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मंगलवार, 14 सितंबर 2021

करोंदा की खेती और फायदे

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----------------++++++++++---------------+++++++++ कई फल और सब्जियां ऐसी हैं जो चलन में काफी कम हैं लेकिन हमारी सेहत के लिए काफी फायदेमंद हैं। लोग इस बात से भी कम ही वाकिफ हैं कि हमारी सेहत के लिए इनमें काफी फायदे छिपे हैं। अब करोंदे फल को ही लीजिए। स्वाद में खट्टे इस फल से लोग अनजान हैं लेकिन ये काफी गुणों से सम्पन्न हैं। गर्मी के मौसम में यह हमें देखने को मिलता है और पुरानी पीढ़ी तो प्रमुखता से इसका इस्तेमाल करती है। इसके सब्जी, आचार ,मुरब्बे ,चटनी सबके स्वाद एक से बढ़कर एक होते हैं। ग्लोबलाइजेशन का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि हम जिंदगी के हर क्षेत्र मैं बेहद सिमट गए हैं।हमारे खान-पान की भी बात की जाए तो अब सालों भर हम कुछ ही चंद चीजों को खाते-पीते रहते हैं। अब पहले जैसी विविधता नही रही है।मार्केटिंग के अभाव में कई सेहतमंद और दुर्लभ चीजों ने अपना दम तोड़ दिया है। करौंदे की फसल किसानों के लिए बहुत फायदेमंद रही है। ये फसल किसानों को मुनाफा देने के साथ-साथ उनकी फसल की सुरक्षा भी करती है। करौंदा झाड़ीनुमा कांटेदार वृक्ष होने की वजह से नीलगाय जैसे जंगली पशुओं को फसल का नुकसान करने के लिए रोकते हैं। करौंदा को किसी भी फसल या बागवानी के चारों तरफ लगाया जाता है, इसके 100 वृक्षों से 20 हजार रुपए की कमाई किसानों को होती है।यह वृक्ष भारत में राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तरप्रदेश और हिमालय के कई क्षेत्रों में पाया जाता है। करौंदे की फसल में लागत शून्य और मुनाफा भरपूर इसके एक पौधे की कीमत तकरीबन ₹2 के आसपास होती है।पौधे लगाने के बाद इसमें कोई विशेष देखभाल और अन्य लागत की जरूरत नहीं पड़ती। इसका पौधा लगने के डेढ़ साल के बाद फल लगने शुरू हो जाते हैं। अप्रैल के महीने में फूल मई-जून में फल लग जाते हैं। जुलाई का महीना आते-आते फल पूरी तरह से पक जाता है। करौंदे के पौधों की हर साल छटाई होती रहे तो उसके फल तोड़ने में कोई परेशानी नहीं होती है।” किसान भाई करौंदा से चटनी, अचार और मुरब्बा अपने घर में खाने भर का बना लेते हैं। इसका अचार तो कई महीने चलता है। स्थानीय बाजारों में भी इसकी अच्छी खासी मांग रहती है जिसे बेचकर किसान अच्छी इनकम प्राप्त कर सकते हैं। एक करौंदे के पौधे में कम से कम 10 किलो करौंदा आराम से निकल आता है। 1 किलो करौंदा की कीमत ₹20 के आसपास मिलती है। करोंदा के फायदे। करोंदा के कई गुणों में एक गुण यह है कि करोंदा हृदय के लिए फायदेमंद होता है। करोंदा में फ्लैनोनोइड एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो कि हमारी हृदय संबंधी बीमारियों से हिफाजत करता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता करोंदे में एंटीऑक्सीडेंट और फाइटोकेमिकल्स गुण होते हैं, जो हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं। इसमें करोंदे का जूस फायदेमंद साबित हो सकता है। पेट का अल्सर एक अध्ययन के अनुसार करोंदे में मौजूद पिग्मेंट पेट में मौजूद बैक्टीरिया से लड़ता हैं। यह आंतों की कोशिकाओं को ठीक करने में सहायक होता हैं, जिससे पेट के अल्सर से बचाव होता है। दांतों के लिए कैल्शियम की अच्छी मात्रा होने के कारण करोंदा दांतों के लिए फायदेमंद होता है। करोंदा में प्रोथेन्थोसाइडिन होता है जो मुंह को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक साबित होता है। मूत्र संक्रमण करोंदा मूत्र संक्रमण को रोकने में भी फायदेमंद माना जाता है। करोंदे में फ्लेवोनॉयड होता है, जो बैक्टीरिया को यूरिनरी टै्रक्ट में पैदा होने से रोकने में सहायक होता है। ©लवकुश आवाज एक पहल कम वजन करोंदे का जूस शरीर में जमा फैट को हटाने का काम करता है, इससे आसानी से बढ़ा हुआ वजन कम किया जा सकता है। इसमें काफी मात्रा में फाइबर होता है, जिससे लंबे समय तक भूख नहीं लगती। हड्डियों को मजबूती करोंदा हड्डियों को भी मजबूती देता है। इसकी वजह है करोंदे में प्राकृतिक रूप से कैल्शियम अच्छी मात्रा में पाया जाता है। इससे ऑस्टियोपोरोसिस होने का खतरा कम होता है। दमकती त्वचा करोंदा खाने से हमारी त्वचा में भी निखार आता है। इसमें पानी, विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों की भरमार होती है, जो हमारी त्वचा को निखारने में कारगर साबित होते हैं। रोकते हैं घटती याद्दाश्त करोंदा में उपस्थित फाइटोन्यूट्रिएंट्स और एंटीऑक्सीडेंट गुण बढ़ती उम्र से संबंधित परेशानियां जैसे कि याद्दाश्त में कमी और एकाग्रता की कमी को दूर करने में सहायक होते हैं। कैंसर में फायदा करोंदा में प्रोंथोसाइनिडिन की अच्छी मात्रा होती है, जो कैंसर कोशिकाओं के विकास को रोकता है। करोंदा में एंटी-कैंसर जन्य घटक होते हैं जो कैंसर की कोशिकाओं को बढऩे से रोकते हैं। बढेंग़े बाल करोंदे से बाल भी बढ़ते हैं। करोंदे में विटामिन-सी और विटामिन-ए होता है, जो बालों को बढऩे में मदद करते हैं। नियमित रूप से करोंदे का जूस पीने से बालों की ग्रोथ बढ़ती। मुंहासों में फायदा करोंदा में एंटीसेप्टिक गुण होते हैं जो त्वचा पर मुंहासे और फुंसियों को रोकने में सहायक होते हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण पर्याप्त मात्रा में होते हैं जो मुंहासों और फुंसियों को कम करते हैं। sabhar Facebook wall

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सोमवार, 13 सितंबर 2021

पूर्णांक 108 का रहस्य

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“ओ३म्” का जप करते समय १०८ प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है, जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास में अत्यन्त प्रबल कारण है।

मेरा आप सभी से अनुरोध है बिना अंधविश्वास समझे कर्तव्य भाव से इस “पूर्णांक १०८” को पवित्र अंक स्वीकार कर, आर्य वैदिक संस्कृति के आपसी सहयोग, सहायता व पहचान हेतु निःसंकोच प्रयोग करें, इसका प्रयोग प्रथम दृष्टिपात स्थान पर करें । यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय काल से हमारे ऋषि मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है और अब अति शीघ्र यही अंक हमारी महान सनातन वैदिक संस्कृति के लिये प्रगाढ़ एकता का विशेष संकेत अंक (code word) बन जायेगा।

संख्या १०८ का रहस्य
अ-१ आ- २ इ- ३ ई- ४ उ- ५ ऊ- ६. ए- ७ ऐ- ८ ओ- ९ औ- १० ऋ- ११ लृ- १२ अं- १३ अ:- १४ ऋॄ - १५ लॄ -१६

क- १  ख- २  ग- ३  घ- ४  ङ- ५  च- ६  छ- ७  ज- ८ झ- ९ ञ- १०  ट- ११  ठ- १२  ड- १३ ढ-१४  ण- १५  त- १६  थ- १७  द- १८  ध- १९  न- २०  प- २१  फ- २२  ब- २३  भ- २४ -  म- २५ -  य- २६ -  र- २७  ल- २८  व- २९  श- ३०  ष- ३१  स- ३२  ह- ३३  क्ष- ३४  त्र- ३५ ज्ञ- ३६  ड़ - ढ़ ।

ओं खम् ब्रह्म
ब्रह्म = ब+र+ह+म =२३+२७+३३+२५=१०८

01. यह मात्रिकाएँ
(१८स्वर+३६ व्यंजन=५४)
नाभि से आरम्भ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे १०८ की संख्या बन जाती हैं। इस प्रकार १०८ मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की १०८ सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है। अधिक जितना हो सके उतना उत्तम है पर नित्य कम से कम १०८ मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए ।

02. मनुष्य शरीर की ऊँचाई
= यज्ञोपवीत(जनेउ) की परिधि
= (४ अँगुलियों) का २७ गुणा होती है।
= ४ × २७ = १०८

03. नक्षत्रों की कुल संख्या = २७
प्रत्येक नक्षत्र के चरण = ४
जप की विशिष्ट संख्या = १०८
अर्थात गायत्री आदि मंत्र जप कम से कम १०८ बार करना चाहिये ।

04. एक अद्भुत अनुपातिक रहस्य
पृथ्वी से सूर्य की दूरी/ सूर्य का व्यास=१०८
पृथ्वी से चन्द्र की दूरी/ चन्द्र का व्यास=१०८
अर्थात मन्त्र जप १०८ से कम नहीं करना चाहिये।

05. हिंसात्मक पापों की संख्या ३६ मानी गई है जो मन, वचन व कर्म ३ प्रकार से होते है। अत: पाप कर्म संस्कार निवृत्ति हेतु किये गये मंत्र जप को कम से कम १०८ अवश्य ही करना चाहिये।

06. सामान्यत: २४ घंटे में एक व्यक्ति २१६०० बार सांस लेता है। दिन-रात के २४ घंटों में से १२ घंटे सोने व गृहस्थ कर्त्तव्य में व्यतीत हो जाते हैं और शेष १२ घंटों में व्यक्ति जो सांस लेता है वह है १०८०० बार।
इसी समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये । इसीलिए १०८०० की इसी संख्या के आधार पर जप के लिये १०८ की संख्या निर्धारित करते हैं।

07. एक वर्ष में सूर्य २१६०० कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माह दक्षिणायन में। अत: सूर्य छः माह की एक स्थितिमें १०८००० बार कलाएं बदलता है।

08. ब्रह्मांड को १२ भागों में विभाजित किया गया है। इन १२ भागों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन १२ राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या ९ में राशियों की संख्या १२ से गुणा करें तो संख्या १०८ प्राप्त हो जाती है।

09. १०८ में तीन अंक हैं १+०+८. इनमें एक “१” ईश्वर का प्रतीक है। शून्य “०” प्रकृति को दर्शाता है। आठ “८” जीवात्मा को दर्शाता है, क्योकि योग के अष्टांग नियमों से ही जीव प्रभु से मिल सकता है । जो व्यक्ति अष्टांग योग द्वारा प्रकृति के विरक्त हो कर ( मोह माया लोभ आदि से विरक्त होकर ) ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है उसे सिद्ध पुरुष कहते हैं। जीव “८” को परमपिता परमात्मा से मिलने के लिए प्रकृति “०” का सहारा लेना पड़ता है। ईश्वर और जीव के बीच में प्रकृति है। आत्मा जब प्रकृति को शून्य समझता है तभी ईश्वर “१” का साक्षात्कार कर सकता है। प्रकृति “०” में क्षणिक सुख है और परमात्मा में अनंत और असीम। जब तक जीव प्रकृति “०” को जो कि जड़ है उसका त्याग नहीं करेगा, शून्य नही करेगा, मोह माया को नहीं त्यागेगा तब तक जीव “८” ईश्वर “१” से नहीं मिल पायेगा पूर्णता (१+८=९) को नहीं प्राप्त कर पायेगा । ९ पूर्णता का सूचक है।

10. वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार
अहंकार के गुण = २
बुद्धि के गुण = ३
मन के गुण = ४
आकाश के गुण = ५
वायु के गुण = ६
अग्नि के गुण = ७
जल के गुण = ८
पॄथ्वी के गुण = ९
२+३+४+५+६+७+८+९ =अत: प्रकॄति के कुल गुण = ४४
जीव के गुण = १०
इस प्रकार संख्या का योग = ५४
अत: सृष्टि उत्पत्ति की संख्या = ५४
एवं सृष्टि प्रलय की संख्या = ५४
दोंनों संख्याओं का योग = १०८

11. Vertual Holy Trinity
संख्या “१” एक ईश्वर का संकेत है।
संख्या “०” जड़ प्रकृति का संकेत है।
संख्या “८” बहुआयामी जीवात्मा का संकेत है। [ यह तीन अनादि परम वैदिक सत्य हैं ] [ यही पवित्र त्रेतवाद ( Holy Trinity ) है ]
संख्या “२” से “९” तक एक बात सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में “०” रूपी स्थान पर जीवन है। इसलिये यदि “०” न हो तो कोई क्रम गणना आदि नहीं हो सकती।
“१” की चेतना से “८” का खेल । “८” यानी “२” से “९” । यह “८” क्या है ? मन के “८” वर्ग या भाव ।
ये आठ भाव ये हैं – १. काम ( विभिन्न इच्छायें / वासनायें ) । २. क्रोध । ३. लोभ । ४. मोह । ५. मद ( घमण्ड ) । ६. मत्सर ( जलन ) । ७. ज्ञान । ८. वैराग ।
एक सामान्य आत्मा से महानात्मा तक की यात्रा का प्रतीक है — १०८ इन आठ भावों में जीवन का ये खेल चल रहा है ।

12. सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं और ये चारो ओर से अलग-अलग निकलती है। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बनें । इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनका पृथ्वी के आठ बसुओं से टक्कर होती हैं। सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ बसुओं की आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है। 1+0+8=9 यह 9 अंक राज राजेश्वरी का प्रिय हे। जिस प्रकार भगवती नित्य पूर्ण हे यह अंक भी पूर्ण है। sabhar aghore tantra Facebook wall

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वाक् शुद्धि : हर ध्वनि हम पर असर डालती है

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अध्यात्म की साधना करने वालों को मन्त्रों का जप करने की सलाह क्यों डी जाती है? क्या असर होता है उस ध्वनि का जो हम बोलते हैं? क्या है वाक् शुद्धि, मंत्र साधना?

 हम जिस तरह की ध्वनि सुनते हैं उसका अपने ऊपर असर तो हम कई बार महसूस कर लेते हैं, लेकिन कभी सोचा है कि हम जो बोलते हैं उसका असर हम पर क्या होता है? हमारी बोली गई ध्वनि का असर सुनने वाले से अधिक खुद हम पर पड़ता है। कैसे?

 
जीवन के सूक्ष्म आयामों को जानने और समझने के लिए, शरीर, मन, रसायन, (न्युरोलोजिकल) तंत्रिका तंत्र और ऊर्जा तंत्र को तैयार करना जरूरी होता है। व्यक्ति के पास एक ऊर्जावान भौतिक शरीर होना चाहिए। तंत्रिका तंत्र पूरी तरह सक्रिय और जीवंत होना चाहिए। प्राणशक्ति पूरी तरह सक्रिय और संतुलित होनी चाहिए और आपका मन बाधक नहीं बल्कि सहायक होना चाहिए। सवाल यह है कि इसकी तैयारी में कितने जीवन लगेंगे? यह निर्भर करता है कि आप कितने बिगड़े हुए हैं।

हो सकता है कि आप उस आदमी को न रोक पाएं, जो आपके बगल में चिल्ला रहा हो, लेकिन कम से कम आप जो बोलते हैं, उस ध्वनि को तो शुद्ध कर सकते हैं। क्योंकि आप जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हैं, उनका असर आपके ऊपर सबसे अधिक होता है।

आपकी जो जीवनशैली है और आप अपने भीतर जिस किस्म का रसायन विकसित कर रहे हैं, उसके कारण तंत्रिका तंत्र गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो सकता है। लेकिन भले ही आपका सिस्टम बुरी तरह बिगड़ा हुआ हो, आपने लगातार अपने अंदर गलत रसायन पैदा किया हो और उसने आपके तंत्रिका तंत्र को बेकार कर दिया हो, यहां तक कि अगर आपने बाहरी मदद से अपने शरीर में रसायन डाले हों और उससे आपको बुरी तरह नुकसान पहुंचा हो, तब भी अगर आप ईमानदारी से कोशिश करना चाहते हैं, तो लगभग हर किसी के लिए यह तैयारी संभव है।
सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए यह संभव नहीं है जिन्हें कुछ खास रोगों ने स्थायी नुकसान पहुंचा दिया हो। उन्हें और अधिक समय की जरूरत होगी। दूसरों के लिए, यह सिर्फ प्राथमिकता का सवाल है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना समय देते हैं, दिन में 21 मिनट या 21 घंटे या उसके बीच कहीं। चुंकि यह संभव है, इसलिए इस बारे में बात करना और कोशिश करना महत्वपूर्ण है। अगर ऐसी कोई संभावना ही नहीं होती, तो इन सब बातों का कोई मतलब नहीं होता।

सही किस्म की ध्वनियां

सही तरह के भोजन, विचार, श्वास प्रक्रिया, मनोभाव और भावनाओं से आपके शरीर को ठीक करते हुए उसका कायाकल्प किया जा सकता है। इसी तरह उचित शब्दों को बोलना और सही तरह की ध्वनियां सुनना भी महत्वपूर्ण है। इससे आपका तंत्रिका तंत्र अपने आस-पास के जीवन के प्रति संवेदनशील हो पाएगा। क्या आपने ध्यान दिया है कि जब आप कुछ घंटों तक गाड़ियों या मशीनों की कर्कश आवाजें सुनते हैं, तो आपको अपने आसपास की साधारण चीजों को भी ठीक से समझने में मुश्किल होती है। जबकि किसी दिन अगर आप सिर्फ घर पर बैठे कुछ शास्त्रीय संगीत सुन रहे होते हैं, उस दिन आपका दिमाग तेज और सजग होता है और बहुत आसानी से चीजों को समझ लेता है। अगर आप सचेतन होकर, इन चीजों पर अधिक से अधिक ध्यान दें, या कम से कम इस बारे में सचेत रहें कि किस तरह की ध्वनि आपके सिस्टम को नुकसान पहुंचा रही है और किस तरह की ध्वनि से लाभ होता है, तो आप उन ध्‍वनियों को शुद्ध कर लेंगे, जिनका आप उच्चारण करते हैं। हो सकता है कि आप उस आदमी को न रोक पाएं, जो आपके बगल में चिल्ला रहा हो, लेकिन कम से कम आप जो बोलते हैं, उस ध्वनि को तो शुद्ध कर सकते हैं। क्योंकि आप जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हैं, उनका असर आपके ऊपर सबसे अधिक होता है।

वाक् शुद्धि

आप जो बोलते हैं, वह सबसे महत्वपूर्ण है। इसे वाक शुद्धि कहा जाता है। वाक शुद्धि का मतलब प्यारी और लुभावनी बातें बोलना नहीं है। इसका मतलब है, सही ध्वनियों का उच्चारण करना। आपको जो भी बोलना है, उसे इस तरीके से बोलें कि वह आपके लिए लाभदायक हो। और जो भी चीज आपके लिए लाभदायक होगी, वह स्वाभाविक रूप से आपके आस-पास हर किसी के लिए भी फायदेमंद होगी। अगर कोई ध्वनि आपके लिए बहुत असरदार साबित हो रही है, तो निश्चित रूप से वह आपके आस-पास हर किसी पर उतना ही असर करेगी।
ऊर्जा को संतुलित रखने के लिए ध्वनि महत्वपूर्ण है। उसके साथ भोजन, भावनाओं और साधना पर भी ध्यान देना जरूरी है। अगर इसका ध्यान रखा जाए तो आप धीरे-धीरे ऐसा शरीर विकसित कर लेंगे जिसमें बोध करने की क्षमता होगी। यदि आप इस मानव शरीर को एक अधिक ऊंची संभावना के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो सही किस्म की ध्वनियों या स्पंदन का एक आधार जरूरी है।

वाक शुद्धि का मतलब प्यारी और लुभावनी बातें बोलना नहीं है। इसका मतलब है, सही ध्वनियों का उच्चारण करना।

वरना आपका सिस्टम हमेशा आपके पीछे घिसटता ही रहेगा। अगर आप उसे एक अधिक बड़ी संभावना बनाना चाहते हैं, तो उसके लिए सही किस्म के स्पंदन की बुनियाद जरूर होनी चाहिए। वाक शुद्धि इसका एक महत्वपूर्ण अंग है। वाक शुद्धि का मतलब है कि आप जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हैं, उन्हें शुद्ध बनाना। यदि आप सिर्फ अपने भीतर मौन हो जाएं, तो इससे बेहतर कोई तरीका नहीं है। यह सबसे बढ़िया तरीका है। परंतु यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है, तो अगली बेहतरीन चीज है, ‘शिव’ शब्द का उच्चारण। यह शब्द निश्चलता या मौन के सबसे करीब है। यदि सिर्फ एक शब्द आपके लिए काफी नहीं है, तो आप थोड़ी और व्यापक चीज अपना सकते हैं – आप ‘ब्रह्मानंद स्वरूप’ या यहां मौजूद आध्यात्मिक मंत्रों में से अपनी पसंद के किसी भी मंत्र का जाप कर सकते हैं। जिस मंत्र के साथ आप सहज हों, उसका जाप करें।

ध्वनि और सही मनोभाव दोनों जरुरी है

ध्वनि एक चीज है, लेकिन एक और चीज है, ध्वनि के उच्चारण के पीछे की नीयत या लक्ष्य। बोलने की क्षमता मनुष्य को मिला एक विशेष उपहार है। बोले जाने वाले शब्दों की जटिलता के हिसाब से कोई और जीव इंसान की बराबरी नहीं कर सकता। लेकिन एक इंसान द्वारा बोले जाने वाले शब्दों की रेंज जितनी कम होगी, उसकी वाक शुद्धि उतनी ही कम होगी। भारतीय भाषाओं की तुलना में, अंग्रेजी में शब्दों या ध्वनियों की रेंज कम है। इसी वजह से अगर आप अपने जन्म से केवल अंग्रेजी ही बोलते रहे हैं, तो आपके लिए कोई मंत्र या दूसरी भाषा बोलना बहुत मुश्किल होगा।
यदि ध्वनियों या शब्दों की संरचना वैज्ञानिक तरीके से की जाती, जैसा कि मंत्रों और संस्कृत भाषा में होता है तो बिना अधिक जागरूकता के भी कुछ बोलने पर, ध्वनियों की एक खास व्यवस्था के कारण आपको लाभ होता। संस्कृत भाषा को काफी सोच समझकर तैयार किया गया था ताकि सिर्फ उस भाषा को बोलने से ही शरीर का शुद्धिकरण हो सके। लेकिन अब हम ज्यादातर ऐसी भाषाएं बोलते हैं, जिन्हें इस तरह तैयार नहीं किया गया है। इसलिए बेहतर है कि इस कमजोरी को संभालने के लिए आप सही इरादे के साथ बोलें। आपको जागरूकता और मजबूत इरादे के साथ इसे ठीक करना होगा क्योंकि कार्मिक प्रक्रिया का संबंध आपके इरादे से अधिक है, कर्मों से नहीं। आप एक ही बात को बेहद प्रेम के कारण भी कह सकते हैं या किसी दूसरे इरादे से भी कह सकते हैं। दोनों का शरीर पर एक जैसा असर नहीं होगा।
अगर आप जो कुछ भी बोलते हैं, उसके एक-एक शब्द में सही इरादा रखें, तो ये शब्द या ध्वनियां आपके भीतर एक खास तरह से स्पंदित होंगी। इसलिए यदि आप किसी से बात कर रहे हैं, तो इस तरह बोलें मानो ये शब्द उस व्यक्ति के लिए आपके आखिरी शब्द हों। यदि आप हर किसी के साथ ऐसा ही करें,  तो यह आपकी वाक शुद्धि करने का बहुत बढ़िया तरीका है।

Isha Foundation

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प्राणायाम -ध्यान -समाधि क लिए चेतावनी

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           आध्यात्मिक क्षेत्र मे भक्ति करने के लिए जब योगक्रिया मे प्राणायाम-ध्यान-समाधि करने के लिए शरीर मे कोईभी प्रकार की तकलीफ ना होवे ईसिके लिए प्राणायाम-ध्यान-समाधि करने के बाद शरीर मे ठंडी लगती है अगर तो गरमी लगती है ईसिके लिए प्राणायाम-ध्यान-समाधि करने के बाद उठने के बाद शरीर मे गरमी लगेतो एक ग्लास ठंडा दूध मे दो चमची शहद डालकर तुरंत पी जानेका ईसिलिए शरीर मे गरमी नही लगेगी और प्राणायाम-ध्यान-समाधि करके उठने के बाद शरीर मे ठंडी लगेतो एक कप चाय या तो गरम दूध मे गरम मसाले सूंठ, काळामरी, दावचीनी ये तीनो सप्रमाण मे एक कप चाय मे एक ग्राम जितना मसाला डालकर पी जानेका ईसिलिए शरीर मे ठंडी नही लगेगी ये दोनो चीजे प्राणायाम के बाद लेना फरजियात होता है नहीं तो शरीर का बेलेन्स बिगड जाता है और प्राणायाम-ध्यान-समाधि करके के बाद 15 से 20 मिनिट तक पानी कभी पीना मत कीतनी भी  प्यास लगेतो भी पानी कभी मत पीना 15 से 20 मिनिट के बाद पानी आप पी शकते हो ईसिके पहले कभी पानी मत पीना नहितर तुरंत ही दो मिनिट मे आपको शरदी-झुकीम हो जायेगा ये बात का हंमेशा के लिए आपको ख्याल रखना पडेगा. 

           प्राणायाम-ध्यान-समाधि करने के लिए आपका अपान वायुं दुर्गन्ध रहित होना चाहिए अगर आपका अपान वायुं दुर्गन्ध वाला होगा तो आपका शरीर रोगिष्ट बन जायेगा ये बात का भी आपको ख्याल कखना पडेगा अपान वायुं मेसे दुर्गन्ध हटाने के लिए आपको कबजियात नही रहना चाहिए अगर आपका अपान वायुं दुर्गन्ध वाला है आपको कबजीयात,,गेस की तकलीफ है तो आपको 
(1):- 250ग्राम हरडे का चूरण 
(2):- 100ग्राम अजवाइन चूरण
(3):- 50ग्राम संचण (संचोडो-काला नमक) 
  ये तीनो चीजो परचारीकी दुकान से लाकर तीनो चूरण मिक्ष करके एक बोटल मे भरलो. हरदिन सांज को खाना खाने के बाद एक चमची चूरण पानी के साथ हरदिन पी जानेका ये चूरण से कबजीयात, गेस पित्त की समस्या नही रहती और आपका अपान वायुं भी गंधसे रहित हो जायेगा. सांम को खाना खाने के बाद एक कलाक के बाद ये चूरण हंमेशा के लिए आपको लेना है. ये चूरण से आपके शरीर मे वात-पित्त-कफ तीनो दोष मिट जायेगा तीनो दोष कंन्ट्रोल मे रहेगा ईसिलिए आपका शरीर भी निरोगी बन जायेगा ये चूरण तो कोईभी मानव ले सकते है  .और प्राणायाम-ध्यान-समाधि करके के लिए खाना खाने के बाद तीन कलाक के बाद हंमेशा करना टुंक मे भूखा पेट प्राणायाम-ध्यान-समाधि करना फरजियात है. और समाधि मे जाने के लिए अगले दिन से आपको खोराक बंध करना पडता है. होजरी मे या तो आंतर मे जूना मल नही होना चाहिए खोराक भी नहीं होना चाहिए होजरी और आंतर दोनो खाली करके समाधि मे आप बैठ शकते हो. होजरी और आंतर दोनो मे खोराक का या तो मल का कण भी रहेगा तो आप समाधि मे से वीपिस नही उतर शकते क्युकिं जल समाधि लगती है तब जो होजरी मे यो तो आंतर मे जूना मल होगा तो अपान वायुं कंठ की तमाम नशे ब्लोक कर देती है. वो डोज की नशे बंध हो जाने से आप समाधि मेसे नीचे नही उतर शकते और कायम के लिए आपकी समाधि लग जायेगी ईसिलिए ये बात का आपको बहुत ख्याल रखना पडेगा ईसिके पहले कभी समाधि मे मत जाना नहीतो आपका शरीर छूट जायेगा. 

       ---गगनगीरीजी महाराज

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ध्यान में होने वाले अनुभव

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साधकों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं. अनेक साधकों के ध्यान में होने वाले अनुभव एकत्रित कर यहाँ वर्णन कर रहे हैं ताकि नए साधक अपनी साधना में अपनी साधना में यदि उन अनुभवों को अनुभव करते हों तो वे अपनी साधना की प्रगति, स्थिति व बाधाओं को ठीक प्रकार से जान सकें और स्थिति व परिस्थिति के अनुरूप निर्णय ले सकें.

१. भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर पहले काला और फिर नीला रंग दिखाई देता है. फिर पीले रंग की परिधि वाले नीला रंग भरे हुए गोले एक के अन्दर एक विलीन होते हुए दिखाई देते हैं. एक पीली परिधि वाला नीला गोला घूमता हुआ धीरे-धीरे छोटा होता हुआ अदृश्य हो जाता है और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है. इस प्रकार यह क्रम बहुत देर तक चलता रहता है. साधक यह सोचता है इक यह क्या है, इसका अर्थ क्या है ? इस प्रकार दिखने वाला नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं जीवात्मा का रंग है. नीले रंग के रूप में जीवात्मा ही दिखाई पड़ती है. पीला रंग आत्मा का प्रकाश है जो जीवात्मा के आत्मा के भीतर होने का संकेत है.

इस प्रकार के गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत होने का लक्षण है. इससे भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्षा दीखने लगते है और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं. साथ ही हमारे मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे हम असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेते हैं.

२. कुण्डलिनी जागरण का अनुभव :-

कुण्डलिनी वह दिव्य शक्ति है जिससे सब जीव जीवन धारण करते हैं, समस्त कार्य करते हैं और फिर परमात्मा में लीन हो जाते हैं. अर्थात यह ईश्वर की साक्षात् शक्ति है. यह कुदालिनी शक्ति सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर शारीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार चक्र में स्थित होती है. जब तक यह इस प्रकार नीचे रहती है तब तक हम सांसारिक विषयों की ओर भागते रहते हैं. परन्तु जब यह जाग्रत होती है तो उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि कोई सर्पिलाकार तरंग है जिसका एक छोर मूलाधार चक्र पर जुदा हुआ है और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ घूमता हुआ ऊपर उठ रहा है. यह बड़ा ही दिव्य अनुभव होता है. यह छोर गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है.

जब कुण्डलिनी जाग्रत होने लगती है तो पहले मूलाधार चक्र में स्पंदन का अनुभव होने लगता है. यह स्पंदन लगभग वैसा ही होता है जैसे हमारा कोई अंग फड़कता है. फिर वह कुण्डलिनी तेजी से ऊपर उठती है और किसी एक चक्र पर जाकर रुक जाती है. जिस चक्र पर जाकर वह रूकती है उसको व उससे नीचे के चक्रों को वह स्वच्छ कर देती है, यानि उनमें स्थित नकारात्मक उर्जा को नष्ट कर देती है. इस प्रकार कुण्डलिनी जाग्रत होने पर हम सांसारिक विषय भोगों से विरक्त हो जाते हैं और ईश्वर प्राप्ति की ओर हमारा मन लग जाता है. इसके अतिरिक्त हमारी कार्यक्षमता कई गुना बढ जाती है. कठिन कार्य भी हम शीघ्रता से कर लेते हैं.

३. कुण्डलिनी जागरण के लक्षण :

कुण्डलिनी जागरण के सामान्य लक्षण हैं : ध्यान में ईष्ट देव का दिखाई देना या हूं हूं या गर्जना के शब्द करना, गेंद की तरह एक ही स्थान पर फुदकना, गर्दन का भाग ऊंचा उठ जाना, सर में चोटी रखने की जगह यानि सहस्रार चक्र पर चींटियाँ चलने जैसा लगना, कपाल ऊपर की तरफ तेजी से खिंच रहा है ऐसा लगना, मुंह का पूरा खुलना और चेहरे की मांसपेशियों का ऊपर खींचना और ऐसा लगना कि कुछ है जो ऊपर जाने की कोशिश कर रहा है.

४. एक से अधिक शरीरों का अनुभव होना :

कई बार साधकों को एक से अधिक शरीरों का अनुभव होने लगता है. यानि एक तो यह स्थूल शारीर है और उस शरीर से निकलते हुए २ अन्य शरीर. तब साधक कई बार घबरा जाता है. वह सोचता है कि ये ना जाने क्या है और साधना छोड़ भी देता है. परन्तु घबराने जैसी कोई बात नहीं होती है.

एक तो यह हमारा स्थूल शरीर है. दूसरा शरीर सूक्ष्म शरीर (मनोमय शरीर) कहलाता है तीसरा शरीर कारण शारीर कहलाता है. सूक्ष्म शरीर या मनोमय शरीर भी हमारे स्थूल शारीर की तरह ही है यानि यह भी सब कुछ देख सकता है, सूंघ सकता है, खा सकता है, चल सकता है, बोल सकता है आदि. परन्तु इसके लिए कोई दीवार नहीं है यह सब जगह आ जा सकता है क्योंकि मन का संकल्प ही इसका स्वरुप है. तीसरा शरीर कारण शरीर है इसमें शरीर की वासना के बीज विद्यमान होते हैं. मृत्यु के बाद यही कारण शरीर एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाता है और इसी के प्रकाश से पुनः मनोमय व स्थूल शरीर की प्राप्ति होती है अर्थात नया जन्म होता है. इसी कारण शरीर से कई सिद्ध योगी परकाय प्रवेश में समर्थ हो जाते हैं. Sabhar satsang Facebook wall

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शनिवार, 11 सितंबर 2021

ब्रह्म साक्षात्कार

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❓ ब्रह्म साक्षात्कार का वास्तविक अर्थ क्या है ? हम कैसे जानेंगे कि हमने ब्रह्म साक्षात्कार कर लिया है?
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ॐ जब साधक साधना करते हुए प्राण वायु पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है और प्राण का प्रवाह सुषुम्ना मार्ग के अवरोधों को पार करते हुए आज्ञा चक्र को पार कर  नाद ध्वनि का साक्षात्कार कर लेता है , तब उसे मानना चाहिए कि वह ब्रह्म के क्रियात्मक अस्तित्व को जानने लगा है ।उसकी क्रिया शक्ति को उसने अपने ही शरीर में महसूस कर लिया है । यह नाद 10 प्रकार का होता है । इसमें सबसे उच्च स्तरीय नाद ओंकार की ध्वनि के समान है ।यह नाद ही है जो संपूर्ण ब्रह्मांड को गतिमान किए हुए है और हमारे संपूर्ण शरीर की क्रियाओं को संचालित करने का मुख्य कारण यह नाद ब्रह्म ही है । यदि इस संपूर्ण  ब्रह्मांड के सृजन एवं क्रिया का कारण खोजा जाए तो यह नाद ही इसका एकमात्र कारण है । हमारे शरीर में यह नाद ही कारण शरीर का प्रतिनिधित्व करता है । इसे हम ईश्वर भी कह सकते हैं जो त्रिगुणात्मक प्रकृति को नियंत्रित एवं संचालित करता है । इसी के द्वारा त्रिगुणात्मक प्रकृति का संचालन हो रहा है।जब साधक नाद ब्रह्म का साक्षात्कार करता है तो प्रारंभ में यह नाद अत्यंत धीमा होता है  किंतु बाद में यह बहुत तीव्र होता जाता है उच्च स्तरीय तीव्रता को प्राप्त होने के बाद जैसे-जैसे साधक अपनी साधना को आगे बढ़ाते जाता है ,वैसे वैसे यह नाद  क्रमश  धीरे-धीरे धीमा होता चला जाता है और यही नाद प्रकाश तत्व में बदलता जाता है । धीरे-धीरे साधक का आज्ञा चक्र पूर्ण प्रकाशित हो जाता है और ऐसी स्थिति में उसे अमृत के स्राव का आनंद भी प्राप्त होने लगता है । इससे आगे जैसे-जैसे साधक की साधना आगे बढ़ती है। आज्ञा चक्र से प्रकाश तत्व का विस्तार सहस्रार चक्र की ओर होने लगता है । सहस्रार चक्र में प्रकाश तत्व का विस्तार पूर्ण व्यापक होने लगता है । संपूर्ण सहस्रार चक्र प्रकाशित होता जाता है और सहस्रार चक्र से असीम आनंददायी लहरें उठने लगती हैं । इस स्थिति में अमृत का स्राव अत्यधिक बढ़ जाता है । इससे संपूर्ण शरीर आनंद की आगोश से भर जाता है । जब संपूर्ण शरीर में यह आनंद दोड़ने लगता है और  साधक घंटों इस आनंद में डूबा रहता है ,तभी सहस्रार चक्र से एकाएक हृदय चक्र में असीम तेजोमयी श्वेत शीतल  प्रकाश उत्पन्न होता है ।एक श्वेत शीतल आनंददायी प्रकाश जिसे प्राप्त करके साधक पूर्ण आत्म विभोर हो जाता है । इसे प्राप्त करके साधक अपनी पूर्णता का अहसास करता है। साधक अपने भीतर एवं बाहर संपूर्ण सृष्टि में एक ही आत्म तत्व का विस्तार प्रकाशित होता हुआ देखता है। यही है -"परब्रह्म  के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार "। यदि कोई साधक यहां तक पहुंच पाता है और संसार की इस महानतम उपलब्धि को प्राप्त करता है  तो उसे मान लेना चाहिए कि उसने ब्रह्म की क्रिया शक्ति के साथ अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप अर्थात ब्रह्म स्वरूप का साक्षात्कार कर लिया है ।उसकी आत्मा ने अपने ब्रह्म स्वरूप को बुद्धि के समक्ष प्रकट कर दिया है। यह किसी भी  उच्च स्तरीय योगी साधक के द्वारा ब्रह्म के स्वरूप को व्यक्त करने की अंतिम शब्द सीमा है। इससे आगे  कोई भी महानतम साधक  एक भी शब्द  अभिव्यक्त नहीं कर सकता  क्योंकि अब अभिव्यक्त करने जैसा कुछ भी नहीं है ।इससे आगे बढ़ने पर साधक निर्विचार, निर्विकल्प समाधि की ओर गति करता है। जहां पर मन ,बुद्धि ,अहंकार आदि क्रियाहीन हो जाते हैं । मन के क्रिया हीन होने से समस्त इंद्रियां अपने अपने कार्य करना बंद कर देती है ।जिससे इनके समस्त कार्य अवरुद्ध हो जाते हैं ।निर्विचार ,निर्विकल्प या असंप्रज्ञात समाधि में स्थित हो जाना ब्रह्म में पूर्ण स्थिति को प्राप्त कर लेना है । जहां पर सिर्फ और सिर्फ उस ब्रह्म के सिवा कुछ भी शेष नहीं रहता । इस स्थिति में स्थित होने वाला साधक  माया के संपूर्ण आवरण को हमेशा हमेशा के लिए मिटा देता है और पूर्ण ब्रह्म परमात्मा में लीन होकर  मुक्त हो जाता है -हमेशा हमेशा के लिए।
                      -- रामेश्वर हिंदू
      ⚜🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜
🌞 अखिल विश्व गायत्री परिवार अकलेरा
     ⚜🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜

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बुधवार, 8 सितंबर 2021

नाभि तक गहरी श्वास ले ये अतिआवश्यक है।गहरी सांसों से गुपचुप हो जाते हैं 7 बड़े बदलाव

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सांस ही प्राण है। इसलिए हमारे यहां ऑक्सीजन को भी प्राणवायु कहा गया है। यही वजह है कि सदियों से हमारी संस्कृति और रोजमर्रा के जीवन में प्राणायाम को प्रभावी माना गया है। नए दौर में विदेशी भी मानने लगे हैं कि यदि हमें अच्छा स्वास्थ्य और जीवन चाहिए तो अपनी हर एक सांस पर ध्यान देना होगा। अपनी आने-जाने वाली संास पर ध्यान देने से न सिर्फ हम शारीरिक बल्कि मानसिक विकारों से भी दूर रह सकते हैं। सांस हमारे तनाव, बेचैनी और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर सकती है। अच्छी सांस तन और मन में सात आश्चर्यजनक बदलाव ला सकती है लेकिन इसके लिए अभ्यास की जरूरत है।

दिमागी क्षमता में वृद्धि

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार मेडिटेशन से हमारे मस्तिष्क का आकार विस्तार लेता है (कार्टेक्स हिस्से की मोटाई बढऩे लगती है)। इससे मस्तिष्क की तार्किक क्षमता में बढ़ोतरी होती है। सोने के बाद गहरी सांस लेने का अभ्यास दिमागी क्षमता को बढ़ाता है।

 

दिल की धडक़न में सुधार

मेडिकल साइंस की रिसर्च में यह पाया गया कि दिल की दो धडक़नों के बीच अंतर होता है जिसे लो हार्ट रेट वैरिएबिलिटी के नाम से जाना जाता है। ऐसे में दिल के दौरा का अंदेशा बहुत ज्यादा होता है। गहरी सांस वाले प्राणायाम के जरिए इस स्थिति को सुधारा जा सकता है।

 

तनाव में कमी, मन को शांति

कमजोर सांस तनाव की स्थिति में शरीर को लडऩे की पूरी ताकत नहीं देती। लेकिन यदि केवल सांसों पर ध्यान लगाएं तो मन की आकुलता घटती है। गहरी सांस से नर्वस सिस्टम उत्तेजना, प्रेरणा वाली पैरा सिम्पेथेटिक स्थिति में चला जाता है, जो मन को आराम, सुकून की स्थिति होती है।

 

नकारात्मकता से मुक्ति

अधिकांश लोग जब पीड़ा या तनाव में होते हैं तो उनकी सांसे उखड़ी रहती हैं। यह हमारे शरीर की कुदरती प्रतिक्रिया होती है। अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करने के किसी भी व्यायाम से बेचैनी, अवसाद, गुस्से और घृणा से भरे नकारात्मक विचारों को दूर करने में मदद मिलती है।

चुनौती की घड़ी में संयम

विदेशी पत्रिका ‘टीचिंग एंड लर्निंग’ में प्रकाशित एक स्टडी में बताया गया कि जो बच्चे अपनी परीक्षा से पहले गहरी सांस लेना सीख जाते हैं उनका ध्यान बढ़ता है और याद किए पाठ को दोहराने की योग्यता में सुधार होता है।

ब्लड प्रेशर पर काबू

हर रोज महज कुछ मिनटों के लिए गहरी सांस लेने और छोडऩे का अभ्यास काफी हद तक आपके ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर सकता है। गहरी सांस लेने से शरीर शांत स्थिति में आता है। ऐसा होने पर इससे रक्त वाहिनियों को अस्थायी रूप से खून को पूरे शरीर में नियंत्रित दबाव के साथ पहुंचाने में मदद मिलती है।

जीन में सकारात्मक बदलाव

यह सबसे बड़ा और बेहद महत्वपूर्ण बदलाव है जो सचमुच इस तरह होता है कि हमें पता ही नहीं चलता। संभवत: इसके अच्छे परिणाम हमें हमारी आने वाली पीढिय़ों में नजर आते हैं। योगा, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से सांसों की गति को नियंत्रित करने से हमारी जेनेटिक संरचना में प्रभावी बदलाव होते हैं। इसमें केवल तन ही नहीं बल्कि मन के स्तर पर भी परिवर्तन होते हैं। इससे हमारे अच्छे जीन ज्यादा संवेदनशील बनते हैं।

 

भारतीय मनीषियों के कथन

सांस भावों से जुड़ी है। भाव को बदलो, सांस बदल जाएगी। क्रोध आए लेकिन अपनी सांस को डोलने मत देना। ऐसे समय में सांस को स्थिर रखना और शांत रहना। रजनीश ओशो, दार्शनिक

प्राणायाम फेफड़ों को स्वस्थ रखने वाला, रक्त को शुद्ध, शरीर के अंग-प्रत्यंगों को चैतन्यता देने वाला और पाचन शक्ति बनाए रखने वाला है इसलिए यह आरोग्य और दीर्घ जीवन देने वाला भी है। 

आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा, गायत्री परिवार के संस्थापक

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मंगलवार, 7 सितंबर 2021

सनई (Crotalaria juncea) का साग

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सनई (Crotalaria juncea) का साग- सरसो, मिर्च,मेथी,जीरा और आजवाईन के संयोग से बनने वाला यह साग सिर्फ स्वाद में हीं बेमिसाल नहीं है बल्कि सेहत का भी खजाना है। कैल्शियम, फोस्फोरस और फाइबर सनई के फूल में प्रमुख हैं। कैल्शियम और फोस्फोरस हड्डियों और दांतों के निर्माण एवं मजबूती के लिए ज़रूरी होते हैं। ये शरीर में एंज़ाइम्स की क्रियाओं और कई चयापचयी (मेटाबॉलिक) क्रियाओं में भी महत्व रखते हैं। कैल्शियम हृदय कि धड़कन को सामान्य रखने और मांसपेशियों की सामान्य क्रियाशीलता में भी सहायक है। फाइबर मोटापा, मधुमेह और हृदय रोगों की आशंकाओं को कम करता है। फाइबर कब्ज़ और कुछ प्रकार के कैंसर से बचाव और नियंत्रण में भी सहायक है। सनई के फूल में थोड़ी मात्रा में प्रोटीन भी पाया जाता है।

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शिव तत्व

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 परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरूदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

    योग में 'यत्पिण्डे तद्ब्रह्माण्डे' रूप अध्यात्म विज्ञान को इन शब्दों में पूर्णतया 'शिवत्व' के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है--

यस्मिन्दर्पणबिम्बजम्भितपुरी।
भातं यत्परसंविदो यत् इदं रूपयादिवल्लीयते।।
यस्याज्ञानविजृम्भिता परभिदावारीन्दु भेदादिवत।
तं भूमानमुपास्महे हृदि सदा वाघारघानिम् शिवम्।।

    अर्थात्--भगवान् ने मनुष्य के साढ़े तीन हाथ के शरीर में भूर्भुवः आदि सप्त लोकों तथा सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, पर्वत, सागर, वृक्ष आदि सभी वस्तुओं को बिम्बवत् प्रतिफलित कर दिया है। शिव संहिता के द्वितीय पटल में योगी की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि ब्रह्माण्ड की संज्ञा वाली देह में जिस प्रकार अनेक देशों की व्यवस्था है, उसे पूर्णतया जान लेने वाला ही योगी है--

जानाति यः सर्वमिदं योगी नात्र संशयः।
ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथा देशं व्यवस्थितः।।
   
  योग में मानव शरीर का विभाजन षट्चक्रों के रूप में किया गया है जैसे--मूलाधार चक्र (चतुर्दल पद्य), स्वाधिष्ठान चक्र (षड्दल पद्य), मणिपूरक चक्र (दश दल पद्य),अनाहत चक्र (द्वादश दल पद्य), विशुद्ध चक्र (षोडश दल पद्य) और आज्ञाचक्र (द्विदल पद्य)। इनके स्थान पर आधुनिक शरीर शास्त्र की दृष्टि से क्रमशः -कटि अस्थि (पेल्विक प्लेक्सस), नाभि-उदर प्रदेश (हाइपोगेस्ट्रिक प्लेक्सस), फेफड़े (ऐपेगेस्टिव प्लेक्सस, ह्रदय और यकृत (कार्डियक प्लेक्सस), गल प्रदेश (कैरोटिड प्लेक्सस) और भृकुटि मध्य (मेडुला) है। इनके ऊपर सहस्त्रदल अर्थात् मस्तिष्क प्रदेश है। चतुर्दल में पृथ्वी तत्व, षड्दल में जलतत्व, दशदल में अग्नितत्व, द्वादश दल में वायुतत्व और षोडश दल में आकाश तत्व की प्रधानता है। इसका तात्पर्य यह है कि शरीर-रथ के सञ्चालन के लिए उक्त तत्वों का उक्त स्थानों पर विशेष रूप से निर्माण हो रहा है। दल से तात्पर्य उन उन स्थानों पर नाड़ियों के गुच्छ रूप से है। इन तत्वों के बीजाक्षर तंत्र शास्त्रोक्त लं (पृथ्वी), वं (जल), रं (अग्नि), यं (वायु) और टम (आकाश) है। ये बीजाक्षर उन ध्वनियों के अनुकरण पर है जो उन तत्वों के निर्माण के समय शरीर में उन-उन स्थानों पर गूंजती रहती हैं। इन ध्वनियों को सूक्ष्म ध्वनिग्राही यंत्रों से सुना जा सकता है। शरीर जो अन्न ग्रहण करता है, उससे निःसृत होने वाले पंचतत्व निर्दिष्ट स्थानों में संग्रहीत होते हैं। तंत्रशास्त्र में बीजों के वाहन इस प्रकार निर्दिष्ट हैं--लं (ऐरावत हाथी), वं (मकर), टम (मेष), यं (मृग)। वायु भिन्न-भिन्न तत्वों से मिलकर जिस प्रकार की गति उत्पन्न करता है, यहाँ उसी का निर्देशन किया गया है। दलों के वर्ण (रंग) इस प्रकार हैं--चतुर्दल (रक्तवर्ण), षड् दल (गुलाबी), दशदल (नीलवर्ण), द्वादश दल (लाल वर्ण) और षोडश दल (धूम्र वर्ण) रुधिर के अरुणवर्ण पर भिन्न-भिन्न तत्वों का प्रतिबिम्ब पड़ने से उसका जो रंग होता है, उसे ही यहाँ निर्दिष्ट किया है। शरीर में भिन्न-भिन्न नाड़ियां वायु की मदद से जिस आकार में चक्कर कटतीं हैं, वे ही इन दलों के विशिष्ट यंत्र हैं। जैसे--चतुरस्त (चतुर्दल) अर्धचंद्राकार (षड् दल), त्रिकोणाकार (दशदल) और लिंगाकार (द्विदल)।
      द्विदल (भ्रूमध्य) में ॐ प्रणव बीज है। सहस्त्र दल में शून्य तत्व है। विसर्ग (:) ह्रीं उसका बीज है। एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने कहा था कि ब्रह्माण्ड को देखने से लगता है जैसे उसके पीछे किसी का विराट मस्तिष्क हो। यही ब्रह्माण्ड का 'सहस्त्रार' है जो मानव मस्तिष्क में निहित है। शून्य अर्थात् 'बिन्दुतत्व' से ही विसर्ग (:) अर्थात् सृष्टि हुई--तंत्रशास्त्र की यही अन्तिम निष्पत्ति है।

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रविवार, 5 सितंबर 2021

चतुर्थ आयाम:

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                      भाग--05
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

        दरवाजा खुलने के बाद मैंने एक युवती को बाहर उतरते हुए देखा। मेरे युवती कहने से जो आपके मन में कल्पना उभरेगी, वैसी नहीं थी वह युवती। उन व्यक्तियों की तरह वह भी विचित्र थी। वह काफी लंबी-चौड़ी कद-काठी की थी। उसका सिर काफी बड़ा था और उस पर घने बाल थे जिनका रंग लाल था। शरीर का भी रंग हल्का गुलाबी था। कमर के नीचे वह सिर्फ एक घाघरा पहने थी। ऊपर का हिस्सा बिलकुल बेपर्दा था। उसके गले में एक कैमरे जैसा डिब्बा लटका हुआ था जिसमें से काफी तीव्र नीले रंग की रौशनी निकल रही थी। युवती ने यान के बाहर निकल कर एक बार चारों और अपना सिर घुमाया। फिर भुवन बाबू की ओर आश्चर्य और कौतूहल से देखने लगी। उसके बाद उसने कैमरे जैसा वह डिब्बा उनकी ओर कर दिया। भुवन बाबू के पूरे शरीर पर वह तीव्र रौशनी पड़ने लगी। कुछ ही मिनट बाद मैंने जो दृश्य देखा उससे मेरा मन भय और आश्चर्य से भर गया। सारा शरीर रोमांचित हो उठा।
       उस नीली रौशनी के प्रभाव से भुवन बाबू का छः फुटा शरीर धीरे-धीरे जन्मजात शिशु के रूप में बदल गया। अर्थात् वे तत्काल पैदा हुए शिशु जैसे हो गए। फिर उस युवती ने मुस्कराते हुए उन्हें अपनी गोद में उठा कर एक पारदर्शी जार में रख कर बंद कर दिया और अपने साथियों के साथ अपने यान के अंदर चली गई। मुझे सारी बात समझते देर न लगी। निश्चय ही वह युवती भुवन बाबू को अपने लोक में ले जा कर किसी तरीके से बड़ा कर लेगी। फिर...आगे क्या होगा..?
       जब मैं इस विषय में विचार कर रहा था तो उस बंजर, बीरान जमीन  के दायरे में फैला हुआ वह रुपहला प्रकाश एकबारगी घने कोहरे की शक्ल में बदल गया, बाद में वह भी धीरे-धीरे गायब हो गया। अब वहां कुछ भी न था। न वे विचित्र प्राणी थे, न उनका यान था और न भुवन बाबू का ही कोई अस्तित्व था। उस समय मेरी हालत का आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। यह गनीमत समझें कि मैं पागल नहीं हुआ। कई दिनों तक घर से बाहर नहीं निकला। मुझे इस बात का पूर्ण विश्वास था कि वे लोग निश्चित ही किसी अन्य ग्रह-नक्षत्र के प्राणी थे। अब भुवन बाबू का इस धरती पर लौटना मुश्किल ही नहीं, ना-मुमकिन था।
       जबसे भुवन बाबू अदृश्य हुए, उसी दिन से उनकी खोज होने लगी। लोगों ने मुझसे पूछा लेकिन मैंने साफ इनकार कर दिया कि मैं इस सम्बन्ध में कुछ जानता हूँ। मगर भुवन बाबू के बड़े भाई को मुझे सब कुछ बता देना पड़ा क्योंकि उनको मुझ पर शक हो रहा था कि कहीं मैंने ही तो भुवन बाबू का कहीं अनिष्ट नहीं किया है ? उनके भाई शरद बाबू  बड़े ध्यान से मेरी बात सुन रहे थे मगर मुझे साफ लग रहा था कि उन्हें मेरी बातों पर रत्तीभर विश्वास नहीं हो रहा था। मेरी बातों पर यकीन करने के लिए आश्विन की शरद पूर्णिमा की रात में शरद बाबू स्वयं अकेले उस स्थान पर गए। मगर वे भी आज तक नहीं लौटे। निश्चय ही शरद बाबू को भी अंतरिक्ष के वे विचित्र प्राणी ही उठा ले गए होंगे और अब उनका भी लौटना मेरे ख्याल से असंभव ही है। कितनी आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय घटना है यह ! हे भगवान ! किसके सामने प्रकट करूँ दोनों भाइयों के गायब होने का रहस्य ? भला कौन विश्वास करेगा मेरी बातों पर ? क्या करुं ? आखिर इसी उलझन में फंसा हुआ मैं चार आयाम से सम्बंधित साहित्य की खोज में लग गया। काफी तलाश करने पर मुझे भुवन बाबू की एक अलमारी के अंदर ही चमड़े की जिल्द में बंधी हुई एक अति प्राचीन हस्त लिखित पुस्तक मिली। उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा। कई महत्वपूर्ण बातों की जानकारी मुझे प्राप्त हुई।
       अपने इस तीन आयाम वाले संसार में हर चीज़ देश, स्पेस, काल, टाइम और निमित्त से बन्धी हुई है। संसार का 'स्पेस' वर्क अर्थात् 'कर्न्ड' है । उस मूल्यवान पुस्तक में पंक्तियाँ पढ़ने के बाद एकाएक मेरे मस्तिष्क में कुछ कोंध-सा गया। योग विज्ञान में इस तथ्य की विस्तृत विवेचना है। हमारी आँखों के दोनों मूल बिन्दु नाक के सिरे पर मिलते हैं और एक त्रिकोण का निर्माण करते हैं। त्रिकोण के अर्धबिन्दु से जहाँ 90 अंश का कोण बनता है, वह 'स्पेस' 'कर्न्ड' ही हैै। अब इसी सिद्धान्त को लेकर वैज्ञानिक गणितीय रीति से सूक्ष्म जगत में प्रवेश करने जा रहे हैं। योग में इसके लिए 'जवा-सिद्धि' है। मैंने इस सिद्धि का कई दिनों अभ्यास किया और अंत में मुझे सफलता मिली। बाद में थोड़े से प्रयास से ही मैं 'वक्रताहीन स्पेस' में पहुँच गया जहाँ केवल वर्तमान-ही-वर्तमान है।  न भूत काल है और न भविष्य काल। उस वर्तमान में मुझे केवल शून्यता का गहन अनुभव हुआ। वह शून्य अथाह और अंतहीन था। उसमें काल की गति अत्यंत क्षीण थी। निश्चय ही योगीगण इसी अवस्था में पहुँच कर 'कालंजयी' हो जाते हैं। देश, काल का प्रभाव उन पर नहीं पड़ता है। मैं उस 'परमशून्य' की स्थिति में कब तक रहा--किसे ज्ञात है ? समय का अभाव नहीं था वहां यदि मन बिलकुल शांत व एकाग्र हो तो मनुष्य को समय का आभास बिलकुल नहीं लग सकता। यही स्थिति मेरी थी और जब मैं उस स्थिति से बाहर निकला तो मालूम हुआ कि छः दिन का समय बीत चुका है।
       तभी से मैं बराबर उस 'परम शून्य' की स्थिति में अधिक से अधिक रहने का अभ्यास कर रहा हूँ। मगर डर है कि कहीं मेरा भी अस्तित्व हमेशा-हमेशा के लिए लुप्त न हो जाये और भुवन बाबू की तरह मुझे भी रहस्यमय लोक के रहस्यमय प्राणी अपने साथ न ले जाएँ।

    --:अन्तर्ध्यान विज्ञान की कसौटी पर:--      ******************************

       वैज्ञानिकों ने स्थान के तीन आयामों (लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई) के आलावा 'काल' को चौथे आयाम के रूप में स्वीकार किया है। आईन्स्टीन के 'सापेक्षवाद' के सिद्धान्त के अनुसार भौतिक जगत एक 'संयुक्त चतुरविस्तारीय दिक्-काल जगत' है जिसमें घटनाओं के बीच केवल एक ही अपरिवर्तनीय अंतर होता है और देश तथा काल में जो अलग-अलग अंतर दिखाई पड़ते हैं, वे वास्तव में  इसी अंतर के प्रक्षेप मात्र हैं। 'देश-अक्ष' और 'काल-अक्ष' पर, दूसरे शब्दों में उनका मान निर्भर करता है उस विशेष 'निर्देशांक पद्धति' पर जिसके द्वारा उन्हें देखा जाय। देश और काल की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होती और उसके परिणाम के बारे में बनने वाली धारणाएं देखने वाले की गति और स्थिति पर निर्भर करती है।
       इस सन्दर्भ में  आप उन अभागे व्यक्तियों के मामलों को समझने की कोशिश कीजिये जो देश और काल (space and time) के गड्ढों में पड़कर अदृश्य हो जाते हैं या फिर ऐसे किसी आयाम में पहुँच जाते हैं जहाँ का जीवन हमारे जीवन से सर्वथा भिन्न है।
       1957 में कैलिफोर्निया के डॉक्टर रॉबर्ट सिरगी और उनके सहयोगियों ने एक ऐसे कंप्यूटर का निर्माण करने का संकल्प किया था जो चौथे आयाम के स्वभाव और स्वरुप को समझाने में सहायक हो सके। उस अवसर पर डा. सिरगी ने कहा था--
       हमारे बाहर जो जगत है, यहाँ गतियां उन दिशाओं में भी हो सकती हैं जिन्हें हम देख नहीं सकते। पर जिन्हें काल परिवर्तन के रूप में ही हम जान सकते हैं। आदमी के सारे वैज्ञानिक नियम हमारे चारों ओर के  वास्तविक जगत की त्रि-आयामी छाया मात्र है। इन खण्ड और एकांगी नियमों के बल पर इस वास्तविक जगत के कार्य-कलापों को समझना कठिन है।
       आप रोज धूप को देखते हैं पर वैज्ञानिकों से पूछिये तो वे कहेंगे कि धूप को कोई कभी भी नहीं देख सकता। उनकी भाषा में धूप सारे सौरमंडल की वर्णक्रम
(सोलर स्पेक्ट्रम) है जो वास्तव में सूर्य द्वारा अंतरिक्ष में की गयी तरंगों और स्फुरणों की बौछार की विस्तृत पट्टी है। यदि इस विस्तृत पट्टी को एक सप्तक मान लिया जाय तो इस पट्टी के जो रंग हमें आँखों से दिखाई देते हैं--लाल से लेकर बैगनी तक, उन्हें सप्तक के अंतर के बीच का एक स्वरानुक्रम माना जा सकता है। अर्थात् धूप में ऐसे रंग भी मौजूद हैं जो हमे आँखों से कभी दिखाई नहीं देते। ऐसे रंगों की संख्या10 अरब के करीब है। हम तो केवल सात रंग ही देख पाते हैं धूप के।
        धूप में 'इंफ्रा-रेड तरंगें' भी होती हैं जिन्हें हम देख तो नहीं सकते पर अनुभव तो कर सकते हैं। धूप की जलन हमें इन्हीं तरंगों के कारण अनुभव होती है। अब विशेष फोटोग्राफिक फिल्मों की मदद से इंफ्रा-रेड के संसार की झांकी ली जा सकती है। उस दुनियां में आकाश ,जल काले और घास तथा पत्तियां एकदम सफ़ेद दिखाई देती हैं।
       चूँकि इंफ्रा-रेड तरंगें दूरी के धुन्धलेपन को आसानी से काट सकती हैं, इसलिए उनका प्रयोग हवाई फोटोग्राफी में किया जाता है। पर जब इंफ्रा-रेड तरंगों की मदद से आकाश से क्यूबा में रखे प्रक्षेपास्त्रों के फोटो खींचे गए तो सिगरेटों के जलते हुए सिरों के फोटो भी आये। वे सिगरेटें जो प्रक्षेपास्त्रों के इंजीनियरों ने पिछली रात को पी थीं।
       हमारी आंखें वर्णक्रम की बहुत थोड़ी मात्रा ही देख पाती हैं। अनुवीक्षण यंत्र की मदद से हम अदृश्य जीवाणुओं की दुनियां की गतिविधि स्पष्ट देख सकते हैं। दुरबीन की मदद से हम अत्यंत दुरी पर स्थित नीहारिकाओं के दर्शन कर सकते हैं। इंफ्रा-रेड और 'अल्ट्रा-वायलेट' फोटोग्राफी की मदद से हम एक ऐसे अदृश्य जगत में पहुँच जाते हैं जो देश और काल की कक्षा से बाहर स्थित है। इस अदृश्य जगत की और अधिक जानकारी अनेक रहस्यों को जिनमें अदृश्यता का रहस्य भी है, समझाने में सहायक होगी।
       सैद्धांतिक रूप से धूप की अदृश्य तरंगें हमारे शरीर, हमारे जीवन और यहांतक कि हमारी नियति को भी प्रभावित करती है ।
'प्रोपेगेशन ऑफ़ शार्ट रेडियो वेव्ज़' नामक अपने शोध प्रबंध में हर्बर्ट गोल्ड स्टीन ने लिखा है कि वायुमंडल में जो दुनियां है वह अदृश्य प्राणियों की दुनियां है। वे प्राणी जो हमें नंगी आँखों से तथा सूक्ष्माति सूक्ष्म अनुवीक्षण यंत्रों की सहायता से भी नहीं दिखाई देते। उनकी वैज्ञानिक व्याख्या के लिए शोध होना आवश्यक है।

       हम और आप इस विवरण को पढ़ कर आसानी से यह अनुमान लगा सकते हैं कि वह परम तत्व परमात्मा कितना सूक्ष्म और कितना विस्तृत और कितना शक्तिशाली होगा जिसके अस्तित्व के भीतर ऐसे न जाने कितने ब्रह्याण्ड और उनके रहस्य विद्यमान हैं। मनुष्य जो ब्रह्माण्ड की सर्वश्रेष्ठ कृति है, उसके सामने मक्खी-मच्छर के बराबर भी नहीं है। 10 अरब रंगों की तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता जो सूर्य की रश्मियों में से प्रकट होते हैं, गणना तो असंभव ही है। इन सब बातों को पढ़ कर लिखने वाले को झूठा कहते और उसकी बातों को यूँ ही हवा में उड़ाते देर नहीं लगेगी। गीता में भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप के दर्शन को विश्व का बहुसंख्य वर्ग आज भी कपोल कल्पना या अतिशयोक्ति मानता है। स्वयं स्वामी दयानंद भी केवल कल्पना मानते हैं पर सोचने- विचारने की बात है कि हमारे आसपास के वातावरण में करोड़ों प्रकार के ऐसे जीव मौजूद हैं जिन्हें हम किसी प्रकार से नहीं देख सकते तो उस परमात्मा को इन नंगी आँखों या किसी यंत्र से कैसे देख सकते हैं ? धन्य है वह अर्जुन और उसका सामर्थ्य, वंदनीय है वह कि जिसने भगवान के उस विराट स्वरुप को देखा और विराटता तथा तेज को वह सहन कर गया!!!

                 --समाप्त--

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रविवार, 22 अगस्त 2021

श्रीकृष्ण हैं बायोटेक्नोलाॅजी के असली जनक

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स्कूल कॉलेजों में हमें यही सिखाया जाता है कि बायोटेक्नॉलाजी को विदेशी वैज्ञानिकों ने खोजा, लेकिन असल में बायोटेक्नोलाॅजी के असली जनक हमारे कान्हा यानि भगवान श्रीकृष्ण थे।  जार्ज मेंडल, वाट्सन और क्रिक नहीं । 

ये सिद्धांत करीब 5000 साल पहले भगवान श्रीकृष्ण ने दिए थे। गीता के कई श्लोकों में इस बात का जिक्र है, जिससे साबित होता है कि बायोटेक के जनक कष्ण थे। गीता के श्लोक बायोटेक के सिद्धांतों को खुद में समेटे हुए हैं। गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक ग्रंथ भी है।

 कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान वैज्ञानिक नजरिए पर आधारित था। इसी ज्ञान आधार पर आज कई वैज्ञानिक अवधारणाओं का जन्म हुआ है। श्रीमद् भागवत गीता के सात श्लोकों में जीवन की उत्पत्ति का पूरा सार मौजूद है।इन्ही श्लोकों के द्वारा कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में ही मानव की उत्पत्ति का विज्ञान दे दिया था।
सामवेद के तीसरे अध्याय के 10वें खंड में पहला व नौवां श्लोक इन पांच तत्व (एटीजीसीयू) की पुष्टि करता है। यानी जीव आत्मा अणु और परमाणु से बनी है। नौवें श्लोक में ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण अणु और परमाणु के रूप में किया है। 

ये हैं गीता के वे सात श्लोक

मय्यासक्तामना: पार्थ योग युजजन्मदाश्रय:।
असंशय समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।

इस श्लोक में शरीर की आंतरिक ऊर्जा के आधार के बारे में बताया गया है। जिसे वैज्ञानिक भाषा में माइटोकोंड्रिया कहते हैं, जिसका अध्ययन सेल बॉयोलॉजी में करते हैं। यही शरीर में ऊर्जा पैदा करने वाला एडीनोसिन ट्राई फॉस्फेट पैदा करता है।

ज्ञानं तेहं सविज्ञामिदं वक्ष्याम्यशेषत:।
यज्ञात्वा नेह भूयोन्यज ज्ञातव्यमविशष्यते।।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया को बताया। पृथ्वी पर निर्जीव से जीव की उत्पत्ति के बारे में जानकारी दी और बताया कि वह कौन से कण थे, जिनसे शरीर का निर्माण हुआ।

मनुष्याणां सहस्त्रेषु कशिचद्यतति सद्धिये।
यततामिप सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वत:।।

तीसरे श्लोक में तत्व ज्ञान को विस्तार से समझाया। आत्मा और मोक्ष पर विस्तार से जानकारी दी। यह भी बताया कि तत्व ज्ञान समझना ही दुष्कर है। इसे जिसने समझ लिया, उसे कुछ और जानने की जरूरत नहीं।

भूमिरापोनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टयां।।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रर्कृंत विद्वि में पराम।
जीवभूतां महाबाहों ययेदं धार्यते जगत्।।

चौथे और पांचवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कई ऐसी बातें कही हैं जिससे सिद्ध होता है कि लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने गुणसूत्र के बारे में भी जानकारी दी थी।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा।

मत्त परतरं नान्यत् किचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। 

छठे और सातवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने उत्पत्ति का आधार आठ तत्वों को बताया। अर्जुन को बताया कि मृत्यु शरीर की होती है, शरीर के अंदर मौजूद तत्वों की नहीं, जिसे आत्मा कहते हैं। 

1940 में वैज्ञानिक एरविन चार्जफ ने कहा था कि डीएनए कभी नहीं बदलता है। चाहे किसी भी रूप में मृत्यु हो, जबकि यही बात गीता में श्रीकृष्ण ने बहुत पहले ही बता दी थी।  

डीएनए- सूत्र का सूत्र में मनियों की तरह गुथा होना (एटीजीसीयू) है। श्रीकृष्ण के अनुसार सूत्र में सूत्र के मनियों के सदृश मुझमें गुथा हुआ है। यानी जीव में विद्यमान है। यह श्लोक डीएनए को ही परिभाषित करता है। श्रीकृष्ण के इसी वाक्य को अगर हम बॉयोकेमेस्ट्री की किसी भी पुस्तक में देखें, तो वहां स्ट्रिंग्स ऑन द रॉल्स इंग्लिश में पढ़ते हैं। इसके अलावा यूएसए की बॉयोकेमेस्ट्री की किताब लेनिनजर में भी यही बताया गया है। 

श्रीकृष्ण ने डीएनए की रासायनिक प्रकृति को मणि रुप में समझाया है। मणि रूप का मतलब डीएनए जो कि केमिकल थ्रेड (धागों) से मिलकर बना है। यहां धागों का मतलब बॉडिंग से है कि किस तरह से निर्जीव पदार्थ आपस में जुड़कर जीवन का निर्माण करते हैं।

आज बस इतना ही .....

अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन

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