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रविवार, 4 अगस्त 2013

इंजीनियरों ने शुरू किया मोबाइल आधारित टीवी चैनल

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इंजीनियरों ने शुरू किया मोबाइल आधारित टीवी चैनल

तिरअनंतपुरम : इंजीनियरिंग स्नातकों के एक समूह ने यहां एक ऐसा टीवी चैनल शुरू किया है जिसे मोबाइल फोन के जरिए देखा जा सकता है। यह चैनल स्थानीय समाचारों एवं घटनाओं को प्रोत्साहित करेगा।

समूह के संस्थापकों में से एक अरविंद जीएस ने यहां संवाददाताओं को बताया कि ‘वी 4 यू’ नाम का यह चैनल राजधानी शहर से पहला 2जी, 3जी मोबाइल टीवी चैनल है।

उन्होंने कहा कि दर्शक इस अनूठे चैनल को अपने मोबाइल फोन से दुनिया में कहीं भी देख सकते हैं। चौबीस घंटे का यह चैनल जावा और एंड्रायड जैसे सभी प्लेटफार्मों पर काम करेगा। दर्शक मामूली शुल्क देकर इस चैनल का लाभ उठा सकते हैं। (एजेंसी) sabhar :http://zeenews.india.com

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वैज्ञानिकों ने पशु ऊतक से बनाया कृत्रिम मानव कान

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वैज्ञानिकों ने पशु ऊतक से बनाया कृत्रिम मानव कान
वाशिंगटन : हाल ही में वैज्ञानिकों ने कथित तौर पर पशु ऊतक से हू-ब-हू मानव कान विकसित करने में सफलता पा ली है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वह किसी रोगी की कोशिका से भी पूरे कान को विकसित करने में जल्द ही सफलता पा लेंगे। बीबीसी ने बोस्टन स्थित मैसाचुसेट्स जनरल अस्पताल के शोधकर्ताओं के हवाले से कहा है कि इस प्रकार विकसित किया गया कान एकदम वास्तविक कान के समान लचीला है।

चिकित्सा विज्ञान में ऊतक अभियांत्रिकी उभरती हुई नई पद्धति है, जिसमें मानव के वैकल्पिक अंगों को विकसित किया जाता है, ताकि क्षतिग्रस्त अंगों को बदला जा सके। यह शोध पत्र विज्ञान पत्रिका रॉयल सोसायटी इंटरफेस में प्रकाशित हुआ है। शोधपत्र में कहा गया है कि अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं का दल कृत्रिम कान के निर्माण में लगा हुआ है, ताकि जन्म से ही कान के अविकसित रहने या दुर्घटना में कान खो देने वाले मनुष्यों की मदद की जा सके।

इससे पहले अनुसंधानकर्ताओं ने किसी बच्चे के कान के आकार के कान को एक चूहे पर विकसित करने में सफलता पाई थी। हालिया अनुसंधान में उन्होंने गाय और भेड़ के ऊतकों की मदद से तार की सहायता से कान के आकार की 3डी संरचना पर कृत्रिम कान विकसित करने में सफलता पाई है। (एजेंसी)  sabhar : http://zeenews.india.com

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बुधवार, 31 जुलाई 2013

वो 6 तरकीबें जिनसे दुनिया को मिलेगा भोजन

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भारत में सब के लिए भोजन की गारंटी के कानून पर बहस हो रही है लेकिन सवाल ये भी उठ रहे हैं कि इतनी बड़ी आबादी के लिए खाने का इंतजाम कहां से होगा.
ये सवाल सिर्फ भारत का ही नहीं पूरी दुनिया का है लेकिन कई नए और उभरते हुए शोध से इसका जवाब मिलने की उम्मीद नज़र आ रही है.
अनुमानों के मुताबिक 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब तक पहुंच जाएगी. इतनी बड़ी आबादी के लिए ख़ाने का इंतज़ाम करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन कम से कम 60% बढ़ाना होगा.

सबको मिलेगा भोजन?

फसल आनुवांशिकी के एसोसिएट प्रोफेसर शॉन मेज़ का कहना है कि ये मानने के कई कारण हैं कि पर्याप्त भोजन पैदा करना एक “अहम चुनौती” होगी.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ से कहा, "ये सिर्फ अभी के उत्पादन को दोगुना करना नहीं है क्योंकि पर्याप्त ज़मीन नहीं है. इस का सिर्फ एक हल नहीं है और कभी नहीं हो सकता. जितने पहलू संभव हैं उनकी कोशिश करनी होगी."
वैज्ञानिकों का मानना है कि 6 आइडिया हैं जो मदद कर सकते हैं.

फसल उत्पादन

"ये सिर्फ अभी के उत्पादन को दोगुना करना नहीं है क्योंकि पर्याप्त ज़मीन नहीं है. इस का सिर्फ एक हल नहीं है और कभी नहीं हो सकता. जितने पहलू संभव हैं उनकी कोशिश करनी होगी."
प्रोफेसर शॉन मेज़, एसोसिएट प्रोफेसर, फसल आनुवांशिक
एक टीम ने हाल ही में एक ऐसे रसायन की खोज की है जो फसलों को ऊंचे तापमान से बचा सकेगा.
“क्विनबैक्टीन” नाम का ये रसायन पौधों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाले एक हॉरमोन की नकल करता है जिससे वो गर्मी का मुकाबला कर पाते हैं.
इस शोध की अगुवाई करने वाले अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शॉन कटलर का कहना है कि जब इस रसायन को पौधों पर छिड़का जाता है तो पौधों का मुर्झाना कम होता है, उनका कम पानी खर्च होता है और वो ज़्यादा मुश्किलें झेल पाते हैं.

भोजन की छपाई

तकनीकी कंपनियां रोज़मर्रा के इस्तेमाल में काम आने वाली चीज़ें छापने के ज़्यादा दक्ष तरीके तैयार कर रही हैं.
अब भोजन की छपाई करना वास्तविकता बनता जा रहा है. नासा छपे हुए भोजन के साथ प्रयोग कर रहा है जिससे सुदूर अंतरिक्ष के अभियानों पर भेजे जाने वालों अंतरिक्षयात्रियों को खाना खिलाया जा सकेगा.
मॉर्डन मिडो नाम की एक और कंपनी ने एलान किया है कि ये कृत्रिम मांस छाप सकती है और एक्सटर यूनिवर्सिटी की एक टीम ने तो छपी हुई चॉकलेट तैयार कर ली है.

शून्य से जीवन की शुरुआत

कृत्रिम जीव विज्ञान के क्षेत्र में कृत्रिम जीन को जोड़कर नए जीवन की शुरुआत करना शामिल है. ये अभी शुरुआती दौर में है लेकिन कुछ खोजों का असर बहुत दूर तक हो सकता है.
इसमें प्रकृति को इंजीनियरिंग की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जहां एक-एक कर कृत्रिम जीन को कम्प्यूटर पर कृत्रिम डीएनए से तैयार किया जाता है.
अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी ने हाल ही में खमीर का एक तंतु तैयार किया है, इस में जीव में विटामिन मिला दिए जाते हैं. और जब खमीर से ब्रेड तैयार की जाती है तो उसमें भरपूर विटामिन सी होता है.

वो अनाज जिन्हें भुला दिया गया

गेहूं, चावल और मक्का हमारे भोजन का 60% हिस्सा बनाते हैं. लेकिन मलेशिया में वैज्ञानिक ऐसे अनाजों पर ध्यान दे रहे हैं जिनमें सूखा सहने की शानदार क्षमता है और खराब मिट्टी में भी उगाए जा सकते हैं.
इन लक्षणों को व्यवसायिक फसलों में डालने पर ऐसी फसलें पैदा करने में मदद मिल सकती है जो बदलती जलवायु का ज़्यादा बेहतर ढंग से सामना कर सके.

जीन संवर्धित भोजन

संकर फसलों को उगाने के बजाय जीन संवर्धित फसलों में खाने का आनुवांशिक रंग रूप प्रयोगशाला में बदला जाता है. ब्रितानी सरकार ने हाल ही में एलान किया कि जीन संवर्धित फसलें पारंपरिक पौधों से ज्यादा सुरक्षित हो सकती हैं.
ज़्यादातर सुपरमार्केट जीन संवर्धित भोजन पर पाबंदी लगा चुके हैं लेकिन उन जानवरों का मांस बिकता है जिन्हें जीन संवर्धित फसलें खिलाई गई हैं. शॉन मेज़ का कहना है कि हम ये कहने की हालत में नहीं हैं कि जीन संवर्धित भोजन का इस्तेमाल नहीं करेंगे क्योंकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जब खेती से जुड़ी किसी समस्या का हल पारंपरिक रूप से संभव न हो.

सिकुड़ता हुआ आदमी

“ग्रीनहाउस में पौधा खूब ऊंचा होता है लेकिन इसके बाहर जाने के बाद ये मुर्झा जाता है क्योंकि ये खुद को संभाल नहीं पाता.”

कलाकार और द इनक्रेडिबल श्रिंकिंग मैन की शुरुआत करने वाले आर्न हेंड्रिक्स ने ये तुलना की है. हेंड्रिक्स का कहना है कि उचित पर्यावरणीय परिस्थितियों में मानव सिकुड़ सकता है या लंबे अरसे में छोटा हो सकता है. यानी बदलते पर्यावरण के साथ ख़ुद को ढाल सकता है. sabhar : bbc.co.uk

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शनिवार, 20 जुलाई 2013

मंगल पर जीवन के 'मज़बूत साक्ष्य'

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अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के 'क्यूरियोसिटी रोवर' को मंगल पर गए करीब एक साल हो चुके हैं.
इस दौरान क्यूरियोसिटी रोवर ने जो तथ्य इकट्ठे किए हैं उनसे पता चलता है कि यह लाल ग्रह चार अरब साल पहले जीवन योग्य रहा होगा.

क्लिक करें
साइंस जर्नल में प्रकाशित शोधपत्र के अनुसार क्लिक करेंमंगल ग्रह के वायुमंडल के विस्तृत अध्ययन से पता चला है कि चार अरब साल पहले मंगल ग्रह का वायुमंडल पृथ्वी से ज़्यादा अलग नहीं था.
उस समय क्लिक करेंमंगल का वायुमंडल काफ़ी सघन हुआ करता था. इन नए नतीजों से इस बात को बल मिलता है कि उस समय इस ग्रह की सतह गर्म और आर्द्र रही होगी और यहाँ पानी भी मौजूद रहा होगा. हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि मंगल पर कभी भी किसी प्रकार का जीवन था या नहीं
ओपेन यूनिवर्सिटी की डॉक्टर मोनिका ग्रैडी कहती हैं, “इस अध्ययन से पहली बार यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मंगल ग्रह पर जल और वायुमंडल की कितनी क्षति हुई होगी, उस समय मंगल का वायुमंडल कैसा रहा होगा और क्या उस समय मंगल ग्रह पर जीवन संभव रहा होगा.”
पूरी संभावना है कि समय का साथ मंगल ग्रह का चुम्बकीय क्षेत्र और वायुमंडल नष्ट हो गया और यह ग्रह एक सूखे निर्जन ग्रह में बदल गया.

क्यूरियोसिटी रोवर

क्लिक करेंक्यूरियोसिटी रोवर रोबोट पिछले साल 6 अगस्त को मंगल पर उतरा था.
26 नवंबर 2011 को इस यान को अंतरिक्ष से छोड़ा गया था और क़रीब 24 हज़ार करोड़ मील की दूरी तय कर यह यान मंगल पर उतरा था.
परमाणु ईधन से चलने वाले इस 'क्यूरियोसिटी रोवर' अभियान की लागत है क़रीब 2.5 अरब डॉलर.
इस अभियान के तहत नासा वैज्ञानिकों ने एक अति उन्नत क्लिक करेंघूमती फिरती प्रयोगशालाको मंगल ग्रह पर भेजा है.
इस प्रयोगशाला से मिली जानकारी मंगल ग्रह के इतिहास को समझने में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है.
रोवर की यात्रा के तीन चरण हैं, पहला है मंगल ग्रह में प्रवेश , दूसरा नीचे सतह की ओर आना और तीसरा ज़मीन पर उतरना.
इस मार्स रोवर का वज़न 900 किलो है और यह अपनी क़िस्म के अनोखे कवच में ढँका हुआ है.

 sabhar bbc.co.uk

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शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

कभी देखी है उड़ने वाली मोटर-बाइक

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चेक गणराज्य में तैयार यह बाईक जमीन से कुछ मीटर की ऊँचाई पर पांच मिनट तक चक्कर लगा सकती है.
उड़ने वाली कार अब भी सपना ही है, लेकिन क्या उड़ने वाली बाइक जल्द ही हकीकत बनकर सामने आ सकती है?
क्लिक करेंचेक गणराज्य में शोधकर्ताओं ने 95 किलोग्राम की क्लिक करेंरिमोट से चलने वाली बाइक तैयार की है, जो जमीन से कुछ मीटर की ऊँचाई पर पाँच मिनट तक चक्कर लगा सकती है.

इस बाइक में सामने और पीछे की ओर दो-दो और अगल बगल एक-एक राजधानी प्राग के एक प्रदर्शनी हाल में एक डमी उड़ान के दौरान इस इलेक्ट्रॉनिक प्रोटोटाइप ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी, चारों तरफ घूमा और सफलतापूर्वक उतर गया.
क्लिक करेंबैटरी चालित प्रोपेलर लगे हैं.
प्रोपेलर एक तरह का पंख है जो घूम घूम कर ऊर्जा पैदा करता है.

बेहतरी की उम्मीद

इस मशीन की मदद से दुपहिया यात्रियों के भीड़भाड़ भरे जाम से निजात मिल सकती है, लेकिय यह भी सड़क पर उतरने या हवा में कुलाँचे भरने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है.
इसकी मौजूदा बैटरी की मदद से यह कुछ मिनट तक उड़ान ही भर सकती है और फिर इसे रिचार्ज करना पड़ता है.
'ड्यूरेटिक बाइसिकिल्स' के तकनीकी निदेशक मिलान डूचेक ने बताया, “चूंकि हर दस साल में बैटरी की क्षमता दोगुनी हो जाती है, इसलिए हम उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में बाइक की इतनी क्षमता होगी कि वह खेल, पर्यटन या छोटे कामों के लिए प्रयोग में आ सके.”
इस बाइक को तैयार करने के लिए ड्यूरेटिक ने दो अन्य चेक कंपनियों टेक्नोडैट और एवेक्टोर के साथ काम किया.

पैराशूट वाली बाइक

उम्मीद जताई गई है कि यह बाइक अगले कुछ वर्षों में खेल या पर्यटन के उपयोग में आ सकेगी.
बाइक को उड़ाने की यह पहली कोशिश नहीं है.
इससे पहले अगस्त 2009 में ऑक्सफोर्डशायर के एक आईटी अध्यापक जॉन कार्वर ने एक बाइक तैयार कर उसे “फ्लाइक” नाम दिया. यह एक उड़ान भरने वाला तिपहिया वाहन था.
उन्होंने चैरिटी के उद्देश्य से ब्रिटेन में उड़ान भी भरी.
कार्वर का वाहन नागर विमानन प्राधिकरण में पंजीकृत था और इसमें टू-स्ट्रोक ट्विन प्रोपेलर मोटर के साथ ही पैराग्लाइडर छतरी भी लगी थी. इसमें एक पैराशूट भी लगा था, जो बाइक के हवा में होने के दौरान हमेशा खुला रहता था.
कार्वर की वेबसाइट के मुताबिक बाइक में प्रत्येक दो घंटे बाद ईंधन भरना पड़ता था और यह 25.4 किलोग्राम तक सामान ले जाने में सक्षम हैं और यह उड़ान के दौरान 32 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर सकती है.
पैरा-साइकिल जैसी कंपनियां भी छोटे उपकरणों की बिक्री करती हैं, लेकिन एक बड़ा पैराशूट शहरी यात्रियों के लिए बोझिल हो सकता है.

20वीं शताब्दी की शुरुआत में “फ्लाइंग मशीन” वास्तव में साइकिल ही थीं, जिनमें पंख जोड़ दिए गए थे.
sabhar : bbc.co.uk

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बिना ड्राइवर की कार को सड़कों पर दौड़ाने की तैयारी

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बिना ड्राइवर की कार को सड़कों पर दौड़ाने की तैयारी
लंदन : ब्रिटेन की सड़कों पर खुद ब खुद चलने वाली कारों का पहली बार परीक्षण इस वर्ष के अंत में किए जाने की तैयारी हो रही है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जापानी बहुराष्ट्रीय ऑटो निर्माता निसान के साथ मिलकर एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं और उन्होंने साइंस पार्क में एक निजी रोड पर ऐसी गाड़ी का परीक्षण पूरा भी कर लिया है।

हालांकि ब्रिटेन की आम सड़कों पर अन्य वाहनों के साथ उसके परीक्षण के लिए परिवहन विभाग से मंजूरी अब मिली है। ये कारें खुद सड़कों पर दौड़ेंगी लेकिन सुरक्षा के तौर पर इनके भीतर एक ड्राइवर को बिठाया जाएगा जो किसी आपात स्थिति में स्टेयरिंग संभालेगा। (एजेंसी) sabhar : http://zeenews.india.com

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शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

दस साल बाद कैसा होगा आपका मकान?

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भविष्य का घर
भविष्य के घर की झलक

जिस रफ्तार के तकनीक बदल रही है, उससे इंसान के रहन-सहन के तौर तरीके में भी बदलाव आ रहे हैं.
कंप्यूटर क्षेत्र की नामी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने 'स्पेस ऑफ द फ्यूचर' नाम के अपने मॉडल को नए रूप में पेश किया है, जो दिखाता है कि आज से पांच या दस साल बाद जिंदगी किस तरह की होगी.

वॉशिंगटन में माइक्रोसॉफ्ट के मुख्यालय में भविष्य के इस मकान को बनाया गया है. इसमें अत्याधुनिक तकनीक से आपकी शक्ल को देख कर या फिर एक इशारा पाते ही खाना पकाने जैसे काम भी बेहद आसानी हो जाते हैं.
माइक्रोसॉफ्ट में इस अहम प्रोजेक्ट से जुड़े एंटन एंड्रयूज ने बीबीसी को इस मकान की सैर कराई. एंड्रयूज़ ने इस मकान में एक खास डेस्क दिखाई.
ये डेस्क आपकी ज़रूरत के हिसाब से ऊपर या नीचे हो जाएगी जिससे आप आसानी से काम कर सकें. फिर देखते ही देखते वो डेस्क कंप्यूटर स्क्रीन के तौर पर खुल कर सामने आती है.

डेस्क में छिपी जानकारियाँ

भविष्य का घर
इसमें आप कुछ चीजों को अपने हिसाब से आकार दे सकते हैं
ये स्क्रीन व्यक्ति का चेहरा पहचान कर उसके काम से संबंधित चीजें स्क्रीन पर पेश करती है. एंड्रयूज़ के मुताबिक़ आगे चलकर हर सूचना के अंदर ही कुछ कमांड्स होंगी यानी एक सूचना से दूसरी और कई जानकारियाँ आप वहाँ पा सकेंगे.
ये कमांड कई तरह के हो सकते हैं जैसे रीवाइंड, जहाँ आप जिस विषय पर काम कर रहे हैं उससे जुड़ी पिछली जानकारियाँ आपको मिल जाएँगी. एंड्रयूज़ के अनुसार साथ ही इसमें अपने आप सर्च जैसी सुविधा होगी. यानी अगर आप किसी विषय पर काम कर रहे हैं तो उससे जुड़ी बाक़ी जानकारियाँ ख़ुद ही उस डेस्क पर आपके सामने आती रहेंगी.
फिर आपने जैसे सर्च की जानकारी दिखाने को कहा तो उससे जुड़े वीडियो, तस्वीरें और बाक़ी जानकारियाँ सामने आ जाएंगी.
अब तक दफ़्तरों या घरों में अगर सफ़ेद या काला बोर्ड रहता है जिस पर आप कुछ लिख सकते हैं तो आगे चलकर उसकी जगह टच स्क्रीन वाले पैनल आ जाएँगे और सारा काम उसी पर होगा.

भविष्य पर नजर

भविष्य में इस तरह की सामग्री में कई तरह की कमांड निहित होंगी. इनमें कुछ आपको इस सामग्री की पिछली अवस्था दिखाएंगी तो कुछ कमांड उस सामग्री को लगातार सर्च के जरिए अपडेट भी करती रहेंगी. इस सर्च में संबंधित वीडियो और कांफ्रेंस होंगे.
"इस मॉडल में कई तरह की तकनीकों का मिश्रण है जिन्हें वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने तैयार किया है. तो ये साइंस फिक्शन नहीं है, बल्कि असल चीजें हैं जिन्हें वास्तव में विकसित किया जा रहा है."
एंटन एंड्रयूज, माइक्रोसॉफ्ट
एंड्रयूज बताते हैं, “इस मॉडल में कई तरह की तकनीकों का मिश्रण है जिन्हें वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने तैयार किया है. तो ये साइंस फिक्शन नहीं है, बल्कि असल चीजें हैं जिन्हें वास्तव में विकसित किया जा रहा है.”
ये आपकी सृजनशीलता को भी नए आयाम देगा. किसी भी चीज को आप एक स्कैनर के सामने रख कर अपने हाथों को जिस प्रकार घुमाते जाएंगे वो वैसा ही रूप लेती जाएगी. स्क्रीन पर उसका थ्री डी मॉडल आपको दिखता रहेगा.
इस तरह अपने मकान में रखे किसी पॉट या गुलदान को जो चाहे रंग रूप दे सकते हैं.

किचन के मज़े

अगर भूख लगी है तो इस मकान की किचन आपका पसंदीदा खाना पेश करने का पूरा प्रयत्न करेगा.
मान लीजिए आप एक शिमला मिर्च लेकर एक स्कैनर के सामने खड़े हो जाते हैं, तो वो आपको उन तमाम व्यंजनों के नाम और तस्वीरें दिखा देगा जो आप उस शिमला मिर्च से बना सकते हैं.
भविष्य का घर
कंप्यूटर को लगातार अक्लमंद बनाया जा रहा है
पसंदीदा डिश तय करने के बाद जैसे ही आप कुकिंग टेबल की तरफ बढ़ते हैं, तो वहां उस डिश में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के चित्र उभर आते हैं ताकि आपसे कुछ छूटे न.
साथ ही उसे बनाने की विधि आपको बताई जाती है. सब कुछ करने के बाद जब आप उसे चूल्हे पर चढ़ाते हैं तो उसका तापमान डिश के मुताबिक तय होता है.

क्या कहते हैं गेट्स

वैसे माइक्रोसॉफ्ट शुरू से ही कंप्यूटर जगत की नामी कंपनी रही हैं और इसके संस्थापक बिल गेट्स दुनिया के सबसे चर्चित लोगों में से एक माने जाते हैं.
जब उनसे हाल ही में पूछा गया कि क्या वो मुख्य कार्यकारी स्टीव बॉलमर के नेतृत्व में कंपनी के प्रदर्शन से खुश हैं तो उन्होंने कहा, “स्टीव के नेतृत्व में साल भर में कई कमाल की चीजें हुई हैं. लेकिन क्या ये पर्याप्त है? नहीं.”
कंपनी के शेयरों के दाम वहीं हैं जहां पांच साल पहले थे जबकि उनकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों एपल, अमेजन और सैमसंग के शेयरों के दाम दोगुने से ज्यादा हो गए हैं.

ऐसे में भविष्य का मकान पेश करने जैसे प्रोजेक्ट नई चीजें उतारने की माइक्रोसॉफ्ट की प्रतिष्ठा को मजबूत करेंगे.

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कैसे होंगे भविष्य के स्मार्ट शहर

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भविष्य के शहर के निर्माण में तकनीक के इस्तेमाल पर बढ़ रहा है जोर
दुनियाभर में नए शहर बसाए जा रहे हैं और जिन शहरों में हम सदियों से रह रहे हैं उन्हें सुधार कर भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा है.
ऐसा तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या और बढ़ते प्रदूषण के जवाब में हो रहा है. साथ ही पूरे शहर को एक साथ वेब नेटवर्क पर जोड़ना भी नए शहर बसाने और पुराने शहरों के नवीनीकरण का एक प्रमुख कारण है.

वहीं कुछ शहर स्मार्ट होने का मकसद शहरों को और हरा-भरा और पर्यावरण को कम दूषित करना है.स्मार्ट शहर का मतलब ये हो सकता है कि डेटा की मदद से ट्रैफिक में जाम से बचा जा सके, या फिर निवासियों को बेहतर सूचना देने के लिए विभिन्न सेवाओं को एक साथ जोड़ देना.
तकनीकी कपंनी जैसे आईबीएम और सिस्को स्मार्ट शहरों में अपने लिए व्यवसाय का ज़बर्दस्त मौका देख रहीं हैं.
आईए जानते हैं, दुनियाभर में चर्चा में रहने वाले ऐसे स्मार्ट शहरों के प्रोजेक्ट के बारे में.

सॉन्गडो, दक्षिण कोरिया

कई लोगों के लिए सॉन्गडो स्मार्ट शहरों का सरताज है. येलो सी समुद्री तट पर इस शहर को बसाने का काम वर्ष 2005 में शुरु हुआ और इस पर 35 बिलियन डॉलर का खर्च होगा.
इस शहर की खासियत ये है कि पूरा शहर एक सूचना प्रणाली से जुड़ा है जिसकी वजह से इसे 'बक्से में बंद शहर' भी कहते हैं.
सॉन्गडो में सभी चीज़ों में इलेक्ट्रॉनिक सेंसर लगा हुआ है. जैसे स्वचालित सीढ़ियां, यानी एस्केलेटर, तभी चलेंगे जब उनपर कोई खड़ा होगा.
सभी घरों में टेलिप्रेजेंस सिस्टम लगाया गया है. साथ ही घर के ताले, घर को गर्म रखने के लिए हीटिंग प्रणाली आदि सभी पर इ-नेटवर्क के ज़रिए कंट्रोल रखा जा सकता है.
यहां तक की स्कूल, अस्पताल और दुसरे सरकारी दफ्तर भी नेटवर्क पर हैं.
तकनीक की दृष्टि से ये शहर बेमिसाल है लेकिन ज़रूरी नहीं कि इसलिए लोगों के लिए भी आदर्श शहर ही साबित हो.
इस शहर को तकनीक सिस्को दे रही है और ये साल 2015 तक पूरा हो जाएगा जिसके बाद यहां 65,000 लोग रह सकेंगे और 300,000 लोग यहां काम पर आएंगे.

मास्दार, संयुक्त अरब अमीरात

अरबी भाषा में मास्दार का मतलब स्रोत होता है.
ये शहर अबू धाबी के रेगिस्तान के बीचों-बीच बसाया जा रहा है.
इसे धरती पर सबसे ज्यादा संवहनीय या सस्टेनेबल और दीर्घकालिक शहर के रुप में बसाया जा रहा है.
शहर में सौर्य उर्जा और वायु उर्जा के संयंत्र लगे हैं जिससे प्रदूषण कम से कम हो.
शहर को गाड़ियों से मुक्त रखा गया है. यहां कोई कार नज़र नहीं आएगी बल्कि आवाजाही के लिए बिजली से चलने वाली बिना ड्राइवर की गाड़ियां बनाई जा रही हैं.
इस शहर में 40,000 लोग रह सकेंगे. लेकिन इसे बनाने की कीमत कई बिलियन डॉलरों में आंकी जा रही है जिससे आलोचकों का कहना है कि दूसरी जगह ऐसा शहर बसाना आसान नहीं होगा.

रियो डे जेनेरो, ब्राज़ील

रियो साल 2014 में फुटबॉल विश्व कप और 2016 में ओलंपिक की मेज़बानी करेगा. जाहिर है दुनिया की नज़र इस शहर पर रहेगी, और उसके लिए खास तैयारी हो रही है.
शहर के तीस एजेंसियों को एक नेटवर्क पर जो़डा गया है जिससे किसी भी स्थिति से बेहतर तरीके से निपटा जा सके.
आईबीएम ने मौसम के पूर्वानुमान के लिए जटिल प्रणाली तैयार की है. मौसम औऱ ट्रैफिक आदि के लिए विशेष ऐप बनाए जा रहे हैं.
लेकिन इस शहर में सब कुछ कॉरपोरेट के नेतृत्व में नहीं हो रहा है.
रियो की झोपड़पट्टियों में आम लोग एक ऐसा प्रोजेक्ट चला रहे हैं जिसके तहत वहां रहने वाले अपने घरों को नई तरह से बना सके.
घरों के डिज़ाइन और उन्हें बनाने के आसान तरीके इंटरनेट पर उपलब्ध कराए गए हैं और लोगों से कहा जा रहा है कि वो अपने डिज़ाइन भी इंटरनेट पर लगाए.
इस प्रोजेक्ट का आदर्श है कि घर बनाने में अगर सभी लोग योगदान दे, तो फिर वो शहर कैसा होगा.

बार्सिलोना, स्पेन

पिछले साल बार्सिलोना शहर के एक प्रमुख अधिकारी ने ये बयान देकर हलचल पैदा कर दी की आने वाले स्मार्ट शहर भविष्य में कई देशों से ज्यादा ताकतवर हो जाएंगे.
बार्सिलोना स्मार्ट शहरों का नेता बनना चाहता है और इसके लिए शहर में कई रोचक प्रोजेक्ट लागू किए जा रहे हैं.
बस के रूटों को, कचरा उठाने की प्रक्रिया को सेंसर की मदद से और सक्षम किया जा रहा है.
इसके अलावा परिवहन के लिए बिना सीधा संपर्क के पेमेंट व्यवस्था तैयार की जा रही है.

लंदन, इंग्लैंड

लंदन में कई छोटे प्रोजेक्टों पर काम चल रहा है. रोमन काल का ये शहर नई टेक्नोलॉजी के लिए परीक्षण भूमि साबित हो रहा है.
इंटेल लंदन में ऐसी प्रणालियों पर प्रयोग कर रहा है जो भविष्य के शहरों में बिजली वितरण के लिए उपयोग में लाई जाएगी.
इसके अलावा सेंसरों के एक नेटवर्क पर काम चल रहा है जो वायु की गुणवत्ता, यातायात का प्रवाह, और पानी के वितरण पर निगरानी रखेगी.
लंदन के कुछ हिस्सों में वर्ष 2011 में दंगे हुए थे. उन दंगों में टॉटेनहैम इलाक़ा काफ़ी प्रभावित हुआ था.
इंजीनियरिंग सलाहकार कंपनी अरूप टॉटेनहैम इलाक़े को नया रूप देने के उद्देश्य से स्थानीय लोगों से ख़ासकर उन दंगों में शामिल लोगों से विचार विमर्श करने के बाद परियोजना बना रही है.

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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

छोटा दिमाग बड़ी समझदारी

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पिछले 30 हजार सालों में इंसान का दिमाग लगातार सिकुड़ता जा रहा है. इसका मतलब ये नहीं कि हम दिमागी रूप से कमजोर हो रहे हैं बल्कि रिसर्च में पता चला है कि विकास के क्रम में छोटा होता दिमाग इंसानों को स्मार्ट बना रहा है.
होमो सेपियन्स से आधुनिक मानव तक का सफर तय करने में इंसान के दिमाग का आकार करीब 10 फीसदी छोटा हो गया. यानी कभी 1500 क्यूबिक सेंटीमीटर के दिमाग का आकार अब घटकर 1359 क्यूबिक सेंटीमीटर रह गया है. महिलाओं का दिमाग पुरुषों के मुकाबले छोटा होता है और उनके दिमाग के आकार में भी इतनी ही कमी आई है. यूरोप, मध्य पूर्व और एशिया में मिली मानव खोपड़ियों के अवशेष की छानबीन करने के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं.
अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के जॉन हॉक्स बताते हैं, "मैं तो कहूंगा कि विकास के क्रम में पलक झपकते ही दिमाग का आकार छोटा हो गया." हालांकि दूसरे वैज्ञानिक दिमाग के सिकुड़ने को ज्यादा हैरतअंगेज नहीं मानते. उनके मुताबिक हम जितने बड़े और मजबूत होंगे हमारे शरीर पर नियंत्रण के लिए उतने बड़े दिमाग की जरूरत होगी. आधुनिक इंसान से ठीक पहले का इंसान यानी निएंडरथाल मानव करीब 30 हजार साल पहले अज्ञात कारणों से खत्म हो गया. निएंडरथाल मानव आधुनिक मानव की तुलना में काफी बड़े आकार के थे और उनका दिमाग भी उतना ही बड़ा था. करीब 17000 साल पहले इंसान की जो प्रजाति थी वो क्रो मैग्नस के नाम से जानी जाती है. क्रो मैग्नस ने गुफाओं में बड़े बड़े जानवरों की पेंटिंग बनाई और उनका दिमाग होमो सेपियंस की सारी प्रजातियों में सबसे ज्यादा बड़ा था. क्रो मैग्नस अपने बाद की पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा ताकतवर भी थे.
मिसौरी यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डेविड गियर कहते हैं कि ये विशेषताएं पर्यावरण के खतरों के बीच खुद को बचाए रखने के लिए जरूरी थीं. उन्होंने 19 लाख साल से लेकर 10 हजार साल पुराने इंसान की खोपड़ियों में हुए विकास का अध्ययन किया है. ये तो सब को पता ही है कि हमारे पूर्वजों को एक बेहद जटिल सामाजिक वातावरण में जीना पड़ा. गियर और उनकी साथियों ने अपने रिसर्च के दौरान देखा कि आबादी बढ़ने के साथ ही दिमाग का आकार घटता गया. गियर कहते हैं, "जटिल समाज के उभरने के साथ ही इंसान के दिमाग का आकार छोटा होता गया क्योंकि तब इंसान को जीवन के लिए ज्यादा संघर्ष की जरूरत नहीं पड़ती थी और उसने जीना सीख लिया था." हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक इस विकास का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि इंसान बेवकूफ होता चला गया बल्कि उसने बुद्धि के विकास से जीने के आसान तरीके सीख लिए. ड्यूक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ब्रायन हारे ने समझाते हुए कहा, "यहां तक कि चिम्पैंजियों में भी दिमाग का आकार बड़ा था, इसी तरह भेड़ियों की तुलना में कुत्तों का दिमाग छोटा पर ज्यादा चालाक, लचीला और समझदार होता है, साफ है कि दिमाग के आकार से समझदारी का फैसला नहीं होता."
रिपोर्टः एजेंसियां/एन रंजन
संपादनः महेश झा sabhar : dw.de

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यह आंख तो नहीं, पर दिखा सकती है

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नेत्रहीन तो इसे वरदान की तरह 'देख' रहे हैं. अमेरिका में बनी यह बायोनिक आंख उन लोगों की रोशनी कुछ हद तक लौटा सकती है जो रेटिनिटिस पिगमेनटोसा की वजह से आंखें खो बैठे हैं. अब दूसरी पीढ़ी की बायोनिक आंख बाजार में आ रही है.
रेटिनिटिस पिगमेनटोसा एक तरह की बीमारी है जो इंसान को अंधा बना देती है. कुछ वक्त पहले तक तो यह अंधापन लाइलाज ही था. लेकिन बायोनिक आंख यानी आर्गस प्रतिरोपण ने कुछ हद तक इसे ठीक कर पाने में सफलता दिलाई.
यूरोप के बाजारों में बायोनिक आंख जल्दी ही बिकने लगेगी. और जर्मनी के लोगों के लिए तो अच्छी खबर यह है कि देश के हेल्थ केयर सिस्टम ने इसे इन्श्योरेंस में कवर करने का फैसला कर लिया है. संभावना है कि ब्रिटेन और फ्रांस भी ऐसा ही करेंगे.
बायोनिक आंख की कीमत एक लाख अमेरिकी डॉलर यानी 45 लाख रुपये से ज्यादा है. सवाल यह है कि इन्श्योरेंस कंपनियों को इसे कवर करने के लिए राजी किया जा सकता है या नहीं. उसी बात पर इसकी सफलता निर्भर करेगी.
बायोनिक विजन सिस्टम एक कैमरा है जो चश्मे से जुड़ा है. यह हाई फ्रीक्वेंसी वाले रेडियो सिगनल रेटिना में लगी चिप को भेजता है. इन चिप के इलेक्ट्रोड के संकेत बदलते हुए ऑप्टिकल नर्व के जरिए दिमाग में पहुंचते हैं जहां दिमाग इन सिगनल्स को इमेज के तौर पर पहचानता है.
पहला इलाज
अमेरिका के लॉस एंजेलिस के रहने वाले टेरी बाइलैंड उम्र के चौथे दशक में अपनी आंखें खो बैठे. वह बताते हैं, "पहली बार जब मैंने एक छड़ी से अपने दरवाजे को छुआ, तो मैंने उसे बीच में ही दे मारा. मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि मैं कहां जाऊं."
बाइलैंड लाइवली रिवरसाइड ब्रेल क्लब के सदस्य हैं जहां बहुत से लोग बिना रोशनी की जिंदगी से समझौता कर चुके हैं. लेकिन टेरी इस समझौते के साथ जिंदगी नहीं गुजारना चाहते थे.
इसी वजह से उन्होंने बायोनिक आंख में दिलचस्पी दिखाई. इस तरह का इलाज कराने वाले वह पहले दो मरीजों में थे. तब इसकी क्लीनिकल ट्रायल ही चल रही थीं. और उन्हें फायदा हुआ. उन्होंने जब इसे ओके कर दिया तो इसे दूसरे लोगों के लिए पेश किया गया.
अब टेरी आर्गस प्रतिरोपण का नया वर्जन भी लगवाना चाहते हैं. वह कहते हैं, "मैं नया वर्जन लगवाने के लिए कुछ भी दे सकता हूं. लेकिन एफडीए इसकी इजाजत ही नहीं देगा."
अमेरिका के दवा और खाद्य प्रशासन ने अभी बायोनिक आंख के नए संस्करण को इजाजत नहीं दी है. हालांकि यूरोप में इसे इजाजत मिल चुकी है.
रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार
संपादनः आभा एम sabhar : dw.de

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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

मूत्र से 'सूँघा जा सकेगा' मूत्राशय का कैंसर?

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कैंसर
कैंसर की कोशिकाएं मौजूद हों तो मूत्र में से एक खास तरह की गंध आती है.
अगर क्लिक करेंमूत्राशय में कैंसर पनप चुका है तो इसमें गैस के रूप में रसायन की मौजूदगी पाई जाती है. यह उपकरण एक सेंसर की मदद से इस रसायन का पता लगा लेता है.

मगर विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पहले कि यह व्यापक पैमाने पर उपलब्ध हो, जाँच से शत-प्रतिशत परिणाम पाने के लिए अभी और अध्ययन करने की जरूरत है.इसको बनाने वालों ने 'प्लॉस' नामक एक पत्रिका को बताया है कि शुरुआती परीक्षणों में हुई 10 बार की जांच में से 9 बार जांच से सटीक परिणाम मिले.
क्लिक करेंब्रिटेन में हर साल करीब 10,000 लोगों के मूत्राशय के कैंसर का इलाज किया जाता है.

मूत्र की गंध

डॉक्टर लंबे समय से ऐसे तरीकों की तलाश कर रहे हैं जिनसे इस क्लिक करेंकैंसर का पता पहले चरण में ही लगाया जा सके. उस समय उसका इलाज आसान होता है.
"इससे पहले कि इस उपकरण का इस्तेमाल अस्पतालों में किया जाने लगे इसकी अभी और जांच करने की जरूरत है. इसके लिए हमें मरीजों से बड़े पैमाने पर नमूने इकट्ठे करने होंगे"
प्रोफेसर प्रोबर्ट
इनमें से कई डॉक्टर मूत्र की गंध की मदद से मूत्राशय कैंसर के खतरों का पता लगाने में लगे हैं.
कैंसर का पता लगाने के लिए पिछले कुछ सालों में जो अनुसंधान किए गए हैं वे बताते है कि यदि कुत्तों को प्रशिक्षित किया जाए तो वह कैंसर को सूंघ लेते हैं.
लिवरपूल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर क्रिस प्रोबर्ट और पश्चिमी इंग्लैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नार्मन रैटक्लिफ का कहना है कि उनके नए उपकरण कैंसर का पता लगा सकते हैं.

मौजूद रसायन

कैंसर
यह उपकरण मूत्र में मौजूद उन रसायनों को सूंघ लेता है जो नमूने को गर्म करने पर पैदा होते हैं.
प्रोफेसर रैटक्लिफ़ ने कहा, “यह उपकरण मूत्र में मौजूद उन रसायनों को सूंघ लेता है जो नमूने को गर्म करने पर पैदा होते हैं."
उन्होंने अपने इस उपकरण को जांचने के लिए मूत्र के 98 नमूनों का इस्तेमाल किया. ये नमूने उन 24 पुरुषों के थे जो मूत्राशय के कैंसर से पीड़ित थे. और इसमें वैसे 74 पुरुषों के मूत्र के नमूने भी शामिल थे जो मूत्राशय से संबंधित बीमारियों से ग्रस्त थे.
प्रोफेसर प्रोबर्ट का कहना है कि जांच के परिणाम बेहद उत्साहजनक थे. मगर उन्होंने बताया, “इससे पहले कि इस उपकरण का इस्तेमाल अस्पतालों में किया जाने लगे इसकी अभी और जांच करने की जरूरत है. इसके लिए हमें मरीजों से बड़े पैमाने पर नमूने इकट्ठे करने होंगे.”

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