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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

स्‍टेम सेल थेरेपी से ठीक हुए एचआईवी के दो मरीज

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मेलबर्न : अमेरिकी के दो मरीजों को घातक बीमारी एचआईवी से पूरी तरह छुटकारा मिल गया है। इससे उन लोगों के लिए उम्‍मीद की किरण जगी है, जो इस बीमारी से पीडि़त हैं। 

बोस्‍टन में ब्रिगहैम एंड वीमेंस हॉस्पिटल के डाक्‍टरों ने बुधवार रात घोषणा की कि एचआईवी से पीडि़त दो मरीजों को इस खतरनाक वायरस (ब्‍लड और टिश्‍यू) से पूरी तरह मुक्ति मिल गई है। कैंसर का इलाज करने के क्रम में बोन मैरो स्‍टेम सेल ट्रांसप्‍लांट किया गया था। जिन दो मरीजों का इलाज किया गया था, उसमें से एक युवा है और दूसरा प्रौढ़ है। एंटी रिट्रोवायरल थेरेपी के आठ और पंद्रह हफ्ते के बाद इनमें इस घातक वायरस के लक्षण नहीं दिखे। एचआईवी पॉजिटीव मरीज जब इलाज बंद कर देते हैं तो यह वायरस से चार से आठ हफ्ते के बीच दोबारा सक्रिय हो जाता है।  sabhar : http://zeenews.india.com

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शनिवार, 22 जून 2013

एलियंस का पता लगाने के लिए भेजा मैसेज

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वॉशिंगटन. ब्रह्माण्ड में एलियंस की मौजूदगी को लेकर हर किसी के मन में जिज्ञासा है। 17 जून को एलियंस को संदेश (लोन सिग्नल) भेजा गया। यह संदेश लोन सिग्नल प्रोजेक्ट के तहत भेजा गया है। इस प्रोजेक्ट के जरिए इंटरनेट यूजर्स बीम मैसेज भेज कर ब्रह्मांड में एलियंस की मौजूदगी का पता कर पाएंगे।
 
 
लोन सिग्नल प्रोजेक्ट के मुख्य मार्केटिंग ऑफिसर अर्नेस्टो क्वालिज्जा के मुताबिक अब हम जान सकेंगे कि ब्रह्मांड के किसी कोने पर एलियंस मौजूद हैं? विख्यात वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने भी कहा था कि एलियंस हमारी पृथ्वी के आसपास ही हैं। वे लगातार हमपर और हमारी गतिविधियों पर नजर भी रख रहे हैं।
 
 
ग्लीज-526 पर एलियंस की संभावना : हक-मिश्रा
 
प्रोजेक्ट के अंतर्गत वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में एक बिंदु चुना है। कैलिफोर्निया का जेम्सबर्ग अर्थ स्टेशन तारामंडल ग्लीज-526 को संदेश भेजेगा। पृथ्वी से ग्लीज 17.6 प्रकाश वर्ष दूर है। लोन सिग्नल ने प्रोजेक्ट के मुख्य साइंस ऑफिसर जैकब हक-मिश्रा के मुताबिक  वैज्ञानिकों को किसी भी ड्वार्फ का चक्कर लगाता कोई ग्रह नहीं मिला। वहीं ग्लीज-526 पर एलियंस के होने की संभावना हो सकती है। हक-मिश्रा और उनकी टीम ही यह निर्णय करेगी कि ये संदेश किस तारामंडल में भेजे जाएंगे।
 
 
जेम्सबर्ग स्टेशन
 
जेम्सबर्ग स्टेशन का रेडियो एंटीना 1968 में स्थापित किया गया था। लोन सिग्नल ने यह एंटीना 30 साल की लीज पर लिया है। भविष्य में लीज बढ़ाई जा सकती है।
 
ऐसा है संदेश
 
ग्लीज को संदेश भेजने के लिए विभिन्न प्रकार की वेव्स का उपयोग किया गया। माइकल बुश द्वारा तैयार अभिवादन वाले संदेशों में ब्रह्माण्ड में पृथ्वी की स्थिति, मैंडलीफ की आवर्त सारणी में उल्लिखित तत्व और हाइड्रोजन परमाणु के बारे में बताया गया है। 
 
 
हम कैसे भेज सकते हैं मैसेज
 
आप कई तरह से प्रोजेक्ट में हिस्सा ले सकते हैं। छोटा संदेश मुफ्त भेज सकते हैं। ज्यादा शब्दों का संदेश और फोटो भेजना चाहते हैं तो आपको करीब  56 रुपए चुकाने होंगे।
sabhar : bhaskar.com
 
 

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रविवार, 31 मार्च 2013

एचआईवी से बचाने वाली दवा

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 एचआईवी से बचाने वाली दवा
 (इस दवा को ब्रिटेन एचआईवी के इलाज के लिए उपयोग की अनुमति देता है न कि उसके बचाव के लिए)

अभी तक दुनिया भर में एचआईवी और एड्स के लड़ने की जद्दोजहद चल रही है और शोध चल रहे हैं कि

इसका इलाज किस तरह से किया जाए.
ये सब एचआईवी संक्रमण के बाद की बाते हैं.
लेकिन इस बीच अब एक ऐसी दवा आ गई है जो एचआईवी संक्रमण को रोकती है.
अमरीकी स्वास्थ्य नियामक संस्था ने पहली बार एक ऐसी दवा को अनुमति दे दी है जो एचआईवी के संक्रमण को रोकती है.
शोध कहता है कि हर रोज़ एक गोली खाने से एचआईवी संक्रमण का खतरा 73 प्रतिशत तक कम हो सकता है.
फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफ़डीए) ने कहा है कि त्रुवादा नाम की ये दवा उन लोगों को दी जा सकती है जिन्हें एचआईवी संक्रमण का खतरा बहुत अधिक है या ऐसे लोगों को जिन्हें एचआईवी संक्रमित व्यक्ति से यौन संबंध बनाने की स्थिति बन सकती है.

विरोध भी

कुछ स्वास्थ्य कर्मियों और एचआईवी प्रभावित लोगों के बीच काम कर रही संस्थाओं ने इस दवा को अनुमति दिए जाने का विरोध किया है.
"हम जानते हैं कि एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति यदि नियमित रूप से एंटीरेट्रोवायरल दवा लेता रहे तो उसका वायरस इतना कमज़ोर हो जाता है कि वह किसी और को संक्रमित लायक ही नहीं बचता"
माइकल बॉर्टन, यूएनएड्स
उनका कहना है कि ऐसी दवा से एचआईवी से रक्षा की एक झूठी सुरक्षा की भावना पैदा होगी और इससे ये होगा कि लोग ज्यादा खतरा उठाने लगेंगे.
उन्हें यह डर भी है कि एचआईवी का एक वायरस भी पैदा हो सकता है जिसमें इस दवा के प्रतिरोध की क्षमता हो. यानी एक समय के बाद इस दवा का असर होना बंद हो जाए.
एफडीए ने एक बयान में कहा है कि इस दवा का उपयोग 'व्यापक एचआईवी बचाव योजना' के तहत की प्रयोग में लाया जाना चाहिए जिसमें कंडोम का प्रयोग और नियमित एचआईवी परीक्षण शामिल है.
मई में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की एक सलाहकार समिति ने एडीए से इस दवा को अनुमति देने की सिफ़ारिश की थी.

'दूसरी दवाओं के साथ लें'

एएफ़डी ने कहा है कि जो लोग पहले से एचआईवी संक्रमित हैं, उन्हें ये दवा एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के साथ लेना चाहिए.
वर्ष 2010 में किए गए प्रयोग से पता चला है कि ट्रूवाडा ने समलैंगिक पुरुषों में एचआईवी की आशंका को 44 प्रतिशत और किसी एचआईवी संक्रमण से मुक्त व्यक्ति के एचआईवी प्रभावित विषमलिंगी व्यक्ति से यौन संबंध बनाने पर संक्रमण की आशंका को 73 प्रतिशत तक कम कर दिया.
एंटीरेट्रोवायरल
एचआईवी संक्रमण के बाद के इलाज के लिए कई दवाएँ पहले से ही बाजार में हैं
संयुक्त राष्ट्र एड्स कार्यक्रम यूएनएड्स के माइकल बॉर्टन ने कहा कि इस बात के सबूत हैं कि ये दवा एचआईवी संक्रमण के खतरे को कम करती है लेकिन तभी जबकि इसका नियमित सेवन किया जाए.
उनका कहना है कि ज्यादातर मामलों में अच्छा ये होगा कि एचआईवी से प्रभावित व्यक्ति का इलाज किया जाए न कि उसके उस पार्टनर पर ध्यान दिया जाए जिसे एचआईवी नहीं है.
उनका कहना है, "हम जानते हैं कि एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति यदि नियमित रूप से एंटीरेट्रोवायरल दवा लेता रहे तो उसका वायरस इतना कमज़ोर हो जाता है कि वह किसी और को संक्रमित लायक ही नहीं बचता."
एंटीरेट्रोवायरल दवा एचआईवी संक्रमित व्यक्ति की जीवन अवधि भी बढ़ा देती है.
ट्रुवाडा को ब्रिटेन में भी अनुमति दी गई है लेकिन एचआईवी के इलाज के लिए न कि उससे बचाव के लिए.
 SABHAR : BBC.CO.UK

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शनिवार, 30 मार्च 2013

इंसानी दिमाग में लगेगा चिप !

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क्या एक दिन ऐसा भी आएगा जब दिमाग में प्रत्यारोपित किए गए चिप की बदौलत इंसान सीधे संपूर्ण मानव ज्ञान का उपयोग करने में सक्षम हो पाएगा?
आपको शायद ये बात मज़ाक लगे, शायद सोच से परे भी, लेकिन अमरीकी लेखक और आविष्कारक रे कुरुजविल का मानना है कि ऐसा भविष्य में ज़रुर संभव होगा.


हाल ही में सैनफ्रांसिस्को में हुए एक सम्मेलन में रेकुरुजविल ने बीबीसी फ्यूचर को बताया कि किस तरह से भविष्य में महत्वपूर्ण बदलाव जन्म लेंगे और इंसानों व समाज पर इनका क्या असर होगा. ये परिवर्तन मानव इतिहास का सबसे बड़ा परिवर्तन होगा.
रे कुरुजविल का तर्क है कि क्लिक करेंकंप्यूटर की ताकत आज जिस तरह से बढ़ गई है, उस देखते हुए कहा जा सकता है कि 2029 में मशीनें इंसानों की तरह ही स्मार्ट हो जाएगी.
चिप को तंत्रिका तंत्र से जोड़ कर हम मानव को और स्मार्ट बनाया जा सकता हैं.
"सूचना प्रौद्योगिकी जिस रफ्तार से बढ़ रही है, दशक पहले जितना कंप्यूटर इस्तेमाल में आता था, उसकी तुलना में आज हम दोगुनी तेजी़ से कंप्यूटर की ताकत का इस्तेमाल करते हैं, भविष्य में इसकी ताकत और इस्तेमाल लगातार बढ़ता जाएगा."
रे कुरुजविल
ये कुछ कुछ वैसा ही होगा जिस तरह से आज हम वर्चुअल रिएलटी गेम का इस्तेमाल करते हैं, ये भी कुछ उसी तरह से संभव होगा.
इसके बाद इंसान की सोच का दायरा भी काफी बड़ा हो जाएगा.

भविष्य की सोच

रे कुरुजविल कहते हैं, “सूचना प्रौद्योगिकी जिस तरह से बढ़ रही है, दशक पहले जितना कंप्यूटर इस्तेमाल में आता था, उसकी तुलना में आज हम दोगुनी तेजी़ से कंप्यूटर की ताकत का इस्तेमाल करते हैं, भविष्य में इसकी ताकत और इस्तेमाल लगातार बढ़ता जाएगा
लेकिन वो स्थितियां कैसी होंगी, इस सवाल पर वो कहते हैं, "लोग नए तरीकों सेक्लिक करेंप्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने लगेंगे और अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए इन शक्तिशाली उपकरणों का इस्तेमाल करने लगेंगे."
चिप को मस्तिष्क में लगाने के बाद कई रोगों का निदान किया जा सकता है, जैसे पार्किंन्सन ले पीड़ित रोगियों के आलावा बधिर लोगों को भी सक्षम बनाया जा सकता है.
तो क्या आप तैयार हैं भविष्य के ऐसे इंसान के लिए जो हर चीज़ इंसान से बेहतर सोचेगा और शायद करेगा भी
 sabhar : bbc.co.uk

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मंगलवार, 26 मार्च 2013

"रिसर्च का तरीका अलग है"

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अभिजीत बोरकर माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट में एस्ट्रोफिजिक्स विभाग में शोध कर रहे हैं. शर्मीले और शांत दिखने वाले अभिजीत को जर्मनी आए अभी कुछ ही समय हुआ है. वह शोध पूरा कर भारत लौटना पसंद करेंगे.
अभिजीत कहते हैं कि अगर वह भारत में विज्ञान को किसी तरह बढ़ावा दे पाएं और हाईस्कूल के बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि पैदा कर पाएं तो उनहें बहुत अच्छा लगेगा. मंथन में इस बार उन्होंने ब्लैक होल और उल्कापिंडों पर रोशनी डाली. पेश हैं उनसे बातचीत के कुछ अंश.
डॉयचे वेलेः अभिजीत जर्मनी में आपने अपने शोध के लिए कहां कहां आवेदन किया?
अभिजीत बोरकरः जी मैंने सिर्फ माक्स प्लांक संस्थान के लिए ही अप्लाई किया था. मेरा चयन यहां सबसे पहले हो गया, तो जुलाई 2012 में मैं यहां पीएचडी के लिए जर्मनी आ गया.
यहां शोध करने के लिए आपने कैसे आवेदन किया?
पीएचडी के लिए आप दो तरह से अप्लाई कर सकते हैं, या तो सीधे प्रोफेसर से संपर्क कीजिए और उन्हें ईमेल या फोन के जरिए अपना प्रोजेक्ट बताइए, या फिर आप उनके कॉलेजों में आवेदन कर सकते हैं. फिर बाकायदा इंटरव्यू होने के बाद छात्रों को चुना जाता है. मेरे मामले में जर्मनी आने की इच्छा खास थी. इसके अलावा मैंने जब अप्लाई किया तब मेरा मास्टर्स पूरा नहीं हुआ था और यही एक ऐसा संस्थान था जहां मैं ऐसी हालात में भी अप्लाई कर सकता था.
अपने रिसर्च के बारे में कुछ बताइए.
मैं हमारी आकाशगंगा के बारे में शोध कर रहा हूं. हमारी गैलेक्सी के केंद्र में जो सुपर मैसिव ब्लैक होल है, उसका रेडियोएनालिसिस करना मेरा विषय है. इसमें मैं वैसे तो अकेले ही काम कर रहा हूं. कभी कभार किसी के साथ सहयोग भी हो जाता है, लेकिन मूल तौर पर मेरा काम अकेले का ही है.
कौन सा आकर्षण था जो आपको एस्ट्रोफिजिक्स की ओर ले आया?
दो कारण थे. एक तो कि खगोल विज्ञान वैसे तो बहुत पुराना विज्ञान है, लेकिन इसमें शोध काफी कम हुआ है. अंतरिक्ष के बहुत से राज खुलने अभी बाकी हैं. भौतिकी के बाकी क्षेत्रों में काफी शोध हुआ है, जबकि खगोल विज्ञान में नहीं. तो यहां संभावनाएं काफी हैं. इससे भी अहम यह है कि सादी तकनीक के जरिए आप काफी जानकारी जमा कर सकते हैं. तो यह आसान तो है, लेकिन जटिल भी.
खगोल विज्ञान के क्षेत्र में शोध के लिए भारत में तकनीकी सुविधाएं कैसी हैं?
मैंने जो शोध देखे हैं या जिस फील्ड में फिलहाल मैं काम कर रहा हूं, वहां तकनीकी तौर पर बहुत अंतर नहीं है. सभी काम अंतरराष्ट्रीय साझेदारी में ही चलता है. टेलीस्कोप और अन्य चीजें अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं. फर्क काम करने के तरीके में है. ब्यूरोक्रैटिक काम में फर्क दिखता है, लेकिन तकनीकी तौर पर दोनों देशों में कोई फर्क नहीं है, खासकर मेरे शोध क्षेत्र में. लेकिन यह है कि भारतीय छात्रों को प्रैक्टिकल का अनुभव कम है. इसका कारण सिर्फ इतना है कि मास्टर्स में छात्रों को उतने मौके नहीं मिलते. तो उन्हें ज्यादा प्रोजेक्ट्स की जानकारी नहीं होती और तकनीक की भी जानकारी कम होती है. बैचलर के छात्रों को प्रयोग के दौरान सभी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं. वह किसी भी मशीन का इस्तेमाल कर सकते हैं जो हमारे यहां नहीं होता.
और क्या फर्क दिखाई देते हैं.
एक बड़ा फर्क यह है कि कई बार छात्र स्नातक के बाद शोध के लिए एक दो साल का गैप ले लेते हैं, तो उन्हें शोध का थोड़ा अनुभव भी हो जाता है. जो हमारे यहां नहीं हो पाता.
जर्मनी में आकर आपने सबसे पहले क्या नया सीखा?
मेरे लिए यहां का वर्क कल्चर अहम था. यहां पर लोग नौ बजे आते हैं और सिर्फ पांच ही बजे तक काम करते हैं. और जब काम करते हैं तो सिर्फ काम ही करते हैं, इसके अलावा कुछ नहीं. यह मुझे रोचक लगा. दूसरा कि यहां के छात्रों का तकनीकी ज्ञान बहुत ही अलग होता है. मैंने देखा है कि भारत में छात्र थ्योरी में बहुत अच्छे होते हैं, लेकिन यहां के तकनीकी तौर पर बेहतर होते हैं.
आप यहां सबसे ज्यादा क्या मिस करते हैं?
खाना मिस करता हूं. और दूसरा है मौसम. यहां सूरज दिखाई ही नहीं देता, तो बहुत परेशानी होती है.
इंटरव्यूः आभा मोंढे
संपादनः ईशा भाटिया

sabhar : DW.DE


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रविवार, 13 जनवरी 2013

लास वेगास में टीवी की बदलती तस्वीर

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अमेरिका के लास वेगास को आलीशान होटलों और कसीनो के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक मेला भी लगता है. इस बार इस मेले में एचडी और ओएलईडी टीवी का जादू बिखरा हुआ है. एक टीवी की कीमत छह लाख तक है. अमेरिका के लास वेगास को आलीशान होटलों और कसीनो के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक मेला भी लगता है. इस बार यहां एचडी और ओएलईडी टीवी का जादू बिखरा हुआ है. एक टीवी की कीमत 60 लाख रुपये तक है. तकनीक में दो मजेदार चलन हैं: एक तो हर मुमकिन उपकरण के आकार को छोटा करने का और दूसरा फोन और टीवी की स्क्रीन को बड़ा करने का. कंप्यूटर छोटे हो कर टैबलेट की शक्ल ले चुके हैं, तो टीवी की स्क्रीन अब 90 इंच तक हो गई है. कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स शो यानी सीईएस में दुनिया भर की टीवी बनाने वाली कंपनियों ने शिरकत की है. इनमें सैमसंग, सोनी, एलजी, शार्प और पैनासोनिक शामिल हैं. खास तौर से सैमसंग और पैनासोनिक का पलड़ा इस शो में भारी लग रहा है. 89" का स्मार्ट टीवी सैमसंग के एस9 को देखने के लिए यहां काफी भीड़ जमा हो रही है. यह टीवी यूएचडी यानी अल्ट्रा हाई डेफिनिशन तकनीक का इस्तेमाल करता है और इसकी स्क्रीन 89 इंच की है. सैमसंग का दावा है कि इस तकनीक से तस्वीरें एचडी के मुकाबले चारगुना साफ दिखती हैं. इसकी यही खासियत तस्वीरों में अनोखी जान डाल देता है. इसके अलावा अत्याधुनिक कंप्यूटर की तरह इस टीवी में क्वाड्रा कोर प्रोसेसर लगा है, जिस कारण इसे स्मार्ट टीवी का नाम दिया गया है. टीवी देखते देखते अगर दोस्तों से बात करने का मन करे या गेम खेलने का मन हो तो उठ कर फोन या कंप्यूटर तक जाने की जरूरत नहीं. सब कुछ इस स्मार्ट टीवी में हो जाएगा. सैमसंग ने इसमें पांच पैनल बनाए हैं. पहला पैनल 'ऑन टीवी' सामान्य केबल टीवी की तरह काम करता है. लेकिन यह आपके पसंदीदा कार्यक्रम को खुद ही सेव कर लेता है. जब आप टीवी देख रहे होते हैं, यह खुद ब खुद कोने में एक छोटी स्क्रीन पर देखा हुआ दूसरा कार्यक्रम भी लगा देता है ताकि आप उसे देखना भूल न जाएं. इस तरह से एक ही साथ टीवी पर कई छोटी स्क्रीन दिख सकती हैं. दूसरा पैनल है 'मूवी एंड टीवी'. इसमें भी टीवी मनपसंद फिल्मों पर ध्यान देता है. पर इस पैनल में ऑन डिमांड वीडियो चलते हैं, जिन्हें आपने अलग से पसंद किया होता है. तीसरा पैनल है 'फोटो, वीडियो एंड मूवी'. यहां आप कंप्यूटर की तरह टीवी में सेव की गयी तस्वीरें वगैरह देख सकते हैं. चौथा पैनल है 'एप्स'. यहां भी कंप्यूटर या स्मार्टफोन की ही तरह टीवी को इस्तेमाल किया जा सकता है. पांचवां और आखिरी पैनल है 'सोशल' यानी यहां आप फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब के जरिए वीडियो देख सकते हैं. ओएलईडी के फीचर यूएचडी के अलावा ओएलईडी यानी ऑर्गेनिक लाइट एमिटिंग डायोड की भी मेले में धूम है. इसी तकनीक पर चलने वाले सैमसंग के एफ9500 में भी अनोखे फीचर हैं. इस टीवी के सामने बैठ कर दो लोग दो अलग अलग कार्यक्रम देख सकते हैं. इसके लिए खास 3डी चश्मों की जरूरत पड़ेगी. इस टीवी की कीमत 10,000 डॉलर रखी गयी है. सैमसंग का कहना है कि उसने दुनिया का पहला ऐसा टीवी बनाया है जिसकी स्क्रीन हल्की सी मुड़ी है. इससे तस्वीरें और भी शानदार दिखती हैं. लेकिन मेले में इस तकनीक को दिखाने वाले और भी हैं. एलजी ओएलईडी टीवी बनाने वाली पहली कंपनी के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहता है. 55 इंच वाले ओएलईडी टीवी की कीमत 12,000 डॉलर है. इसी तरह पैनासोनिक भी 4के ओएलईडी टीवी लाया है. 56 इंच स्क्रीन के साथ पैनासोनिक का दावा है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा ओएलईडी टीवी है. इसमें फेशियल रेकॉगनिशन तकनीक लगी है जो टीवी के सामने बैठे व्यक्ति के चेहरे को पहचान लेती है. इसके जरिए टीवी आपको बता सकता है कि आपके दोस्त इस वक्त क्या देख रहे हैं. ओएलईडी तकनीक वाले टीवी दूसरे टीवी के मुकाबले कईगुना पतले होते हैं. इनमें तस्वीरों के रंग बेहतरीन होते हैं और बिजली की खपत कम होती है. हालांकि इनकी कीमत देखते हुए जानकारों का मानना है कि इन्हें बाजार में जगह बनाने में समय लग सकता है. लेकिन तकनीक के शौकीन फिलहाल लास वेगास में इन चमकती तस्वीरों का लुत्फ उठा सकते हैं. यह मेला 8 से 11 जनवरी तक चलेगा. आईबी/एजेए (एएफपी, डीपीए) sabhae DW.DE

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लास वेगास में टीवी की बदलती तस्वीर

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अमेरिका के लास वेगास को आलीशान होटलों और कसीनो के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक मेला भी लगता है. इस बार इस मेले में एचडी और ओएलईडी टीवी का जादू बिखरा हुआ है. एक टीवी की कीमत छह लाख तक है. अमेरिका के लास वेगास को आलीशान होटलों और कसीनो के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक मेला भी लगता है. इस बार यहां एचडी और ओएलईडी टीवी का जादू बिखरा हुआ है. एक टीवी की कीमत 60 लाख रुपये तक है. तकनीक में दो मजेदार चलन हैं: एक तो हर मुमकिन उपकरण के आकार को छोटा करने का और दूसरा फोन और टीवी की स्क्रीन को बड़ा करने का. कंप्यूटर छोटे हो कर टैबलेट की शक्ल ले चुके हैं, तो टीवी की स्क्रीन अब 90 इंच तक हो गई है. कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स शो यानी सीईएस में दुनिया भर की टीवी बनाने वाली कंपनियों ने शिरकत की है. इनमें सैमसंग, सोनी, एलजी, शार्प और पैनासोनिक शामिल हैं. खास तौर से सैमसंग और पैनासोनिक का पलड़ा इस शो में भारी लग रहा है. 89" का स्मार्ट टीवी सैमसंग के एस9 को देखने के लिए यहां काफी भीड़ जमा हो रही है. यह टीवी यूएचडी यानी अल्ट्रा हाई डेफिनिशन तकनीक का इस्तेमाल करता है और इसकी स्क्रीन 89 इंच की है. सैमसंग का दावा है कि इस तकनीक से तस्वीरें एचडी के मुकाबले चारगुना साफ दिखती हैं. इसकी यही खासियत तस्वीरों में अनोखी जान डाल देता है. इसके अलावा अत्याधुनिक कंप्यूटर की तरह इस टीवी में क्वाड्रा कोर प्रोसेसर लगा है, जिस कारण इसे स्मार्ट टीवी का नाम दिया गया है. टीवी देखते देखते अगर दोस्तों से बात करने का मन करे या गेम खेलने का मन हो तो उठ कर फोन या कंप्यूटर तक जाने की जरूरत नहीं. सब कुछ इस स्मार्ट टीवी में हो जाएगा. सैमसंग ने इसमें पांच पैनल बनाए हैं. पहला पैनल 'ऑन टीवी' सामान्य केबल टीवी की तरह काम करता है. लेकिन यह आपके पसंदीदा कार्यक्रम को खुद ही सेव कर लेता है. जब आप टीवी देख रहे होते हैं, यह खुद ब खुद कोने में एक छोटी स्क्रीन पर देखा हुआ दूसरा कार्यक्रम भी लगा देता है ताकि आप उसे देखना भूल न जाएं. इस तरह से एक ही साथ टीवी पर कई छोटी स्क्रीन दिख सकती हैं. दूसरा पैनल है 'मूवी एंड टीवी'. इसमें भी टीवी मनपसंद फिल्मों पर ध्यान देता है. पर इस पैनल में ऑन डिमांड वीडियो चलते हैं, जिन्हें आपने अलग से पसंद किया होता है. तीसरा पैनल है 'फोटो, वीडियो एंड मूवी'. यहां आप कंप्यूटर की तरह टीवी में सेव की गयी तस्वीरें वगैरह देख सकते हैं. चौथा पैनल है 'एप्स'. यहां भी कंप्यूटर या स्मार्टफोन की ही तरह टीवी को इस्तेमाल किया जा सकता है. पांचवां और आखिरी पैनल है 'सोशल' यानी यहां आप फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब के जरिए वीडियो देख सकते हैं. ओएलईडी के फीचर यूएचडी के अलावा ओएलईडी यानी ऑर्गेनिक लाइट एमिटिंग डायोड की भी मेले में धूम है. इसी तकनीक पर चलने वाले सैमसंग के एफ9500 में भी अनोखे फीचर हैं. इस टीवी के सामने बैठ कर दो लोग दो अलग अलग कार्यक्रम देख सकते हैं. इसके लिए खास 3डी चश्मों की जरूरत पड़ेगी. इस टीवी की कीमत 10,000 डॉलर रखी गयी है. सैमसंग का कहना है कि उसने दुनिया का पहला ऐसा टीवी बनाया है जिसकी स्क्रीन हल्की सी मुड़ी है. इससे तस्वीरें और भी शानदार दिखती हैं. लेकिन मेले में इस तकनीक को दिखाने वाले और भी हैं. एलजी ओएलईडी टीवी बनाने वाली पहली कंपनी के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहता है. 55 इंच वाले ओएलईडी टीवी की कीमत 12,000 डॉलर है. इसी तरह पैनासोनिक भी 4के ओएलईडी टीवी लाया है. 56 इंच स्क्रीन के साथ पैनासोनिक का दावा है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा ओएलईडी टीवी है. इसमें फेशियल रेकॉगनिशन तकनीक लगी है जो टीवी के सामने बैठे व्यक्ति के चेहरे को पहचान लेती है. इसके जरिए टीवी आपको बता सकता है कि आपके दोस्त इस वक्त क्या देख रहे हैं. ओएलईडी तकनीक वाले टीवी दूसरे टीवी के मुकाबले कईगुना पतले होते हैं. इनमें तस्वीरों के रंग बेहतरीन होते हैं और बिजली की खपत कम होती है. हालांकि इनकी कीमत देखते हुए जानकारों का मानना है कि इन्हें बाजार में जगह बनाने में समय लग सकता है. लेकिन तकनीक के शौकीन फिलहाल लास वेगास में इन चमकती तस्वीरों का लुत्फ उठा सकते हैं. यह मेला 8 से 11 जनवरी तक चलेगा. आईबी/एजेए (एएफपी, डीपीए) DW.DE

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गुरुवार, 3 जनवरी 2013

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज

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लंदन. साइंस मैगजीन ने वर्ष 2012 की 10 सबसे बड़ी खोज की सूची जारी की है। इसमें हिग्स बोसोन की खोज शीर्ष स्थान पर रही है। वैज्ञानिक पिछले 4 दशकों से ‘गॉड पार्टिकल’  की तलाश में थे। यह है 2012 की टॉप-10 उपलब्धियां-
हिग्स बोसोन

जुलाई 2012 में यूरोपीय न्यूक्लीयर रिसर्च टीम ने जिनेवा के सर्न में घोषणा की कि उन्होंने एक ऐसे कण को खोज लिया है जो ‘गॉड पार्टिकल’ की अवधारणा पर खरा उतरता है। वैज्ञानिकों ने उस पार्टिकल की खोज में स्विस-फ्रांस बॉर्डर पर दुनिया की सबसे बड़ी एटम स्मेशिंग मशीन स्थापित की। साइंस न्यूज जर्नलिस्ट एड्रियन चो ने लिखा- बोसोन ने ही अंतरिक्ष में विद्यमान‘हिग्स फील्ड’ के जरिए तत्वों को घनत्व प्रदान किया। घनत्व के बिना ब्रह्मांड की अस्तित्व नामुमकिन है।



2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज


डेनिसोवान जीन

विलुप्त मानव प्रजाति ‘डेनिसोवांस’ के डीएनए ब्लूप्रिंट के सीक्वेंस को खोजना। ये 41 हजार साल पहले साइबेरिया में रहते थे।

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज


स्टेम सेल से अंडा बनाना

जापानी रिसर्चर ने चूहे के एंब्रायोनिक स्टेम सेल से अंडे का निर्माण किया। जिससे नए चूहे की उत्पत्ति हुई। भविष्य में नि:संतान दंपत्ति के लिए वरदान साबित होगी।

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज
मेजोराना फर्मिनोस

हर तत्व में पाया जाने वाला एक ऐसा तत्व जो अपने मूल तत्व से हटकर व्यवहार करता है जो वस्तु के साथ होने वाली क्रिया का बिलकुल हटकर व्यवहार दर्शाता है। इस तत्व को लेकर गत 7 दशकों से बहस छिड़ी हुई थी।





2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज

एक्स रे से प्रोटीन खोज

सामान्य स्रोत से एक अरब गुना तेज चमकीली एक्स-रे से अफ्रीकन स्लीपिंग सिकनेस पैदा करने वाले एंजाइम की खोज। इस बीमारी से हर साल 30 हजार लोग मरते हैं।


2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज


जीनोम टूल टेलेन

ट्रांसक्रिप्शन एक्टिवेटर लाइक इफेक्टर न्यूक्लियस(टेलेन), जो बीमार जीव के शरीर से स्वस्थ्य व्यक्ति में आने वाले जीन और सेल का पहचान करता है। जिससे पशु-पक्षियों से इंसानों में आने वाली बीमारियों की रोका जा सकेगा।



2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज


क्यूरोसिटी लैंडिंग

नासा के क्यूरोसिटी रोवर के लैंडिंग सिस्टम को पांचवें स्थान पर रखा गया। अमेरिका के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के तहत, 3.3 टन के रोवर की लैंडिंग।

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज

एनकोड प्रोजेक्ट

एक दशक की स्टडी के रिजल्ट के मुताबिक मानवीय जीनोम वैज्ञानिकों की सोच से अधिक 80 प्रतिशत सक्रिय पाया गया है जो नई संभावनाएं विकसित करेंगी।



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न्यूट्रीनो मिक्सिंग

चीन के वैज्ञानिकों ने डाया बे रिएक्टर न्यूक्लीयर एक्सपेरीमेंट के जरिए न्यूट्रीनो को प्रकाश की रफ्तार से गति कराकर एकरूप बनाने में कामयाबी हासिल की है।

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ब्रेन मशीन इंटरफेस

दिमाग की न्यूरल रिकॉर्डिग के जरिए कम्प्यूटर स्क्रीन पर कर्सर नियंत्रण कर दिखाया। लकवाग्रस्त व्यक्ति मैकेनिकल हाथ को दिमाग से कई दिशाओं में घुमा सकता है। इसे भविष्य में स्पाइनल चोट और अन्य मामलों में प्रयोग संभव होगा। sabhar : bhaskar.com



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मंगलवार, 6 नवंबर 2012

वायु से बनेगा शुद्ध जल और ऊर्जा

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अबू धाबी। फ्रांसीसी इंवेटर और ईओलवाटर के संस्थापक मार्क पेरेंट ने कई वर्षो तक हवा में घुली वाष्प को संघनन करने की चेष्टी की और अंत में सफलता भी पाई। उन्होंने जिस एयर कंडीशनर को तैयार किया है, वह विंड टरबाइन के साथ वाणिज्यिक स्तर पर वायुमंडलीय नमी को संघनीभूत कर सकता है।
पिछले साल उनके इस उपकरण से अबू धाबी में करीब 500-800 लीटर शुद्ध व ताजे जल को एक दिन में तैयार किया। इनके उपकरण ईओलवाटर डब्ल्यूएमएस1000 को केवल मरूभूमि में ही नहीं लगाया जा सकता है। यह उन स्थानों पर भी भूमिका निभा सकता है, जहां पानी की आपूर्ति के लिए आधारभूत व्यवस्थाएं नहीं है।

पांचवीं पीढ़ी के इस उपकरण के लिए 19.7 फीट गुणा 6.5 फीट की जगह चाहिए, जहां वाटर कंडेंसर सिस्टम शीर्ष पर करीब 78 फीट पर स्थापित किया जा सके। इसे 30 केवी का विंड टरबाइन संचालित करता है, जिसके लिए हवा की रफ्तार 24 किमी प्रति घंटा होनी चाहिए। टरबाइन में रोटर का व्यास 42 फीट है। वाष्प की संघनीभूत होने के बाद पानी फिल्टर होकर स्टेनलैस स्टील के टैंक में संग्रह हो जाता है। sabhar :patrika.com

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रविवार, 20 मई 2012

निजी विमान से अंतरिक्ष की सैर

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वो दिन दूर नहीं जब हम और आप अंतरिक्ष में सैर के लिए जाएंगे. वजह है अंतरिक्ष यान का आसानी से उपलब्ध होना. एक निजी कंपनी ने पहली बार आसमान में अपना निजी रॉकेट छोडने की पहल की है.
अमेरिका के कैलिफोर्निया की इस कंपनी का नाम है स्पेस एक्स. इस कंपनी की शनिवार को अपना निजी रॉकेट अंतरिक्ष के लिए रवाना करने की योजना थी, लेकिन उसे अंतिम समय में मोटर में तकनीकी समस्या के कारण रोक दिया गया है. इतिहास में ये पहली बार है जब कोई निजी कंपनी अपना रॉकेट अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र आईएसएस के लिए रवाना कर रही है. हालांकि ये टेस्ट उड़ान है. लेकिन कहा जा रहा है कि इसकी सफलता या असफलता से अमेरिका के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर काफी असर पड़ेगा. चालीस साल में यह पहला मौका है जब यान भेजने का ठेका गैर सरकारी कंपनी को मिला है.
राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार जॉन हाल्ड्रेन इसे नासा का एक और व्यापारिक अभियान मानते हैं. गौरतलब है कि इस अभियान में नासा की ओर से भी पैसा लगाया गया है. अभियान में नासा ने 38 करोड़ डॉलर खर्च किया है जबकि कंपनी की ओर से 1 अरब डॉलर का खर्चा किया गया है.
नासा के स्पेस स्टेशन कार्यक्रम के मैनेजर माइक सफ्रैदिनी का कहना है कि हमें इस तरह की टेस्ट उड़ान की सफलता या असफलता को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं होना चाहिए. परीक्षण उड़ानों का परिणाम कई बार योजना के मुताबिक नहीं होता. कंपनी के मालिक एलन मस्क भी मानते हैं कि इसमें दुर्घटना की संभावना होती है.
दो दिन की नियोजित उड़ान के बाद जब रॉकेट अंतरिक्ष केन्द्र के नजदीक पहुंच जाएगा तो इसके कैप्स्यूल ड्रैगन को अभ्यास गतिविधियां करने के लिए कहा जाएगा ताकि बाद में उसे आईएसएस में जुड़ने का निर्देश दिया जा सके. इसके बाद इसमें लदा करीब आधा टन खाद्य पदार्थ उतारा जाएगा. हालांकि अंतरिक्ष में इंसान भेजने की क्षमता स्पेस एक्स और कुछ दूसरी कंपनियां हासिल कर चुकी थी. यही वजह है कि अमेरिकी कांग्रेस में बहुत से लोगों ने इस कंपनी को मदद दिए जाने का विरोध भी किया है. डच अंतरिक्ष यात्री एंड्रे कुइपर्स का कहना है कि ये एक नये युग की शुरूआत है.
sabhar : dw.de

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पांच तरकीब जो बदल देंगी आपकी दुनिया

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आईबीएम वैसे तो आधुनिक कंप्यूटरों और तकनीक के लिए मशहूर है, लेकिन अब यह कंपनी पांच ऐसी नई तरकीब बाजार में ला रही है जिससे इंसान की जिंदगी बदल सकती है.
आईबीएम ने दिमाग में चल रहे विचारों को भांपने वाली मशीनों का आविष्कार किया है. इन मशीनों से पता लगाया जा सकेगा कि आप किस तरह के व्यक्ति से बात कर रहे हैं और उसके दिमाग में क्या चल रहा है. इस आविष्कार का नाम "आईबीएम 5 इन 5 है" और इसके लिए सामाजिक ट्रेंडों पर शोध किया गया है. 2017 से कंपनी अपने शोध के नतीजों का इस्तेमाल करना शुरू करेगी. "5 इन 5" का मतलब है, पांच ऐसे आविष्कार जो आने वाले सालों और महीनों में इंसान की जिंदगी बदल सकते हैं.
इनमें से पहला है पीपुल पॉवर. आईबीएम के वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य के हिलने डुलने से बहुत सारी ऊर्जा पैदा होती है और भविष्य में इसका सही तौर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा. अब कंपनी ऐसे तकनीक पर काम कर रही है जो किसी के चलने या काम करने से पैदा हो रही गर्मी को कहीं जमा कर सके ताकि उसका उपयोग बाद में किया जा सके.
दूसरी खोज के बारे में आईबीएम का कहना है कि स्काइवॉकर और एक्स मेन फिल्मों की तरह अब कंपनी ऐसी तकनीक बना रही है जिससे दिमाग को कंप्यूटर या स्मार्टफोन से जोड़ा जा सकता है. मिसाल के तौर पर आप अगर किसी को फोन करना चाहें, तो आपको केवल उसके बारे में सोचना होगा और फोन अपने आप कनेक्ट हो जाएगा. कंप्यूटर के स्क्रीन को भी आप अपनी सोच से नियंत्रित कर सकेंगे.
भविष्य में पासवर्ड की भी जरूरत नहीं होगी क्योंकि आंखों में रेटिना और आवाज से कंप्यूटर आपको पहचान लेगा. एटीएम से अगर आप पैसे निकालना चाहें, तो आपको बस मशीन के सामने खड़ा होना पड़ेगा. आपकी रेटिना को पढ़ कर कंप्यूटर अपने आप आपको पहचान लेता है और आपको पैसे निकालने में आसानी होती है.
तीसरी खोज पर एक बयान में कंपनी ने लिखा, "हूदीनी से लेकर स्काइवॉकर और फिर एक्स मेन, दिमाग को पढ़ना साइंस फिक्शन तक सीमित रह गया है, लेकिन कल्पना के फैंस की मन्नतें पूरी हो सकती हैं." हूदीनी एक मशहूर अमेरिकी जादूगर थे जो लोगों की भीड़ के बीचोंबीच से गायब होने और अपने आप को जंजीरों से छुड़ाने में अव्वल थे. अब माइंड रीडिंग एक आम बात होने वाली है.
आईबीएम ने अपने आविष्कारों में अमीरों को ही नहीं बल्कि समाज के हर स्तर के व्यक्ति को शामिल करने की कोशिश की है. दुनिया में ऐसे करोड़ों लोग हैं जिनके पास कंप्यूटर और यहां तक कि बिजली की सुविधा नहीं है. लेकिन कंपनी का कहना है कि आने वाले पांच सालों में दुनिया के 80 प्रतिशत लोगों के पास सेलफोन होगा और इससे बहुत सारे लोग वह सब काम कर पाएंगे जो वह इस समय नहीं कर पा रहे.
आईबीएम के 5 इन 5 में पांचवीं खोज आपके ईमेल इनबॉक्स में आपकी पसंद के संदेश लाएगी. बेकार के संदेश अब आपके ईमेल इनबॉक्स को भरेंगे नहीं. इंटरनेट में आपकी पसंदों को मापा जाएगा और उसके मुताबिक आपको संदेश भेजे जाएंगे.
sabhar : dw.de

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