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बुधवार, 22 सितंबर 2021

ध्यान के प्रकार

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आपने आसन और प्राणायाम के प्रकार जाने हैं, लेकिन ध्यान के प्रकार बहुत कम लोग ही जानते हैं। निश्चित ही ध्यान को प्रत्येक व्यक्ति की मनोदशा के अनुसार ढाला गया है।

मूलत: ध्यान को चार भागों में बांटा जा सकता है– 1.देखना, 2.सुनना, 3.श्वास लेना और 4.आंखें बंदकर मौन होकर सोच पर ध्‍यान देना। देखने को दृष्टा या साक्षी ध्यान, सुनने को श्रवण ध्यान, श्वास लेने को प्राणायाम ध्यान और आंखें बंदकर सोच पर ध्यान देने को भृकुटी ध्यान कह सकते हैं। उक्त चार तरह के ध्यान के हजारों उप प्रकार हो सकते हैं।

उक्त चारों तरह का ध्यान आप लेटकर, बैठकर, खड़े रहकर और चलते-चलते भी कर सकते हैं। उक्त तरीकों को में ही ढलकर योग और हिन्दू धर्म में ध्यान के हजारों प्रकार बताएं गए हैं जो प्रत्येक व्यक्ति की मनोदशा अनुसार हैं। भगवान शंकर ने मां पार्वती को ध्यान के 112 प्रकार बताए थे जो ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ में संग्रहित हैं।

देखना : ऐसे लाखों लोग हैं जो देखकर ही सिद्धि तथा मोक्ष के मार्ग चले गए। इसे दृष्टा भाव या साक्षी भाव में ठहरना कहते हैं। आप देखते जरूर हैं, लेकिन वर्तमान में नहीं देख पाते हैं। आपके ढेर सारे विचार, तनाव और कल्पना आपको वर्तमान से काटकर रखते हैं। बोधपूर्वक अर्थात होशपूर्वक वर्तमान को देखना और समझना (सोचना नहीं) ही साक्षी या दृष्टा ध्यान है।

सुनना : सुनकर श्रवण बनने वाले बहुत है। कहते हैं कि सुनकर ही सुन्नत नसीब हुई। सुनना बहुत कठीन है। सुने ध्यान पूर्वक पास और दूर से आने वाली आवाजें। आंख और कान बंदकर सुने भीतर से उत्पन्न होने वाली आवाजें। जब यह सुनना गहरा होता जाता है तब धीरे-धीरे सुनाई देने लगता है- नाद। अर्थात ॐ का स्वर।

श्वास पर ध्यान : बंद आंखों से भीतर और बाहर गहरी सांस लें, बलपूर्वक दबाब डाले बिना यथासंभव गहरी सांस लें, आती-जाती सांस के प्रति होशपूर्ण और सजग रहे। बस यही प्राणायाम ध्यान की सरलतम और प्राथमिक विधि है।

भृकुटी ध्यान : आंखें बंद करके दोनों भोओं के बीच स्थित भृकुटी पर ध्यान लगाकर पूर्णत: बाहर और भीतर से मौन रहकर भीतरी शांति का अनुभव करना। होशपूर्वक अंधकार को देखते रहना ही भृकुटी ध्यान है। कुछ दिनों बाद इसी अंधकार में से ज्योति का प्रकटन होता है। पहले काली, फिर पीली और बाद में सफेद होती हुई नीली।

अब हम ध्यान के पारंपरिक प्रकार की बात करते हैं। यह ध्यान तीन प्रकार का होता है- 1.स्थूल ध्यान, 2.ज्योतिर्ध्यान और 3.सूक्ष्म ध्यान।

1.स्थूल ध्यान- स्थूल चीजों के ध्यान को स्थूल ध्यान कहते हैं- जैसे सिद्धासन में बैठकर आंख बंदकर किसी देवता, मूर्ति, प्रकृति या शरीर के भीतर स्थित हृदय चक्र पर ध्यान देना ही स्थूल ध्यान है। इस ध्यान में कल्पना का महत्व है।

2.ज्योतिर्ध्यान– मूलाधार और लिंगमूल के मध्य स्थान में कुंडलिनी सर्पाकार में स्थित है। इस स्थान पर ज्योतिरूप ब्रह्म का ध्यान करना ही ज्योतिर्ध्यान है।

3.सूक्ष्म ध्यान– साधक सांभवी मुद्रा का अनुष्ठान करते हुए कुंडलिनी का ध्यान करे, इस प्रकार के ध्यान को सूक्ष्म ध्यान कहते हैं।

ध्यान के चमत्कारिक अनुभव
ध्यान के अनुभव निराले हैं। जब मन मरता है तो वह खुद को बचाने के लिए पूरे प्रयास करता है। जब विचार बंद होने लगते हैं तो मस्तिष्क ढेर सारे विचारों को प्रस्तुत करने लगता है। जो लोग ध्यान के साथ सतत ईमानदारी से रहते हैं वह मन और मस्तिष्क के बहकावे में नहीं आते हैं, लेकिन जो बहकावे में आ जाते हैं वह कभी ध्यानी नहीं बन सकते।

प्रत्येक ध्यानी को ध्यान के अलग-अलग अनुभव होते हैं। यह उसकी शारीरिक रचना और मानसिक बनावट पर निर्भर करता है कि उसे शुरुआत में क‍िस तरह के अनुभव होंगे। लेकिन ध्यान के एक निश्चित स्तर पर जाने के बाद सभी के अनुभव लगभग समान होने लगते हैं।

शुरुआती अनुभव : शुरुआत में ध्यान करने वालों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं। पहले भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर अंधेरा दिखाई देने लगता है। अंधेरे में कहीं नीला और फिर कहीं पीला रंग दिखाई देने लगता है।

यह गोलाकार में दिखाई देने वाले रंग हमारे द्वारा देखे गए दृष्य जगत का रिफ्‍लेक्शन भी हो सकते हैं और हमारे शरीर और मन की हलचल से निर्मित ऊर्जा भी। गोले के भीतर गोले चलते रहते हैं जो कुछ देर दिखाई देने के बाद अदृश्य हो जाते हैं और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है। यह क्रम चलता रहता है।

कुछ ज्ञानीजन मानते हैं कि नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं जीवात्मा का रंग है। नीले रंग के रूप में जीवात्मा ही दिखाई पड़ती है। पीला रंग जीवात्मा का प्रकाश है। इस प्रकार के गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत होने का लक्षण भी माना जाता है।

इसका लाभ : कुछ दिनों बाद इसका पहला लाभ यह मिलता है कि व्यक्ति के मन और मस्तिष्क से तनाव और चिंता हट जाती है और वह शांति का अनुभव करता है। इसके साथ ही मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे वह असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेता है। ऐसा व्यक्ति भूत और भविष्य की कल्पनाओं में नहीं जिता।

दूसरा लाभ यह कि लगातार भृकुटी पर ध्यान लगाते रहने से कुछ माह बाद व्यक्ति को भूत, भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्ष दीखने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति को भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि उसकी छटी इंद्री जाग्रत होने लगी है और अब उसे ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। यदि आगे प्रगति करना है तो ऐसे व्यक्ति को लोगो से अपने संपर्क समाप्त करने की हिदायत दी जाती है, लेकिन जो व्यक्ति इसका दुरुपयोग करता है उसे योगभ्रष्ट कहा जाता है।

कैसे करें ध्यान की तैयारी
यदि आपने ध्यान करने का पक्का मन बना ही लिया है और इसे नियमित करने का संकल्प ले ही लिया है तो फिर आप अब ध्यान की तैयारी करें। इससे कहले हम ‘ध्यान की शुरुआत’ और ‘कैसे करें ध्यना’ पर लिख चुके हैं। नीचे इस संबंध में लिंक देखें। यहां प्रस्तुत है ध्यान की तैयारी के संबंध में सामान्य जानकारी।

बेहतर स्थान : ध्यान की तैयारी से पूर्व आपको ध्यान करने के स्‍थान का चयन करना चाहिए। ऐसा स्थान जहां शांति हो और बाहर का शोरगुल सुनाई न देता हो। साथ ही वह खुला हुआ और हरा-भरा हो। आप ऐसा माहौल अपने एक रूम में भी बना सकते हो।
जरूरी यह है कि आप शोरगुल और दम घोंटू वातावरण से बचे और शांति तथा सकून देने वाले वातारवण में रहे जहां मन भटकता न हो। यदि यह सब नहीं हैं तो ध्यान किसी ऐसे बंद कमरे में भी कर सकते हैं जहां उमस और मच्छर नहीं हो बल्कि ठंडक हो और वातावरण साफ हो। आप मच्छरदारी और एक्झास फेन का स्तेमाल भी कर सकते हैं।

वातावण हो सुगंधित : सुगंधित वातावरण को ध्यान की तैयारी में शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए सुगंध या इत्र का इस्तेमाल कर सकते हैं या थोड़े से गुड़ में घी तथा कपूर मिलाकर कंडे पर जला दें कुछ देर में ही वातावरण ध्यान लायक बन जाएगा।
ध्यान की बैठक : ध्यान के लिए नर्म और मुलायम आसान होना चाहिए जिस पर बैठकर आराम और सूकुन का अनुभव हो। बहुत देर तक बैठे रहने के बाद भी थकान या अकड़न महसूस न हो। इसके लिए भूमि पर नर्म आसन बिछाकर दीवार के सहारे पीठ टिकाकर भी बैठ सकते हैं अथवा पीछे से सहारा देने वाली आराम कुर्सी पर बैठकर भी ध्यान कर सकते हैं।
आसन में बैठने का तरीका ध्यान में काफी महत्व रखता रखता है। ध्यान की क्रिया में हमेशा सीधा तनकर बैठना चाहिए। दोनों पैर एक दूसरे पर क्रास की तरह होना चाहिए या आप सिद्धासन में भी बैठ सकते हैं।

4.समय : ध्यान के लिए एक निश्चित समय बना लेना चाहिए इससे कुछ दिनों के अभ्यास से यह दैनिक क्रिया में शामिल हो जाता है फलत ध्यान लगाना आसान हो जाता है।

सावधानी : ध्यान में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इस क्रिया में किसी प्रकार का तनाव नहीं हो और आपकी आंखें बंद, स्थिर और शांत हों तथा ध्यान भृकुटी पर रखें। खास बात की आप ध्यान में सोएं नहीं बल्कि साक्षी भाव में रहें।

अज्ञात

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शिवलिंग कोई साधारण (मूर्ती) नहीं है पूरा विज्ञान है

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शिवलिंग में विराजते हैं तीनों देव:---
सबसे निचला हिस्सा जो नीचे टिका होता है वह ब्रह्म है, दूसरा बीच का हिस्सा वह भगवान विष्णु का प्रतिरूप और तीसरा शीर्ष सबसे ऊपर जिसकी पूजा की जाती है वह देवा दी देव महादेव का प्रतीक है, शिवलिंग के जरिए ही त्रिदेव की आराधना हो जाती है तथा अन्य मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग का निचला नाली नुमा भाग माता पार्वती को समर्पित तथा प्रतीक के रूप में पूजनीय है....अर्थात शिवलिंग के जरिए ही त्रिदेव की आराधना हो जाती है। अन्य मान्यता के अनुसार, शिवलिंग का निचला हिस्सा स्त्री और ऊपरी हिस्सा पुरुष का प्रतीक होता है। अर्थता इसमें शिव और शक्ति, एक साथ में वास करते हैं।

▪️ #शिवलिंग_का_अर्थ: 
शास्त्रों के अनुसार 'लिंगम' शब्द 'लिया' और 'गम्य' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ 'शुरुआत' व 'अंत' होता है। तमाम हिंदू धर्म के ग्रंथों में इस बात का वर्णन किया गया है कि शिव जी से ही ब्रह्मांड का प्राकट्य हुआ है और एक दिन सब उन्हीं में ही मिल जाएगा।

▪️ #शिवलिंग_में_विराजते_त्रिदेव: 
हम में लगभग लोग यही जानते हैं कि शिवलिंग में शिव जी का वास है। परंतु क्या आप जानते हैं इसमें तीनों देवताओं का वास है। कहा जाता है शिवलिंग को तीन भागों में बांटा जा सकता है। सबसे निचला हिस्सा जो नीचे टिका होता है, दूसरा बीच का हिस्सा और तीसरा शीर्ष सबसे ऊपर जिसकी पूजा की जाती है।

निचला हिस्सा ब्रह्मा जी ( सृष्टि के रचयिता ), मध्य भाग विष्णु ( सृष्टि के पालनहार ) और ऊपरी भाग भगवान शिव ( सृष्टि के विनाशक ) हैं। अर्थात शिवलिंग के जरिए ही त्रिदेव की आराधना हो जाती है। तो वहीं अन्य मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग का निचला हिस्सा स्त्री और ऊपरी हिस्सा पुरुष का प्रतीक होता है। अर्थता इसमें शिव-शक्ति, एक साथ वास करते हैं।

▪️ #शिवलिंग_की_अंडाकार_संरचना
कहा जाता है शिवलिंग के अंडाकार के पीछे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक, दोनों कारण है। अगर आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो शिव ब्रह्मांड के निर्माण की जड़ हैं। अर्थात शिव ही वो बीज हैं, जिससे पूरा संसार उपजा है। इसलिए कहा जाता है यही कारण है कि शिवलिंग का आकार अंडे जैसा है। वहीं अगर वैज्ञानिक दृष्टि से बात करें तो 'बिग बैंग थ्योरी' कहती है कि ब्रह्मांड का निमार्ण अंडे जैसे छोटे कण से हुआ है। शिवलिंग के आकार को इसी अंडे के साथ जोड़कर देखा जाता है।

🚩🚩🔱🔱🔱 ॐ नम:शिवाय: 🔱🔱🔱🚩🚩

दिनांक - १८.०९.२०२१
---#राज_सिंह---

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मंगलवार, 21 सितंबर 2021

क्या हैआदि शंकराचार्य कृत दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्( Dakshinamurti Stotram) का महत्व

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1-दक्षिणामूर्ति स्तोत्र ;-

02 FACTS;-

दक्षिणा मूर्ति स्तोत्र मुख्य रूप से गुरु की वंदना है। श्रीदक्षिणा मूर्ति परमात्मस्वरूप शंकर जी हैं जो ऋषि मुनियों को उपदेश देने के लिए कैलाश पर्वत पर दक्षिणाभिमुख होकर विराजमान हैं। वहीं से चलती हुई वेदांत ज्ञान की परम्परा आज तक चली आ रही  हैं।व्यास, शुक्र, गौड़पाद, शंकर, सुरेश्वर आदि परम पूजनीय गुरुगण उसी परम्परा की कड़ी हैं। उनकी वंदना में यह स्त्रोत समर्पित है।भगवान् शिव को गुरु स्वरुप में दक्षिणामूर्ति  कहा गया है, दक्षिणामूर्ति ( Dakshinamurti ) अर्थात दक्षिण की ओर मुख किये हुए शिव इस रूप में योग, संगीत और तर्क का ज्ञान प्रदान करते हैं और शास्त्रों की व्याख्या करते हैं। कुछ शास्त्रों के अनुसार, यदि किसी साधक को गुरु की प्राप्ति न हो, तो वह भगवान् दक्षिणामूर्ति को अपना गुरु मान सकता है, कुछ समय बाद उसके योग्य होने पर उसे आत्मज्ञानी गुरु की प्राप्ति होती है। 

2-गुरुवार (बृहस्पतिवार) का दिन किसी भी प्रकार के शैक्षिक आरम्भ के लिए शुभ होता है, इस दिन सर्वप्रथम भगवान् दक्षिणामूर्ति की वंदना करना चाहिए।दक्षिणामूर्ति हिंदू भगवान शिव का एक अंश है जो सभी प्रकार के ज्ञान के गुरु हैं। परमगुरु के प्रति समर्पित भगवान परमाशिव का यह अंश परम जागरूकता, समझ और ज्ञान के रूप में उनका व्यक्तित्व है।यह रूप शिव को योग, संगीत और ज्ञान के शिक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है, और शास्त्रों पर प्रतिपादक देता है। उनकी पूजा इस रूप में की जाती है। ज्ञान के देवता, पूर्ण और पुरस्कृत ध्यान।आदि शंकराचार्य ने बहुत सारे महान स्तोत्र (प्रार्थना) लिखे हैं, लेकिन यहां एक अनोखी प्रार्थना है, जो न केवल एक प्रार्थना है, बल्कि उन सभी दर्शन का सारांश है जो उन्होंने सिखाया है। अपने समय के दौरान भी, इस स्तोत्र को समझना मुश्किल था और उनके एक शिष्य के लिए यह आवश्यक हो गया, सुरेश्वराचार्यो ने इस स्तोत्र को मानसोलासा नामक एक टीका लिखी।

आदि शंकराचार्य का दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्;-

ध्यानम्;- 

मौन व्याख्या प्रकटित परब्रह्म तत्त्वं युवानं। वर्षिष्ठांते वसद् ऋषिगणैः आवृतं ब्रह्मनिष्ठैः ।। 

आचार्येन्द्रं कर कलित चिन्मुद्रमानंद रुपम । स्वात्मारामं मुदित वदनं दक्षिणामूर्ति मीडे ।1। 

जिनकी मौन व्याख्या उनके शिष्यों के हृदय में परम ब्रह्म के ज्ञान को जागृत कर रही है, जो युवा हैं तथापि (फिर भी) ब्रह्म में लीन वृद्ध ऋषियों से घिरे हुए हैं [अर्थात वृद्ध ऋषि जिनके शिष्य हैं], जिन ब्रह्म ज्ञान के सर्वोच्च आचार्य के हाथ चिन्मुद्रा (ऊपर फोटो में देखें) में हैं, जिनकी स्थिर और आनंदमय है, जो स्वयं में आनन्दमय हैं यह उनके मुख से प्रतीत होता है; उन दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।। 

वटविटपि समीपे भूमिभागे निषण्णं। सकल मुनि जनानां ज्ञान दाता रमारात्।। 

त्रिभुवन-गुरुमीशं दक्षिणामूर्ति देवं। जनन मरण दुः खच्छेद दक्षं नमामि ।2। 

 जो वटवृक्ष (बरगद) के नीचे भूमि पर बैठे हैं, जिन ज्ञानदाता के समीप सभी मुनि जन बैठे हैं, जो दक्षिणामूर्ति तीनों लोकों के गुरु हैं, उन जन्म-मरण के दुः ख से भरे चक्र को नष्ट करने वाले देव को नमन करता हूँ ।। 

चित्रं वट तरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा। गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं; शिष्या स्तुच्छिन्न संशयाः ।3। 

वास्तव में यह विचित्र है कि वट वृक्ष की जड़ पर वृद्ध शिष्य (ऋषिगण) अपने युवा गुरु (शिव) के समक्ष बैठे हुए हैं, और गुरु का मौन व्याख्यान उन शिष्यों के संशय (doubts) को दूर कर रहा है।

।। निधये सर्व विद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् । गुरवे सर्व लोकानां दक्षिणामूर्तये नमः ।4। 

जो सभी विद्याओं के निधान (भण्डार) हैं, संसार के सभी रोगों के उपचारक [औषधि] हैं, उन सभी लोकों के गुरु श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।

।। ॐ नमः प्रणवार्थाय शुद्ध ज्ञानैक मूर्तये। निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः ।5। 

ॐ, जो प्रणव (ॐ) और शुद्ध अद्वैत (Non-Dual) ज्ञान के मूर्त-रूप हैं, उन्हें नमस्कार है, निर्मल और शान्ति समाहित (जो शान्ति से परिपूर्ण हो ऐसे) श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।

।। चिद्घनाय महेशाय; वटमूल निवासिने । सच्चिदानन्द रूपाय दक्षिणामूर्तये नमः ।6। 

सघन चेतना के रूप को, महा-ईश्वर (महादेव) को, वटवृक्ष (बरगद) के मूल पर निवास करने वाले, सत-चित-आनंद (Existence, Consciousness, Bliss) के मूर्त रूप को, श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।

।। ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्ति भेद विभागिने । व्योम वद् व्याप्त देहाय; दक्षिणामूर्तये नमः ।7। 

ईश्वर, गुरु, और आत्मन्- इन तीनों विभिन्न रूपों में जो आकाश (आध्यात्मिक आकाश या चिदाकाश) की तरह जो व्याप्त हैं, उन दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।

 स्तोत्रम्;-

 1- विश्वं दर्पण दृश्यमान नगरी ..तुल्यं निजान्तर्गतं। पश्यन्नात्मनि मायया बहिरि वोद्भूतं यथा निद्रया ।। 

यः साक्षात्कुरुते प्रबोध समये स्वात्मान मेवाद्वयं। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।1। 

स्वयं के अंतर्मन में देखने पर सम्पूर्ण विश्व एक दर्पण (mirror) में बसे नगर के समान है, अपने आत्मन के भीतर से देखने पर (नींदनीं के स्वप्न की तरह, माया से बना) यह बाहरी संसार आत्मन की आध्यात्मिक जागृति के समय, स्वयं अद्वैत आत्मन के भीतर साक्षात दिखाई देता है, अपने गहन मौन से इस ज्ञान को जागृत करने वाले उन गुरु रूप श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।। 

NOTE;-

उपर्युक्त श्लोक हमें बताता है कि जो दुनिया हमारे बाहर है वह हमारी आत्मा के समान है लेकिन हम उन्हें अज्ञानता के घूंघट के कारण अलग-अलग संस्थाओं के रूप में देखते हैं। जैसे ही हम जागते हैं, हम महसूस करते हैं कि सपना झूठा है और यहां तक कि दर्पण में हमारी छवि को देखते हुए, हम जानते हैं कि हम हमें दर्पण में नहीं बल्कि हमारी छवि देख रहे हैं। जब हम गुरु से ज्ञान प्राप्त करते हैं तो हम अज्ञान के घूंघट के बिना जाग्रत अवस्था में होते हैं। 

2-बीज अस्याऽन्तरि वाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्ग निर्विकल्पं पुनः । माया कल्पित देशकाल कलना वैचित्र्य चित्रीकृतम् ।। 

मायावीव विजृम्भ यत्यपि महा ..योगी व यः स्वेच्छया। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये ..नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।2। 

यह जगत जो बीज के अन्दर स्थित अंकुर की भांति है, यह माया के द्वारा रचित आकाश (space) और समय से मिलकर बार-बार अनेकों रूपों में जन्म लेता है। वे महायोगी जो एक मायावी की भांति अपनी इच्छा मात्र से इस जगत की गतियों को नियंत्रित करते हैं, मैं अपने गुरु के रूप में उन श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ

 3-यस्यैव स्फुरणं सदात्मकम सत्कल्पार्थकं भासते। साक्षा त्तत्त्वमसीति वेद वचसा.. यो बोध यत्याश्रितान् ।। 

यत्साक्षात्करणा अंद्भवेन्न पुनरावृत्ति र्भवाम्भोनिधौ। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।3। 

जिनका स्पंदन (फड़क, गति) ही सत-चित-आनंद की प्रकृति को दर्शाता है, जिनका वास्तविक रूप एक आभासी (अवास्तविक) रचना लगता है, जो अपने आश्रितों को साक्षात ही तत्-त्वम-असि का वेद वचन सुनाते हैं। जिनका साक्षात ज्ञान प्राप्त कर व्यक्ति फिर कभी जन्म और मृत्यु के समुद्र में नही फंसता, मैं अपने गुरु के रूप में उन श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ।।  

4-नानाच्छिद्र घटोदर-स्थित महादीप-प्रभा भास्वरं। ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरण-द्वारा वहिः स्पन्दते ।। 

जानामीति तमेव भान्तमनु भात्ये तत्समस्तं जगत्। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।4।  

जिस प्रकार कई छिद्रों वाले बर्तन में रखे एक चमकते दीपक की रोशनी उस बर्तन के बाहर से चमकती दिखती है, इसी प्रकार मात्र उसका [आत्मन का, स्वयं का ] ज्ञान हो जाने से मनुष्य की आँखें भी बाहर से चमकती दिखाई देती हैं।  "मैं जानता हूँ" इस रूप में जिस अकेले की प्रभा से समस्त जगत प्रभावान होता है, मैं अपने गुरु के रूप में उन श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ।

5-देहं प्राण अमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः । स्त्री बालान्ध जडोप मास्त्वह मिति भ्रान्ता भृशं वादिनः ।। माया शक्ति विलास कल्पित महा.. व्यामोह संहारिणे। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।5। 

जो लोग देह (शरीर), प्राण, इन्द्रियों, यों प्राचल (गतिमान) बुद्धि या परम शून्य को ही, "मैं" का अर्थ, मानते हैं वे एक भोली लड़की की भांति और अंधे होकर भी अपनी बातों को जोरों से बोलते रहते हैं। माया, शक्ति और विलास से पैदा हुए इस महान व्योम (भ्रान्ति) को नष्ट करने वाले अपने गुरु के रूप में, मैं श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ।। 

6-राहुग्रस्त दिवाकरेन्दु सदृशो.. माया समाच्छादनात्। सन्मात्रः करणोप संहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् ।। 

प्राग स्वाप्समिति प्रबोध समये.. यः प्रत्यभिज्ञायते। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये.. नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।6।

जैसे सूर्य और चंद्रमा को राहु द्वारा ग्रहण किया जाता है, वैसे ही माया के द्वारा ढके हुए, इन्द्रियों के हट जाने पर अजन्मा सोया हुआ पुरुष प्रकट हो जाता है। ज्ञान देते समय जो यह पहचान करा देते हैं कि पूर्व में सोये हुए यह तुम ही थे, उन श्री दक्षिणामूर्ति को गुरु रूप में नमस्कार है।। 

7-बाल्या दिष्वपि जाग्रदा दिषुतथा सर्वास्व वस्था स्वपि। व्यावृत्ता स्वनु वर्तमानं  महमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा ।। 

स्वात्मानं प्रकटी करोति भजतां यो मुद्रया भद्रया। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये ..नमइदं.. श्रीदक्षिणामूर्तये ।7। 

बाल्य अवस्था और अन्य अवस्थाओं में, जागते हुए या निद्रा आदि जीवन की सभी अवस्थाओं में जो आत्मन (आत्मा) शरीर के भीतर दीप्त रहती है, वह सभी नियमों से मुक्त लेकिन हर समय उपस्थित रहती है। जो अपने भक्तों को चिन्मुद्रा के माध्यम से इस आत्मन का ज्ञान कराते हैं, उन श्री दक्षिणामूर्ति को गुरु रूप में नमस्कार है।। 

8-विश्वं पश्यति कार्य कारण तया ..स्वस्वामि सम्बन्धतः । शिष्या अचार्यतया तथैव.. पितृ पुत्रा अध्यात्मना भेदतः ।। 

स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो.. माया परि भ्रामितः । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये.. नमइदं ..श्रीदक्षिणामूर्तये ।8।

 विश्व में जो अलग-अलग सम्बन्ध जैसे कि- कार्य-कारण, स्व-स्वामी, शिष्य-आचार्य, और पिता-पुत्र आदि दिखाई देते हैं, स्वप्न में और जागृति में ये सभी समबंध पुरुष ( आत्मतत्व ) को भ्रमित करने के लिए माया द्वारा बनाए गये हैं। मैं अपने गुरुरुपी श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ।।  

9-भूरम्भांस्यन लोऽनिलोऽम्बर महर्नाथो हिमांशु पुमान् । इत्या भाति चरा चरात्मक मिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम्।। 

नान्यत् किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्मा द्विभोः । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नमइदं.. श्रीदक्षिणामूर्तये ।9। 

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश,सूर्य, चन्द्र और जीव- ये आठ उस [आत्मन] के रूप हैं, जो चर-अचर रूपों में विद्यमान हैं, इस [आत्मन] के अतिरिक्त संसार में कुछ भी नही हैं, यही सर्वव्यापक है, अंतर्मन में लीन योगी इसे ही विश्व का सार मानते हैं, मैं अपने गुरुरुपी श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ।। 

10-  सर्वात्मत्व मिति स्फुटी कृतमिदं.. यस्माद मुष्मिन् स्तवे। तेनास्य श्रवणा त्तदर्थ मनना ध्यानाच्च संकीर्तनात् ।। सर्वात्मत्व महाविभूति सहितं ..स्यादीश्वरत्वं स्वतः । सिद्ध्ये त्तत्पुनर अष्टधा ..परिणतं .. ऐश्वर्य मव्याहतम् ।10। 

इस स्तुति में स्वयं [आत्मन] की सर्वव्यापकता स्पष्ट रूप से प्रकट हुई है, जिसके बारे में सुनने से, उसके अर्थ पर विचार करने से, ध्यान और भजन करने से अष्टांगिक ऐश्वर्यों के साथ विश्व के परम सार के ज्ञान की प्राप्ति होती है, बिना बाधा और कठिन प्रयास किये आध्यात्मिक जागृति प्राप्त होती है। 

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सोमवार, 20 सितंबर 2021

क्या है आदि शंकर द्वारा लिखित ''सौंदर्य लहरी''की महिमा

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ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ 

अर्थ :'' हे! परमेश्वर ,हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों  (गुरू और शिष्य) को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए। हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो। हम दोनों परस्पर द्वेष न करें''।   

 
''सौंदर्य लहरी''की महिमा   ;-

17 FACTS;-

1-सौंदर्य लहरी (संस्कृत: सौन्दरयलहरी) जिसका अर्थ है “सौंदर्य की लहरें” ऋषि आदि शंकर द्वारा लिखित संस्कृत में एक प्रसिद्ध साहित्यिक कृति है। कुछ लोगों का मानना है कि पहला भाग “आनंद लहरी” मेरु पर्वत पर स्वयं गणेश (या पुष्पदंत द्वारा) द्वारा उकेरा गया था। शंकर के शिक्षक गोविंद भगवदपाद के शिक्षक ऋषि गौड़पाद ने पुष्पदंत के लेखन को याद किया जिसे आदि शंकराचार्य तक ले जाया गया था। इसके एक सौ तीन श्लोक (छंद) शिव की पत्नी देवी पार्वती / दक्षिणायनी की सुंदरता, कृपा और उदारता की प्रशंसा करते हैं।सौन्दर्यलहरी/शाब्दिक अर्थ सौन्दर्य का सागर आदि शंकराचार्य तथा पुष्पदन्त द्वारा संस्कृत में रचित महान साहित्यिक कृति है।इसमें माँ पार्वती के सौन्दर्य, कृपा का १०३ श्लोकों में वर्णन है।भगवत्पाद शंकराचार्य की सौन्दर्यलहरी प्रथम तान्त्रिक रचना है जिसमें सौ श्लोकों के माध्यम से आचार्य शंकर ने भगवती पराशक्ति पराम्बा त्रिपुरसुन्दरी की कादि एवं हादि साधानाओं के गोप्य रहस्यों का उद्यघाटन किया है और पराशक्ति भगवती के अध्यात्मोन्मुख अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन किया है।ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्यलहरी है।  

 2-भगवत्पाद ने सौन्दर्यलहरी की रचना कर भगवती के स्तवन  से श्रीविद्या की उपासना एवं महिमा, विधि, मन्त्र, श्रीचक्र एवं षट्चक्रों से उनका सम्बन्ध तथा उन षट्चक्रों के वेधरूपी ज्ञान के प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया है।सौन्दर्यलहरी में कुल सौ श्लोक हैं, जिनमें से आदि के इकतालिस श्लोक आनन्दलहरी के नाम से प्रसिद्ध हैं। शेष उनसठ श्लोकों में देवी के सौन्दर्य का नखशिख वर्णन है। वस्तुत: 'आनन्द' ब्रह्मा का स्वरूप है जिसका ज्ञान  हमें भगवती करा देती है। अत: ब्रह्मा के स्वरूप 'आनन्द' को बताने वाली भगवती उमा के स्वरूप का प्रतिपादन शेष उनसठ श्लोकों में वर्णित है।तंत्र में कई यंत्र भी प्रयोग में आते हैं। ऐसे यंत्रों में सबसे आसानी से शायद श्री यंत्र को पहचाना जा सकता है। 

 3-सौन्दर्यलहरी के 32-33वें श्लोक इसी श्री यंत्र से जुड़े हैं। साधकों के लिए इस ग्रन्थ का हर श्लोक किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है, जिसमें से कुछ आम लोगों के लिए भी परिचित हैं, कुछ विशेष हैं, सबको मालूम नहीं होते। शिव और शक्ति के बीच कोई भेद न होने के कारण ये अद्वैत का ग्रन्थ भी होता है। ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्य लहरी है। कई श्लोकों में माता सृष्टि और विनाश का आदेश देने की क्षमता के रूप में विद्यमान हैं।सौन्दर्यलहरी केवल काव्य ही नहीं है, यह तंत्रग्रन्थ है। जिसमें पूजा, यन्त्र तथा भक्ति की तांत्रिक विधि का वर्णन है। इसके दो भाग हैं-

आनन्दलहरी - श्लोक १ से ४१

सौन्दर्यलहरी - श्लोक ४२ से १०३

 4-एक बार ऐसा कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य शिव और पार्वती की पूजा करने के लिए कैलाश गए थे। वहां, भगवान ने उन्हें १०० श्लोकों वाली एक पांडुलिपि दी, जिसमें देवी के कई पहलुओं को उन्हें उपहार के रूप में वर्णित किया गया था। जब शंकर कैलाश के दर्शन कर लौट रहे थे, तब नंदी ने उन्हें रास्ते में रोक दिया। उसने उससे पांडुलिपि छीन ली, उसे दो भागों में फाड़ दिया, एक भाग लिया और दूसरा शंकर को दे दिया। शंकर, शिव के पास दौड़े और उन्हें घटना सुनाई। शिव ने मुस्कुराते हुए, उन्हें १०० छंदों के प्रारंभिक भाग के रूप में ४१ छंदों को अपने साथ रखने की आज्ञा दी और फिर, देवी की स्तुति में अतिरिक्त ५९ छंद लिखने की आज्ञा दी। इस प्रकार, श्लोक १-४१ भगवान शिव की मूल कृति है, जो तंत्र, यंत्र और विभिन्न शक्तिशाली मंत्रों के प्राचीन अनुष्ठानों पर बहुत प्रकाश डालते हैं।आदि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी में कहा-चतुर्भि: श्रीकंठे: शिवयुवतिभि: पश्चभिरपि ../नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं। 

 5-श्लोक १-४१ शिव और शक्ति के मिलन और संबंधित घटनाओं के रहस्यमय अनुभव का वर्णन करता है। शेष श्लोक अर्थात 42-100 की रचना स्वयं आदि शंकर ने की है, जो मुख्य रूप से देवी के स्वरूप पर केंद्रित हैं।सभी १०० श्लोकों को सामूहिक रूप से 'सौंदर्य लहरी' के रूप में जाना जाता है। सौंदर्य लहरी केवल एक कविता नहीं है। यह एक तंत्र पाठ्यपुस्तक है, जिसमें पूजा और प्रसाद, कई यंत्र, प्रत्येक श्लोक के लिए लगभग एक निर्देश दिया गया है; प्रत्येक विशिष्ट श्लोक से जुड़ी भक्ति करने की तंत्र तकनीक का वर्णन करना; और उससे होने वाले परिणामों का विवरण देता है।श्लोक 42-100 अधिक सीधे हैं; वे देवी की शारीरिक सुंदरता का वर्णन करते हैं और कभी-कभी उन्हें सौंदर्य लहरी भी कहा जाता है।  
 6-कुंडलिनी की अवधारणा;-
पहले ४१ श्लोकों में माता की आंतरिक पूजा का विस्तृत विवरण दिया गया है। इसमें कुंडलिनी , श्री चक्र , मंत्र (श्लोक ३२, ३३) की अवधारणा की व्यवस्थित व्याख्या शामिल है। यह सर्वोच्च वास्तविकता को अद्वैत के रूप में दर्शाता है लेकिन शिव और शक्ति, शक्ति धारक और शक्ति, होने और इच्छा के बीच अंतर के साथ। शक्ति, अर्थात् , माता या महा त्रिपुर सुंदरी , प्रमुख कारक बन जाती है और शक्ति धारक या शिव एक आधार बन जाते हैं। प्रथम श्लोक में ही इस विचार का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। "शक्ति के साथ संयुक्त, शिव बनाने की शक्ति के साथ संपन्न है, या अन्यथा, वह एक आंदोलन भी करने में असमर्थ है।"इसी विचार को श्लोक 24 में लाया गया है, "ब्रह्मा ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं, विष्णु पालन करते हैं, रुद्र नष्ट करते हैं, और महेश्वर हर चीज को अवशोषित करते हैं और सदाशिव में आत्मसात करते हैं। आपकी लता जैसे भौंहों से जनादेश प्राप्त करने पर, सदाशिव सब कुछ पिछले की तरह गतिविधि में पुनर्स्थापित करता है चक्र।" माता की ऐसी प्रधानता श्लोक ३४ और ३५ में भी देखी जा सकती है। 

 7-सौन्दर्य लहरी आदि शंकर की अप्रतिम सर्जना का अन्यतम उदाहरण है। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ।पुरानी मान्‍यता है कि जब एक ही जगह पर, एक ही स्‍वर में, एकजुट होकर मंत्र का जाप किया जाए तो उस जगह ऊर्जा का ऐसा चक्र निर्मित होता है, जो मनमंदिर, शरीर, आत्‍मा सभी को अपनी परिधि में ले लेता है। नाद-ब्रह्म की कल्‍पना हमारे यहां उसी संदर्भ में स्‍वीकृत की गई है। आधुनिक विज्ञान भी नाद-ब्रह्म के सामर्थ्‍य का, मंत्रों के उच्‍चारण की ताकत का इन्‍कार नहीं करता है।सौन्‍दर्य लहरी के अदभुत पाठ से पूरे वातावरण में ऊर्जा महसूस होता है।एक दिव्‍य अनुभूति ...जिसमें रस भी है, रहस्‍य भी है और ईश्‍वर के साथ रम जाने की अदम्‍य इच्‍छा भी है।सौन्‍दर्य लहरी के हर मंत्र में एक अलग शक्ति है, एक अलग भाव है।उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है।शिव   और   शक्ति   के   अभेद   तथा   परस्पर   अपेक्षिता   तथा   शक्ति   के   कल्याणकारी   स्वरूप   का   दर्शन   सौन्दर्यलहरी   में   जिस   प्रकार   से   प्राप्त   होता   हैं; वैसे   अन्यत्र   कहीं   नहीं   हैं।

  8-भगवान् शंकराचार्य ने अपनी शक्ति-साधना के अनुभवों की हलकी-सी झाँकी सौंदर्य लहरी  में प्रस्तुत की है। शक्ति के बिना शिव की प्राप्ति नहीं हो सकती। उपनिषद्कार के अनुसार यह आत्मा बलहीनों को प्राप्त नहीं होती। दुर्बलता के रहते ब्रह्म तक पहुँच सकने की क्षमता कहाँ से आ सकती है। इस दृष्टि से ब्रह्मविद्या के सहारे ब्रह्मवेत्ता बनने और ब्रह्मतत्व को प्राप्त करने के प्रयत्न में भगवान् शंकराचार्य को शक्ति-साधना करनी पड़ी। और इसके लिए योगाभ्यास के—प्रत्याहार,धारणा, ध्यान, समाधि के प्रयोग ही पर्याप्त नहीं रहे, वरन् उन्हें पंच-तत्वों की प्रवृत्ति का संचार और नियंत्रित कर्तीृ अपराविद्या का अवलम्बन लेकर शरीर और मन को भी समर्थ बनाना पड़ा। इस प्रयोजन के अपराविद्या की साधना में कुंडलिनी शक्ति को प्रमुख माना जाता रहा है। इसे कामकला या काम-बीज भी कहते हैं। प्रजनन प्रयोजन में भी यह कला प्रयुक्त होती है और उसका जननेन्द्रिय के गुह्य क्रियाकलापों से भी संबंध है, इसलिये उसे गोपनीय गिन लिया जाता है और उसकी चर्चा अश्लील मानी जाती है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं।
 9-अश्लील कोई अवयव या कोई क्रियाकलाप नहीं। प्रजनन को अपने यहाँ एक धर्म कृत्य माना गया है। सोलह संस्कारों में गर्भाधान भी एक संस्कार है। जिसकी पृष्ठभूमि धर्मकृत्यों के देवता और गुरुजनों के आशीर्वाद के साथ विनिर्मित की जाती है। भगवान् शिव का प्रतीक विग्रह जननेन्द्रिय के रूप में ही है, जिसे धर्मभावना और श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। निन्दनीय वह प्रक्रिया ही हो सकती है, जिसके द्वारा पशुप्रवृत्ति को भड़काने में सहायता मिले। शंकराचार्य ने भारती के प्रश्नों को यह कहकर टाला नहीं कि हम संन्यासी हैं, हमें 'कामविद्या' के संदर्भ में कुछ जानना या बताना क्या आवश्यक है? वे जानते थे कि योग परा और अपराविद्या के सम्मिश्रण का नाम है। परा अर्थात् ब्रह्मविद्या ज्ञान-विद्या अपरा अर्थात् शक्तिविद्या आत्मवेत्ता को दोनों ही जाननी चाहिए। 

 10-जो शक्ति है, उसके सदुपयोग-दुरुपयोग की जानकारी होना भी आवश्यक है। शरीर के क्रिया-कलाप और मन के उल्लास, जिस सूक्ष्म शक्ति से प्रेरित, प्रोत्साहित और कर्म प्रवृत्त होते हैं, उस कुण्डलिनी शक्ति को उपेक्षा में नहीं डाला जा सकता। इस उपेक्षा से विकृतियाँ उत्पन्न होने और सदुपयोग की अनभिज्ञता से अहित ही हो सकता है। इसलिए गृहस्थ, ब्रह्मचारी सभी के लिए उसे जानना आवश्यक है।मस्तिष्क के मध्य ब्रह्मरंध्र में 'ज्ञानबीज' और जननेन्द्रिय मूल में 'कामबीज' स्थित हैं। कामबीज को नारी की 'योनि' की संज्ञा दी जाती है और ज्ञानबीज को 'शिश्न' की। यह मात्र आकर्षक कल्पना ही नहीं;  इसमें वैज्ञानिक तथ्य भी हैं।   उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की तरह यह दो अत्यंत सामर्थ्यवान् प्रचण्ड क्षमताओं से परिपूर्ण दो शक्ति-संस्थान विद्यमान हैं। मस्तिष्क का सदुपयोग जानने और करने वाले व्यक्ति जिस प्रकार भौतिक और आत्मिक प्रगति कर सकते हैं, उसी प्रकार कामशक्ति कुंडलिनी का सदुपयोग करके भी जीवन के हर क्षेत्र में उत्साह और उल्लास विकसित किया जा सकता है। न केवल शरीर और मन के विकास के लिए, न केवल भौतिक सफलताएँ, समर्थताएँ प्राप्त करने के लिए, वरन् आत्मिक और भावनात्मक प्रगति के लिए इस शक्ति की प्रक्रिया का ज्ञान एवं अनुभव होना आवश्यक है।  

 11-अध्यात्म शास्त्रों में कुण्डलिनी के संबंध में बहुत कुछ बताया गया है।योग राजोपनिषद केअनुसारअपान स्थल मूलाधार में कंद है। उसे कामरूप-कामबीज कहते हैं। उसे ही वह्नि कुण्ड अथवा कुण्डलिनी तत्त्व कहते हैं। वायु पुराण केअनुसार जीव ने ब्रह्म से कहा। आप बीज हैं, मैं योनि हूँ। यह क्रम सनातन है । कुंडलिनी स्थान पर अधोलिंग का, शिखा स्थान पर पश्चिम लिंग का और भृकुटियों के मध्य ज्योतिर्लिंग का ध्यान करना चाहिए। प्रकृति का प्रतिनिधित्व करने वाला केन्द्र है— जननेन्द्रिय मूल—कुण्डलिनी चक्र। और पुरुष का मनुष्य शरीर से मस्तिष्क के मध्य ब्रह्मरन्ध्र—सहस्रार चक्र में अवस्थित है। जब तक दोनों का मिलन नहीं होता, बिजली की दो धा राएँ-पृथक-पृथक रहने की तरह मानव जीवन में भी सब कुछ सूना रहता है। पर जब इन दोनों शक्ति केन्द्रों का परस्पर संबंध-समन्वय-सहचर्य आरंभ हो जाता है तो ग्रीष्म और शीत के मिलने पर आने वाले बसन्त की तरह जीवन उद्यान भी पुष्प-पल्लवों से भर जाता है। इसी प्रयत्न के किए जाने वाले प्रयोग को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। 

 12-शंकराचार्य के ज्ञान और अनुभव में यही कमी देखकर भारती ने उनकी साधना-अपूर्णता को चुनौती दी थी और शास्त्रार्थ के लिए ललकारा था। काम केन्द्र में स्फुरणा बड़ी सरस और कोमल है। समस्त कलाएँ और प्रतिभाएँ वहीं पर केन्द्रीभूत हैं। जो लोग उस सामर्थ्य को मैथुन प्रयोजन के तुच्छ क्रीड़ा -कल्लोल में खर्च करते रहते हैं, वे उन दिव्य विभूतियों से वंचित रह जाते हैं जो इस कामशक्ति को सृजनात्मक दिशा में मोड़कर उपलब्ध की जा सकती हैं। आत्मविद्या के ज्ञाता इस कामशक्ति को न तो हेय मानते हैं और न तिरस्कृत करते हैं, वरन् उसके स्वरूप, उपयोग को समझने और सृजनात्मक प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करने के लिए सचेष्ट होते हैं।ब्रह्म को शिव और प्रकृति को शक्ति कहते हैं। इन दोनों के मिलन का अतीव सुखद परिणाम होता है। ब्रह्मरन्ध्र में अवस्थित और ज्ञानबीज और जननेन्द्रिय मूल में सन्निहित कामबीज का मिलन भी जब संभव हो जाता है, तो बाह्य और आन्तरिक जीवन में आनन्द, उल्लास का ठिकाना नहीं रहता है। 

 13-ब्रह्मानन्द की तुलना मोटे अर्थ में विषयानन्द से की जाती रही है। यह अन्ततः शक्तियों का मिलन भी अलंकारिक भाषा में ब्रह्ममैथुन कहा जाता है। कुण्डलिनी-साधना की जब प्राप्ति होती है तो इस स्तर का आनन्द भी साधक को सहज ही मिलने लगता है।योगिनी तंत्र के अनुसार ''हे पार्वती, सहस्रकमल में जो कुल और कुण्डलिनी—महासर्प और महासर्पिणी का मिलन है। उसी को यतियों ने परम मैथुन कहा है। तंत्र सार के अनुसार आत्मा को परब्रह्म के साथ प्रगाढ़ आलिंगन में आबद्ध करके परम रस में निमग्न रहना ..यही यतियों का मैथुन है ; कामसेवन नहीं। इड़ा, सुषुम्ना और जीवात्मा संगम इसे मैथुन सुख कहते हैं। शंकराचार्यकृत सौंदर्यलहरी में कुण्डलिनीशक्ति को रूपवती युवती के रूप में चित्रित किया गया है और उसके ब्रह्ममिलन को काम-कल्लोल, मैथुन की भाषा में चित्रित किया गया है।सन्त कबीर की 'उलटा बासियों” में इसी प्रकार का प्रयोग है। उन्होंने जीवात्मा को प्रेमिका और परमात्मा को प्रेमी के रूप में चित्रित किया है।  

 14-त्रिपुरोपनिषद  के अनुसार उसका अंकुश मधु की तरह अत्यंत मधुर है। क्रूर भी उस पाश में बँध जाते हैं। पाँच बाणों वाले काम-धनुष में वह अरुणा सबको अपनी मुट्ठी में रखती है।''कुण्डलिनी विद्या को इसीलिये भुक्ति और मुक्ति उभयसंपदाएँ प्रदान करने वाली कहा गया है। वह दीप्तिमान देवी सौम्या, भोगिनी, भोगशायिनी, त्रैलोक्य सुंदरी, रम्य, सौम्यरूपा और कामचारिणी है।सौंदर्य लहरी'' के कतिपय श्लोकों में कुण्डलिनी के कामबीज की महत्ता और उसकी उपलब्धियों की ओर संकेत किया है।नीचे उनमें से कई श्लोक इसलिए दिए जा रहे हैं कि आत्मसाधना के पथ पर चलने वाले पथिक यह समझ सकें कि अपने अन्तरंग में भरी हुई क्षमता का श्रेष्ठतम लाभ कैसे उठाया जा सकता है। कामबीज का भोंड़ा लाभ तो पशु-पक्षी, कीट-पतंग सभी उठाते हैं। पर यदि उसका विशिष्ठ उपयोग संभव हो सके, तो उससे असंख्य गुनी आनन्द, उल्लास भरी उपलब्धियाँ प्रा प्त की जा सकती हैं। कुण्डलिनी जागरण से जहाँ ब्रह्मानंद की हिलोरें अन्तःकरण को विभोर करती हैं वहाँ उनमें यह क्षमता भी है कि शारीरिक आनंद को न केवल उत्साहवर्धक बना सकें, वरन् उपयोगी भी बना सकें। ऐसे हास-विलास शरीरों की जितनी क्षति करते हैं, उससे अनेक गुनी उपलब्धियाँ भी लाकर रख देते हैं। इस प्रकार उस शक्ति का भौतिक उपयोग भी उतना ही आनंदमय, उत्साहवर्धक और लाभदायक बन जाता है, जिससे गृहस्थ और ब्रह्मचर्य का समन्वित लाभ प्राप्त किया जा सके। 

15-सौंदर्य लहरी मंत्रोचारण अनुष्ठान में भाग लेने से आपको निम्नलिखित लाभ प्राप्त हो सकते हैं:-
1-समस्त मनोकामनाओं व इच्छाओं की पूर्ति होती है|

2-आपको उत्तम स्वास्थ्य, धन, ज्ञान व समृद्धि की प्राप्ति होती है|

3-संतान सुख व दीर्घायु प्राप्त होती है|

4-संपूर्ण शक्ति, बल व विजय की प्राप्ति होती है|

5-किसी को भी आकर्षित करने व शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति मिलती है|

6-रोगों से मुक्ति व सुरक्षा प्राप्त होती है|

7-बुरे जादू व भय का नाश होता है|

8-परम शक्ति व आनंद प्राप्त होता है|

 

सौंदर्य लहरी के विशेष श्लोक  ;-

 सौंदर्य लहरी में इसी तथ्य का प्रतिपादन करने वाली कुछ भगवान् शंकराचार्य की अनुभूतियाँ है, जो समझने योग्य हैं —उनमें से कुछ नीचे देखिये।

1-श्लोक भावार्थ- ''जो स्तन मुख की तरह गोल तथा एक मुख वाला है। उसके नीचे तीन गुहा सदृश घर बने हुए हैं। ऐसी कामकला का कोई कामी मनुष्य उपभोग करता है तो उसकी कामनापूर्ण होती है और वह स्वयं कामरूप हो जाता है।  

2-श्लोक भावार्थ - ''बल खाती हुई कटी, भ्रमरी जैसी चंचलता; अलकावलि से आच्छादित मुख, कमल पुष्पों जैसा परिहास; स्फटिक जैसे दाँतों से युक्त हे देवि, तेरी मुस्कराहट के समय निकलने वाली सुगंध से कामदहन करने वाले शिवजी भी भ्रमर की तरह उन्मत्त हो जाते हैं।'' संकेत—मन को सिकोड़कर बैठे हुए, निष्क्रिय, निराश और नीरस लोग भी कुण्डलिनी की स्फुरणा प्राप्त करके इठलाते हुए, भ्रमरी जैसे सक्रिय अलका वलि जैसे स्निग्ध, शोभित, बढ़ चलने वाले, हँसमुख स्वभाव और अपनी वाणी से सर्वत्र सुगंध फैलाने वाले बन जाते हैं और निष्क्रिय लोगों को भी आशा और स्फूर्ति की उमंग से उन्मत्त कर देते हैं।

3-श्लोक भावार्थ-''तेरे विशाल नेत्र कानों तक जा पहुँचे हैं और दो पलकों को पंखों की तरह धारण किये हुए हैं। यह कान तक तने हुए कामदेव के पुष्पबाण शिवजी के चित्त को भी अशांत कर देते हैं। संकेत—कुण्डलिनी-साधक का दृष्टिकोण विशाल, परिष्कृत और दूरदर्शी हो जाता है। 

4-श्लोक भावार्थ-''विशाल नेत्र अर्थात् विशाल हृदय एवं विशाल दृष्टिकोण का विस्तार।उन पर मर्यादा और लोकहित के दो बंधन अर्थात् पलक पंख। 'इस आंतरिक सुसंपन्नता से समर्थ बना हुआ साधक अपने प्रतिपादन पर भगवान का भी सिंहासन हिला सकता है। और ईश्वर की भी निष्क्रियता को उसी तरह क्रियाशील बना देता है जैसा कि कामदेव ने शिवजी के चित्त को भी अशांत कर दिया था।पूर्वकाल में विष्णु ने तुम्हारी आराधना करके मोहिनी रूप पाया और शिवजी के मन में भी काम विकार उत्पन्न कर दिया। कामदेव भी तुम्हारी ही आराधना से अपनी पत्नी का नयनाभिराम बना हुआ है और बड़े-बड़े मुनियों के मन में भी क्षोभ उत्पन्न करता रहता है।

संकेत -मोहिनी वह जो दूसरों को मोहित कर ले, पर स्वयं मोहित न हो। योग साधना से मनुष्य में वे सद्गुण विकसित होते हैं, जिनके कारण दूसरे सभी लोग उससे प्रभावित एवं आकर्षित होते हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण हो जाने पर मनुष्य स्वभावतः सम्मान और श्रद्धा का केन्द्र बन जाता है, यही व्यक्ति का मोहिनी रूप है। इस सफलता को पाने के साथ-साथ आत्मवेत्ता स्वयं किसी पर मोहित नहीं होता। न व्यक्ति न पदार्थ दोनों में उसे आकर्षण नहीं होता। वह तो अपनी आत्मा पर ही मोहित रहता है, इसलिए उसका प्यार कर्त्तव्य एवं आदर्श की परिधि में सीमाबद्ध हो जाता है। ऐसी मोहिनीवृति कुण्डलिनी साधना के प्रभाव से उपलब्ध होती है। कुण्डलिनी जागरण के साथ−साथ कामवृति का भी परिष्कार होता है। बहिर्मुखी लोगों के मन में उससे काम-क्षोभ भी उत्पन्न हो सकता है और बढ़ सकता है। पर विज्ञसाधक उसे रचनात्मक प्रयोजन में मोड़कर जीवन को अधिक सरस एवं उल्लसित बना लेते हैं।  

5-श्लोक भावार्थ- ''कामदेव पुष्पों का धनुष, भ्रमरी की रस्सी, पाँच विषयों के बाण, वसंत रूपी सेनापति, मलयगंधरूप रथ में बैठकर -शरीर न रहते हुए भी सारे जगत को अकेला जीत लेता है। उस कामदेव को यह सामर्थ्य तुम्हारी कृपा से ही प्राप्त होती है''। 

संकेत ;-कुण्डलिनी का केंद्र जननेंद्रिनेंय मूल में रहने से कामप्रवृत्ति का प्रदीप्त होना स्वाभाविक है। यह प्रवृत्ति इच्छा और क्रिया दोनों का सृजन करती है। मस्तक में उपस्थित ज्ञानकेन्द्र के निर्णयों को आकांक्षा एवं क्रिया के रूप में बदल देना इसी शक्ति का कार्य है। कामप्रवृत्ति मनुष्य का मन, शरीर और स्वभाव सभी प्रफुल्लित, आशान्वित एवं स्फूर्तिवान रहते हैं। इसका सदुपयोग होने से व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से कामदेव सरीखा आकर्षक हो जाता है। पुष्पों की तरह हँसता, मुस्कुराता मुख, भ्रमर जैसी दिव्य रसिकता, पाँचों ज्ञानेन्द्रिय  का निग्रह, मलयगंध जैसी प्रवृत्ति से सम्पन्न होने वाला व्यक्ति अकेला ही संसार को प्रभावित कर सकता है। कामप्रवृत्ति के सदुपयोग का यही स्वाभाविक परिणाम है। कुण्डलिनीशक्ति की कृपा से यह उपलब्धियाँ सहज ही संभव हो जाती हैं।  

 6-श्लोक भावार्थ-''वृद्ध, कुरूप, क्रीड़ा से अनभिज्ञ जड़ मनुष्य भी तुम्हारी दृष्टि पड़ने पर इतना कमनीय और रमणीय हो जाता है कि अनेक युवतियाँ उसके पीछे असंयमी होकर अस्त-व्यस्त की तरह भागने लगती हैं'' ।  

संकेत ;-मानसिक दृष्टि से निराश को वृद्ध, दुर्गुणी को कुरूप और नीरस, कर्कश स्वभाव वाले को मूढ़ कहते हैं। ऐसा व्यक्ति भी कुण्डलिनी साधना से सहृदय, सज्जन, सद्गु णी और सरस बनकर एक प्रकार से अपना आंतरिक कायाकल्प ही कर डालता है। 7-श्लोक भावार्थ - ''ऋद्धि और सिद्धियाँ उसके पीछे ऐसे ही भागती हैं, जैसे कुलटा नारियाँ किसी रूप,  सौंदर्य सम्पन्न आकर्षक स्वभाव वाले कामुक युवक के पीछे बिना बुलाए ही फिरने लगती हैं''।

संकेत ;-महाशक्ति की साधना से उत्पन्न आकर्षण प्राण- प्रवाह (काम) के प्रभाव से अनेक सत्प्रवृत्तियाँ और सफलताएँ आकर्षित होने लगती हैं। जैसे खिले हुए फूल पर तितलियाँ और मधुमक्खियाँ मंडराती हैं वैसे ही उस साधक को विभूतियों का दुलार और सहयोग अनायास ही सब ओर से प्राप्त होता है। यह प्रकृति भी अनुकूल हो जाती है और परिस्थितियाँ उसके इशारे पर नाचती, बदलती, सँभलती रहती हैं।   

 8-श्लोक भावार्थ तेरी काम कला के प्रभाव से मनुष्य के लिए स्त्रियों के मन में तु्रंत क्षोभ उत्पन्न कर देना बाँये हाथ का खेल होता है। सच तो यह है कि तेरी साधना करने वाला इन सूर्य-चन्द्ररूपी दो स्तनों वाली प्रकृति-तरुणी को भी अपने इशारे पर नचा सकता है। 

9-श्लोक भावार्थ तुम्हारी ही दी हुई वाक् शक्ति से तुम्हारी ही स्तुति करना, सूर्य को दीपक दिखाना, ओस से चन्द्रमा को अर्घ चढ़ाने अथवा समुद्र के ही जल-कणों से महासागर करने जैसा ही बाल-प्रयास है। 

संकेत ;-मनुष्य के पास जो कुछ है सो सारा वैभव इस कुण्डलिनी नाम से संबोधित पराशक्ति का ही है। तुम्हारी दी हुई वाणी, काया, चेतना तथा सामग्री से ही तुम्हारा स्तवन वंदन कैसे हो ? इसका विकल्प यही है कि साधक अपना आत्मसमर्पण इस सत्ता के चरणों में करके उसी के दिव्य संकेतों के अनुरूप दिव्य जीवन जीने के लिए कदम बढ़ाए और सच्ची साधना करने वाले सच्चे साधक को लोक-परलोक में आनन्द-उल्लास भरा रखने वाली परम गति को प्राप्त करे।  

10-श्लोक भावार्थ -''तेरे स्तनों से बहने वाले ज्ञानामृतरुपी पयपान करके यह द्रविण शिशु (शंकराचार्य) प्रौढ़ कवियों जैसी कमनीय कविताएँ रच सकने में समर्थ हो गया''। 

 संकेत; -

श्री आद्य शंकराचार्य अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि मैं तुच्छ-सा द्रविड़वंश का बालक कुण्डलिनी माता का ज्ञानामृतरूपी पयपान करने के कारण इतना समर्थ हो गया कि बचपन में ही प्रौढ़कवियों जैसा साहित्यसृजन करने लगा। ऐसा ही मेधा- प्रगति का लाभ दूसरे श्रद्धावान साधक भी उठा सकते हैं। एक गाथा यह प्रचलित है कि एक बार शंकराचार्य के पिताजी कहीं प्रवास में गए और अपनी अनुपस्थिति में अपनी पत्नी को भगवती के विग्रह की पूजा करते रहने का निर्देश कर गए। इसी बीच एक दिन शंकराचार्य की माताजी पूजा न कर सकीं, कीं तो उन्होंने बालक को दूध लेकर भगवती का भोग लगाने भेजा। भोग लगाया पर दूध ज्यों का त्यों रखा रहा। तब बालक ने रोकर पीने की प्रार्थना की। भगवती ने उसे पी लिया। अब बालक को और व्यथा हुई। भोग से बचा दूध उन्हें मिलता था, वह तो भगवती पी गई, उसे खाली हाथ रहना पड़ा। दूध न मिलने के कारण रोते हुए शंकराचार्य को भगवती ने छाती से लगा लिया और उसे स्तन पान कराया। इसे पीते ही वे प्रचंड विद्वान और प्रखर कवि हो गए और अद्भुत रचनाएँ करने लगे। इसी घटना का संकेत सौंदर्य लहरी के श्लोक 75 में मिलता है।श्री शंकराचार्य की भावविभोरता देखते ही बनती है। महाशक्ति के अनुग्रह से वे जिस प्रकार कृतकृत्य हुए और उन्होंनेन्हों उसकी महान संभावनाओं तथा अनुकंपाओं का स्वरूप समझा, उसे देखते हुए यह भावविभोरता उचित भी है।   

 श्री आद्य शंकराचार्य के कुण्डलिनी अनुभव -  

11-श्लोक भावार्थ—मैं अपनी छहों इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ छठा मन) इन छहों पैरों से—षट् पद भ्रमर की तरह तुम्हारे पतितों को उबारने वाले चरणकमलों का मकरंदपान करता रहूँ। 

 संकेत; -

श्री आद्य शंकराचार्य कुण्डलिनी शक्ति की महान उपलब्धियों का रसास्वादन करते हुए आनन्दविभोर होकर एकमात्र यही का मना करते हैं कि उस महासत्ता पद पद्मों का षट् पद—'भौंरे ' की तरह मकरन्दपान करते रहें। षट्चक्रों की आराधना में निरन्तर संलग्नता का भाव भी 'षट्पद' शब्द में है। इस मार्ग पर चलने वाले हर साधक को उपलब्ध आनन्द की अनुभूति करते हुए ऐसी ही आकांक्षा उमड़ती है।  

12-श्लोक भावार्थ—मैं अपनी छहों इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ छठा मन) इन छहों पैरों से—षट् पद भ्रमर की तरह तुम्हारे पतितों को उबारने वाले चरणकमलों का मकरंदपान करता रहूँ। 

 संकेत; -

श्री आद्य शंकराचार्य कुण्डलिनी शक्ति की महान उपलब्धियों का रसास्वादन करते हुए आनन्दविभोर होकर एकमात्र यही कामना करते हैं कि उस महासत्ता पद पद्मों का षट् पद—'भौंरे ' की तरह मकरन्दपान करते रहें। षट्चक्रों की आराधना में निरन्तर संलग्नता का भाव भी 'षट्पद' शब्द में है। इस मा र्ग पर चलने वाले हर साधक को उपलब्ध आनन्द की अनुभूति करते हुए ऐसी ही आकांक्षा उमड़ती है। 

 13-श्लोक भावार्थ—हे माँ ! मेरे सभी वाक्य जप हों,  हाथों की सभी क्रियाएँ मुद्रा हों, हर कदम प्रदक्षिणा हों,  आहार के ग्रास आहुतियाँ हों, मेरे प्रणाम तुम में तादात्म्य हों, मेरे सभी सुख तुम्हारी अखिल आत्मा में समर्पित हों, हों मैं जो कुछ भी करूँ सो सभी तुम्हारी पूजा में गिने जाएँ। 

 संकेत; -

कुण्डलिनी शक्ति से उपलब्ध आत्मिक शक्ति एवं उत्कृष्ट विचारणा के आधार पर साधक की विचारणा तथा क्रिया देवोपम हो जाती है और उसके द्वारा सोचा गया प्रत्येक विचार, कार्य भगवान की आराधना जैसा ही मंगलमय होता है। मनुष्य शरीर में देवत्व का उदय करने में कुण्डलिनी शक्ति का अनुपम योगदान मिलता है। श्री शंकराचार्य ने बहुत कुछ पा लेने के बाद अंतिम रूप में यह माँगा है कि वे सर्वतोभावेन महाशक्ति में ही लीन हो जाएँ।संयम ही समस्त सिद्धियों का आधार है और संयम की प्रथम सीढ़ी है-वाचोगुप्ति अर्थात् 'वाणी का संयम'।  

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 ''सौंदर्य लहरी''के श्लोक 1 से 16 का हिन्दी  अनुवाद;-

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि |
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति || 1
शिव को कल्याण का पर्याय ओर आदि देव माना गया है | उनके वाम विभाग ( दाहिने अंग ) मे गिरिजा शक्ति स्वरूपा हदय स्पंदन वत विध्यमान है  |भगवान शिव शक्ति से युक्त हो कर ही समस्त सृष्टि का संचालन करने मे समर्थ हो पाते है | शिव शक्ति पुराक है ....!! शिव संकल्प हे तो शक्ति उसे पूर्ण करने की क्रिया शक्ति | परा शक्ति भगवती त्रिपुरासुंदरी राजराजेश्वरी  ना हो , तो उन मे स्पंदन भी संभव नही | शिव त्र्यंबक कहे जाते है ... शक्तिहीन सृष्टि ,स्थिति , संहार का संतुलन नियमन रखने मे भी अपने आप को सामर्थ्यवान नही पाते |प्रकृति के बिना पुरुष मात्र कल्पना भर है | हे माँ ...जिनके अनेको जन्म जन्मांतर के पुण्य का उदय हुआ हो वही त्रिदेव ब्रम्हा ,विष्णु , महेश द्वारा आराध्य पूजनीय आपकी ‘श्री’ की स्तुति-पूजन-वंदन-आराधन करने का अधिकारी बन आपके श्री चरणो की धूल ( चरणधूलि-चरणों की रज ) प्राप्त कर सकता है |
  संकेत; -

इच्छा – ज्ञान – क्रिया ये तीन प्रकार की शक्ति मानी गयी है |इस त्रिगुणात्मिका शक्तिओ के बिना - हीन होकर स्वयं शिव भी कोई गति या कार्य करने मे समर्थ नही माने जाते |शिवशक्ति को एक दूसरे के पूरक माना गया हे तभी ये एकात्म स्वरूप से सारी लीलाए करने मे समर्थ हो पाते है |” शिव हं वाच्य है और  शक्ति सः वाच्य “ ओर इस दोनों के भिन्न होने से क्रिया संभव ही नही |ये एकाकार हो तभी हं+सः = हंस: मंत्र सिद्ध होता है |जिसे उल्टा करने पर भी .... सोअहं रूप बनता है | ह ऑर स हादिविध्या के प्रथम दो अक्षर हे यही विशुद्ध ‘श्रीविद्या ’ का संकेत करते है | 
तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं
विरिञ्चिस्सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् |
बहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां
हरस्संक्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ||2
हे माँ ... उद्भव-स्थिति-संहार कारिणी ! आपके अति कोमल कमल समान श्रीचरणो के स्पर्श से दिव्य बनी धूल की रज की कृपा से ब्रम्हा निरंतर सृष्टि के नवसर्जन करने मे रत रहेते है | प्रतिपालक कहे जाते स्वयं विष्णु शेषवतार धारण कर अपने सहस्त्र सिरो से ... आप की श्रीचरण धुली से उत्पन्न समस्त लोक के प्रतिपालन का सामर्थ्य और दायित्व धारण करते है | सर्व संहारक स्वयं रुद्र आप की दिव्य चरण रज को ही अपने सर्वांग भस्म वत धारण कर लेपन करते है | ये त्रिदेव ब्रमहा , विष्णु , महेश तीनों मूर्ति पराशक्ति और आप के ‘श्री’ बीज का आराधन कर कृतकृत्य हो जाते है | आप की करुणा से ही सभी सामर्थ्य से संमपन्न बने रहेते है|
संकेत; -

गति के भी तीन प्रकार माने गए हे मन – वाचा और देह | गति को क्रियात्मक स्वरूप देने मे चरण प्रमुख देह अवयव है | परा शक्ति की अद्भुत गति ‘स्पंदगति ‘ विद्या -अविद्या का रूप धारण करती है |उन्ही की गति ओर विक्षेप से अनंत सूक्ष्म अणु की सृष्टि हो कर उनसे अनंत ब्राम्हांड सूर्य आदि ग्रह , आकाश गंगा ,नक्षत्र आदि नभमण्डल का प्रादुर्भाव होता है |सप्त आकाश – सप्त पाताल मध्य मे भू लोक(मृत्यु लोक या ये प्राणी जगत ) का सर्जन और  उसमे जीव सृष्टि का प्रारंभ होता है | मूल चेतना  और इन्हे प्राण देकर स्पंदित बनाए रखने का सामर्थ्य आप के श्री चरणों की रज मात्र से प्रगट होता है |यही   मूल चेतना का महात्म सर्व विदित है| 
अविद्यानामन्त-स्तिमिर-मिहिरद्वीपनगरी
जडानां चैतन्य-स्तबक-मकरन्द-स्रुतिझरी |
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपु-वराहस्य भवती || 3
सचराचर जगत मे अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान और बुद्धि स्वरूप से नष्ट करने वाली मणिद्वीप नगरी का प्राग्ट्य आप के श्रीचरणो की धूल की रज से ही प्रगट होता है |अज्ञानियो के लिए आत्मज्ञान रूपी वांछितफल प्रदान करने वाले कल्पवृक्ष के पुनि से निकालने वाला पराग , अर्थहीन दरारीद्र्यो के लिए सकल संपत्ति का स्वामी बननेवाली चिंतामणि ये सभी और अन्य दुर्लभ मानेजाते इच्छित कामनाओ की पूर्ति के साधन आप ही का कृपा प्रसाद है |जैसे भवसागर मे डूबे हुये समस्त जीवो के उद्धार हेतु भगवान विष्णु के वराह स्वरूप के दो दंत ही उभरने का एक मात्र आश्रय है |
  संकेत ;-

विद्या के दो भेद हे - अविद्या और विद्या .. इन्ही  को परा और अपरा कहा जाता है| चतुर्वेद ,छह वेदांग यह समस्त अपरा विद्या है |और  जिस विद्या  से ब्रह्म की प्राप्ति होती है उसे परा विद्या कहा जाता है| इसीलिए केवल वेद या शास्त्रो का ज्ञान रखनेवालो को विद्वान नहीं कहा जा सकता | ज्ञान से उत्पन्न ‘अहम’ का परित्याग कर सहज भाव से विनम्र ब्र्म्ह ज्ञान का जिज्ञासु मुमुक्ष ही परा विद्या  का अधिकारी बनता है | समस्त इच्छित कामनाओ की पूर्ति करनेवाले माने गए सभी उत्तम साधन जैसे कल्पवृक्ष –चिंतामणि या कामधेनु आदि सभी माँ भगवती की ही कृपा प्रसादी है | 
त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः
त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया |
भयात् त्रातुं दातुं फलमपि च वांचासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ || 4
समस्त चर अचर जगत का अंतिम आश्रय ओर शरणालय आप के श्री चरण है| हे माँ ... आप के तेज और चेतना से ही सामर्थ्य वान हो कर अन्य समस्त देवगण अभय या वरदमुद्रा प्रदर्शित कर अपने भक्तो को क्रमश: सभी भय से मुक्ति – सर्व संपदाओ से विभूषित होने का संकेत देते है | केवल आप ही हो जो अभयमुद्रा या आवश्यकता पूर्ति की वरद मुद्रा का प्रदर्शन (अभिनय) नही करते हो|क्योकि आप के श्री चरण की रज मात्र भी उतनी सामर्थ्यवान है| जिससे आप के शरणागत या आश्रित भक्त गण की अनेको जन्मजन्मांतर की सभी कामना , जन्म मरण रूप भवसागर से मुक्ति ,समस्त भय - व्याधि – त्रिविधताप का शमन  और वांछित संपदाओ के उपभोग और  मुक्ति की प्राप्ति की मंशा आप के चरण रज से ही परिपूर्ण हो जाती  है |
संकेत;-  

ऐं – रीं – क्लीं...ये त्रिगुणत्मिका के दिव्य बीज मन्त्र माने जाते है | इनहि का आराधन वाग – चित्त और क्रिया का मूल उद्भव स्त्रोत माना गया है | श्री चक्र के मध्य मे त्रिकोण का स्वरूप इन्ही त्रिगुण शक्तिओ (महासरस्वती –वाग ,महालक्ष्मी –चित्त् ,महाकाली –क्रिया ) का निवास माना जाता है | जो सभी इच्छित कामनाओ की पूर्ति – भक्ति ओर अन्तः परम दुर्लभ मुक्ति भी प्रदान करते है | महादेवी की राजोपचार पूजन प्रणाली मे इन्ही त्रिगुणात्मिक दुर्गा का विविध उपचार प्रणाली से अराधन करने का “पात्रासादन “ से महा पूजन का प्रावधान देखा जाता है |अन्य देवी देवतो के आराधन से इच्छित कामना की या मुक्ति दोनो मे से  एक् की ही पूर्ति संभव है|लेकिन केवल भागवती परांबा का श्रीचक्र अराधन  ही भक्तो का कामनाओ की पूर्ति और मुक्ति दोनो प्रदान करता है... जो अति दुर्लभ माना जाता है  | 
हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननी
नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् |
स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा
मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् || 5
आपका आराधन करनेवाले समस्त शरणागत भक्तो को सर्व सौभाग्य प्रदान करने वाली माँ .... समुद्र मंथन से उत्पन्न अमृत की प्राप्ति के विवाद का शमन करने हेतु स्वयं विष्णु ने आप का ही आराधन किया था और नारी का मोहिनी रूप धारण कर त्रिपुरसुर का वध करनेवाले भगवन शिव के मन मे भी क्षोभ उत्पन्न किया था | आप के काम बीज ‘क्लीं’ का अराधन कर के ही स्वयं काम देव स्वयं के सुखो का त्याग कर अपनी पत्नी रति के अधरो से चुंबित सुंदरतम देह से ग्र्विष्ठ होकर बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानिओ की तपस्या मे उनके अन्तः करण मे संसार के प्रति मोह और कामासक्ति उत्पन्न करने की शक्ति प्राप्त करते हे |
 संकेत;-  

प्रजनन के देवता कामदेव ने कादिका बीज ‘क्लीं’की उपासना की थी |कामदेव अपने आराधन से इतने समर्थ हो गए के सभी देव और ऋषिगण को मोहित और  देह के प्रति आकर्षित कर जनित क्रियाओ मे रत रहने का चित्तभ्रम स्थापित करते है |माया   बीज ‘रीं’ और काम बीज’ ‘क्लीं’ के योग से ही 'हलीं ब्लें' इस परम साध्य मंत्र का उद्धार है| यही सौभाग्य ,संतति और अन्य नानाविध इच्छाओ की पूर्ति करता है | 
धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पञ्च विशिखाः
वसन्तः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः |
तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते कामपि कृपां
अपांगात्ते लब्ध्वा जगदिद-मनङ्गो विजयते || 6 
हे हिमगिरिसु ते .... कामदेव का धनुष पुष्पो से बना हुआ है और प्रत्यंचा ( डोरी ) मधुर गुंजन करते भ्रमरो से गूँथी गयी है | पाँच विषय – रस , रूप ,गंध ,शब्द ,स्पर्श उनके पाँच तीर (काम बाण) है जो सुवासित पुष्पो के बने माने गए है |बसंत ऋतु उनका मंत्री और उनका रथ माल्यागीरी का मंदगति से चलने वाला , अति सुगंधित वायु है |और  वे स्वयं अनंग ( शिवजी ने देह को भस्म कर दिया था तभी शरीर या देह रहित ) है| फिर भी  वो इस परम दिव्य शस्त्रो को लेकर समस्त जगत को अकेला ही जीत लेता है |उस पर आप के आराधन के फल स्वरूप आपकी अनिर्वचनीय किंचित कृपा का ही ये फल है कि वो सर्वत्र विजयी होता है|
 संकेत;- काम से ककार , मलय से लकार ,मौर्वी से ई , और पुष्प से अनुस्वार लेकर कलीं का उच्चारण किया जाता है | कामभाव को साधना समाधि के लिए बड़ा विज्ञ माना जाता है |जो स्वयं शिव की समाधि मे भी विक्षेप कर सके उसकी प्रबलता सर्वविदित है |काम का क्षय विशुद्ध ब्रम्हज्ञान के उदय से ही संभव होता है | समान्यतः साधक को कामभाव से ग्रसित कर आराधन से दूर करने की मंशा काम मे देखी जाती है |इसीलिए सभी मुमुक्षो को भगवती परा का शरण लेना अनिवार्य माना जाता है  ... माँ की कृपा और उन्ही  के श्रीचरण का निरंतर ध्यान करने से काम का प्रभाव बलहीन होता देखा जाता है |  
क्वणत्काञ्चीदामा करिकलभकुम्भस्तननता
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना |
धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधाना करतलैः
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका || 7
अपनी कटि प्रदेश ( कमर ) मे ‘कल-कल’ ध्वनि करने वाले घुंघरूओ से यूक्त मेखला धारण किए हुई ;हाथी के बच्चे के मस्तक पर स्थित कुंभो ( घड़ा ) के समान स्तनो के भार से थोड़ी  झुककर खड़ी हुई , अत्यंत पतले कटि प्रदेश वाली , शरदृ ऋतु के पुर्णिमा के चंद्र के समान मुखवाली , हाथो मे ईख से बना हुआ धनुष ,विषय रूपी पाँच पुष्पबाण , राग रूपीपाश एवम क्रोध रूपी अंकुश इत्यादि धारण करने वाली तथा जाग्रत ,स्वप्न और  सुसुप्ति रूपी त्रिपुर का संहार करनेवाले परम शिव के अहंकार स्वरूपिणी वह परम दिव्य परा शक्ति हमारे सामने ( ध्यान मे ) बिराजित रहे |
 संकेत;- 

बाण से ब ,करतल से ल ,मथितु: से उ ओर आस्ता से अनुस्वार लेकर ‘ब्लुं’ बीज का ग्रहण किया जाता है | “रीं ब्लुं” इस बीज का जप आरधक को देवी का सायुज्य सुलभ् कराता है |
सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे |
शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ||8
अमृत समुद्र के मध्य मे , सभी मनोरथों को पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्षो की वाटिकाओ से घिरे हुये ,मणियो के द्वीप (पर्वत) मे ; नीप (कदंब) वृक्षो के उपवन के मध्य चिंतामणियो से निर्मित भुवन मे ;परममंगलरूपी रत्नजड़ित त्रिकोणाकृति मंच पर , परम शिव की गोद मे बिराजमान चिदानंद लहरी स्वरूप आप का ध्यान कोई विरल अनेक जन्मो के पुण्य से पुलकित जन ही कर सकता है | वे धन्य  है|भगवती के भजन अराधन से चिदानंद की दिव्य तरंगो की जो अनुभूति होती  है|ऐसे साधक अराधक अल्प ही होते है  |जिन पर भगवती की ऐसी  कृपा हो ..वे ही अपने अराधन मे सफल हुये माने जाते है |
 संकेत;-  

शिवजी की गोद मे शक्ति को देखना.. ये कोई प्रणय मुद्रा ना समझ  कर शिवशक्ति का  एकात्म भाव देखना ही उचित माना जायेगा| 
महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि |
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ||9
मूलाधार चक्र मे पृथ्वी तत्व को ,एवं जल को भी मूलाधार चक्र मे ही ,मणिपुर चक्र मे अग्नि तत्व को जिसकी स्थिति स्वाधिष्ठान चक्र मे है |हदय स्थित अनाहत चक्र मे वायु तत्व को ,और उसके ऊपर विशुद्धि चक्र मे आकाश तत्व को और भौहों के ( भ्रमर) मध्य आज्ञा चक्र मे मन तत्व को |इस प्रकार सकल कुल पथ ( शक्ति के मार्ग ) सुषुम्ना मार्ग के द्वारा सभी चक्रो का भेदन कर के सहस्त्रदल वाले कमल मे अपने पति शिव से युक्त होकर विहार करती है|भेदन के समय शक्ति की गति मूलाधार से सहस्त्रार की ओर होती है |सहस्त्रार से नीचे उतरते समय वह नाड़ीयों को अमृत से सींचती हुई मूलाधार की ओर लौटती है |
 संकेत;-  

पिछले श्लोक मे कुंडलिनी को जाग्रत होकर मूलाधार से सहस्त्रार यात्रा की अत्रेय भूमिका के दिव्य वर्ण  के बाद इस श्लोक मे कुंडलिनी की प्रत्यावृत्त -भूमिका का वर्णन है |कु अर्थात पृथ्वी तत्व जहाँ लीन होता है उसे कुल कहते है ,वही आधार चक्र है |लक्षणा करने से सुषुम्णा मार्ग ही कुल है... यह सिद्धांत होता है |यही कौलमत का रहस्य भी है |सुषुम्णा के मूल मे कमल कनदाकार छिद्र मे विहारने वाली ही कुंडलिनी शक्ति है और वही परम दिव्य “श्री विद्या'' है |
चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि
प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः |
चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय
त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरणकोणाः परिणताः || 10
चार शिव चक्र ,उनसे भिन्न पाँच शिव युवतिया (शक्तिचक्र ) तथा प्रपंच के मूल कारण नौ तत्व से युक्त आपका निवास स्थान तिरलिस कणो का बना हुआ है |जो शंभु के बिन्दु स्थान से भिन्न है|वह अष्टदल , सोलहदल , तीन रेखाओ एवम तीन वृत्तो से युक्त है |
 संकेत;- ..!! सहस्त्रार चक्र मे रक्खे हुये आपके श्री चरणो के मध्य मे से जरनेवाली अमृत धाराओ की वर्षा से पञ्चमहाभूतो से रचित शरीर की समस्त नाड़िया ( प्रपंच ) को सींचती हुई अपने मूल स्थान मूलाधार को लौटकर अपना रूप सर्प के समान मंडलाकार मे परिवर्तित कर ( साढ़े तीन कुंडल ) डाल कर छोटे छिद्र वाले कुहर (गुफा) मे सोती है|सहस्त्रार से नीचे मूलाधार को उतारने को अन्वय भूमिका कहते है |
 संकेत;- 

पिछले श्लोक मे कुंडलिनी को जाग्रत होकर मूलाधार से सहस्त्रार यात्रा की अत्रेय भूमिका के दिव्य वर्ण  के बाद इस श्लोक मे कुंडलिनी की प्रत्यावृत्त -भूमिका का वर्णन है |कु अर्थात पृथ्वी तत्व जहाँ लीन होता है उसे कुल कहते है ,वही आधार चक्र है |लक्षणा करने से सुषुम्णा मार्ग ही कुल है... यह सिद्धांत होता है |यही कौलमत का रहस्य भी है |सुषुम्णा के मूल मे कमल कनदाकार छिद्र मे विहारने वाली ही कुंडलिनी शक्ति है और वही परम दिव्य “श्री विद्या'' है |
चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि
प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः |
चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय
त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरणकोणाः परिणताः |11 
चार शिव चक्र ,उनसे भिन्न पाँच शिव युवतिया (शक्तिचक्र ) तथा प्रपंच के मूल कारण नौ तत्व से युक्त आपका निवास स्थान तिरलिस कणो का बना हुआ है |जो शंभु के बिन्दु स्थान से भिन्न है|वह अष्टदल , सोलहदल , तीन रेखाओ एवम तीन वृत्तो से युक्त है |
 संकेत;- 

अति गुप्त श्रीचक्र ब्र्महांड ओर पिंड दोनों का प्रतिनिधित्व होता है |इसकी रचना चार शिव त्रिकोण और पाँच शक्तित्रिकोण के योग से होती है|शिव ओर शक्ति त्रिकोणो का मुख एक दूसरे से विपरीत होता है| श्रीयंत्र का लेखन दो प्रकार से होता है १- सृष्टिक्रम २- संहारक्रम|कौलाचार मे संहारक्रम होता है और समयाचार मे सृष्टिक्रम |यहाँ अभिप्राय ये है कि श्रीचक्र के मध्य मे ऊर्ध्व और  अधो त्रिकोण का स्वरूप शिवशक्ति का ही निरूपण है | 

त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं
कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चिप्रभृतयः |
यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा
तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् || 12
हे हिमवान की कन्या ... आप के सौंदर्य की उपमा देने के प्रयत्न मे ब्र्म्हाप्रभूति कविश्रेष्ठ इत्यादि कुछ-कुछ कल्पना किया करते  है ,परंतु वे भी पूर्णतः सफल नहीं है |उस सौंदर्य की इच्छा (उत्सुकता) से स्वर्ग की अप्सराये भी ध्यानस्थ हो जाती है और परम शिव के नयनों के मध्य मे उनका दर्शन करने के लिए अनेकों कठिन तपस्याओ से प्राप्त होने वाले दुर्लभ शिव सायुज्य पदवी को मानसिक रूप से प्राप्त करती है| परम शिव के नेत्रो के अलावा अन्य नेत्रो के लिये परा शक्ति के सौंदर्य का आनंद लेना असंभव होने के कारण देवस्त्रीया शिव से आत्मसात हो जाने की अर्थात सायुज्य पदवी की इच्छा करती है |

संकेत;- 

ब्र्म्हा सृष्टि के कर्ता है  इसलिये सर्व प्रथम कवि है |चतुर मुखो से वेदो का गान करते है | इसलिये सभी कवियों मे श्रेष्ठ है | परंतु वे भी भगवती की परम सौंदर्य की उपमा नहीं ढूंढ सके ...!! | इसलिये अन्य कवि तो केवल कल्पना ही कर सकते है | यदि अप्सरा आदि की उपमा दी जाए तो वे सभी भी भगवती का त्रिभुवन मोहन स्वरूप की ही समाधिस्थ हो कर आराधना करती है|यहाँ केवल शिव से युक्त होकर ही शक्ति का ऐक्य होना परम पदवी की उपलब्धि का ही गई है | केवल शिवजी ही कामासक्त नहीं है  तभी वो जगदंबा के अनुपम सौन्दर्य के द्रष्टा माने गये है |बाकी अन्य देव गण माँ के रूप स्वरूप और सौन्दर्य का निरूपण करने मे सर्वथा असमर्थ देखे जाते है |माँ का नारी देह धारण किये होना केवल लीला मात्र है| शक्ति के अनंत स्वरूप है| यहाँ  अन्य देव गण केवल नारी देह के भाव से ग्रसित हो कर कामासक्त होने के कारण देवी के दिव्य स्वरूप की महिमा  समझने और वर्णन मे असमर्थ देखे जाते है |

नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं
तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः |
गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया
हठात् त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः || 13

वृद्धावस्था को प्राप्त , देखने मे कुरूप ,प्रेमक्रीडा से अज्ञान पुरुष भी आप की कृपा द्रष्टि पड़ने मात्र से ऐसा रमणीय ( सुंदर ) हो जाता है कि सैकड़ों की संख्या मे युवतिया “ जिनके केश बिखरे हुये है , कूच –कलशों ( स्तनो ) से वस्त्र फिसल गए है  ,जिनकी मेखलाए जबरन टूट गई है और  जिनकी साड़ी ( वस्त्र –उपवसत्र ) शरीर पर से उतरी जा रही है |ऐसी अति सुंदरतम युवतिया भी जो पहले कुरूप था अब उसके पीछे  गिरते – पड़ते भागने लगती है |अतः स्त्रीरूप मे जिन शक्तिओ का वर्णन किया जाता है वे उससे आकर्षित होती है |
 संकेत;- 

यहा स्थूल कामुक भाव का वर्णन नहीं ....योग दर्शन के अनुसार रूपलावण्य ,बल ओर शरीर का वज्रवत सुगठित होना कायसंपत कहा जाता है |भूतजय से अणिमादि सिद्धियो की भी प्राप्ति होती है |प्रत्येक नाड़ियो मे अमृत का संचार होने का फल यही कायसंपत है |ऊर्ध्वरेता मनुष्य के शरीर की रसोत्पादकता बढ़ जाने से निर्माण शक्ति का हास बंध हो जाता है और स्नायुओ मे जीवन शक्ति का संचार होकर सातो धातुओ का विधिवत पुनः निर्माण होने लगता है |जैसे समस्त शरीर का रक्त हदय की ओर गति करता है|वैसे ही यहाँ युवतियो का दौड़ कर आने की उपमा भर समझना उचित माना जायेगा | 

क्षितौ षट्पञ्चाशद् द्विसमधिकपञ्चाशदुदके
हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपञ्चाशदनिले .
दिवि द्विष्षट्त्रिंशन्मनसि च चतुष्षष्टिरिति ये
मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ||14 

पृथ्वीतत्वरूपी मूलाधार मे 46 , जलतत्वरूपी मणिपुरचक्र मे 52, अग्नितत्वरूपी स्वाधिष्ठान मे 62, वायुतत्वरूपी अनाहद मे 54,आकाशतत्व से युक्त विशुद्द मे 62 , तथा मनतत्वरूपी आज्ञाचक्र मे जो 64 मयूख (किरण) है| उन सभी के ऊपर आप के श्री चरण कमल है | उपरोक्त किरणे छः चक्रो से संबंध रखने वाले तत्वो की है और  इन छहों चक्रो से ऊपर (आज्ञाचक्र) के ऊपर भगवती के श्रीचरण युगल शोभित होते है |सभी किरणों को सुषुम्ना मार्ग मे लीन करते हुये ( छःचक्रो ) का अतिक्रमण करते हुए आज्ञाचक्र के ऊपर अर्थात माँ भगवती के श्री चरणो तक पंहुचा जा सकता है |
संकेत;-

भगवती राजराजेश्वरी, त्रिपुरासुंदरी के श्री चरण आज्ञाचक्र के ऊपर बिराजित  है| यहाँ आराधना मार्ग का सुंदर निरूपण किया गया है| आध्यात्म मार्ग मे माँ के सायुज्य के इच्छुक साधक की क्रमश: सभी कामना, इच्छा और स्थूल देहभाव की आसक्तिओ का परित्याग कर एक एक चक्र मे आगे बढ़ते हुये भोग -विलास -काम का निर्मूलन होते ही देवी का शरण सहज होने का निर्देश समझाया गया है| 
शरज्ज्योत्स्नाशुद्धां शशियुतजटाजूटमुकुटां
वरत्रासत्राणस्फटिकघुटिकापुस्तककराम् |
सकृन्नत्वां नत्वा कथमिव सतां संन्निदधते
मधुक्षीरद्राक्षामधुरिमधुरीणाः कणितयः || 15

शरद पुर्णिमा की चन्द्रिका ( चाँदनी ) के समान स्वछ , निर्मल , धवल वर्णो वाली तथा द्वितीय के चंद्रमा युक्त जटाजूट रूपी मुकुटो से  सुशोभित , अपने दोनों हस्त मे वरदमुद्रा एवम सभी भय से मुक्ति की अभयमुद्रा को प्रदर्शित किए हुये तथा दोनों कर कमलो मे ,एक मे अति दिव्य विशुद्ध स्फटिक मणियो की माला एवम दूसरे मे पुस्तक धारण किए हुये  है |ऐसे आप के सौम्य स्वरूप का एक बार भी वंदना ना करने वाले मनुष्य को मधु , दूध एवम द्राक्षा के मिश्रण समान मधुर कविता करने की शक्ति केसे प्राप्त होगी ...??

 संकेत;-

ऋग्वेद  के अनुसार वर्णमयी सरस्वती चतुरपद वाली होती है जिसे विद्वान वेदज्ञ ब्राह्मण आराधते है | उनमे से तीन परा ,  पश्यन्ति और मध्यमा गुहा मे निहित है और चौथी वैखरी को मनुष्य वाचा प्रयोजन बोलते है | इस मंत्र के साथ सरस्वती के बीज ‘ऐं’ की उपासना की जाती है | यहाँ भाव ये बताया गया है कि माँ शारदा का आराधन नहीं करने वाला साधक बिना ज्ञान या भक्ति के माँ भगवती की अनंत महिमा को केसे समझ सकेगा | माँ त्रिगुणत्मिका है और त्रिविद्या  होने के कारण उनके स्वरूप मे शारदा ज्ञान और बुद्धि प्रदान करने का स्त्रोत समझाया गया है| 

कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबालातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् | 
विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतरशृङ्गारलहरी
गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतांरञ्जनममी || 16

कवि चक्रवर्तियों  के चित्तरूपी कमल वन को विकसित करने के लिए उदित होते सूर्य के समान ‘अरुणा ‘ नाम से आपको संबोधित करते है|आपका जो कोई महान पुरुष आप का भजन करते है|वे ब्र्म्हाजी की प्रिया (सरस्वती) की समृद्धि तरुणतर श्रुंगाररस की धारा  जैसी गंभीर कविताओ द्वारा ओजस्वी वाक शक्ति के द्वारा सज्जन पुरुष माँ भगवती का मनोरंजन किया करते है|इस रूप मे देवी की आराधना करने वाले पुरुषो को श्रुंगार रस से युक्त कविताओ की रचना करने की सामर्थ्य  शक्ति प्राप्त होती है|कवियों के चित्त रूपी कमल वन को विकसित करने के लिए अरुणादेवी बालाभगवती सूर्य के समान है|

 ... SHIVOHAM...sabhar Chidananda 

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मंगलवार, 14 सितंबर 2021

करोंदा की खेती और फायदे

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----------------++++++++++---------------+++++++++ कई फल और सब्जियां ऐसी हैं जो चलन में काफी कम हैं लेकिन हमारी सेहत के लिए काफी फायदेमंद हैं। लोग इस बात से भी कम ही वाकिफ हैं कि हमारी सेहत के लिए इनमें काफी फायदे छिपे हैं। अब करोंदे फल को ही लीजिए। स्वाद में खट्टे इस फल से लोग अनजान हैं लेकिन ये काफी गुणों से सम्पन्न हैं। गर्मी के मौसम में यह हमें देखने को मिलता है और पुरानी पीढ़ी तो प्रमुखता से इसका इस्तेमाल करती है। इसके सब्जी, आचार ,मुरब्बे ,चटनी सबके स्वाद एक से बढ़कर एक होते हैं। ग्लोबलाइजेशन का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि हम जिंदगी के हर क्षेत्र मैं बेहद सिमट गए हैं।हमारे खान-पान की भी बात की जाए तो अब सालों भर हम कुछ ही चंद चीजों को खाते-पीते रहते हैं। अब पहले जैसी विविधता नही रही है।मार्केटिंग के अभाव में कई सेहतमंद और दुर्लभ चीजों ने अपना दम तोड़ दिया है। करौंदे की फसल किसानों के लिए बहुत फायदेमंद रही है। ये फसल किसानों को मुनाफा देने के साथ-साथ उनकी फसल की सुरक्षा भी करती है। करौंदा झाड़ीनुमा कांटेदार वृक्ष होने की वजह से नीलगाय जैसे जंगली पशुओं को फसल का नुकसान करने के लिए रोकते हैं। करौंदा को किसी भी फसल या बागवानी के चारों तरफ लगाया जाता है, इसके 100 वृक्षों से 20 हजार रुपए की कमाई किसानों को होती है।यह वृक्ष भारत में राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तरप्रदेश और हिमालय के कई क्षेत्रों में पाया जाता है। करौंदे की फसल में लागत शून्य और मुनाफा भरपूर इसके एक पौधे की कीमत तकरीबन ₹2 के आसपास होती है।पौधे लगाने के बाद इसमें कोई विशेष देखभाल और अन्य लागत की जरूरत नहीं पड़ती। इसका पौधा लगने के डेढ़ साल के बाद फल लगने शुरू हो जाते हैं। अप्रैल के महीने में फूल मई-जून में फल लग जाते हैं। जुलाई का महीना आते-आते फल पूरी तरह से पक जाता है। करौंदे के पौधों की हर साल छटाई होती रहे तो उसके फल तोड़ने में कोई परेशानी नहीं होती है।” किसान भाई करौंदा से चटनी, अचार और मुरब्बा अपने घर में खाने भर का बना लेते हैं। इसका अचार तो कई महीने चलता है। स्थानीय बाजारों में भी इसकी अच्छी खासी मांग रहती है जिसे बेचकर किसान अच्छी इनकम प्राप्त कर सकते हैं। एक करौंदे के पौधे में कम से कम 10 किलो करौंदा आराम से निकल आता है। 1 किलो करौंदा की कीमत ₹20 के आसपास मिलती है। करोंदा के फायदे। करोंदा के कई गुणों में एक गुण यह है कि करोंदा हृदय के लिए फायदेमंद होता है। करोंदा में फ्लैनोनोइड एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो कि हमारी हृदय संबंधी बीमारियों से हिफाजत करता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता करोंदे में एंटीऑक्सीडेंट और फाइटोकेमिकल्स गुण होते हैं, जो हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं। इसमें करोंदे का जूस फायदेमंद साबित हो सकता है। पेट का अल्सर एक अध्ययन के अनुसार करोंदे में मौजूद पिग्मेंट पेट में मौजूद बैक्टीरिया से लड़ता हैं। यह आंतों की कोशिकाओं को ठीक करने में सहायक होता हैं, जिससे पेट के अल्सर से बचाव होता है। दांतों के लिए कैल्शियम की अच्छी मात्रा होने के कारण करोंदा दांतों के लिए फायदेमंद होता है। करोंदा में प्रोथेन्थोसाइडिन होता है जो मुंह को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक साबित होता है। मूत्र संक्रमण करोंदा मूत्र संक्रमण को रोकने में भी फायदेमंद माना जाता है। करोंदे में फ्लेवोनॉयड होता है, जो बैक्टीरिया को यूरिनरी टै्रक्ट में पैदा होने से रोकने में सहायक होता है। ©लवकुश आवाज एक पहल कम वजन करोंदे का जूस शरीर में जमा फैट को हटाने का काम करता है, इससे आसानी से बढ़ा हुआ वजन कम किया जा सकता है। इसमें काफी मात्रा में फाइबर होता है, जिससे लंबे समय तक भूख नहीं लगती। हड्डियों को मजबूती करोंदा हड्डियों को भी मजबूती देता है। इसकी वजह है करोंदे में प्राकृतिक रूप से कैल्शियम अच्छी मात्रा में पाया जाता है। इससे ऑस्टियोपोरोसिस होने का खतरा कम होता है। दमकती त्वचा करोंदा खाने से हमारी त्वचा में भी निखार आता है। इसमें पानी, विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों की भरमार होती है, जो हमारी त्वचा को निखारने में कारगर साबित होते हैं। रोकते हैं घटती याद्दाश्त करोंदा में उपस्थित फाइटोन्यूट्रिएंट्स और एंटीऑक्सीडेंट गुण बढ़ती उम्र से संबंधित परेशानियां जैसे कि याद्दाश्त में कमी और एकाग्रता की कमी को दूर करने में सहायक होते हैं। कैंसर में फायदा करोंदा में प्रोंथोसाइनिडिन की अच्छी मात्रा होती है, जो कैंसर कोशिकाओं के विकास को रोकता है। करोंदा में एंटी-कैंसर जन्य घटक होते हैं जो कैंसर की कोशिकाओं को बढऩे से रोकते हैं। बढेंग़े बाल करोंदे से बाल भी बढ़ते हैं। करोंदे में विटामिन-सी और विटामिन-ए होता है, जो बालों को बढऩे में मदद करते हैं। नियमित रूप से करोंदे का जूस पीने से बालों की ग्रोथ बढ़ती। मुंहासों में फायदा करोंदा में एंटीसेप्टिक गुण होते हैं जो त्वचा पर मुंहासे और फुंसियों को रोकने में सहायक होते हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण पर्याप्त मात्रा में होते हैं जो मुंहासों और फुंसियों को कम करते हैं। sabhar Facebook wall

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सोमवार, 13 सितंबर 2021

पूर्णांक 108 का रहस्य

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“ओ३म्” का जप करते समय १०८ प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है, जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास में अत्यन्त प्रबल कारण है।

मेरा आप सभी से अनुरोध है बिना अंधविश्वास समझे कर्तव्य भाव से इस “पूर्णांक १०८” को पवित्र अंक स्वीकार कर, आर्य वैदिक संस्कृति के आपसी सहयोग, सहायता व पहचान हेतु निःसंकोच प्रयोग करें, इसका प्रयोग प्रथम दृष्टिपात स्थान पर करें । यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय काल से हमारे ऋषि मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है और अब अति शीघ्र यही अंक हमारी महान सनातन वैदिक संस्कृति के लिये प्रगाढ़ एकता का विशेष संकेत अंक (code word) बन जायेगा।

संख्या १०८ का रहस्य
अ-१ आ- २ इ- ३ ई- ४ उ- ५ ऊ- ६. ए- ७ ऐ- ८ ओ- ९ औ- १० ऋ- ११ लृ- १२ अं- १३ अ:- १४ ऋॄ - १५ लॄ -१६

क- १  ख- २  ग- ३  घ- ४  ङ- ५  च- ६  छ- ७  ज- ८ झ- ९ ञ- १०  ट- ११  ठ- १२  ड- १३ ढ-१४  ण- १५  त- १६  थ- १७  द- १८  ध- १९  न- २०  प- २१  फ- २२  ब- २३  भ- २४ -  म- २५ -  य- २६ -  र- २७  ल- २८  व- २९  श- ३०  ष- ३१  स- ३२  ह- ३३  क्ष- ३४  त्र- ३५ ज्ञ- ३६  ड़ - ढ़ ।

ओं खम् ब्रह्म
ब्रह्म = ब+र+ह+म =२३+२७+३३+२५=१०८

01. यह मात्रिकाएँ
(१८स्वर+३६ व्यंजन=५४)
नाभि से आरम्भ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे १०८ की संख्या बन जाती हैं। इस प्रकार १०८ मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की १०८ सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है। अधिक जितना हो सके उतना उत्तम है पर नित्य कम से कम १०८ मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए ।

02. मनुष्य शरीर की ऊँचाई
= यज्ञोपवीत(जनेउ) की परिधि
= (४ अँगुलियों) का २७ गुणा होती है।
= ४ × २७ = १०८

03. नक्षत्रों की कुल संख्या = २७
प्रत्येक नक्षत्र के चरण = ४
जप की विशिष्ट संख्या = १०८
अर्थात गायत्री आदि मंत्र जप कम से कम १०८ बार करना चाहिये ।

04. एक अद्भुत अनुपातिक रहस्य
पृथ्वी से सूर्य की दूरी/ सूर्य का व्यास=१०८
पृथ्वी से चन्द्र की दूरी/ चन्द्र का व्यास=१०८
अर्थात मन्त्र जप १०८ से कम नहीं करना चाहिये।

05. हिंसात्मक पापों की संख्या ३६ मानी गई है जो मन, वचन व कर्म ३ प्रकार से होते है। अत: पाप कर्म संस्कार निवृत्ति हेतु किये गये मंत्र जप को कम से कम १०८ अवश्य ही करना चाहिये।

06. सामान्यत: २४ घंटे में एक व्यक्ति २१६०० बार सांस लेता है। दिन-रात के २४ घंटों में से १२ घंटे सोने व गृहस्थ कर्त्तव्य में व्यतीत हो जाते हैं और शेष १२ घंटों में व्यक्ति जो सांस लेता है वह है १०८०० बार।
इसी समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये । इसीलिए १०८०० की इसी संख्या के आधार पर जप के लिये १०८ की संख्या निर्धारित करते हैं।

07. एक वर्ष में सूर्य २१६०० कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माह दक्षिणायन में। अत: सूर्य छः माह की एक स्थितिमें १०८००० बार कलाएं बदलता है।

08. ब्रह्मांड को १२ भागों में विभाजित किया गया है। इन १२ भागों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन १२ राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या ९ में राशियों की संख्या १२ से गुणा करें तो संख्या १०८ प्राप्त हो जाती है।

09. १०८ में तीन अंक हैं १+०+८. इनमें एक “१” ईश्वर का प्रतीक है। शून्य “०” प्रकृति को दर्शाता है। आठ “८” जीवात्मा को दर्शाता है, क्योकि योग के अष्टांग नियमों से ही जीव प्रभु से मिल सकता है । जो व्यक्ति अष्टांग योग द्वारा प्रकृति के विरक्त हो कर ( मोह माया लोभ आदि से विरक्त होकर ) ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है उसे सिद्ध पुरुष कहते हैं। जीव “८” को परमपिता परमात्मा से मिलने के लिए प्रकृति “०” का सहारा लेना पड़ता है। ईश्वर और जीव के बीच में प्रकृति है। आत्मा जब प्रकृति को शून्य समझता है तभी ईश्वर “१” का साक्षात्कार कर सकता है। प्रकृति “०” में क्षणिक सुख है और परमात्मा में अनंत और असीम। जब तक जीव प्रकृति “०” को जो कि जड़ है उसका त्याग नहीं करेगा, शून्य नही करेगा, मोह माया को नहीं त्यागेगा तब तक जीव “८” ईश्वर “१” से नहीं मिल पायेगा पूर्णता (१+८=९) को नहीं प्राप्त कर पायेगा । ९ पूर्णता का सूचक है।

10. वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार
अहंकार के गुण = २
बुद्धि के गुण = ३
मन के गुण = ४
आकाश के गुण = ५
वायु के गुण = ६
अग्नि के गुण = ७
जल के गुण = ८
पॄथ्वी के गुण = ९
२+३+४+५+६+७+८+९ =अत: प्रकॄति के कुल गुण = ४४
जीव के गुण = १०
इस प्रकार संख्या का योग = ५४
अत: सृष्टि उत्पत्ति की संख्या = ५४
एवं सृष्टि प्रलय की संख्या = ५४
दोंनों संख्याओं का योग = १०८

11. Vertual Holy Trinity
संख्या “१” एक ईश्वर का संकेत है।
संख्या “०” जड़ प्रकृति का संकेत है।
संख्या “८” बहुआयामी जीवात्मा का संकेत है। [ यह तीन अनादि परम वैदिक सत्य हैं ] [ यही पवित्र त्रेतवाद ( Holy Trinity ) है ]
संख्या “२” से “९” तक एक बात सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में “०” रूपी स्थान पर जीवन है। इसलिये यदि “०” न हो तो कोई क्रम गणना आदि नहीं हो सकती।
“१” की चेतना से “८” का खेल । “८” यानी “२” से “९” । यह “८” क्या है ? मन के “८” वर्ग या भाव ।
ये आठ भाव ये हैं – १. काम ( विभिन्न इच्छायें / वासनायें ) । २. क्रोध । ३. लोभ । ४. मोह । ५. मद ( घमण्ड ) । ६. मत्सर ( जलन ) । ७. ज्ञान । ८. वैराग ।
एक सामान्य आत्मा से महानात्मा तक की यात्रा का प्रतीक है — १०८ इन आठ भावों में जीवन का ये खेल चल रहा है ।

12. सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं और ये चारो ओर से अलग-अलग निकलती है। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बनें । इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनका पृथ्वी के आठ बसुओं से टक्कर होती हैं। सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ बसुओं की आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है। 1+0+8=9 यह 9 अंक राज राजेश्वरी का प्रिय हे। जिस प्रकार भगवती नित्य पूर्ण हे यह अंक भी पूर्ण है। sabhar aghore tantra Facebook wall

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वाक् शुद्धि : हर ध्वनि हम पर असर डालती है

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अध्यात्म की साधना करने वालों को मन्त्रों का जप करने की सलाह क्यों डी जाती है? क्या असर होता है उस ध्वनि का जो हम बोलते हैं? क्या है वाक् शुद्धि, मंत्र साधना?

 हम जिस तरह की ध्वनि सुनते हैं उसका अपने ऊपर असर तो हम कई बार महसूस कर लेते हैं, लेकिन कभी सोचा है कि हम जो बोलते हैं उसका असर हम पर क्या होता है? हमारी बोली गई ध्वनि का असर सुनने वाले से अधिक खुद हम पर पड़ता है। कैसे?

 
जीवन के सूक्ष्म आयामों को जानने और समझने के लिए, शरीर, मन, रसायन, (न्युरोलोजिकल) तंत्रिका तंत्र और ऊर्जा तंत्र को तैयार करना जरूरी होता है। व्यक्ति के पास एक ऊर्जावान भौतिक शरीर होना चाहिए। तंत्रिका तंत्र पूरी तरह सक्रिय और जीवंत होना चाहिए। प्राणशक्ति पूरी तरह सक्रिय और संतुलित होनी चाहिए और आपका मन बाधक नहीं बल्कि सहायक होना चाहिए। सवाल यह है कि इसकी तैयारी में कितने जीवन लगेंगे? यह निर्भर करता है कि आप कितने बिगड़े हुए हैं।

हो सकता है कि आप उस आदमी को न रोक पाएं, जो आपके बगल में चिल्ला रहा हो, लेकिन कम से कम आप जो बोलते हैं, उस ध्वनि को तो शुद्ध कर सकते हैं। क्योंकि आप जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हैं, उनका असर आपके ऊपर सबसे अधिक होता है।

आपकी जो जीवनशैली है और आप अपने भीतर जिस किस्म का रसायन विकसित कर रहे हैं, उसके कारण तंत्रिका तंत्र गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो सकता है। लेकिन भले ही आपका सिस्टम बुरी तरह बिगड़ा हुआ हो, आपने लगातार अपने अंदर गलत रसायन पैदा किया हो और उसने आपके तंत्रिका तंत्र को बेकार कर दिया हो, यहां तक कि अगर आपने बाहरी मदद से अपने शरीर में रसायन डाले हों और उससे आपको बुरी तरह नुकसान पहुंचा हो, तब भी अगर आप ईमानदारी से कोशिश करना चाहते हैं, तो लगभग हर किसी के लिए यह तैयारी संभव है।
सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए यह संभव नहीं है जिन्हें कुछ खास रोगों ने स्थायी नुकसान पहुंचा दिया हो। उन्हें और अधिक समय की जरूरत होगी। दूसरों के लिए, यह सिर्फ प्राथमिकता का सवाल है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना समय देते हैं, दिन में 21 मिनट या 21 घंटे या उसके बीच कहीं। चुंकि यह संभव है, इसलिए इस बारे में बात करना और कोशिश करना महत्वपूर्ण है। अगर ऐसी कोई संभावना ही नहीं होती, तो इन सब बातों का कोई मतलब नहीं होता।

सही किस्म की ध्वनियां

सही तरह के भोजन, विचार, श्वास प्रक्रिया, मनोभाव और भावनाओं से आपके शरीर को ठीक करते हुए उसका कायाकल्प किया जा सकता है। इसी तरह उचित शब्दों को बोलना और सही तरह की ध्वनियां सुनना भी महत्वपूर्ण है। इससे आपका तंत्रिका तंत्र अपने आस-पास के जीवन के प्रति संवेदनशील हो पाएगा। क्या आपने ध्यान दिया है कि जब आप कुछ घंटों तक गाड़ियों या मशीनों की कर्कश आवाजें सुनते हैं, तो आपको अपने आसपास की साधारण चीजों को भी ठीक से समझने में मुश्किल होती है। जबकि किसी दिन अगर आप सिर्फ घर पर बैठे कुछ शास्त्रीय संगीत सुन रहे होते हैं, उस दिन आपका दिमाग तेज और सजग होता है और बहुत आसानी से चीजों को समझ लेता है। अगर आप सचेतन होकर, इन चीजों पर अधिक से अधिक ध्यान दें, या कम से कम इस बारे में सचेत रहें कि किस तरह की ध्वनि आपके सिस्टम को नुकसान पहुंचा रही है और किस तरह की ध्वनि से लाभ होता है, तो आप उन ध्‍वनियों को शुद्ध कर लेंगे, जिनका आप उच्चारण करते हैं। हो सकता है कि आप उस आदमी को न रोक पाएं, जो आपके बगल में चिल्ला रहा हो, लेकिन कम से कम आप जो बोलते हैं, उस ध्वनि को तो शुद्ध कर सकते हैं। क्योंकि आप जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हैं, उनका असर आपके ऊपर सबसे अधिक होता है।

वाक् शुद्धि

आप जो बोलते हैं, वह सबसे महत्वपूर्ण है। इसे वाक शुद्धि कहा जाता है। वाक शुद्धि का मतलब प्यारी और लुभावनी बातें बोलना नहीं है। इसका मतलब है, सही ध्वनियों का उच्चारण करना। आपको जो भी बोलना है, उसे इस तरीके से बोलें कि वह आपके लिए लाभदायक हो। और जो भी चीज आपके लिए लाभदायक होगी, वह स्वाभाविक रूप से आपके आस-पास हर किसी के लिए भी फायदेमंद होगी। अगर कोई ध्वनि आपके लिए बहुत असरदार साबित हो रही है, तो निश्चित रूप से वह आपके आस-पास हर किसी पर उतना ही असर करेगी।
ऊर्जा को संतुलित रखने के लिए ध्वनि महत्वपूर्ण है। उसके साथ भोजन, भावनाओं और साधना पर भी ध्यान देना जरूरी है। अगर इसका ध्यान रखा जाए तो आप धीरे-धीरे ऐसा शरीर विकसित कर लेंगे जिसमें बोध करने की क्षमता होगी। यदि आप इस मानव शरीर को एक अधिक ऊंची संभावना के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो सही किस्म की ध्वनियों या स्पंदन का एक आधार जरूरी है।

वाक शुद्धि का मतलब प्यारी और लुभावनी बातें बोलना नहीं है। इसका मतलब है, सही ध्वनियों का उच्चारण करना।

वरना आपका सिस्टम हमेशा आपके पीछे घिसटता ही रहेगा। अगर आप उसे एक अधिक बड़ी संभावना बनाना चाहते हैं, तो उसके लिए सही किस्म के स्पंदन की बुनियाद जरूर होनी चाहिए। वाक शुद्धि इसका एक महत्वपूर्ण अंग है। वाक शुद्धि का मतलब है कि आप जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हैं, उन्हें शुद्ध बनाना। यदि आप सिर्फ अपने भीतर मौन हो जाएं, तो इससे बेहतर कोई तरीका नहीं है। यह सबसे बढ़िया तरीका है। परंतु यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है, तो अगली बेहतरीन चीज है, ‘शिव’ शब्द का उच्चारण। यह शब्द निश्चलता या मौन के सबसे करीब है। यदि सिर्फ एक शब्द आपके लिए काफी नहीं है, तो आप थोड़ी और व्यापक चीज अपना सकते हैं – आप ‘ब्रह्मानंद स्वरूप’ या यहां मौजूद आध्यात्मिक मंत्रों में से अपनी पसंद के किसी भी मंत्र का जाप कर सकते हैं। जिस मंत्र के साथ आप सहज हों, उसका जाप करें।

ध्वनि और सही मनोभाव दोनों जरुरी है

ध्वनि एक चीज है, लेकिन एक और चीज है, ध्वनि के उच्चारण के पीछे की नीयत या लक्ष्य। बोलने की क्षमता मनुष्य को मिला एक विशेष उपहार है। बोले जाने वाले शब्दों की जटिलता के हिसाब से कोई और जीव इंसान की बराबरी नहीं कर सकता। लेकिन एक इंसान द्वारा बोले जाने वाले शब्दों की रेंज जितनी कम होगी, उसकी वाक शुद्धि उतनी ही कम होगी। भारतीय भाषाओं की तुलना में, अंग्रेजी में शब्दों या ध्वनियों की रेंज कम है। इसी वजह से अगर आप अपने जन्म से केवल अंग्रेजी ही बोलते रहे हैं, तो आपके लिए कोई मंत्र या दूसरी भाषा बोलना बहुत मुश्किल होगा।
यदि ध्वनियों या शब्दों की संरचना वैज्ञानिक तरीके से की जाती, जैसा कि मंत्रों और संस्कृत भाषा में होता है तो बिना अधिक जागरूकता के भी कुछ बोलने पर, ध्वनियों की एक खास व्यवस्था के कारण आपको लाभ होता। संस्कृत भाषा को काफी सोच समझकर तैयार किया गया था ताकि सिर्फ उस भाषा को बोलने से ही शरीर का शुद्धिकरण हो सके। लेकिन अब हम ज्यादातर ऐसी भाषाएं बोलते हैं, जिन्हें इस तरह तैयार नहीं किया गया है। इसलिए बेहतर है कि इस कमजोरी को संभालने के लिए आप सही इरादे के साथ बोलें। आपको जागरूकता और मजबूत इरादे के साथ इसे ठीक करना होगा क्योंकि कार्मिक प्रक्रिया का संबंध आपके इरादे से अधिक है, कर्मों से नहीं। आप एक ही बात को बेहद प्रेम के कारण भी कह सकते हैं या किसी दूसरे इरादे से भी कह सकते हैं। दोनों का शरीर पर एक जैसा असर नहीं होगा।
अगर आप जो कुछ भी बोलते हैं, उसके एक-एक शब्द में सही इरादा रखें, तो ये शब्द या ध्वनियां आपके भीतर एक खास तरह से स्पंदित होंगी। इसलिए यदि आप किसी से बात कर रहे हैं, तो इस तरह बोलें मानो ये शब्द उस व्यक्ति के लिए आपके आखिरी शब्द हों। यदि आप हर किसी के साथ ऐसा ही करें,  तो यह आपकी वाक शुद्धि करने का बहुत बढ़िया तरीका है।

Isha Foundation

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प्राणायाम -ध्यान -समाधि क लिए चेतावनी

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           आध्यात्मिक क्षेत्र मे भक्ति करने के लिए जब योगक्रिया मे प्राणायाम-ध्यान-समाधि करने के लिए शरीर मे कोईभी प्रकार की तकलीफ ना होवे ईसिके लिए प्राणायाम-ध्यान-समाधि करने के बाद शरीर मे ठंडी लगती है अगर तो गरमी लगती है ईसिके लिए प्राणायाम-ध्यान-समाधि करने के बाद उठने के बाद शरीर मे गरमी लगेतो एक ग्लास ठंडा दूध मे दो चमची शहद डालकर तुरंत पी जानेका ईसिलिए शरीर मे गरमी नही लगेगी और प्राणायाम-ध्यान-समाधि करके उठने के बाद शरीर मे ठंडी लगेतो एक कप चाय या तो गरम दूध मे गरम मसाले सूंठ, काळामरी, दावचीनी ये तीनो सप्रमाण मे एक कप चाय मे एक ग्राम जितना मसाला डालकर पी जानेका ईसिलिए शरीर मे ठंडी नही लगेगी ये दोनो चीजे प्राणायाम के बाद लेना फरजियात होता है नहीं तो शरीर का बेलेन्स बिगड जाता है और प्राणायाम-ध्यान-समाधि करके के बाद 15 से 20 मिनिट तक पानी कभी पीना मत कीतनी भी  प्यास लगेतो भी पानी कभी मत पीना 15 से 20 मिनिट के बाद पानी आप पी शकते हो ईसिके पहले कभी पानी मत पीना नहितर तुरंत ही दो मिनिट मे आपको शरदी-झुकीम हो जायेगा ये बात का हंमेशा के लिए आपको ख्याल रखना पडेगा. 

           प्राणायाम-ध्यान-समाधि करने के लिए आपका अपान वायुं दुर्गन्ध रहित होना चाहिए अगर आपका अपान वायुं दुर्गन्ध वाला होगा तो आपका शरीर रोगिष्ट बन जायेगा ये बात का भी आपको ख्याल कखना पडेगा अपान वायुं मेसे दुर्गन्ध हटाने के लिए आपको कबजियात नही रहना चाहिए अगर आपका अपान वायुं दुर्गन्ध वाला है आपको कबजीयात,,गेस की तकलीफ है तो आपको 
(1):- 250ग्राम हरडे का चूरण 
(2):- 100ग्राम अजवाइन चूरण
(3):- 50ग्राम संचण (संचोडो-काला नमक) 
  ये तीनो चीजो परचारीकी दुकान से लाकर तीनो चूरण मिक्ष करके एक बोटल मे भरलो. हरदिन सांज को खाना खाने के बाद एक चमची चूरण पानी के साथ हरदिन पी जानेका ये चूरण से कबजीयात, गेस पित्त की समस्या नही रहती और आपका अपान वायुं भी गंधसे रहित हो जायेगा. सांम को खाना खाने के बाद एक कलाक के बाद ये चूरण हंमेशा के लिए आपको लेना है. ये चूरण से आपके शरीर मे वात-पित्त-कफ तीनो दोष मिट जायेगा तीनो दोष कंन्ट्रोल मे रहेगा ईसिलिए आपका शरीर भी निरोगी बन जायेगा ये चूरण तो कोईभी मानव ले सकते है  .और प्राणायाम-ध्यान-समाधि करके के लिए खाना खाने के बाद तीन कलाक के बाद हंमेशा करना टुंक मे भूखा पेट प्राणायाम-ध्यान-समाधि करना फरजियात है. और समाधि मे जाने के लिए अगले दिन से आपको खोराक बंध करना पडता है. होजरी मे या तो आंतर मे जूना मल नही होना चाहिए खोराक भी नहीं होना चाहिए होजरी और आंतर दोनो खाली करके समाधि मे आप बैठ शकते हो. होजरी और आंतर दोनो मे खोराक का या तो मल का कण भी रहेगा तो आप समाधि मे से वीपिस नही उतर शकते क्युकिं जल समाधि लगती है तब जो होजरी मे यो तो आंतर मे जूना मल होगा तो अपान वायुं कंठ की तमाम नशे ब्लोक कर देती है. वो डोज की नशे बंध हो जाने से आप समाधि मेसे नीचे नही उतर शकते और कायम के लिए आपकी समाधि लग जायेगी ईसिलिए ये बात का आपको बहुत ख्याल रखना पडेगा ईसिके पहले कभी समाधि मे मत जाना नहीतो आपका शरीर छूट जायेगा. 

       ---गगनगीरीजी महाराज

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ध्यान में होने वाले अनुभव

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साधकों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं. अनेक साधकों के ध्यान में होने वाले अनुभव एकत्रित कर यहाँ वर्णन कर रहे हैं ताकि नए साधक अपनी साधना में अपनी साधना में यदि उन अनुभवों को अनुभव करते हों तो वे अपनी साधना की प्रगति, स्थिति व बाधाओं को ठीक प्रकार से जान सकें और स्थिति व परिस्थिति के अनुरूप निर्णय ले सकें.

१. भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर पहले काला और फिर नीला रंग दिखाई देता है. फिर पीले रंग की परिधि वाले नीला रंग भरे हुए गोले एक के अन्दर एक विलीन होते हुए दिखाई देते हैं. एक पीली परिधि वाला नीला गोला घूमता हुआ धीरे-धीरे छोटा होता हुआ अदृश्य हो जाता है और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है. इस प्रकार यह क्रम बहुत देर तक चलता रहता है. साधक यह सोचता है इक यह क्या है, इसका अर्थ क्या है ? इस प्रकार दिखने वाला नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं जीवात्मा का रंग है. नीले रंग के रूप में जीवात्मा ही दिखाई पड़ती है. पीला रंग आत्मा का प्रकाश है जो जीवात्मा के आत्मा के भीतर होने का संकेत है.

इस प्रकार के गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत होने का लक्षण है. इससे भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्षा दीखने लगते है और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं. साथ ही हमारे मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे हम असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेते हैं.

२. कुण्डलिनी जागरण का अनुभव :-

कुण्डलिनी वह दिव्य शक्ति है जिससे सब जीव जीवन धारण करते हैं, समस्त कार्य करते हैं और फिर परमात्मा में लीन हो जाते हैं. अर्थात यह ईश्वर की साक्षात् शक्ति है. यह कुदालिनी शक्ति सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर शारीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार चक्र में स्थित होती है. जब तक यह इस प्रकार नीचे रहती है तब तक हम सांसारिक विषयों की ओर भागते रहते हैं. परन्तु जब यह जाग्रत होती है तो उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि कोई सर्पिलाकार तरंग है जिसका एक छोर मूलाधार चक्र पर जुदा हुआ है और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ घूमता हुआ ऊपर उठ रहा है. यह बड़ा ही दिव्य अनुभव होता है. यह छोर गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है.

जब कुण्डलिनी जाग्रत होने लगती है तो पहले मूलाधार चक्र में स्पंदन का अनुभव होने लगता है. यह स्पंदन लगभग वैसा ही होता है जैसे हमारा कोई अंग फड़कता है. फिर वह कुण्डलिनी तेजी से ऊपर उठती है और किसी एक चक्र पर जाकर रुक जाती है. जिस चक्र पर जाकर वह रूकती है उसको व उससे नीचे के चक्रों को वह स्वच्छ कर देती है, यानि उनमें स्थित नकारात्मक उर्जा को नष्ट कर देती है. इस प्रकार कुण्डलिनी जाग्रत होने पर हम सांसारिक विषय भोगों से विरक्त हो जाते हैं और ईश्वर प्राप्ति की ओर हमारा मन लग जाता है. इसके अतिरिक्त हमारी कार्यक्षमता कई गुना बढ जाती है. कठिन कार्य भी हम शीघ्रता से कर लेते हैं.

३. कुण्डलिनी जागरण के लक्षण :

कुण्डलिनी जागरण के सामान्य लक्षण हैं : ध्यान में ईष्ट देव का दिखाई देना या हूं हूं या गर्जना के शब्द करना, गेंद की तरह एक ही स्थान पर फुदकना, गर्दन का भाग ऊंचा उठ जाना, सर में चोटी रखने की जगह यानि सहस्रार चक्र पर चींटियाँ चलने जैसा लगना, कपाल ऊपर की तरफ तेजी से खिंच रहा है ऐसा लगना, मुंह का पूरा खुलना और चेहरे की मांसपेशियों का ऊपर खींचना और ऐसा लगना कि कुछ है जो ऊपर जाने की कोशिश कर रहा है.

४. एक से अधिक शरीरों का अनुभव होना :

कई बार साधकों को एक से अधिक शरीरों का अनुभव होने लगता है. यानि एक तो यह स्थूल शारीर है और उस शरीर से निकलते हुए २ अन्य शरीर. तब साधक कई बार घबरा जाता है. वह सोचता है कि ये ना जाने क्या है और साधना छोड़ भी देता है. परन्तु घबराने जैसी कोई बात नहीं होती है.

एक तो यह हमारा स्थूल शरीर है. दूसरा शरीर सूक्ष्म शरीर (मनोमय शरीर) कहलाता है तीसरा शरीर कारण शारीर कहलाता है. सूक्ष्म शरीर या मनोमय शरीर भी हमारे स्थूल शारीर की तरह ही है यानि यह भी सब कुछ देख सकता है, सूंघ सकता है, खा सकता है, चल सकता है, बोल सकता है आदि. परन्तु इसके लिए कोई दीवार नहीं है यह सब जगह आ जा सकता है क्योंकि मन का संकल्प ही इसका स्वरुप है. तीसरा शरीर कारण शरीर है इसमें शरीर की वासना के बीज विद्यमान होते हैं. मृत्यु के बाद यही कारण शरीर एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाता है और इसी के प्रकाश से पुनः मनोमय व स्थूल शरीर की प्राप्ति होती है अर्थात नया जन्म होता है. इसी कारण शरीर से कई सिद्ध योगी परकाय प्रवेश में समर्थ हो जाते हैं. Sabhar satsang Facebook wall

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शनिवार, 11 सितंबर 2021

ब्रह्म साक्षात्कार

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❓ ब्रह्म साक्षात्कार का वास्तविक अर्थ क्या है ? हम कैसे जानेंगे कि हमने ब्रह्म साक्षात्कार कर लिया है?
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ॐ जब साधक साधना करते हुए प्राण वायु पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है और प्राण का प्रवाह सुषुम्ना मार्ग के अवरोधों को पार करते हुए आज्ञा चक्र को पार कर  नाद ध्वनि का साक्षात्कार कर लेता है , तब उसे मानना चाहिए कि वह ब्रह्म के क्रियात्मक अस्तित्व को जानने लगा है ।उसकी क्रिया शक्ति को उसने अपने ही शरीर में महसूस कर लिया है । यह नाद 10 प्रकार का होता है । इसमें सबसे उच्च स्तरीय नाद ओंकार की ध्वनि के समान है ।यह नाद ही है जो संपूर्ण ब्रह्मांड को गतिमान किए हुए है और हमारे संपूर्ण शरीर की क्रियाओं को संचालित करने का मुख्य कारण यह नाद ब्रह्म ही है । यदि इस संपूर्ण  ब्रह्मांड के सृजन एवं क्रिया का कारण खोजा जाए तो यह नाद ही इसका एकमात्र कारण है । हमारे शरीर में यह नाद ही कारण शरीर का प्रतिनिधित्व करता है । इसे हम ईश्वर भी कह सकते हैं जो त्रिगुणात्मक प्रकृति को नियंत्रित एवं संचालित करता है । इसी के द्वारा त्रिगुणात्मक प्रकृति का संचालन हो रहा है।जब साधक नाद ब्रह्म का साक्षात्कार करता है तो प्रारंभ में यह नाद अत्यंत धीमा होता है  किंतु बाद में यह बहुत तीव्र होता जाता है उच्च स्तरीय तीव्रता को प्राप्त होने के बाद जैसे-जैसे साधक अपनी साधना को आगे बढ़ाते जाता है ,वैसे वैसे यह नाद  क्रमश  धीरे-धीरे धीमा होता चला जाता है और यही नाद प्रकाश तत्व में बदलता जाता है । धीरे-धीरे साधक का आज्ञा चक्र पूर्ण प्रकाशित हो जाता है और ऐसी स्थिति में उसे अमृत के स्राव का आनंद भी प्राप्त होने लगता है । इससे आगे जैसे-जैसे साधक की साधना आगे बढ़ती है। आज्ञा चक्र से प्रकाश तत्व का विस्तार सहस्रार चक्र की ओर होने लगता है । सहस्रार चक्र में प्रकाश तत्व का विस्तार पूर्ण व्यापक होने लगता है । संपूर्ण सहस्रार चक्र प्रकाशित होता जाता है और सहस्रार चक्र से असीम आनंददायी लहरें उठने लगती हैं । इस स्थिति में अमृत का स्राव अत्यधिक बढ़ जाता है । इससे संपूर्ण शरीर आनंद की आगोश से भर जाता है । जब संपूर्ण शरीर में यह आनंद दोड़ने लगता है और  साधक घंटों इस आनंद में डूबा रहता है ,तभी सहस्रार चक्र से एकाएक हृदय चक्र में असीम तेजोमयी श्वेत शीतल  प्रकाश उत्पन्न होता है ।एक श्वेत शीतल आनंददायी प्रकाश जिसे प्राप्त करके साधक पूर्ण आत्म विभोर हो जाता है । इसे प्राप्त करके साधक अपनी पूर्णता का अहसास करता है। साधक अपने भीतर एवं बाहर संपूर्ण सृष्टि में एक ही आत्म तत्व का विस्तार प्रकाशित होता हुआ देखता है। यही है -"परब्रह्म  के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार "। यदि कोई साधक यहां तक पहुंच पाता है और संसार की इस महानतम उपलब्धि को प्राप्त करता है  तो उसे मान लेना चाहिए कि उसने ब्रह्म की क्रिया शक्ति के साथ अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप अर्थात ब्रह्म स्वरूप का साक्षात्कार कर लिया है ।उसकी आत्मा ने अपने ब्रह्म स्वरूप को बुद्धि के समक्ष प्रकट कर दिया है। यह किसी भी  उच्च स्तरीय योगी साधक के द्वारा ब्रह्म के स्वरूप को व्यक्त करने की अंतिम शब्द सीमा है। इससे आगे  कोई भी महानतम साधक  एक भी शब्द  अभिव्यक्त नहीं कर सकता  क्योंकि अब अभिव्यक्त करने जैसा कुछ भी नहीं है ।इससे आगे बढ़ने पर साधक निर्विचार, निर्विकल्प समाधि की ओर गति करता है। जहां पर मन ,बुद्धि ,अहंकार आदि क्रियाहीन हो जाते हैं । मन के क्रिया हीन होने से समस्त इंद्रियां अपने अपने कार्य करना बंद कर देती है ।जिससे इनके समस्त कार्य अवरुद्ध हो जाते हैं ।निर्विचार ,निर्विकल्प या असंप्रज्ञात समाधि में स्थित हो जाना ब्रह्म में पूर्ण स्थिति को प्राप्त कर लेना है । जहां पर सिर्फ और सिर्फ उस ब्रह्म के सिवा कुछ भी शेष नहीं रहता । इस स्थिति में स्थित होने वाला साधक  माया के संपूर्ण आवरण को हमेशा हमेशा के लिए मिटा देता है और पूर्ण ब्रह्म परमात्मा में लीन होकर  मुक्त हो जाता है -हमेशा हमेशा के लिए।
                      -- रामेश्वर हिंदू
      ⚜🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜
🌞 अखिल विश्व गायत्री परिवार अकलेरा
     ⚜🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜

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बुधवार, 8 सितंबर 2021

नाभि तक गहरी श्वास ले ये अतिआवश्यक है।गहरी सांसों से गुपचुप हो जाते हैं 7 बड़े बदलाव

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सांस ही प्राण है। इसलिए हमारे यहां ऑक्सीजन को भी प्राणवायु कहा गया है। यही वजह है कि सदियों से हमारी संस्कृति और रोजमर्रा के जीवन में प्राणायाम को प्रभावी माना गया है। नए दौर में विदेशी भी मानने लगे हैं कि यदि हमें अच्छा स्वास्थ्य और जीवन चाहिए तो अपनी हर एक सांस पर ध्यान देना होगा। अपनी आने-जाने वाली संास पर ध्यान देने से न सिर्फ हम शारीरिक बल्कि मानसिक विकारों से भी दूर रह सकते हैं। सांस हमारे तनाव, बेचैनी और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर सकती है। अच्छी सांस तन और मन में सात आश्चर्यजनक बदलाव ला सकती है लेकिन इसके लिए अभ्यास की जरूरत है।

दिमागी क्षमता में वृद्धि

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार मेडिटेशन से हमारे मस्तिष्क का आकार विस्तार लेता है (कार्टेक्स हिस्से की मोटाई बढऩे लगती है)। इससे मस्तिष्क की तार्किक क्षमता में बढ़ोतरी होती है। सोने के बाद गहरी सांस लेने का अभ्यास दिमागी क्षमता को बढ़ाता है।

 

दिल की धडक़न में सुधार

मेडिकल साइंस की रिसर्च में यह पाया गया कि दिल की दो धडक़नों के बीच अंतर होता है जिसे लो हार्ट रेट वैरिएबिलिटी के नाम से जाना जाता है। ऐसे में दिल के दौरा का अंदेशा बहुत ज्यादा होता है। गहरी सांस वाले प्राणायाम के जरिए इस स्थिति को सुधारा जा सकता है।

 

तनाव में कमी, मन को शांति

कमजोर सांस तनाव की स्थिति में शरीर को लडऩे की पूरी ताकत नहीं देती। लेकिन यदि केवल सांसों पर ध्यान लगाएं तो मन की आकुलता घटती है। गहरी सांस से नर्वस सिस्टम उत्तेजना, प्रेरणा वाली पैरा सिम्पेथेटिक स्थिति में चला जाता है, जो मन को आराम, सुकून की स्थिति होती है।

 

नकारात्मकता से मुक्ति

अधिकांश लोग जब पीड़ा या तनाव में होते हैं तो उनकी सांसे उखड़ी रहती हैं। यह हमारे शरीर की कुदरती प्रतिक्रिया होती है। अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करने के किसी भी व्यायाम से बेचैनी, अवसाद, गुस्से और घृणा से भरे नकारात्मक विचारों को दूर करने में मदद मिलती है।

चुनौती की घड़ी में संयम

विदेशी पत्रिका ‘टीचिंग एंड लर्निंग’ में प्रकाशित एक स्टडी में बताया गया कि जो बच्चे अपनी परीक्षा से पहले गहरी सांस लेना सीख जाते हैं उनका ध्यान बढ़ता है और याद किए पाठ को दोहराने की योग्यता में सुधार होता है।

ब्लड प्रेशर पर काबू

हर रोज महज कुछ मिनटों के लिए गहरी सांस लेने और छोडऩे का अभ्यास काफी हद तक आपके ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर सकता है। गहरी सांस लेने से शरीर शांत स्थिति में आता है। ऐसा होने पर इससे रक्त वाहिनियों को अस्थायी रूप से खून को पूरे शरीर में नियंत्रित दबाव के साथ पहुंचाने में मदद मिलती है।

जीन में सकारात्मक बदलाव

यह सबसे बड़ा और बेहद महत्वपूर्ण बदलाव है जो सचमुच इस तरह होता है कि हमें पता ही नहीं चलता। संभवत: इसके अच्छे परिणाम हमें हमारी आने वाली पीढिय़ों में नजर आते हैं। योगा, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से सांसों की गति को नियंत्रित करने से हमारी जेनेटिक संरचना में प्रभावी बदलाव होते हैं। इसमें केवल तन ही नहीं बल्कि मन के स्तर पर भी परिवर्तन होते हैं। इससे हमारे अच्छे जीन ज्यादा संवेदनशील बनते हैं।

 

भारतीय मनीषियों के कथन

सांस भावों से जुड़ी है। भाव को बदलो, सांस बदल जाएगी। क्रोध आए लेकिन अपनी सांस को डोलने मत देना। ऐसे समय में सांस को स्थिर रखना और शांत रहना। रजनीश ओशो, दार्शनिक

प्राणायाम फेफड़ों को स्वस्थ रखने वाला, रक्त को शुद्ध, शरीर के अंग-प्रत्यंगों को चैतन्यता देने वाला और पाचन शक्ति बनाए रखने वाला है इसलिए यह आरोग्य और दीर्घ जीवन देने वाला भी है। 

आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा, गायत्री परिवार के संस्थापक

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