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शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

दिमाग के रहस्य खोलने के लिए सबसे बड़ा दांव

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ह्यूमन ब्रेन प्रोजेक्ट
इंसानी दिमाग़ को समझने के लिए दस साल तक चलने वाली एक अरब पाउंड (करीब 99 अरब रुपये) लागत की परियोजना पर काम शुरू हो गया है.
दुनिया के 135 संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिक इस परियोजना में भाग ले रहे हैं जिसका नाम है दि ह्यूमन ब्रेन प्रोजेक्ट (एचबीपी). इनमें से ज़्यादातर वैज्ञानिक यूरोपीय हैं.

यह हर साल प्रकाशित हज़ारों न्यूरोसाइंस के शोधपत्रों से दिमाग पर शोध के आंकड़ों का डाटाबेस भी तैयार करेगा.इसका उद्देश्य एक ऐसी तकनीक विकसित करना है जिससे दिमाग की कंप्यूटर से नकल तैयार की जा सके.
ईपीएल, स्विट्ज़रलैंड में एचबीपी के निदेशक प्रोफ़ेसर हेनरी मार्कराम कहते हैं, "ह्यूमन ब्रेन प्रोजेक्ट पूरी तरह नई कंप्यूटर साइंस टेक्नोलॉजी बनाने की कोशिश है ताकि हम सालों से दिमाग के बारे में जुटाई जा रही सारी जानकारियों को एकत्र कर सकें."

नक्शा बनाना संभव नहीं

प्रोफ़ेसर मार्कराम कहते हैं, "हमें अब यह समझने लगना चाहिए कि इंसान का दिमाग इतना ख़ास क्यों होता है, ज्ञान और व्यवहार के पीछे का मूल ढांचा क्या है? दिमागी बीमारियों का निदान कैसे किया जाए और दिमागी गणना के आधार पर नई तकनीकों का विकास कैसे किया जाए."
इस परियोजना को यूरोपीय संघ भी आर्थिक सहायता दे रहा है. परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि वर्तमान कंप्यूटर तकनीक दिमाग की जटिल क्रियाओं की नकल करने में सक्षम नहीं है.
लेकिन एक दशक के अंदर ही सुपरकंप्यूटर्स इतने ताकतवर हो जाने चाहिए कि इंसानी दिमाग की पहली नकल का प्रारूप तैयार हो सके.
ह्यूमन ब्रेन प्रोजेक्ट
इंसानी दिमाग की एक थ्रीडी तस्वीर
दूसरी दिक्कत आंकड़ों की वह बड़ी मात्रा है जो इस प्रक्रिया से निकलेगी. इसका मतलब यह है कि गणना की मैमोरी को भारी मात्रा में बढ़ाना पड़ेगा.
एबीपी को ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट के न्यूरोसाइंस समकक्ष की तरह देखना चाहिए. ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट में भी हमारे पूरे जेनेटिक कोड को तैयार करने के लिए दुनिया भर के हज़ारों वैज्ञानिक शामिल थे. इसमें एक दशक से ज़्यादा का समय और सैकड़ों अरब रुपये खर्च हुए.
उस प्रोजेक्ट में हर कोशिका में पाए जाने वाली तीन अरब मूल जोड़ों का नक्शा बनाया गया था जिससे हमारा पूरा जेनेटिक कोड तैयार होता है.
लेकिन ह्यूमन ब्रेन प्रोजेक्ट पूरे इंसानी दिमाग़ का नक्शा नहीं बनाएगा. क्योंकि यह बहुत ज़्यादा जटिल है.
दिमाग में करीब 100 अरब न्यूरॉन या तंत्रिका कोशिका होती हैं और करीब 100 ट्रिलियन सूत्रयुग्मक (synaptic) संपर्क होते हैं.
इसके बजाय यह परियोजना कई तरह की कंप्यूटर नकल तैयार करने पर केंद्रित है.

न्यूरोमॉरफ़िक कंप्यूटर

मानचेस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एक ऐसा मॉडल बना रहे हैं जो दिमागी क्रिया के एक फ़ीसदी की नकल करेगा.
दि स्पिननेकर प्रोजेक्ट के मुखिया स्टीप फ़रबेर हैं जो कंप्यूटर उद्यग का एक जाना-माना नाम है. उन्होंने बीबीसी के माइक्रोकंप्यूटर के डिज़ाइन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
वह कहते हैं, "मैंने अपना समय पारंपरिक कंप्यूटर बनाने में लगाया है और मैंने उनके प्रदर्शन को असाधारण ढंग से बेहतर होते देखा है."
"लेकिन फिर भी उन्हें बहुत सी ऐसी चीज़ें करने में मुश्किल होती है जो इंसान स्वाभाविक रूप से कर लेते हैं. नवजात शिशु भी अपनी मां को पहचान लेते हैं लेकिन किसी ख़ास व्यक्ति को पहचानने वाला कंप्यूटर बनाना संभव तो है- पर बहुत मुश्किल भी है."
वैज्ञानिकों को लगता है कि इन रहस्यों को सुलझाने से सूचना तकनीक में बड़े फ़ायदे मिल सकते हैं. ऐसी मशीन के ईजाद से जिसे न्यूरोमॉरफ़िक कंप्यूटर कहा जाता है- ऐसी मशीन जो दिमाग की तरह सीखती है.
प्रोफ़ेसर मार्कराम कहते हैं, "इस जानकारी से हम ऐसी कंप्यूटर चिप्स बनाने में सक्षम हो सकते हैं जिनमें ऐसी ख़ास विशेषताएं हों जो इंसानी दिमाग की नकल कर सकें- जैसे कि भीड़ का विश्लेषण करने की क्षमता, बड़े और जटिल आंकड़ों के बीच फ़ैसला करने की क्षमता."
इन डिजिटल दिमागों से शोधकर्ताओं को स्वस्थ और बीमार दिमाग के कंप्यूटर मॉडलों की तुलना का भी मौका मिलेगा.

सही समय

ह्यूमन ब्रेन प्रोजेक्ट
परियोजना का एक मुख्य उद्देश्य दिमागी बीमारियों की एक बेहतर वैज्ञानिक समझ विकसित करना भी है.
इससे तंत्रिका संबंधी गड़बड़ी का एक एकीकृत नक्शा बनाकर यह देखा जा सकेगा कि उनका आपस में क्या संबंध है.
एचबीपी दल को यकीन है कि इससे दिमागी बीमारियों के ज़्यादा वस्तुनिष्ठ तरीके से निदान और इलाज में मदद मिलेगी.
एचबीपी की भआरी लागत की यह कहकर आलोचना की जा रही है कि इसकी भारी-भरकम लागत की वजह से दूसरे न्यूरोसाइंस शोध कार्यक्रमों के लिए पैसे की कमी हो जाएगी.
परियोजना की बड़ी महत्वाकांक्षा ने भी कुछ संदेह पैदा कर दिए हैं कि क्या सचमुच एक दशक में यह दिमाग को समझने की क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है.
लेकिन प्रोफ़ेसर स्टीप फ़रबर को यकीन है कि इसके लिए यह सही समय है.

वह कहते हैं, "कई तरह के अविश्वासों की पर्याप्त वजह है. लेकिन अगर हम लक्ष्य को पूरी तरह हासिल नहीं भी कर पाते हैं तो भी हम इतनी प्रगति तो कर ही लेंगे कि मेडिसिन, कंप्यूटिंग और समाज के लिए फ़ायदेमंद होगी."
sabhar : bbc.co.uk

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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

किसी भी भाषा को ट्रांसलेट कर देगा ये इंटेलिजेंट चश्मा

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टोक्यो. जापान ने एक ऎसा चश्मा तैयार किया है जिसको पहनकर आप किसी भी भाषा को आसानी से पढ सकते हैं, क्योँकि यह चश्मा किसी भी भाषा को ट्रांसलेट कर आपके सामने पेश कर सकता है और आप आसानी से इस चश्मे को पहनकर किसी भी भाषा को आसानी से पढ सकते हैं. आपकी जानकारी के लिये बता दें कि यह चश्मा पर्यटकों के लिए वरदान साबित हो सकता है. इस तकनीक से विदेश यात्रा करने वाले पर्यटकों, रेस्त्रां का मैन्यू और अन्य दस्तावेज को तुरंत पढने में सहायता मिलेगी. जापान की एक बडी मोबाइल ऑपरेटर कंपनी का कहना है कि उसने एक ऎसा चश्मा तैयार किया है जो अपरिचित शब्दों की एक सूची का अनुवाद कर सकता है. खबर के अनुसार कंपनी का कहना है कि उसका यह इंटेलीजेंट चश्मा किसी भी अपरिचित शब्दों की अनुवादित छवि पेश कर सकता है.
यह चश्मा देखने के काम आने के साथ-साथ आभासी चित्रों की भी हेरफेर करने में सहायक है. कंपनी के अनुसार इस तकनीक को जापान के एक कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक शो सीटैक-2013 में प्रदर्शित किया जाएगा. कंपनी का कहना है कि यह चश्मा, जिस पर अभी शोध जारी है, उपभोक्ता की अपनी भाषा में अनुवादित विषयवस्तु प्रस्तुत कर सकता है.
गूगल ने स्मार्ट ग्लासेज यानी स्मार्ट चश्मे को एक वीडियो के जरिए आम लोगों के बीच पेश किया है. इस चश्मे के जरिए जापानी, अंग्रेजी, चीनी और कोरियाई भाषाओं में अनुवाद किया जा सकता है. जबकि किसी भी भाषा में अनुवाद के लिए पांच सेकेंड का समय लगता है और इस तकनीक से सपाट सतह को टच स्क्रीन में भी बदला जा सकता है. कोई भी व्यक्ति इस चश्मे में एक रिंग का इस्तेमाल कर सामने नजर आने वाले चित्रों में हेरफेर भी कर सकता है.
जबकि इन चश्मों में सामने नजर आने वाले व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी प्रदर्शित करने के लिए चेहरों को पहचानने का एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भी किया गया है. जिसके लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हुए दूरदराज सर्वरों से डाटा लिया जाता है. आईडीसी कंज्यूमर टेक्नोलॉजी सलाहकार ने बताया की धारण की जाने वाली इन तकनीकों में काफी क्षमता है, लेकिन कई समस्याओं का भी सामना करना पडता है. उन्होंने कहा कि छोटी ऎप्लीकेशन वाले इसके साथ स्मार्ट चश्मे नहीं बेचेंगे.
स्मार्ट चश्मों के साथ तात्कालिक समस्या उनके आकार, वजन और बैटरी लाइफ की है. इसके अलावा उपभोक्ताओं की दुनिया में फैशन और सामाजिक स्वीकार्यता भी मुद्दे हैं. कुछ बडी तकनीकी कंपनियां हैं, जो इस तरह की तकनीक विकसित करने में लगी है. गूगल भी अपने गूगल ग्लास प्रोजेक्ट के तहत सिर पर पहने जाने वाला चश्मा तैयार कर रहा है. धारण की जाने वाली तकनीक इन चश्मों में सामने नजर आने वाले व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी प्रदर्शित करने के लिए चेहरों को पहचानने का एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भी किया गया है.sabhar : palpalindia.com

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भविष्य की दुनिया क्या कनेक्टेड होगी?

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लोग भविष्य कनेक्टेड, संचार, तकनीक

भविष्य की पीढ़ियां जिस दुनिया में रहेंगी वे हर लिहाज़ से ज़्यादा कनेक्टेड (जुड़ी हुई) होंगी. लेखक टेड विलियम्स पूछते हैं कि क्या ये एक जुड़ी हुई दुनिया यानी कनेक्टेड वर्ल्ड कैसे हमारे समाज और हमें बदल देगी.
"तर्कशील व्यक्ति दुनिया के हिसाब से खुद को ढाल लेता है जबकि अविवेकी व्यक्ति दुनिया को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करता है. इसलिए जितनी भी तरक्की है वह अविवेकी मनुष्य पर निर्भर है." जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

भले ही हम उन्हें तब महसूस नहीं कर पाते हैं जब वे घटित हो रहे होते हैं.तकनीक के हर बड़े क़दम ने मानव समाज को व्यापक रूप में बदला है. इसलिए ही हम जानते हैं कि वे बड़े तकनीकी बदलाव थे.

निजी विचार और समूह

जेबीएस हेल्डेन के ब्रह्मांड के बारे में दिए गए प्रसिद्ध वक्तव्य में कहा जाए तो, 'भविष्य आपकी कल्पना से अलग नहीं होगा बल्कि जितनी आप कल्पना कर सकते हैं उससे बहुत अलग होगा.'
हम सामाजिक प्राणी हैं लेकिन भिन्न होने के ख़तरे तब से कम हुए हैं जब से व्यक्तिवाद हमारे समाज और स्वयं हम में बड़ी ताक़त बनता चला गया है.
फ़्यूचर सिटी
भविष्य की दुनिया ज़्यादा कनेक्टेड होगी
नवीन तकनीक एक बड़ा कारण है. दो शक्तिशाली बल अब तेज़ी से समाज और व्यक्ति के बीच के समीकरण बदल रहे हैं.
व्यक्तिवाद का केंद्रीकरण और एक बंटे हुए समाज से अस्थिर और समस्तरीय समाज के प्रति निष्ठा का हस्तांतरण.
अपने शानदार उपन्यास 'केट्स क्रेडल' में कर्न वोनॉट ने एक ऐसे धर्म की खोज की जो मानवीय रिश्तों को 'कारासेज़' या फ़िर 'ग्रेनफॉलूंस' में परिभाषित करता है.
कारासेज़ का मतलब है लोगों के बीच में सच्चा संपर्क जो स्वतः स्थापित होता है और ग्रेनफॉलूंस ऐसे रिश्ते हैं जो अधिकतर असत्य होते हैं यानि जन्म, रंग, स्थान आदि के आधार पर बनते हैं.
बहुत से धर्म और राष्ट्र, जैसे कि सच्चे समस्तरीय सामाजिक समूह, साझा विचारों के रूप में शुरु हुए लेकिन जैसे-जैसे ये संस्थाएं बढ़ी और बदली लोगों के बीच की सहमतियाँ धूमिल होती चली गईं.
अमरीका में उदार ईसाई, कट्टर ईसाइयों के मुकाबले उदार नास्तिकों से ज़्यादा मिलते-जुलते हैं.
तो फ़िर अमरीकी ईसाई कौन हैं? लेकिन ब्लूग्रास का एक प्रशंसक हमेसा ब्लूग्रास का ही संगीत पसंद करेगा भले ही वो टैनेसी में रहता है या ट्यूनीसिया में.
जो विचार आधिकारिक सीमाओं में क़ैद नहीं होते वे ही अपने अनुयायियों की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं. जबकि राष्ट्र और धर्म बहुत ही कम लचीले होते हैं.
लेकिन यदि हम अपनी निष्ठाओं को अधिक व्यक्तिकत रुचियों जैसे कि पर्यावरण की राजनीति, बंदूकों पर मालिकाना हक़, पुराने फर्नीचर को ख़रीदना या फिर अंतरराष्ट्रीय मामलों पर नज़र रखना आदि की ओर करेंगे तो हम देशीय या अन्य सीमाओं में नया राजनीतिक गठबंधन बना लेंगे.

स्वास्थ्य क्रांति

लोग भविष्य कनेक्टेड, संचार, तकनीक
तकनीक की दुनिया में हो रहे तीव्र बदलाव हमें सिर्फ़ जानकारियाँ साझा करने से और भी बहुत कुछ ज़्यादा करने का मौका देते हैं.
ज़ल्द ही हम लोगों के विचार, सोच और उनकी आवाज़ को सुन पाएंगे. बिना बोले संवाद की तकनीक (वर्चुल टच) में होने वाले सुधारों की मदद में से हम चीजों की छु्अन का अहसास भी साझा कर पाएंगे.
अगर आपकी पर्वतारोहण में रुचि है तो इस तकनीक के ज़रिए माउंट एवरेस्ट पर चढ़ रहे किसी शेरपा के बूट में आप अपना पाँवों को महसूस कर पाएंगे और जान पाएंगे कि उसे कैसा लग रहा है.
आप स्काई डाइवर के साथ छलाँग लगा सकेंगे और अमेजन नदी के किनारे बसे लोगों से ऐसे बात कर पाएँगे जैसे आप वहीं हो.
यही नहीं किसी सड़क पर हो रहे विरोध प्रदर्शन में आप हज़ारों किलोमीटर दूर होते हुए भी शामिल हो पाएंगे.
लेकिन नज़रिए में बदलाव सिर्फ़ यहीं नहीं रुकेगा. तकनीक की दुनिया में हो रहे बदलाव हमारी स्वयं की भौतिकी में भी बदलावों के संकेत दे रहे हैं.
स्मार्टफ़ोन सिर्फ़ एक तकनीकी पड़ाव हैं, हालाँकि वे इस सदी में ताज़ा रहेंगे और दुनिया के कम विकसित इलाक़ों में उनके कई अप्रत्याशित इस्तेमाल भी होंगे, लेकिन विकसित देशों में इक्कीसवीं सदी के मध्य तक पहुँचते-पहुँचते हम अपने कंप्यूटर डिवाइस को अपने साथ रखने के कई व्यक्तिगत तरीकों की ओर जाने लगेंगे.
भले ही हम तब तक सीधे स्थापित होने वाले 'साइबरपंक' हासिल न कर पाएं, स्मार्ट गॉगल या शरीर में फिट होने वाले बेहद छोटे आकार के इनपुट-आउटपुट डिवाइस फोन का स्थान ले लेंगे.
लेकिन सिर्फ़ इतना ही नहीं, न सिर्फ़ आपका पूरा सहकर्मी समूह आपगे दिमाग़ में होगा बल्कि आपको अपनी सेहत के प्रति भी अतिचिंतित नहीं होना पड़ेगा.
हृद्यगति, अंगों की सक्रियता, ब्लड शुगर, यहाँ तक की दिमाग़ी हालत की भी जानकारी आपको पल-पल मिलती रहेगी.
हीट सिग्नेचर (शरीर या गति से निकलने वाली गर्मी) से हमें पता चल जाएगा कि क्या हम किसी तेज़ रफ़्तार से आती कार के रास्ते में तो नहीं है या आगे कोई लुटेरा हमारा इंतज़ार तो नहीं कर रहा है.

बदलेंगे विचार

लोग भविष्य कनेक्टेड, संचार, तकनीक
किराने की दुकान से ख़रीदारी करते वक़्त हम हर सामान को स्कैन कर उसके बारे में अतिरिक्त जानकारी और बाकी लोगों की राय तुरंत हासिल कर सकेंगे.
अगर आपको किसी ख़ास पदार्थ से एलर्जी है या फ़िर आपके भोजन की कुछ ख़ास ज़रूरतें हैं तो किसी भी पदार्थ को चखने से पहले ही आपको उसके बारे में समस्त जानकारी मिल सकेगी और आप तय कर सकेंगे कि आपको यह सामान ख़रीदना है या नहीं.
महत्वपूर्ण जानकारियों को किसी भी वक्त हासिल करने की इस क्षमता के रास्ते में क़ानून और राजनीति भी आएंगे.
यदि ऐसी सेवाएं उपलब्ध होंगी तो ज़्यादातर लोग इन्हें हासिल करना चाहेंगे, भले ही वे इनकी क़ीमत चुकाने में सक्षम हो या न हों.
ख़ासकर उन सेवाओं की माँग बढ़ेगी जो जीवन को बढ़ाने में मदद करेंगी.
इन जानकारियों को सभी लोगों को उपलब्ध करवाने का दवाब ऐसा ही होगा जैसा किसी अन्य स्वास्थ्य संबंधी सेवा पर होता है.
सिर्फ़ अमीर लोगों के पास ही हृद्यघात के वक़्त जान बचाने वाले शरीर में फिट गए मॉनिटर या फिब्रिलेटर क्यों हों?
जब आपके तमाम मित्र आपके दिमाग़ के भीतर या फिर हर समय आपसे जुड़े हुए हो और आप व्लादिवोस्क में बैठे किसी व्यक्ति से उस खेल के बारे में चर्चा कर रहे हो जिसे आप दोनों खेल रहे हैं, या फिर आप अपने जैसी सोच रखने वाले दमिश्क में बैठे किसी व्यक्ति से बात कर रहे हों तो निश्चित रूप से आपके इस बारे में विचार बदलेंगे कि 'हम' क्या हैं और 'वे' क्या हैं.
राजनीतिक एवं अन्य विभाजन खत्म नहीं होंगे, लेकिन वे हमें अलग लगने लगेंगें.

नए तरीके खोजने होंगे

क्या अधिक निजी स्वतंत्रता और निजी निवेश की इस दुनिया का कोई स्याह पहलू भी है?
जाहिर तौर पर हैं. जैसे-जैसे हम लगातार अपडेट होती जानकारियों से घिरे हुए स्वयं के निर्मित विश्व में अधिक समय बिताएँगे और अपने और अपने जैसी सोच रखने वाले लोगों के बारे में बेहद सूक्ष्म जानकारियाँ रखेंगे, हम एक अलग किस्म के मानव समाज में परिवर्तित होते जाएंगे.
कुछ लोगों का कहना है कि डरने के लिए सिर्फ अधिकाधिक अत्यधिक आत्म भागीदारी ही नहीं बल्कि अन्य कारण भी हैं.
सामाजिक आलोचकों को लगता है कि हम इंटरनेट युग से पहले भी एक जैसी सोच वाले लोगों के समूहों की ओर अग्रसर हो रहे थे.
साइबर जगत में ध्रवीकरण पर हुए ताज़ा शोध बताते हैं कि जन संपर्क के इस दौर में हालात और भी बदतर हुए हैं, यानि व्यक्तिगत की तुलना में एक जैसी सोच वाले समूहों में हम ज़्यादा कट्टर हो जाते हैं.
व्यक्तिगत होने के मुकाबले जब हम समूह में होते हैं तब अलग दृष्टिकोण के प्रति तिरस्कार की भावना भी रखते हैं.
आने वाली सदी में हमारी चुनौती इन अपनी सोच के दायरे में सीमित रहने से खुद को रोकने की भी होगी.

हमें सिर्फ़ अपने बारे में ही नहीं बल्कि दूसरे लोगों के बारे में भी सोचना होगा. वास्तव में, जब पुराने तरीके विलुप्त हो जाएंगे तब हम मनुष्यों को पड़ोसी होने के नए तरीके खोजने होंगे. sabhar : bbc.co.uk

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कपड़े जो राह दिखाएंगे और ना गुम होंगे

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मचीना ऐसी जैकेट बना रही हैं जिससे संगीत पैदा किया जा सके
चेन्नई में इंजीनियरिंग छात्राओं ने छेड़खानी करने वालों को क्लिक करेंकरंट मारने वाले अंतर्वस्त्रबनाए तो ज़्यादातर लोगों को पहली बार पता चला कि तकनीक का इस्तेमाल कपड़ों में कितने काम का हो सकता है.
लेकिन दुनिया भर में पहनने योग्य तकनीक को लेकर कई तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं.

कंपनी की सह संस्थापक लिंडा मचीना कहती हैं, “हम एक कार्यक्रम में गए और देखा कि एक व्यक्ति सिर्फ़ कंप्यूटर से संगीत बजा रहा था.”कैलिफ़ोर्निया की एक नई कंपनी मचीना मेक्सिकन कारीगरों का इस्तेमाल कर एक ऐसी जैकेट तैयार कर रही हैं जो संगीत पैदा कर सके.
व कहती हैं, “हमने सोचा कि ऐसी चीज़ बनाई जाए जिससे संगीतकार अपने शरीर का इस्तेमाल कर ही संगीत पैदा कर सके.“

जैकेट से संगीत

उनकी जैकेट में कपड़ों के नीचे चार लचीले सेंसर हैं. एक एक्सलेरोमीटर मीटर है जो आपकी बांह की हरकत को भांप लेता है. एक जॉयस्टिक है और चार दबाने वाले बटन हैं.
पहनने वाले की ज़रूरत के अनुसार सेंसर और बटन जैसे चाहे लगाए जा सकते हैं. यह एक इंटरफ़ेस सॉफ्टवेयर से कंप्यूटर या मोबाइल फ़ोन से जुड़े होते हैं.
मचीना कहती हैं, “यह शुरुआती स्तर पर है. हम एक किराए का स्टोर भी बना रहे हैं जो यूज़र्स को अपने निजी प्राथमिकताएं और अपने कार्यक्रम अपलोग करने की सुविधा देगा.
मचीना के अनुसार, “अगर आप इसे अपने आईपॉड को नियंत्रित करने, वीडियो मिक्स करने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं तो अतिरिक्त सेंसर जोड़िए या फिर ऐसी ‘हरकत’ को किराए पर ले लीजिए, जिससे आप यह कर पाएं.”
वह यह भी कहती हैं, “हमारे सारे कोड मुफ़्त में उपलब्ध होंगे.”
कंपनी इसमें कुछ और बदलाव करने की सोच रही है. जैकेट के इस साल के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है.

महसूस कीजिए आवाज़

सुनने से लाचार लोगों को मदद करेगी यह जैकेट
संगीत पैदा करने वाली जैकेट शायद ही सुनने से लाचार लोगों को आकर्षित कर पाए. लेकिन उनके लिए एक दूसरा अविष्कार भी है.
फ़्लटर नाम की ड्रेस को कोलोरेडो विश्वविद्यालय की पीएचडी छात्रा हैली प्रोफ़िटा ने ईजाद किया है.
वह बताती हैं, “इस ड्रेस में माइक्रोफ़ोन का एक जाल है जो आवाज़ों को सुनता है. ये सूक्ष्म नियंत्रण प्रणाली से जुड़े होते हैं जो यह तय करती हैं कि आवाज़ किस दिशा से आई थी.”
“एक बार यह तय कर लेती है कि आवाज़ किस दिशा से आई थी तो वह कंपन के माध्यम से सूचना दे देती है. अगर आपको पीछे देखना है तो ऐसा लगेगा कि कोई पीछे से आपके कंधे को थपथपा रहा है.”
इसका अहसास वैसा ही होता है जैसा मोबाइल फ़ोन के कंपन का.
वो कहती हैं, “इसके पहले हमने ऐसे उत्पाद बनाए जिन्हें लोग इसलिए पहनना नहीं चाहते क्योंकि वह ख़राब दिखते हैं और वह व्यक्ति की अक्षमता की ओर ध्यान खींचते हैं.”
प्रोफ़िटा पहने जाने योग्य तकनीक को लेकर बेहद उत्साहित हैं. वो कहते हैं कि यह न सिर्फ़ पहनने वाले का जीवन स्तर बेहतर बनाते हैं बल्कि इन्हें सुंदर भी बनाया जा सकता है.
फ़्लटर अभी शोध के स्तर पर ही है. प्रोफ़िटा को उम्मीद है कि जल्दी ही इसका इंसानों पर प्रयोग किया जा सकेगा.
भविष्य के डिज़ाइनों में इसमें सुनने के उपकरण भी शामिल किए जा सकते हैं.

जैकेट बताएगी अपना पता

एशर लेवाइन अपने महंगे कपड़ों में ब्लूटूथ लगा रहे हैं
और आखिर में चर्चा उस प्रयोग की जिसके ज़रिए कपड़ें ही आपको ढूंढने या संपर्क करने की क्षमता रखेंगे.
एशर लेवाइन न्यूयॉर्क फ़ैशन हाउस के मालिक हैं. वो लेडी गागा, बियोन्स, ब्लैक आइड पीज़ जैसे संगीत स्टारों के कपड़े डिज़ाइन करते हैं.
वो भी अपने काम में तकनीक का समावेश करना पसंद करते हैं. अपने 2012 फ़ॉल/विंटर कलेक्शन में उन्होंने मेकरबोट के साथ मिलकर थ्रीडी-प्रिंटिड ग्लासेस पेश किए थे.
ब्लूटूथ के इस्तेमाल के लिए इस साल, 2013, में उन्होंने एक नई कंपनी फ़ोन हालो से हाथ मिलाया है.
एशर कहते हैं, “मेरे कई दस्ताने खो चुके हैं. इसलिए मैं अपने बेहतरीन उत्पाद में इसे लगाने के पक्ष में हूं. क्योंकि कई बार हमारे उत्पाद इतने महंगे होते हैं कि कपड़ों पर बहुत सा पैसा खर्च करने वालों को भी यह महंगे लगते हैं.”
अगर आप चिप लगी वस्तु से दूर जाते हैं तो एशर का ‘ट्रैकआर ऐप’ अलार्म बजा देता है. अगर आप इसके बाद भी अपने पसंदीदा जैकेट को छोड़ जाते हैं तो यह आपको एक टेक्स्ट मैसेज, ईमेल या फ़ेसबुक मैसेज भेज देता है. इसमें सामान के जीपीएस कॉर्डिनेट्स होते हैं जिनके आधार पर आप गूगल मैप से अपना सामान ढूंढ सकते हैं. sabhar : bbc.co.uk

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पहनने वाली तकनीक से बदलेगी दुनिया?

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गूगल ग्लास से पहले की दुनिया की ऐसी नहीं थी, जैसी अब हो गई है.
इस ग्लास के इस्तेमाल से आप फोटो ले सकते हैं, मैसेज भेज सकते हैं. इससे दिशा का पता चल सकता है और दूसरी तमाम चीजें भी कर सकते हैं.

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ऐसे में वाकई में गूगल ग्लास अविश्वसनीय चीज है.
गूगल ग्लास उन पहनने वाली तकनीकों में शामिल है जिसके जरिए माना जा रहा है कि आम लोगों का जीवन बदल सकता है.
हालांकि इस मुद्दे पर अभी बहस जारी है कि कंप्यूटर और इंसानों के नजदीकी बढ़ने से किस तरह के सकारात्मक बदलाव होंगे, इन तकनीकों के बाज़ार और कारोबार के बारे में ज़्यादा चर्चा देखने को नहीं मिलती.

'तकनीक से हैप्पी बर्थडे'

"कल्पना कीजिए, एक शख्स बॉयलर को पकड़े हुए है, वह एक भारी उपकरण के नीचे है और उसे अपने हाथों के सहारे से उसे पकड़े रहना है, इसके बावजूद वह कंप्यूटिंग वातावरण में काम कर सकता है."
वेद सेन, प्रमुख, मोबिलिटी विभाग, कॉग्निजेंट टेक्नॉलॉजी सोल्यूशन
हालांकि अभी वियरेबल टेक्नॉलॉजी (ऐसी तकनीक जिसे पहनना संभव होगा) के शुरुआती दिन हैं लेकिन ढेरों ऐसी कंपनियां हैं जो इसके कारोबार पर ध्यान देने लगी हैं.
अमरीकी क्लाउड टेक्नॉलॉजी कंपनी रैकस्पेस में हुए अनुसंधान से ये पता चला है कि अभी उनके कर्मचारियों के पास इन उपकरणों से महज छह फीसदी का ही कारोबार मिल पाया है.
लेकिन कॉग्निजेंट टेक्नॉलॉजी सोल्यूशन के मोबिलिटी विभाग के मुखिया वेद सेन के मुताबिक स्थिति में बदलाव होने वाला है.
गूगल ग्लास के प्रयोगों के दायरे को देखते हुए वे कहते हैं, “कल्पना कीजिए, एक शख्स बॉयलर को पकड़े हुए है, वह एक भारी उपकरण के नीचे है और उसे अपने हाथों के सहारे से उसे पकड़े रहना है, इसके बावजूद वह कंप्यूटिंग वातावरण में काम कर सकता है.”

कनेक्टिविटी से बदल जाएगी दुनिया

वेद सेन आगे कहते हैं कि एक सेल्स पर्सन के उदाहरण को देखिए, जो अपने किसी उपभोक्ता के दफ्तर में पहुंचता है और वहां उसे सारी सूचनाएं अपनी आंखों के सामने चाहिए. मसलन, कंपनी से अंतिम ऑर्डर क्या दिया था?, क्या वे इससे ख़ुश थे? या फिर उपभोक्ता का अंतिम जन्मदिन कब था?
ऐसी स्मार्ट तकनीकों का प्रयोग केवल चश्मे के तौर पर नहीं होगा.
सेन कहते हैं, “मान लीजिए कि मैं एक बड़े सुविधा केंद्र का मैनेजर हूं. मैं टहल रहा हूं. मेरे जूते में कोई चीज है. मैं एक उपकरण को इस्तेमाल करता हूं जो बता देता है कि वो चीज इस्तेमाल के लायक है या नहीं, या फिर आवाज़ के जरिए मुझे सूचित कर देते हैं.”
दरअसल इन स्मार्ट तकनीकों के सहारे इंसानों के आसपास से संपर्क कहीं ज्यादा मज़बूत हो सकता है. वेद सेन कहते है, “इससे हमारे चीजों को समझने की क्षमता बेहतर होगी.”
डेलॉइट के रिसर्च निदेशक डंकन स्टीवार्ट ने कहा कि वियरेबल टेक्नॉलॉजी से कारोबार की दुनिया पर काफी असर पड़ेगा. ख़ासकर उन क्षेत्रों में जहां दूसरी चीजें का स्तर कमतर है.
वे कहते हैं, “स्मार्ट फोन और पर्सनल कंप्यूटर को बदलने पर असर नहीं होगा लेकिन जिन लोगों का संपर्क मोबाइल और लैपटॉप से नहीं है, उनके हाथों में इन तकनीकों के आने से काफी असर पड़ेगा.”
डंकन स्टीवार्ट कहते हैं, “कोई फोर्कलिफ्ट चला रहा हो तो वह पीसी और स्मार्टफोन का इस्तेमाल नहीं कर सकता, क्योंकि इससे टक्कर लगने का अंदेशा पैदा हो जाएगा. लेकिन कल्पना कीजिए वह फोर्कलिफ्ट को चलाते हुए ही कोई बॉक्स खोल ले और उससे अपने काम की चीज को बाहर निकाल ले.”

रिटेल कारोबार पर असर

उन्होंने तुलानात्मक तौर पर बताया है कि मोबाइल फोन के जरिए भुगतान से क्रांतिकारी बदलाव अफ़्रीका में देखने को मिल रहा है.
"स्मार्ट फोन और पर्सनल कंप्यूटर को बदलने पर असर नहीं होगा लेकिन जिन लोगों का संपर्क मोबाइल और लैपटॉप से नहीं है, उनके हाथों में इन तकनीकों के आने से काफी असर पड़ेगा."
डंकन स्टीवार्ट, रिसर्च निदेशक, डेलोइट
डंकन के मुताबिक लोगों के चेक और एटीएम तक पहुंच की सुविधा उपलब्ध नहीं लेकिन वे बड़े पैमाने पर ऑनलाइन भुगतान कर रहे हैं.
स्वास्थ्य सेवाओं में वियरेबल तकनीकों का इस्तेमाल शुरू हो गया है. नाइके का फ्यूलबैंड ऐसी तकनीक है जो लोगों के शारीरिक गतिविधियों को मापती है.
उन गोलियों की बात भी हो रही है जिसको निगलने से ना केवल वह दवा का काम करेगी बल्कि वह शरीर पर होने वाली प्रतिक्रियाओं की निगरानी भी करेगी. रिटेल एनवायरनमेंट एक दूसरा क्षेत्र है जिसमें लाभ होने की उम्मीद की जा रही है.
वियरबेल तकनीक ग्राहकों को वैसा मौका उपलब्ध कराएगी जिससे वो उत्पादों के बीच तुलना कर पाएंगे. ठीक उसी तरह से जिस तरह से ऑनलाइन विशेष ऑफ़रों की पड़ताल होती है, लेकिन उन्हें अपनी आंखों के सामने इन उत्पादों के बारे में जानने को मौका मिलेगा.
डिजिटल कॉमर्स फर्म के वेंदू के निदेशक जेम्स क्रोनिन ने कहा कि कनेक्टेविटी बढ़ने से कारोबारी फायदा बढ़ेगा.
क्रोनिन कहते हैं, “निजीकरण के इस दौर में इससे उपभोक्ताओं और व्यापारियों को काफी फायदा होगा, पिछले कुछ सालों में ऑनलाइन कारोबार का चलन बढ़ा है.”
काग्निजेंट के वेद सेन के मुताबिक उपभोक्ताओं के लिए ये काफी फायदे का सौदा होगा जब वे किसी स्टोर में टीवी खरीदने जाएंगे और उन्हें टीवी की कीमतें, वारंटी और दूसरी तुलनात्मक चीजों के बारे में जानकारी मिल रही हो.
हालांकि वियरेबल टेक्नॉलॉजी के उपभोक्ताओं को टारगेट करने वाली कंपनियों को थोड़ी सावधानी भी बरतनी होगी.

निजता का सवाल

टेक्नॉलॉजी कंसलटेंसी एमेज के टुंडे कॉकशॉट कहते हैं, “वियरेबल उत्पाद अपनी प्रकृति में काफी व्यक्तिगत होते हैं.”
वे चेतावनी भरे लहजे में कहते हैं, “वे मेरे बारे में सूचना और अनुभव एकत्रित करते हैं, जैसे शरीर, स्थान, वातावरण, गतिविधि, विजन और मेरी दिलचस्पी के बारे में. इस तरह की जानकारी और नितांत व्यक्तिगत अनुभव के दायरे को ब्रांड दखल नहीं दे सकती.”
वे कहते हैं, “उन्हें इस बात पर विचार करना होगा कि वे इस आंकड़े का इस्तेमाल किस तरह से करते हैं ताकि वे प्रासंगिक भी बना रहे और उपभोक्ताओं को सेवा भी दे पाए.”

हैकरों के निशाने पर

हालांकि नई तकनीक के चलते कई ऐसे मुद्दे हैं जिसके बारे में विचार करना होगा. हालांकि शुरुआती तौर पर ये महंगा भी होगा और इसमें मुश्किलें भी सामने आएंगी.
इसके अलावा दूसरी सामान्य मुश्किलें भी सामने आ सकती हैं- मसलन बैटरी का समाप्त हो जाना. इससे उन लोगों को काफी मुश्किल जो ऐसे उपकरणों पर निर्भर हो जाएंगे.
हालांकि इसमें प्राइवेसी और सुरक्षा का मसला जुड़ा है. अगर पहनने वाली तकनीकों के इस्तेमाल से ढेर सारी सूचनाएं प्राप्त हो सकेंगी तो फिर ये तकनीक हैकरों के निशाने पर होंगी.

हैकरों की कंपनी ट्रस्टवेव के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट निकोलस पेरकोको ने कहा, “अगर मैं एक हमलावर हूं तो मैं किसी के व्यक्तिगत जीवन और उसके बारे में तमाम जानकारी हासिल करना चाहूंगी और इसके लिए मैं वियरेबल तकनीकों में सेंध लगाऊंगा.” sabhar : bbc.co.uk

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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

आखिर अंदर से कैसा होता है मस्तिष्क?

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अमरीका में वैज्ञनिक पहली बार मनुष्य के दिमाग का पूरा नक्शा जारी करने वाले हैं.
इस नक़्शे से इस बात को समझने में मदद मिलेगी कि क्यों कुछ लोग स्वाभाविक रूप से अधिक वैज्ञानिक सोच वाले, संगीत के रसिक या कलाप्रेमी होते हैं.

वैज्ञानिक मैसेच्यूसेट्स के जनरल अस्पताल में मौजूद दुनिया की सबसे ताकतवर ब्रेन स्कैनिंग मशीन से दिमाग का नक्शा तैयार करने में लगे हैं.हाल ही में कुछ चित्रों को अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ़ साइंस की एक बैठक में जारी किया गया.

इस स्कैनर को चलाने के लिए 22 मेगावाट बिजली की दरकार होती है. इतनी बिजली के साथ एक परमाणु पनडुब्बी बड़े ही आराम से चलती हैं.
अभी तक वैज्ञानिकों ने केवल 50 मनुष्यों के गहन स्कैन किए हैं .

दिमाग का स्कैन

"हम दिल का स्कैन कर के अच्छी तरह से बता सकते हैं कि वहां क्या चल रहा है या क्या गलत घट रहा है. कितना अच्छा होगा अगर हम दिमाग की इस तरह की तस्वीरे निकालें और लोगों को सलाह दे पायें कि उन्हें उनकी समस्या के लिए क्या करना है"
प्रोफ़ेसर वैन वीडीन
वैज्ञानिक क्लिक करेंदिमाग की बारीक नसों में मौजूद तरल का पीछा करते करते दिमाग की नसों के नक़्शे तैयार करते हैं.
नतीजे में वैज्ञानिकों के हाथ लगती हैं किसी दिमाग के भीतर मौजूद रास्तों के थ्री-डी नक़्शे.
इस परियोजना से जुड़े मुख्य वैज्ञानिकों में से एक प्रोफ़ेसर वैन वीडीन दिमाग के स्कैन चित्रों को देख कर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मनुष्य का दिमाग कैसे काम करता है और तब क्या होता है जब कुछ गड़बड़ हो जाती है.
प्रोफ़ेसर वैन वीडीन कहते हैं, " हमारे सामने इतनी सारी मनोचिकित्सकीय समस्याएं हैं और इन्हें समझने के हमारे तौर तरीके सौ साल से वहीं के वहीं हैं."
प्रोफ़ेसर वीडीन के अनुसार, "हम दिल का स्कैन कर के अच्छी तरह से बता सकते हैं कि वहां क्या चल रहा है या क्या गलत घट रहा है. कितना अच्छा होगा अगर हम दिमाग की इस तरह की तस्वीरें निकालें और लोगों को सलाह दे पाएँ कि उन्हें उनकी समस्या के लिए क्या करना है."

ह्यूमन कनेक्टोम प्रोजेक्ट

अमरीकी नेतृत्व में चल रही इस परियोजना का नाम है " क्लिक करेंह्यूमन कनेक्टोम प्रोजेक्ट."
अपने पूर्ववर्ती ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट की तरह ही इस परियोजना के ज़रिए जुटाया गया तमाम डाटा सार्वजनिक कर दिया जाएगा ताकि दुनिया में कहीं भी वैज्ञानिक इसका परीक्षण कर सकें.
इस परियोजना में करीब चार करोड़ अमरीकी डॉलर या करीब 215 करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर खर्च आएगा. इस पूरी परियोजना में करीब 1200 अमरीकी लोगों के दिमागों का स्कैन किए जाने की योजना है.

"इस स्कैन परियोजना से यह भी साफ़ हो जाएगा की क्या वाकई अलग-अलग तरह के मनुष्यों के दिमाग भी अलग-अलग तरह के होते हैं"
डॉक्टर टीम बेन्हंस , ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय
वैज्ञानिक पहले चरण के 80 से 100 लोगों के दिमागों का स्कैन जल्द ही जारी करने वाले हैं. इस काम में करीब पांच साल का वक़्त लगेगा.

सोच का नक्शा

इस परियोजना पर काम कर रहे वैज्ञानिक स्कैन किए जाने वाले लोगों के अनुवांशिक और व्यवहार संबंधी डेटा को जमा करेंगे ताकि मनुष्य के अंतस का एक खाका तैयार किया जा सके.
मनुष्य के क्लिक करेंदिमाग की वायरिंग का डायग्राम किसी इलेक्ट्रौनिक यंत्र की वायरिंग से अलग होता है क्योंकि मनुष्य के हर अनुभव के साथ यह बदल जाती है . एक तरह से यह मनुष्य ने क्लिक करेंक्या और कैसे किया है इसका नक्शा भी होता है.
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के डॉक्टर टीम बेन्हंस का कहना है, "इस स्कैन परियोजना से यह भी साफ़ हो जाएगा की क्या वाकई अलग-अलग तरह के मनुष्यों के दिमाग भी अलग-अलग तरह के होते हैं."
डॉक्टर टीम बेन्हंस ने बीबीसी को बताया, "मनुष्य के दिमाग के हिस्सों के आपस में कनेक्शन अलग-अलग तरह के मनुष्यों में अलग-अलग होते हैं. इनको अगर हम समझ सकें तो हम जान लेंगे कि क्यों कुछ लोग अधिक मोल लेते हैं जबकि कुछ अन्य लोग संभल के चलते हैं."
इस परियोजना से जुड़े प्रोफ़ेसर स्टीव पीटरसन ने अपना पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित कर रखा है कि दिमाग के कौन से हिस्से मनुष्य को वैज्ञानिक सोच देते हैं और मनुष्य अपने दिमाग में जानकारी को कैसे संभाल कर रखता है.

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दक्षिण कोरिया ने बनाए पेट्रोल-उत्पादक जीवाणु

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दक्षिण कोरिया ने बनाए पेट्रोल-उत्पादक जीवाणु

दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने संसार में सबसे पहले ऐसे जीवाणु पा लिए हैं जो पेट्रोल बना सकते हैं|

देश के विज्ञान, सूचना-संचार प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक प्राक्कल्पना मंत्रालय ने यह बताया है|
कोरियाई अग्रणी विज्ञान और टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट में विकसित ये जीवाणु ग्लूकोज़ “खाते” हैं और बदले में देते हैं पेट्रोल| प्रयोगों के दौरान ऐसे जीवाणुओं वाले एक लीटर घोल से 580 मिलीग्राम ईंधन प्राप्त हुआ|
यह ईंधन आम पेट्रोल से थोड़ा भिन्न है तो भी इसका व्यापक उपयोग हो सकता है, सूचना में कहा गया है
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/news/2013_09_30/DKoriya-petrol-jivanu/

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शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

जीने के लिए सर्वभक्षी बनना होगा

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जीने के लिए सर्वभक्षी बनना होगा

संयुक्त राष्ट्र संघ का खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि मानवजाति को भुखमरी से बचने के लिए सर्वभक्षी बनना होगा| इस संगठन के विशेषज्ञों का कहना है कि कीट-पतंगे ही भविष्य में मनुष्य का प्रमुख आहार होंगे|

पिछले कई दशकों से संसार खाद्य-पदार्थों की कमी को लेकर चिंतित है| कृषि-उत्पादन में ऐसी “आनुवंशिक-संशोधित” किस्मों के, जिन पर किसी तरह के हानिकारक कीटों और रोगों का कोई प्रभाव नहीं पडता, उपयोग को लेकर बहुत वाद-विवाद होता रहा है| अब हवा के एक नया रुख चला है| एफ.ए.ओ. के विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोटीन का पृथ्वी पर एक प्रचुर स्रोत है जिसकी ओर लोगों ने ध्यान नहीं दिया है – ये हैं कीट-पतंगे| इनका पालन कृषि की एक प्रमुख शाखा बन सकता है| आज तो ऐसी बातें कपोल-कल्पना ही लगती हैं, किंतु ये जीवन का यथार्थ बन सकती हैं, रूसी आयुर्विज्ञान अकादमी के आहार संस्थान के डायरेक्टर विक्टर तुतेल्यान कहते हैं:
“हमें सदा आहार के नए स्रोतों की, नई टेक्नोलोजी की खोज करते रहना चाहिए| आहार की समस्या विकासशील देशों की ही नहीं, सारी मानवजाति की समस्या है| इस समस्या का एक संभव हल है – मनुष्य के आहार में कीट-पतंगों का उपयोग| उनसे भी वही प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट मिलते हैं| एक जैविक प्रजाति के नाते मनुष्य के लिए इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि उसे ये पौष्टिक पदार्थ कहाँ से मिलते हैं| अभी तीस साल पहले तक रूस में किसी ने सीप-मांस चखा तक नहीं था, जो फ्रांस में एक लज़ीज़ चीज़ मानी जाती है| और अब यह रूस में काफी लोकप्रिय है|”
विक्टर तुतेल्यान के मत में न केवल पूर्वी एशिया में बल्कि संसार के दूसरे भागों में भी कीट-पतंगों से बना भोजन प्रचलित हो सकता है|
“खाद्य-पदार्थ के, आहार के स्रोत के नाते कीट-पतंगे इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं? एक तो उनकी गिनती बड़ी तेज़ी से बढती है| दूसरे आधुनिक औद्योगिक विधियों से उन्हें बिना किसी स्वाद वाले “गूदे” में बदला जा सकता है और फिर उन्हें ऐसा रूप-रंग दिया जा सकता है जिससे खानेवाले को लगेगा कि वह सामान्य सामिष या मत्स्य भोजन खा रहा है|”
वैसे कुछ विशेषज्ञों का यह मानना है कि कुछ प्रकार के कीटों को बड़े पैमाने पर पालने का काम तो अभी से शुरू कर देना चाहिए| जीवविज्ञानी अलेक्सेई शिपीलोव का कहना है कि बड़े पैमाने पर मधुमक्खियों को पालना बहुत ज़रूरी है:
“एक सिद्धांत यह भी है कि जिस दिन धरती पर मधुमक्खियां नहीं रहेंगी, समझ लेना उसके तीन-चार साल बाद मानव का भी अस्तित्व नहीं रहेगा| क्योंकि पृथ्वी पर कुछ भी पैदा नहीं होगा| आजकल सारी दुनिया में मधुमक्खियों की गिनती तेज़ी से घट रही है| इसका एक कारण मोबाइल फोनों का प्रचलन बढ़ना बताया जा रहा है| बात यह है कि मधुमक्खियां पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुवों की मदद से अपने छत्तों तक लौटने का रास्ता ढूँढती हैं| मोबाईल फोनों से चुम्बकीय विकिरण होता है जिसके कारण वे अपने घर का रास्ता नहीं खोज पाती हैं और मारी जाती हैं\”
 अनेक कीटों में प्रोटीन और लाभदायक वसाओं की मात्रा काफी अधिक होती है साथ ही विभिन्न खनिज पदार्थों, जैसे कि कैल्शियम, लौह, जिंक आदि की भी| एफ.ए.ओ. के विशेषज्ञों का कहना है कि मांस में जहां सौ ग्राम सूखे वज़न के पीछे लौह की मात्रा 6 मिलीग्राम होती है, वहीं टिड्डी में 8 से 20 मिलीग्राम तक| ऐसा अनुपात उस सामिष आहार के पक्ष में नहीं है जिसका मनुष्य आदी है| कौन जाने पारंपरिक पालतू जानवरों के सामिष भोजन का स्थान कीट-पतंगों से बना सामिष भोजन ले ले| sabhar :http://hindi.ruvr.ru
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2013_05_19/jiinaa-sarvabhakshi-banna/

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