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बुधवार, 3 मार्च 2021

srtring theory aur mantra vigyan

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स्टेम सेल से होगा बुड़ापे का इलाज

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 वैज्ञानिको ने  उम्रदराज लोगो की कोसिकाओ को स्टेम सेल में बदलने में भी सफलता प्राप्त की है | मोंटेपेलियोर युनिवेर्सिटी  के वैज्ञानिकों ने कहा है की , वह जल्दी ही  इन  कोसिकायो से  उम्रदराज मरीजो का इलाज इस विधि से कर सकते है | प्रमुख शोधकर्ता  ज्यां -मार्क लेमाएत्रे ने बताया , यह कोशिकाओं के कायाकल्प के छेत्र में एक नयी मिशाल है | कोसिकाओ के पुनर्गठन के रास्ते  में उनकी उम्र कोई रुकावट नहीं पैदा  करती है | स्टेम सेल से शरीर के किसी भी भाग के उतकों में तब्दील किया जा  सकता है |
 साभार : हिंदुस्तान हिंदी दैनिक 

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स्किन फैक्टरी में बनेगी नकली त्वचा

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चार साल से छोटे लड़कों के जननांग से निकाली गई त्वचा से बिलकुल नई स्किन बन सकती है. जर्मनी की फ्राउनहोफर यूनिवर्सिटी ने रिसर्च पूरी कर ली है. इससे नई दवाइयों और कॉस्मेटिक उद्योग में बड़े बदलाव आ सकते हैं.




स्किन फैक्टरी, यह नाम किसी साइंस फिक्शन फिल्म का लगता है. लेकिन फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने सचमुच ऐसी मशीन बनाई है, जो त्वचा बनाती है. यह त्वचा दवाओं, रसायनों और कॉस्मेटिक के परीक्षण को आसान और सस्ता बना सकती है. साथ ही जानवरों पर इनके परीक्षण की जरूरत नहीं रह जाएगी.
त्वचा बनाने की यह मशीन सात मीटर लंबी, तीन मीटर चौड़ी और तीन मीटर ऊंची है. कांच की दीवार के पीछे रोबोट की छोटी बाहें काम कर रही हैं, पेट्री डिश को इधर उधर ले जा रहे हैं, खाल को खरोंच रहे हैं, एंजायम की मदद से ऊपरी त्वचा को सेल से अलग कर रहे हैं. संयोजी ऊतक और रंग वाली कोशिकाएं भी इस तरह पैदा की जाती हैं.
अहम रिसर्च
इस समय कोशिकाओं की आपूर्ति का काम चार साल तक के लड़कों के जननांग से निकाले गए अग्रभाग से किया जा रहा है. जर्मनी में श्टुटगार्ट शहर के फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के प्रोडक्शन इंजीनियर आंद्रेयास टाउबे कहते हैं, "आदमी की उम्र जितनी बढ़ती जाती है, उसकी कोशिकाएं उतनी ही खराब काम करती हैं." कोशिकाएं विकसित करने के लिए स्टेमसेल पर भी शोध किया जा रहा है. टाउबे का कहना है, "महत्वपूर्ण बात यह है कि शुरुआती सेल एक जैसे स्रोत से आएं ताकि त्वचा के उत्पादन में अंतर से बचा जा सके."
डोनरों के हिसाब से हर नमूने से तीस लाख से एक करोड़ कोशिकाएं निकलती हैं जिनकी संख्या इंक्यूबेटर में सौ गुनी हो जाती है. एक सेंटीमीटर व्यास के 24 ट्यूबों वाले टिश्यू कल्चर प्लेट पर उनसे नई त्वचा का विकास होता है. नया एपीडर्मिस एक मिलीमीटर से भी पतला होता है. जब उन्हें शोधकर्ता जोड़ने वाली कोशिकाओं से जोड़ते हैं तो पूर्ण त्वचा बनती है जो पांच मिलीमीटर तक मोटी होती है. इस पूरी प्रक्रिया में छह हफ्ते तक लग सकते हैं. टाउबे कहते हैं, "इसे मशीन की मदद से भी तेज नहीं किया जा सकता, बल्कि जीव विज्ञान द्वारा निर्धारित होता है."
मुश्किल है रिसर्च
संयंत्र के अंदर सब कुछ पूरी तरह असंक्रमित होता है. इंक्यूबेटर के अंदर तापमान 37 डिग्री होता है. एक तापमान जिसमें बैक्टीरिया भी तेजी से बढ़ सकते हैं. त्वचा फैक्टरी में 24 टिश्यू कल्चर वाले 500 से अधिकों प्लेटों पर एक साथ काम होता है. फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट में इस तरह शोधकर्ता हर महीने त्वचा के 5000 नमूने तैयार करते हैं. लेकिन अब तक उन्हें कोई खरीदार नहीं मिला है क्योंकि अभी तक इस प्रक्रिया को यूरोपीय अधिकारियों से मान्यता नहीं मिली है. इसके लिए तुलनात्मक परीक्षणों की जरूरत होगी जो यह साबित कर सकें कि कृत्रिम त्वचा भी जानवरों की त्वचा जैसे नतीजे देते हैं. टाउबे कहते हैं, "मैं सोचता हूं कि नौ महीनों में हम शुरुआत कर सकते हैं." कृत्रिम त्वचा को खरीदने वाला उद्योग जगत होगा.
दवा उद्योग में बदलाव
जर्मनी में दवाइयां बनाने वाली कंपनियों के संघ के रॉल्फ होएम्के का कहना है कि नए तत्वों के विकास के लिए त्वचा के नमूनों का इस्तेमाल हो सकता है. वे कहते हैं, "हमारा विश्वास है कि कृत्रिम त्वचा की कोशिकाएं असली त्वचा जैसी हैं." अब तक त्वचा के नमूने छोटे पैमाने पर तैयार किए जाते थे, लेकिन होएम्के को उम्मीद है कि अब ऐसा बड़े पैमाने पर हो सकेगा. इसका इस्तेमाल कैंसर के शोध के अलावा पिगमेंट में गड़बड़ी, एलर्जी या फंगस की बीमारी के सिलसिले में किया जा सकेगा. श्टुटगार्ट में बनने वाली कृत्रिम त्वचा के नमूनों को सुरक्षा टेस्ट पास करने में सालों लग जाएंगे.इस तरह का परीक्षण दवाओं की मंजूरी के लिए भी जरूरी होता है. होएम्के कहते हैं, "इसमें अंतरराष्ट्रीय मानक बना हुआ है, उसकी प्रक्रिया को आप यूं ही बदल नहीं सकते."
चिकित्सा के क्षेत्र में भी कृत्रिम त्वचा की मांग है. 8 से 10 सेंटीमीटर चौड़े त्वचा के बैंडेज बाजार में उपलब्ध हैं और उन पर दो कंपनियों का कब्जा है. रिजेनरेटिव मेडिसीन सोसायटी की अध्यक्ष उलरिके श्वेमर कहती हैं कि और चौड़े बैंडेज के क्षेत्र में मांग बनी हुई है. टाउबे इसे भविष्य का सपना बता रहे हैं कि त्वचा फैक्टरी कभी न कभी इन्हें बनाना शुरू कर देंगी जिनका इस्तेमाल आग से जलने के कारण हुई घावों को भरने के लिए किया जा सकेगा. अभी तो आंख की त्वचा कोर्निया को बनाने पर काम चल रहा है.
रिपोर्ट: डीपीए/महेश झा
संपादन: ए जमाल  sabhar : DE-WORLD.DE

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अदृश्यता पैदा करने के करीब पहुंचे अमेरिकी वैज्ञानिक

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अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के वैज्ञानिक अदृश्य तकनीक की मदद लेते हुए एक जबरदस्त संचार सिस्टम बनाने में जुटे हैं. इसके 'टाइम क्लोक' यानी समय का आवरण कहा जा रहा है. सब कुछ आंखों के 

सामने होगा लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगेगी.




बनाई गई मशीन प्रकाश के बहाव को ऐसे परिवर्तित कर रही है कि इंसानी आंखें इस परिवर्तन को पकड़ ही नहीं पा रही है. विज्ञान मामलों की पत्रिका नेचर में इस बारे में एक रिपोर्ट छपी है. रिपोर्ट के मुताबिक प्रकाश की कुछ खास रंग की किरणों में बदलाव करने पर इंसान की आंख को बेवकूफ बनाया जा सकता है. वैज्ञानिकों को लगता है कि इस तकनीक की मदद से इंसान के सामने बिना किसी नजर में आए काफी कुछ किया जा सकेगा.
न्यूयॉर्क की कोरनेल यूनिवर्सिटी की मोटी फ्रीडमन कहती हैं, "हमारे नतीजे दिखाते हैं कि हम अदृश्यता पैदा करने वाला उपकरण बनाने के काफी करीब पहुंच रहे हैं." प्रयोग के तहत अलग अलग आवृत्ति वाली प्रकाश की किरणों को भिन्न भिन्न रफ्तार से आगे बढ़ाया जाता है. प्रयोग के लिए कई लैंसों का इस्तेमाल किया गया. सबसे पहले हरे रंग के प्रकाश को फाइबर ऑप्टिक केबल से गुजारा गया.
फिर प्रकाश अलग अलग लेंसों से टकराया. लेंसों से टकराते ही प्रकाश किरणें दो रंगों में बदल गई. प्रकाश नीले और हरे रंग में टूर गई. नीले रंग की किरण लाल रंग से ज्यादा तेज रफ्तार से आगे बढ़ी. प्रकाश की दो किरणें बनने के दौरान अदृश्यता की स्थिति पैदा हो गई. प्रयोग के अगले चरण में टूटे हुई किरणों को फिर से एक कर दिया गया और फिर से सामान्य प्रकाश बन गया और अदृश्यता गायब हो गई.
यह सब कुछ 50 पीकोसेकेंड के भीतर हुआ. यह एक सेकेंड के 10 लाखवें हिस्से का भी पांच करोड़वां हिस्सा है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस तकनीक का इस्तेमाल संचार में किया जा सकता है.  इस तकनीक के जरिए होने वाला संचार ऑप्टिकल सिग्नल तोड़ता है. किरणें टूटती हैं और अदृश्य हो जाती हैं. बाद में किरणों को फिर से एक किया जा सकता है और सब कुछ देखा जा सकता है. यानी डाटा को अदृश्य बनाकर भेजा जा सकता है और फिर एकत्रित किया जा सकता है.
रिपोर्ट: एएफपी/ओ सिंह
संपादन: एम गोपालकृष्णन
 
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दिमाग से कमांड लेने वाला कम्पुटर

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इनोवर टेक्नोलॉजी ट्रेड फेयर के दौरान प्रदर्शित  किये गए मेंटल टाईप राईटर के लिये कीबोर्ड मावुस की अवसकता नहीं है तकनीकी  भाषा में बर्लिन ब्रेन कम्पूटर इंटरफेस नामित यह कम्पूटर सीदे दिमाग से कमांड लेता है

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विज्ञान आत्‍मा शरीर

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विज्ञान की नजर में आत्मा,


इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में होता है जिसे माइक्रोटयूबुल्स कहते हैं। दोनों वैज्ञानिकों का तर्क है कि इन माइक्रोटयूबुल्स पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के परिणामस्वरूप हमें चेतनता का अनुभव होता है।

वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (आर्च-ओर) का नाम दिया है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। दरअसल, इसका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था। यह आत्मा काल के जन्म से ही व्याप्त थी।

अखबार के अनुसार यह परिकल्पना बौद्ध एवं हिन्दुओं की इस मान्यता से काफी कुछ मिलती-जुलती है कि चेतनता ब्रह्मांड का अभिन्न अंग है। इन परिकल्पना के साथ हेमराफ कहते हैं कि मृत्यु जैसे अनुभव में माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, लेकिन इसके अंदर के अनुभव नष्ट नहीं होते। आत्मा केवल शरीर छोड़ती है और ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है।

हेमराफ का कहना है कि हम कह सकते हैं कि दिल धड़कना बंद हो जाता है, रक्त का प्रवाह रुक जाता है, माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, माइक्रोटयूबुल्स में क्वांटम सूचनाएं नष्ट नहीं होतीं। ये नष्ट नहीं हो सकतीं। यह महज व्यापक ब्रह्मांड में वितरित एवं विलीन हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि यदि रोगी बच जाता है तो यह क्वांटम सूचना माइक्रोटयूबुल्स में वापस चली जाती है तथा रोगी कहता है कि उसे मृत्यु जैसा अनुभव हुआ है। हेमराफ यह भी कहते हैं कि यदि रोगी ठीक नहीं हो पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है तो यह संभव है कि यह क्वांटम सूचना शरीर के बाहर व्याप्त है।


मस्तिष्क में क्वांटम कंप्यूटर के लिए चेतना एक प्रोग्राम की तरह काम करती है


वाशिंगटन। आत्मा के बारे में हिंदू धर्म के धर्मग्रंथ वेदों में लिखा है कि आत्मा मूलत: मस्तिष्क में निवास करती है। मृत्यु के बादआत्मा वहां से निकलकर दूसरे जन्म के लिए ब्रह्मांड में परिव्याप्त हो जाती है। कुछ वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से हिंदू धर्म की इस मान्‍यता की पुष्टि हुई है। मृत्यु के अनुभव पर वैज्ञानिकों ने यह शोध किए हैं।

मृत्यु का करीबी अनुभव करने वाले लोगों के अनुभवों पर आधारित दो प्रख्यात वैज्ञानिकों ने मृत्यु के अनुभव पर एक सिद्धांत प्रतिपादित किया है। प्राणी की तंत्रिका प्रणाली से जबआत्मा को बनाने वाला क्वांटम पदार्थ निकलकर व्यापक ब्रह्मांडमें विलीन होता है तो मृत्यु जैसा अनुभव होता है। इस सिद्धांत के पीछे विचार यह है कि मस्तिष्क में क्वांटम कंप्यूटर के लिए चेतना एक प्रोग्राम की तरह काम करती है। यह चेतना मृत्यु के बाद भी ब्रह्मांड में परिव्याप्त रहती है।



'डेली मेल' की खबर के अनुसार एरिजोना विश्वविद्यालय में एनेस्थिसियोलॉजी एवं मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर एमरेटसएवं चेतना अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. स्टुवर्ट हेमेराफ ने इस अर्ध-धार्मिक सिद्धांत को आगे बढ़ाया है। यह परिकल्पना चेतनता के उस क्वांटम सिद्धांत पर आधारित है, जो उन्होंने एवं ब्रिटिश मनोविज्ञानी सर रोजर पेनरोस ने विकसित की है। 
इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में होता है जिसे माइक्रोटयूबुल्स कहते हैं। दोनों वैज्ञानिकों का तर्क है कि इन माइक्रोटयूबुल्स पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के परिणामस्वरूप हमें चेतनता का अनुभव होता है।

वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (आर्च-ओर) का नाम दिया है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारीआत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। दरअसल, इसका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था। यह आत्मा काल के जन्म से ही व्याप्त थी।

अखबार के अनुसार यह परिकल्पना बौद्ध एवं हिन्दुओं की इस मान्यता से काफी कुछ मिलती-जुलती है कि चेतनता ब्रह्मांडका अभिन्न अंग है। इन परिकल्पना के साथ हेमराफ कहते हैं कि मृत्यु जैसे अनुभव में माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, लेकिन इसके अंदर के अनुभव नष्ट नहीं होते। आत्मा केवल शरीर छोड़ती है और ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है।

हेमराफ का कहना है कि हम कह सकते हैं कि दिल धड़कना बंद हो जाता है, रक्त का प्रवाह रुक जाता है, माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, माइक्रोटयूबुल्स में क्वांटम सूचनाएं नष्ट नहीं होतीं। ये नष्ट नहीं हो सकतीं। यह महज व्यापक ब्रह्मांड में वितरित एवं विलीन हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि यदि रोगी बच जाता है तो यह क्वांटम सूचना माइक्रोटयूबुल्स में वापस चली जाती है तथा रोगी कहता है कि उसे मृत्यु जैसा अनुभव हुआ है। हेमराफ यह भी कहते हैं कि यदि रोगी ठीक नहीं हो पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है तो यह संभव है कि यह क्वांटम सूचना शरीर के बाहर व्याप्त है। 
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मानव का विकाश

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मानव के विकाश के समबन्ध में वैज्ञानिको के कई मत है लैमार्क ने अंगों के उपयोग का सिधांत दिया परन्तु डार्विन ने जैव विकाश का सिधांत दिया जीवन के प्रतिस्पर्धा के परिणामस्वरूप प्रकृती की सरौतम कृति मानुष का विकाश हुआ मानव jangalou में रहता था मानव ने आग जलाने की विधि जानी मानव पत्तथरो युग से धीरे धीरे आधुनीक युग में के विकाश में अनेक योगदान है

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१०० years जिलाने वाली जीन का पहिचान

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अलबर्ट आइस्तींन कालेज आफ मेडीसीन के नेत्र्तव मेंएक अंतरासतीय टीम ने मनुस्य को १०० वरसो तक जिलाने वाली एक जीन की ख़ोज की है टीम ने पाया की जीन में टेलोमीरेज एन्जाईम की मौजूदगी से डीएनए की मात्रा कम होने से बचाता है

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याद पौधे भी रखते है

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plant के लिए चित्र परिणाम


फोटो : गूगल

पोलैंड की  वर्सा यूनिवर्सिटी  के प्रोफ़ेसर स्टेनिलो कार पिंस्की  और उनके  साथी वैज्ञानिको का दावा है है की पौधे प्रकाश  में कैद जानकारिया समझ कर  प्रतिक्रिया देते है । एक प्रयोग में  जब  पौधे के ऊपरी भाग में रोशनी डाली गयी  तो उसका असर पूरे  पौधे पे सामान रूप से हुआ । शोधकर्ता बताते है की पौधेां का भी नर्वस सिस्टम होता है । साथ ही उनकी याददाश्त  भी कमाल  की होती है  । इसी कारण  पौधे अपने ऊपर आये वातावरण मेंबदलाव के मुताबिक खुद को ढाल लेते है।

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मंत्र विज्ञान

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------------:मन्त्र जप और मन्त्र सिद्धि:------------
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानधारा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

      मन्त्र के बार-बार जपने से उसका प्रभाव होता है। मन्त्र शब्द के कम्पन से प्रकम्पित होकर मनुष्य के कोष उसके अनुकूल हो जाते हैं। जो कोष अनुकूल होते हैं, उनसे सम्बंधित विषय का बोध मनुष्य को स्वयं अपने आप होने लगता है। 
       मन्त्र का कार्य श्रद्धा पर आधारित है। मन्त्रों की क्रिया उनके उच्चारण पर निर्भर है।  मंत्रोच्चारण उनके अर्थ पर निर्भर होते हैं।
       मन्त्र के उच्चारण से जो कम्पन पैदा होता है, पहले कुछ समय तक वह वायु में रह कर धीरे-धीरे उसी में विलीन हो जाता है। लेकिन मन्त्र-जप की संख्या जब अधिक हो जाती है तो उसके कम्पन वायु की पर्तों  का भेदन कर सूक्ष्मतम वायु मंडल में चले जाते हैं और वहां से उस देवता का आकार-प्रकार बनाने लग जाते हैं जिस देवता का वह मन्त्र होता है। इसीलिए  मन्त्र-जप की संख्या निश्चित होती है। उस संख्या से जब अधिक जप होता है तभी सूक्ष्मतम वायुमंडल में देवता का आकार-प्रकार बनता है। जब वह पूर्णरूप से बन जाता है तो देवता अपने लोक से आकर उसमें स्वयं प्रतिष्ठित होते हैं। आकार-प्रकार का बनना मन्त्र-चैतन्य का लक्षण है। देवता का अपने आकार-प्रकार में प्रतिष्ठित होना ही मन्त्र-सिद्धि है। मन्त्र सिद्ध होने पर सम्बंधित देवता मन्त्र जपने वाले को उसका फल प्रदान करते हैं। 

-----:ॐ का सही उच्चारण:-----
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      सही ढंग से जो ॐ का उच्चारण करना जानता है ,उसके जैसा कोई साधक नहीं होता। ॐ के उच्चारण में श्वास-प्रश्वास के लय और उसकी गति को समझना आवश्यक है। ॐ का उच्चारण कई प्रकार से किया जाता है। प्रत्येक उच्चारण के स्वर एक दूसरे से भिन्न होते हैं और उनके प्रभाव भी भिन्न होते हैं। भिन्न-भिन्न प्रभाव से तत्काल वातावरण में परिवर्तन होता है।
       ॐ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि शंख के माध्यम से निकली हुई ॐ की ध्वनि अति विचित्र और महत्व्पूर्ण होती है। इसलिए कि वह देवलोक और उसके ऊपर के लोकों तक सुनाई देती है। देवगण उसको सुनकर चमत्कृत होते हैं और होते हैं प्रसन्न।
       यह तो निश्चित है कि ॐ के उच्चारण की भिन्नता के कारण उसका फल भी भिन्न-भिन्न होता है। "ओ" पर चौगुना ज़ोर देकर दीर्घकाल तक उसका उच्चारण करने के बाद "म" का उच्चारण भी दीर्घकाल तक करना चाहिए। जितना समय ओ के उच्चारण में लगे, उतना ही समय म के उच्चारण में भी लगना चाहिए। ऐसा "म" अत्यधिक शक्तिशाली होता है। ऐसे ॐ के उच्चारण का प्रभाव उच्चारण करने वाले व्यक्ति के मन, मस्तिष्क और आत्मा पर तुरंत पड़ता है। इसके अतिरिक्त अदृश्य रूप से वातावरण में विद्यमान अपआत्माएं ( भूत-प्रेत) भी भाग जाती हैंऔर अच्छी आत्माएं आकर्षित होकर वहां आ जाती हैं और शंख बजाने वाले की सहायता करती हैं मानसिक रूप से। sabhar shivaram Tiwari Facebook wall

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