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मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

पुनः उग आएंगे छतिग्रस्त अंग

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वैज्ञानिको ने मानव शरीर में मौजूद उस खाश जीन का पता लगा लिया है जिसे स्विच ऑफ़ करते ही हमारे छतिग्रस्त अंग नए सिरे से पैदा हो जायेगे अमेरिका के फिलाडेल्फिया स्थित विस्टार संस्थान के वैज्ञानिक की टीम ने पी २१ नामक जीन को तलाशा है यह जीन लाखो वर्षो के विकाश क्रम में स्विच ओंन हो गयी थी पी २१ नामक जीन कोशिकाओं के पुनर्जनम को रोके हुए है जब चूहों के सरीर में में इस जीन को निष्क्री किया गया तो उनके छातीग्रस्त उतक फिर पैदा हुए यह ब्लास्तेमा नाक एक संग्रचना के कारन संभव हुआ वैज्ञानिको ने ये भी बताया की पी२१ हटा देने पर मानव शरीर कोसिकायो में स्टेम सेल कोसिकायो का लगातार निर्माण किया जा सकता है

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क्वांटम कम्प्युटर बनेगा भविष्य का कम्प्युटर

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आगे भविष्य में कम्प्युटर के कार्य करने के तरीके बदल जायेंगे आने वाले भविष्य में आप के कम्प्यूटरों का स्थान क्वांटम कम्प्युटर ले लेगा जो चिप के स्थान पर द्रवों से भरा होगा यह भौतिक नियमो से संचालित नहीं होगा इसके आपरेसन के लिए क्वांटम यांत्रिकी का प्रयोग होगा अर्थात किसी बस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर विना स्थान परिवर्तन के पहुंचाना और समान्तर ब्रह्माण्ड जैसा सिधांत है यह कम्प्युटर पेंटियम -३ से १ अरब गुना ज्यादे तेजी से गड़ना करेगा और यह पलक झपकते पुरे इंटरनेट को खंगालने में सछम होगा यह कम्पूटर २०३० के आस पास आप के पास उपलब्द होगा यह सबसे एडवांस सिकोरिटी कोड को आसानी से तोड़ देगा इसके कम्पूटर चिपों के स्थान पर द्रव भरा होगा जिसमे उपस्थित परमाणु का प्रयोग गड़ना के लिए करेंगे परमाणु प्राकृतिक रूप से सूछ्म कल्कुलेटर है इसकी गति ऊपर नीचे होती है जो डिजिटल तकनीक से मेल खाती है क्वांटम यांत्रिकी के द्वारा सूछ्म अर्थात अणु परमाणु क्वार्ट इत्यादि के संसार को समझा जा सकता है इसके नियम इतने विचित्र है उनको समझना आसान नहीं है लेकिन इनके सिधांत को बार बार सिध्य किया गया है क्योकि किसी परमाणु का चक्रण एक ही समय में ऊपर या नीचे हो सकता है इसलिए पारंपरिक कम्पूटर के एक बिट के बराबर नहीं हो सकता है यह कुछ अलग है वैज्ञानिक इसे क्युबित कहते है यदि आप क्युबित के एक समूह को एक साथ रखे तो वे बर्तमान कम्पूटरों की तरह एक रेखीय गड़नाये नहीं करते वे एक समय सभी संभावितगड़ना करते है एक

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सौर ऊर्जा से चीनी बनाने में सफलता

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वैज्ञानिको ने सौर ऊर्जा से चीनी बनाने में सफलता प्राप्त की है सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के शोधकर्ता के दल ने सौर ऊर्जा से चीनी बनाने की कोशिश में कृत्रिम फोटो सिंथेटिक के जरिये चीनी बनाने की थी उन्होंने पौधों मेढक फफूद एन्जाएम और बैक्टेरिया को एक फोम के खोल में बंद करके सूरज की रोशनी और कार्बन डाई आक्साइड की मौजूदगी से इस प्रक्रिया में सफलता पाई यह पूरी प्रक्रिया अर्ध विषुवतीय छेत्र के टुंगारा मेडक के फोम से बने घोसले पर आधारित थी इस प्रक्रिया में सूरज की पूरी रोसनी का इस्तमाल चीनी बनाने के लिए होता है जबकि पौधे और फफूद फोटो सिंथेटिक के दौरान प्रकाश का इस्तेमाल अन्य कामो के लिए भी करते है इससे बनाई गयी चीनी को बड़ी आसानी से इथेनाल और दूसरे बायो फ्यूल में बदला जा सकता है यह एक ईधन के छेत्र एक अहम् खोज है

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बायो प्रिंटर से बनेगे इंसानी अंग

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अमेरिकी वैज्ञानिको ने ऐसा बायो प्रिंटर बनाने का दावा किया है जो जरूरतों के मुताबिक इंसानी अंग बना पायेगा कैलिफोर्निया स्थित रीजेनेरेटिव मेडिसिन कंपनी ओरागानोव ने इसी तरह की एक प्रोटोटाईप मशीन बिकसित कर ली है जो खून की नलिया उगाने में कामयाब है इसी से वैज्ञानिक बिरादरी में उम्मीद जगी है की एक दिन वो नए अंग उगा सकेगे यह मशीन थ्री डी लेसर तकनीक पर आधारित है फिलहाल इसकी मदद से मशीनो के पार्ट बनाये जाते है लेकिन बायो प्रिंटर में प्लास्टिक और मेटल की जगह जीवित टिशु प्रयोग किये जायेंगे इसके लिए दो लेसर बेस्ड प्रिंटिग हेड जीते जागते सेल्स को जेल की पतली शीट पर रखेंगे जरूरत के हिसाब से बने ढाचे में एक के ऊपर एक परते बनाती जायेंगी इसके बाद सेल्स आपस में जुड़ जायेंगी

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वैज्ञानिको ने आयु बड़ाने का तरीका प्राप्त किया

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वैज्ञानिको ने आनुवंसिक गुणों के आधार पर ऐसा उपाय ढूढ़ निकाला है जिसकी मदद से न सिर्फ दिर्ग्यायु जीवन संभव है बल्कि कैंसर का खतरा भी पूरी तारा ख़त्म हो जाएगा मेड्रिड स्थित स्पेन के रास्ट्रीय कन्सर शोध केंद्र के वैज्ञानिकों का एक दल चूहों पर प्रयोग के बाद इस निष्कर्ष पर पंहुचा है शोध के दौरान वैज्ञानिको ने तेलोमेरास पी ५३ पी १६ नाम के जिन्श की अतिरिक्त प्रति चूहों के स्टेम सेल में डाल दी तीनो गईं लम्बी आयु और टयूमर की वृद्धि रोकने में महत्वपूर्ण माने जाते है वैज्ञानिको ने पाया की चूहों की आयु ४५फीसदी तक बढ गयी और वे टयूमर से मुक्त रहे असल में इन तीन जीनो की अतिरिक्त प्रती डालने से चूहों के शरीर में अधिक प्रोटीन बनाने लगा और वे अधिक सक्रीय हो गए इस वजह से क्रोमोजोम का सिकुरना बंद होगया यही वो प्रक्रिया है जो किसी जीव या आदमी की उम्र बड़ा देती है क्रोमोजोम के सिकुरने से ही आदमी बूढा होता है इस तरह से मनुष्य के ज्यादे दिनों तक जवान रहने की संभावना बड़ी है इससे आयु भी बढेगी और कैंसर पर भी रोक लगेगी

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चन्द्रमा पर ओक्सीजन का स्रोत मिला

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हबल खौगोल दूरबीन के अत्याधुनिक कैमरे ने चन्द्रमा पर ऐरिस्तैराश ज्वालामुखी के मुहाने की क्लोजप तस्वीर उतारी है यह मुहाना ओक्सिजन हासिल किये जाने वाले खनिज का महत्त्व पूर्ण स्रोत हो सकता है ग्रीन वेल्ट स्थित नासा के गाडार्ड स्पेश फलाईट सेंटर के अनुसार अगस्त में पूर्ण चंद्रमा के दौरान ली गयी ये तस्वीरे बहुमूल्य सिद्य हो सकती है हब्बल ने अल्त्रवैलेट प्रकाश में तस्वीर उतारी है इन तस्वीरों से यह पता चला है की ओक्सिजन का स्रोत इलामेनाईट नाम का खनीज चन्द्रमा पर है विज्ञानियों के अनुसार विदमान लौह टिटेनियम और ओक्सिजन के समिसरण से इल्मेनिते का निर्माण हुआ है इससे भविष्य में चन्द्र अभियानों के लिए और वहा रिहाईश की सूरत में सांस लेने योग्य ओक्सिजन आसानी से हासिल किया जा सकता है यह खनिज बैसल्तिक चट्टानों में पाया जाता है इस चट्टान से ओक्सिजान हासिल करने की प्रक्रिया में पानी भी निकल सकता है

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अमेरीकी वैज्ञानिको ने कृतिम फेफड़ा बनाया

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अमेरिकी वैज्ञानिको ने कृतिम फेफड़ा बनाने का दावा किया है की उन्होंने इंसानी फेफड़ा बनाने की दिशा में प्रगति की है उनका दावा है कि उन्होंने प्रयोगशाला में विकसित कोसिकायो को चूहों के फेफड़े में कामयाबी से लगाकर नया फेफड़ा बनाने कि दिशा में अहम प्रगती कि है उन्होंने इंसानी फेफड़े कि तरह नजर आने वाली माइको चिप पर एक कृत्रिम उपकरण बनाकर इस दिशा में एक अहम प्रगती करने का दावा किया है येल यूनिवर्सिटी के शोध करताओ ने फेफड़े को बनाने में कामयाबी हासिल कि प्रयोगशाला में बिकसित कोसिकायो के इस्तेमाल से इन फेफड़े ने ४५ से १२० मिनट तक कार्य किया और फिर उन्हें चूहों में फिट कर दिया गया

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प्रकृतीक एंटी बायोटिक विटामीन डी

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हाल में किये गए शोधों से यह सिध्य हो गया है की विटामीन डी मनुष्य के शरीर के लिए के लिए एक प्रकृतीक एंटी बायोटिक की तरह कार्य करता है इससे इस विटामीन के कई फायदे सामने आये हैं इससे  की शरीर प्रतिरोधक छमता बड़ती है  जिससे  ह्रदय रोग में बचाव तथा इन्प्लुन्सा बीमारियों से शरीर को बचाता है यहाँ तक दावा किया जा रहा है इससे टी बी एड्स जैसी बीमारियों की थीरेपी इसके एनालोग को प्रयोग किया जा सकता है वैज्ञानिको का यहाँ तक कहना है सही मात्र में विटामीन डी शरीर में नहीं  पहुँच रही  है  तो स्वाथ्य के लिए हानिकारक है |

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क्लोनिंग क्या है

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जीव विज्ञान में क्लोनिंग अनुवांशिक रूप से सामान प्राणियों की जनसंख्या उत्पन्न करने की प्रक्रिया को कहते हैं जो प्रकृति में विभिन्न जीवो जैसे बैक्टीरिया की या पौधों द्वारा अलैंगिक रूप से प्रजनन करने पर घटित होती है बायो टेक्नोलॉजी में क्लोनिंग डीएनए खंड कोशिकाओं या जीवो के क्लोन निर्मित करने की प्रक्रिया को कहते हैं क्लोन निचले जीव में काफी आम है लेकिन उच्च कोटि के जीवो में क्लोन प्राकृतिक रूप से नहीं पाए जाते हैं1997 में रोज निल संस्थान एडिनबड़ा ब्रिटेन में सफलतापूर्वक डॉली नामक भीड़ को क्लोन किया गया डोली का जन्म नाभिक स्थानांतरण विधि द्वारा हुआ इस प्रक्रिया में एक भेड़ के स्तन की कोशिका को अलग करके उसे निष्क्रिय कर दिया गया इस कोशिका को एक नाभिक रहित अनिषेचित कोशिका में प्रवेश करा करके उसे भूण कोशिका होने तक एक कल्चर डिस में विकसित होने दिया गया इस प्रक्रिया में दो विभिन्न कोशिकाओं के कोशिका द्रव्य आपस में मिल जाते हैं कोशिका द्रव्य वह द्रव्य है जिसमें सूत्र कणिकाएं रहती है आपस में मिल जाते हैं सूत्र कोशिका है वह कोशिका है जिनकी जिनावलिया दाता तथा अदाता दोनों में से उत्पन्न हो सकती है यह विभिन्य प्रकार से हो सकती है मॉलिकुलर क्लोनिंग यह क्लोनिंग एक डीएनए क्रम की अनेक प्रतिलिपि या बनाने की प्रक्रिया को कहते हैं अक्सर क्लोनिंग का प्रयोग संपूर्ण जीवनी युक्त डीएनए खंडों के परिवर्धन के लिए किया जाता है लेकिन इसका प्रयोग किसी भी डीएनए क्रम जैसे वह प्रमोटर गैर कोडिंग क्रम और बिना किसी कारण के विखंडित डीएनए के परिवर्तन के लिए किया जाता है जिन्हें जेनेटिक फिंगर प्रिंटिंग से लेकर अनेक बड़े पैमाने पर प्रोटीन उत्पादन तक जैविक प्रयोगों वर्ग व्यावहारिक अनुप्रयोगों की एक व्यापक श्रृंखला में इसका प्रयोग किया जाता है कोशिकीय क्लोनिंग एक कोशिका की क्लोनिंग का मतलब है किसी एकल कोशिका से कई कोशिकाओं का निर्माण करना है उसकी वजह से बैक्टीरिया और खमीर में यह प्रक्रिया काफी सरल होती है और इसमें उपयुक्त माध्यम की आवश्यकता होती है हालांकि बहुकोशिकीय जीवो के कोशिका परिवर्धन के मामले में कोशिकाओं की क्लोनिंग काफी कठिन कार्य होता है क्योंकि यह कोशिकाएं मानक माध्यम में सरलता पूर्वक विकसित नहीं होती है जीव क्लोनिंग यह क्लोनिंग जिसे प्रजननीय क्लोनिंग भी कहा जाता है एककोशकीय जीव के निर्माण की विधि को कहते हैं जो जेनेटिक रूप से किसी अन्य जीव में समान होता है प्रतिरूपण का यह रूप प्रजनन की एक अलंगिक विधि है जिसमें निषेचन नहीं होता अलैंगिक प्रजनन प्राकृतिक रूप से अनेक प्रजातियों में पाई जाने वाली विधि है जिसमें अधिकांश वनस्पतियां व कीट शामिल है वैज्ञानिकों ने क्लोनिंग के साथ कुछ बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं जिनमें भेड़ों और गायों का अलैंगिक प्रजनन शामिल है इस बात पर बड़ी नैतिक बहस जारी है कि क्लोनिंग का प्रयोग किया जाना चाहिए या नहीं हालांकि क्लोनिंग या अलैंगिक प्रजनन हॉर्टिकल्चर में सालों सालों से जारी है इस प्रकार के क्लोन पुर तक संभोग नहीं होते क्योंकि दैहिक कोशिका के नाभिक डीएनए में कुछ परिवर्तन हो सकते हैं कृतिम भूण विभाजन या भ्रूण के जुड़े बनाने की विधि का प्रयोग भी प्रतिरूपण की एक पद्धति के रूप में किया जा सकता है इसमें पूर्ण स्थानांतरण से पहले परिपक्व को विभाजित किया जाता है जिओ की कृतिम क्लोनिंग जेनेटिक तौर पर एक समान जीवो के निर्माण के लिए प्रजनन क्लोनिंग आमतौर पर दैहिक कोशिका परमाणु हस्तांतरण का प्रयोग करता है इस प्रक्रिया में एक डाटाबेस कोशिका से किसी नाभिक बिहीन अंडे में नाभिक का स्थानांतरण करना शामिल होता है यदि अंडा सामान्य रूप से विभाजित हो जाए तो इसे सरोगेट मदर के गर्भाशय में हस्तांतरित कर दिया जाता है डाली भेड़ के क्लोनिंग में प्रति निषेचित अंडे की सफलता दर कम थी मानव क्लोनिंग किसी मानव की जेनेटिक रूप से समान प्रतिलिपि का निर्माण करना मानव क्लोनिंग कहलाता है जुड़वा बच्चों के रूप में मानव क्लोनिंग सामान्य रूप से पाए जाते हैं जिसमें क्लोनिंग प्रजनन के प्राकृतिक प्रक्रिया के दौरान होता है मानव क्लोनिंग के दो प्रकार हो सकते हैं उपचारात्मक क्लोनिंग और प्रजनन क्लोनिंग उपचारात्मक क्लोनिंग में से चिकित्सा में इस्तेमाल के लिए वॉइस कोशिकाओं का कॉलिंग करना शामिल है प्रेग्नेंट लर्निंग मेट लोड मानव का निर्माण शामिल है एक तीसरे प्रकार की क्लोनिंग जिसे प्रतिस्थापन क्लोनिंग कहते हैं यह अभी केवल सिद्धांत के क्षेत्र में ही है और यह उपचारात्मक वह प्रजननिय क्लोनिंग का एक संयोजन होगा

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डायबिटीज की दवा आयु को बढ़ाती है

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टाइप टू डायबिटीज में उपयोग होने वाली दवा मेटफॉर्मिन के कारण आयु भी बढ़ती है यह दवा हृदय की बीमारियों एवं कैंसर को दूर रखती है जनरल डायबिटीज ओबेसिटी व मेटाबॉलिज में छपे शोध के अनुसार वैज्ञानिकों 1.8 lack लोगों पर साडे 5 साल तक अध्ययन किया शोधकर्ताओं के अनुसार सटीक निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए यह अवधि बहुत कम है ब्रिटेन स्थित कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर क्यूरी ने टाइप 2 डायबिटीज में उपयोग की जाने वाली दवा मेटफॉर्मिन पर शोध किया सामान्यता डायबिटीज के रोगियों पर खतरा मंडराता रहता है कि दवाई लेने पर साइड इफेक्ट आते हैं फिर इन्हें नियंत्रित करने के लिए रोगी को अपनी दिनचर्या में परिवर्तन करने के साथ ही स्थित दवाई भी खानी पड़ती है इस नवीन शोध के अनुसार टाइप टू डायबिटीज की है दवा शरीर में ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित रखती है इससे शरीर का मेटाबॉलिज्म अच्छा रहता है साथ ही यह दवा कैंसर और हृदय रोग को भी दूर रखती है

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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

कामवासना का विज्ञान

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#गुरुदेवकाअभौतकसत्ताकीज्ञानविज्ञानमण्डलीसेसमपर्क6
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानधारा में पावन अवगाहन 

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमN

      महात्मा महाव्रत एक जटिल आध्यात्मिक विषय को कितनी सरलता से समझा रहे थे--यह मेरे लिए आश्चर्यजनक था। वे थोड़ा ठहरकर आगे बोले--भौतिक जगत् मिथुनजन्य है। उसकी सीमा में जितनी भी सृस्टि है, सब मैथुनी सृष्टि है। इसलिए कि मैथुनी जगत् में 'काम' प्रधान है। उसकी व्यापकता सर्वत्र है। उसका अस्तित्व कण-कण में है और एकमात्र यही कारण है कि उस पर विजय प्राप्त करना अथवा उससे परे होना अति कठिन कार्य है। कामवासना को हम जितना दबाएंगे, उतनी ही वह बढ़ेगी। भले ही हम जननेंद्रिय या कामेन्द्रिय का उपयोग न करें लेकिन हमारा जो मन है, हमारा जो चित्त है, वह सदैव कामवासना से भरा ही रहेगा। इसका एकमात्र कारण है कि हम शरीर से पूर्णतया जुड़े हुए हैं। यदि हमें कामवासना से मुक्त होना है तो दो बातों को सदैव याद रखें। पहली बात--मैं शरीर नहीं हूँ। दूसरी बात--मेरे भीतर जीवन की कामना नहीं है। इन दोनों बातों के प्रति हमारी दृष्टि स्थिर होनी चाहिए।
       कामवासना का विरोध मृत्यु से है। जन्म तो कामवासना से होता है, परन्तु मृत्यु कामवासना का अन्त है। मृत्यु कामवासना विरोधी है। भारतीय मनीषा का कहना है कि यदि वास्तव में कामवासना पर विजय प्राप्त करना है, कामवासना से विमुख होना है तो मृत्युसाधना करनी चाहिए। मृत्युसाधना सबसे बड़ी साधना है। कामवासना से परे जाने के लिए मृत्यु साधना एक परम वैज्ञानिक प्रयोग है।
       इसके लिए हमें मरघट पर, श्मशान पर अधिक से अधिक जाना चाहिए। ध्यान से देखना चाहिए कि जो कभी जीवित था, उसका अंग-अंग कैसे आग की लपटों में जल रहा है ! मरघट ही, श्मशान ही हमारा वास्तविक साधना-स्थल है। मुर्दे आएंगे, बच्चों के, जवानों के, वृद्धों के, उनमें कुछ सुन्दर होंगे, कुछ विकृत होंगे, कुछ कुरूप होंगे, कुछ स्वस्थ होंगे और कुछ होंगे अस्वस्थ भी। इस प्रकार के शव आएंगे, मुर्दे आएंगे, उनको हमें देखना चाहिए, उनकी जलती चिताएं देखनी चाहिए, उन्हें मुट्ठीभर राख में बदलते देखना चाहिए। हमें उन पर अपने मन को एकाग्र करना चाहिए।
       मृत्यु-साधना अध्यात्मसाधना की एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साधना है। क्योंकि मृत्यु हमारे सामने पूर्णतया स्पष्ट हो जाये तो हमारी कामवासना तुरंत नष्ट हो जायेगी। इसी तथ्य को एक उदाहरण के द्वारा समझाता हूँ--महात्मा महाव्रत बोले-- एक अत्यंत सुन्दर तरुणी व्यक्ति के सामने हो और वह कामवासना से भरा हुआ हो। शारीरिक सुख को प्राप्त करने के लिए वह लालायित हो और उसी समय उसके किसी अपराध के दण्ड स्वरूप राज्य की ओर से यह सूचना मिले कि उसे आज शाम को मृत्युदण्ड दिया जायेगा। सोचिये--उस व्यक्ति की उस समय क्या स्थिति होगी ? वह सुन्दर कमनीय तरुणी उसके आँखों से खो जायेगी। वासना का प्रवाह बन्द हो जायेगा। वासना की सारी धारा तिरोहित हो जायेगी। वासना का रस तत्काल समाप्त हो जायेगा क्योंकि उसके मन में एक ही बात स्थायी रूप से बैठ जायेगी कि आज सायंकाल हमें मृत्यु के मुख में हमेशा-हमेशा के लिए समा जाना होगा।
       कहने का तात्पर्य यह है कि कामवासना से मुक्त होने के लिए सदैव मृत्यु का स्मरण करते रहना चाहिए। हमें समझना चाहिए कि मृत्यु कभी भी आ सकती है। सच भी है--मृत्यु कब आ जाये किसे पता है ? मृत्यु किसी भी पल आ सकती है। हो सकता है जो पल हम जी रहे हैं, वही आखीरी पल हो। हमारा शरीर हमेशा-हमेशा के लिए छूट जाने वाला हो। मृत्यु की धारणा जितनी गहरी होगी, कामवासना उतनी ही कमजोर होती जाएगी और एक समय ऐसा आएगा जब हमें कामवासना से निजात मिल जायेगी। यह मुक्ति न कामवासना के दमन से उपलब्ध् होती है और न ही उपलब्ध् होती है उसके भोग से।
      व्यक्ति को समझ लेना चाहिए कि सभी इंद्रियों का केंद्र कामेन्द्रिय है। व्यक्ति के नेत्रों के माध्यम से कामवासना रूप-सौन्दर्य खोजती है। कानों से मधुर ध्वनि, कामोत्तेजक आवाज, संगीत सुनती है। संगीत से कामवासना ही तृप्त होती है। सुन्दर चित्र, सुन्दर वातावरण, प्राकृतिक सुंदरता, पक्षियों का मनमोहक कलरव, गगन में खिला हुआ पूनम का चाँद, हरे-भरे लहलहाते खेत, हवा में लहराते हुए रंग-विरंगे फूल--ये सब क्या हैं ? कानों और नेत्रों के द्वारा जगत् के साथ एक प्रकार का सम्भोग ही तो है।  नाक के द्वारा सुमधुर  कामोत्तेजक् गन्ध, जीभ के द्वारा मधुर स्वाद, त्वचा के द्वारा कोमल कमनीय काया का स्पर्श --ये सब मैथुन का ही एक प्रकार है। इन सब कामोद्दीपक साधनों से मन में कामवासना ही तो पुष्ट होती है जिनका माध्यम बनती हैं व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियाँ और उपभोग का माध्यम बनती हैं व्यक्ति की कर्मेन्द्रियाँ। बस, इस प्रसंग के अंत में हमें केवल इतना ही कहना है कि कामवासना जीवन वासना का पर्याय है। जीवन वासना ही जीवेषणा है। इससे बड़ा पागलपन जीवन में और क्या है ? क्योंकि जीवन में इससे क्या उपलव्धि होती है? हमारे हाथ क्या लगता है ? फिर भी हम जीना चाहते हैं। जीवन को हम छोड़ने के लिए कदापि तैयार नहीं होते। हमें यह बात ज्ञात होनी चाहिए कि यदि हम स्वेच्छा से जीवन त्यागने के लिए तैयार हैं तो एक नया जीवन हमें उपलब्ध् हो जाता है। मृत्यु-- जिसका एक विश्राम-स्थल होता है और उस विश्राम के बाद हम पुनः एकबार महाजीवन की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। जो व्यक्ति जीवन को दरिद्र की भांति पकड़े रहता है, एक भिखारी की तरह जीवन की भीख मांगता है, उसके हाथ क्या लगता है सिवाय एक पश्चाताप के ? इसके अलावा और कुछ भी नहीं।

आगे के लिए इंतज़ार करें-- sabhar Shiv ram sharma Facebook 

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