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शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

बिटकॉइन

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बिटकॉइन एक Virtual Currency है इसका अविष्कार Santoshi Nakamoto ने 2009 में किया था ये बाकी करेंसी की तरह ही एक Digital Currency है। बस हम इसे बाकी करेंसी की तरह छुके नही सकते । लेकिन हम इसका उपयोग online कर सकते है क्योंकि यह एक Digital Currency है।Bitcoin एक Virtual मुद्रा है या फिर हम इसे डिजिटल मुद्रा भी कह सकते है। आप इसे एक उदाहरण की मदद से समझ सकते है। जैसे कि आपके बैंक खाते में जब पैसे होते है तो आप अपने बैंक खाते से net-banking या फिर debit या credit card की मदद से online shopping कर सकते है या बिलों का भुगतान कर सकते है। ठीक इसी तरह bitcoin भी आपके बैंक के खाते के पैसों की तरह होता है जिसका इस्तमाल आप बाकी सभी करेंसी की तरह कर सकते है। sorce https://currencyinbox.com

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क्वांटम क्रांति के मुहाने पर जर्मनी

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sorceजर्मनी की छवि भले ही औद्योगिक शक्ति की है लेकिन जहां तक क्वांटम कंप्यूटिंग का सवाल है यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बाकियों से पीछे रह गई है लेकिन अब नया कंप्यूटर हालत बदल सकता है जर्मनी में क्वांटम युग का आगाज हो रहा है जर्मनी क्वांटम क्वांटम कंप्यूटिंग में चीन और अमेरिका ऐसी ताकतों से मुकाबला करना चाहता है और जिसके पास भी जितनी आधुनिक क्वांटम कंप्यूटिंग तकनीक है वह उतना ही ज्यादा ताकतवर है इसलिए जर्मनी अब इस ओर विशेष ध्यान दे रहा है इस हफ्ते म्यूनिख स्थित इंस्टिट्यूट और अमेरिकी कंपनी आईबीएम ने क्वांटम कंप्यूटिंग में मिलकर काम करने का ऐलान किया है आईबीएस के नए क्वांटम सिस्टम वन कंप्यूटर के इर्द-गिर्द केंद्रित होगा या दुनिया का सबसे ताकतवर कंप्यूटर है चीन और अमेरिका के पास क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में जर्मनी से कहीं ज्यादा पेटेंट है और ऐसा तब है जबकि जर्मनी में रिसर्च पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जाता है इसके बारे में दुनिया को ज्यादा नहीं पता है हनोवर की लाइव नित्स यूनिवर्सिटी में मैं क्वांटम फिजिक्स के प्रोफेसर क्रिस्टी यान आर एल का उस कहते हैं मैं कहूंगा कि अब हम सब तरह की पकड़ में आए बिना उड़ते रहे हैं इसकी वजह है कि इस क्षेत्र में मिलने वाली वित्तीय मदद को अक्सर अलग तरीके के तकनीक नाम दिए जाते हैं यानी हमने यह कभी नहीं कहा कि हम एक कंप्यूटर बना रहे हैं बल्कि हम ने यह कहा कि हमें ऐसी अवस्था का अध्ययन कर रहे हैं जिसमें 20 आयन है  कंप्यूटर बाइनरी गणना करते हैं यानी एक बार जीरो अगली बार एक क्वांटम कंप्यूटर 0 और 1 दोनों को एक साथ गणना में रखते हैं जैसे आम कंप्यूटर में इकाई को बिट कहते हैं हैं यहां क्यूबिट कहा जाता है कि क्यूबिट में होने वाली गणना कहीं ज्यादा तेज होती है मौजूदा सुपर कंप्यूटर से भी ज्यादा तेज जिन समस्याओं को वैज्ञानिक हल नहीं कर पा रहे हैं क्वांटम  कंप्यूटर से हल कराया जा सकता है sorce dw. de Prime Shred Fat Burner For Men

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अंतरिक्ष में इंसान पैदा करने की दिशा में कार्य हुआ

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see sorce अंतरिक्ष में बच्चे पैदा किए जा सकते हैं इस सवाल को वैज्ञानिक मानव प्रजाति के भविष्य के लिए हम मानते हैं इसलिए वर्षों से इस क्षेत्र में शोध किया जा रहा है और पहली बार इसमें कुछ सफलता हासिल हुई है वैज्ञानिकों का कहना है कि चूहे के स्तनों से उन्होंने 168 चूहे पैदा किए सालों तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में रखे जाने के बाद इनसे जापान की एक प्रयोगशाला में एक चुहिया को गर्भवती किया गया और 168 बच्चे पैदा हुए स्पर्म को स्विच करने के लिए जिस स्तर के रेडिएशन की जरूरत होती है जैपनीज एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी के  स्पेस सेंटर में इन्हें उस से 170 गुना ज्यादा रेडिएशन लेवल पर रखा गया अंतरिक्ष में रेडिएशन का स्तर पृथ्वी से ज्यादा होता है यामा नाशी यूनिवर्सिटी के जीव विज्ञानिक तेनु ही को वाह का या मां के नेतृत्व में हुआ या धन साइंस एडवांस नामक पत्रिका में छपा है डाकर डॉक्टर वाकायामा कहते हैं कि अंतरिक्ष में रेडिएशन के में शुक्राणुओं के डीएनए को नुकसान नहीं पहुंचाया ना ही इनकी जनन क्षमता को प्रभावित किया इन शुक्राणु से जन्मे बच्चे उतने ही स्वस्थ हुए जितने पृथ्वी पर जन्मे चूहे के बच्चे हो सकते हैं ना उनके जींस में किसी तरह की खामी पाई गई यहां तक कि उनके बच्चों के बच्चे भी स्वस्थ पैदा हुए वैज्ञानिक समझने की कोशिश कर रहे हैं अंतरिक्ष की परिस्थितियां किस तरह प्रभावित करती हैं एक चिंता यह है कि अंतरिक्ष में रेडिएशन का ज्यादा होना जींस को प्रभावित कर सकता है जीरो ग्रेविटी की परिस्थिति लेकर भी चिंता है कि कहीं वह एंब्रियो  के विकास को प्रभावित ना कर दे  sorce www.dw.de

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मन्त्र विज्ञान अजपा गायत्री और विकार मुक्ति

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तीन तल हुए—एक वाणी में प्रकट हो,
एक विचार में प्रकट हो, 
एक विचार के नीचे अचेतन में हो।
 ऋषि कहते हैं, उसके नीचे भी एक तल है। अचेतन में भी होता है, तो भी उसमें आकृति और रूप होता है। 
उसके भी नीचे एक तल है, महाअचेतन का कहें, जहां उसमें रूप और आकृति भी नहीं होती। वह अरूप होता है। जैसे एक बादल आकाश में भटक रहा है। अभी वर्षा नहीं हुई। ऐसा एक कोई अज्ञात तल पर भीतर कोई संभावित,पोटेंशियल विचार घूम रहा है । 
वह अचेतन में आकर अंकुरित होगा, 
चेतन में आकर प्रकट होगा, 
वाणी में आकर अभिव्यक्त हो जाएगा। ऐसे चार तल हैं।

गायत्री उस तल पर उपयोग की है जो पहला तल है, सबसे नीचे। उस तल पर "अजपा"  का प्रवेश है। 
तो जप का नियम है। अगर कोई भी जप शुरू करें—समझें कि राम—राम जप शुरू करते हैं, या ओम, कोई भी जप शुरू करते हैं; या अल्लाह, कोई भी जप शुरू करते है—तो पहले उसे वाणी से शुरू करें। पहले कहें, राम, राम; जोर से कहें। फिर जब यह इतना सहज हो जाए कि करना न पड़े और होने लगे, इसमें कोई एफर्ट न रह जाए पीछे, प्रयत्न न रह जाए,यह होने लगे; जैसे श्वास चलती है, ऐसा हो जाए कि राम, राम चलता ही रहे, तो फिर ओंठ बंद कर लें।
 फिर उसको भीतर चलने दें। फिर मुख से न बोलें राम, राम; मन मे चलने दे राम, राम।

फिर इतना इसका अभ्यास हो जाए कि उसमें भी प्रयत्न न करना पड़े, तब इसे वहां से भी छोड़ दें, तब यह और नीचे 'डूब जाएगा। 
और अचेतन में चलने लगेगा—राम,राम। आपको भी पता न चलेगा कि चल रहा है, और चलता रहेगा। फिर वहां से भी गिरा दिए जाने की विधियां हैं और तब वह अजपा में गिर जाता है। फिर वहां राम, राम भी नहीं चलता। फिर राम का भाव ही रह जाता है—जस्ट क्लाउडी, एक बादल की तरह छा जाता है। जैसे पहाड़ पर कभी बादल बैठ जाता है धुआ—धुआ, ऐसा भीतर प्राणों के गहरे में अरूप छा जाता है।

उसको कहा है ऋषि ने, अजपा। 
और जब अजपा हो जाए कोई मंत्र, तब वह गायत्री बन गया। अन्यथा वह गायत्री नहीं है।

और क्या है इस अजपा का उपयोग ???
इस अजपा से सिद्ध क्या होगा ??? इससे सिद्ध होगा, विकार— मुक्ति। 
विकारदंडो ध्येय: इस अजपा का लक्ष्य है विकार से मुक्ति।

यह बहुत अदभुत कीमिया है, केमेस्ट्री है इसकी। 
मंत्र शास्त्र का अपना पूरा रसायन है। 
मंत्र शास्त्र यह कहता है कि अगर कोई भी मंत्र का उपयोग अजपा तक चला जाए,तो आपके चित्त से कामवासना क्षीण हो जाएगी, सब विकार गिर जाएंगे। क्योंकि जो व्यक्ति अपने अंतिम अचेतन तल तक पहुंचने में समर्थ हो गया, उसको फिर कोई चीज विकारग्रस्त नहीं कर सकती। क्योंकि सब विकार ऊपर—ऊपर हैं, भीतर तो निर्विकार बैठा हुआ है। हमें उसका पता नहीं है,इसलिए हम विकार से उलझे रहते हैं।

कोई भी मंत्र गायत्री बन जाता है,जब अजपा हो जाए। यही इस सूत्र का अर्थ है अजपागायत्री विकारदंडो ध्येय:।

मन का निरोध ही उनकी झोली है।

वे जो संन्यासी हैं, उनके कंधे पर एक ही बात टंगी हुई है चौबीस घंटे—मन का निरोध, मन से मुक्ति, मन के पार हो जाना। चौबीस घंटे उनके कंधे पर है।

आपने एक शब्द सुना होगा,खानाबदोश। यह बहुत बढ़िया शब्द है। इसका मतलब होता है, जिनका मकान अपने कंधे पर है। खाना—बदोश। खाना का मतलब होता है मकान—दवाखाना—खाना यानी मकान। दोश का मतलब होता है कंधा,बदोश का मतलब होता है, कंधे के ऊपर। जो अपने कंधे पर ही अपना मकान लिए हुए हैं, उनको खानाबदोश कहते हैं—घूमक्कडू लोग, जिनका कोई मकान नहीं है, कंधे पर ही मकान है।

संन्यासी भी अपने कंधे पर एक चीज ही लिए चलता है चौबीस घंटे—मन का निरोध। वही उसकी धारा है सतत श्वास—श्वास की, मन के पार कैसे जाऊं ??? क्योंकि मनातीत है सत्य। मन के पार कैसे जाऊं ???
क्योंकि मनातीत है अमृत। मन के पार कैसे जाऊं ??? 
क्योंकि मनातीत है प्रभु।

जाया जा सकता है। ध्यान उसका मार्ग है। sabhar dev sharma Facebook wall

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बुधवार, 21 जुलाई 2021

स्वस्थ रहने हेतु हेल्थ इंश्योरेंस करवाएं

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आज के बढ़ते युग में करो ना जैसी महामारी और खानपान में बढ़ते बदलाव से बीमारियों का प्रचलन ज्यादा हो गया स्वास्थ्य एक समस्या हो गई है अतः हमें स्वास्थ्य बीमा करा लेना चाहिए तभी हम वैज्ञानिक सभी तकनीकी का फायदा उठाe

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मंगलवार, 20 जुलाई 2021

रेबीज

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 रेबीज या जलांतक (Hydrophobia) दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक है। यह रोग मनुष्य को यदि एक बार हो जाए तो उसका बचना काफी मुश्किल होता है। रेबीज लाइसा वाइरस अर्थात् विषाणु द्वारा होती है और अधिकतर कुत्तों के काटने से ही होती है। परन्तु यह अन्य दाँत वाले प्राणियों जैसे-बिल्ली, बन्दर, सियार, भेड़िया, सूअर इत्यादि के काटने से भी हो सकती है। इन जानवरों या प्राणियों को नियततापी (Warm blooded) कहते हैं। 

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रविवार, 18 जुलाई 2021

सूर्य से हमें ज्योति मिलता है चन्द्रमा से अमृतत्त्व

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श्रीमद्भगवद्गीता का आठवां अध्याय और वृहदारण्यकोपिषद् के छठवें अध्याय के दूसरे ब्राह्मण तथा और भी अनेकों आर्ष-ग्रन्थों के अनुसार  सूर्य-चन्द्र लोक में तो युक्तयोगी को भी जाना पड़ता है शरीर छोड़ने के बाद क्रममुक्ति के क्रम में ।

अच्छा , इनका आध्यात्मिक महत्त्व छोड़कर केवलमेव भौतिक-दृष्टि से भी विचार करे तो सूर्य प्रकाश व चन्द्रमा शीतलता प्रदान करने के बाद भी आपसे बिजली व एसी की भांति बिल नहीं लेते ।

कहते हैं जितनी पृथ्वी है , उससे तिगुणा जल है , किन्तु उस सामुद्रिक जल से क्या प्रयोजन , जो न पीने के काम आये , न स्नान के और  वस्त्र-प्रक्षालनादि के ही !

सूर्य की रश्मियां जब उसी सामुद्रिक-जल को खींचकर मेघमण्डल के फिल्टर में डालती है , और वह जब पुनः धरती पर बरसता है तो पीने-नहाने-वस्त्रादि धोने योग्य होता है ।

धरती के अंदर जाने पर उसी जल को ट्यूबवेल, कूप , चापाकल आदि के द्वारा लोग प्रयोग में लाते हैं ।

कुल मिलाकर सूर्य-चन्द्रमा है तो जीवन है , प्राण है , पृथ्वी है ।  किमधिकम् ये कलियुग के प्रत्यक्ष देवता हैं ।

इसी उपकार को ध्यान में रखकर भी जब सूर्य-चन्द्र ग्रहणादि का अवसर हो , उस समय निद्रा-मैथुन-आलस्यादि को त्यागकर उनके कष्ट-निवृत्त्यर्थ जप-ध्यानादि करना चाहिये ।

जिन्हें यह सब बातें अन्धविश्वास लगते हों ,  चलो ! उनकी तुष्टि के लिए असत्य मानें , तब भी जप-ध्यानादि के करने से क्या हानि है !

किन्तु जब यह बातें पूर्णरूपेण सत्य ही है , तो ग्रहणकाल में टांग-फैलाकर सोने से तो हानि ही हानि है ।
 Sabhar satsang Facebook wall
श्री शंकराचार्य वेद वेदांत विज्ञान

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शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

देवताओं का भौतिक अवतरण

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      श्रीमद्भगवद्गीता की रचना संभवतया ईसवी पूर्व 300 और 300 ईसवी के मध्य में हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा--मैं ही बलिदान और बलि तथा वरदान और पवित्र पौधा हूँ। मैं ही पवित्र शब्द, पवित्र भोजन, पवित्र अग्नि और अग्नि को समर्पित वस्तु भी हूँ। मैं ही ब्रह्माण्ड का रचयिता और ईश्वर का स्रोत भी हूँ। मैं अमर हूँ और मृत्यु भी जो कुछ है, वह मैं ही हूँ और जो नहीं है, वह भी मैं ही हूँ।
      मूर्तियों का विशेष आकार होता है। उनमें मनुष्य या  किसी पशु विशेष के गुण होते हैं, किन्तु हर हालत में वे इंसान से परे किसी अलौकिक शक्ति की प्रतीक हैं जो हमारे सामान्य जीवन से परे किसी दूसरे जगत में रहती हैं।
      मूर्तियों की उत्पत्ति कब हुई और उनके विशेष आकार-प्रकार कहाँ से आये ?--यह अभी तक रहस्यमय है। क्या उन्हें बनाने वालों को उन दैवीय शक्तियों ने स्वप्न में दर्शन दिए थे या कि वे गहन ध्यान से उत्पन्न हुईं ?
      विष्णुधर्मोत्तर पुराण में लिखा है कि सतयुग, त्रेता, द्वापर युगों में लोग देवताओं को अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देख सकते थे। कलियुग में उनकी वह देखने की शक्ति समाप्त हो गयी है। इसीलिए उपासना और ध्यान के लिए निराकार की जगह साकार ईश्वर की मूर्तियां बनाई गई हैं।
      विष्णु संहिता में मूर्तियों के प्रयोजन के बारे में स्पष्ट रूप से उल्लेख आया है : बिना आकार के ईश्वर का ध्यान लगाना कैसे संभव हो सकता है ? उनकी कोई आकृति नहीं तो मस्तिष्क कैसे एकाग्र किया जाएगा ? ध्यान प्रायः ही भटक जाएगा या नींद आ जायेगी। इसलिए बुद्धिमान लोग किसी आकार विशेष पर ध्यान लगाएंगे, यह जानते हुए कि वह वास्तविक नहीं, आरोपित है, काल्पनिक है।
      जाबाल उपनिषद के अनुसार--उपासना आरम्भ करने वालों को मूर्तिया सहारा देती हैं, जबकि योगीगण शिव या अन्य किसी देवता की छवि में नहीं, अपनी आत्मा में उतरते हैं, आत्मा के दर्शन करते हैं। मूर्तियां ऐसे लोगों के लिए बनाई गई हैं जो अज्ञानी से अज्ञानी हैं। अर्थात अज्ञानी से अज्ञानी भी लाभ ले सकते हैं। वेदों में मूर्तियों की कोई अवधारणा नहीं है( न तस्य प्रतिमा अस्ति ) ईश्वर की कोई प्रतिमा नहीं है। लेकिन वैदिक ऋषियों ने देवताओं के विवरण को मूर्तियों के स्थान पर शब्दों में सजाया-संभाला है। अग्नि के बारे में कहा गया है कि उसकी लाल वर्ण की सात जीभें हैं, सात चेहरे और चमकते हुए बाल हैं। इंद्र के पास वज्र है।
      वैदिक ऋषि इस संसार में होने वाली सभी घटनाओं को एक-दूसरे से जुड़ी हुई मानते थे। उनके अनुसार शक्ति और क्रिया तथा प्रतीक और प्रतीकात्मकता में कोई अन्तर नहीं। मनुष्य सत्य ी खोज कर सकता है। उसे सक्रिय भी कर सकता है।
      वैदिक रीतियां और वैदिक विधान वास्तव में सृजन का दर्शन कराते हैं। अग्नि की वेदी में उस विराट पुरुष की सुनहरी आकृति रहती है। उस विराट पुरुष को हवि ( यज्ञ की अग्नि में डाला गया पदार्थ ) देने के लिए यज्ञ से उठता हुआ धुआं उड़कर अंतरिक्ष में फिर समस्त ब्रह्माण्ड में चला जाता है। sabhar shivaram Tiwari Facebook wall
#adyatm websires in hindi

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गुरुवार, 15 जुलाई 2021

छाया पुरुष और छाया शरीर

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन 

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

      प्राणमय कोष सूक्ष्म और स्थूल सत्ता के सन्धि स्थल पर विद्यमान है। उसके एक ओर छाया शरीर है और दूसरी ओर है--स्थूल शरीर। प्राणमय कोष का मूलकेंद्र 'नाभि' है। नाभि पर मन को एकाग्र करने पर प्राणमय कोष से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि जिस जीवित या मृत व्यक्ति के रूप का उस अवस्था में ध्यान करेंगे, उस व्यक्ति का छाया शरीर आपके सामने स्पष्ट रूप से आ जायेगा। इस क्रिया को अनुभवी और परिपक्व लोग अपने सामने इच्छित व्यक्ति के चित्र को भी रखकर करते हैं। इससे सफलता शीघ्र मिलती है। छाया शरीर से कोई भी कार्य कराया जा सकता है। यदि जीवित व्यक्ति है तो उसके छाया शरीर पर अपना मानसिक प्रभाव डालकर उसे अपने मन के अनुकूल भी किया जा सकता है। उसकी रोग-व्याधि भी दूर की जा सकती है और उसकी समस्याएं भी दूर की जा सकती हैं। यदि व्यक्ति मृत है तो उससे अज्ञात रहस्यों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसी को छाया पुरुष-सिद्धि भी कहते हैं। इस सिद्धि के द्वारा किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से तत्काल सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है और कुछ सीमा तक मनोनुकूल कार्य भी कराया जा सकता है।
      काशी के शिवाला घाट पर एक महाशय रहते थे। नाम् था--शशि शेखर पांडेय। सुना था पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे लोगों की आत्माओं से उन्होंने संपर्क किया था। उनके कमरे में पड़े छोटे से तख्त पर कई लोगों के फोटो चिपके थे जिनमें जीवित और मृत दोनों व्यक्तियों के थे--महिलाओं और पुरुषों के भी। उन फोटो के माध्यम से वे महाशय उनके छाया पुरुषों से संपर्क करते थे। एक दिन गुरुदेव श्री अरुण कुमार शर्मा का भी चित्र लेकर चिपका लिया तख्त पर।(यह उन दिनों की बात है जब गुरुदेव की तरुण अवस्था थी। कोई नौकरी भी नहीं थी उनकी। गुरुदेव उनके कमरे में गए तो वह बोले--बन्धुवर ! मिठाई खिलाइये।
       क्यों, किसलिए ?
       कल आपको नियुक्ति पत्र मिलने वाला है।
       गुरुदेव को याद आया कि दो माह पहले केंद्रीय सरकार में एक वरिष्ठ पद के लिए आवेदन किया था। साक्षात्कार भी हो चुका था। नौकरी की आशा कम ही थी। एक प्रकार से भूल ही चुके थे गुरुदेव्।
       बात सच निकली। दूसरे ही दिन मिल गया नियुक्ति-पत्र डाक से। सचमुच छाया सिद्धि का चमत्कार था यह।

जीवित और मृत व्यक्ति के छाया शरीर में अन्तर

      जीवित व्यक्ति के छाया शरीर के ईथरिक कणों में होने वाले कम्पन अति तीव्र होते हैं लगभग एक सेकेण्ड में पचास हज़ार बार जबकि मृत व्यक्ति के शरीर में वे कम्पन एक सेकेण्ड में 30-40 हज़ार बार होते हैं। वायुतत्व के प्रभाव से वे कम्पन कभी कम, कभी अधिक भी होते हैं जिससे छाया शरीर का आकार-प्रकार घटता-बढ़ता रहता है और कभी-,कभी बेडौल-सा हो जाता है। जीवित व्यक्ति के छाया शरीर को 'छाया पुरुष' और मृत व्यक्ति के छाया शरीर को 'छाया शरीर' कहते हैं।
       अघोर मार्गीय साधक छाया पुरुष की ही सिद्धि करते हैं। इसके लिए श्मशान का वातावरण ही छाया पुरुष की सिद्धि के लिए उचित व अनुकूल बताया गया है। इसके कई कारण हैं जिनमें मुख्य कारण है--साधक को अपनी इच्छानुकूल छाया पुरुष का वहाँ मिल जाना। कोई भी छाया पुरुष साधक के बन्धन में अधिक देर तक नहीं रह सकता। वह हमेशा बंधन-मुक्त होने के लिए व्याकुल रहता है ताकि उसे सूक्ष्म शरीर प्राप्त हो जाये और उसके बाद पुनर्जन्म हो जाये। यदि साधक उसे मुक्त नहीं करता है तो वह उसकी ऐसी दुर्गति करता है कि बतलाया नहीं जा सकता। इसलिए अघोरी नए- नए छाया पुरुष की खोज में रहते हैं। 

sabhar shivrama Tiwari Facebook wall

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सोमवार, 12 जुलाई 2021

योग और विज्ञान

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साठ के दशक में योग के सामने कठिन दौर था वैज्ञानिक साबित होने का. क्योंकि अमेरिका के लैब में योग सफल न हुआ तो उसका पश्चिम में प्रवेश निषेध हो जाता. इसी कठिन दौर में हिमालय के एक महान योगी स्वामी राम डॉ एल्मर ग्रीन के बुलावे पर 1969 में अमेरिका जाते हैं.

मैनिन्जर फाउण्डेशन की लेबोरेटरी में उनके योग संबंधी दावों की लंबी जांच पड़ताल चलती है लेकिन स्वामी राम की पराभौतिक शक्तियों के आगे विज्ञान असंभव को संभव मान लेता है. परीक्षण के दौरान उन्होंने16 सेकेण्ड के लिए हृदय गति रोक दी लेकिन वे जिन्दा रहे और सबसे बात करते रहे. उन्होंने अपने हथेली के अलग अलग हिस्से में 11 डिग्री का तापमान अंतर पैदा करके शरीर विज्ञान के असंभव को संभव कर दिखाया.

लेकिन योग का इससे भी बड़ा एक अचंभा उन्होंने कैमरे में कैद किया. और वह था चक्र की शक्ति. शरीर के भीतर षट्चक्रों को विज्ञान कल्पना ही मानता था. लेकिन स्वामी राम ने दावा किया कि वे हर चक्र पर आभामंडल (औरा) पैदा करेंगे जिसे कैमरे में कैद किया जा सकता है. उनके हृदय स्थल (अनाहत चक्र) पर उभरा आभामंडल न सिर्फ कैमरे में कैद हुआ बल्कि विज्ञान के सामने पहली बार योग का षट्चक्र सिद्धांत भी साबित हुआ जो अभी तक विज्ञान में कपोल कल्पना समझा जाता था.

स्वामी राम जैसे महान योगियों के कारण आधुनिक दुनिया में योग ko manyta mili Dr_Abhilasha_Dwivedi Facebook wall

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