकम्प्यूटिंग कोशिकाओं (सेलों) के भीतर नहीं, उनके बाहर होती है| ऐसा करना कहीं अधिक जटिल है| कोशिकाओं के भीतर तो कोशिकाओं के जैव-अणु तत्वों (उदाहरण के लिए डीएनए) का उपयोग किया जा सकता है, किंतु कोशिकाओं से बाहर ऐसी कोई नैसर्गिक संरचनाएं (नेचुरल स्ट्रक्चर) नहीं हैं जो गणनाएँ करने, निष्कर्ष पर पहुँचने में मदद दे सकें| किंतु कोशिका-इतर बायोकम्प्यूटिंग से ही “जादुई गोली” बन सकती है जोकि शरीर की दृष्टि से एक बाहरी “उपकरण” है किंतु इसके बावजूद वही ऊतकों (टीशू) पर सबसे सही तरीके से प्रभाव डालता है|
रूसी प्रोजेक्ट में नैनोकण अपनी गणनाओं के लिए अपनी बाहरी परत से काम लेते हैं जिसकी संरचना ख़ास तौर पर चुनी जाती है| बाहरी पदार्थों के सम्पर्क में आने पर इस परत की प्रतिक्रया अलग-अलग होती है| इन पदार्थों के अणु तर्कसंगत क्रियाओं के लिए संकेतों का काम करते हैं – निश्चित संकेत मिलने पर नैनोकण पहले से तय एल्गोरिथम के अनुसार निश्चित कार्य करते हैं|
यह पहला ऐसा प्लेटफार्म है जो कोई भी तर्कसंगत फंक्शन पूरा कर सकता है, नेचर नैनोटेक्नोलॉजी पत्रिका ने लिखा है|
sabhar :http://hindi.ruvr.ru/

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मंगलवार, 26 अगस्त 2014

टेलिपैथी

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एक समय पहले जब विज्ञान और तर्कशास्त्र जैसे विषयों तक सामान्य जनता की पहुंच नहीं थी तब तक हर क्रिया को चमत्कार ही समझा जाता था. लेकिन अब विज्ञान के आविष्कारों और स्थापनाओं ने चमत्कार के सिद्धांत को पूरी तरह नकार दिया है और यह साबित कर दिया है कि सूरज के चमकने से लेकर पृथ्वी पर होने वाली हर हलचल, यहां तक कि इंसानी जीवन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी घटना के तार विज्ञान के साथ जुड़े हैं ना कि चमत्कार के साथ.


telepathy
विज्ञान के आविष्कार ने हमारे जीवन को सहज बना दिया है और इसके कई फायदे भी हैं लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं और विज्ञान भी इन सबसे बच नहीं पाया है. टेलिपैथी, विज्ञान की ही एक विधा है, जिसके अंतर्गत शारीरिक रूप से एक दूसरे से मीलों दूर बैठे लोग भी मानसिक रूप से एक दूसरे तक संदेश पहुंचा सकते हैं. टेलिपैथी की सहायता से आप किसी भी व्यक्ति को अपने अनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं और सबसे खास बात है कि आप दोनों की बात किसी तीसरे के कानों तक नहीं पहुंचेगी.



टेलिपैथी के फायदे बहुत हैं लेकिन आज हम आपको इस विधा से जुड़ी एक ऐसी घटना से अवगत करवाने जा रहे हैं जब तुर्की के चार इंजीनियरों ने आत्महत्या कर ली थी और आश्चर्यजनक रूप से इन चारों ही आत्महत्याओं का कारण टेलिपैथी को बताया गया.


telepathy
संदिग्ध रूप से हुई इन चारों आत्महत्याओं की जब जांच-पड़ताल शुरू हुई तो इनके पीछे का कारण टेलिपैथी को पाया गया. ऐसा माना गया कि किसी ने इन चारों इंजीनियरों को टेलिपैथी के जरिए पहले अपने वश में किया और फिर बाद में उन्हें आत्महत्या करने के लिए उकसाया. इनपर टेलिपैथी का प्रयोग इतना असरदार था कि वह अपने कानों में गूंजने वाली आवाज को अनसुना नहीं कर पाए और बिना सोचे-समझे मौत को गले लगा लिया.



यह घटना 2006-2007 की है लेकिन टेलिपैथी के प्रयोग के किस्से पुराणों में भी पढ़े जाते हैं, जहां बिना किसी यंत्र के सिर्फ विचारों के संप्रेषण के जरिए ही अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई जाती थी. पहले इसे चमत्कातर का नाम दिया जाता था लेकिन अब यह स्पष्ट रूप से विज्ञान का ही एक नमूना साबित हुई है. आपको बता दें कि टेलिपैथी में मनुष्य शरीर की पांचों इन्द्रियों का कोई भी प्रयोग नहीं किया जाता बल्कि छठी इन्द्री को विकसित कर टेलिपैथी का उपयोग किया जाता है जो किसी भी रूप में आसान नहीं है.

telepathy

भारत में टेलिपैथी की विधा बहुत पुरानी है, हमारे शास्त्रों में इसका जिक्र मिलता है लेकिन आधुनिक युग में टेलिपैथी को जन सामान्य तक पहुंचाने का श्रेय फ्रेड्रिक डब्ल्यू एच मायर्स को जाता है जिन्होंने वर्ष 1882 में विचार संप्रेषण की इस विधा को जन टेलिपैथी का नाम दिया.


आपको शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि कछुआ इकलौता ऐसा जीव है जिसे इस विधा में महारत हासिल है, मादा कछुआ अपने अंडों से मीलों दूर से भी संपर्क साध सकती है इतना ही नहीं जब अंडों में से बच्चे निकलने का समय नजदीक आने लगता है तो वह अपने बच्चों के पास चली जाती है. सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि मादा कछुआ को अगर कुछ हो जाए तो अंडों में मौजूद उसके बच्चे भी मर जाते हैं.sabhar :http://infotainment.jagranjunction.com/

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सोमवार, 25 अगस्त 2014

जापान करेगा इबोला का इलाज

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अफ्रीकी देशों में इबोला महामारी के बढ़ते संकट के बीच जापान ने कहा है कि उसने इबोला का इलाज ढूंढ निकाला है और विश्व स्वास्थ्य संगठन की मांग पर दवाएं मुहैया कराने के लिए तैयार है.



जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव योशिहिदे सूगा ने सोमवार को पत्रकारों से कहा कि कंपनी फुजीफिल्म होल्डिंग्स कॉरपोरेशन की एक शाखा ने इंफ्लुएंजा की दवा तैयार की है, जिसे इबोला के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. फैवीपीरावीर नाम की इस दवा को मार्च में ही जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने मंजूरी दे दी थी.
फुजीफिल्म के प्रवक्ता ताकाओ आओकी ने बताया कि इबोला और इंफ्लुएंजा एक ही तरह के वायरस से फैलते हैं, इसलिए दोनों वायरस पर इस दवा का असर दिख सकता है. उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला में चूहों पर टेस्ट किए जा चुके हैं और नतीजे सकारात्मक रहे हैं.
कंपनी का कहना है कि उसके पास 20,000 मरीजों के लिए दवा मौजूद है और वह डब्ल्यूएचओ के जवाब का इंतजार कर रही है. साथ ही कंपनी अमेरिका की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के साथ भी संपर्क साधे हुए है. फुजीफिल्म का कहना है कि डब्ल्यूएचओ के जवाब से पहले अगर लोगों ने निजी तौर पर दवा की मांग शुरू की, तो वह उसके लिए भी तैयार है.
हाल ही में अमेरिका में जेडमैप नाम की दवा से दो लोगों का इलाज हुआ है. इस दवा को सैन डिएगो मैप नाम की कंपनी ने विकसित किया है और यह अभी भी प्रयोग के स्तर पर ही इस्तेमाल की जा रही है. इसी तरह की कई दवाएं दुनिया भर में विकसित की जा रही हैं और इबोला के मामले में डब्ल्यूएचओ का कहना है कि लोगों की जान बचाने के लिए किसी भी तरह की एक्सपेरिमेंटल दवा का इस्तेमाल नैतिक है.
अफ्रीका में इबोला का प्रकोप सबसे ज्यादा देखा जा रहा है. इस साल यह खतरनाक वायरस 1,400 लोगों की जान ले चुका है.
आईबी/एमजे (एएफपी)

sabhar :DW.DE

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रविवार, 24 अगस्त 2014

एचआईवी का टीका बनाने के करीब पहुंचे वैज्ञानिक

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एचआईवी का टीका बनाने के करीब पहुंचे वैज्ञानिक

न्यूयॉर्क: शोधकर्ताओं ने विशेष एचआईवी एंटीबॉडिज (रोग-प्रतिकारक) के नए गुणों का खुलासा करने में सफलता पाई है, जिसे ब्रॉडली न्यूट्रालाइजिंग एंटीबॉडिज (बीएनए) कहा जाता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि इस खुलासे से हम एचआईवी का टीका बनाने के एक कदम और पास पहुंच गए हैं। बीएनए का विकास एचआईवी के टीके का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। एचआईवी से संक्रमित कुछ ही लोगों में बीएनए का निर्माण होता है। बीएनए की सहायता से टीका बनाना प्रमुख उद्देश्य है। इसकी सहायता से टीकाकरण के बाद वही सुरक्षा एचआईवी से मिलेगी, जैसा अन्य बीमारियों में टीकाकरण के बाद मिलता है।
अमरीका में बॉस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर थॉमस केप्लर ने कहा, इस परिणाम से स्पष्ट होता है कि बीएनए टीके का विकास संभव है। उल्लेखनीय है कि एंडिबॉडी प्रतिरक्षण बी कोशिकाओं से बनती है। जब बी कोशिकाएं किसी एंटीजेंस (रोगाणु) के संपर्क में आती है, तो उसकी रचना में परिवर्तन आ जाता है, जो एंटिजेंस के लिए घातक होता है। इस परिवर्तन को इंडेल" कहा जाता है।
शोधकर्ताओं ने एक विशेष बीएनए का अध्ययन किया, जिसे सीएच 31 कहते हैं। इसमें काफी ज्यादा मात्रा में इंडेल पाया गया। जिसका अर्थ है कि इसमें रोगाणुओं से लड़ने की असीम क्षमता है। इस प्रकार, सीएच 31 के विकास में इंडेल की महत्वपूर्ण भूमिका उजागर हुई। केप्लर ने कहा, सीएच31 की एचआईवी से लड़ने की क्षमता को आंका गया, तो पता चला कि वही सीएच 31 ऎसा कर पाने में सक्षम थे, जिनमें इंडेल मौजूद थे और अधिक मात्रा में थे।
एजेंसी 
sabhar :http://zeenews.india.com/

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ढूंढ़ने में मददगार कोशिका की खोज

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इनसान के मस्तिष्क में एक ऐसी कोशिका होती है, जो उसे किसी अपरिचित माहौल में अपनी जानी-पहचानी चीजों को ढूंढ़ने में मदद करती है. वैज्ञानिकों ने इनसान के दिमाग में एक नये प्रकार की कोशिका को खोज निकाली है, जो इनसान की रुचि और उसके अनुकूल चीजों को ढूंढ़ने में उसकी मदद करता है. पेनसिलवालिया यूनिवर्सिटी, ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी, यूसीएलए और थॉमस जैफरसन यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम ने मिल कर यह खोज की है. साइंस डेली में छपी एक खबर में बताया गया है कि हम जब किसी अपरिचित माहौल में खुद की रुचि से जुड़ी चीजों को ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं तो इसमें ग्रिड सेल हमारी मदद करता है.
हमारे ढूंढ़ने का तरीका इसी सेल के व्यवहार पर निर्भर करता है. इस प्रकार से चीजों को ढूंढ़ने को विज्ञान की भाषा में पाथ नेविगेशन कहा जाता है. ड्रेक्सेल्स स्कूल ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, साइंस एंड हेल्थ सिस्टम्स में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर जोशुआ जैकब का कहना है कि ग्रिड पैटर्न के बारे में बताना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि यह दृढ़ होता है. इस रिसर्च के दौरान दिमाग की कई तरह से रिकॉर्डिग की गयी, जिसमें 14 भागीदारों को शामिल किया गया.
इसमें बहुत सी चीजों को छिपा कर रखा गया और वहां मौजूद लोगों से अपनी रुचि के मुताबिक चीजों को ढूंढ़ने के लिए कहा गया. इस दौरान इन लोगों के मस्तिष्क और उनकी कोशिकाओं को रिकॉर्ड किया गया. रिसर्च टीम ने अध्ययन किया कि चीजों को ढूंढ़ने के दौरान भागीदारों के न्यूरॉन की गतिविधि कैसी रही.sabhar :http://www.prabhatkhabar.com/

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बुधवार, 20 अगस्त 2014

रूसी वैज्ञानिकों ने गम्भीर रोगों के इलाज के लिए दुनिया का पहला 'स्मार्ट' नैनोकण

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रूसी वैज्ञानिकों ने गम्भीर रोगों के इलाज के लिए दुनिया का पहला 'स्मार्ट' नैनोकण

रूसी वैज्ञानिकों ने चिकित्सा के क्षेत्र में नैनोरोबोटों की खोज करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। ये नैनोरोबोट शरीर मेंजैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं का उपयोग कर रोग का ठीक-ठीक निदान कर सकेंगे। इस नई प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके रोगों केनिदान और गम्भीर रोगों के उपचार के नए तरीकों की खोज की जा सकेगी।


प्रोख़रोफ़ सामान्य भौतिकी संस्थान, शेम्याकिन और अवचेन्निकोफ़ जैव-आर्गेनिक रसायन संस्थान तथा मास्को के भौतिकी तकनीकी संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा मिलकर किए जा रहे इस अनुसन्धान की रिपोर्ट प्रमुख वैज्ञानिक पत्रिका ’नेचर नैनोटैक्नोलौजी’ में प्रकाशित हुई है।
अपने काम के बारे में बताते हुए वैज्ञानिकों ने लिखा है कि उनका यह अनुसन्धान जैवमोलेक्यूल की सहायता से बीमारी का पता लगाने के सिद्धान्त पर आधारित है। यदि इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में तार्किक तत्त्वों की मदद से करेण्ट के द्वारा या वोल्टेज़ के द्वारा क्रिया की जाती है तो जैव रासायनिक प्रणालियों में कोई ऐसा निश्चित तत्त्व सामने आएगा जो जैविक प्रणालियों पर उपचारात्मक प्रभाव दिखा सकता है। इस स्थिति में नैनोकणों की विशेष रूप से चयनित रचना बाहरी परत के माध्यम से कुछ निश्चित कार्यों को पूरा करेगी।
वैज्ञानिकों ने इन नैनोकणों को कैंसर कोशिकाओं के साथ लक्षित परिणाम प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल करके दिखाया। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इस अतिरिक्त नियंत्रण के फलस्वरूप स्वस्थ ऊतकों और अंगों पर कम से कम प्रभाव डालते हुए कैंसर की कोशिकाओं का अधिक सटीक रूप से विनाश किया जा सकेगा।

sabhar: http://hindi.ruvr.ru/


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दिमाग़ की उत्तेजना दिल के लिए फायदेमंद!

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मनुष्य का दिमाग

जेम्स गैलाघर
हेल्थ एडिटर, बीबीसी न्यूज़ वेबसाइट

दिमाग़ के एक हिस्से की उत्तेजना दिल के लिए फायदेमंद हो सकती है.
'प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंस' में प्रकाशित इस रिसर्च पेपर के अनुसार दिमाग़ का जो हिस्सा शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करता है, उसके उत्तेजित होने से दिल का दौरा पड़ने के बाद मरीज़ की हालत सुधर सकती है.

'द स्ट्रोक एसोसिएशन' ने कहा है कि रिसर्च से दिलचस्प नतीजे निकले हैं. देखा गया है कि दिल के दौरे से लोगों की याद्दाश्त चली जाती है, उनकी गतिविधियों और बातचीत करने की क्षमता पर भी असर पड़ता है.अध्ययन में चूहे के दिमाग़ पर तेज़ रोशनी डाली गई. ये चूहे उन जानवरों की तुलना में तेजी से दौड़ने लगे जिन पर यह प्रयोग नहीं आज़माया गया था.
ख़ून के थक्के से दिमाग़ की कोशिकाओं को ऑक्सीजन और शुगर की आपूर्ति बंद हो जाती है और वे कोशिकाएँ नष्ट होने लगती हैं. स्ट्रोक होने की सूरत में नुक़सान कम हो इसके लिए जल्द से जल्द इलाज ज़रूरी होता है.

उत्तेजना

मनुष्य का दिमाग
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन की रिसर्च टीम ने जानवरों पर परीक्षण करके इस बात का पता लगाने की कोशिश की कि क्या दिमाग़ को उत्तेजित करने से उनके दिल में कोई सुधार आता है या नहीं.
शोधकर्ताओं को ये विश्वास है कि उत्तेजना से होने वाला असर इस बात पर निर्भर करेगा कि दौरा पड़ने के बाद दिमाग़ में कितने अंदरूनी बदलाव होते हैं. उन्होंने मस्तिष्क की कोशिकाओं को जोड़ने वाले तरल पदार्थ का स्तर बढ़ा हुआ पाया.
रिसर्च टीम के लीडर प्रोफेसर गैरी स्टीनबर्ग ने कहा है कि दिल का दौरा पड़ने की स्थिति में मरीज के दिमाग की कोशिकाओं को बचाने के लिए दवा का चुनाव एक चुनौती था. sabhar :http://.bbc.co.uk/

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रविवार, 16 फ़रवरी 2014

नई क़िस्म की सूर्य-बैटरियों के निर्माण की तक्नोलौजी खोज ली गई

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नई क़िस्म की सूर्य-बैटरियों के निर्माण की तक्नोलौजी खोज ली गई

आस्ट्रेलिया की फ़्लींडेर्स यूनिवर्सिटी में प्लास्टिक लेमिनेशन करके लचीली सूर्य-बैटरियों के निर्माण की ऐसी नई तकनीक खोज ली गई

आस्ट्रेलिया की फ़्लींडेर्स यूनिवर्सिटी में प्लास्टिक लेमिनेशन करके लचीली सूर्य-बैटरियों के निर्माण की ऐसी नई तकनीक खोज ली गई है जो कहीं अधिक सस्ती है। इस आविष्कार से नई पर्यावरण शुद्ध ऊर्जा की ओर आगे बढ़ना आसान हो जाएगा।
हालाँकि प्लास्टिक की सूर्य-बैटरियों के क्षेत्र में पिछले पन्द्रह साल से अनुसंधान किए जा रहे हैं, लेकिन फिर भी इस दिशा में आजकल उपयोग में लाई जा रही तकनीक बड़ी महँगी पड़ती है। परम्परागत् रूप से प्लास्टिक पैनल बनाने की तकनीक में एक के बाद एक विभिन्न सामग्रियों की परतें एक-दूसरे के ऊपर चढ़ाई जाती हैं। लेकिन समय के साथ-साथ ये सामग्रियाँ घिस जाती हैं और सूर्य-बैटरियाँ काम करना बन्द कर देती हैं।
नई तकनीक के अनुसार दो विद्युत-संचरण परतों पर विभिन्न सामग्रियों की परत चढ़ाने के बाद ऊपर से उस पर प्लास्टिक लेमिनेशन किया जा सकेगा। इस लेमिनेशन के फलस्वरूप सामग्रियों का घिसना और आपस में मिलना रूक जाएगा और सूर्य-बैटरी कहीं अधिक कुशलता से काम कर सकेगी।
लेमिनेशन का यह काम प्रिंटिंग मशीन से भी किया जा सकेगा। इससे बड़े पैमाने पर जल्दी काम करना संभव होगा और सूर्य-बैटरियों की लागत-क़ीमत भी बहुत कम हो जाएगी। sabhar http://hindi.ruvr.ru/

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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

कृत्रिम हाथ असली हाथ जैसा

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 रोम. किसी दुर्घटना में अपना हाथ गंवा चुके लोगों के लिए वैज्ञानिक एक खुशखबरी लाए हैं. शोधकर्ताओं ने एक ऐसा कृत्रिम हाथ बनाने में कामयाबी हासिल करली हैं जो काफी कुछ असली हाथ जैसा हैं. यानि यह कृत्रिम हाथ चीज़ों को पकड़ने के साथ-साथ उन्हें महसूस भी कर सकेगा. यूरोपीय शोधकर्ताओं ने अपनी इस सफलता की घोषणा करते हुए कहा है कि पहली बार एक बायोनिक हाथ के जरिए एक व्यक्ति मुट्ठी में पकड़ी गई चीज की बनावट और आकार समझने में कामयाब रहा है. यानी कृत्रिम हाथ भी अब महसूस करने में मदद कर सकेगा. इटली में बायोनिक हाथ पर एक महीने तक ट्रायल चला. इस कामयाबी ने शोधकर्ताओं में नया जोश भर दिया है.
अब तक कृत्रिम हाथ का इस्तेमाल करने वाले को वस्तु के पकड़े जाने का कोई एहसास नहीं होता था. साथ ही कृत्रिम हाथ को नियंत्रित करना मुश्किल होता है, मतलब यह कि कृत्रिम हाथ का इस्तेमाल करने वाला वस्तु को पकड़ने की कोशिश में उसे नुकसान पहुंचा सकता है.
शोध में शामिल सिलवेस्ट्रो मिचेरा के मुताबिक, जब हमने ये कृत्रिम हाथ सेंसर की मदद से उस व्यक्ति के हाथ पर लगाया तो हम उस हाथ में अहसास उसी समय बहाल कर सके और वह अपने बायोनिक हाथ को नियंत्रित भी कर पा रहा था. इस शोध का नेतृत्व मिचेरा और स्टानिसा रास्पोविच ने किया है.
डेनमार्क के 36 वर्षीय डेनिस आबो सोरेंसन पर इसका ट्रायल किया गया, सोरेंसन पटाखे से जुड़ी एक दुर्घटना में अपना बायां हाथ खो चुके हैं. सोरेंसन के मुताबिक, जब मैंने वस्तु पकड़ी, मैं यह महसूस कर सकता था कि वह मुलायम है या कठोर, गोल है या चौकोर. पिछले 9 सालों में जिन चीजों को मैं महसूस नहीं कर पाया था उसे अब मैंने महसूस किया.
सोरेंसन की बाजू पर भारी मैकेनिकल हाथ लगाया गया है, जिसकी उंगलियों में बहुत सारे एडवांस सेंसर लगे हुए हैं. हाथ के ऊपरी हिस्से में सर्जरी के जरिए कई तार लगाए गए हैं जो सेंसर के जरिए वहां तक सिगनल पहुंचाते हैं. पिछले एक दशक में सोरेंसन की नसों का इस्तेमाल नहीं हुआ था इसके बावजूद वैज्ञानिक सोरेंसन के छूने की भावना को दोबारा सक्रिय करने में कामयाब रहे.
रोम के जमेली अस्पताल में पिछले साल इसका ट्रायल किया गया. इस दौरान सोरेंसन की आंखों में पट्टी बांधी गई और कानों में इयरप्लग्स लगाए गए. ट्रायल के दौरान सोरेंसन नारंगी और बेसबॉल के बीच फर्क बता पाए. वह यह भी बताने के लायक थे कि वह मुलायम चीज पकड़े हुए हैं या कोई कठोर वस्तु या फिर प्लास्टिक की कोई चीज.
सोरेंसन मजाक करते हैं कि जब उनके बच्चों ने उन्हें बहुत सारे वायरों के साथ देखा तो उन्हें द केबल गाय कहकर बुलाने लगे. सुरक्षा कारणों की वजह से सोरेंसन में किया गया प्रत्यारोपण 30 दिन के बाद हटा लिया गया. लेकिन जानकारों का मानना है कि इलेक्ट्रोड्स बिना किसी परेशानी के कई साल शरीर में रह सकते हैं. इस मामले में और अधिक परीक्षण चल रहे हैं. शोधकर्ता कृत्रिम हाथ की संवेदी क्षमताओं को बढ़ाने और उसे पोर्टेबल बनाने के लिए काम कर रहे हैं.
इस बीच सोरेंसन अपना पुराना कृत्रिम हाथ का इस्तेमाल करने लगे हैं. बांह की मांसपेशियों को खींचने या फिर छोड़ने पर कृत्रिम हाथ हरकत करता है लेकिन वह चीजों को महसूस करने की इजाजत नहीं देता. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि बायोनिक हाथ पर और शोध करने से लाभकारी परिणाम मिल सकते हैं और कृत्रिम हाथ इस्तेमाल करने के लिए मजबूर लोगों के लिए नई उम्मीद जगेगी./
यह पहली बार हुआ है जब किसी विकलांग को नकली हाथ में संवेदना का एहसास हुआ है"
प्रोफ़ेसर सिल्वेस्त्रो मिकेरा
इटली में डेनमार्क के एक व्यक्ति को सर्जरी के बाद ऐसा हाथ लगाया गया है जो उसकी बाजू के ऊपरी हिस्से की नसों से जुड़ा है.
प्रयोगशाला में हुए परीक्षण में उन्हें आंख पर पट्टी बांधकर चीजें थमाई गईं और इस हाथ की मदद से वह इन चीजों के आकार और कड़ेपन को जानने में सफल रहे.डेनिस आबो ने एक दशक पहले आतिशबाज़ी में अपना हाथ गंवा दिया था. उन्होंने इस बायोनिक हाथ को 'अद्भुत' बताया है.
इस बारे में साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन ने विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है.
एक अंतरराष्ट्रीय दल ने इस शोध परियोजना में हिस्सा लिया था, जिसमें इटली, स्विटरज़रलैंड और जर्मनी के रोबोटिक्स विशेषज्ञ शामिल थे.

परियोजना

"इकोल पॉलीटेक्नीक फ़ेडेरेल डी लुसाने और स्कूओला सुपीरिओर सेंट अन्ना, पीसा के प्रोफ़ेसर सिल्वेस्त्रो मिकेरा ने कहा, "यह पहली बार हुआ है जब किसी विकलांग को नकली हाथ में संवेदना का अहसास हुआ है."स बायोनिक हाथ में न केवल एडवांस वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है बल्कि ऐसे इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर लगाए गए हैं जो मस्तिष्क को संदेश भेजते हैं.
मिकेरा और उनकी टीम ने इस कृत्रिम हाथ में ऐसे संवेदक लगाए जो किसी चीज को छूने पर उसके बारे में सूचना देते हैं.
कम्प्यूटर एल्गोरिदम के इस्तेमाल से वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रिकल संकेतों को एक ऐसी उत्तेजना में बदला जिसे संवेदी तंत्रिकाएं समझ सकें.
रोम में ऑपरेशन के दौरान मरीज़ के बाजू के ऊपरी हिस्से की तंत्रिकाओं में चार इलेक्ट्रोड जोड़े गए. ये इलेक्ट्रोड कृत्रिम हाथ की उंगलियों के संवेदकों से जुड़े थे जो छूने और दवाब के फीडबैक को सीधे मस्तिष्क को भेजते हैं.

प्रयोगशाला

कृत्रिम हाथ
36 साल के आबो ने एक महीने प्रयोगशाला में बिताए. प्रयोगशाला में पहले तो इस बात की जाँच की गई कि इलेक्ट्रोड काम कर रहे हैं या नहीं. फिर यह देखा गया कि ये बायोनिक हाथ से पूरी तरह जुड़े हैं या नहीं.
उन्होंने कहा, "मज़ेदार बात यह है कि इसके सहारे मैं मुझे बिना देखे ही छूने से चीज़ों का अहसास हो जाता है. मैं अंधेरे में भी इसका इस्तेमाल कर सकता हूं."
यह बायोनिक हाथ अभी शुरुआती चरण में है और सुरक्षा कारणों से आबो का एक और ऑपरेशन करना पड़ा ताकि संवेदकों को हटाया जा सके.
बायोनिक हाथ को विकसित करने वाली टीम अब इस प्रयास में जुटी है कि इसे छोटा कैसे बनाया जाए ताकि इसे घर में इस्तेमाल किया जा सके.
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस हाथ के व्यावसायिक इस्तेमाल में एक दशक तक का समय लग सकता है. उनका कहना है कि इससे भविष्य में कृत्रिम अंगों का रास्ता साफ़ होगा जो वस्तुओं और तापमान का पता बता सकेंगे.

बहरहाल आबो को उनका पुराना कृत्रिम हाथ मिल गया है और वह भविष्य में इसे बायोनिक हाथ से बदलने को तैयार हैं. sabhar :http://www.bbc.co.uk/   sabhar :http://www.palpalindia.com

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