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वाटरजेन' नामक कंपनी ने हाल ही में हवा से जल बनाने की तकनीक को विकसित किया है। जिसमें अधिक नमी वाली हवा के तापमान को कम किया जाता है और इसके फलस्वरूप हवा में मौजूद जल के अणु नीचे गिरने लगते हैं और इन्हें एकत्रित कर लिया जाता है।
कंपनी के सहायक सीईओ ए कोहावी के अनुसार ''हवा के इस तंत्र में से गुजारने के पर सिस्टम हवा में की आर्द्रता को कम करने का काम करता है और एकत्रित जल को एक विशेष टैंक में एकत्रित कर लिया जाता है।''
आगे उन्होंने बताया कि ''इस जल को एक बड़े फिल्टरेशन तंत्र से गुजारा जाता है, जिसके कारण इसमें होने वाली संभावित सूक्ष्मजैव या रसायन संबंधी अशुद्धियां अलग हो जाती हैं। इसके बाद जल को एक विशाल टैंक में रखा जाता है, जहां जल की शुद्धता के सारे पैमानों का ध्यान रखा जाता है।
''
हालांकि इस तरह के यंत्र अन्य कंपनियों द्वारा भी बनाए जा चुके हैं, जिनका उपयोग औद्योगिक और घरेलू कार्यों में किया जाता है। लेकिन 'वाटरजेन' का दावा है कि उनके द्वारा विकसित किए गए इस यंत्र में कम से कम ऊर्जा का उपयोग किया जाएगा।
आगे कोहावी ने बताया कि ''हालांकि कुछ अन्य कंपनियां भी इसका दावा करती हैं और यह इतना मुश्किल कार्य नहीं है कि हवा से जल के अणु एकत्रित कर लिए जाएं। लेकिन मुद्दा यह है कि कम से कम ऊर्जा की खपत में इस कार्य को अंजाम दिया जाए।''
आगे उन्होंने बताया कि जब हम इस कार्य को और अधिक कुशलता से कर पाऐंगे तो वास्तव में पीने के जल की समस्या का इससे अच्छा निवारण कोई दूसरा नहीं हो सकता कि वायु से ही जल बना लिया जाए।
यह यंत्र एक दिन में 250-800 लीटर जल निर्मित कर सकता है जिसकी मात्रा तापमान और आर्द्रता के आधार पर भिन्न हो सकती है।
कंपनी ने प्रारंभ में इस तकनीक का उपयोग आईडीए या 'इजराइल डिफेंस फोर्स' के लिए किया। और वर्तमान में 'वाटरजेन' कंपनी सात देशों की रक्षा सेनाओं को लिए सेवा प्रदान कर रही है। लेकिन अब कंपनी इस आम लोगों के लिए भी बाजार में उपलब्ध कराना चाहती है।
कोहावी ने आगे बताया कि कंपनी इस प्रोडक्ट को कई देशों जैसे भारत के बाज़ार में उतारना चाहता है, जहां पीने के शुद्ध जल की समस्या है। इससे वहां के लोगों को शुद्ध जल के लिए वाटर सप्लाई पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। आगे कोहावी बताते हैं कि ''यह सिस्टम मात्र 1.5 रुपए में एक लीटर शुद्ध जल निर्मित करेगा जबकि वाटर बॉटल खरीदने पर आप एक लीटर शुद्ध जल के लिए 15 रुपए चुकाते हैं। (एजेंसियां) sabhar webdunia.com
प्रोटीन शेक पीना कितना फ़ायदेमंद, कितना नुक़सानदेह
ब्रिटेन में प्रोटीन शेक पीने के कारण एक भारतीय मूल के किशोर की मौत की वजह को लेकर आई एक ख़बर ने नई बहस छेड़ दी है.
सवाल उठ रहे हैं कि प्रोटीन सप्लिमेंट्स पर लगे लेबल पर चेतावनी लिखी होनी चाहिए या नहीं.
दरअसल, लंदन में रहने वाले 16 साल के रोहन की तबीयत 15 अगस्त 2020 को अचानक बिगड़ गई थी और उसके तीन दिन बाद उन्होंने अस्पताल में दम तोड़ दिया था.
क़रीब पौने तीन साल तक चली गहन पड़ताल के बाद जांचकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि रोहन की मौत उस प्रोटीन शेक के कारण हुई थी, जो उनके पिता ने वज़न बढ़ाने के लिए दिया था.
जांचकर्ताओं के मुताबिक़, रोहन को ऑर्निथीन ट्रांसकार्बामिलेज़ (OTC) डेफ़िशिएंसी नाम की एक आनुवांशिक समस्या थी, जिसकी वजह से प्रोटीन शेक लेने के बाद उनके शरीर में अमोनिया जानलेवा स्तर पर पहुंच गया था.
जांचकर्ता ने अदालत में कहा कि उनकी राय में प्रोटीन सप्लिमेंट के लेबल पर ये चेतावनी छापनी चाहिए.
उनके अनुसार, ''भले ही OTC डेफ़िशिएंसी आम समस्या नहीं है लेकिन जिन्हें यह डिसऑर्डर है उनके लिए अतिरिक्त प्रोटीन लेना ख़तरनाक हो सकता है.''
इस ख़बर के बाद ब्रिटेन ही नहीं पूरी दुनिया में प्रोटीन सप्लिमेंट्स को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं और कहा जा रहा है कि प्रोटीन सप्लिमेंट के लेबल पर इस तरह की चेतावनी हो क्योंकि युवाओं, ख़ासकर जिम जाने वालों में प्रोटीन शेक ख़ासा लोकप्रिय है.
प्रोटीन ज़रूरी क्यों है?
प्रोटीन एक ज़रूरी पोषक तत्व है. मांसपेशियां बनाने और उनकी रिपेयर में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है.
प्रोटीन हड्डियों और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाता है साथ ही दिल, दिमाग़ और त्वचा को स्वस्थ रखता है.
इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रीसर्च (ICMR) के अनुसार, भारतीयों के लिए रोज़ अपने वज़न के हिसाब से 0.8 से 1 ग्राम प्रति किलो प्रोटीन काफ़ी है और आपके भोजन का एक चौथाई हिस्सा प्रोटीन होना चाहिए.
यह शरीर के लिए ज़रूरी प्रोटीन की मानक मात्रा है. उम्र, सेहत, शारीरिक श्रम और व्यायाम के स्तर के आधार पर हर किसी की प्रोटीन की ज़रूरत अलग होती है लेकिन अधिकतर लोगों को सही मात्रा का पता ही नहीं होता.
अंडे, दूध, दही, मछली, दाल, मीट, सोया वगैरह प्रोटीन से भरपूर होते हैं और संपन्न देशों के ज्यादातर युवाओं को इसकी ज़रूरी मात्रा अपने खाने से ही मिल जाती है.
डाइट से न मिल पाने वाले प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए प्रोटीन सप्लिमेंट्स इस्तेमाल किए जाते हैं.
ज्यादातर प्रोटीन सप्लिमेंट पाउडर के रूप में उपलब्ध होते हैं जिनका मुख्यत: शेक बनाकर सेवन किया जाता है.
प्रोटीन पाउडर अलग-अलग स्रोतों से लिए गए प्रोटीन का पाउडर होता है. यह प्रोटीन पाउडर, आलू, सोयाबीन, चावल और मटर जैसे पौधों से भी लिया जाता है और अंडों या दूध से भी.
कितना ख़तरनाक है प्रोटीन सप्लिमेंट लेना?
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज में कार्यरत डॉक्टर समीर जम्वाल जीव रसायन विभाग में एमडी हैं. वह बताते हैं, “अगर आप 50 किलो के हैं तो 50 ग्राम प्रोटीन रोज़ लेने में कोई समस्या नहीं है.''
वह बताते हैं कि प्रोटीन को पचाने के बाद बनने वाले अतिरिक्त अमोनिया को शरीर यूरिया में बदल देता है जो पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाता है.
मगर कई लोगों के शरीर में अमोनिया को यूरिया में बदलने वाले एंज़ाइम नहीं होते यानी उन्हें यूरिया साइकल डिसऑर्डर होता है.
डॉक्टर समीर बताते हैं कि इसका नुक़सान ये होता है कि शरीर में अमोनिया का स्तर बढ़ जाता है जो दिमाग़ के लिए बहुत हानिकारक होता है.
वे बताते हैं कि ये यूरिया डिसऑर्डर अलग-अलग तरह के होते हैं और जिन लोगों में इस तरह की समस्या होती है उनके लिए अधिक प्रोटीन लेना ख़तरनाक हो सकता है.
डॉक्टर मनीष बताते हैं कि बहुत से लोग ऐसे हैं जो नफ़ा-नुक़सान जाने बिना सप्लिमेंट लेना शुरू कर देते हैं, जबकि उन्हें ज़रूरत ही नहीं होती.
वे कहते हैं, “बॉडी बिल्डिंग का तब क्या फ़ायदा जब आप स्वस्थ न हों. आपने देखा होगा कि जिम जाने वाले कई लोगों को कार्डिएक अरेस्ट हुए हैं. अच्छी डील-डौल ही अच्छे स्वास्थ्य का पैमाना नहीं होती. सबसे ज़रूरी है संतुलित आहार.”
वहीं डॉक्टर समीर जम्वाल प्रोटीन सप्लिमेंट से जुड़े एक बड़े ख़तरे के बारे में आगाह करते हैं. यह ख़तरा है- प्रोटीन सप्लिमेंट में हेवी मेटल्स की अशुद्धियां.
डॉक्टर जम्वाल बताते हैं, “आमतौर पर जिम जाने वाले लोग दूध से बनने वाले वे प्रोटीन (Whey Protein) को इस्तेमाल करते हैं. अगर फ़ैक्ट्री में सावधानी न बरती जाए तो स्रोत से प्रोटीन को अलग करने प्रक्रिया में लेड, आर्सेनिक और मर्क्युरी जैसे हेवी मेटल्स मिलने का ख़तरा रहता है. इन हेवी मेटल्स को शरीर बाहर नहीं निकाल पाता और किडनी और लीवर जैसे अंगों को नुक़सान पहुंचता
प्रोटीन सप्लिमेंट का बाज़ार
भारत में प्रोटीन और अन्य सप्लिमेंट्स की मांग तेज़ी से बढ़ रही है.
आईएमएआरसी (IMARC) के अनुसार, 2022 में भारत में डायटरी सप्लिमेंट्स का बाजार लगभग 436 अरब रुपये का था जो 2028 तक क़रीब 958 अरब रुपये का हो जाएगा.
इसमें बड़ा हिस्सा प्रोटीन सप्लिमेंट्स का है. ऐसे में मुनाफ़े के लिए नकली और मिलावटी प्रोटीन सप्लिमेंट का कारोबार भी चल निकला है.
पश्चिमी दिल्ली में सप्लिमेंट्स और हेल्थ केयर उत्पादों का शोरूम चलाने वाले अमन चौहान बताते हैं कि मिलावटी और नकली उत्पादों से बचना ज़रूरी है.
वे कहते हैं, “स्थापित कंपनियों द्वारा अधिकृत स्टोर से ही सप्लिमेंट खरीदने चाहिए. प्रॉडक्ट के पैकेज पर हॉलमार्क स्टैम्प, इंपोर्टर का टैग चेक करें और जीएसटी बिल ज़रूर लें.”
चेतावनी लगाने से कुछ बदलेगा?
अभी ब्रिटेन में इस बात को लेकर फ़ैसला नहीं हुआ है कि वहां प्रोटीन सप्लिमेंट के लेबल पर कोई चेतावनी देनी है या नहीं.
लेकिन क्या केवल चेतावनी देना काफ़ी होगा?
क्योंकि इससे जुड़ा एक सवाल ये भी है कि भारत में अभी जेनेटिक मैपिंग करवाने का चलन नहीं है जिससे यह पता चल सके कि किसी को कौन सा जेनेटिक डिसऑर्डर है और उसे किन चीज़ों के सेवन से समस्या हो सकती है.
ऐसे में डॉक्टरों के पास अधिकतर मामले तभी आते हैं, जब किसी को उस डिसऑर्डर के कारण गंभीर समस्या हो जाए.
फिर लेबल पर चेतावनी देना शायद उतना कारगर साबित न हो.
डॉक्टर बताते हैं कि सप्लिमेंट्स लेने की बजाए लोगों को अपनी खुराक का ख़्याल रखना चाहिए और संतुलित आहार लेना चाहिए sabhar BBC.com https://www.bbc.com
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