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शनिवार, 6 मार्च 2021

Depression Natural Treatment

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https://ir3.xyz/6043bd36c56ae Man is the social animal who has come with his own development. He has come to this phase with his own thoughts and ideas. He not only got the compensations with his progress but also got some of the negative aspects like he was exposed to many diseases that came in the way of his progression. One among them is this depression. This is a curable disease and can get treated as early as possible at its early stage. It has a natural and herbal remedy. This depression is one of the diseases having an anxiety disorder that attacks especially the adult population. No matter what the age is or where we are from. The depression is a mental disorder that prevails in the person and may attack at any moment. Here in this condition he undergoes a mental disorder that affects his mood. In this situation he has abnormal feelings or normal feelings, which fall in the category of calm and deep which in turn makes him to get or fell into the attack of this disease. If a person gets deeply attacked with this disease then he is away from performing his daily activities or he is away from his normal life and this can be considered as the symptoms of the depressive order. This in turn leads to personality disorder and lacks in self-improvement. When the man gets this at the initial stage then it just sadness and gloom. But this must not go deeper as he will become abnormal from his daily activities. So, he should get treated at its initial stage. He may get upset for the small things but these should not contribute as a major part for his depression disease. Now there is a good news for this disease that it can be cured with the proper treatment given by the physician whom you consult for the treatment. The cause for this depression is not found exactly. In the previous days the main cause was that the man was disturbed with his thoughts and emotions. But the for this there are many factors and it may depend on any of these factors like biological, environmental and the genetic also. It can also occur when a person is affected with the chronic diseases that take some period to get cured. There is chance of getting affected with this disease when the medication does not cure the affected disease. One can say that he is affected with this disease when he has these signs like tension, sadness, lack of interest in new things or habits or daily activities, feels tired unnecessarily, inactive in what he does, unable to concentrate, feels guilty about himself, attempts or thinks about suicide. A person can come out of this depression with the regular intake of the medications which are prescribed by the physician that may be natural or herbal. The patient may also undergo counseling if needed. It is better to turn your attention towards the natural or herbal treatments as they don’t have any side effects to you. The disease can be cured by the remedies are natural so that they don’t harm you and cures you as soon as possible. The primary thing what you can do is you can consult the doctor as early as possible. The check ups that are needed should be regularly as it should be narrowed at its first stage. Keeping oneself with enthusiasm and being away with the tiredness. To have confidence in doing the works which are daily activities or others. This depression can be helped when we encourage the people active in their work, thinkings. He should have a loved atmosphere that can cure the disease.

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गुरुवार, 4 मार्च 2021

chetna ka vigyan

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----------------:यात्रा प्रेतलोक की:----------------
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

--------:एक चेतना दूसरी चेतना को किसी भी भौतिक माध्यम के बिना संकल्प मात्र से  प्रभावित कर सकती है:-------
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    हमारा युग विज्ञान का युग है। आज मनुष्य समूची सृष्टि और ब्रह्माण्ड की खोज में लगा हुआ है तथा उसने प्रकृति के मूलतत्व और उनकी शक्तियों की खोज की है।
      विज्ञान के पीछे पागल यह मनुष्य अपने आप में स्वयं एक आश्चर्य है। उसका सामाजिक व्यवहार, उसकी शारीरिक क्रियाएँ और इन सबसे बढ़कर उसका दिमाग इस सृष्टि की सबसे बढ़कर अधिक अजीबो-गरीब चीज़ है। संसार के सभी धर्मों ने इसकी रचना और कार्य-प्रणाली पर विस्तार से रौशनी डाली है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी खोजने की कोशिश की है कि मनुष्य के मस्तिष्क के पीछे संचालिका शक्ति कौन-सी है ? उन्होंने उसे एक नाम दिया है--'चेतना' तथा यह भी कहा है कि मनुष्य की चेतना उसके मस्तिष्क में बन्द एकाकी चेतना नहीं है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई विराट चेतना का एक अंग है और हर अवस्था में उससे सम्बन्ध बनाये रखती है। यही कारण है कि मनुष्यों के आलावा अन्य प्राणियों में तथा सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत में व्याप्त  चेतनाएं एक दूसरे के साथ जुडी रहती हैं, एक दूसरे पर प्रभाव डालती रहती हैं और प्रभावित भी होती रहती हैं।
      रूस के लेनिनग्राद विश्वविद्यालय के #प्रोफ़ेसर #लियोनिद ने एक अनूठा प्रयोग किया। उन्होंने मीलों दूर एक प्रयोगशाला में कुछ अनुसन्धान कर्ताओं को परामानसिक संचार द्वारा सम्मोहित कर दिया और उनसे उनका प्रयोग छुड़वा कर उन्हें किसी अन्य कार्य में लगा दिया। वे सब अनजाने में ही विवश से लियोनिद के आदेशों का पालन करने लगे। उन्हें यह भान तक नहीं हुआ वे किसी अन्य व्यक्ति की शक्ति के आधीन हो गए हैं। इस वैज्ञानिक प्रयोग से यह बात सिद्ध होती है कि *एक चेतना दूसरी चेतना को किसी भी भौतिक माध्यम के बिना संकल्प मात्र से प्रभावित कर सकती है।*
      मनुष्य की इसी चेतना को आत्मा, रूह, सोल अथवा परामानसिक चेतना कहा गया है। ब्रह्माण्ड की विराट चेतना को परम चेतना, परमात्मा, गॉड या अल्लाह कहा गया है। तान्त्रिक लोग परामानसिक चेतना को 'पराशक्ति' और विराट चेतना या परम चेतना को 'परम शिव' की संज्ञा देते हैं।
      ईश्वर को भले ही वैज्ञानिक स्वीकार न करें, लेकिन ब्रह्माण्ड और उसमें फैली हुई ब्रह्माण्डीय ऊर्जा (ईथर) की धारणा वैज्ञानिकों ने अवश्य स्वीकार कर ली है। उनके सामने इस ब्रह्माण्ड की अनेक गुत्थियों में से एक गुत्थी यह भी है कि मनुष्य की चेतना का मूल स्वरूप क्या है ? उसका ब्रह्माण्डीय चेतना से क्या सम्बन्ध है ? एक और भी बड़ा प्रश्न है कि क्या व्यक्त चेतना से परे मनुष्य किसी अव्यक्त चेतना का स्वामी है जो इस पदार्थ जगत के नियमों से ऊपर है तथा जो मनुष्य को प्राकृतिक शक्तियों से परे कहीं अधिक सूक्ष्म, पराभौतिक शक्तियां प्रदान करती हैं जिनके द्वारा वह इस ब्रह्माण्ड में किसी भी स्थान, काल के रहस्यों को अपनी जगह बैठा-बैठा ही जान सकता है तथा उसका वर्णन भी कर सकता है ?
      वैज्ञानिकों ने अनुसन्धान के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लिया है कि धर्म जिसे पराचेतना कहता है, यह सत्य है तथा मनुष्य का जाग्रत मन इस विराट मन का एक छोटा-सा भाग है जिसका एक बड़ा अंश एक रहस्यमय आवरण के पीछे छिपा रहता है और वह उस आवरण के पीछे से हमारे चेतन मन को कठपुतली की तरह नचाता रहता है। वैज्ञानिकों ने उस उपचेतन मन को 'परामन' अथवा 'पैरासाइकिक तत्व' कहा है।

      मानव शरीर की श्रेष्ठता का कारण  **********************************

      मनुष्य की जीवित अवस्था में जीवन का तीन भाग जाग्रत मन से प्रभावित रहता है और चौथा भाग 'उपचेतन या परामन' के आधीन रहता है। मरने के बाद जाग्रत मन का अस्तित्व तो समाप्त हो जाता है लेकिन उसका मौलिक तत्व जिसमें वासना, संस्कार और तमाम भौतिक वृत्तियाँ रहती हैं, उस उपचेतन मन में चला जाता है। यही कारण है कि मरने के बाद उपचेतन मन की शक्ति और अधिक बढ़ जाती है। इतना ही नहीं, विराट मन या पराचेतना से भी उसका संपर्क अधिक घनिष्ठ हो जाता है। परामनोविज्ञान का यह अत्यन्त गम्भीर विषय है जिस पर प्रेत-विद्या के सारे सिद्धान्त निर्भर हैं।
      प्रत्येक जीवित मनुष्य का मरने के बाद कुछ समय के लिए प्रेत होना निश्चित है। जिसे जीवात्मा कहा जाता है उसके तीन योगरूप हैं--
      1--मनुष्यात्मा--जब जीवात्मा मनुष्य शरीर अर्थात् पार्थिव शरीर में रहती है, तो उसे 'मनुष्यात्मा' कहते हैं।
      2--प्रेतात्मा--मरने के तुरंत बाद जब जीवात्मा वासनामय शरीर में रहती है, तो उसे 'प्रेतात्मा' कहते हैं।
     3--सूक्ष्मात्मा--जब जीवात्मा की वासना का वेग समाप्त हो जाता है और वह सूक्ष्म परमाणुओं से निर्मित सूक्ष्म शरीर में चली जाती है तो वह 'सूक्ष्मात्मा' कहलाती है। सूक्ष्मात्मा की स्थिति उपलब्ध होने का तात्पर्य है कि अब वह जीवात्मा पुनर्जन्म ग्रहण करने की अधिकारिणी हो गयी है। सूक्ष्मात्मा के भी तिरोहित हो जाने का अर्थ है कि जीवात्मा को भव-चक्र से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति प्राप्त हो गयी। इसी सूक्ष्म शरीर से मुक्ति पाने के लिए ही सारी साधनाएं, उपासनाएँ,  तप आदि उपक्रम हैं।
      वासना शरीरधारी प्रेतात्माओं का जो जगत है, उसे ही हम 'वासना-जगत' या 'प्रेत-लोक' कहते हैं। कुछ लोगों का भ्रम है कि 'प्रेत-लोक' सुदूर कहीं अंतरिक्ष में विद्यमान है। मगर नहीं, काफी छान-बीन और अन्वेषण के बाद जो तथ्य सामने आये हैं, उनके अनुसार प्रेत-लोक अंतरिक्ष में नहीं, बल्कि हमारी इसी धरती पर दूध में पानी की तरह मिला हुआ है। आधुनिक उपकरणों द्वारा पता करने पर उनका अस्तित्व और उनकी 'लो फ्रीक्वेंसी' की आवाज़ को रिकॉर्ड किया जा सकता है जो 'भूत-प्रेत' के अस्तित्व का वैज्ञानिक प्रमाण है।
      वासना दो प्रकार की होती है--अच्छी भी और बुरी भी। इसी दृष्टि से प्रेत-लोक को भी हम दो भागों में विभाजित कर सकते हैं। अच्छी वासनाओं के भाग को 'पितृ-लोक' और बुरी वासनाओं के भाग को 'प्रेत-लोक' कहा गया है। पितृ-लोक के ऊपर सुक्ष्म शरीरधारी आत्माओं का 'सूक्ष्मलोक' है। उसके बाद 'मनोमय लोक' है। इसे ही 'देव-लोक' कहा गया है। यह मनोमय लोक नक्षत्र मण्डलों की सीमा और गुरुत्वाकर्षण की परिधि के बाहर सुदूर अंतरिक्ष में है। उसमें निवास करने वाली आत्माओं में मनः-शक्ति और विचार-शक्ति अति प्रबल होती है। इसी प्रकार सूक्ष्मात्माओं में इच्छा-शक्ति और प्राण-शक्ति अति प्रबल होती है। लेकिन जहां तक प्रेतात्माओं का सम्बन्ध है, उनमें सिर्फ वासना की प्रबलता रहती है। वासना की शक्ति ही उनकी स्व-शक्ति है।
      परामानसिक जगत के विद्वानों का कहना है कि देवात्माओं, सूक्ष्मात्माओं, प्रेतात्माओं में क्रमशः मनः-शक्ति, विचार-शक्ति और इच्छा-शक्ति या प्राण-शक्ति विद्यमान हैं, वे सारी शक्तियां एक साथ मनुष्य शरीर में विद्यमान हैं। इसीलिए मानव को और मानव शरीर को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
      मस्तिष्क के तीन भाग हैं। वे तीनों भाग मनः-शक्ति, विचार-शक्ति, इच्छा-शक्ति या प्राण-शक्ति के केंद्र हैं। प्राण-शक्ति का केंद्र है--नाभि। उन शक्तिओं का सम्बन्ध प्राण-शक्ति से जहाँ स्थापित होता है, वह है--हृदय।
       मानव शरीर में मनः-शरीर, सूक्ष्म शरीर और वासना शरीर का बीज रूप में अस्तित्व है--इस तथ्य को आज वैज्ञानिको ने भी स्वीकार कर लिया है। भौतिक शरीर की रचना पञ्च भौतिक तत्वों के परमाणुओं के संगठन से होती है। इसीलिए सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर के सर्वाधिक निकट है। योगी लोग मनोमय शरीर और वासना शरीर से अधिक महत्व इसीलिए सुक्ष्मशरीर को देते हैं कि वे भौतिक शरीर की तरह इसका उपयोग अपनी इच्छानुसार कर सकते हैं। sabhar shivram Tiwari Facebook wall

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indolead

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बुधवार, 3 मार्च 2021

A Pocket Pc Is Portability At It S Best

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A Pocket PC is a handheld computer, which features many of the same capabilities as a modern PC. These handy little devices allow individuals to retrieve and store e-mail messages, create a contact file, coordinate appointments, surf the internet, exchange text messages and more. Every product that is labeled as a Pocket PC must be accompanied with specific software to operate the unit and must feature a touchscreen and touchpad. Pocket PC products are created by some of the world’s top computer manufacturers, including HP, Toshiba and Gateway. As is the case with any new technology product, the cost of a Pocket PC was substantial during it’s early release. For approximately $700.00, consumers could purchase one of top-of-the-line Pocket PCs in 2003. These days, customers are finding that prices have become much more reasonable now that the newness is wearing off. For approximately $350.00, a new Pocket PC can now be purchased. Even years after their release, Pocket PCs are a staple in the world of travelers, college students and business leaders. The need to stay in constant communication with family and/or colleagues has kept the portability factor one that remains popular today. When traveling for business or other reason, individuals often need a way to stay in touch. A desktop computer is simply not a feasible accompaniment and notebooks are at a constant risk for being stolen or damaged. A Pocket PC can obviously fit inside of a pocket, but may also find a safe haven in a purse, duffle bag, tote or other small compartment. Purchasing a Pocket PC can be a difficult choice because of the various models and manufacturers available. When considering the options, consumers must look at any available warranty, included software and capabilities. Much like in the world of traditional desktop and notebook computers, manufacturers are always looking for a way to outdo the competition and the customer often finds that such actions may lead to a real bargain. Like any other computer, a Pocket PC must be cared for in such a way that it is not exposed to extreme heat or cold for prolonged periods of time, is not shuffled around carelessly and is carefully packed for safety during travel. Owning a Pocket PC means having access to an address book, your e-mail account, the world wide web and your appointment calendar all in the comfort of your own pocket. Carrying the internet in your pocket? Now that is portability at it’s best.
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srtring theory aur mantra vigyan

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स्टेम सेल से होगा बुड़ापे का इलाज

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 वैज्ञानिको ने  उम्रदराज लोगो की कोसिकाओ को स्टेम सेल में बदलने में भी सफलता प्राप्त की है | मोंटेपेलियोर युनिवेर्सिटी  के वैज्ञानिकों ने कहा है की , वह जल्दी ही  इन  कोसिकायो से  उम्रदराज मरीजो का इलाज इस विधि से कर सकते है | प्रमुख शोधकर्ता  ज्यां -मार्क लेमाएत्रे ने बताया , यह कोशिकाओं के कायाकल्प के छेत्र में एक नयी मिशाल है | कोसिकाओ के पुनर्गठन के रास्ते  में उनकी उम्र कोई रुकावट नहीं पैदा  करती है | स्टेम सेल से शरीर के किसी भी भाग के उतकों में तब्दील किया जा  सकता है |
 साभार : हिंदुस्तान हिंदी दैनिक 

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स्किन फैक्टरी में बनेगी नकली त्वचा

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चार साल से छोटे लड़कों के जननांग से निकाली गई त्वचा से बिलकुल नई स्किन बन सकती है. जर्मनी की फ्राउनहोफर यूनिवर्सिटी ने रिसर्च पूरी कर ली है. इससे नई दवाइयों और कॉस्मेटिक उद्योग में बड़े बदलाव आ सकते हैं.




स्किन फैक्टरी, यह नाम किसी साइंस फिक्शन फिल्म का लगता है. लेकिन फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने सचमुच ऐसी मशीन बनाई है, जो त्वचा बनाती है. यह त्वचा दवाओं, रसायनों और कॉस्मेटिक के परीक्षण को आसान और सस्ता बना सकती है. साथ ही जानवरों पर इनके परीक्षण की जरूरत नहीं रह जाएगी.
त्वचा बनाने की यह मशीन सात मीटर लंबी, तीन मीटर चौड़ी और तीन मीटर ऊंची है. कांच की दीवार के पीछे रोबोट की छोटी बाहें काम कर रही हैं, पेट्री डिश को इधर उधर ले जा रहे हैं, खाल को खरोंच रहे हैं, एंजायम की मदद से ऊपरी त्वचा को सेल से अलग कर रहे हैं. संयोजी ऊतक और रंग वाली कोशिकाएं भी इस तरह पैदा की जाती हैं.
अहम रिसर्च
इस समय कोशिकाओं की आपूर्ति का काम चार साल तक के लड़कों के जननांग से निकाले गए अग्रभाग से किया जा रहा है. जर्मनी में श्टुटगार्ट शहर के फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के प्रोडक्शन इंजीनियर आंद्रेयास टाउबे कहते हैं, "आदमी की उम्र जितनी बढ़ती जाती है, उसकी कोशिकाएं उतनी ही खराब काम करती हैं." कोशिकाएं विकसित करने के लिए स्टेमसेल पर भी शोध किया जा रहा है. टाउबे का कहना है, "महत्वपूर्ण बात यह है कि शुरुआती सेल एक जैसे स्रोत से आएं ताकि त्वचा के उत्पादन में अंतर से बचा जा सके."
डोनरों के हिसाब से हर नमूने से तीस लाख से एक करोड़ कोशिकाएं निकलती हैं जिनकी संख्या इंक्यूबेटर में सौ गुनी हो जाती है. एक सेंटीमीटर व्यास के 24 ट्यूबों वाले टिश्यू कल्चर प्लेट पर उनसे नई त्वचा का विकास होता है. नया एपीडर्मिस एक मिलीमीटर से भी पतला होता है. जब उन्हें शोधकर्ता जोड़ने वाली कोशिकाओं से जोड़ते हैं तो पूर्ण त्वचा बनती है जो पांच मिलीमीटर तक मोटी होती है. इस पूरी प्रक्रिया में छह हफ्ते तक लग सकते हैं. टाउबे कहते हैं, "इसे मशीन की मदद से भी तेज नहीं किया जा सकता, बल्कि जीव विज्ञान द्वारा निर्धारित होता है."
मुश्किल है रिसर्च
संयंत्र के अंदर सब कुछ पूरी तरह असंक्रमित होता है. इंक्यूबेटर के अंदर तापमान 37 डिग्री होता है. एक तापमान जिसमें बैक्टीरिया भी तेजी से बढ़ सकते हैं. त्वचा फैक्टरी में 24 टिश्यू कल्चर वाले 500 से अधिकों प्लेटों पर एक साथ काम होता है. फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट में इस तरह शोधकर्ता हर महीने त्वचा के 5000 नमूने तैयार करते हैं. लेकिन अब तक उन्हें कोई खरीदार नहीं मिला है क्योंकि अभी तक इस प्रक्रिया को यूरोपीय अधिकारियों से मान्यता नहीं मिली है. इसके लिए तुलनात्मक परीक्षणों की जरूरत होगी जो यह साबित कर सकें कि कृत्रिम त्वचा भी जानवरों की त्वचा जैसे नतीजे देते हैं. टाउबे कहते हैं, "मैं सोचता हूं कि नौ महीनों में हम शुरुआत कर सकते हैं." कृत्रिम त्वचा को खरीदने वाला उद्योग जगत होगा.
दवा उद्योग में बदलाव
जर्मनी में दवाइयां बनाने वाली कंपनियों के संघ के रॉल्फ होएम्के का कहना है कि नए तत्वों के विकास के लिए त्वचा के नमूनों का इस्तेमाल हो सकता है. वे कहते हैं, "हमारा विश्वास है कि कृत्रिम त्वचा की कोशिकाएं असली त्वचा जैसी हैं." अब तक त्वचा के नमूने छोटे पैमाने पर तैयार किए जाते थे, लेकिन होएम्के को उम्मीद है कि अब ऐसा बड़े पैमाने पर हो सकेगा. इसका इस्तेमाल कैंसर के शोध के अलावा पिगमेंट में गड़बड़ी, एलर्जी या फंगस की बीमारी के सिलसिले में किया जा सकेगा. श्टुटगार्ट में बनने वाली कृत्रिम त्वचा के नमूनों को सुरक्षा टेस्ट पास करने में सालों लग जाएंगे.इस तरह का परीक्षण दवाओं की मंजूरी के लिए भी जरूरी होता है. होएम्के कहते हैं, "इसमें अंतरराष्ट्रीय मानक बना हुआ है, उसकी प्रक्रिया को आप यूं ही बदल नहीं सकते."
चिकित्सा के क्षेत्र में भी कृत्रिम त्वचा की मांग है. 8 से 10 सेंटीमीटर चौड़े त्वचा के बैंडेज बाजार में उपलब्ध हैं और उन पर दो कंपनियों का कब्जा है. रिजेनरेटिव मेडिसीन सोसायटी की अध्यक्ष उलरिके श्वेमर कहती हैं कि और चौड़े बैंडेज के क्षेत्र में मांग बनी हुई है. टाउबे इसे भविष्य का सपना बता रहे हैं कि त्वचा फैक्टरी कभी न कभी इन्हें बनाना शुरू कर देंगी जिनका इस्तेमाल आग से जलने के कारण हुई घावों को भरने के लिए किया जा सकेगा. अभी तो आंख की त्वचा कोर्निया को बनाने पर काम चल रहा है.
रिपोर्ट: डीपीए/महेश झा
संपादन: ए जमाल  sabhar : DE-WORLD.DE

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अदृश्यता पैदा करने के करीब पहुंचे अमेरिकी वैज्ञानिक

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अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के वैज्ञानिक अदृश्य तकनीक की मदद लेते हुए एक जबरदस्त संचार सिस्टम बनाने में जुटे हैं. इसके 'टाइम क्लोक' यानी समय का आवरण कहा जा रहा है. सब कुछ आंखों के 

सामने होगा लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगेगी.




बनाई गई मशीन प्रकाश के बहाव को ऐसे परिवर्तित कर रही है कि इंसानी आंखें इस परिवर्तन को पकड़ ही नहीं पा रही है. विज्ञान मामलों की पत्रिका नेचर में इस बारे में एक रिपोर्ट छपी है. रिपोर्ट के मुताबिक प्रकाश की कुछ खास रंग की किरणों में बदलाव करने पर इंसान की आंख को बेवकूफ बनाया जा सकता है. वैज्ञानिकों को लगता है कि इस तकनीक की मदद से इंसान के सामने बिना किसी नजर में आए काफी कुछ किया जा सकेगा.
न्यूयॉर्क की कोरनेल यूनिवर्सिटी की मोटी फ्रीडमन कहती हैं, "हमारे नतीजे दिखाते हैं कि हम अदृश्यता पैदा करने वाला उपकरण बनाने के काफी करीब पहुंच रहे हैं." प्रयोग के तहत अलग अलग आवृत्ति वाली प्रकाश की किरणों को भिन्न भिन्न रफ्तार से आगे बढ़ाया जाता है. प्रयोग के लिए कई लैंसों का इस्तेमाल किया गया. सबसे पहले हरे रंग के प्रकाश को फाइबर ऑप्टिक केबल से गुजारा गया.
फिर प्रकाश अलग अलग लेंसों से टकराया. लेंसों से टकराते ही प्रकाश किरणें दो रंगों में बदल गई. प्रकाश नीले और हरे रंग में टूर गई. नीले रंग की किरण लाल रंग से ज्यादा तेज रफ्तार से आगे बढ़ी. प्रकाश की दो किरणें बनने के दौरान अदृश्यता की स्थिति पैदा हो गई. प्रयोग के अगले चरण में टूटे हुई किरणों को फिर से एक कर दिया गया और फिर से सामान्य प्रकाश बन गया और अदृश्यता गायब हो गई.
यह सब कुछ 50 पीकोसेकेंड के भीतर हुआ. यह एक सेकेंड के 10 लाखवें हिस्से का भी पांच करोड़वां हिस्सा है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस तकनीक का इस्तेमाल संचार में किया जा सकता है.  इस तकनीक के जरिए होने वाला संचार ऑप्टिकल सिग्नल तोड़ता है. किरणें टूटती हैं और अदृश्य हो जाती हैं. बाद में किरणों को फिर से एक किया जा सकता है और सब कुछ देखा जा सकता है. यानी डाटा को अदृश्य बनाकर भेजा जा सकता है और फिर एकत्रित किया जा सकता है.
रिपोर्ट: एएफपी/ओ सिंह
संपादन: एम गोपालकृष्णन
 
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दिमाग से कमांड लेने वाला कम्पुटर

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इनोवर टेक्नोलॉजी ट्रेड फेयर के दौरान प्रदर्शित  किये गए मेंटल टाईप राईटर के लिये कीबोर्ड मावुस की अवसकता नहीं है तकनीकी  भाषा में बर्लिन ब्रेन कम्पूटर इंटरफेस नामित यह कम्पूटर सीदे दिमाग से कमांड लेता है

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विज्ञान आत्‍मा शरीर

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विज्ञान की नजर में आत्मा,


इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में होता है जिसे माइक्रोटयूबुल्स कहते हैं। दोनों वैज्ञानिकों का तर्क है कि इन माइक्रोटयूबुल्स पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के परिणामस्वरूप हमें चेतनता का अनुभव होता है।

वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (आर्च-ओर) का नाम दिया है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। दरअसल, इसका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था। यह आत्मा काल के जन्म से ही व्याप्त थी।

अखबार के अनुसार यह परिकल्पना बौद्ध एवं हिन्दुओं की इस मान्यता से काफी कुछ मिलती-जुलती है कि चेतनता ब्रह्मांड का अभिन्न अंग है। इन परिकल्पना के साथ हेमराफ कहते हैं कि मृत्यु जैसे अनुभव में माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, लेकिन इसके अंदर के अनुभव नष्ट नहीं होते। आत्मा केवल शरीर छोड़ती है और ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है।

हेमराफ का कहना है कि हम कह सकते हैं कि दिल धड़कना बंद हो जाता है, रक्त का प्रवाह रुक जाता है, माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, माइक्रोटयूबुल्स में क्वांटम सूचनाएं नष्ट नहीं होतीं। ये नष्ट नहीं हो सकतीं। यह महज व्यापक ब्रह्मांड में वितरित एवं विलीन हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि यदि रोगी बच जाता है तो यह क्वांटम सूचना माइक्रोटयूबुल्स में वापस चली जाती है तथा रोगी कहता है कि उसे मृत्यु जैसा अनुभव हुआ है। हेमराफ यह भी कहते हैं कि यदि रोगी ठीक नहीं हो पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है तो यह संभव है कि यह क्वांटम सूचना शरीर के बाहर व्याप्त है।


मस्तिष्क में क्वांटम कंप्यूटर के लिए चेतना एक प्रोग्राम की तरह काम करती है


वाशिंगटन। आत्मा के बारे में हिंदू धर्म के धर्मग्रंथ वेदों में लिखा है कि आत्मा मूलत: मस्तिष्क में निवास करती है। मृत्यु के बादआत्मा वहां से निकलकर दूसरे जन्म के लिए ब्रह्मांड में परिव्याप्त हो जाती है। कुछ वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से हिंदू धर्म की इस मान्‍यता की पुष्टि हुई है। मृत्यु के अनुभव पर वैज्ञानिकों ने यह शोध किए हैं।

मृत्यु का करीबी अनुभव करने वाले लोगों के अनुभवों पर आधारित दो प्रख्यात वैज्ञानिकों ने मृत्यु के अनुभव पर एक सिद्धांत प्रतिपादित किया है। प्राणी की तंत्रिका प्रणाली से जबआत्मा को बनाने वाला क्वांटम पदार्थ निकलकर व्यापक ब्रह्मांडमें विलीन होता है तो मृत्यु जैसा अनुभव होता है। इस सिद्धांत के पीछे विचार यह है कि मस्तिष्क में क्वांटम कंप्यूटर के लिए चेतना एक प्रोग्राम की तरह काम करती है। यह चेतना मृत्यु के बाद भी ब्रह्मांड में परिव्याप्त रहती है।



'डेली मेल' की खबर के अनुसार एरिजोना विश्वविद्यालय में एनेस्थिसियोलॉजी एवं मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर एमरेटसएवं चेतना अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. स्टुवर्ट हेमेराफ ने इस अर्ध-धार्मिक सिद्धांत को आगे बढ़ाया है। यह परिकल्पना चेतनता के उस क्वांटम सिद्धांत पर आधारित है, जो उन्होंने एवं ब्रिटिश मनोविज्ञानी सर रोजर पेनरोस ने विकसित की है। 
इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में होता है जिसे माइक्रोटयूबुल्स कहते हैं। दोनों वैज्ञानिकों का तर्क है कि इन माइक्रोटयूबुल्स पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के परिणामस्वरूप हमें चेतनता का अनुभव होता है।

वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (आर्च-ओर) का नाम दिया है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारीआत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। दरअसल, इसका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था। यह आत्मा काल के जन्म से ही व्याप्त थी।

अखबार के अनुसार यह परिकल्पना बौद्ध एवं हिन्दुओं की इस मान्यता से काफी कुछ मिलती-जुलती है कि चेतनता ब्रह्मांडका अभिन्न अंग है। इन परिकल्पना के साथ हेमराफ कहते हैं कि मृत्यु जैसे अनुभव में माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, लेकिन इसके अंदर के अनुभव नष्ट नहीं होते। आत्मा केवल शरीर छोड़ती है और ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है।

हेमराफ का कहना है कि हम कह सकते हैं कि दिल धड़कना बंद हो जाता है, रक्त का प्रवाह रुक जाता है, माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, माइक्रोटयूबुल्स में क्वांटम सूचनाएं नष्ट नहीं होतीं। ये नष्ट नहीं हो सकतीं। यह महज व्यापक ब्रह्मांड में वितरित एवं विलीन हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि यदि रोगी बच जाता है तो यह क्वांटम सूचना माइक्रोटयूबुल्स में वापस चली जाती है तथा रोगी कहता है कि उसे मृत्यु जैसा अनुभव हुआ है। हेमराफ यह भी कहते हैं कि यदि रोगी ठीक नहीं हो पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है तो यह संभव है कि यह क्वांटम सूचना शरीर के बाहर व्याप्त है। 
sabhar :http://hindi.webdunia.com : http://www.aajkikhabar.com

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मानव का विकाश

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मानव के विकाश के समबन्ध में वैज्ञानिको के कई मत है लैमार्क ने अंगों के उपयोग का सिधांत दिया परन्तु डार्विन ने जैव विकाश का सिधांत दिया जीवन के प्रतिस्पर्धा के परिणामस्वरूप प्रकृती की सरौतम कृति मानुष का विकाश हुआ मानव jangalou में रहता था मानव ने आग जलाने की विधि जानी मानव पत्तथरो युग से धीरे धीरे आधुनीक युग में के विकाश में अनेक योगदान है

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