शवासन

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शरीर और मन से तनाव दूर कर साक्षी में प्रवेश करवाने वाला अद्भुत आसन - 

शवासन योग का आरंभिक चरण है। शवासन हमारे शरीर को उस स्थिति में प्रवेश करवाता है जिस स्थिति में ध्यान आसानी से घटित हो सके।

शवासन का मतलब है कि शव या मुरदा जिस आसन या स्थिति में होता है, अपने शरीर को उस स्थिति में ले जाना। जिस भांति मुरदा न श्वास लेता, न कोई हलचल करता, चेहरे पर कोई भाव नहीं होता है, चेहरा निर्भाव होता है, ठीक उसी स्थिति में अपने शरीर को ले जाना शवासन कहलाता है।

मुर्दे के जैसा चेहरा तब होता है जब हमारे चेहरे पर कोई भाव नहीं होता है और मुर्दे जैसा शरीर तब होता है जब हमारे मन में कोई भी विचार नहीं होता है। यानि ध्यान वाली स्थिति। ध्यान वाली स्थिति में हमारा शरीर मुर्दे जैसा शांत और शिथिल हो जाता है। 

जब हमारा ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश होता है, अचेतन में प्रवेश होता है, तब चेहरे से भाव और मन से विचार विलिन होने लगते हैं। भाव और विचारों के विलिन होते ही मन शांत होने लगता है और मन के शांत और शिथिल होते ही शरीर एक स्थिति में प्रवेश करता है। वह शांत और शिथिल हो उस स्थिति में प्रवेश करता है जिस स्थिति में शव होता है। यानि वह शवासन में जाने लगता है। 

फिर इसी बात को दूसरी तरफ से लिया गया कि यदि ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश करने पर, मन के, विचारों के शांत होने पर शरीर शव की स्थिति में चला जाता है, तो क्यों न शरीर को शव वाली स्थिति में ले जाया जाए, ताकि मन शांत और शिथिल हो जाए और ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश संभव हो सके! और यह घटना दोनों ओर से घट सकती है। 

हमारा शरीर और मन सदेव एक-दूसरे का अनुगमन करते आए हैं। मन में विचार आने पर शरीर उस विचार को क्रिया में बदलना शुरु कर देता है। इसी भांति यदि हम शरीर से कुछ कहते हैं तो यह वैसा ही करना शुरू कर देता है। यदि अचेतन में उठे भाव और विचार शरीर को सक्रिय कर देते हैं तो क्यों न हम सचेतन शरीर को कहें, इसे आदेश दें कि शांत हो जाओ, शिथिल हो जाओ, तो यह अवश्य शांत और शिथिल होने लगेगा। जो भी भाव या विचार हम करेंगे, यह वैसी ही प्रतिक्रिया देने लगेगा।

शवासन में जैसे ही हमारा शरीर शांत और विश्राम की अवस्था में प्रवेश करने लगता है, हमारा मन और विचार भी शांत होने लगते हैं। और विचारों के शांत होते ही हम अपने आप पर लौट आते हैं, या कि हम अपने शरीर और मन के प्रति बोधपूर्ण होने लगते हैं। यहां हमें अपने शरीर से अलग होने का बोध होता है। यानि हम अपने शरीर के साक्षी हो जाते हैं। 

जब भी हम विश्राम में जाएं, दौपहर भोजन के बाद या रात सोते समय, तब इस आसन में प्रवेश करें।

लेट जाएँ और शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें। शरीर में कोई तनाव नहीं, कोई हलन- चलन नहीं। अपनी श्वास को नाभि तक चलने दें, श्वास को कोई गति न दें, स्वाभाविक रूप से चलने दें।

अपना सारा ध्यान घुटनों से नीचे दोनों पैरों में केंद्रित करें और भाव करें कि "पैर शिथिल हो रहे हैं.. पैर शिथिल हो रहे हैं.. पैर शिथिल हो रहे हैं।" दो से तीन मिनट तक भाव करने पर पैर अपने से ही भारी होने लगेंगे, शिथिल होने लगेंगे। फिर उपर की ओर बढ़ें और अपना सारा ध्यान जंघाओं पर लाएं और भाव करें कि "दोनों जंघाएं शिथिल हो रही है... जंघाएं शिथिल हो रही है... रिलेक्स हो रही है।" थोड़ी देर में ही दोनों जंघाएं शिथिल हो जाएंगी। अब और उपर बढ़ें, भाव करें कि नाभि और पेट शिथिल हो रहा है। पेट शिथिल हो रहा है... नाभि शिथिल हो रही है। दो से तीन मिनट तक भाव करें और फिर उपर आएं। अब सारा ध्यान सीने पर लाएं और भाव करें कि" सीना शिथिल हो रहा है..सीना शिथिल हो गया है।" थोड़ी ही देर में सीना भी शिथिल हो जाएगा। अब भाव करें कि "कंधे और दोनों हाथ शिथिल हो रहे हैं... कंधे और दोनों हाथ शिथिल हो रहे हैं।" 
हम महसूस करेंगे कि थोड़ी देर में कंधे और हाथ शिथिल हो गये हैं और हिलाने पर भी नहीं हिल रहे हैं। अब अंत में गर्दन, सारा ध्यान गर्दन में लगा दें और भाव करें कि "गर्दन शिथिल हो रही है.. गर्दन शिथिल हो रही है... गर्दन शिथिल हो रही है।" इस तरह दो से धीरे-धीरे हमारा पूरा शरीर शांत और शिथिल होता जाएगा। 

अब इस प्रक्रिया को पुनः उपर से नीचे की ओर दौहराएं। गर्दन के बाद वापस कंधे और हाथ, फिर सीना, पेट, जंघाएं, घुटने और पैर तक वापस अपना ध्यान ले जाएं और दो से तीन मिनट तक हर अंग के शिथिल होने का भाव करें।

पंद्रह से बीस मिनट की इस प्रक्रिया में पूरा शरीर शिथिल और शांत हो जाएगा। और शरीर हमें विश्राम में लेटा हुआ हमसे अलग दिखलाई पड़ेगा, यानि शरीर से अलग होने का या कि साक्षी होने का बोध होगा।
साक्षी का बोध इसलिए होगा कि शरीर के शांत और शिथिल होते ही मन यानी विचार भी शिथिल हो जाते हैं। और विचारों के शिथिल होते ही, हमारी साक्षी चेतना, जो विचारों में उलझी हुई थी, वह विचारों से मुक्त हो स्वयं पर लौट आती है और अपने शरीर को देखने लगती है। अतः हमें अपने साक्षी का बोध होता है।

यहां हमें अपने आसपास की ध्वनियां स्पष्ट सुनाई पड़ने लगेंगी। चौके से बर्तन की आवाज, बच्चों के खेलने की आवाज, पक्षियों की आवाज, सड़क पर यातायात, सब कुछ स्पष्ट सुनाई पड़ने लगेगा। सारी आवाज़ों को साक्षी भाव से सुनते रहना है, बिना किसी प्रतिक्रिया के, यदि जरा सी भी प्रतिक्रिया करेंगे कि बाहर "यह कौन चीख चिल्ला रहा है" तो फिर विचार को प्रवेश मिल जाएगा और हम साक्षी को भूल जाएंगे। अतः हमें बाहर भीतर की सारी आवाजों को सिर्फ सुनना है।
जब तक इस स्थिति में रहना चाहें रहें, फिर धीरे से दो चार गहरी श्वास लें और आंखें खोलकर बाहर आ जाएं।

इस प्रयोग में शरीर का थका हुआ होना उपयोगी होगा। यदि नींद नहीं आती है तो यह प्रयोग नींद लाने का सुगम उपाय है। रात सोते समय करेंगे तो नींद का आना आसान होगा और साक्षी हमारे अचेतन में प्रवेश कर जाएगा जिससे हमें सतत साक्षी का स्मरण बना रहेगा। 

स्वामी ध्यान उत्सव

मानव शरीर का सम्बन्ध प्रकृति से


                        
                      
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      मानव शरीर का सम्बन्ध प्रकृति से है। प्रकृति ने जिस प्रकार मानव शरीर की संरचना की है, वह अपने आप में विस्मयकारी है। शरीर शास्त्र के अनुसार शरीर की रचना का जितना ही अधिक विचार-विश्लेषण किया जाय, उतना ही यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि इसकी संरचना अद्भुत है।
       206 हड्डियों और 600 से भी अधिक मांसपेशियों के ऊपर त्वचा का चोला तना है। हड्डियों, मांसपेशियों और त्वचा--तीनों की संरचना का कौशल आश्चर्यजनक है। हड्डियों जैसी मजबूत और हल्की चीज़ की कल्पना करना भी कठिन है। शरीर का जितना वजन होता है, हड्डियां उसके पांचवें हिस्से से भी कम होती हैं। अपने शरीर का ही भार इन पर कम नहीं होता। जब हम ख़ाली हाथ डुलाते हुए चलते हैं तो उस समय हमारे जांघ की हड्डी के एक-एक वर्ग इंच क्षेत्र पर पांच-पांच सौ किलो का दबाव पड़ रहा होता है। शरीर का भार, धरती का गुरुत्वाकर्षण और हवा का तेज भार-ये तीन दबाव हड्डियां झेल रही होती हैं। इस दबाव को सिर्फ स्टील की धड़ ही बर्दाश्त कर सकती है। सीमेंट और स्टील को मात करने वाली ये मानव अस्थियां कितनी मजबूत फिरभी कितनी हल्की होती हैं।

         -----:मानव अस्थियां:-----

       हड्डियों की बनावट का कौशल और सूझबूझ विचित्र है। आधुनिक इमारतों में गोलाईदार पतली छत बनाई जाती है
क्योंकि अंडाकार खोल पतला होने पर भी मजबूत होता है। मानव मस्तिष्क की रक्षा करने वाली खोपड़ी की हड्डियां गोलाकार प्लेटों की शक्ल में होती हैं। जांघ की हड्डियों पर अधिक ज़ोर पड़ता है तो इन्हें भी एक खोखले बेलन की आकृति दे दी गयी है। जांघ, कूल्हे, बांह और कंधे की हड्डियों का जोड़  ऐसा है जैसे  किसी गोल छल्ले में गेंद फंसा दी जाय ताकि आसानी से घूम भी सकें और फंसी भी रहें। खोपडे, कूल्हे जैसे स्थानों में हड्डी का हिलना-डुलना घातक हो सकता है। इसलिए वहां के जोड़ बहुत मजबूत बने रहते हैं। स्त्री के कूल्हों की हड्डियां पुरुषों से अलग होती हैं। उनमें यह व्यवस्था रहती है कि प्रसव-काल समीप आते ही जोड़ कुछ खुल जाय ताकि आसानी से प्रसव हो सके और शिशु सुरक्षित बाहर आ सके। पसलियों का जोड़ सीने की हड्डी के साथ कुछ इस तरह होता है कि उनके जोड़ को घूम कर और फिसल कर फैलने -
सिकुड़ने में आसानी हो। हड्डियों के इन जोड़ों की व्यवस्था का परिणाम है--हम शरीर को तरह-तरह से घुमा सकते हैं।
      वास्तव में मनुष्य का शरीर ही नहीं, मन, बुद्धि, अंतःकरण--सभी इतने समर्थ होते हैं कि छोटी-छोटी भूलों को सुधार लेना या कहें हल्के-फुल्के आघातों को झेल लेना उनके लिए सरल बात होती है। अनाचार और अपव्यय की अति ही उन्हें कमज़ोर और बीमार बनाती है। अन्यथा प्रतिकूलताओं के बीच में रहते हुए भी मानव शरीर अनुकूलता में बदल सकता है। शरीर की मासपेशियां अपने से हज़ार गुना वजन संभाले रहती हैं। पेट की मांसपेशी खाना खाने के लिए स्वतः फैलती चली जाती है। ह्रदय की मांसपेशी गर्भस्थ शिशु में तीसवें दिन से काम शुरू कर देती है और रात-दिन सेवा में तत्पर रहती है। वह आजीवन क्रियाशील रहती है।
       साधारण कार्य करते हुए प्रत्येक व्यक्ति अपनी मांसपेशियों पर इतना ज़ोर डालता है जितना कि ज़ोर टनों माल उठाते समय किसी क्रेन पर लगातार पड़ता है। अपनी हड्डी और मांसपेशी तो आदमी साधारणतः देख नहीं पाता पर त्वचा पर उसकी नज़र तो रोज़ ही पड़ती है। इस त्वचा को रंगने-पोतने में हज़ारों रुपये खर्च करते हैं पर त्वचा के वास्तविक चमत्कार को कम ही लोग जान पाते हैं और जानने पर भी याद तो और भी कम लोग रख पाते हैं।
     1- बाहरी ताप को झेलने, 2- शरीर के भीतरी ताप को सामान्य बनाये रखने, 3- स्पर्शबोध के द्वारा जानकारी देते रहने और 4- भीतरी अंगों को चोट-चपेट, कीटाणु-विषाणु से बचाये रखने का कार्य हमारी त्वचा निरन्तर करती रहती है। जबकि शरीर के किसी भी हिस्से में यह एक इंच के पांचवें हिस्से से भी अधिक पतली होती है। इतनी नाजुक और पतली त्वचा के भी हिस्से होते हैं। त्वचा का बाहरी हिस्सा जो 'एपिडर्मिस' कहलाता है,एक चतुर चौकीदार होता है। अपने चौकीदार के कर्तव्य को करने के लिए जहाँ जैसी व्यवस्था आवश्यक है, वैसी ही व्यूह रचना उसने कर रखी है। आँख जैसी कोमल स्थान की रक्षा के लिए वह इतनी पतली और मृदु हो गई है एक इंच के दो हजारवें भाग के बराबर ही उसकी तह है। उँगलियों के नाजुक पोरों की रक्षा के लिए तो उसने नाखूनों का ही निर्माण कर डाला है। तलुओं में वह मोटे-तगड़े चौकीदार के रूप में बैठी है। हड्डियों के उन जोड़ों पर जहाँ मोड़ने की जरुरत पड़ती है,यह त्वचा ढीली-ढाली होती है।
       बाहरी त्वचा के नीचे वाली तह किसी विशाल व व्यवस्थित दल के निष्ठावान स्वयं सेवकों की तरह चुपचाप काम करती रहती है। वह नित नए कोष रूपी कार्यकर्त्ता तैयार कर उन्हें व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाती है ताकि समय आने पर वे बाहर मंच की व्यवस्था संभाल सके। दुनियां को गोरे-काले, भूरे-पीले के भेदों में फंसाने वाला 'मेलेनिन' नामक पदार्थ इसी तह में होता है। 'मेलेनिन' पदार्थ की अधिकता से रंग काला हो जाता है। तेज धूप और गर्मी से शरीर की रक्षा के लिए अधिक 'मेलेनिन' की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए गर्म देशों के लोग ज्यादा काले रंग के होते हैं। मोर भी ज्यादा समय यहाँ रहें तो ताम्बई रंग होने लगते हैं। भीतरी त्वचा का कारोबार तो और भी जटिल है। उनमें लाखों बारीक तार अर्थात् स्नायु-तंतु फैले हुए हैं जो प्रत्येक स्पर्श की संवेदना मस्तिष्क तक ले जाते हैं और वहां से आवश्यक सुचना निर्देश लाते हैं। सर्दी-गर्मी, पीड़ा-रोमांच आदि की अनुभूतियों के सन्देशवाहक में बारीक तार कुल मिला कर अपने आप में किसी विशाल दूरभाष केंद्र की छवि पैदा करते हैं। मस्तिष्क  के
'हाइपोथैलेमस' केंद्र से जैसे ही दूरभाष पर खबर मिली कि शरीर का तापमान बढ़ गया है, वैसे ही रक्त-प्रवाह की और त्वचा में स्थित पसीने की ग्रंथियों की गति तेज हो जाती है और रक्त की बढ़ी हुई गर्मी बाहरी त्वचा के रास्ते पसीने के रूप में निकलने लगती है। तापमान गिरने की इस टेलीफोन से खबर मिलने पर रक्त-प्रवाह कम हो जाता है। पसीने की ग्रन्थियां भी अपना काम धीमा कर देती हैं। त्वचा और चर्बी की पर्तें शरीर की गर्मी को बाहर नहीं जाने देती। इस प्रकार किसी वायरलेस-सज्जित, अनुशासित और पुलिस-दल की तरह चौकस, सक्रिय, समर्पित स्वयं सेवकों की तरह निष्काम भाव से सेवारत तथा परिपक्व बुद्धि संचालकों की तरह सूझ-बूझ से काम लेने वाली यह शरीर की व्यवस्था जितनी विशाल है, उतनी ही जटिल भी है।


सनातन सदाशिव निर्गुण एवं सगुण



सनातन सदाशिव निर्गुण एवं सगुण दो स्वरूपों में जाने जाते हैं प्रकृति से शुन्य  जहां प्रकृति नहीं है शिव निर्गुण हैं और जब यह प्रकृति रूप में होते तो हैं तो वह सगुण हैं सत चित एवं आनंद रूप ऐश्वर्य से परिपूर्ण उस परमेश्वर के प्रकृति से युक्त हो जाने पर (उसमें प्रकृति की उत्पत्ति होने पर) शक्ति की उत्पत्ति हुई है शक्ति से नाद एवं नाद से बिंन्दु की उत्पत्ति हुई है समस्त ज्ञान का कारण  निरंजन ब्रह्म है जो साक्षी रूप है साक्षी रूप इसलिए कि वह वही सब कुछ उत्पन्न और नष्ट होने के समय उपस्थित रहता है aऔर प्रत्येक स्थान पर प्रत्येक क्रिया को अनुभूत करता है प्रकृति की विकृति का उद्भव इसी में होता है और इसे ही #तत्व कहते हैं।
प्रकृति एवं पुरुष महाघोर एवं निराकार है सृष्टि के समय वही ब्रह्म प्रकृति एवं पुरुषों दो स्वरूपों में अभिव्यक्त होते हैं प्रकृति पुरुष चणक के आकार का है कोई से प्रकृति कहता है कोई पुरुष ब्रह्मवाक्य सें से अतीत एवं निर्मल समुज्वल घुतियुक्त है ब्रह्म मन से बुद्धि आदि से क्रिया से एवं वाक्य से अतीत है सदाशिव केवल साधकों के हितार्थ एवं ज्ञातार्थ एकत्वाश्रित ब्रह्म की उस पुरुष की अभिलाषा के अनुसार उसी से सब की उत्पत्ति होती है वैसे ही प्रकृति की इच्छा से पुरुष में शेष सभी उत्पत्ति होती हैs पूर्वानंन्दयुता कामार्त्ता मंदोन्मता प्रकृति विपरीता हो जाती है तब सदाशिव ही पुरुष का धारण रूप धारण करके सृष्टि करता है।
जब प्रकृति नहीं होती सदाशिव निर्गुण निर्विकार होते हैं उसमें जब प्रकृति की उत्पत्ति शास्त्रों में इसे विकृति और विपक्ष कहा गया है क्योंकि यह उत्पत्ति नहीं है इसमें नया कुछ नहीं बनता यह सदा शिव का ही एक रूप परिवर्तन होती है तब उस प्रकृति में से सदाशिव के संयोग करने से नाद नाद से शक्ति और शक्ति से बिंदु की उत्पत्ति होती है यही बिंदु भी विश्वात्मा या जीवात्मा है यहां जानना समीचीन होगा कि एक नाद पहले ही उत्पन्न होता है जिससे प्रकृति की उत्पत्ति होती है इसे तत्वज्ञानियो ने परानाद कहा है इन क्रियाओं को उत्तरवर्ती नाद को ब्रह्मनाद या शब्दनाद कहा जाता है ।
यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति की क्रिया है जिसे जानने के लिए विश्व भर के वैज्ञानिक प्रयत्नशील हैं भारत के कौपीन धारियों  को ना जाने यह कब से पता था क्योंकि यह जानना ब्रह्मांड के किसी भी विकसित जीव के मस्तिष्क की पराकाष्ठा है सनातन ऋषियों ने कहा है कि सृष्टि की अनुपस्थिति में वह निराकार परब्रह्म निष्क्रिय समाधि रत था अकेला था दूसरा कोई नहीं था जिससे वह मन बहलाता तब उसने स्वयं को ही परिवर्तित करके एक भंवर रूपी चाक की उत्पत्ति कर दी जिसके बीच में एक स्तंभ थाh उसके शीर्ष पर ज्योति जगमगा रही थी यह इतनी उग्र गति से नाच रहा था कि परमात्मा रूपी अनंत में चकराता फिर रहा था और इसी की प्रतिक्रिया में दूसरा उसी प्रकार का अधोगामी चक्र उत्पन्न हुआ दोनों एक दूसरे की ओर दौड़ पड़े और एक दूसरे में समा गए इससे एक महानाद हुआ और शब्दब्रह्म की उत्पत्ति हुई इससे बिंदुरूप विश्वात्मा की उत्पत्ति हुई इससे सुक्ष्म वमनावतार का जन्म हुआ और उसने अपनी योग माया से प्रकृति को विकसित एवं पोषित किया।
इस निष्क्रिय निराकार निर्गुण तत्व की ये लीला अद्भुत और अवर्णनीय है उसमें कोई क्रियाशीलता नहीं है पर वह सभी क्रियाओं को उत्पन्न करता है उसमें कोई गुण नहीं है oकिंतु सभी गुणों की उत्पत्ति उस से ही होती है वह चेतना से रिक्त है पर समस्त चेतना तमक उत्पत्ति उसी से होती है उसकी कोई आकृति नहीं है पर सभी आकृतियां उसकी उससे ही उत्पन्न होती है उसमें कोई भेद प्रभेद नहीं है पर सभी भेद प्रभेद उसी से उत्पन्न होते हैं उसकी इस लीला का वर्णन कोई कैसे कर सकता है जबकि ज्ञान बुद्धि चेतना और शब्द की उत्पत्ति भी उसी से होती है उस महाविभु लीला को वह स्वयं ही जान सकता है कि वह ऐसा क्यों करता है।
तत्वज्ञानियो महऋषियो ने इस उत्पत्ति को अविद्या कहा है kअर्थात अज्ञानता के कारण ही इस उत्पत्ति को जीव सत्य मानकर इसमें भटकता रहता है और इंद्रियों पर विश्वास करके अपनी अनुभूतियों के माया जाल से बनने वाले जगत में भटकता है सत्य तो यह है कि यह कोई उत्पत्ति है ही नहीं चक्रवात में वायु के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता इसमें भी परमात्मा तत्व के  अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

योग किसको कहते है


           योग मे ही सजॅन है,योग मे ही विसजॅन है, योग मे ही रूपांतरण है, योग मे ही समानता है,योग मे ही जीवन है,योग मे हो चलायमान है,योग मे ही वियोग है,योग मे ही विग्यान है, योग मे ही ग्यान है।
          मानव शरीर मे जो योग क्रिया के माध्यम से मानव मशीन का उपयोग करके स्थूळ शरीर की दसेय ईन्द्रीयो की जो अलग अलग रूप मे शक्तिओ काम करती है वह सभी शक्तिओ को एक स्थान पर एक रूप मे एकत्रित करके कायॅवाहीत करके ध्यान  धारणा के मारफत अपनी आत्मा को ज्योत (ऊजाॅ)  स्वरूप मे दशॅन करना  ये पुरी क्रिया जो करते है उनको योग कहा जाता है ओर निती नियमो के आधिन जो नित्य ये क्रियामे लगे रहते है उनको योगी षुरूष कहा जाता है। आत्मा से परमात्मा तक देखना ईसीको योग कहते है निराकार चैंतन्य को आंतरीक द्रष्टि से  आकार मे देखना ऊसीको योग कहते है।
           मानव शरीर मे अलग-अलग स्थान पर जो अलग-अलग शक्तिया काम करती है उन सभी को क्रम वाईझ जागृत करने के बाद सभी शक्तियो को त्रिभेटी ए एक रूप मे एकत्रित  करके उनको कायॅवाहित करना है। ओर शरीर की भीतर जो प्राण तत्व होता है वह प्राणतत्व को जागृत करने के लीए प्राणायाम का सहारा लेके प्राण तत्व को उजाॅ स्वरूप मे लाकर त्रिभेटी पर उस उजाॅ को आंतर द्रष्टि से देखना पडता है। यह आत्मा को जागृत ईस तरीके से करनी पडती है।
            जब ललाटे त्रिभेटी पर उजाॅ स्वरूप मे ज्योत देखाई देती है। तब ईसी समय मस्तक मे आपको अनहद  सुनाई देता है तब ईस समय अपनी मनको ओर आंतर नजर को प्रकाश मे ओर अनहद नाद मे विलिन कर दो प्रकाश को झांख झांख के देखा करो ऑर मन को अनहदनाद को सुनने मे तल्लिन कर दो। जब आपका मन ओर आंतरीक नजर दोनो तल्लिन हो जाये ईसी समय आपको त्रिभेटी पे अखुट चैंतन्य के भंदार के रूप मे ऊजाॅ का स्रोत ईतना वहेगा कि  सूयॅका उजाला भी कम लगेगा वो ऊजाॅ मे मन ओर आंतर नजर को तल्लिन कर देने से आपकी आत्मा आपके भ्रह्माड को वेध कर अखिल भ्रह्मांड मे विलिन हो जाता है।ईस समय यह समाधि की बिलकुल नजदीक पहोच जाते है। ईसी समय आपकि प्राण शरीर का विकास हो जाता है।ओर ईसके बाद प्रेकटीस जारी रखने से आपका सुक्ष्म शरीर भी अलग हो जाता हो।जब आपका सूक्ष्म शरीर अलग हो जावे  बादमे आत्मा का ड्राईवर संकल्प है। आप जो संकल्प ईसी समय छोडोगे वो संकल्प आपका भ्रह्माड को वेधन करके अखिल भ्रह्मांड मे वो संकल्प की तरंगे जाती है। ओर अखिल भ्रह्मांड मे से सिध्ध होकर रीटॅन होती है। आपके नजर के सामने ही वो संकल्प वास्तविकता मे परिवतॅन हो जाती है। यही  योग क्रिया का सबसे बडा प्रमाण आपको मिल जाता है।सूयॅ की उजाला से बहुत गुणे ज्यादा उजाला आपको दिखता है वही ब्रह्मतत्व है।वही चैंतन्य आत्मा है , वही निरंजन है।वही निराकार है।, वही अविनाशी है, वही भ्रह्मांड का चैंतन्य है।लेकिन अपनी संकल्प शक्ति द्रढ ओर मजबुत करनी पडती है।ऊसकी थोडे समय की एक साधना से संकल्प शक्ति ओर मनोबल दोनो द्रढ मजबूत हो जाती है इसके बिना सिफॅ ऊजाला देखने से कुछ भी नही मिलता  टुंक मे इतना कह सकते है की आत्मा को जीव मे से शिव मे पलटाने के लिए मानव शरीर मे योग क्रिया बहुत महत्व की है।ये शरीर की तमाम सत्ता  बाह्य मन के पास होती है वह सत्ता मन के पास से लेकर आत्मा को सोंपने की जो क्रिया होती है।उनको योग कहते है । शरीर मे सत्ता का पलटा करना है ओर मनको स्थिर करना है ये क्रिया को योग क्रिया कहते है।
           योगासन को योग नही कहते ,योगासन तो सिफॅ शरीर की तंदूरस्ती के लीए होता है।योग क्रिया करने के लिए अनुभवी सद्दगुरू मिलेगा तो ही योगक्रिया शिखा सकते है । नहीतर ये काया को पलटोओ खवरावी देने जैसा हो जायेगा ओर हवा मे हवातिया मारने जैसी हालत आपकी हो जायेगी । योगक्रिया करने से पहले अपने शरीर को निरोगी करना पडता है ।ईसके बिना योगक्रिया नही हो सकती  कोई मानव करभी नही सकता अपान वायु को भी दुरगंध दूर करनी पडती है ।  अपान वायुकी दुरगंध दूर नही होगी तो आपके शरीर का बेलेन्स बिगड जायेगा शायद पागलपन भी आ शकता है।
           योगक्रिया करने के लिए सबसे पहले शरीर मे से  गेस,पित्त,कबज्यात ओर कफ से रहीत करना पडता है। बादमे हर दिन उसकी प्रेकटिस करनी पडती हो। प्रेकटिस करने के लिए आपको जो आसन शरीर को अनुकुल होवे वो आसन ग्रहण करके शांत मनसे थोडी देर बैठे रहो बाद मे अपने शरीर का शिथिलिकरण करदो ईसके बाद मे अपनी सूक्ष्मणा नादी को शरू करदो बाद मे बिलकुल टटार बैठ के अपनी आंतरीक नजर त्रिभेटी पे स्थिर करदो इसके बाद मे एक मिनीट की लंबाइ वाला प्राणायाम करो ।ईतना करनेमे आपको 5 वषॅ तक का समय लगता है।5 वषॅ तक आपको ये हताई हुई योग क्रिया पर सतत हरदिन दो कलाक की प्रकटिस जारी रखना है।तब आपको थोडासा कुदरती चैंतन्य का अनुभव होगा लेकिन इतना याद रखना अपनि शरीर पहले निरोगी करना है। बाद मे ये योगक्रिया की प्रकटिस करना वरना आपको शरीर मे बहुत तकलिफे आ जायेगी ओर आशन भी सिध्ध करना पडेगा यदी कोई भी मानव को यह प्रेकटिस करने की ईच्छा होवेतो मुझे मीलेगा तो उनको जरूर सलाह देके संपुणॅ योगक्रिया का मागॅदशॅन अवश्य करुंगा प्रमाण के साथ करऊगा ।
          हदय के तकलिफ वाले ,बी.पी. की तकलिफ वाले मानव ये योगक्रिया की प्रेकटिस कभी मत करना।।
       
         गगनगीरीजी महाराज
      फोन--9574752091

दस महाविद्याओं का रहस्य

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                                                             #कमला_रहस्य

दस महाविद्याओं में से प्रत्येक की अंग देवियां है इनकी संख्या अंनगनित है दक्षिण मार्ग की पूजा आधारित तंत्र विधियों में सोलह  आवरण तक की पूजा विधि मिलती है पर इसका अर्थ यह नहीं कि यह यहीं तक सीमित है प्रथम केंद्र की में कर्णिका के बाद कमल में आठ दल हो जाते हैं जिसमें पचास से ऊपर देवी देवताओं की पूजा करनी होती है और फिर दूसरे आवरण में सोलह के तीसरे में बत्तीस चौथे में चौसठ अर्थात हर आवरण मे दल दोगुना होते होते चले जाते हैंa इस प्रकार हजारों से अधिक देवी देवताओं और उनके आयुधों पूजा करनी होती है समस्त शास्त्रीय वाड्गमय मैं ऐसे ही तंत्र साधना कहा गया है किंतु सत्य यह नहीं है यह तंत्र के दक्षिणमार्गी जिसे वैदिक मार्ग भी कहते हैं कर्म कांडों को के आधार पर किया गया रूपांतर है हम पूर्व पोस्टों मे लिखते आये है के तंत्र जिन लोगों की संस्कृति से प्रस्फुटित हुआ है उसमें कर्मकांड प्रचलित नहीं थे यह विद्या वैदिक संस्कारों के अनुरूप नहीं थी इसलिए उन्हें परिवर्द्धित संशोधित कर दिया था।
 कमला लक्ष्मी का ही दूसरा नाम है यह मणिपुर चक्र की देवी है इनका स्थान नाभि के मूल में रीढ़ हड्डी में होता है इनकी उत्पत्ति विष्णु के वक्ष पर स्थित कोलासुर नामक असुरों का वध करने के लिए हुई थी एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय हुई थी sकमला शरीर या इकाई की वह शक्ति है जो बाहरी ऊर्जा तत्व को खींचकर शरीर एवं "विष्णु "का पोषण करती है शरीर की चर्बी का निर्माण इससे ही होता है  इसी उर्जा की प्रवृत्ति से "जीव" भौतिक संग्रह की ओर प्रवृत्त होता है  अन्य देवियों की भांति कमला के भी अनेक रूप हैं।                                                     #दक्षिणमार्ग
वाग्भव, कमला, माया, कामबीज, यह चार अक्षरों वाला मंत्र कमला का बताया गया है इनका स्वरूप इस प्रकार से है कि पूर्णमासी के चंद्रमा जैसे मुख वाली कमल के ऊपर बैटरी वाली बैठी हुई गौरांगी अनेक प्रकार के रत्नो के अलंकर से अलंकृत नितंबो तक रेशमी वस्त्र धारण किए हुए दोनों हाथों में वरद् एवं अभय मुद्रा धारण किए हुए सफेद वर्ण के चार हाथी अपनी सूंडो मे सोने का अमृत घट लेकर उसका अभिषेक कर रहे हैं।
                                                          #तन्त्रपूूजा
 कमला की तंत्र पूजा रेशमी वस्त्र रेशमिया आसन पर उत्तराभिमुखी होकर महानिशा काल में की जाती है साधना स्थल का चुनाव शमशान सूनेघर अपना घर आदि में पूर्ववत की जाती है यंत्र को गोबर से लीपे स्थान में चंदन गोरोचन छागरक्त  गेहूं के आटे से बनाया जाता है तंत्र पूजा में न्यास आदि की आवश्यकता नहीं होती यद्यपि बहुत से साधक षोड़ान्यास करते हैंh तंत्र पूजा में यंत्र की कर्णिका में देवी की स्थापना करके उनकी पूजा की जाती है पूजा से सिद्धि भी मिलती है घी और कमल के फूल से एक हजार आहुति दी जाती है पर तंत्र सिद्धि के लिए पूजा के पश्चात दस हजार मंत्रों का जप रात्रि काल में करना चाहिए जप समाप्त होने पर वह या छाग के मांस और घी की आहूति देनी चाहिए  गोह और छाग दोनों के मांस से हवन करने से लक्ष्मी तो सिद्ध होती है पर धरती के अंदर देखने की दिव्य शक्ति भी प्राप्त हो जाती है और गडे़ खजानों का पता चलता है।
                                                               #कौलसाधना
कौल साधना पद्धति मैं कमला की साधना मे पुर्ववत यंत्र बनाकर पूर्व युवा ठोस मांसल बदन वाली सुंदर युवती को जो पूर्णता गोरी हो लक्ष्मी के रूप में बिठाकर उसकी पूजा करके उसे चावल मछली मदिरा पूरी आदि का भोग चढ़ाया जाता है फिर उसको यह सब अर्पण करके साधक स्वयं भी इन का भोग लगाता है तत्पश्चात बैठकर इक्कीस हजार मंत्रों का जप करता है जप के बाद युवती को भेंट आदि से प्रसन्न करके विदा करता है कौलसाधकों मे आजकल एक अन्य वर्ग भी बन गया हैo जो मछली मांस का उपयोग नहीं करते और मदिरा के स्थान पर विजया यानी के भांग का उपयोग करते हैं खीर मिठाई दूध चावल पूरी मालपुआ मधु आदि का प्रयोग करके भैरवी साधना करते हैं।
                                                                 #तन्त्र_साधनम्_२
 बरगद के वृक्ष के नीचे अमावस्या की रात में पूर्व वक्त अष्टदल कमल युक्त यंत्र बनाएं हल्दी चंदन साली चावल के आटे दूध आदि से इसके सामने उत्तराभिमुखी होकर आसन लगाएं कर्णिका बरगद के दूध और भरत मिलाकर शालि चावल की पीष्टि से बाराह उंगल की प्रतिमा बनाई या बरगद की जड़ की मिट्टी बरगद का दूध और पंचगव्य को मिश्रित करके पिंण्डी बनाएं इस में प्राण प्रतिष्ठा करके ग्यारह सौ मंत्रों के जप करके देवी को गुड खीर मधु और घी अर्पित करें फिर बेल बरगद पान के पत्तों पर खीर मालपुए आदि नैवेध और यहां बैठ कर दो लाख मंत्रों का जप करें बीस हजार से होम करे kजप के समय शरीर रक्षा दिगरक्षा आदि करले बरगद के वृक्ष पर के इतर निवासियों के लिए भी अभिमंत्रित जल से सुरक्षा प्रदान करें पूजा के बाद छाग की बलि दे होम में उसी बरगद के पत्ते पान छाग का मांस घृत और शालि के चावल प्रयुक्त करें निर्धारित संख्या में जप पूर्ण होने तक आहुति दे लक्ष्मी सिद्ध होने पर साधक को धन एवं वृद्ध संपत्ति की प्राप्ति होती है वह इसकी जिद्दी से सुंदर पत्नी प्राप्त होती है और वशीकरण की शक्ति भी प्राप्त होती है।

चतुर्थ क्रिया पीनियल ग्रंथि

 

चतुर्थ क्रिया का अभ्यास करने से आप ललाट, पोन्स, थैलेमस, हाइपोथैलेमस, पीनियल ग्रंथि के अंदर, पिट्यूटरी के सामने और मध्य मस्तिष्क में कुछ विशेष आत्मिक गति को अनुभव करते हैं। आपको लगता है कि प्रकाश  उर्ध्वलोकों से  भूलोक की ओर घूमते हुए आ रहा है । इस चौथे स्तर को असंशक्ति समाधि कहा जाता है, इसका अर्थ है कि आप स्वतंत्र रूप से परमचेतना में विचरण कर रहे हैं और अपने पूरे शरीर में भगवान की प्रत्यक्ष उपस्थिति का अनुभव करते हैं। आप स्वयं को एक दिव्य प्रकाश एवं भगवत अनुभूति का अनुभव करने वाले  देवता के रूप में देखते हैं। आप हजारों ज्योतियों और उनके प्रकाश को देख सकते हैं, यहां तक ​​कि खुली आंखों से, जो आपकी आंतरिक जगत को प्रकाशित करती हैं। आप वास्तव में सहस्रार के ऊपर एक परम प्रकाश को पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशमान करते हुए देख सकते हैं । आपके शरीर में आप सात प्रकार के प्रकाश देख सकते हैं,  सात केंद्रों में से प्रत्येक में दो अग्नि, एक आरोही और दूसरा अवरोही । आप इन ज्योतियों को अपने शरीर के भीतर और बाहर दोनों जगह देख सकते हैं। गुरु का शरीर अंधकार जैसा दिखाई देगा, जिसके चारों तरफ प्रकाश होगा।

~ परमहंस हरिहरानंद जी के लेख के अंश

*Fourth  Kriya* 

By practicing  the  fourth  Kriya  you  feel  some  special  movement  of  the  soul  inside  the  forehead, pons,  thalamus,  hypothalamus,  pineal  gland,  in  front  of  the  pituitary  and  in  the  mid  brain.  You feel  that  the  light  is  rotating  around  from  the  high  heavens  to  the  earth.  This  fourth  level  is  called asamshakti  samadhi,  it  means  you  are  roaming  freely  in  superconsciousness  and  perceive  the living  presence  of  God  in  your  whole  body. You  see  the  Self  as  a  deity  experiencing  divine  illumination  and  the  sensation  of  God.  You  may see  thousands  of  sparks  and  flashes,  even  with  your  eyes  open,  that  light  up  your  inner  world. You  can  also  literally  see  a  super  light  above  the  crown,  lighting  up  the  whole  universe.  In  your body  you  can  see  seven  types  of  light,  two  fires  in  each  of  your  seven  centers,  one  ascending  and the  other  descending.  You  can  see  these  lights  both  inside  and  outside  your  body.  The  body  of the  guru  will  appear  dark,  with  illumination  all  around  it. 

~ Excerpts from writings of Paramahamsa Hariharananda ji

मृत्यु और जीवन

{{{ॐ}}}

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मृत्यु इस पृथ्वी की सबसे बडी माया है इसे भ्रम भी कह सकते है ,और इसी कारण इस लोक को मृत्युलोक भी कहते है । विज्ञान कहता है  कि #क्रोमोजोम्स की मृत्यु ही मनुष्य की मृत्यु है । ये क्रोमोजोम्स एक निश्चित अवधि तक ही सक्रिय रहते है । परन्तु अध्यात्म कहता है कि मनुष्य एक भौतिक ईकाई मात्र नही है ।बल्कि एक अभौतिक पदार्थ है जो मृत्यु के समय शरीर से मिलकर शुन्य मे चला जाता है, एवं समय पाकर पुनः नया शरीर ग्रहण करता है । kक्रोमोजोम्स भी उसी चेतना शक्ति जीवित एवं मृत होते है।
अभी मैने विडियो पर एक संत को यह कहते सुना था कि मृतक को चौदह दिनो तक आराम से मरने दिजिये ।क्या ये लोग ज्ञान बांट रहे है या हलवा बना रहे है आराम से मरो ओर चौदह दिन मरो हमारे यहां मृतक का दाह संस्कार कुछ घण्टे मै हो जाता है चौदह दिन मे तो मृतक मे कीड़े पड जायेगे , यह उन लोगों के ज्ञान की पराकाष्ठा है ,और उनके अनुयायी के तो क्या कहने।
 वास्तव मे सच क्या है सोने से पुर्व जिस प्रकार स्वप्न की छाया पडने लगती है । उसी प्रकार मृत्यु के छ: महिने पुर्व   उसकी छाया पडने लगती है, उस समय जागरूक व्यक्ति मृत्यु की भविष्यवाणी कर सकता है । oपांच छ: घण्टे पहले या एक दो दिन पहले तो इसके स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगते है ।जिससे कई व्यक्ति अपनी मृत्यु की पूर्व सुचना दे देते है। जो नित्य सोते या उठते समय प्रार्थना का प्रयोग करते है, या ध्यान करते है, उन्हें भी अपने मृत्यु के समय का पता चल जाता है । निर्मल चित्त वालों को भी यह पता चल जाता है ।
आत्मा से निकलने पर भी शरीर की ऊर्जा तीन दिन तक उसमे से निकलती रहती है ।जैसे वृक्ष काटने पर भी उसे सुखने मे कई दिन लग जाते है  ह्रदय की धड़कन बन्द होने पर डाक्टर लोग  hमनुष्य को मृत घोषित कर देते है जिससे क्लीनिकलडैथ (शारीरिक मृत्यु) कहा जाता है, किन्तु जब शरीर की सम्पूर्ण ऊर्जा बाहर निकल जाती है तो उसे बायोलोजिकल डेथ ( जैविक मृत्यु )कहा जाता है।
इसमे लगभग तीन दिन लग जाते है। जैविक मृत्यु से पूर्व यदि विशेष विधियों द्वारा आत्मा को शरीर मे पुनः प्रवेश कराया जा सके तो वह पुनः जीवित हो सकता है ,जैसे पौधा जमीन से उखाड देने पर भी थोडे समय बाद पुनः लगाने पर जीवित हो जाता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि जीवात्मा शरीर को छोड देती है, किन्तु शरीर यदि बेकार नही हुआ तो अन्य कोई आत्मा प्रवेश कर जाती है । sजिससे वह मृत शरीर पुनः जीवित हो उठता है ।
कोई जीव जब मृत्यु को प्राप्त करता है तो उसकी चेतना के कारण आत्मा वातावरण मे चली जाती है और वह अपने अनुरूप प्रवृत्ति वाले ऊर्जा शरीर मे कुर्म की पुछ से सम्पर्क करके वहाँ अवतरित हो जाती है।
इस समय आत्मा बीजरूप परमबिन्दू  होती है । उसमे केवल कर्मों के संस्कार होते है, उसका कोई प्रकट अस्तित्व किसी भी रूप मे नही होता ।संस्कार जहां एकत्रित होता है , वह विरल तत्त्व बिन्दू है यही जीवात्मा है। वह सुक्ष्मत्म होता है तो वहां कुछ नही होता ।प्रत्यक्ष भौतिक जगत का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है ।उससे आगे कुछ नही है क्योकि जो नही है वह वास्तव मे है ।
किन्तु वह भौतिक तत्त्व नही है उसकी कोई आकृति कोई स्वरूप नही है वह एक भौतिक तत्त्वों से शुन्य बिन्दू मात्र है। वहा केवल संस्कार हैa और यह संस्कार ही फिर से शरीर धारण करता है ,जब संस्कार ही शुन्य हो जाते है फिर पुनर्जन्म नही हो सकता है

शिव शक्तिएवं चेतन परमात्मा

वह परमात्मा चैतन्य है जो ज्ञान स्वरूप अथवा बोधस्वरूप है। वह तत्व अति सूक्ष्म होने से किसी भी प्रकार से दृश्य नही है

 वह स्वयं कोई क्रिया नही करता किन्तु क्रिया का माध्यम उसकी शक्ति है जो सभी प्रकार की क्रिया का कारण है। यह सम्पूर्ण दृश्य जगत उसी की शक्ति का विलास है।

 बिना शक्ति के शिव भी शव रूप ही है शिव को सीधा नही जाना जा सकता है शक्ति की सहायता से ही शिव की पहिचान होती है जिस प्रकार से अग्नि की पहिचान उसकी दाहिक शक्ति (जलाने की शक्ति) से होती है। यदि उसमे जलाने की शक्ति ही नही है तो उसे अग्नि कैसे कहा जा सकता है? 

जिस प्रकार अग्नि से उसकी दाहशक्ति भिन्न नही है, जिस प्रकार सूर्य से उसका प्रकाश भिन्न नही है जिस प्रकार चंद्रमा से उसकी चांदनी भिन्न नही जिस प्रकार चीनी से उसकी मिठास भिन्न नही है उसी प्रकार शिव से उसकी शक्ति भिन्न नही है।
 शक्ति के बिना अकेला शिव सृष्टि की रचना नही कर सकता है।

अकेली शक्ति भी बिना चेतन (शिव ) सृष्टि की  रचना नही कर सकती अतःयह शक्ति उसका उपकरण है जिसकी सहायता से वह सृष्टि की रचना करता है।

जहा चेतना है वह शक्ति विद्यमान रहती है तथा जहा शक्ति है वह चेतना है ही दोनों अभिन्न है ।

आज विज्ञान केवल शक्ति पर ही अपना ध्यान केंद्रित किये हुवे है तथा इस चेतनतत्व से अनभिज्ञ है जिससे विज्ञान के अपेक्षित परिणाम नही आ रहे चेतन का ज्ञान ही अध्यात्म का विषय है इसके बिना विज्ञान अधूरा है। अधूरा ज्ञान कभी जीवन का आधार नही बन सकता है
ओउम

Virat Yog Sagar

पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक सुन्दर, सुडौल और आकर्षक क्यों

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                        भाग--02
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      शुक्रबिन्दु और रजोबिन्दु में 'प्रोटोन' और 'इलेक्ट्रॉन' की सम्भावना समझनी चाहिए। दोनों की ऊर्जा बराबर एक दूसरे की ओर आकर्षित होती रहती है और जब उनका आकर्षण एक विशेष् सीमा पर जाकर घनीभूत होता है तब उस स्थिति में वहां 'न्यूट्रॉन' की सम्भावना पैदा हो जाती है। फलस्वरूप दोनों प्रकार की ऊर्जाएं और उनमें निहित दोनों प्रकार की विद्युत् चुम्बकीय तरंगें एक दूसरे में मिलकर एक ऐसे विलक्षण 'अणु'  का निर्माण करती हैं जिसे हम 'आणुविक शरीर' या 'एटॉमिक बॉडी' कहते हैं।
      इस आणुविक शरीर में हमारा सारा व्यक्तित्व और संपूर्ण जीवन की घटनाएं व संपूर्ण जीवन का इतिहास छिपा हुआ होता है। यह वह अणुविक शरीर है जिसके निर्माण का आधार पहले ही दिन गर्भ में हो जाता है और जिसमें निर्माण-कार्य पूर्ण होने पर आत्मा प्रवेश करती है। इस अणुविक शरीर की जैसी संरचना है, जैसी स्थिति है, उसी के अनुकूल आत्मा उसमें प्रवेश करती है।
       मनुष्य जाति का जीवन और चेतना आज हर क्षण पतन की ओर अग्रसर होती जा रही है। इसका एकमात्र कारण यह है कि संसार के दम्पति श्रेष्ठ व उच्चकोटि की आत्माओं को उत्पन्न होने का अवसर ही नहीं दे रहे हैं। वे जो अवसर दे रहे हैं, वह निम्नकोटि की आत्माओं के पैदा होने के लिए है। यही कारण है कि अच्छी और उच्चकोटि की आत्माओं का संसार में अभाव हो गया है और दूसरी ओर निम्नकोटि की आत्माओं की संख्या आकाश छूने लगी है।
      यह जरुरी नहीं कि मनुष्य के मर जाने के बाद उसकी आत्मा को तुरन्त जन्म लेने या शरीर पाने का अवसर मिल जाये। साधारण आत्माएं तो 13 दिन के भीतर अपने शरीर को खोज लेती हैं लेकिन जो आत्माएं अत्यन्त निकृष्ट कोटि की होती हैं, वे रुक जाती हैं क्योंकि उनकी निकृष्टता के अनुकूल निकृष्ट गर्भ और अवसर मिलना कठिन होता है। ऐसी ही निकृष्ट आत्माओं को हम 'भूत-प्रेत' कहते हैं। इसी प्रकार बहुत उच्च और श्रेष्ठ कोटि की आत्माएं भी रुक जाती हैं क्योंकि उनके अनुकूल श्रेष्ठ व उच्चकोटि का अवसर उन्हें नहीं मिल पाता। ऐसी ही उत्कृष्ट आत्माओं को हम 'देवता' कहते हैं। यही प्रमुख कारण है अवतार ग्रहण करने योग्य उच्च लोकों की उच्च आत्मा को भूलोक में शीघ्र अवतरित न हो पाने का। पूरा का पूरा कालखंड बीत जाता है, युग परिवर्तन हो जाते हैं, तब कहीं जाकर अवतार होता है।
      पूर्व के समय में मनुष्य रूपी भूत-प्रेत कम थे और देव पुरुष अधिक थे। लेकिन आज भूत-प्रेत मनुष्य के रूप में बहुत अधिक आ गए हैं तथा देव पुरुष कम। श्रेष्ठ आत्माओं के जन्म के लिए आवश्यक बात है प्रेमपूर्ण विवाह का होना। लेकिन आज प्रेमपूर्ण विवाह का सर्वथा अभाव है। सच्चा प्रेम ही आध्यात्मिक जीवन का आधार है। अतः श्रेष्ठ आत्माओं के अवतरण के लिए प्रेममय आध्यात्मिक जीवन की आवश्यकता है।
       स्त्री अखिल विश्वब्रह्माण्ड में चैतन्य और क्रियाशील महाशक्ति का एक विशिष्ट केंद्र है। मगर इस रहस्य से बहुत कम लोग परिचित होंगे कि पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक सुन्दर, सुडौल और आकर्षक क्यों दिखलाई पड़ती है ? उसके व्यक्तित्व के भीतर आखिर ऐसा कौन-सा तत्व है जो आनंद के लिए पुरुष को आकर्षित करता है ? इसका एक कारण है जो बिलकुल साधारण है और जिसकी हम-आप कल्पना तक नहीं कर सकते।
      जिसे हमने 'अणुविक शरीर' अथवा 'एटॉमिक बॉडी' कहा है, उसमें 24 जीवाणु पुरुष के और 24 जीवाणु स्त्री के होते हैं। इन 48 परमाणुओं के मिलन से पहला 'सेल' निर्मित होता है और इस प्रथम सेल से जो प्राण पैदा होता है, उससे स्त्री का शरीर बनता है। 24+24 :48 का यह सन्तुलित सेल होता है। पुरुष का जो सेल होता है और उससे जो प्राण पैदा होता है, वह 47 जीवाणुओं का होता है। उसके सन्तुलन में एक ओर 23 और दूसरी ओर 24 (23+24:47) जीवाणु होते हैं। बस, यहीं से पुरुष के व्यक्तित्व का सन्तुलन टूट जाता है। इसके विपरीत स्त्री का व्यक्तित्व सन्तुलन की दृष्टि से बराबर(24+24:48) है। उसी के परिणाम स्वरूप स्त्री का सौंदर्य, सुडौलता, आकर्षण, सम्मोहन, कला और रस उसके व्यक्तित्व में पैदा हो जाता है।
      पुरुष के व्यक्तित्व में एक ओर 24 जीवाणु हैं और एक ओर 23 जीवाणु हैं, अतः वह असन्तुलित है। उसमें एक जीवाणु की कमी है। उसे माँ से जो जीवाणु मिला, वह 24 का बना हुआ है और पिता से जो मिला, वह 23 का बना हुआ है। बस, इसी असन्तुलन से पुरुषों में जीवनभर बेचैनी बनी रहती है। एक आन्तरिक अभाव खटकता रहता है। क्या करूं, क्या न करूं ? यह कर् लूँ, वह कर लूँ। इस प्रकार की चिन्ता और उधेड़-बिन बराबर बनी रहती है। तात्पर्य यह कि यह एक छोटी-सी घटना अर्थात् एक अणु का अभाव स्त्री-पुरुष के संपूर्ण जीवन में इतना भारी अन्तर ला देता है।
      मगर यह अन्तर स्त्री में सौंदर्य, आकर्षण, सुडौलता, सम्मोहन, कला और रस तो पैदा कर देता है, पर उसको विकसित नहीं कर पाता। क्योंकि जिस व्यक्तित्व में समता होती है, उसके विकास के अवसर कम ही होते हैं। वह जहाँ है, वहीँ रुक जाता है। यही नियम सर्वत्र लागू होता है। सम्भवतया यही एकमात्र ऐसा जैविक कारण है कि हमारे विद्वान् मनीषियों ने समगोत्री कुल और परिवार में स्त्री-पुरुष के विवाह का स्पष्ट निषेध किया है। क्योंकि उनकी जो सन्तान होगी, उसके विकास और गुणवत्ता की विविधता में कमी होगी। इसी विविधता की कमी के कारण ही उसके व्यक्तित्व का बहुआयामी विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसके विपरीत पुरुष का व्यक्तित्व सम नहीं, विषम है और इसी विषमता के कारण उसका बहुआयामी विकास स्वाभाविक रूप से हो जाता है। इसके कारण पुरुष जो कार्य करता है, वह स्त्री कभी नहीं कर पाती। यदि वह कोशिश भी कर ले तो भी पुरुष की तरह वह सफल नहीं हो पाती।
       स्त्री और पुरुष के चार भिन्न-भिन्न विद्युतीय शरीर हैं और उन्हीं चार शरीरों तक दोनों में भेद पाया जाता है। स्त्री-पुरुष के चारों शरीर स्त्री-पुरुष के मिश्रित होते हैं। सभी को भली भाँति ज्ञात होना चाहिए कि शरीर संरचना में माँ से प्राप्त एक्स जीवाणु और पिता से प्राप्त एक्स और वाई जीवाणु के संयोग से माँ के गर्भ में प्रथम दिन जो सेल निर्मित होता है और उससे जो प्राण पैदा होता है, उसी से आने वाले शिशु का शरीर विकसित होता है। माँ के डिम्बाशय से जो डिम्ब निकलता है, उसमें केवल एक्स(X) जीवाणु होते हैं और पिता के शुक्र से जो स्पर्म आते हैं, उनमें एक्स और वाई(Xऔर Y) दो प्रकार के जीवाणु होते हैं। ये जीवाणु एक साथ एक समय में करोड़ों की संख्या में निकलते हैं। मगर माँ के डिम्बाशय के जीवाणु से पिता से प्राप्त केवल एक ही जीवाणु संयोग कर पाता है। शेष नष्ट हो जाते हैं। अब यदि माँ से प्राप्त एक्स 
(X) जीवाणु का संयोग पिता से प्राप्त एक्स(X) जीवाणु से हो गया तो दोनों X+X = - अर्थात् माइनस (ऋणात्मक) विद्युत् आवेशयुक्त रहता है। इसी प्रकार यदि माँ से प्राप्त एक्स(X) जीवाणु का संयोग पिता से प्राप्त वाई  जीवाणु से हो गया तो X+Y = + प्लस (धनात्मक) विद्युत् आवेशयुक्त रहता है। दो X X मिलकर र्ऋणात्मक और X और Y मिलकर धनात्मक सेल की रचना करते हैं। 
      ऋणात्मक सेल से स्त्रैण शरीर की और धनात्मक सेल से पुरुष शरीर की रचना प्रक्रिया आरम्भ होती है। मगर यहाँ एक दूसरा तथ्य भी कार्य करता है। पुरुष शरीर में एक साथ चार शरीर और स्त्री शरीर में भी एक साथ चार शरीर मिश्रित होते हैं। ये चार शरीर निम्न लिखित हैं। पहला शरीर जैसा कि दिखाई देता है--स्थूल या भौतिक या पार्थिव शरीर कहलाता है, दूसरा शरीर जो इसके भीतर होता है, उसे भाव या वासना या आकाशीय या विद्युतीय शरीर कहते हैं। तीसरा शरीर जो भाव शरीर के भीतर छिपा होता है, उसे सूक्ष्म शरीर की संज्ञा दी गयी है और चौथा शरीर जो सूक्ष्म शरीर के भी भीतर होता है, उसे मनोमय शरीर कहते हैं। इस तरह ये चारों शरीर स्त्री और पुरुष के शरीर में मिश्रित रूप से इस तरह रहते हैं जैसे दूध और पानी मिश्रित रहते हैं।
       यदि कोई व्यक्ति पुरुष है तो उसका पहला भौतिक् शरीर जैसा कि दिखलाई पड़ता है, पुरुष शरीर होता है। लेकिन जो उसका दूसरा भाव शरीर है, वह स्त्रैण शरीर(स्त्री का शरीर) है। इसका कारण यह है कि पुरुष शरीर धनात्मक और स्त्री शरीर ऋमात्मक विद्युत् अवेशयुक्त हैं। विज्ञान के नियमानुसार कोई धनात्मक ध्रुव या ऋणात्मक ध्रुव अकेला नहीं रह सकता। यदि अकेला है भी तो कौन जानता है क्योंकि उसकी उपस्थिति का आभास नहीं हो सकता। उसकी उपस्थिति दूसरे ध्रुव के मेल से पता चल पाती है जब दोनों के संयोग से विद्युत् धारा का प्रवाह आरम्भ हो जाता है। विद्युत् एक प्रकार की ऊर्जा है, शक्ति है, एक प्रवाह है और उसकी क्रियाशीलता से ही उसका आभास मिल पाता है। अन्यथा तो शक्ति विहीन वस्तु उस प्रकार निष्क्रिय होती है जैसे प्राणविहीन शव। 
      स्त्री का पहला भैतिक शरीर ऋणात्मक है, यही कारण है कि स्त्री अधिकांश मामलों में(अपवाद को छोड़कर) कामवासना के सन्दर्भ में आक्रामक नहीं हो सकती। वह कभी पुरुष पर बलात्कार नहीं कर सकती। वह बलात्कार झेल सकती है, व्यथा सहन कर सकती है। कामवासना के क्षेत्र में बिना पुरुष की इच्छा या  आवाहन के स्त्री कुछ भी नहीं कर सकती। स्त्री का दूसरा भाव शरीर धनात्मक, तीसरा शरीर फिर ऋणात्मक और चौथा शरीर धनात्मक होता है। 
      ऋणात्मक का मतलब शून्य नहीं समझना चाहिए। विद्युत् विज्ञान की भाषा में इसका अर्थ होता है--संग्राहक(ग्रहण करने वाली)। स्त्री के पास एक ऐसा शरीर है जिसमें असीम शक्ति संग्रहीत है। मगर वह असीम शक्ति क्रियाशील नहीं, निष्क्रिय रहती है। हमारे पुराणों ने इस महत्वपूर्ण सिद्धान्त को बहुत ही रोचक और अर्थवान रूपक के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। देवासुर संग्राम में जब समस्त देवगण अपने सभी प्रयत्नों के बावजूद भी असुरों को परास्त करने में असमर्थ हो गए तो वे सब मिलकर महामाया पराशक्ति के आश्रय में पहुंचे और फिर उन देवों के समवेत अंश से जो एक विलक्षण तेज उत्पन्न हुआ और उससे जो विध्वंसात्मक ऊर्जा पैदा हुई, वह वही महाकाली, कराली, कंकाली, दुर्गा का स्वरुप थी। फिर उस ऊर्जस्वित तेजपुंज के आवेग को रोक पाना किसी देव के वश में भी नहीं था। इसी स्वरुप का सचित्र चित्रण पुराणों और तंत्रग्रंथ 'दुर्गा सप्तशती' में किया गया है। उत्तेजित, आक्रोशित दुर्गा का तेज जब किसी देव के रोके न रुका तो फिर देवों के देव 'महादेव' महाकाली को रोकने के लिए सामने आ गए। फिर भी महादेवी का वेग शीघ्र शान्त नहीं हो पाया और उनके पैर महादेव के ऊपर आ पड़े। महादेव के ऊपर आक्रोशित महाकाली का वह विग्रह इस तथ्य की ओर संकेत है कि जब तक स्त्री की ऋणात्मक शक्ति शान्त है, तबतक वह शान्त है, निष्क्रिय है, लेकिन जैसे ही वह धनात्मक शक्ति के माध्यम से  जबर्दस्ती जाग्रत की जाती है, वैसे ही वह अशान्त, उत्तेजित, आक्रोशित और क्रियाशील हो जाती है। फिर उसकी क्रियाशीलता, उत्तेजना, क्रोध या आवेश शीघ्र शान्त नहीं हो पाता।
       यही कारण है कि स्थूल शरीर की दृष्टि से पुरुष स्त्री की अपेक्षा अधिक ताकतवर है, लेकिन वह कुछ ही क्षणों के लिए है क्योंकि पुरुष का दूसरा शरीर जो स्त्रैण शरीर है, वह नकारात्मक है। यदि उसको स्त्री से लम्बे समय तक संघर्ष करना पड़े तो वह पराजित हो जायेगा। इसका एकमात्र कारण यही है कि स्त्री का दूसरा शरीर जो पुरुष शरीर है, उसमें धनात्मक आवेश विद्यमान है। इसीलिए स्त्री में पुरुष की तुलना में सहनशक्ति अधिक होती है।
      पुरुष और स्त्री में इन चार शरीरों तक भेद रहता है। पांचवां शरीर लिंगभेद से परे है। इसीलिए इसे अलिंग शरीर कहते हैं। क्योंकि आत्मा का कोई लिंग नहीं होता। वह कभी पुरुष शरीर में तो कभी स्त्री शरीर में प्रवेश कर जन्म ग्रहण करती है। कब वह पुरुष शरीर में और कब स्त्री शरीर में प्रवेश करेगी, यह परिस्थितयों, कर्म और प्रारब्ध के ऊपर निर्भर है। यह विषय एक अलग विषय है, इस सम्बन्ध में कभी किसी दूसरी जगह चर्चा अपेक्षित है। यहाँ विषयांतर करने की आवश्यकता नहीं है।
      सफल दाम्पत्य जीवन के लिए आवश्यक है कि स्त्री को ऐसा पति मिले जो उसके भीतर विद्यमान पुरुष शरीर से सामंजस्य रख सके।  उसी प्रकार पुरुष को ऐसी पत्नी मिले जो  पुरुष के भीतर विद्यमान स्त्री शरीर से उचित तालमेल बैठा सके। इसके लिए स्त्री-पुरुष दोनों को अपने-अपने भीतर के विद्युतीय शरीरों को जानना-समझना-पहचानना जरुरी है। और यह तभी संभव है जब वे कुण्डलिनी जागरण के उपाय के रूप में 'बिन्दुसाधना' करते हैं। बिन्दुसाधना वह साधना है जिसमें स्त्री या पुरुष अपने भीतर के विद्युतीय शरीरों से साक्षात्कार करते हैं। उसे जानने-समझने का कार्य करते हैं और उससे सामंजस्य बैठाते हैं।(हमारी प्राचीन भारतीय सनातन संस्कृति में चार आश्रमों की जो व्यवस्था की गयी थी--ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानवप्रस्थ और सन्यास आश्रमों की, उनमें ब्रह्मचर्य आश्रम में 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य शक्ति का संचय करने का विधान किया गया था और गृहस्थ आश्रम को उसके प्रयोग और परीक्षण के लिए व्यवस्थित किया गया था जिसके परिणाम स्वरुप ही 'परिणय' या 'विवाह' की नैतिक और भावनामय परंपरा का सफल निर्वहन करना होता है। परिणय या विवाह का उद्देश्य मात्र कामवासना की तृप्ति ही नहीं है, बल्कि यह एक उच्च गुरुतर उत्तरदायित्व के निर्वाह का परीक्षण काल है। 20-25 वर्षों तक जिस ब्रह्मचर्य तत्व की शक्ति का जो संचय किया गया होगा, उसीका कुण्डलिनी जागरण के क्रम में बिन्दुसाधना की प्रक्रिया का प्रयोग और परीक्षण है, न कि कामवासना की तृप्ति। इस प्रयोजन में यह प्रक्रिया शुद्ध मन, प्राण और भाव से की जाती है, तभी बिन्दुसाधना की सफलता है। साथ ही पितृ ऋण से मुक्ति के लिए उच्चकोटि की आत्मा को स्त्री-पुरुष-समागम के माध्यम से आकर्षित किया जाता है ताकि सृष्टि प्रक्रिया की मर्यादा का पालन  हो सके। उच्च और विशुद्ध भाव से यह ईश्वरीय क्रिया मानकर करने से उच्च आत्माएं आकृष्ट होती हैं और केवल कामवासना के वेग को शान्त करने के लिए स्त्री-पुरुष संसर्ग में  वासनाप्रधान निम्न कोटि की आत्माएं आकृष्ट होती हैं)।
       इन सारे तथ्यों को ध्यान में रखकर भारतीय सनातन समाज में एक विशिष्ट जीवन शैली निर्धारित की गई जिसे 'हिन्दू संस्कृति' या 'सनातन संस्कृति' की संज्ञा दी गयी। इस संस्कृति में सर्वप्रथम स्थूल शरीर को साधन और ब्रह्मचर्य को साध्य बनाया गया था।
       यहाँ मानव शरीर की रचना,  उनसे सम्बंधित तत्वों,  लोकों तथा चक्रों का विवरण नीचे दिया जा रहा है--

1-स्थूल शरीर(physical body): स्थूल जगत् :पृथ्वी तत्व : मूलाधार चक्र।
 2-भाव या वासना शरीर(etheric body): वासना जगत् या प्रेत जगत् या स्वप्न जगत् या भाव जगत्: जल तत्व: स्वाधिष्ठान चक्र।
3-सूक्ष्म शरीर या प्राण शरीर(astral body): सूक्ष्म जगत् : अग्नि तत्व: मणिपूरक चक्र।
4-मनोमय शरीर या मनः शरीर(mental body): मनोमय जगत्: वायुतत्व: अनाहत चक्र।
5-आत्म शरीर(spiritual body) : आत्म- जगत्: आकाश तत्व : विशुद्ध चक्र।
6-ब्रह्म या ब्रह्मांडीय शरीर(cosmic body) : ब्रह्म जगत् या ब्रह्माण्ड जगत् पंचतत्व रहित अवस्था : आज्ञाचक्र।
7-निर्वाण शरीर(bodiless existence): निर्वाण जगत् :शून्यावस्था: सहस्रार चक्र।

                            समाप्त

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