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शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

क्वांटम क्रांति के मुहाने पर जर्मनी

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sorceजर्मनी की छवि भले ही औद्योगिक शक्ति की है लेकिन जहां तक क्वांटम कंप्यूटिंग का सवाल है यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बाकियों से पीछे रह गई है लेकिन अब नया कंप्यूटर हालत बदल सकता है जर्मनी में क्वांटम युग का आगाज हो रहा है जर्मनी क्वांटम क्वांटम कंप्यूटिंग में चीन और अमेरिका ऐसी ताकतों से मुकाबला करना चाहता है और जिसके पास भी जितनी आधुनिक क्वांटम कंप्यूटिंग तकनीक है वह उतना ही ज्यादा ताकतवर है इसलिए जर्मनी अब इस ओर विशेष ध्यान दे रहा है इस हफ्ते म्यूनिख स्थित इंस्टिट्यूट और अमेरिकी कंपनी आईबीएम ने क्वांटम कंप्यूटिंग में मिलकर काम करने का ऐलान किया है आईबीएस के नए क्वांटम सिस्टम वन कंप्यूटर के इर्द-गिर्द केंद्रित होगा या दुनिया का सबसे ताकतवर कंप्यूटर है चीन और अमेरिका के पास क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में जर्मनी से कहीं ज्यादा पेटेंट है और ऐसा तब है जबकि जर्मनी में रिसर्च पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जाता है इसके बारे में दुनिया को ज्यादा नहीं पता है हनोवर की लाइव नित्स यूनिवर्सिटी में मैं क्वांटम फिजिक्स के प्रोफेसर क्रिस्टी यान आर एल का उस कहते हैं मैं कहूंगा कि अब हम सब तरह की पकड़ में आए बिना उड़ते रहे हैं इसकी वजह है कि इस क्षेत्र में मिलने वाली वित्तीय मदद को अक्सर अलग तरीके के तकनीक नाम दिए जाते हैं यानी हमने यह कभी नहीं कहा कि हम एक कंप्यूटर बना रहे हैं बल्कि हम ने यह कहा कि हमें ऐसी अवस्था का अध्ययन कर रहे हैं जिसमें 20 आयन है  कंप्यूटर बाइनरी गणना करते हैं यानी एक बार जीरो अगली बार एक क्वांटम कंप्यूटर 0 और 1 दोनों को एक साथ गणना में रखते हैं जैसे आम कंप्यूटर में इकाई को बिट कहते हैं हैं यहां क्यूबिट कहा जाता है कि क्यूबिट में होने वाली गणना कहीं ज्यादा तेज होती है मौजूदा सुपर कंप्यूटर से भी ज्यादा तेज जिन समस्याओं को वैज्ञानिक हल नहीं कर पा रहे हैं क्वांटम  कंप्यूटर से हल कराया जा सकता है sorce dw. de Prime Shred Fat Burner For Men

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अंतरिक्ष में इंसान पैदा करने की दिशा में कार्य हुआ

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see sorce अंतरिक्ष में बच्चे पैदा किए जा सकते हैं इस सवाल को वैज्ञानिक मानव प्रजाति के भविष्य के लिए हम मानते हैं इसलिए वर्षों से इस क्षेत्र में शोध किया जा रहा है और पहली बार इसमें कुछ सफलता हासिल हुई है वैज्ञानिकों का कहना है कि चूहे के स्तनों से उन्होंने 168 चूहे पैदा किए सालों तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में रखे जाने के बाद इनसे जापान की एक प्रयोगशाला में एक चुहिया को गर्भवती किया गया और 168 बच्चे पैदा हुए स्पर्म को स्विच करने के लिए जिस स्तर के रेडिएशन की जरूरत होती है जैपनीज एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी के  स्पेस सेंटर में इन्हें उस से 170 गुना ज्यादा रेडिएशन लेवल पर रखा गया अंतरिक्ष में रेडिएशन का स्तर पृथ्वी से ज्यादा होता है यामा नाशी यूनिवर्सिटी के जीव विज्ञानिक तेनु ही को वाह का या मां के नेतृत्व में हुआ या धन साइंस एडवांस नामक पत्रिका में छपा है डाकर डॉक्टर वाकायामा कहते हैं कि अंतरिक्ष में रेडिएशन के में शुक्राणुओं के डीएनए को नुकसान नहीं पहुंचाया ना ही इनकी जनन क्षमता को प्रभावित किया इन शुक्राणु से जन्मे बच्चे उतने ही स्वस्थ हुए जितने पृथ्वी पर जन्मे चूहे के बच्चे हो सकते हैं ना उनके जींस में किसी तरह की खामी पाई गई यहां तक कि उनके बच्चों के बच्चे भी स्वस्थ पैदा हुए वैज्ञानिक समझने की कोशिश कर रहे हैं अंतरिक्ष की परिस्थितियां किस तरह प्रभावित करती हैं एक चिंता यह है कि अंतरिक्ष में रेडिएशन का ज्यादा होना जींस को प्रभावित कर सकता है जीरो ग्रेविटी की परिस्थिति लेकर भी चिंता है कि कहीं वह एंब्रियो  के विकास को प्रभावित ना कर दे  sorce www.dw.de

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मन्त्र विज्ञान अजपा गायत्री और विकार मुक्ति

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तीन तल हुए—एक वाणी में प्रकट हो,
एक विचार में प्रकट हो, 
एक विचार के नीचे अचेतन में हो।
 ऋषि कहते हैं, उसके नीचे भी एक तल है। अचेतन में भी होता है, तो भी उसमें आकृति और रूप होता है। 
उसके भी नीचे एक तल है, महाअचेतन का कहें, जहां उसमें रूप और आकृति भी नहीं होती। वह अरूप होता है। जैसे एक बादल आकाश में भटक रहा है। अभी वर्षा नहीं हुई। ऐसा एक कोई अज्ञात तल पर भीतर कोई संभावित,पोटेंशियल विचार घूम रहा है । 
वह अचेतन में आकर अंकुरित होगा, 
चेतन में आकर प्रकट होगा, 
वाणी में आकर अभिव्यक्त हो जाएगा। ऐसे चार तल हैं।

गायत्री उस तल पर उपयोग की है जो पहला तल है, सबसे नीचे। उस तल पर "अजपा"  का प्रवेश है। 
तो जप का नियम है। अगर कोई भी जप शुरू करें—समझें कि राम—राम जप शुरू करते हैं, या ओम, कोई भी जप शुरू करते हैं; या अल्लाह, कोई भी जप शुरू करते है—तो पहले उसे वाणी से शुरू करें। पहले कहें, राम, राम; जोर से कहें। फिर जब यह इतना सहज हो जाए कि करना न पड़े और होने लगे, इसमें कोई एफर्ट न रह जाए पीछे, प्रयत्न न रह जाए,यह होने लगे; जैसे श्वास चलती है, ऐसा हो जाए कि राम, राम चलता ही रहे, तो फिर ओंठ बंद कर लें।
 फिर उसको भीतर चलने दें। फिर मुख से न बोलें राम, राम; मन मे चलने दे राम, राम।

फिर इतना इसका अभ्यास हो जाए कि उसमें भी प्रयत्न न करना पड़े, तब इसे वहां से भी छोड़ दें, तब यह और नीचे 'डूब जाएगा। 
और अचेतन में चलने लगेगा—राम,राम। आपको भी पता न चलेगा कि चल रहा है, और चलता रहेगा। फिर वहां से भी गिरा दिए जाने की विधियां हैं और तब वह अजपा में गिर जाता है। फिर वहां राम, राम भी नहीं चलता। फिर राम का भाव ही रह जाता है—जस्ट क्लाउडी, एक बादल की तरह छा जाता है। जैसे पहाड़ पर कभी बादल बैठ जाता है धुआ—धुआ, ऐसा भीतर प्राणों के गहरे में अरूप छा जाता है।

उसको कहा है ऋषि ने, अजपा। 
और जब अजपा हो जाए कोई मंत्र, तब वह गायत्री बन गया। अन्यथा वह गायत्री नहीं है।

और क्या है इस अजपा का उपयोग ???
इस अजपा से सिद्ध क्या होगा ??? इससे सिद्ध होगा, विकार— मुक्ति। 
विकारदंडो ध्येय: इस अजपा का लक्ष्य है विकार से मुक्ति।

यह बहुत अदभुत कीमिया है, केमेस्ट्री है इसकी। 
मंत्र शास्त्र का अपना पूरा रसायन है। 
मंत्र शास्त्र यह कहता है कि अगर कोई भी मंत्र का उपयोग अजपा तक चला जाए,तो आपके चित्त से कामवासना क्षीण हो जाएगी, सब विकार गिर जाएंगे। क्योंकि जो व्यक्ति अपने अंतिम अचेतन तल तक पहुंचने में समर्थ हो गया, उसको फिर कोई चीज विकारग्रस्त नहीं कर सकती। क्योंकि सब विकार ऊपर—ऊपर हैं, भीतर तो निर्विकार बैठा हुआ है। हमें उसका पता नहीं है,इसलिए हम विकार से उलझे रहते हैं।

कोई भी मंत्र गायत्री बन जाता है,जब अजपा हो जाए। यही इस सूत्र का अर्थ है अजपागायत्री विकारदंडो ध्येय:।

मन का निरोध ही उनकी झोली है।

वे जो संन्यासी हैं, उनके कंधे पर एक ही बात टंगी हुई है चौबीस घंटे—मन का निरोध, मन से मुक्ति, मन के पार हो जाना। चौबीस घंटे उनके कंधे पर है।

आपने एक शब्द सुना होगा,खानाबदोश। यह बहुत बढ़िया शब्द है। इसका मतलब होता है, जिनका मकान अपने कंधे पर है। खाना—बदोश। खाना का मतलब होता है मकान—दवाखाना—खाना यानी मकान। दोश का मतलब होता है कंधा,बदोश का मतलब होता है, कंधे के ऊपर। जो अपने कंधे पर ही अपना मकान लिए हुए हैं, उनको खानाबदोश कहते हैं—घूमक्कडू लोग, जिनका कोई मकान नहीं है, कंधे पर ही मकान है।

संन्यासी भी अपने कंधे पर एक चीज ही लिए चलता है चौबीस घंटे—मन का निरोध। वही उसकी धारा है सतत श्वास—श्वास की, मन के पार कैसे जाऊं ??? क्योंकि मनातीत है सत्य। मन के पार कैसे जाऊं ???
क्योंकि मनातीत है अमृत। मन के पार कैसे जाऊं ??? 
क्योंकि मनातीत है प्रभु।

जाया जा सकता है। ध्यान उसका मार्ग है। sabhar dev sharma Facebook wall

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बुधवार, 21 जुलाई 2021

स्वस्थ रहने हेतु हेल्थ इंश्योरेंस करवाएं

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आज के बढ़ते युग में करो ना जैसी महामारी और खानपान में बढ़ते बदलाव से बीमारियों का प्रचलन ज्यादा हो गया स्वास्थ्य एक समस्या हो गई है अतः हमें स्वास्थ्य बीमा करा लेना चाहिए तभी हम वैज्ञानिक सभी तकनीकी का फायदा उठाe

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मंगलवार, 20 जुलाई 2021

रेबीज

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 रेबीज या जलांतक (Hydrophobia) दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक है। यह रोग मनुष्य को यदि एक बार हो जाए तो उसका बचना काफी मुश्किल होता है। रेबीज लाइसा वाइरस अर्थात् विषाणु द्वारा होती है और अधिकतर कुत्तों के काटने से ही होती है। परन्तु यह अन्य दाँत वाले प्राणियों जैसे-बिल्ली, बन्दर, सियार, भेड़िया, सूअर इत्यादि के काटने से भी हो सकती है। इन जानवरों या प्राणियों को नियततापी (Warm blooded) कहते हैं। 

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रविवार, 18 जुलाई 2021

सूर्य से हमें ज्योति मिलता है चन्द्रमा से अमृतत्त्व

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श्रीमद्भगवद्गीता का आठवां अध्याय और वृहदारण्यकोपिषद् के छठवें अध्याय के दूसरे ब्राह्मण तथा और भी अनेकों आर्ष-ग्रन्थों के अनुसार  सूर्य-चन्द्र लोक में तो युक्तयोगी को भी जाना पड़ता है शरीर छोड़ने के बाद क्रममुक्ति के क्रम में ।

अच्छा , इनका आध्यात्मिक महत्त्व छोड़कर केवलमेव भौतिक-दृष्टि से भी विचार करे तो सूर्य प्रकाश व चन्द्रमा शीतलता प्रदान करने के बाद भी आपसे बिजली व एसी की भांति बिल नहीं लेते ।

कहते हैं जितनी पृथ्वी है , उससे तिगुणा जल है , किन्तु उस सामुद्रिक जल से क्या प्रयोजन , जो न पीने के काम आये , न स्नान के और  वस्त्र-प्रक्षालनादि के ही !

सूर्य की रश्मियां जब उसी सामुद्रिक-जल को खींचकर मेघमण्डल के फिल्टर में डालती है , और वह जब पुनः धरती पर बरसता है तो पीने-नहाने-वस्त्रादि धोने योग्य होता है ।

धरती के अंदर जाने पर उसी जल को ट्यूबवेल, कूप , चापाकल आदि के द्वारा लोग प्रयोग में लाते हैं ।

कुल मिलाकर सूर्य-चन्द्रमा है तो जीवन है , प्राण है , पृथ्वी है ।  किमधिकम् ये कलियुग के प्रत्यक्ष देवता हैं ।

इसी उपकार को ध्यान में रखकर भी जब सूर्य-चन्द्र ग्रहणादि का अवसर हो , उस समय निद्रा-मैथुन-आलस्यादि को त्यागकर उनके कष्ट-निवृत्त्यर्थ जप-ध्यानादि करना चाहिये ।

जिन्हें यह सब बातें अन्धविश्वास लगते हों ,  चलो ! उनकी तुष्टि के लिए असत्य मानें , तब भी जप-ध्यानादि के करने से क्या हानि है !

किन्तु जब यह बातें पूर्णरूपेण सत्य ही है , तो ग्रहणकाल में टांग-फैलाकर सोने से तो हानि ही हानि है ।
 Sabhar satsang Facebook wall
श्री शंकराचार्य वेद वेदांत विज्ञान

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शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

देवताओं का भौतिक अवतरण

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      श्रीमद्भगवद्गीता की रचना संभवतया ईसवी पूर्व 300 और 300 ईसवी के मध्य में हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा--मैं ही बलिदान और बलि तथा वरदान और पवित्र पौधा हूँ। मैं ही पवित्र शब्द, पवित्र भोजन, पवित्र अग्नि और अग्नि को समर्पित वस्तु भी हूँ। मैं ही ब्रह्माण्ड का रचयिता और ईश्वर का स्रोत भी हूँ। मैं अमर हूँ और मृत्यु भी जो कुछ है, वह मैं ही हूँ और जो नहीं है, वह भी मैं ही हूँ।
      मूर्तियों का विशेष आकार होता है। उनमें मनुष्य या  किसी पशु विशेष के गुण होते हैं, किन्तु हर हालत में वे इंसान से परे किसी अलौकिक शक्ति की प्रतीक हैं जो हमारे सामान्य जीवन से परे किसी दूसरे जगत में रहती हैं।
      मूर्तियों की उत्पत्ति कब हुई और उनके विशेष आकार-प्रकार कहाँ से आये ?--यह अभी तक रहस्यमय है। क्या उन्हें बनाने वालों को उन दैवीय शक्तियों ने स्वप्न में दर्शन दिए थे या कि वे गहन ध्यान से उत्पन्न हुईं ?
      विष्णुधर्मोत्तर पुराण में लिखा है कि सतयुग, त्रेता, द्वापर युगों में लोग देवताओं को अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देख सकते थे। कलियुग में उनकी वह देखने की शक्ति समाप्त हो गयी है। इसीलिए उपासना और ध्यान के लिए निराकार की जगह साकार ईश्वर की मूर्तियां बनाई गई हैं।
      विष्णु संहिता में मूर्तियों के प्रयोजन के बारे में स्पष्ट रूप से उल्लेख आया है : बिना आकार के ईश्वर का ध्यान लगाना कैसे संभव हो सकता है ? उनकी कोई आकृति नहीं तो मस्तिष्क कैसे एकाग्र किया जाएगा ? ध्यान प्रायः ही भटक जाएगा या नींद आ जायेगी। इसलिए बुद्धिमान लोग किसी आकार विशेष पर ध्यान लगाएंगे, यह जानते हुए कि वह वास्तविक नहीं, आरोपित है, काल्पनिक है।
      जाबाल उपनिषद के अनुसार--उपासना आरम्भ करने वालों को मूर्तिया सहारा देती हैं, जबकि योगीगण शिव या अन्य किसी देवता की छवि में नहीं, अपनी आत्मा में उतरते हैं, आत्मा के दर्शन करते हैं। मूर्तियां ऐसे लोगों के लिए बनाई गई हैं जो अज्ञानी से अज्ञानी हैं। अर्थात अज्ञानी से अज्ञानी भी लाभ ले सकते हैं। वेदों में मूर्तियों की कोई अवधारणा नहीं है( न तस्य प्रतिमा अस्ति ) ईश्वर की कोई प्रतिमा नहीं है। लेकिन वैदिक ऋषियों ने देवताओं के विवरण को मूर्तियों के स्थान पर शब्दों में सजाया-संभाला है। अग्नि के बारे में कहा गया है कि उसकी लाल वर्ण की सात जीभें हैं, सात चेहरे और चमकते हुए बाल हैं। इंद्र के पास वज्र है।
      वैदिक ऋषि इस संसार में होने वाली सभी घटनाओं को एक-दूसरे से जुड़ी हुई मानते थे। उनके अनुसार शक्ति और क्रिया तथा प्रतीक और प्रतीकात्मकता में कोई अन्तर नहीं। मनुष्य सत्य ी खोज कर सकता है। उसे सक्रिय भी कर सकता है।
      वैदिक रीतियां और वैदिक विधान वास्तव में सृजन का दर्शन कराते हैं। अग्नि की वेदी में उस विराट पुरुष की सुनहरी आकृति रहती है। उस विराट पुरुष को हवि ( यज्ञ की अग्नि में डाला गया पदार्थ ) देने के लिए यज्ञ से उठता हुआ धुआं उड़कर अंतरिक्ष में फिर समस्त ब्रह्माण्ड में चला जाता है। sabhar shivaram Tiwari Facebook wall
#adyatm websires in hindi

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गुरुवार, 15 जुलाई 2021

छाया पुरुष और छाया शरीर

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन 

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

      प्राणमय कोष सूक्ष्म और स्थूल सत्ता के सन्धि स्थल पर विद्यमान है। उसके एक ओर छाया शरीर है और दूसरी ओर है--स्थूल शरीर। प्राणमय कोष का मूलकेंद्र 'नाभि' है। नाभि पर मन को एकाग्र करने पर प्राणमय कोष से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि जिस जीवित या मृत व्यक्ति के रूप का उस अवस्था में ध्यान करेंगे, उस व्यक्ति का छाया शरीर आपके सामने स्पष्ट रूप से आ जायेगा। इस क्रिया को अनुभवी और परिपक्व लोग अपने सामने इच्छित व्यक्ति के चित्र को भी रखकर करते हैं। इससे सफलता शीघ्र मिलती है। छाया शरीर से कोई भी कार्य कराया जा सकता है। यदि जीवित व्यक्ति है तो उसके छाया शरीर पर अपना मानसिक प्रभाव डालकर उसे अपने मन के अनुकूल भी किया जा सकता है। उसकी रोग-व्याधि भी दूर की जा सकती है और उसकी समस्याएं भी दूर की जा सकती हैं। यदि व्यक्ति मृत है तो उससे अज्ञात रहस्यों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसी को छाया पुरुष-सिद्धि भी कहते हैं। इस सिद्धि के द्वारा किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से तत्काल सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है और कुछ सीमा तक मनोनुकूल कार्य भी कराया जा सकता है।
      काशी के शिवाला घाट पर एक महाशय रहते थे। नाम् था--शशि शेखर पांडेय। सुना था पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे लोगों की आत्माओं से उन्होंने संपर्क किया था। उनके कमरे में पड़े छोटे से तख्त पर कई लोगों के फोटो चिपके थे जिनमें जीवित और मृत दोनों व्यक्तियों के थे--महिलाओं और पुरुषों के भी। उन फोटो के माध्यम से वे महाशय उनके छाया पुरुषों से संपर्क करते थे। एक दिन गुरुदेव श्री अरुण कुमार शर्मा का भी चित्र लेकर चिपका लिया तख्त पर।(यह उन दिनों की बात है जब गुरुदेव की तरुण अवस्था थी। कोई नौकरी भी नहीं थी उनकी। गुरुदेव उनके कमरे में गए तो वह बोले--बन्धुवर ! मिठाई खिलाइये।
       क्यों, किसलिए ?
       कल आपको नियुक्ति पत्र मिलने वाला है।
       गुरुदेव को याद आया कि दो माह पहले केंद्रीय सरकार में एक वरिष्ठ पद के लिए आवेदन किया था। साक्षात्कार भी हो चुका था। नौकरी की आशा कम ही थी। एक प्रकार से भूल ही चुके थे गुरुदेव्।
       बात सच निकली। दूसरे ही दिन मिल गया नियुक्ति-पत्र डाक से। सचमुच छाया सिद्धि का चमत्कार था यह।

जीवित और मृत व्यक्ति के छाया शरीर में अन्तर

      जीवित व्यक्ति के छाया शरीर के ईथरिक कणों में होने वाले कम्पन अति तीव्र होते हैं लगभग एक सेकेण्ड में पचास हज़ार बार जबकि मृत व्यक्ति के शरीर में वे कम्पन एक सेकेण्ड में 30-40 हज़ार बार होते हैं। वायुतत्व के प्रभाव से वे कम्पन कभी कम, कभी अधिक भी होते हैं जिससे छाया शरीर का आकार-प्रकार घटता-बढ़ता रहता है और कभी-,कभी बेडौल-सा हो जाता है। जीवित व्यक्ति के छाया शरीर को 'छाया पुरुष' और मृत व्यक्ति के छाया शरीर को 'छाया शरीर' कहते हैं।
       अघोर मार्गीय साधक छाया पुरुष की ही सिद्धि करते हैं। इसके लिए श्मशान का वातावरण ही छाया पुरुष की सिद्धि के लिए उचित व अनुकूल बताया गया है। इसके कई कारण हैं जिनमें मुख्य कारण है--साधक को अपनी इच्छानुकूल छाया पुरुष का वहाँ मिल जाना। कोई भी छाया पुरुष साधक के बन्धन में अधिक देर तक नहीं रह सकता। वह हमेशा बंधन-मुक्त होने के लिए व्याकुल रहता है ताकि उसे सूक्ष्म शरीर प्राप्त हो जाये और उसके बाद पुनर्जन्म हो जाये। यदि साधक उसे मुक्त नहीं करता है तो वह उसकी ऐसी दुर्गति करता है कि बतलाया नहीं जा सकता। इसलिए अघोरी नए- नए छाया पुरुष की खोज में रहते हैं। 

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सोमवार, 12 जुलाई 2021

योग और विज्ञान

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साठ के दशक में योग के सामने कठिन दौर था वैज्ञानिक साबित होने का. क्योंकि अमेरिका के लैब में योग सफल न हुआ तो उसका पश्चिम में प्रवेश निषेध हो जाता. इसी कठिन दौर में हिमालय के एक महान योगी स्वामी राम डॉ एल्मर ग्रीन के बुलावे पर 1969 में अमेरिका जाते हैं.

मैनिन्जर फाउण्डेशन की लेबोरेटरी में उनके योग संबंधी दावों की लंबी जांच पड़ताल चलती है लेकिन स्वामी राम की पराभौतिक शक्तियों के आगे विज्ञान असंभव को संभव मान लेता है. परीक्षण के दौरान उन्होंने16 सेकेण्ड के लिए हृदय गति रोक दी लेकिन वे जिन्दा रहे और सबसे बात करते रहे. उन्होंने अपने हथेली के अलग अलग हिस्से में 11 डिग्री का तापमान अंतर पैदा करके शरीर विज्ञान के असंभव को संभव कर दिखाया.

लेकिन योग का इससे भी बड़ा एक अचंभा उन्होंने कैमरे में कैद किया. और वह था चक्र की शक्ति. शरीर के भीतर षट्चक्रों को विज्ञान कल्पना ही मानता था. लेकिन स्वामी राम ने दावा किया कि वे हर चक्र पर आभामंडल (औरा) पैदा करेंगे जिसे कैमरे में कैद किया जा सकता है. उनके हृदय स्थल (अनाहत चक्र) पर उभरा आभामंडल न सिर्फ कैमरे में कैद हुआ बल्कि विज्ञान के सामने पहली बार योग का षट्चक्र सिद्धांत भी साबित हुआ जो अभी तक विज्ञान में कपोल कल्पना समझा जाता था.

स्वामी राम जैसे महान योगियों के कारण आधुनिक दुनिया में योग ko manyta mili Dr_Abhilasha_Dwivedi Facebook wall

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नाद अनुसंधान

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नाद अर्थात शब्द, अनुसंधान कोई वस्तु जो पहले से विद्यमान है उसे दोबारा  खोजना।  
नाद अनुसंधान अथवा शब्दों को खोजना,
और शब्दों की यह खोज किसी बाह्य जगत में नहीं की जाती है।  बल्कि यह खोज तो स्वयं
के आंतरिक जगत की है।
शास्त्रों में कहा गया है,की जो कुछ भी इस जगत में है वो सब कुछ इस शरीर में है।
अर्थात पंचतत्व से बने सभी पदार्थ जो इस ब्रहमांड में उपस्थित है।वो सभी सूक्ष्म रूप
में इस शरीर में उपस्थित है।
 बाह्य जगत अनेक ध्वनियां जो हमें सुनाई देती है,वो सब ध्वनियाँ हमारे शरीर में भी होती रहती है।  परन्तु वे ध्वनियाँ बड़ी सूक्ष्म होती है,इसलिए सुनाई नहीं देती।योग के द्वारा बुद्धि जब सूक्ष्म होने लगती है तो उसकी पकड़ में सूक्ष्म विषय स्वभाव से ही आने लगे है।इन सूक्ष्म ध्वनियों को सुनने के लिए की जाने वाली यौगिक क्रिया ही नाद अनुसंधान कही गयी है।  
महर्षि गोरखनाथ ने नाद अनुसंधान की उपासना का वर्णन किया है,उन्होंने कहा है की वे सामान्य लोग जो तत्त्व ज्ञान को पाने में असमर्थ रहते है,उनको नाद की उपासना करनी चाहिए।  
घेरण्ड सहिंता में इसका वर्णन नहीं किया गया है।
 लेकिन हठयोग प्रदीपिका के चतुर्थ उपदेश में नाद अनुसंधान का वर्णन किया गया है।
और कहा गया है की - 
"मुक्तासने (सिद्धासन) स्थितो यपगी मुंडा संधाय शाम्भवीम। 
शृणुयाद्दक्षीणे कर्णे नादमंतस्थमेकधी:।।"  
साधक सिद्धासन में बैठ कर शाम्भवी मुद्रा लगाकर एकाग्रचित्त होकर अपने दाहिने कान से शरीरांतर्ग - ध्वनि को सुनने का प्रयास करे। 
कुछ समय अभ्यास के बाद 
"श्रवणपुटनयनयुगल घ्राणमुखाना निरोधन कार्यम्।
शुद्दुसुषुम्नासरणो स्फुटममल: श्रूयते नाद: ।।"  
दोनों कान, दोनों आँख, दोनों नासिका विवर और मुख को दोनों हाथो की अंगुलियों से बंद करके चित्त को एकाग्र करे तो कुछ अभ्यास के बाद साधक को स्पष्ट व पवित्र नाद सुनाई देता है। नाद की सुनने की विभिन्न चार अवस्थाये होती है। जिनमे विभिन्न अलग -अलग अनाहत नाद सुनाई देती है।
प्रारम्भ में यह क्रिया ऐसे ही है जैसे भ्रामरी प्राणायाम। अन्तर  इतना ही है की इस क्रिया में हमें कोई भी ध्वनी नहीं करनी है केवल अंदर की आवाज को सुनना है उस पर ध्यान लगाना है।
  जिनका वर्णन निम्न प्रकार है। 
आरम्भवस्था :
"बृह्मग्रन्थेम्रवेदभेदादानन्द: शून्यसम्भव:।
 विचित्र: कवणको देह्रअनाहत: श्रुय्ते ध्वनि: ।।
दिव्यदेहशच तेजस्वी दिव्यगन्धस्तवरोगवान। 
सम्पूर्णहृदय: शुन्य आरम्भे योगवान भवेत्।।"
आरम्भवस्था में ब्रह्मग्रंथ के भेदन के फलस्वरूप आनंद का अनुभव होता है। और अन्तः शरीर में शून्यसम्भूत असाधारण झंण - झंण रूप अनाहत शब्द सुनाई देता है।  
लाभ :
वह योगी जो इस अवस्था को सिद्ध कर लेता है,वह दिव्य देह वाला ओजस्वी, दिव्यगन्ध, निरोगी, प्रसन्नचित्त तथा शून्यचारी हो जाता है। 
घटावस्था  :
"द्वितीयाया घटिकृत्य वायुभवति मध्यग:। 
दृढ़सनो भवेद्योगी ज्ञानी देवसमस्तया।।
विष्णुग्रन्थेस्ततो भेदात परमानन्द सूचक:। 
अतिशून्य विमर्दशच भेरी शब्दसत्था भवेत।।"
योगी का आसन में दृढ़ होने पर दूसरी घटावस्था में जब विष्णुग्रंथि के भेदन से निबद्ध वायु का सुषुम्ना में संचार होता है,तब अतिशून्य अर्थात कपालकुहर में परमानन्द का सूचक एक वाद्ययंत्र भेरी एवं आद्यातजन्य जैसा शब्द सुनाई देता है। 
लाभ : 
इसकी सिद्धि के फलस्वरूप साधक ज्ञानी व देवतुल्य हो जाता है। 
परिचयावस्था : 
"तृतीय तु विज्ञेयो विहायो मर्दलध्वनि:। 
महाशून्य तदा याति सर्वसिद्धि समाश्रय:।।" 
तृतीय  परिचयावस्था में भ्रूमध्याकाश में ढोल की ध्वनि जैसा नाद सुनाई देता है। इसकी सिद्धि से प्राण सभी सिद्धियो को देने वाले महाशून्य (अंतराकाश या आज्ञाचक्र) में पहुंचता है।
लाभ :
"चितानन्द तदा सहजानन्दसंभव:। 
दोषदु:जजराव्याधिक्षुधानिडाविवर्जित:।।"
इस अवस्था में साधक को दोष-दुःख, जरा ,व्याधि, क्षुधा, निद्रा से रहित सहज आनंद की परमानन्द अवस्था प्राप्त होती है। 
निष्पत्तिवस्था :
 रूद्रग्रंथि का भेदन कर जब प्राण आज्ञाचक्र स्थित शिव के स्थान पर पहुंचता है तो यही अवस्था निष्पत्ति अवस्था कहलाती है, इस अवस्था में साधक को वीणा का झंकृत शब्द सुनाई देता है। 
"रूद्रग्रंथि यदा भित्वा शव्रपीठगतोअनिल:। 
   निष्पत्तो वैणव: क्वणद्विणाम्वणो भवेत।।"
लाभ:
" एकीभुत तदा चित्त राजयोगभिदानकम् । 
सृष्टि संहार कर्ता सौ योगिशवरसमो भवेत् ।।"
इस अवस्था में चित्त सर्वथा एकाग्र होकर समाधि संज्ञक बनता है। और तब इस अवस्था में योगी सृष्टि संहार कर्ता ईश्वर के समान हो जाता है।  
विश्लेषण :
नाद अनुसन्धान में बताई गई उपरोक्त चार अवस्थाएं-
आरम्भावस्था, घटावस्था, परिचयवस्था व निष्पत्ति अवस्था है।
 मानव शरीर में सबसे महत्व की सुषुम्ना नाड़ी है।यह नाड़ी इडा व पिंगला के मध्य होती है तथा  रीढ की हड्डी में गुदा मार्ग से कुछ ऊपर प्रारम्भ होकर सहस्त्रार तक जाती है।समान्यत: प्राण क्रिया इडा व पिंगला से की जाती है।यही प्राण क्रिया सुषुम्ना से करने के लिए योग साधना से सुषुम्ना के अवरोधो को दूर करते है ।और प्राण को चलाते है। जब यह प्राण सुषुम्ना से गुजरता है तो शरीर के विभिन्न हिस्सो में अनेक अति विशिष्ट अति सूक्ष्म ज्ञान प्रदान करने वाली क्रियाए होती है।
नाद अनुसंधान भी ऐसी ही एक क्रिया है,जो सुषुम्ना में प्राण के चलने से होने वाला स्पंदन है। यह स्पंदन सुषुम्ना के श्रवण केंद्र को स्पर्श करने वाले स्थान पर स्थित बिन्दु के उत्तेजित होने से होता है ।
इस नाद अनुसंधान में तीन ग्रंथियो का भेदन कहा गया है,जिनका विस्तार पूर्वक वर्णन निम्न प्रकार है ।
प्राण जब सुषुम्ना में ऊपर की तरफ चलने लगता है,
तो साधक को अनेक आध्यात्मिक, मानसिक व शारीरिक अनुभूतियां होने लगती है ।
प्राण जब सुषुम्ना में ऊपर की तरफ चलता है तो सर्वप्रथम मूलाधार चक्र (सबसे नीचे स्थित चक्र) का जागरण होता है फिर स्वाधिष्ठान व मणिपुर का होता है। इन तीनों चक्रो में सुषुम्ना से आने वाले प्राण पर किसी प्रकार का आवरण नहीं आता।
परन्तु आगे के तीन चक्रो पर एक विशेष प्रकार आवरण आता है ।
अर्थात यह आवरण हृदय की कक्षा में अर्थात अनाहत चक्र में आता है।अनाहत को ही ब्रह्मग्रंथि कहते है ।
इस ब्रह्मग्रंथि का भेदन करने से अर्थात अनाहत चक्र को क्रियाशील करने से आरंभवस्था की प्राप्ति होती है ।
अर्थात इस अनाहत चक्र के क्रियाशील होने पर जब साधक हाथो से इंद्रियो के सब द्वारो को बंद करके चित्त को या मन को अंतर्मुखी करता है। अर्थात स्वयं के अंदर की तरफ ध्यान लगाता है ।तो उसे झण झण रूप अनाहत शब्द सुनाई देता है।इस अवस्था को प्राप्त साधक की देह दिव्य ओज से भर जाती है। उसके शरीर से एक प्रकार की दिव्य गंध आने लगती है।शरीर के रोग दूर हो जाते है उसका चित्त प्रसन्न रहने लगता है।तथा शून्य का आचरण करने वाला अर्थात चित्त की सब वृत्तियाँ और उनकी उथल पुथल दूर हो जाती है।साधक एक भाव में अर्थात सम अवस्था में रहने लगता है।इसके बाद जब प्राण विशुद्धि चक्र (विष्णुग्रंथि) में पहुंचता है तो उसमे उपस्थित आवरण का भेदन होने पर यह जाग्रत होता है ।तब साधक को इंद्रियो के द्वारो को बंद करके आंतरिक ध्यान लगाने से भेरी व आघातजन्य अर्थात हृदय को कपाने वाली ध्वनियाँ जिनको सुनने से शरीर का अंग अंग काँप जाए ऐसी ध्वनियां सुनाई देती है।जैसे ढ़ोल, नगाड़े, युद्ध में बजने वाले अन्य यंत्र तथा होने वाली अनेक भयानक आवाज़े साधक को सुनाई देती है।इन आवाजो को सुनकर भी साधक को शांत चित्त रहना चाहिए,घबराना नहीं चाहिए। ये अवस्था घटावस्था कहलाती है ।
तृतीय परिचय अवस्था में प्राण भ्रूमध्य आकाश में पहुंचता है अर्थात आज्ञाचक्र में पहुंचता है अर्थात वह सभी सिद्धियां प्रदान करने वाले अंतराकाश में पहुंचता है।
पतंजलि योगशुत्र में समाधि का वर्णन करते हुए उसके दो स्वरूप बताये गए है। सम्प्रज्ञात व असम्प्रज्ञात समाधि ।जिनका विस्तार पूर्वक वर्णन योगशुत्र की व्याख्या करते हुए आगे करेंगे ।
यहाँ आवश्यकतानुसार कहता हूँ।
 जब चित्त सब वृत्तियो का निरोध कर लेता है परंतु उसका कारण रहता है या वह अपने कारण में लीन नहीं होता है। वह समाधि सम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है ।सम्प्रज्ञात समाधि की भी चार भूमियाँ या अवस्थाये (वितर्कानुगत,विचारानुगत,आनन्दानुगत तथा अस्मिताानुगत )होती है।
और जब चित्त सब वृत्तियो का निरोध करके स्वय भी अपने कारण में लीन हो जाता है।
 वह असम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है ।
यह समाधि ही योग की,जीव की,आत्मा की अंतिम अवस्था है।
 यह प्रथम आरम्भावस्था सम्प्रज्ञात समाधि की प्रथम अवस्था वितर्कानुगत समाधि कही जा सकती है।
या कह सकते की सम्प्रज्ञात समाधि की वितर्कानुगत समाधि इस प्रथम आरम्भावस्था में प्राप्त हो जाती है। हालांकि यह वितर्कानुगत समाधि प्रथम भूमि है।परंतु फिर भी बड़ी महत्व की है। इस समाधि में साधक के सामने पंच महाभूतों का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है जिससे साधक दिव्य देह वाला ओजस्वी, दिव्यगन्ध, निरोगी, प्रसन्नचित्त तथा शून्यचारी हो जाता है। द्वितीय घटावस्था विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था है इसमें सूक्ष्म भूतो का ज्ञान हो जाता है। तृतीय परिचयावस्था विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि है।इस अवस्था में अहम् अस्मि की वृत्ति रहती है। शेष सभी वृत्तियो का निरोध हो जाता है। जिससे साधक की भूख,प्यास,निद्रा जैसे सभी वृत्तियो का निरोध हो जाता है।और उसे अहम् अस्मि इस भाव में एक परम आनन्द की प्राप्ति होती है। चौथी निष्पत्तिवस्था में साधक जब आज्ञाचक्र को जाग्रत कर लेता है,अथवा ये कहे की रुद्रग्रन्थि का भेदन कर जब प्राण आज्ञाचक्र में कहे गए शिव के स्थान में पहुंचता है।तब साधक द्वारा इंद्रियो के द्वार बंद कर आंतरिक ध्यान लगाने पर उसे वीणा का अति मधुर व सुरीला शब्द सुनाई देता है
निष्पत्ति की यह चतुर्थ अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि की अंतिम भूमि अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अंतिम अवस्था है जहां विवेक ख्याति की प्राप्ति होती है ।
इस अवस्था की प्राप्ति के फलस्वरूप चित्त पूर्ण एकाग्र हो जाता है अर्थात सब वृत्तियो का पूर्ण निरोध होने लगता है। अर्थात यही से अंतिम अवस्था (असम्प्रज्ञात समाधि) की प्राप्ति के लिए के लिए साधक आगे बढ़ जाता है । इस अवस्था में साधक सृष्टि संहार कर्ता ईश्वर के समान हो जाता है ।
विशेष : प्रारम्भ में साधक को जो मेघ, भेरी आदि ध्वनियाँ सुनाई देती है अभ्यास क्रम बढ़ने के साथ ही सुनाई देने वाली इन ध्वनियों में भी सूक्ष्म से सूक्षतम अनेक नाद या शब्द या ध्वनि साधक को सुनाई देने लगती है वे ध्वनियां अनुभव जन्य  होती है,उनका वर्णन नहीं किया जा सकता ।
कहा जा सकता है की जब साधक नाद अनुसंधान की साधना करता है,तब प्रारम्भ में वर्णन की जाने वाली ध्वनियाँ सुनाई देती है।अभ्यास बढ़ने पर ऐसी दिव्य ध्वनियां या नाद सुनाई देने लगती है जो शब्दो में नहीं कही जा सकती है ।
सावधानियाँ : 
एकान्त वास में इसका अभ्यास करें
इस क्रिया से पहले लम्बे समय तक एक आसन में बैठने का अभ्यास कर ले।
इससे पहले कुछ देर अनुलोम विलोम व भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास कर ले।
उन दिनों में गरिष्ठ भोजन न ले।
लम्बी यात्रा से परहेज करें।
अधिक लोक व्यवाहार न करें।
अति विशष्ट निर्देष है की इस अभ्यास से पहले आसन प्राणायाम का अभ्यास
करके शरीर को पूर्ण शुद्ध कर ले।
जिससे की उस ऊर्जा के आने पर शरीर में उसे संभालने की शक्ति हो।
डरावनी ध्वनियां सुनने पर घबराए नहीं धैर्य के साथ उन्हें सुनते रहे।
बिना गुरु के निर्देशन के यह क्रिया न करें।

OSHO

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