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शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

Quantum computers

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Quantum computers aren’t the next generation of supercomputers—they’re something else entirely. Before we can even begin to talk about their potential applications, we need to understand the fundamental physics that drives the theory of quantum computing. (Featuring Scott Aaronson, John Preskill, and Dorit Aharonov.) For more, read "Why Quantum Computers Are So Hard to Explain": https://www.quantamagazine.org/why-is.. sabhar.

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हमारा आंख कैसे काम करता है

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नमस्कार दोस्तों.......

स्वागत है आपका The Science News चैनल में। दोस्तों आज की इस वीडियो मे मैंने आपको हमारे आंख के बारे में बताया है कि हमारा आंख कैसे काम करता है। कम समय में मैंने आपको सही जानकारी देने की कोशिश की है इसलिए इस वीडियो को पूरा देखें।


वीडियो अच्छा लगे तो please इसे LIKE कर दे और इस वीडियो से रिलेटेड आपका कोई सुझाव, समस्या या जानकारी के लिए हमें COMMENT करके बताएं। इस विडियो को SHERE करे ताकि और भी लोग इसके बारे में जान सके और हमारे चैनल को SUBSCRIBE कर ले ताकि आगे भी मैं आपके लिए इससे भी अच्छी वीडियो ला सकू.......धन्यवाद। sbhar the science news chhanel

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जैव प्रौद्योगिकी विभाग

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) पिछले 30 वर्षों में आधुनिक जीव विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी में विकास के लिए एक नई गति प्रदान की है.. विभाग ने निरंतर इस क्षेत्र से उद्योग को और समृद्ध करने की दिशा में काम किया है। एक तरह से कहा जाए तो विभाग ने उद्योग के विकास को सुविधाजनक बनाने के लिए निरंतर सहायता प्रदान की है.. यही वजह है कि कृषि, स्वास्थ्य देखभाल, पशु विज्ञान, पर्यावरण और उद्योग के क्षेत्रों में जैव प्रौद्योगिकी के विकास और आवेदन में महत्वपूर्ण उपलब्धियां रही हैं।आज भारत दुनिया के शीर्ष 12 बायोटेक स्थलों में से एक है और एशिया प्रशांत क्षेत्र में तीसरे स्थान पर है। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (यूएसएफडीए) अनुमोदित पौधों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या भारत में है। यूएसए के बाद भारत का ही नंबर आता है। भारत रिकांबिनैट हेपेटाइटिस बी टीके का भी सबसे बड़ा उत्पादक है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय (डीबीटी )की दृष्टि और रणनीति "जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करना, भविष्य की प्रमुख सटीक उपकरण की बदौलत जैव प्रौद्योगिकी को नया आकार देना और गरीबों के कल्याण के लिए विशेष रूप से सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने या कहें गरीबों के कल्याण की दिशा में काम करना है"

अधिक जानकारी के लिए कृपया http://www.dbtindia.nic.in/ पर जाएं। ।

माईगोव पर डीबीटी , लोगों को विभाग के साथ जुड़ने और जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर योगदान करने के लिए भी अवसर दे रहा है ताकि इससे विभाग और सशक्त बन सके sabhar my gov.in

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गुरुवार, 5 अगस्त 2021

मंत्र-विधियाँ क्यों नहीं करते हैं काम

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आपने अक्सर सत्संग में सुना होगा, रामायण, महाभारत या वेदों आदि में पढ़ा होगा कि प्राचीन काल में तपस्वी लोग मंत्रों की शक्ति से जो चाहे हासिल कर लेते थे। वे जिस चीज का आह्वान करते थे, उसे तुरंत पा लेते थे।

आज भी आप जब शारीरिक या आर्थिक रूप से परेशान होते हैं, और किसी ज्योतिषी के पास जाते हैं, तो वह क्या करता है। जन्म पत्रिका देखने के बाद पीड़ित ग्रह की शांति के लिए कुछ उपाय बता देता है और कुछ मंत्रों का जाप करने के लिए कहता है।

ऐसे में कई बार लोग सवाल करते हैं कि उन्होंने मंत्रों का जाप तो किया, लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिली। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जो मंत्र प्राचीन काल में सिद्ध थे, उनका प्रभाव आज कम दिखता है या नहीं दिखता है। मंत्रों की शक्ति प्रभावी क्यों नहीं होती है।

आज हम आपको इसका सबसे बड़ा राज बताने जा रहे हैं कि मंत्रों की शक्ति आखिर काम कैसे करती है। दरअसल, आज लोग मंत्रों को जाप करते समय सिर्फ मुंह से बोलते रहते हैं। उसमें उनका मन और आत्मा नहीं शामिल होती है।

मंत्र पढ़ते या जपते समय आधा ध्यान घर के काम में लगा होता है और कई बार तो लोग मंत्रों का जाप करते हुए घर की साफ सफाई भी कर देते हैं, गाड़ी भी चला लेते हैं। उन्हें लगता है कि पंडित ने जपने के लिए कहा था और यह किसी काम को करते हुए भी तो किया जा सकता है।
मगर, यह गलत तरीका है। मान लीजिए आपके घर में अंधेरा है और आप जीरो वॉट का बल्ब लगाते हैं, तो कितनी रोशनी मिलेगी? फिर आप कहेंगे बल्ब तो जला दिया है, लेकिन रोशनी तो आ ही नहीं रही है। यही तो आप मंत्रों को जपते हुए कर रहे हैं। जीरो वॉट के बल्ब की तरह सिर्फ मुंह से मंत्र का उच्चारण करते जा रहे हैं। खुद ही सोचिए क्या वह फलीभूत होंगे।

दूसरा तरीका है, मन से जाप करने का। एक जगह ध्यान लगाकर बैठ जाएं। आपको विचलित करने वाली कोई चीज मोबाइल, किसी तरह का शोर नहीं हो। मंत्र को पूरे मनोयोग से ध्यान केंद्रित करते हुए जपें। जब मन की शक्ति शामिल होगी, तो यह 10 वाट के बल्ब की तरह रोशनी देगी। आपको इसका फायदा होता दिखेगा।

तीसरा तरीका है आत्मा से मंत्रों का जप करना। यह 100 वॉट का बल्ब है, जो पूरे कमरे को रोशनी से भर देगा। क्योंकि इसमें आपका शरीर यानी मुंह से मंत्रों का उच्चारण हो रहा होगा, मन यानी ध्यान में भी आपके मंत्र होंगे और आत्मा यानी आपके शरीर के सातों चक्र, रोम-रोम उसका उच्चारण कर रहा होगा, जैसे प्राचीन काल में लोग करते थे। अब बताइए 100 वॉट का बल्ब जलेगा, तो क्या मंत्रों की शक्ति आपके जीवन के अंधकार को दूर नहीं कर देगी।

मंत्र तो वही थे, वही रहेंगे, लेकिन उन्हें जपने और सिद्ध करने में आप कितनी ऊर्जा लगाते हैं। इससे तय होता है कि आपको उसका फायदा कितना मिल रहा है। पहले तरीके से मंत्र जपने से तो बेहतर है कि आप न ही करें क्योंकि इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा।

यह बिल्कुल टेप रिकॉर्डर की तरह है, जिसमें आपके मन ने मंत्र बोलने की फीडिंग कर ली है और जैसे आप बाइक या कार चलाते हुए ध्यान नहीं देते हैं और कार चलती रहती है, वैसे ही मंत्रों की शक्ति को बढ़ाते नहीं है। दिमाग की प्रोग्रामिक के चलते मंत्र मुंह से निकलते रहते हैं।

विधियां काम क्यों नहीं करती ?
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विधियां जीवंत है, विधियां सदगुरू बनाते हैं, बुद्ध बनाते हैं। और उन्होंने प्रयोग करके बनाई है। उन्होंने जिस विधि से यात्रा की है, और पहुँचे हैं, वे उसी विधि की वे चर्चा करते हैं। 

फिर हमेशा प्रश्न उठता है कि विधियां काम क्यों नहीं करतीं ? सारा जीवन विधि प्रयोग में ही निकल जाता है !  लोगों को हमने सारा जीवन साधना करते हुए देखा है, ध्यान करते हुए देखा है, और वे वहीं के वहीं हैं, कहीं नहीं पहुँचे है, उल्टे और कलह से भर गए हैं। उनमें पाखंड पैदा हो गया है, उन्हें क्रोध भी आता है और बाद में वे बहुत पश्चाताप में जलते भी हैं कि मैं संन्यासी या साधक होते हुए भी क्रोध से मुक्त नहीं हो पा रहा हूँ !

विधि काम न करने के पीछे बहुत से कारण संभव है। पहला और सबसे बड़ा कारण है अपने साधक होने का अहंकार, कि मैं साधक या ध्यानी! इसमें दूसरे के प्रति, जो धार्मिक नहीं हैं, उनके प्रति निंदा का भाव भी आ जाता है कि कुछ नहीं कर रहे हैं, नर्क में जाएंगे। हम दिन रात अध्यात्म और ज्ञान की चर्चा करते रहते हैं, अपनी साधना की चर्चा करते रहते हैं, यानी बीज को बोकर रोज - रोज खोदकर देखते हैं कि उगा या कि नहीं! और ध्यान का बीज जीवन भर नहीं उग पाता। 

अपनी प्रेमिका के विषय में हम किसी को बताते नहीं हैं और भगवान् से प्रेम है यह बात हम ढोल पीटकर कहना चाहते हैं। ओशो कहते हैं कि दांया हाथ जो काम करे, वह बांए हाथ को भी पता नहीं चलना चाहिए। साधना की चर्चा करने से जिन अनुभवों से हम गुजरते हैं वे अनुभव दोबारा घटित नहीं होते, उन्हें कहना नहीं है, सिर्फ स्मरण में रखना है, ताकि वे गहरे जा सके।  इसलिए सधना में गोपनीयता बहुत आवश्यक है। 

दूसरा कारण है झूंठ जीवन जीना। हम सुबह से शाम तक सिर्फ झूंठ बोलते हैं। दूसरों से भी और अपनों से भी। एक झूंठ को छुपाने के लिए दूसरा झूंठ और तीसरा झूंठ, इस तरह हम अपने ही बनाए झूंठ के जाल में उलझ कर मुसीबत में पड़ते हुए तनाव से भर जाते हैं। और तनाव के कारण हम विधि प्रयोग में असमर्थ हो जाते हैं। 

तीसरा कारण है संकल्प की कमी। हममें संकल्प बिल्कुल भी नहीं है। हमारी छोटी-छोटी आदतें ही हम नहीं बदल पाते! हर गलती को बार - बार दोहराते रहते हैं। आज जिस बुरी आदत को छोड़ने का संकल्प लेते हैं, कल तक उस पर टिकना मुश्किल हो जाता है, कल और अगले कल पर टाल देते हैं कि अभी कहां जीवन निकला जा रहा, कल देख लेंगे ! 

चौथा है धैर्य की कमी। हममें धैर्य तो है ही नहीं! हमारा जीवन इतना तेजी से भागा जा रहा है कि हमें आज और अभी ही परिणाम चाहिए ! यदि हमारा शरीर अस्वस्थ हो, हमें बुखार हो, तो हमें पूरी तरह से स्वास्थ्य होने में एक से दो सप्ताह लगते हैं जबकि ध्यान तो शरीर के साथ ही चेतना का भी स्वास्थ्य होना है ! और शरीर तो अभी बिमार हुआ है, चेतना तो जन्मों से बिमार है ! उसके लिए तो हमें प्रतिक्षा करनी पड़ेगी और धैर्य होगा तो ही हम प्रतिक्षा कर पाएंगे। 

यह प्रतिक्षा पूरी हो इसके लिए हमें धैर्य रखना होगा। कहने सुनने में यह बात बहुत अच्छी लगती है कि "धैर्य" रखना चाहिए... लेकिन हम धैर्य रख नहीं पाते ? कैसे रखें धैर्य?

धैर्य हमारे जीवन में उतर सके इसके लिए हमें स्वीकार भाव बढ़ाना होगा। छोटी-छोटी बातें हम स्वीकार नहीं कर पाते हैं, जो हमें तनाव देकर हमारे स्वभाव में चिड़चिड़ापन घोलती है। जिस चीज की जरूरत हमें थी ही नहीं, वह चीज हम मंहगे दामों में बाजार से खरीद लाते हैं, लेकिन दो से पाँच रूपयों के लिए सब्जी वाले से, फेरी वाले से या फिर बस कंडक्टर से झिक - झिक करते हैं। 

यदि हमें धैर्य को अपने जीवन में प्रवेश देना है तो स्वीकार भाव बढ़ाना होगा। जितना स्वीकार भाव बढ़ेगा उतना ही हममें धैर्य का अवतरण होना शुरू हो जाएगा। स्वीकार भाव होगा तो मन में नये तनाव, नयी ग्रंथियां इकठ्ठा नहीं होगी और पुरानी ग्रंथियों को हम रेचन करके से बाहर निकाल देंगे। अतः जैसे - जैसे निर्ग्रंथ होते जाएंगे, वैसे - वैसे धैर्य के साथ ध्यान का प्रवेश हममें होता जाएगा।

पांचवां है विधि में सत्यता का अभाव। कोई भी विधि निरंतरता की मांग करती है। ताकि आगे की विधि में पहुंचा जा सके। बीच में यदि हम विधि से हटते हैं तो निश्चय ही गत्यात्मकता का बना रहना मुश्किल है, हम फिर - फिर पीछे लौट आते हैं यानी चार कदम बढ़ते हैं और दो कदम फिर पीछे हट जाते हैं। इस तरह हम चलते भी जाते हैं और रूकते भी जाते हैं। 

छठा है विधि के चरणों को पूरा नहीं करना यानी अपने को पूरा नहीं देना, कुछ बचा लेना। हम विधि प्रयोग करते हैं लेकिन सारे चरणों को पूरी शक्ति और संकल्प से पूरा नहीं करते। और जब तक हम अपना पूरा सौ प्रतिशत नहीं देंगे तब तक विधि काम नहीं करेगी। हममें इतनी त्वरा, इतना संकल्प हो कि हम स्वयं को विधि के हवाले कर सकें, पूरी ताकत, पूरी शक्ति लगा सकें जैसे कोई छुरा लेकर पीछे दौड़ रहा है और हम अपने को बचाने के लिए पूरी शक्ति लगाकर भाग रहे हैं। 

इस तरह धीरे-धीरे विधि से हमारा भरोसा ही उठने लगता है है, हमारी संकल्प शक्ति और भी क्षीण होने लगती है और ध्यान साधना, कुंडलिनी, तीसरी आँख , अचेतन में जाना यह सब बातें कपोल कल्पना लगने लगती है।

सातवां कारण है अपनी विधि न चुन पाना। यदि हम मोटे तौर पर विधियों को बांटें तो दो तरह की ध्यान विधियां हैं, पहली है सक्रिय विधि और दूसरी है निष्क्रिय विधि। सक्रिय विधि वह है जिसमें हमें कुछ करना होता है मसलन श्रम, व्यायाम, प्राणायाम और निष्क्रिय विधि वह है जिसमें कुछ भी नहीं करना है, शरीर को पूरी तरह से विश्राम में ले जाना है। सक्रिय विधि प्राथमिक है, पहले करनी होती है और निष्क्रिय विधि बाद में यानी सक्रिय विधि से गुजरकर ही निष्क्रिय विधि में प्रवेश किया जा सकता है।

शरीर जब तक श्रम नहीं करेगा, पसीना नहीं निकालेगा, अपने को थकाएगा नहीं तब तक विश्राम को उपलब्ध नहीं हो सकेगा। क्योंकि निष्क्रिय विधि के लिए शरीर का विश्राम में जाना बहुत जरूरी है। शरीर पूरी तरह से विश्राम में होगा यानी कोई हलचल नहीं, पूरी शांति। शरीर के तल पर कोई तनाव नहीं और मन के तल पर भी कोई तनाव नहीं। तभी शरीर विश्राम में जाएगा और निष्क्रिय विधि में प्रवेश कर पाएगा। 

परेशानी यहीं से शुरू होती है। सक्रिय विधि हम करते नहीं हैं और सीधे निष्क्रिय विधि प्रयोग करना शुरू कर देते हैं। जब तक हम सक्रिय विधि में श्रम नहीं करेंगे तब तक हम निष्क्रिय विधि में विश्राम को उपलब्ध नहीं हो सकते।

हम सीधे निष्क्रिय विधि प्रयोग करते हैं और उसमें सफल हो नहीं पाते, हम शरीर और मन दोनों तलों पर अशांत होते हैं । शरीर विरोध करता है, कहीं खुजली चलती है, कहीं चींटी काटती है, भाव उठते हैं, विचार घेरे रहते हैं। जबकि निष्क्रिय विधि में पैंतालिस मिनट से एक घंटे तक हमें शांत रहना है, कोई भाव नहीं, कोई विचार नहीं, तभी ध्यान में प्रवेश होगा। 

अतः निष्क्रिय विधि से पहले हमें सक्रिय विधि से गुजरना होगा, क्योंकि सक्रिय विधि ध्यान का पहला चरण है यानी सक्रिय विधि हमें निष्क्रिय विधि में प्रवेश करने के लिए तैयार करती है। sabhar dev sharma Facebook wall
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बुधवार, 4 अगस्त 2021

आविष्कारों के लिए पेटेंट low

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 पेटेंट आविष्कारों के लिए दिया जाता है। ‘आविष्कार’ का अर्थ उस प्रक्रिया या उत्पाद से है, जो कि औद्योगिक उपयोजन (Industrial application) के योग्य है। अविष्कार नवीन एवं उपयोगी होना चाहिये तथा इसको उस समय की तकनीक की जानकारी में अगला कदम होना चाहिए। यह आविष्कार उस कला में कुशल व्यक्ति के लिए स्पष्ट (Obvious) भी नहीं होना चाहिये।

आविष्कार को भारत के पेटेंट अधिनियम की धारा 3 के प्रकाश में भी देखा जाना चाहिये। यह धारा परिभाषित करती है कि क्या आविष्कार नहीं होते हैं। किसी बात को आविष्कार तब तक नहीं कहा जा सकता है जब तक वह नवीन न हो। यदि किसी बात का पूर्वानुमान किसी प्रकाशित दस्तावेज के द्वारा किया जा सकता था या पेटेंट आवेदन के प्रस्तुत करने के पूर्व विश्व में और कहीं प्रयोग किया जा सकता था तो इसे नवीन नहीं कहा जा सकता। यदि कोई बात सार्वजनिक क्षेत्र में है या पूर्व कला के भाग की तरह उपलब्ध है तो उसे भी आविष्कार नहीं कहा जा सकता। भारत देश में परमाणु उर्जा से सम्बन्धित आविष्कारों का पेटें‍ट नहीं कराया जा सकता है।sabhar vikipidia

Ssabhar

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Live Basic Arthroscopic Rotator cuff repair Surgery by Dr Prathmesh

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This video focuses on ABC of rotator cuff repair. Learn how to do a subacromial arthroscopy and rotator cuff repair of small rotator cuff tear. This video has been made keeping into consideration the needs and requirements of a patient who plans to start doing arthroscopic rotator cuff repairs.

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मंगलवार, 3 अगस्त 2021

मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक

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मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक
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मरने के बाद व्यक्ति की तीन तरह की गतियां होती हैं- 1. उर्ध्व गति, 2. स्थिर गति और 3.
अधो गति। व्यक्ति जब देह छोड़ता है तब सर्वप्रथम वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाता है।
सूक्ष्म शरीर की गति के अनुसार ही वह भिन्न-भिन्न लोक में विचरण करता है और अंत में
अपनी गति अनुसार ही पुन: गर्भ धारण करता है।
आत्मा के तीन स्वरूप माने गए हैं- जीवात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा। जो भौतिक शरीर में
वास करता है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासनामय शरीर में निवास होता है
तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। तीसरा स्वरूप है सूक्ष्म स्वरूप। मरने के बाद जब आत्मा सूक्ष्मतम
शरीर में प्रवेश करता है, तब उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।
कमजोर सूक्ष्म शरीर से ऊपर की यात्रा मुश्किल हो जाती है तब ऐसा व्यक्ति नीचे के लोक में
स्वत: ही गिर जाता है या वह मृत्युलोक में ही पड़ा रहता है और दूसरे जन्म का इंतजार करता है।
उसका यह इंतजार 100 वर्ष से 1000 वर्ष तक की अवधि का भी हो सकता है।
पहले बताए गए आत्मा के तीन स्वरूप से अलग- 1. पहली विज्ञान आत्मा, 2. दूसरी महान
आत्मा और 3. तीसरी भूत आत्मा।
1. विज्ञान आत्मा वह है, जो गर्भाधान से पहले स्त्री-पुरुष में संभोग की इच्छा उत्पन्न
करती है, वह आत्मा रोदसी नामक मंडल से आता है, उक्त मंडल पृथ्वी से सत्ताईस हजार मील
दूर है।
2. महान आत्मा वह है, जो चन्द्रलोक से अट्ठाईस अंशात्मक रेतस बनाकर आता है, उसी 28
अंश रेतस से पुरुष पुत्र पैदा करता है। 28 अंश रेतस लेकर आया महान आत्मा मरने के बाद
चन्द्रलोक पहुंच जाता है, जहां उससे वहीं 28 अंश रेतस मांगा जाता है। चंद्रलोक में वह
आत्मा अपने स्वजातीय लोक में रहता है।
3. भूतात्मा वह है, जो माता-पिता द्वारा खाने वाले अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड
में प्रवेश करता है। उससे खाए गए अन्न और पानी की मात्रा के अनुसार अहम भाव शामिल
होता है, इसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते हैं। यह भूतात्मा पृथ्वी के
अलावा किसी अन्य लोक में नहीं जा सकता है।

वे लोग जो जिंदगीभर क्रोध, कलह, नशा, भोग-संभोग, मांसभक्षण आदि धर्म-विरुद्ध निंदित
कर्म में लगे रहे हैं मृत्यु के बाद उन्हें अधो गति प्राप्त होती। जिन्होंने थोड़ा-बहुत धर्म
भी साधा है या जो मध्यम मार्ग में रहे हैं उन्हें स्थिर गति प्राप्त होती है। और जिन्होंने
वेदसम्मत आचरण करते हुए जीवनपर्यंत यम-नियमों का पालन किया है उन्हें उर्ध्व गति प्राप्त
होती है।
अधो गति वाला आत्मा कीट-पतंगे, कीड़े-मकौड़े, रेंगने वाले जंतु, जलचर प्राणी और पेड़-पौधे
आदि योनि में पहुंच जाता है। स्थिर गति वाला आत्मा पशु, पक्षी और मनुष्य की योनि में पहुंच
जाता है लेकिन जो उर्ध्व गति वाला आत्मा है उनमें से कुछ पितरों के लोक और कुछ देवलोक
पहुंच जाता है।
जो आत्मा अपने आध्यात्मिक बल के द्वारा देवलोक चला जाता है वह देवलोक में रहकर
सुखों को भोगता है। यदि वहां भी वह देवतुल्य बनकर रहता है तो देवता हो जाता है। लेकिन
यदि उनमें राग-द्वेष उत्पन्न होता है तो वह फिर से मृत्युलोक में मनुष्य योनि में जन्म ले
लेता है।
लेकिन उर्ध्व गति प्राप्त कुछ आत्माएं अपने आध्यात्मिक बल की शक्ति से पितर और
देवलोक से ऊपर ब्रह्मलोक में जाकर सदा के लिए जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
यही मोक्ष है।

-संदर्भ वेद-पुराण।
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