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शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

बिना ड्राइवर की कार को सड़कों पर दौड़ाने की तैयारी

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बिना ड्राइवर की कार को सड़कों पर दौड़ाने की तैयारी
लंदन : ब्रिटेन की सड़कों पर खुद ब खुद चलने वाली कारों का पहली बार परीक्षण इस वर्ष के अंत में किए जाने की तैयारी हो रही है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जापानी बहुराष्ट्रीय ऑटो निर्माता निसान के साथ मिलकर एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं और उन्होंने साइंस पार्क में एक निजी रोड पर ऐसी गाड़ी का परीक्षण पूरा भी कर लिया है।

हालांकि ब्रिटेन की आम सड़कों पर अन्य वाहनों के साथ उसके परीक्षण के लिए परिवहन विभाग से मंजूरी अब मिली है। ये कारें खुद सड़कों पर दौड़ेंगी लेकिन सुरक्षा के तौर पर इनके भीतर एक ड्राइवर को बिठाया जाएगा जो किसी आपात स्थिति में स्टेयरिंग संभालेगा। (एजेंसी) sabhar : http://zeenews.india.com

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शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

दस साल बाद कैसा होगा आपका मकान?

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भविष्य का घर
भविष्य के घर की झलक

जिस रफ्तार के तकनीक बदल रही है, उससे इंसान के रहन-सहन के तौर तरीके में भी बदलाव आ रहे हैं.
कंप्यूटर क्षेत्र की नामी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने 'स्पेस ऑफ द फ्यूचर' नाम के अपने मॉडल को नए रूप में पेश किया है, जो दिखाता है कि आज से पांच या दस साल बाद जिंदगी किस तरह की होगी.

वॉशिंगटन में माइक्रोसॉफ्ट के मुख्यालय में भविष्य के इस मकान को बनाया गया है. इसमें अत्याधुनिक तकनीक से आपकी शक्ल को देख कर या फिर एक इशारा पाते ही खाना पकाने जैसे काम भी बेहद आसानी हो जाते हैं.
माइक्रोसॉफ्ट में इस अहम प्रोजेक्ट से जुड़े एंटन एंड्रयूज ने बीबीसी को इस मकान की सैर कराई. एंड्रयूज़ ने इस मकान में एक खास डेस्क दिखाई.
ये डेस्क आपकी ज़रूरत के हिसाब से ऊपर या नीचे हो जाएगी जिससे आप आसानी से काम कर सकें. फिर देखते ही देखते वो डेस्क कंप्यूटर स्क्रीन के तौर पर खुल कर सामने आती है.

डेस्क में छिपी जानकारियाँ

भविष्य का घर
इसमें आप कुछ चीजों को अपने हिसाब से आकार दे सकते हैं
ये स्क्रीन व्यक्ति का चेहरा पहचान कर उसके काम से संबंधित चीजें स्क्रीन पर पेश करती है. एंड्रयूज़ के मुताबिक़ आगे चलकर हर सूचना के अंदर ही कुछ कमांड्स होंगी यानी एक सूचना से दूसरी और कई जानकारियाँ आप वहाँ पा सकेंगे.
ये कमांड कई तरह के हो सकते हैं जैसे रीवाइंड, जहाँ आप जिस विषय पर काम कर रहे हैं उससे जुड़ी पिछली जानकारियाँ आपको मिल जाएँगी. एंड्रयूज़ के अनुसार साथ ही इसमें अपने आप सर्च जैसी सुविधा होगी. यानी अगर आप किसी विषय पर काम कर रहे हैं तो उससे जुड़ी बाक़ी जानकारियाँ ख़ुद ही उस डेस्क पर आपके सामने आती रहेंगी.
फिर आपने जैसे सर्च की जानकारी दिखाने को कहा तो उससे जुड़े वीडियो, तस्वीरें और बाक़ी जानकारियाँ सामने आ जाएंगी.
अब तक दफ़्तरों या घरों में अगर सफ़ेद या काला बोर्ड रहता है जिस पर आप कुछ लिख सकते हैं तो आगे चलकर उसकी जगह टच स्क्रीन वाले पैनल आ जाएँगे और सारा काम उसी पर होगा.

भविष्य पर नजर

भविष्य में इस तरह की सामग्री में कई तरह की कमांड निहित होंगी. इनमें कुछ आपको इस सामग्री की पिछली अवस्था दिखाएंगी तो कुछ कमांड उस सामग्री को लगातार सर्च के जरिए अपडेट भी करती रहेंगी. इस सर्च में संबंधित वीडियो और कांफ्रेंस होंगे.
"इस मॉडल में कई तरह की तकनीकों का मिश्रण है जिन्हें वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने तैयार किया है. तो ये साइंस फिक्शन नहीं है, बल्कि असल चीजें हैं जिन्हें वास्तव में विकसित किया जा रहा है."
एंटन एंड्रयूज, माइक्रोसॉफ्ट
एंड्रयूज बताते हैं, “इस मॉडल में कई तरह की तकनीकों का मिश्रण है जिन्हें वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने तैयार किया है. तो ये साइंस फिक्शन नहीं है, बल्कि असल चीजें हैं जिन्हें वास्तव में विकसित किया जा रहा है.”
ये आपकी सृजनशीलता को भी नए आयाम देगा. किसी भी चीज को आप एक स्कैनर के सामने रख कर अपने हाथों को जिस प्रकार घुमाते जाएंगे वो वैसा ही रूप लेती जाएगी. स्क्रीन पर उसका थ्री डी मॉडल आपको दिखता रहेगा.
इस तरह अपने मकान में रखे किसी पॉट या गुलदान को जो चाहे रंग रूप दे सकते हैं.

किचन के मज़े

अगर भूख लगी है तो इस मकान की किचन आपका पसंदीदा खाना पेश करने का पूरा प्रयत्न करेगा.
मान लीजिए आप एक शिमला मिर्च लेकर एक स्कैनर के सामने खड़े हो जाते हैं, तो वो आपको उन तमाम व्यंजनों के नाम और तस्वीरें दिखा देगा जो आप उस शिमला मिर्च से बना सकते हैं.
भविष्य का घर
कंप्यूटर को लगातार अक्लमंद बनाया जा रहा है
पसंदीदा डिश तय करने के बाद जैसे ही आप कुकिंग टेबल की तरफ बढ़ते हैं, तो वहां उस डिश में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के चित्र उभर आते हैं ताकि आपसे कुछ छूटे न.
साथ ही उसे बनाने की विधि आपको बताई जाती है. सब कुछ करने के बाद जब आप उसे चूल्हे पर चढ़ाते हैं तो उसका तापमान डिश के मुताबिक तय होता है.

क्या कहते हैं गेट्स

वैसे माइक्रोसॉफ्ट शुरू से ही कंप्यूटर जगत की नामी कंपनी रही हैं और इसके संस्थापक बिल गेट्स दुनिया के सबसे चर्चित लोगों में से एक माने जाते हैं.
जब उनसे हाल ही में पूछा गया कि क्या वो मुख्य कार्यकारी स्टीव बॉलमर के नेतृत्व में कंपनी के प्रदर्शन से खुश हैं तो उन्होंने कहा, “स्टीव के नेतृत्व में साल भर में कई कमाल की चीजें हुई हैं. लेकिन क्या ये पर्याप्त है? नहीं.”
कंपनी के शेयरों के दाम वहीं हैं जहां पांच साल पहले थे जबकि उनकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों एपल, अमेजन और सैमसंग के शेयरों के दाम दोगुने से ज्यादा हो गए हैं.

ऐसे में भविष्य का मकान पेश करने जैसे प्रोजेक्ट नई चीजें उतारने की माइक्रोसॉफ्ट की प्रतिष्ठा को मजबूत करेंगे.

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कैसे होंगे भविष्य के स्मार्ट शहर

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भविष्य के शहर के निर्माण में तकनीक के इस्तेमाल पर बढ़ रहा है जोर
दुनियाभर में नए शहर बसाए जा रहे हैं और जिन शहरों में हम सदियों से रह रहे हैं उन्हें सुधार कर भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा है.
ऐसा तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या और बढ़ते प्रदूषण के जवाब में हो रहा है. साथ ही पूरे शहर को एक साथ वेब नेटवर्क पर जोड़ना भी नए शहर बसाने और पुराने शहरों के नवीनीकरण का एक प्रमुख कारण है.

वहीं कुछ शहर स्मार्ट होने का मकसद शहरों को और हरा-भरा और पर्यावरण को कम दूषित करना है.स्मार्ट शहर का मतलब ये हो सकता है कि डेटा की मदद से ट्रैफिक में जाम से बचा जा सके, या फिर निवासियों को बेहतर सूचना देने के लिए विभिन्न सेवाओं को एक साथ जोड़ देना.
तकनीकी कपंनी जैसे आईबीएम और सिस्को स्मार्ट शहरों में अपने लिए व्यवसाय का ज़बर्दस्त मौका देख रहीं हैं.
आईए जानते हैं, दुनियाभर में चर्चा में रहने वाले ऐसे स्मार्ट शहरों के प्रोजेक्ट के बारे में.

सॉन्गडो, दक्षिण कोरिया

कई लोगों के लिए सॉन्गडो स्मार्ट शहरों का सरताज है. येलो सी समुद्री तट पर इस शहर को बसाने का काम वर्ष 2005 में शुरु हुआ और इस पर 35 बिलियन डॉलर का खर्च होगा.
इस शहर की खासियत ये है कि पूरा शहर एक सूचना प्रणाली से जुड़ा है जिसकी वजह से इसे 'बक्से में बंद शहर' भी कहते हैं.
सॉन्गडो में सभी चीज़ों में इलेक्ट्रॉनिक सेंसर लगा हुआ है. जैसे स्वचालित सीढ़ियां, यानी एस्केलेटर, तभी चलेंगे जब उनपर कोई खड़ा होगा.
सभी घरों में टेलिप्रेजेंस सिस्टम लगाया गया है. साथ ही घर के ताले, घर को गर्म रखने के लिए हीटिंग प्रणाली आदि सभी पर इ-नेटवर्क के ज़रिए कंट्रोल रखा जा सकता है.
यहां तक की स्कूल, अस्पताल और दुसरे सरकारी दफ्तर भी नेटवर्क पर हैं.
तकनीक की दृष्टि से ये शहर बेमिसाल है लेकिन ज़रूरी नहीं कि इसलिए लोगों के लिए भी आदर्श शहर ही साबित हो.
इस शहर को तकनीक सिस्को दे रही है और ये साल 2015 तक पूरा हो जाएगा जिसके बाद यहां 65,000 लोग रह सकेंगे और 300,000 लोग यहां काम पर आएंगे.

मास्दार, संयुक्त अरब अमीरात

अरबी भाषा में मास्दार का मतलब स्रोत होता है.
ये शहर अबू धाबी के रेगिस्तान के बीचों-बीच बसाया जा रहा है.
इसे धरती पर सबसे ज्यादा संवहनीय या सस्टेनेबल और दीर्घकालिक शहर के रुप में बसाया जा रहा है.
शहर में सौर्य उर्जा और वायु उर्जा के संयंत्र लगे हैं जिससे प्रदूषण कम से कम हो.
शहर को गाड़ियों से मुक्त रखा गया है. यहां कोई कार नज़र नहीं आएगी बल्कि आवाजाही के लिए बिजली से चलने वाली बिना ड्राइवर की गाड़ियां बनाई जा रही हैं.
इस शहर में 40,000 लोग रह सकेंगे. लेकिन इसे बनाने की कीमत कई बिलियन डॉलरों में आंकी जा रही है जिससे आलोचकों का कहना है कि दूसरी जगह ऐसा शहर बसाना आसान नहीं होगा.

रियो डे जेनेरो, ब्राज़ील

रियो साल 2014 में फुटबॉल विश्व कप और 2016 में ओलंपिक की मेज़बानी करेगा. जाहिर है दुनिया की नज़र इस शहर पर रहेगी, और उसके लिए खास तैयारी हो रही है.
शहर के तीस एजेंसियों को एक नेटवर्क पर जो़डा गया है जिससे किसी भी स्थिति से बेहतर तरीके से निपटा जा सके.
आईबीएम ने मौसम के पूर्वानुमान के लिए जटिल प्रणाली तैयार की है. मौसम औऱ ट्रैफिक आदि के लिए विशेष ऐप बनाए जा रहे हैं.
लेकिन इस शहर में सब कुछ कॉरपोरेट के नेतृत्व में नहीं हो रहा है.
रियो की झोपड़पट्टियों में आम लोग एक ऐसा प्रोजेक्ट चला रहे हैं जिसके तहत वहां रहने वाले अपने घरों को नई तरह से बना सके.
घरों के डिज़ाइन और उन्हें बनाने के आसान तरीके इंटरनेट पर उपलब्ध कराए गए हैं और लोगों से कहा जा रहा है कि वो अपने डिज़ाइन भी इंटरनेट पर लगाए.
इस प्रोजेक्ट का आदर्श है कि घर बनाने में अगर सभी लोग योगदान दे, तो फिर वो शहर कैसा होगा.

बार्सिलोना, स्पेन

पिछले साल बार्सिलोना शहर के एक प्रमुख अधिकारी ने ये बयान देकर हलचल पैदा कर दी की आने वाले स्मार्ट शहर भविष्य में कई देशों से ज्यादा ताकतवर हो जाएंगे.
बार्सिलोना स्मार्ट शहरों का नेता बनना चाहता है और इसके लिए शहर में कई रोचक प्रोजेक्ट लागू किए जा रहे हैं.
बस के रूटों को, कचरा उठाने की प्रक्रिया को सेंसर की मदद से और सक्षम किया जा रहा है.
इसके अलावा परिवहन के लिए बिना सीधा संपर्क के पेमेंट व्यवस्था तैयार की जा रही है.

लंदन, इंग्लैंड

लंदन में कई छोटे प्रोजेक्टों पर काम चल रहा है. रोमन काल का ये शहर नई टेक्नोलॉजी के लिए परीक्षण भूमि साबित हो रहा है.
इंटेल लंदन में ऐसी प्रणालियों पर प्रयोग कर रहा है जो भविष्य के शहरों में बिजली वितरण के लिए उपयोग में लाई जाएगी.
इसके अलावा सेंसरों के एक नेटवर्क पर काम चल रहा है जो वायु की गुणवत्ता, यातायात का प्रवाह, और पानी के वितरण पर निगरानी रखेगी.
लंदन के कुछ हिस्सों में वर्ष 2011 में दंगे हुए थे. उन दंगों में टॉटेनहैम इलाक़ा काफ़ी प्रभावित हुआ था.
इंजीनियरिंग सलाहकार कंपनी अरूप टॉटेनहैम इलाक़े को नया रूप देने के उद्देश्य से स्थानीय लोगों से ख़ासकर उन दंगों में शामिल लोगों से विचार विमर्श करने के बाद परियोजना बना रही है.

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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

छोटा दिमाग बड़ी समझदारी

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पिछले 30 हजार सालों में इंसान का दिमाग लगातार सिकुड़ता जा रहा है. इसका मतलब ये नहीं कि हम दिमागी रूप से कमजोर हो रहे हैं बल्कि रिसर्च में पता चला है कि विकास के क्रम में छोटा होता दिमाग इंसानों को स्मार्ट बना रहा है.
होमो सेपियन्स से आधुनिक मानव तक का सफर तय करने में इंसान के दिमाग का आकार करीब 10 फीसदी छोटा हो गया. यानी कभी 1500 क्यूबिक सेंटीमीटर के दिमाग का आकार अब घटकर 1359 क्यूबिक सेंटीमीटर रह गया है. महिलाओं का दिमाग पुरुषों के मुकाबले छोटा होता है और उनके दिमाग के आकार में भी इतनी ही कमी आई है. यूरोप, मध्य पूर्व और एशिया में मिली मानव खोपड़ियों के अवशेष की छानबीन करने के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं.
अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के जॉन हॉक्स बताते हैं, "मैं तो कहूंगा कि विकास के क्रम में पलक झपकते ही दिमाग का आकार छोटा हो गया." हालांकि दूसरे वैज्ञानिक दिमाग के सिकुड़ने को ज्यादा हैरतअंगेज नहीं मानते. उनके मुताबिक हम जितने बड़े और मजबूत होंगे हमारे शरीर पर नियंत्रण के लिए उतने बड़े दिमाग की जरूरत होगी. आधुनिक इंसान से ठीक पहले का इंसान यानी निएंडरथाल मानव करीब 30 हजार साल पहले अज्ञात कारणों से खत्म हो गया. निएंडरथाल मानव आधुनिक मानव की तुलना में काफी बड़े आकार के थे और उनका दिमाग भी उतना ही बड़ा था. करीब 17000 साल पहले इंसान की जो प्रजाति थी वो क्रो मैग्नस के नाम से जानी जाती है. क्रो मैग्नस ने गुफाओं में बड़े बड़े जानवरों की पेंटिंग बनाई और उनका दिमाग होमो सेपियंस की सारी प्रजातियों में सबसे ज्यादा बड़ा था. क्रो मैग्नस अपने बाद की पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा ताकतवर भी थे.
मिसौरी यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डेविड गियर कहते हैं कि ये विशेषताएं पर्यावरण के खतरों के बीच खुद को बचाए रखने के लिए जरूरी थीं. उन्होंने 19 लाख साल से लेकर 10 हजार साल पुराने इंसान की खोपड़ियों में हुए विकास का अध्ययन किया है. ये तो सब को पता ही है कि हमारे पूर्वजों को एक बेहद जटिल सामाजिक वातावरण में जीना पड़ा. गियर और उनकी साथियों ने अपने रिसर्च के दौरान देखा कि आबादी बढ़ने के साथ ही दिमाग का आकार घटता गया. गियर कहते हैं, "जटिल समाज के उभरने के साथ ही इंसान के दिमाग का आकार छोटा होता गया क्योंकि तब इंसान को जीवन के लिए ज्यादा संघर्ष की जरूरत नहीं पड़ती थी और उसने जीना सीख लिया था." हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक इस विकास का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि इंसान बेवकूफ होता चला गया बल्कि उसने बुद्धि के विकास से जीने के आसान तरीके सीख लिए. ड्यूक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ब्रायन हारे ने समझाते हुए कहा, "यहां तक कि चिम्पैंजियों में भी दिमाग का आकार बड़ा था, इसी तरह भेड़ियों की तुलना में कुत्तों का दिमाग छोटा पर ज्यादा चालाक, लचीला और समझदार होता है, साफ है कि दिमाग के आकार से समझदारी का फैसला नहीं होता."
रिपोर्टः एजेंसियां/एन रंजन
संपादनः महेश झा sabhar : dw.de

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यह आंख तो नहीं, पर दिखा सकती है

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नेत्रहीन तो इसे वरदान की तरह 'देख' रहे हैं. अमेरिका में बनी यह बायोनिक आंख उन लोगों की रोशनी कुछ हद तक लौटा सकती है जो रेटिनिटिस पिगमेनटोसा की वजह से आंखें खो बैठे हैं. अब दूसरी पीढ़ी की बायोनिक आंख बाजार में आ रही है.
रेटिनिटिस पिगमेनटोसा एक तरह की बीमारी है जो इंसान को अंधा बना देती है. कुछ वक्त पहले तक तो यह अंधापन लाइलाज ही था. लेकिन बायोनिक आंख यानी आर्गस प्रतिरोपण ने कुछ हद तक इसे ठीक कर पाने में सफलता दिलाई.
यूरोप के बाजारों में बायोनिक आंख जल्दी ही बिकने लगेगी. और जर्मनी के लोगों के लिए तो अच्छी खबर यह है कि देश के हेल्थ केयर सिस्टम ने इसे इन्श्योरेंस में कवर करने का फैसला कर लिया है. संभावना है कि ब्रिटेन और फ्रांस भी ऐसा ही करेंगे.
बायोनिक आंख की कीमत एक लाख अमेरिकी डॉलर यानी 45 लाख रुपये से ज्यादा है. सवाल यह है कि इन्श्योरेंस कंपनियों को इसे कवर करने के लिए राजी किया जा सकता है या नहीं. उसी बात पर इसकी सफलता निर्भर करेगी.
बायोनिक विजन सिस्टम एक कैमरा है जो चश्मे से जुड़ा है. यह हाई फ्रीक्वेंसी वाले रेडियो सिगनल रेटिना में लगी चिप को भेजता है. इन चिप के इलेक्ट्रोड के संकेत बदलते हुए ऑप्टिकल नर्व के जरिए दिमाग में पहुंचते हैं जहां दिमाग इन सिगनल्स को इमेज के तौर पर पहचानता है.
पहला इलाज
अमेरिका के लॉस एंजेलिस के रहने वाले टेरी बाइलैंड उम्र के चौथे दशक में अपनी आंखें खो बैठे. वह बताते हैं, "पहली बार जब मैंने एक छड़ी से अपने दरवाजे को छुआ, तो मैंने उसे बीच में ही दे मारा. मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि मैं कहां जाऊं."
बाइलैंड लाइवली रिवरसाइड ब्रेल क्लब के सदस्य हैं जहां बहुत से लोग बिना रोशनी की जिंदगी से समझौता कर चुके हैं. लेकिन टेरी इस समझौते के साथ जिंदगी नहीं गुजारना चाहते थे.
इसी वजह से उन्होंने बायोनिक आंख में दिलचस्पी दिखाई. इस तरह का इलाज कराने वाले वह पहले दो मरीजों में थे. तब इसकी क्लीनिकल ट्रायल ही चल रही थीं. और उन्हें फायदा हुआ. उन्होंने जब इसे ओके कर दिया तो इसे दूसरे लोगों के लिए पेश किया गया.
अब टेरी आर्गस प्रतिरोपण का नया वर्जन भी लगवाना चाहते हैं. वह कहते हैं, "मैं नया वर्जन लगवाने के लिए कुछ भी दे सकता हूं. लेकिन एफडीए इसकी इजाजत ही नहीं देगा."
अमेरिका के दवा और खाद्य प्रशासन ने अभी बायोनिक आंख के नए संस्करण को इजाजत नहीं दी है. हालांकि यूरोप में इसे इजाजत मिल चुकी है.
रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार
संपादनः आभा एम sabhar : dw.de

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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

मूत्र से 'सूँघा जा सकेगा' मूत्राशय का कैंसर?

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कैंसर
कैंसर की कोशिकाएं मौजूद हों तो मूत्र में से एक खास तरह की गंध आती है.
अगर क्लिक करेंमूत्राशय में कैंसर पनप चुका है तो इसमें गैस के रूप में रसायन की मौजूदगी पाई जाती है. यह उपकरण एक सेंसर की मदद से इस रसायन का पता लगा लेता है.

मगर विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पहले कि यह व्यापक पैमाने पर उपलब्ध हो, जाँच से शत-प्रतिशत परिणाम पाने के लिए अभी और अध्ययन करने की जरूरत है.इसको बनाने वालों ने 'प्लॉस' नामक एक पत्रिका को बताया है कि शुरुआती परीक्षणों में हुई 10 बार की जांच में से 9 बार जांच से सटीक परिणाम मिले.
क्लिक करेंब्रिटेन में हर साल करीब 10,000 लोगों के मूत्राशय के कैंसर का इलाज किया जाता है.

मूत्र की गंध

डॉक्टर लंबे समय से ऐसे तरीकों की तलाश कर रहे हैं जिनसे इस क्लिक करेंकैंसर का पता पहले चरण में ही लगाया जा सके. उस समय उसका इलाज आसान होता है.
"इससे पहले कि इस उपकरण का इस्तेमाल अस्पतालों में किया जाने लगे इसकी अभी और जांच करने की जरूरत है. इसके लिए हमें मरीजों से बड़े पैमाने पर नमूने इकट्ठे करने होंगे"
प्रोफेसर प्रोबर्ट
इनमें से कई डॉक्टर मूत्र की गंध की मदद से मूत्राशय कैंसर के खतरों का पता लगाने में लगे हैं.
कैंसर का पता लगाने के लिए पिछले कुछ सालों में जो अनुसंधान किए गए हैं वे बताते है कि यदि कुत्तों को प्रशिक्षित किया जाए तो वह कैंसर को सूंघ लेते हैं.
लिवरपूल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर क्रिस प्रोबर्ट और पश्चिमी इंग्लैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नार्मन रैटक्लिफ का कहना है कि उनके नए उपकरण कैंसर का पता लगा सकते हैं.

मौजूद रसायन

कैंसर
यह उपकरण मूत्र में मौजूद उन रसायनों को सूंघ लेता है जो नमूने को गर्म करने पर पैदा होते हैं.
प्रोफेसर रैटक्लिफ़ ने कहा, “यह उपकरण मूत्र में मौजूद उन रसायनों को सूंघ लेता है जो नमूने को गर्म करने पर पैदा होते हैं."
उन्होंने अपने इस उपकरण को जांचने के लिए मूत्र के 98 नमूनों का इस्तेमाल किया. ये नमूने उन 24 पुरुषों के थे जो मूत्राशय के कैंसर से पीड़ित थे. और इसमें वैसे 74 पुरुषों के मूत्र के नमूने भी शामिल थे जो मूत्राशय से संबंधित बीमारियों से ग्रस्त थे.
प्रोफेसर प्रोबर्ट का कहना है कि जांच के परिणाम बेहद उत्साहजनक थे. मगर उन्होंने बताया, “इससे पहले कि इस उपकरण का इस्तेमाल अस्पतालों में किया जाने लगे इसकी अभी और जांच करने की जरूरत है. इसके लिए हमें मरीजों से बड़े पैमाने पर नमूने इकट्ठे करने होंगे.”

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स्‍टेम सेल थेरेपी से ठीक हुए एचआईवी के दो मरीज

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मेलबर्न : अमेरिकी के दो मरीजों को घातक बीमारी एचआईवी से पूरी तरह छुटकारा मिल गया है। इससे उन लोगों के लिए उम्‍मीद की किरण जगी है, जो इस बीमारी से पीडि़त हैं। 

बोस्‍टन में ब्रिगहैम एंड वीमेंस हॉस्पिटल के डाक्‍टरों ने बुधवार रात घोषणा की कि एचआईवी से पीडि़त दो मरीजों को इस खतरनाक वायरस (ब्‍लड और टिश्‍यू) से पूरी तरह मुक्ति मिल गई है। कैंसर का इलाज करने के क्रम में बोन मैरो स्‍टेम सेल ट्रांसप्‍लांट किया गया था। जिन दो मरीजों का इलाज किया गया था, उसमें से एक युवा है और दूसरा प्रौढ़ है। एंटी रिट्रोवायरल थेरेपी के आठ और पंद्रह हफ्ते के बाद इनमें इस घातक वायरस के लक्षण नहीं दिखे। एचआईवी पॉजिटीव मरीज जब इलाज बंद कर देते हैं तो यह वायरस से चार से आठ हफ्ते के बीच दोबारा सक्रिय हो जाता है।  sabhar : http://zeenews.india.com

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शनिवार, 22 जून 2013

एलियंस का पता लगाने के लिए भेजा मैसेज

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वॉशिंगटन. ब्रह्माण्ड में एलियंस की मौजूदगी को लेकर हर किसी के मन में जिज्ञासा है। 17 जून को एलियंस को संदेश (लोन सिग्नल) भेजा गया। यह संदेश लोन सिग्नल प्रोजेक्ट के तहत भेजा गया है। इस प्रोजेक्ट के जरिए इंटरनेट यूजर्स बीम मैसेज भेज कर ब्रह्मांड में एलियंस की मौजूदगी का पता कर पाएंगे।
 
 
लोन सिग्नल प्रोजेक्ट के मुख्य मार्केटिंग ऑफिसर अर्नेस्टो क्वालिज्जा के मुताबिक अब हम जान सकेंगे कि ब्रह्मांड के किसी कोने पर एलियंस मौजूद हैं? विख्यात वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने भी कहा था कि एलियंस हमारी पृथ्वी के आसपास ही हैं। वे लगातार हमपर और हमारी गतिविधियों पर नजर भी रख रहे हैं।
 
 
ग्लीज-526 पर एलियंस की संभावना : हक-मिश्रा
 
प्रोजेक्ट के अंतर्गत वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में एक बिंदु चुना है। कैलिफोर्निया का जेम्सबर्ग अर्थ स्टेशन तारामंडल ग्लीज-526 को संदेश भेजेगा। पृथ्वी से ग्लीज 17.6 प्रकाश वर्ष दूर है। लोन सिग्नल ने प्रोजेक्ट के मुख्य साइंस ऑफिसर जैकब हक-मिश्रा के मुताबिक  वैज्ञानिकों को किसी भी ड्वार्फ का चक्कर लगाता कोई ग्रह नहीं मिला। वहीं ग्लीज-526 पर एलियंस के होने की संभावना हो सकती है। हक-मिश्रा और उनकी टीम ही यह निर्णय करेगी कि ये संदेश किस तारामंडल में भेजे जाएंगे।
 
 
जेम्सबर्ग स्टेशन
 
जेम्सबर्ग स्टेशन का रेडियो एंटीना 1968 में स्थापित किया गया था। लोन सिग्नल ने यह एंटीना 30 साल की लीज पर लिया है। भविष्य में लीज बढ़ाई जा सकती है।
 
ऐसा है संदेश
 
ग्लीज को संदेश भेजने के लिए विभिन्न प्रकार की वेव्स का उपयोग किया गया। माइकल बुश द्वारा तैयार अभिवादन वाले संदेशों में ब्रह्माण्ड में पृथ्वी की स्थिति, मैंडलीफ की आवर्त सारणी में उल्लिखित तत्व और हाइड्रोजन परमाणु के बारे में बताया गया है। 
 
 
हम कैसे भेज सकते हैं मैसेज
 
आप कई तरह से प्रोजेक्ट में हिस्सा ले सकते हैं। छोटा संदेश मुफ्त भेज सकते हैं। ज्यादा शब्दों का संदेश और फोटो भेजना चाहते हैं तो आपको करीब  56 रुपए चुकाने होंगे।
sabhar : bhaskar.com
 
 

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रविवार, 31 मार्च 2013

एचआईवी से बचाने वाली दवा

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 एचआईवी से बचाने वाली दवा
 (इस दवा को ब्रिटेन एचआईवी के इलाज के लिए उपयोग की अनुमति देता है न कि उसके बचाव के लिए)

अभी तक दुनिया भर में एचआईवी और एड्स के लड़ने की जद्दोजहद चल रही है और शोध चल रहे हैं कि

इसका इलाज किस तरह से किया जाए.
ये सब एचआईवी संक्रमण के बाद की बाते हैं.
लेकिन इस बीच अब एक ऐसी दवा आ गई है जो एचआईवी संक्रमण को रोकती है.
अमरीकी स्वास्थ्य नियामक संस्था ने पहली बार एक ऐसी दवा को अनुमति दे दी है जो एचआईवी के संक्रमण को रोकती है.
शोध कहता है कि हर रोज़ एक गोली खाने से एचआईवी संक्रमण का खतरा 73 प्रतिशत तक कम हो सकता है.
फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफ़डीए) ने कहा है कि त्रुवादा नाम की ये दवा उन लोगों को दी जा सकती है जिन्हें एचआईवी संक्रमण का खतरा बहुत अधिक है या ऐसे लोगों को जिन्हें एचआईवी संक्रमित व्यक्ति से यौन संबंध बनाने की स्थिति बन सकती है.

विरोध भी

कुछ स्वास्थ्य कर्मियों और एचआईवी प्रभावित लोगों के बीच काम कर रही संस्थाओं ने इस दवा को अनुमति दिए जाने का विरोध किया है.
"हम जानते हैं कि एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति यदि नियमित रूप से एंटीरेट्रोवायरल दवा लेता रहे तो उसका वायरस इतना कमज़ोर हो जाता है कि वह किसी और को संक्रमित लायक ही नहीं बचता"
माइकल बॉर्टन, यूएनएड्स
उनका कहना है कि ऐसी दवा से एचआईवी से रक्षा की एक झूठी सुरक्षा की भावना पैदा होगी और इससे ये होगा कि लोग ज्यादा खतरा उठाने लगेंगे.
उन्हें यह डर भी है कि एचआईवी का एक वायरस भी पैदा हो सकता है जिसमें इस दवा के प्रतिरोध की क्षमता हो. यानी एक समय के बाद इस दवा का असर होना बंद हो जाए.
एफडीए ने एक बयान में कहा है कि इस दवा का उपयोग 'व्यापक एचआईवी बचाव योजना' के तहत की प्रयोग में लाया जाना चाहिए जिसमें कंडोम का प्रयोग और नियमित एचआईवी परीक्षण शामिल है.
मई में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की एक सलाहकार समिति ने एडीए से इस दवा को अनुमति देने की सिफ़ारिश की थी.

'दूसरी दवाओं के साथ लें'

एएफ़डी ने कहा है कि जो लोग पहले से एचआईवी संक्रमित हैं, उन्हें ये दवा एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के साथ लेना चाहिए.
वर्ष 2010 में किए गए प्रयोग से पता चला है कि ट्रूवाडा ने समलैंगिक पुरुषों में एचआईवी की आशंका को 44 प्रतिशत और किसी एचआईवी संक्रमण से मुक्त व्यक्ति के एचआईवी प्रभावित विषमलिंगी व्यक्ति से यौन संबंध बनाने पर संक्रमण की आशंका को 73 प्रतिशत तक कम कर दिया.
एंटीरेट्रोवायरल
एचआईवी संक्रमण के बाद के इलाज के लिए कई दवाएँ पहले से ही बाजार में हैं
संयुक्त राष्ट्र एड्स कार्यक्रम यूएनएड्स के माइकल बॉर्टन ने कहा कि इस बात के सबूत हैं कि ये दवा एचआईवी संक्रमण के खतरे को कम करती है लेकिन तभी जबकि इसका नियमित सेवन किया जाए.
उनका कहना है कि ज्यादातर मामलों में अच्छा ये होगा कि एचआईवी से प्रभावित व्यक्ति का इलाज किया जाए न कि उसके उस पार्टनर पर ध्यान दिया जाए जिसे एचआईवी नहीं है.
उनका कहना है, "हम जानते हैं कि एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति यदि नियमित रूप से एंटीरेट्रोवायरल दवा लेता रहे तो उसका वायरस इतना कमज़ोर हो जाता है कि वह किसी और को संक्रमित लायक ही नहीं बचता."
एंटीरेट्रोवायरल दवा एचआईवी संक्रमित व्यक्ति की जीवन अवधि भी बढ़ा देती है.
ट्रुवाडा को ब्रिटेन में भी अनुमति दी गई है लेकिन एचआईवी के इलाज के लिए न कि उससे बचाव के लिए.
 SABHAR : BBC.CO.UK

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शनिवार, 30 मार्च 2013

इंसानी दिमाग में लगेगा चिप !

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क्या एक दिन ऐसा भी आएगा जब दिमाग में प्रत्यारोपित किए गए चिप की बदौलत इंसान सीधे संपूर्ण मानव ज्ञान का उपयोग करने में सक्षम हो पाएगा?
आपको शायद ये बात मज़ाक लगे, शायद सोच से परे भी, लेकिन अमरीकी लेखक और आविष्कारक रे कुरुजविल का मानना है कि ऐसा भविष्य में ज़रुर संभव होगा.


हाल ही में सैनफ्रांसिस्को में हुए एक सम्मेलन में रेकुरुजविल ने बीबीसी फ्यूचर को बताया कि किस तरह से भविष्य में महत्वपूर्ण बदलाव जन्म लेंगे और इंसानों व समाज पर इनका क्या असर होगा. ये परिवर्तन मानव इतिहास का सबसे बड़ा परिवर्तन होगा.
रे कुरुजविल का तर्क है कि क्लिक करेंकंप्यूटर की ताकत आज जिस तरह से बढ़ गई है, उस देखते हुए कहा जा सकता है कि 2029 में मशीनें इंसानों की तरह ही स्मार्ट हो जाएगी.
चिप को तंत्रिका तंत्र से जोड़ कर हम मानव को और स्मार्ट बनाया जा सकता हैं.
"सूचना प्रौद्योगिकी जिस रफ्तार से बढ़ रही है, दशक पहले जितना कंप्यूटर इस्तेमाल में आता था, उसकी तुलना में आज हम दोगुनी तेजी़ से कंप्यूटर की ताकत का इस्तेमाल करते हैं, भविष्य में इसकी ताकत और इस्तेमाल लगातार बढ़ता जाएगा."
रे कुरुजविल
ये कुछ कुछ वैसा ही होगा जिस तरह से आज हम वर्चुअल रिएलटी गेम का इस्तेमाल करते हैं, ये भी कुछ उसी तरह से संभव होगा.
इसके बाद इंसान की सोच का दायरा भी काफी बड़ा हो जाएगा.

भविष्य की सोच

रे कुरुजविल कहते हैं, “सूचना प्रौद्योगिकी जिस तरह से बढ़ रही है, दशक पहले जितना कंप्यूटर इस्तेमाल में आता था, उसकी तुलना में आज हम दोगुनी तेजी़ से कंप्यूटर की ताकत का इस्तेमाल करते हैं, भविष्य में इसकी ताकत और इस्तेमाल लगातार बढ़ता जाएगा
लेकिन वो स्थितियां कैसी होंगी, इस सवाल पर वो कहते हैं, "लोग नए तरीकों सेक्लिक करेंप्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने लगेंगे और अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए इन शक्तिशाली उपकरणों का इस्तेमाल करने लगेंगे."
चिप को मस्तिष्क में लगाने के बाद कई रोगों का निदान किया जा सकता है, जैसे पार्किंन्सन ले पीड़ित रोगियों के आलावा बधिर लोगों को भी सक्षम बनाया जा सकता है.
तो क्या आप तैयार हैं भविष्य के ऐसे इंसान के लिए जो हर चीज़ इंसान से बेहतर सोचेगा और शायद करेगा भी
 sabhar : bbc.co.uk

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मंगलवार, 26 मार्च 2013

"रिसर्च का तरीका अलग है"

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अभिजीत बोरकर माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट में एस्ट्रोफिजिक्स विभाग में शोध कर रहे हैं. शर्मीले और शांत दिखने वाले अभिजीत को जर्मनी आए अभी कुछ ही समय हुआ है. वह शोध पूरा कर भारत लौटना पसंद करेंगे.
अभिजीत कहते हैं कि अगर वह भारत में विज्ञान को किसी तरह बढ़ावा दे पाएं और हाईस्कूल के बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि पैदा कर पाएं तो उनहें बहुत अच्छा लगेगा. मंथन में इस बार उन्होंने ब्लैक होल और उल्कापिंडों पर रोशनी डाली. पेश हैं उनसे बातचीत के कुछ अंश.
डॉयचे वेलेः अभिजीत जर्मनी में आपने अपने शोध के लिए कहां कहां आवेदन किया?
अभिजीत बोरकरः जी मैंने सिर्फ माक्स प्लांक संस्थान के लिए ही अप्लाई किया था. मेरा चयन यहां सबसे पहले हो गया, तो जुलाई 2012 में मैं यहां पीएचडी के लिए जर्मनी आ गया.
यहां शोध करने के लिए आपने कैसे आवेदन किया?
पीएचडी के लिए आप दो तरह से अप्लाई कर सकते हैं, या तो सीधे प्रोफेसर से संपर्क कीजिए और उन्हें ईमेल या फोन के जरिए अपना प्रोजेक्ट बताइए, या फिर आप उनके कॉलेजों में आवेदन कर सकते हैं. फिर बाकायदा इंटरव्यू होने के बाद छात्रों को चुना जाता है. मेरे मामले में जर्मनी आने की इच्छा खास थी. इसके अलावा मैंने जब अप्लाई किया तब मेरा मास्टर्स पूरा नहीं हुआ था और यही एक ऐसा संस्थान था जहां मैं ऐसी हालात में भी अप्लाई कर सकता था.
अपने रिसर्च के बारे में कुछ बताइए.
मैं हमारी आकाशगंगा के बारे में शोध कर रहा हूं. हमारी गैलेक्सी के केंद्र में जो सुपर मैसिव ब्लैक होल है, उसका रेडियोएनालिसिस करना मेरा विषय है. इसमें मैं वैसे तो अकेले ही काम कर रहा हूं. कभी कभार किसी के साथ सहयोग भी हो जाता है, लेकिन मूल तौर पर मेरा काम अकेले का ही है.
कौन सा आकर्षण था जो आपको एस्ट्रोफिजिक्स की ओर ले आया?
दो कारण थे. एक तो कि खगोल विज्ञान वैसे तो बहुत पुराना विज्ञान है, लेकिन इसमें शोध काफी कम हुआ है. अंतरिक्ष के बहुत से राज खुलने अभी बाकी हैं. भौतिकी के बाकी क्षेत्रों में काफी शोध हुआ है, जबकि खगोल विज्ञान में नहीं. तो यहां संभावनाएं काफी हैं. इससे भी अहम यह है कि सादी तकनीक के जरिए आप काफी जानकारी जमा कर सकते हैं. तो यह आसान तो है, लेकिन जटिल भी.
खगोल विज्ञान के क्षेत्र में शोध के लिए भारत में तकनीकी सुविधाएं कैसी हैं?
मैंने जो शोध देखे हैं या जिस फील्ड में फिलहाल मैं काम कर रहा हूं, वहां तकनीकी तौर पर बहुत अंतर नहीं है. सभी काम अंतरराष्ट्रीय साझेदारी में ही चलता है. टेलीस्कोप और अन्य चीजें अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं. फर्क काम करने के तरीके में है. ब्यूरोक्रैटिक काम में फर्क दिखता है, लेकिन तकनीकी तौर पर दोनों देशों में कोई फर्क नहीं है, खासकर मेरे शोध क्षेत्र में. लेकिन यह है कि भारतीय छात्रों को प्रैक्टिकल का अनुभव कम है. इसका कारण सिर्फ इतना है कि मास्टर्स में छात्रों को उतने मौके नहीं मिलते. तो उन्हें ज्यादा प्रोजेक्ट्स की जानकारी नहीं होती और तकनीक की भी जानकारी कम होती है. बैचलर के छात्रों को प्रयोग के दौरान सभी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं. वह किसी भी मशीन का इस्तेमाल कर सकते हैं जो हमारे यहां नहीं होता.
और क्या फर्क दिखाई देते हैं.
एक बड़ा फर्क यह है कि कई बार छात्र स्नातक के बाद शोध के लिए एक दो साल का गैप ले लेते हैं, तो उन्हें शोध का थोड़ा अनुभव भी हो जाता है. जो हमारे यहां नहीं हो पाता.
जर्मनी में आकर आपने सबसे पहले क्या नया सीखा?
मेरे लिए यहां का वर्क कल्चर अहम था. यहां पर लोग नौ बजे आते हैं और सिर्फ पांच ही बजे तक काम करते हैं. और जब काम करते हैं तो सिर्फ काम ही करते हैं, इसके अलावा कुछ नहीं. यह मुझे रोचक लगा. दूसरा कि यहां के छात्रों का तकनीकी ज्ञान बहुत ही अलग होता है. मैंने देखा है कि भारत में छात्र थ्योरी में बहुत अच्छे होते हैं, लेकिन यहां के तकनीकी तौर पर बेहतर होते हैं.
आप यहां सबसे ज्यादा क्या मिस करते हैं?
खाना मिस करता हूं. और दूसरा है मौसम. यहां सूरज दिखाई ही नहीं देता, तो बहुत परेशानी होती है.
इंटरव्यूः आभा मोंढे
संपादनः ईशा भाटिया

sabhar : DW.DE


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