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मंगलवार, 14 जून 2022

मंत्र साधना

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मंत्र साधना से अन्दर की सोई हुई चेतना को जागृत किया जा सकता है।आन्तरिक शक्ति का विकास करके महान बना जा सकता है। मंत्र के जाप से मन की चंचलता नष्ट हो जाती है। जीवन संयमित बनता है ,स्मरण शक्ति में वृद्घि होती है और एकाग्रता प्राप्त होती है। मनन करने पर जो रक्षा करे उसे मंत्र कहते हैं। एक प्रकार से विशेष शब्दों का समूह जप करने पर मन को एकाग्र करके अभिष्ट फल की प्राप्ति कराएं उसे मंत्र कहते हैं। वास्तव में,साधक दो प्रकार की यात्राएं कर सकता है। एक यात्रा है शक्ति की और दूसरी यात्रा है शांति की। शक्ति की यात्रा सत्य की यात्रा नहीं है, शक्ति की यात्रा तो अहंकार की ही यात्रा है। फिर शक्ति चाहे धन से मिलती हो, पद से मिलती हो या मंत्र से। तुम शक्ति चाहते हो, तो सत्य नहीं चाहते हो। तुम्हारे द्वारा अर्जित की गई शक्ति शरीर की हो, मन की हो, या तथाकथित अध्यात्म की हो। तुम्हें मजबूत करेगी। तुम जितने मजबूत हो, परमात्मा से उतने ही दूर हो। तुम्हारी शक्ति परमात्मा के समक्ष तुम्हारे अहंकार की घोषणा है। तुम्हारी शक्ति ही तुम्हारे लिए बाधा बनेगी। तुम्हारी शक्ति ही, वास्तविक अर्थों में, परमात्मा के समक्ष तुम्हारी निर्बलता है। तो जितने तुम अपनी आंखों में शक्तिशाली बनोगे , उतने ही परमात्मा के द्वार पर निर्बल होते जाओगे। इसलिए शक्ति की खोज वास्तविक साधक की खोज नहीं। लेकिन साधक उस दिशा में ही जाता है। क्योंकि हम जो संसार में खोजते हैं, वही हम परमात्मा में भी खोजते हैं। जो हमें यहां नहीं मिला, उसे ही हम वहां पा लेना चाहते हैं। तो हमारे संसार और हमारे मोक्ष में एक कंटिन्युटी है। जिसे बाजार में खोजा और वह नहीं मिला, तो उसे हम मंदिर में खोजते हैं। लेकिन खोज वही है। खोज करने वाला जरा भी बदला नहीं है। एक जगह असफल हुए, तो दूसरी जगह सफलता की आकांक्षा जमा लेते हैं। लेकिन तुम शक्तिशाली होना चाहते हो, यही तुम्हारा दुख है। तुम मिटोगे तो आनन्द घटेगा, तुम्हारी अनुपस्थिति में अमृत की वर्षा होगी , तुम्हारे रहते यह होने वाला नहीं है। मंत्र शक्तिदायी है। तो मंत्र से निश्चित शक्ति मिलती है। वास्तव में, मंत्र मन को एकाग्र करता है। तुम्हारी सारी बिखरी हुई मन की किरणें इकट्ठी हो जाती हैं। फिर वह मंत्र कोई भी हो ..राम का नाम हो, नमोकार हो, ऊँ मणि पद्मो हुम् हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। तुम अपना खुद का मंत्र बना ले सकते हो। मंत्र में आये शब्दों का भी कोई अर्थ नहीं है। मंत्र का प्रयोजन न शब्दों से है, न अर्थ से। मंत्र का प्रयोजन मन को एकाग्र करने से है। जब तुम मंत्र की रटन करते हो, तब तुम्हारे सारे विचारों की शक्ति विचारों से हटकर मंत्र में प्रवाहित होने लगती है। चित्त में मंत्र ही रह जाता है। और भीतर तुम्हारे जितने ऊर्जा के द्वार हैं, उनके बहाव की ओर कोई दिशा नहीं बचती। जब तुम विचार करते हो, तो तुम्हारी शक्ति अनंत-अनंत धाराओं में बह रही है। एक विचार पश्चिम जा रहा है, एक पूरब जा रहा है, एक दक्षिण जा रहा है, एक उत्तर जा रहा है। तुम बहुत तरफ बह रहे हो । इकट्ठे नहीं हो, बंटे हो, विभाजित हो। जब तुम मंत्र का जाप कर रहे हो, तब सारी ऊर्जा एक दिशा में प्रवाहित होने लगती है। जैसे हम सूरज की किरणों को एक कांच के लेंस से इकट्ठा कर लें, तो आग पैदा हो जाती है। सूरज की किरणों में आग तो छिपी है, लेकिन पृथक-पृथक ज्यादा से ज्यादा गर्मी पैदा होगी। इकट्ठी हो जाएं, तो आग पैदा हो जाती है। ऐसे ही तुम्हारे मन में भी बड़ी आग छिपी है, अलग-अलग सिर्फ उष्णता रहती है। मंत्र उन्हें इकट्ठा करने का उपाय है। इकट्ठे होते से ही बड़ी गर्मी, ऊर्जा पैदा होती है। और अगर तुम सतत मंत्र का प्रयोग करते रहो, तो तुम्हारे जीवन में अनेक शक्ति की घटनाएँ घटनी शुरू हो जाएंगी, जो तुम्हारे अहंकार को बड़ा सुख देंगी। तुम जो कहोगे, वह सच होने लगेगा; तुम जो बोल दोगे, वैसा हो जाएगा; तुम अभिशाप दे दोगे, तो फलित हो जाएगा। तुम वरदान दे दोगे, तो पूरा हो जाएगा। क्योंकि तुम्हारी ऊर्जा इतनी इकट्ठी हो गई है कि तुम्हारे शब्द अब सार्थक होने लगेंगे। उनकी सार्थकता का कारण यही है कि जब कोई व्यक्ति इकट्ठी ऊर्जा से कुछ कहता है, तो वह दूसरे के अचेतन तक प्रवेश कर जाता है। उसका तीर सीधा दूसरे के हृदय में चला जाता है। और दूसरे के हृदय में कोई भी बात पहुंच जाए, तो उसके परिणाम शुरू हो जाते हैं। अगर तुमने किसी व्यक्ति को कह दिया कल सुबह तुम बीमार पड़ जाओगे और तुम्हारा पूरा चित्त इसमें प्रवाहित हुआ हो। तो तत्क्षण तुमने दूसरे के हृदय को घाव से भर दिया। इस कहते क्षण में, कोई दूसरा विचार विघ्न-बाधा डालने को नहीं, बस यही तुम्हारा मनोकार मंत्र रहा हो कि कल सुबह तुम बीमार पड़ जाओगे । अब यह व्यक्ति रात भर सो न सकेगा। इसने तुम्हारी आंखें देखीं, तुम्हारा वक्तव्य सुना। तुम्हारा ढंग देखा और इसके मन पर यह गहरी छाप पड़ गई कि तुमने जो कहा है, उससे बचना मुश्किल है। इसका मन भी अब इसी मंत्र के आस पास घूमेगा। यह रात सपने में भी तुम्हें देखेगा, सपने में भी इसे यही वचन सुनाई पड़ेगा। यह कई बार मन में कहेगा, इससे कुछ होने वाला नहीं। डरो मत, भय मत करो। लेकिन भीतर से कोई इसे फिर भी भयभीत किए जाएगा। चाहे व कहे कि डरो मत, चाहे यह डरे, दोनों हालात में यह तुम्हारे मंत्र को दोहरा रहा है । सुबह होते-होते यह बीमार पड़ जाएगा। यह बीमारी तुमने पैदा की आधी, आधी इसने पैदा की। और ठीक ऐसा ही जीवन के बहुत अंगों में कर सकते हो। और एक बार तुम्हारा वचन सार्थक होने लगे, तो तुम्हारा आत्माविश्वास बढ़ेगा, तुम और बलशाली होने लगोगे। जितना तुम्हारा वचन सही होंगे, उतना ही तुम्हें लगेगा कि मैं कुछ दिव्य शक्ति, कोई सिद्धि से भरा हुआ हूं। यह भरोसा तुम्हारे मंत्र को मजबूत करेगा। हर मंत्र तुम्हारे भरोसे को मजबूत करेगा। तुम धीरे-धीरे अनेक शक्तियों का अनुभव करने लगोगे। यह जो शक्तियों का अनुभव है, इन्हें योग ने सिद्धियां कहा है। ये सिद्धियां परमात्मा के मार्ग पर सबसे बड़ी बाधाएं हैं। महृषि पतंजलि ने योग-सूत्रों में इनका उल्लेख किया है, ताकि तुम इनसे सावधान रहो। इनकी तरफ जाना ही नहीं है। जा चुके हो, तो वापस लौट आना है। जितना जल्दी लौट आओ, उतना अच्छा है। क्योंकि जितना समय इसमें खोया, वह बिलकुल व्यर्थ ही जाता है। हर बार जितने आगे तुम इन दिशाओं में जाते हो, उतना लौटना मुश्किल होने लगता है। संसार शक्ति की खोज है, सिद्धि की खोज है। परमात्मा शांति, शून्यता की खोज है। वहां तुम मिटते हो, वहां तुम धीरे-धीरे लीन होते हो। सिद्धि की खोज में आखिर में तुम बचोगे, परमात्मा बिल्कुल नहीं। शांति की खोज में तुम न बचोगे, अंत में सिर्फ परमात्मा बचेगा। और इन दो में से एक का मिटना जरूरी है। ये दोनों साथ-साथ नहीं हो सकते। परमात्मा और तुम साथ-साथ नहीं हो सकते, तुम्हारा सह-अस्तित्व असंभव है। तब तक तुम हो, तब तक परमात्मा नहीं; जब परमात्मा है, तब तुम नहीं। तो सिद्धि और शक्ति तो केवल तुम्हें मजबूत करेगी। इसलिए मंत्रों के साधक परम अहंकार से भरे हुए दिखाई पड़ते हैं। धनी का अहंकार उनके सामने कुछ भी नहीं, पद पर बैठे राजनीतिक का अहंकार भी उनके सामने कुछ भी नहीं। उनका अहंकार बड़ा सूक्ष्म और भीतरी है। और उसका कारण भी है कि धन छीना जा सकता है, चोरी जा सकता है, पद आज है, कल न हो, लेकिन मंत्र का भरोसा ज्यादा प्रबल है।क्योकि चोर छीन नहीं सकते, जनता का लोकमत बदल नहीं सकता। और मंत्र तुम्हारे मन पर ही निर्भर है, किसी और पर नहीं। इसलिए तुम ज्यादा सबल, आत्मनिर्भर, अपने पैरों पर खड़े मालूम पड़ते हो। साधक अगर सिद्धि की दिशा में चला जाए, तो भटक गया। रस बहुत आएगा, क्योंकि अहंकार को इस तरह की चीजों से ही रस आता है। अगर एक चींटी इस तरफ आ रही है । और तुम सिर्फ अपने मनोबल से उसका रास्ता बदल दो, हालांकि इस कृत्य में कोई सार नहीं है, पर फिर भी तुम्हें रस आएगा। उदाहरण के लिए रूस में एक महिला किसी भी वस्तु को अपने मन से चालित कर देती है। टेबिल रखी है, छह फीट दूर वह खड़ी हो जाए, पंद्रह मिनिट मन को एकाग्र करे। तो वह टेबिल को हिलाना शुरू कर देती है। टेबिल उसकी तरफ सरक सकती है, दूर जा सकती है। और सब तरह की जांच-पड़ताल से सब समझा गया है, कोई धोखाधड़ी नहीं है। परन्तु पंद्रह मिनिट के प्रयोग में उस महिला की बहुत ऊर्जा खो जाता है । और एक सप्ताह के लिए वह निर्बल हो जाती है। क्योंकि जब तुम मन को एकाग्र करके अपनी शक्ति को बाहर फेंकते हो, ‘तब’ तुम्हारे शरीर की उर्जा भी उसमें क्षीण होती है। लेकिन फिर भी वह महिला बड़ा आनंद लेती है।इस उपद्रव में उसका सारा जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है । और यह एक खेल बन गया है, वैज्ञानिक अध्ययन करने आ रहे हैं कि कोई चमत्कार घटित हो रहा है। लेकिन चमत्कार से प्राप्ति भी क्या है ? टेबिल तुम हाथ से हटा सकते थे, जिसमें कि रत्ती भर ताकत लगती है। उसे तुमने मन से हटाया और दो पौंड शरीर की ऊर्जा क्षीण की । रामकृष्ण परमहंस के पास किसी ने आकर एक दिन कहा कि लोग कहते हैं, आप परमहंस हो, लेकिन कोई ऐसी सिद्धि तो दिखाई नहीं पड़ती। मेरे गुरु हैं, वे पानी पर चलते हैं। रामकृष्ण कहने लगे, मैं दो पैसा देकर नदी पार हो जाता हूं। तो जो काम दो पैसे से हो जाता । तब उसके लिए क्यो समय लगाऊ । आखिर पानी ही पार होते हैं, तो पानी पार होने में ऐसी बात क्या है ? नाव हो, दो पैसे लेती है, न हो तो व्यक्ति तैर कर पार हो जाए। पर नदी पर चलकर जो व्यक्ति पार होता वहाँ अहङ्कार खड़ा होता लेकिन नाव में बैठकर अहंकार खड़ा नहीं हो सकता। मंत्र शक्ति स्रोत हैं और सभी धर्मों ने मंत्र खोज लिए हैं, क्योंकि सभी धर्म शांति की तलाश से शक्ति की तलाश में पतित हो जाते हैं।‘मंत्र’ का वास्तविक अर्थ है, मन को स्थिर करने वाला अर्थात जो मन की गति को रोक सके। पूरे विश्वास के साथ मंत्र जपने से सफलता प्राप्त होती है। मंत्र में कभी शंका नहीं करनी चाहिए। मंत्र में जिसकी जैसी भावना होती है, उसको वैसी ही सिद्घि प्राप्त होती है। मंत्र शक्ति उतनी ही सामर्थ्यवान बन जाएगी। अचेतन मन को जागृत करने की वैज्ञानिक विधि को मंत्र जप कहते हैं। मंत्र जप से मनोबल दृढ़ होता है। आस्था में परिपक्वताआती है, बुद्घि निर्मल होती है। भावपूर्वक मंत्र को बार-बार दोहराना जप कहलाता है। मंत्र के अक्षर, मंत्र के अर्थ, जप करने की विधि को अच्छी प्रकार सीखकर उसके अनुसार जप करने से साधक की योग्यता विकसित होती है। मंत्र जपने से पुराने संस्कार हटते जाते हैं। मंत्र जप से मन पवित्र होता है। दुख, चिन्ता, भय, शोक, रोग आदि निवृत्त होने लगते हैं। सुख-समृद्घि और सफलता की प्राप्ति में मदद मिलती हैं। मंत्र के माध्यम से आप अपने मन की इच्छानुसार फल प्राप्त कर सकते हैं। वट वृक्ष का बीज और मंत्र, द्वितीया के चन्द्रमा की तरह छोटा दिखाई देता है। परन्तु बढ़ते-बढ़ते रंग बिखेर देता है। सारा संसार देवताओं के अधीन हैं, देवता मंत्र के अधीन हैं, मंत्र योगी के अधीन है और योगी परमात्मा के अधीन है। जिन मंत्रों को हम उच्चारित करते हैं तो उच्चारण करने से जो ध्वनि पैदा होती है । उस ध्वनि के अन्दर एक विचित्र प्रकार की शक्ति छिपी रहती है जो बड़ी शक्तिशाली होती है। जिससे बड़े से बड़ा प्रलय व सृजन कार्य होता है। ध्वनि विशेषज्ञों ने इसको प्रमाणित किया है। ध्वनि को विश्व ब्रह्मïड का एक संक्षिप्त रूप कहा जाता है। वायु, जल और पृथ्वी इन तीन चीजों से ध्वनियां उत्पन्न होती है। वायु की तरंगों से प्राप्त होने वाली ध्वनि की गति प्रति सेकेंड 1088 फुट होती है। जल तरंगों से गति इससे भी तेज है जो 4900 फुट चलती है तथा पृथ्वी के माध्यम से यह और भी तीव्र हो जाती है अर्थात एक सेकेंड में 16400 फुट। सभी जीवित प्राणी ध्वनि के प्रभाव को अनुभव करते हैं। आप किसी व्यक्ति को गाली देते हैं, क्रोधित होकर डांटते हैं तो वह क्रोध से आगबबूला हो जाता है। उसी व्यक्ति के साथ आप मधुर वचन बोलते हैं वह प्रसन्नचित होकर गदगद हो जाता है। अपने आपको हर समय न्यौछावर करने को तैयार रहता है। यह सब चमत्कार ध्वनि का है। गायन कला के अनुसार कंठ को अमुक आरोह-अवरोहों के अनुरूप उतार-चढ़ाव के स्वरों से युक्त करके जो ध्वनि प्रवाह होता है वह गायन है। इसी प्रकार मुख के उच्चारण मंत्र को अमुक शब्द क्रमवार बार-बार लगातार संचालन करने से जो विशेष प्रकार की ध्वनि प्रवाह संचारित करने से जो विशेष प्रकार की ध्वनि प्रवाह संचारित होती है वही मंत्र की भौतिक क्षमता होती है।बयही ध्वनि का प्रभाव सूक्ष्म शरीर को प्रभावित करता है। इसके अन्दर विद्यमान 3 ग्रन्थियों, षटचक्रों, षोडश माष्टकाडों, 24 उपत्यिकाओं तथा 84 नाड़ियों को झंकृत करने में मंत्र शक्ति का ध्वनि उच्चारण बहुत कार्य करता है और दिव्य शक्ति प्राप्ति हेतु मंत्र के शब्दों का उच्चारण ही बड़ा कारण है। सील और डॉल्फिन नामक जन्तु मधुर संगीत की लहरें सुनकर शिकारियों के जाल मे फंस जाते हैं। बीन की ध्वनि पर सर्प, बांसुरी की ध्वनि पर हिरण वशीभूत हो जाते हैं। हौलेण्ड के पशु पालकों ने गायों का दूध निकालते समय संगीत बजाने का क्रम चलाया । और अधिक मात्रा में दूध की प्राप्ति की । वहीं यूगोस्वालिया में फसल को सुविकसित करने लिए अपने खेतों पर वाद्य ध्वनि यंत्र से संगीतमय ध्वनि प्रभावित की जिसका परिणाम उत्साहवर्धक पाया गया। जो मंत्र जिस देवता से सम्बन्धित होता है । वह उसकी शक्ति को जागृत कर आत्मसात कर लेता है। मंत्र साधक स्वयं देवता तुल्य होकर जन-कल्याण करने लगता है। मंत्र साधक को सशक्त व जागृत बनाता है। जागृत मंत्र के साधक से जो कुछ चाहता है वह उसे अवश्य प्राप्त हो जाता है। sabharfacebook wall yog sadhana kundalni sakti क्रमशः

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शनिवार, 11 जून 2022

परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण से सृष्टि का आरम्भ

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परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण से सृष्टि का आरम्भ!!!!!!!? यह अनंत ब्रह्माण्डअलख-निरंजन परब्रह्म परमात्मा का खेल है। जैसे बालक मिट्टी के घरोंदे बनाता है, कुछ समय उसमें रहने का अभिनय करता है और अंत मे उसे ध्वस्त कर चल देता है। उसी प्रकार परब्रह्म भी इस अनन्त सृष्टि की रचना करता है, उसका पालन करता है और अंत में उसका संहारकर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। यही उसकी क्रीडा है, यही उसका अभिनय है, यही उसका मनोविनोद है, यही उसकी निर्गुण-लीला है जिसमें हम उसकी लीला को तो देखते हैं, परन्तु उस लीलाकर्ता को नहीं देख पाते। भगवान की इन्हीं निर्गुण-लीला पर विस्मय-विमुग्ध होकर गोस्वामी तुलसीदासजी ने विनय-पत्रिका में लिखा है– केसव! कहि न जाइ का कहिए। देखत तव रचना विचित्र हरि! समुझि मनहिं मन रहिये।। परब्रह्म परमात्मा का प्रकृति के असंख्य ब्रह्माण्डों को बनाने-बिगाड़ने का यह अनवरत कार्य कब प्रारम्भ हुआ और कब तक चलेगा, यह कोई नहीं जान सकता। उनके लिए सृष्टि, पालन एवं संहार–तीनों प्रकार की लीलाएं समान हैं। जब प्रकृति में परमात्मा के संकल्प से विकासोन्मुख परिणाम होता है, तो उसे सृष्टि कहते हैं और जब विनाशोन्मुख परिणाम होता है, तो उसे प्रलय कहते हैं। सृष्टि और प्रलय के मध्य की दशा का नाम स्थिति है। तैत्तिरीयोपनिषद् (२।६) में कहा गया है कि उस परमेश्वर ने विचार किया कि मैं प्रकट हो जाऊँ (अनेक नाम-रूप धारणकर बहुत हो जाऊँ), इस स्थिति में एक ही परमात्मा अनेक नाम-रूप धारणकर सृष्टि की रचना करते हैं। श्रीमद्भागवत (४।७।५०) में भगवान कहते हैं–’मैं ही सम्पूर्ण सृष्टि की रचना करता हूँ। मैं ही उसका मूल कारण हूँ।’ वह पूर्ण ब्रह्म अपने एक अंश से जगत को धारण करता है पर स्वयं अचलरूप से स्थित रहता है। इसीलिए श्रुति में कहा गया है– ऊँ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।। अर्थात्–वह पूर्ण है, यह पूर्ण है, पूर्ण से ही पूर्ण की वृद्धि होती है। पूर्ण में से पूर्ण लेने पर भी पूर्ण ही बच रहता है। इसी प्रकार भगवान अंशयुक्त होने पर भी पूर्ण है। परमात्मा श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के एकमात्र ईश्वर हैं, जो प्रकृति से परे हैं। उनका विग्रह सत्, चित और आनन्दमय है। ब्रह्मा, शंकर, महाविराट् और क्षुद्रविराट्–सभी उन परमब्रह्म परमात्मा का अंश हैं। प्रकृति भी उन्हीं का अंश कही गयी है। जैसे स्वर्णकार सुवर्ण के बिना आभूषण नहीं बना सकता तथा कुम्हार मिट्टी के बिना घड़ा बनाने में असमर्थ है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा को यदि प्रकृति का सहयोग न मिले तो वे सृष्टि नहीं कर सकते। सृष्टि के अवसर पर परब्रह्म परमात्मा दो रूपों में प्रकट हुए–प्रकृति और पुरुष। उनका आधा दाहिना अंग ‘पुरुष’ और आधा बांया अंग ‘प्रकृति’ हुआ। वही प्रकृति परमब्रह्म में लीन रहने वाली उनकी सनातनी माया हैं। इस लेख में परमब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण से विभिन्न देवी-देवताओं के प्राकट्य का उल्लेख किया गया है जोकि विभिन्न ग्रन्थों जैसे श्रीमद्देवीभागवत, ब्रह्मवैवर्तपुराण व श्रीमद्भगवद्गीता आदि पर आधारित है। सृष्टि के बीजरूप परमात्मा श्रीकृष्ण!!!!!! ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जगत–जो प्राकृतिक सृष्टि है, वह सब नश्वर है। तीनों लोकों के ऊपर जो गोलोकधाम है, वह नित्य है। गोलोक में अन्दर अत्यन्त मनोहर ज्योति है। वह ज्योति ही परात्पर ब्रह्म है। वे परमब्रह्म अपनी इच्छाशक्ति से सम्पन्न होने के कारण साकार और निराकार दोनों रूपों में अवस्थित रहते हैं। उस तेजरूप निराकार परमब्रह्म का योगीजन सदा ध्यान करते हैं। उनका कहना है कि परमात्मा अदृश्य होकर भी सबका द्रष्टा है। किन्तु वैष्णवजन कहते हैं कि तेजस्वी सत्ता के बिना वह तेज किसका है। अत: उस तेजमण्डल के मध्य में अवश्य ही परमब्रह्म विराजते हैं। वे स्वेच्छामय रूपधारी तथा समस्त कारणों के कारण हैं। वे परमात्मा श्रीकृष्ण अत्यन्त कमनीय, नवकिशोर, गोपवेषधारी, नवीन मेघ की-सी कान्ति वाले, कमललोचन, मयूरमुकुटी, वनमाली, द्विभुज, एक हाथ में मुरली लिए, अग्निविशुद्ध पीताम्बरधारी और रत्नाभूषणों से अलंकृत हैं। ब्रह्माजी की आयु जिनके एक निमेष की तुलना में है, उन परिपूर्णतम ब्रह्म को ‘कृष्ण’ नाम से पुकारा जाता है। ‘कृष्ण’ शब्द का अर्थ है श्रीकृष्ण ही सर्वप्रपंच के स्त्रष्टा तथा सृष्टि के एकमात्र बीजस्वरूप हैं। परमात्मा श्रीकृष्ण से नारायण, शिव, ब्रह्मा, धर्म, सरस्वती आदि देवी-देवताओं का प्रादुर्भाव!!!!!! प्रलयकाल में भगवान श्रीकृष्ण ने दिशाओं, आकाश के साथ सम्पूर्ण जगत को शून्यमय देखा। न कहीं जल, न वायु, न ही कोई जीव-जन्तु, न वृक्ष, न पर्वत, न समुद्र, बस घोर अन्धकार ही अन्धकार। सारा आकाश वायु से रहित और घोर अंधकार से भरा विकृताकार दिखाई दे रहा था। वे भगवान श्रीकृष्ण अकेले थे। तब उन स्वेच्छामय प्रभु में सृष्टि की इच्छा हुई और उन्होंने स्वेच्छा से ही सृष्टिरचना आरम्भ की। सबसे पहले परम पुरुष श्रीकृष्ण के दक्षिणभाग से जगत के कारण रूप तीन गुण प्रकट हुए। उन गुणों से महतत्त्व, अंहकार, पांच तन्मात्राएं, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द प्रकट हुए। इसके बाद श्रीकृष्ण से साक्षात् भगवान नारायण का प्रदुर्भाव हुआ जो शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी चतुर्भुज, वनमाला से विभूषित व पीताम्बरधारी थे। उन्होंने परमब्रह्म श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहा–जो श्रेष्ठ, सत्पुरुषों द्वारा पूज्य, वर देने वाले, वर की प्राप्ति के कारण हैं, जो कारणों के भी कारण, कर्मस्वरूप और उस कर्म के भी कारण हैं, उन भगवान श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूं। इसके बाद परम पुरुष श्रीकृष्ण के वामभाग से स्फटिक के समान अंगकान्ति वाले, पंचमुखी, त्रिनेत्रवाले, जटाजूटधारी, हाथों में त्रिशूल व जपमाला लिए व बाघम्बर पहने भगवान शिव प्रकट हुए। उनका शरीर भस्म से भूषित था और उन्होंने मस्तक पर चन्द्रमा को धारण कर रखा था। सर्पों के उन्होंने आभूषण पहन रखे थे। उन्होनें श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हुए कहा–’जो विश्व के ईश्वरों के भी ईश्वर, विश्व के कारणों के भी कारण हैं, जो तेजस्वरूप, तेज के दाता और समस्त तेजस्वियों में श्रेष्ठ हैं, उन भगवान गोविन्द की मैं वन्दना करता हूँ।’ तत्पश्चात् श्रीकृष्ण के नाभिकमल से ब्रह्माजी प्रकट हुए। उनके श्वेत वस्त्र व केश थे, कमण्डलुधारी, चार मुख वाले, वेदों को धारण व प्रकट करने वाले हैं। वे ही स्त्रष्टा व विधाता हैं। उन्होंने चारों मुखों से भगवान की स्तुति करते हुए कहा–जो तीनों गुणों से अतीत और एकमात्र अविनाशी परमेश्वर हैं, जिनमें कभी कोई विकार नहीं होता, जो अव्यक्त और व्यक्तरूप हैं तथा गोपवेष धारण करते हैं, उन गोविन्द श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूं। इसके बाद परमात्मा श्रीकृष्ण के वक्ष:स्थल से श्वेत वर्ण के जटाधारी ‘धर्म’ प्रकट हुए। वह सबके साक्षी व सबके समस्त कर्मों के दृष्टा थे। उन्होंने भगवान की स्तुति करते हुए कहा–जो सबको अपनी ओर आकृष्ट करने वाले सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, इसलिए ‘कृष्ण’ कहलाते हैं, सर्वव्यापी होने के कारण जिन्हें विष्णु कहते हैं, सबके भीतर निवास करने से जिनका नाम ‘वासुदेव’ है, जो ‘परमात्मा’ एवं ‘ईश्वर’ हैं, उन भगवान श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ। फिर धर्म के ही वामभाग से ‘मूर्ति’ नामक कन्या प्रकट हुई। तदनन्तर परमात्मा श्रीकृष्ण के मुख से शुक्लवर्णा, वीणा-पुस्तकधारिणी, वाणी की अधिष्ठात्री, कवियों की इष्टदेवी, शान्तरूपिणी सरस्वती प्रकट हुईं। उन्होंने भगवान की स्तुति करते हुए कहा–जो रासमण्डल के मध्यभाग में विराजमान हैं, रास के अधिष्ठाता देवता हैं, रासोल्लास के लिए सदा उत्सुक रहने वाले हैं, मैं उनको प्रणाम करती हूँ। फिर परमात्मा श्रीकृष्ण के मन से गौरवर्णा, सम्पूर्ण ऐश्वर्यों की अधिष्ठात्री, फलरूप से सम्पूर्ण सम्पत्तियां प्रदान करने वाली स्वर्गलक्ष्मी प्रकट हुईं। वे राजाओं में राजलक्ष्मी, गृहस्थ मनुष्यों में गृहलक्ष्मी और सभी प्राणियों तथा पदार्थों में शोभारूप से विराजमान रहती हैं। उन्होंने भी भगवान को प्रणाम करते हुए कहा–जो सत्यस्वरूप, सत्य के स्वामी, सत्य के मूल हैं, उन सनातनदेव श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करती हूँ। तदनन्तर परमात्मा श्रीकृष्ण की बुद्धि से मूल प्रकृति का प्रादुर्भाव हुआ। वे लाल रंग की साड़ी पहने हुए थीं व रत्नाभरण से भूषित व सहस्त्रों भुजाओं वाली थीं। वे निद्रा, तृष्णा, क्षुधा-पिपासा (भूख-प्यास), दया, श्रद्धा, बुद्धि, लज्जा, तुष्टि, पुष्टि, भ्रान्ति, कान्ति और क्षमा आदि देवियों की व समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री देवी हैं। उन्हीं को दुर्गा कहा गया है। त्रिशूल, शक्ति, शांर्गधनुष, खड्ग, बाण, शंख, चक्र, गदा, पद्म, अक्षमाला, कमण्डलु, वज्र, अंकुश, पाश, भुशुण्डि, दण्ड, तोमर, नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र, रौद्रास्त्र, पाशुपतास्त्र, पार्जन्यास्त्र, वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र तथा गान्धर्वास्त्र–इन सबको धारण किए हुए हैं। उन्हीं की अंशाशकला से सभी नारियां प्रकट हुई हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहा–प्रभो ! मैं प्रकृति, ईश्वरी, सर्वेश्वरी, सर्वरूपिणी और सर्वशक्तिस्वरूपा कहलाती हूँ। मेरी शक्ति से ही यह जगत शक्तिमान है तथापि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ; क्योंकि आपने मेरी सृष्टि की है, अत: आप ही तीनों लोकों के पति, गति, पालक, स्रष्टा, संहारक तथा पुन: सृष्टि करने वाले हैं। आप तीनों लोकों के चराचर प्राणियों, ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुझ जैसी कितनी ही देवियों की खेल-खेल में ही सृष्टि कर सकते हैं, मैं आपकी वन्दना करती हूँ। तत्पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण की जिह्वा के अग्रभाग से स्फटिक के समान वर्ण वाली, सफेद साड़ी व आभूषण पहने, हाथ में जपमाला लिए सावित्री देवी प्रकट हुईं। उन्होंने भगवान को प्रणाम करते हुए कहा–भगवन् ! आप सबके बीज, सनातन ब्रह्म-ज्योति व निर्विकार ब्रह्म हैं। फिर श्रीकृष्ण के मानस से सुवर्ण के समान कांतिमान, पुष्पमय धनुष व पांच बाण लिए कामियों के मन को मथने वाले ‘मन्मथ’ (कामदेव) प्रकट हुए। कामदेव के पांच बाण हैं–मारण, स्तम्भन, जृम्भन, शोषण और उन्मादन। कामदेव के वामभाग से परम सुन्दरी ‘रति’ प्रकट हुईं। अपने बाणों की परीक्षा करने के लिए कामदेव ने बारी-बारी से सभी बाण चलाए जिससे सभी लोग काम के वशीभूत हो गए। कामदेव के बाणों से ब्रह्माजी की कामाग्नि प्रदीप्त हो गयी जिससे अग्नि प्रकट हुई। उस अग्नि को शान्त करने के लिए भगवान ने ‘जल’ की रचना की और अपने मुख से जल की एक-एक बूंद गिराने लगे। तभी से जल के द्वारा आग बुझने लगी। उस बिन्दुमात्र जल से सारे जगत में जल प्रकट हो गया और उसी से जल के व सभी जल-जन्तुओं के देवता ‘वरुण देव’ प्रकट हुए और अग्नि से ‘अग्निदेव’ प्रकट हुए। अग्निदेव के वामभाग से उनकी पत्नी ‘स्वाहा’ प्रकट हुईं। वरुणदेव के वामभाग से ‘वरुणानी’ प्रकट हुईं। भगवान श्रीकृष्ण की नि:श्वास वायु से ‘पवन’ का प्रादुर्भाव हुआ जो सभी मनुष्यों के प्राण हैं। वायुदेव के वामभाग से उनकी पत्नी ‘वायवी’ प्रकट हुईं। श्रीराधा का प्राकट्य!!!!!!! इन सबकी सृष्टि करके भगवान सभी देवी-देवताओं के साथ रासमण्डल में आए। उस रासमण्डल का दर्शन कर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए। वहां श्रीकृष्ण के वामभाग से कन्या प्रकट हुई, जिसने दौड़कर फूल ले आकर भगवान के चरणों में अर्घ्य प्रदान किया। क्योंकि ये रासमण्डल में धावन कर (दौड़कर) पहुंचीं अत: इनका नाम ‘राधा’ हुआ। वह परम सुन्दरी थीं। कोटि चन्द्र की प्रभा को लज्जित करने वाली शोभा धारण किए वे अपनी मन्द-मन्द गति से राजहंस और गज के गर्व को दूर करने वाली थी। रासमण्डल में उनका आविर्भाव हुआ, वे रासेश्वरी, गोलोक में निवास करने वाली, गोपीवेष धारण करने वाली, परम आह्लादस्वरूपा, संतोष तथा हर्षरूपा हैं। वे श्रीकृष्ण की सहचरी और सदा उनके वक्ष:स्थल पर विराजमान रहती हैं। उनका दर्शन ईश्वरों, देवेन्द्रों और मुनियों को भी दुर्लभ है। वे भगवान श्रीकृष्ण की अद्वितीय दास्यभक्ति और सम्पदा प्रदान करने वाली हैं। ये निर्गुणा (लौकिक त्रिगुणों से रहित), निर्लिप्ता (लौकिक विषयभोग से रहित), निराकारा (पांचभौतिक शरीर से रहित, दिव्यचिन्मयस्वरूपा) व आत्मस्वरूपिणी (श्रीकृष्ण की आत्मा) नाम से विख्यात हैं। ये अग्निशुद्ध नीले रंग के दिव्य वस्त्र धारण करती हैं। इन्हें परावरा, सारभूता, परमाद्या, सनातनी, परमानन्दस्वरूपा, धन्या, मान्या और पूज्या कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर वे रत्नमय सिंहासन पर बैठ गईं। उन किशोरी के रोमकूपों से लक्षकोटि गोपांगनाओं का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष में उन्हीं के समान थीं तथा गोलोक में उनकी प्रिय दासियों के रूप में रहती थी। फिर श्रीकृष्ण के रोमकूपों से तीस करोड़ गोपगणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष में उन्हीं के समान थे। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्ण के प्राणों के समान प्रिय पार्षद बन गए। फिर श्रीकृष्ण के रोमकूपों से गौएं, बलीवर्द (सांड़), बछड़े व कामधेनु प्रकट हुईं। भगवान श्रीकृष्ण ने करोड़ों सिहों के समान बलशाली एक बलीवर्द को शिवजी को सवारी के लिए दे दिया। तत्पश्चात् भगवान के नखों से हंसपक्ति प्रकट हुई। उनमें से एक राजहंस को भगवान श्रीकृष्ण ने तपस्वी ब्रह्मा को वाहन बनाने के लिए दे दिया। फिर परमात्मा श्रीकृष्ण के बांये कान से सफेद रंग के घोड़े प्रकट हुए उनमें से एक भगवान ने धर्मदेव को सवारी के लिए दे दिया। भगवान के दाहिने कान से सिंह प्रकट हुए, उनमें से एक सिंह उन्होंने प्रकृतिदेवी दुर्गा को अर्पित कर दिया। इसके बाद श्रीकृष्ण ने योगबल से पांच रथों का निर्माण किया, उनमें से एक रथ भगवान नारायण को व एक श्रीराधा को देकर शेष अपने लिए रख लिए। भगवान श्रीकृष्ण के गुह्यदेश से ‘कुबेर’ व ‘गुह्यक’ प्रकट हुए। कुबेर के वामभाग से उनकी पत्नी प्रकट हुईं। भगवान के गुह्यदेश से ही भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस आदि प्रकट हुए। तदनन्तर भगवान के मुख से शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी पार्षद प्रकट हुए जिन्हें उन्होंने नारायण को सौंप दिया। गुह्यकों को उनके स्वामी कुबेर को और भूत-प्रेत आदि भगवान शंकर को अर्पित कर दिए। तदनन्तर श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों से हाथों में जपमाला लिए पार्षद प्रकट हुए। श्रीकृष्ण ने उन्हें दास्यकर्ममें लगा दिया। वे सभी श्रीकृष्णपरायण ‘वैष्णव’ थे। उनके सारे अंग पुलकित थे, नेत्रों से अश्रु झर रहे थे और वाणी गद्गद थी। इसके बाद भगवान के दाहिने नेत्र से तीन नेत्रों वाले, विशालकाय, दिगम्बर, हाथों में त्रिशूल और पट्टिश लिए, भयंकर गण प्रकट हुए जो ‘भैरव’ कहलाए। परमात्मा श्रीकृष्ण के बांये नेत्र से दिक्पालों के स्वामी ‘ईशान’ प्रकट हुए। इसके बाद श्रीकृष्ण की नासिका के छिद्र से डाकिनियां, योगिनियां, क्षेत्रपाल व पृष्ठदेश (पीठ) से विभिन्न देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ। परमात्मा श्रीकृष्ण द्वारा देवताओं को उनकी पत्नी का दान!!!!!!! परमात्मा श्रीकृष्ण ने महालक्ष्मी व सरस्वती भगवान नारायण को, सावित्री ब्रह्माजी को, मूर्तिदेवी धर्मदेव को, रूपवती रति कामदेव को और मनोरमा कुबेर को प्रदान की। जो-जो स्त्री जिस-जिससे प्रकट हुईं थीं, उस-उस स्त्री को उसी पति के हाथों में अर्पित किया। भगवान ने शंकरजी से सिंहवाहिनी दुर्गा को ग्रहण करने के लिए कहा। शिवजी ने कहा–मुझे गृहिणी नहीं अपनी भक्ति दीजिए। इस पर भगवान ने हंसते हुए कहा–तुम पूरे सौ करोड़ कल्पों तक निरन्तर दिन-रात मेरी सेवा करो। तुम अमरत्व लाभ करो और महान मृत्युज्जय हो जाओ। तुमसे बढ़कर मेरा कोई प्रिय भक्त नहीं है किन्तु तुम सौकोटि कल्पों के बाद शिवा (दुर्गा) को ग्रहण करोगे। तुम केवल तपस्वी नहीं हो, मेरे समान ही महान ईश्वर हो जो समयानुसार गृही, तपस्वी और योगी हुआ करता है। ऐसा कहकर भगवान ने उन्हें मृत्युज्जय-तत्त्वज्ञान दिया। भगवान ने दुर्गा से कहा–इस समय तुम गोलोक में मेरे पास रहो। समय आने पर तुम शिव को पति रूप में प्राप्त करोगी। सभी देवताओं के तेज:पुंज से प्रकट होकर समस्त दैत्यों का संहार करके तुम सबके द्वारा पूजित होओगी। समस्त लोकों में प्रतिवर्ष तुम्हारी शरत्कालीन पूजा होगी। गांवों व नगरों में तुम ग्रामदेवता के रूप में पूजित होओगी। मैं तुम्हारे लिए कवच व स्त्रोत का विधान करुंगा। जो लोग तुम्हारी पूजा करेंगे, उनके यश, कीर्ति, धर्म और ऐश्वर्य की वृद्धि होगी। ये स्वर्ग में ‘स्वर्गलक्ष्मी’ और गृहस्थों के घर ‘गृहलक्ष्मी’ के रूप में विराजती हैं। तपस्वियों के पास तपस्यारूप से, राजाओं के यहां श्रीरूप से, अग्नि में दाहिका रूप से, सूर्य में प्रभा रूप से तथा चन्द्रमा एवं कमल में शोभा रूप से इन्हीं की शक्ति शोभा पा रही है। इनका सहयोग पाकर आत्मा में कुछ करने की योग्यता प्राप्त होती है। इन्हीं से जगत शक्तिमान माना जाता है। इनके बिना प्राणी जीते हुए भी मृतक के समान है। विराट् पुरुष की उत्पत्ति!!!!!! भगवान श्रीकृष्ण का शुक्र जल में गिरा। वह एक हजार वर्ष के बाद एक अंडे के रूप में प्रकट हुआ। उसीसे ‘विराट् पुरुष’ की उत्पत्ति हुई, जो सम्पूर्ण विश्व के आधार व अनन्त ब्रह्माण्डनायक हैं। वे स्थूल से भी स्थूलतम हैं। उनसे बड़ा दूसरा कोई नहीं है इसलिए वे महाविराट् नाम से प्रसिद्ध हुए। यह विराट् पुरुष ही प्रथम जीव होने के कारण समस्त जीवों का आत्मा, जीवरूप में परमात्मा का अंश और प्रथम अभिव्यक्त होने के कारण भगवान का आदि अवतार है। भूख से आतुर वह विराट् पुरुष रोने लगा और भगवान की स्तुति करने लगा। तब भगवान ने प्रकट होकर कहा–प्रत्येक लोक में वैष्णवभक्त जो नैवेद्य अर्पित करता है, उसका सोलहवां भाग तो भगवान विष्णु का होता है तथा पन्द्रह भाग इस विराट् पुरुष के होते हैं क्योंकि ये स्वयं परिपूर्णतम श्रीकृष्ण का विराट् रूप हैं। उन परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्ण को तो नैवेद्य से कोई प्रयोजन नहीं है। भक्त उनको जो कुछ भी नैवेद्य अर्पित करता है, उसे वे विराट् पुरुष ग्रहण करते हैं। भगवान ने उन्हें वर देते हुए कहा–तुम बहुत काल तक स्थिर भाव से रहो, जैसे मैं हूँ वैसे ही तुम भी हो जाओ। असंख्य ब्रह्मा के नष्ट होने पर भी तुम्हारा नाश नहीं होगा। प्रत्येक ब्रह्माण्ड में तुम अपने अंश से क्षुद्रविराट् रूप में स्थित रहोगे। तुम्हारे नाभिकमल से उत्पन्न होकर ब्रह्मा विश्व का सृजन करने वाले होंगे। सृष्टि के संहार के लिए ब्रह्मा के ललाट से ग्यारह रूद्रों का आविर्भाव होगा। उन रूद्रों में जो ‘कालाग्नि’ नाम का रूद्र है वही विश्व के संहारक होंगे। विष्णु विश्व की रक्षा के लिए तुम्हारे क्षुद्रअंश से प्रकट होंगे। तुम मुझ जगत्पिता और मेरे हृदय में निवास करने वाली जगन्माता को ध्यान के द्वारा देख सकोगे। काल, स्वभाव, कार्य, कारण, मन, पंचमहाभूत, अहंकार, तीनों गुण, इन्द्रियां, ब्रह्माण्ड शरीर, स्थावर-जंगम जीव–सब-के-सब उन अनन्त भगवान के ही रूप हैं। वे ही ‘महाविष्णु’ जाने जाते हैं। तेज में वे परमात्मा श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश के बराबर हैं। उनके एक-एक रोमकूप में एक-एक ब्रह्माण्ड स्थित हैं अत: इनके रोमकूपों में कितने ब्रह्माण्ड हैं, उन सब की स्पष्ट संख्या बता पाना संभव नहीं। एक-एक ब्रह्माण्ड में अलग-अलग ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं। पाताल से ब्रह्मलोकपर्यन्त वे महार्णव के जल में शयन करते हैं। शयन करते समय इनके कानों के मल से दो दैत्य (मधु कैटभ) प्रकट हुए जिनका भगवान नारायण ने वध कर दिया, उन्हीं के मेदे से यह सारी मेदिनी पृथ्वी निर्मित हुई उसी पर सम्पूर्ण विश्व की स्थिति है, जिसे वसुन्धरा कहते हैं। क्षुद्रविराट्–श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार वे विराट् पुरुष अपने अंश से क्षुद्र विराट् पुरुष हो गए। इनकी सदा युवा अवस्था रहती है। ये श्याम वर्ण के व पीताम्बरधारी हैं और जल रूपी शय्या पर सोये रहते हैं। इनको जनार्दन भी कहा जाता है। इसके बाद परमात्मा श्रीकृष्ण ने सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी को महाविराट् के एक रोमकूप में स्थित क्षुद्रविराट् के नाभिकमल से प्रकट होने का आदेश दिया। इन्हीं के नाभिकमल से ब्रह्मा प्रकट हुए और उत्पन्न होकर वे ब्रह्मा उस कमलदण्ड में एक लाख युगों तक चक्कर लगाते रहे फिर भी पद्मनाभ की नाभि से उत्पन्न हुए कमलदण्ड तथा कमलनाल के अंतिम छोर का पता नहीं लगा सके। तब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान व स्तुति की और भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से ब्रह्माजी ने सृष्टि-रचना का कार्य आरम्भ कर दिया। सर्वप्रथम ब्रह्मा से सनकादि चार मानस पुत्र हुए, उनके ललाट से शिव के अंश ग्यारह रूद्र हुए। क्षुद्रविराट् के वामभाग से जगत की रक्षा के लिए चतुर्भुज विष्णु हुए जो श्वेतद्वीप में निवास करते हैं। ब्रह्माजी द्वारा मेदिनी, सृष्टि का निर्माण!!!!!!! भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार ब्रह्माजी ने सबसे पहले मधु और कैटभ के मेदे से मेदिनी की सृष्टि की। ब्रह्माजी ने आठ प्रधान पर्वत (सुमेरु, कैलास, मलय, हिमालय, उदयाचल, अस्ताचल, सुवेल और गन्धमादन) और अनेकों छोटे-छोटे पर्वत बनाए। फिर ब्रह्माजी ने सात समुद्रों (क्षारोद, इक्षुरसोद, सुरोद, घृत, दधि तथा सुस्वादु जल से भरे हुए समुद्र) की सृष्टि की व अनेकानेक नदियों, गांवों, नगरों व असंख्य वृक्षों की रचना की। सात समुद्रों से घिरे सात द्वीप (जम्बूद्वीप, शाकद्वीप, कुशद्वीप, प्लक्षद्वीप, क्रौंचद्वीप, न्यग्रोधद्वीप तथा पुष्करद्वीप) का निर्माण किया। इसमें उनचास उपद्वीप हैं। उन्होंने मेरुपर्वत के आठ शिखरों पर आठ लोकपालों के लिए आठ पुरियां व भगवान अनन्त (शेषनाग) के लिए पाताल में नगरी बनाई। तदनन्तर ब्रह्माजी ने उस पर्वत के ऊपर सात स्वर्गों (भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक) की सृष्टि की। पृथ्वी के ऊपर भूर्लोक, उसके बाद भुवर्लोक, उसके ऊपर स्वर्लोक, तत्पश्चात् जनलोक, फिर तपोलोक और उसके आगे सत्यलोक है। मेरु के सबसे ऊपरी शिखर पर स्वर्ण की आभा वाला ब्रह्मलोक है, उससे ऊपर ध्रुवलोक है। मेरुपर्वत के नीचे सात पाताल (अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, पाताल तथा रसातल) हैं जो एक से दूसरे के नीचे स्थित हैं, सबसे नीचे रसातल है। सात द्वीप, सात स्वर्ग तथा सात पाताल सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ब्रह्माजी के अधिकार में है। ऐसे-ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और वे महाविष्णु के रोमकूपों में स्थित हैं। श्रीकृष्ण की माया से प्रत्येक ब्रह्माण्ड में अलग-अलग दिक्पाल, ब्रह्मा, विष्णु व महेश, देवता, ग्रह, नक्षत्र, मनुष्य आदि स्थित हैं। पृथ्वी पर चार वर्ण के लोग और उसके नीचे पाताललोक में नाग रहते हैं। पाताल से ब्रह्मलोकपर्यन्त ब्रह्माण्ड कहा गया है। उसके ऊपर वैकुण्ठलोक है; वह ब्रह्माण्ड से बाहर है। उसके ऊपर पचास करोड़ योजन विस्तार वाला गोलोक है। कृत्रिम विश्व व उसके भीतर रहने वाली जो वस्तुएं हैं वे अनित्य हैं। वैकुण्ठ, शिवलोक और गोलोक ही नित्यधाम हैं। विभिन्न कल्पों में सृष्टि-रचना!!!!!! जैसे सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग–ये चार युग होते हैं, वैसे ही तीन महाकल्प होते हैं–ब्रह्मकल्प, वाराहकल्प और पाद्मकल्प। परन्तु छोटे-छोटे कल्प बहुत-से हैं। ब्रह्माजी की आयु के बराबर एक कल्प होता है। ब्राह्मकल्प में मधु-कैटभ के मेद से मेदिनी की सृष्टि करके ब्रह्माजी ने भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा लेकर सृष्टि-रचना की थी। वाराहकल्प में जब पृथ्वी एकार्णव के जल में डूब गयी थी, तब वाराहरूपधारी भगवान विष्णु ने रसातल से उसका उद्धार किया और सृष्टि-रचना की। पाद्मकल्प में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने विष्णु के नाभिकमल पर सृष्टि का निर्माण किया। सृष्टि-रचना में ब्रह्मलोकपर्यन्त जो त्रिलोकी है, उसी की रचना की; गोलोक, वैकुण्ठलोक व शिवलोक नित्य हैं। प्राकृतिक प्रलय!!!!!!! इकत्तर दिव्य युगों की इन्द्र की आयु होती है। ऐसे अट्ठाईस इन्द्रों का पतन हो जाने पर ब्रह्मा का एक दिन-रात होता है। ऐसे सौ वर्ष की ब्रह्मा की आयु होती है। जब श्रीहरि आंख मूंदते और पलक गिराते हैं, तब ब्रह्माजी का पतन एवं प्रलय होता है। उसी को ‘प्राकृतिक प्रलय’ कहते हैं। उस प्राकृतिक प्रलय के समय पृथ्वी दिखाई नहीं पड़ती। उस समय सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ, प्राणी और देवता ब्रह्मा में लीन हो जाते हैं और ब्रह्मा भगवान श्रीकृष्ण के नाभिकमल में लीन हो जाते हैं। क्षीरशायी विष्णु, वैकुण्ठवासी विष्णु परमात्मा श्रीकृष्ण के वामभाग में लीन हो जाते हैं। रूद्र, भैरव आदि शिव के अनुगामी शिव में लीन हो जाते हैं, और ज्ञान के अधिष्ठाता शिव श्रीकृष्ण के ज्ञान में विलीन हो जाते हैं। सम्पूर्ण शक्तियां दुर्गा में तिरोहित हो जाती हैं और बुद्धि की अधिष्ठात्री दुर्गा भगवान श्रीकृष्ण की बुद्धि में स्थान ग्रहण कर लेती हैं। स्वामी कार्तिकेय श्रीकृष्ण के वक्ष:स्थल में और गणेश उनकी दोनों भुजाओं में प्रविष्ट हो जाते हैं। लक्ष्मी, उनकी अंशभूता देवियां, गोपियां और सभी देवपत्नियां श्रीराधा में लीन हो जाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण के प्राणों की अधीश्वरी देवी श्रीराधा उनके प्राणों में निवास कर जाती हैं। सावित्री, वेद एवं सम्पूर्ण शास्त्र सरस्वती में प्रवेश कर जाते हैं। सरस्वती परमब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण की जिह्वा में विलीन हो जाती हैं। गोलोक के सम्पूर्ण गोप भगवान श्रीकृष्ण के रोमकूपों में लीन हो जाते हैं। सम्पूर्ण प्राणियों की प्राणस्वरूप वायु का श्रीकृष्ण के प्राणों में, समस्त अग्नियों का उनकी जठराग्नि में व जल का उनकी जिह्वा के अग्रभाग में लय हो जाता है। भक्तिरस का पान करने वाले समस्त वैष्णव भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में लीन हो जाते हैं। क्षुद्रविराट् महाविराट् में और महाविराट् श्रीकृष्ण में लीन हो जाते हैं। प्रकृति भी परब्रह्म श्रीकृष्ण में लीन हो जाती है। परमात्मा श्रीकृष्ण के ही रोमकूपों में सम्पूर्ण विश्व की स्थिति है। भगवान के आंख मींचने पर महाप्रलय होता है तथा उनकी आंख खुलते ही पुन: सृष्टि का कार्य आरम्भ हो जाता है। ब्रह्मा के सौ वर्षों तक सृष्टि चालू रहती है, फिर उतने ही समय के लिए प्रलय हो जाता है। जैसे पृथ्वी के धूलिकणों की गिनती नहीं की जा सकती, ठीक उसी तरह ब्रह्मा की सृष्टि और प्रलय की कोई गिनती ही नहीं है। कितने कल्प आए और गए, कौन जान सकता है? सभी ब्रह्माण्डों का ईश्वर एक ही है; और वह हैं श्रीकृष्ण। वे श्रीकृष्ण द्विभुज और चतुर्भुज होकर दो रूपों में विभक्त हो गए। उनमें चतुर्भुज श्रीहरि वैकुण्ठ में और स्वयं द्विभुज श्रीकृष्णरूप में गोलोक में प्रतिष्ठित हुए। मैं ही गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी शरण, निवास, सुहृद मैं ही। मैं उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान नित्य बीज मैं ही।। मैं ही मेघ रोकता, तपता, मैं ही बरसाता हूँ वृष्टि। मैं ही अमृत, मृत्यु भी मैं ही, सदसत् मैं ही सारी सृष्टि।। (श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार) श्रीभगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं– ‘हे अर्जुन! मेरे अतिरिक्त दूसरी कोई भी वस्तु नहीं है। माला के सूत्र में पिरोये हुए मणियों के समान यह समस्त ब्रह्माण्ड मुझमें पिरोया हुआ है।’ (७।७) ‘मैं ही गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, सबका आधार, निधान तथा अविनाशी कारण हूँ।’ (१४।२७) गीता में ऐसे बहुत-से श्लोक हैं, इनके अलावा महाभारत व श्रीमद्भागवत में ऐसे अनेक वाक्य हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण परात्पर सनातन ब्रह्म हैं। परमात्मा श्रीकृष्ण नित्यस्वरूप, नित्यानन्द, निराकार, निरामय, निरंकुश, निर्गुण, निर्लिप्त, सर्वसाक्षी एवं सर्वाधार हैं। कमलनयन श्रीकृष्ण से बढ़कर दूसरा कोई दिखाई ही नहीं देता। वे ही सर्वभूतमय और सबकी आत्मा हैं। वे परम तेज हैं और सम्पूर्ण लोकों के पितामह हैं। अनोखा अभिनय यह संसार! रंगमंच पर होता नित नटवर-इच्छित व्यापार।। कोई है सुत सजा, किसी ने धरा पिता का साज। कोई स्नेहमयी जननी बन करता नट का काज।। इसी तरह जग में सब खेलें खेल सभी अविकार। मायापति नटवर नायक के शुभ इंगित-अनुसार।। (श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार) जैसे कठपुतली के नाच में कठपुतली और उसका नृत्यदर्शकों को दिखाई देता है, परन्तु कठपुतलियों को नचाने वाला सूत्रधार पर्दे के पीछे रहता है, जिसे दर्शक देख नहीं पाते। इसी प्रकार यह संसार तो दिखता है–पर इसका संचालक परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता। जो कुछ दिखता है, वह सत्य नहीं है, सत्य तो केवल परब्रह्म परमात्मा है। इसीलिए श्रीशंकराचार्यजी ने कहा है– ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।’ श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मुख में अर्जुन को विश्वदर्शन कराकर यह शिक्षा दी कि मैं ही सब कुछ हूँ, सब मेरा ही स्वरूप हैं, उसके अतिरिक्त कुछ नहीं। अंत में यही कहा जा सकता है कि इस सृष्टि का सूत्रधार सृष्टि के कण-कण में समाया हुआ है, हम सबके हृदय में व्याप्त है। जब हमारा चित्त निर्मल होगा, तभी वह हमें दिखाई देगा।sabharfacebook wal shivanand mishra

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गुरुवार, 2 जून 2022

साधना_के_दो_खण्ड_ज्ञानखण्ड_शक्तिखण्ड

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{{{ॐ}}} # यह विषय हम सीधे-सीधे कुण्डलिनी साधना से जोड़ रहे है। जो भी व्यक्ति साधनाओं में रूचि रखते हैं। वो आज्ञा चक्र पर दस से बीस मिनट ध्यान करें। ध्यान बढ़ने पर या तो यह स्वत: सहस्त्रार पर जाएगा अथवा संकल्प से ले जाना पडे़गा। सहस्त्रार पर भी बीस मिनट ध्यान करें। इस प्रकार प्रतिदिन कम से कम चालीस मिनट एक बार में ध्यान अवश्य करें। ध्यान और बढ़ने पर यह ऊर्जा सहस्त्रार से पीछे की ओर नीचे गिरेगी व मूलाधार तक पहुंचेगी। इस प्रकार एक बार सातों चक्रो में स्फुरणा प्रारम्भ हो जाएगी। यह साधना का प्रथम सोपान है इसके हम ज्ञान खण्ड की संज्ञा दे रहे है। इस सोपान में प्रज्ञा बुद्धि व्यक्ति के भीतर विकसित होने लगती है, सत चित्र, आनन्द से उसका सम्पर्क बनने लगता है। भीतर तरह-तरह का ज्ञान विज्ञान स्फुरित होने लगेगा। कभी-कभी किसी चक्र को ऊर्जा अधिक मिलने से उसकी सिद्धि, शक्ति अथवा विकृति का भी सामना करना पड़ेगा। किसी-किसी चक्र में ऊर्जा के भवंर से व्यक्ति को कुछ कठिनार्ईयों का सामना भी करना पड़ेगा। रास्ता बनाने के लिए ऊर्जा जोर मारती है व मीठे-मीठे अथवा कभी तीव्र दर्द का अहसास भी होता है। व्यक्ति अब योगियों की भाँति जीवन जीना पसन्द करता है। साथ-साथ प्रारब्धो का भुगतान भी प्रारम्भ हो जाता है जो कई बार कठोर भी हो सकता है। इस प्रथम सोपान को पार करने में व्यक्ति के अनेक वर्ष लग जाते हैं। इसमें व्यक्ति अपना सामान्य जीवन जीते हुए साधना कर सकता है। गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए माह में एक या दो बार सम्भोग भी कर सकता है अपनी नौकरी व भोजन सामान्य रूप से कर सकता है। छोटे-छोटे शक्तिपात से व्यक्ति में यह साधना क्रम प्रारम्भ हो जाता है। यदि व्यक्ति साधना में अधिक समय लगाने लगे व चक्रो में ऊर्जा पर्याप्त मात्रा में आने लगे तो मूलाधार चक्र की ऊर्जा कुण्डलिनी पर तीव्र आघात कर उसे जगा देती हैं। यह कुण्डलिनी आगे से ऊपर की ओर उठती हुयी सहस्त्रार पर जाती है व एक चक्र में ऊर्जा दौड़ती है। अब साधना का दूसरा सोपान प्रारम्भ होता है। इस सोपान में गम्भीरता व सावधानी पूर्वक प्रवेश करना होता है। व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह पूर्ण ब्रह्मचार्य का पालन करें। उसका अधिक इधर उधर घूमना, व्यर्थ बाते बनाना सब पर प्रतिबन्ध लगने आरम्भ हो जाते हैं। यहाँ तक कि यदि वह किसी दूसरे के बिस्तर पर लेटे तो उसे परेशनी होने लगती है। कई बार सामने वाले गलत व्यक्ति से भी कष्ट अनुभव होता है। इस सोपान में व्यक्ति का तन्त्र बहुत ही सम्वेदनशील हो जाता है। रामकृष्ण परमहंस जी को अजीबोगरीब स्थिति से हम सभी परिचित हैं। कुछ-कुछ इसी प्रकार के लक्षण साधक में आने लगते है। कभी-कभी साधक के शरीर का कोई भाग बहुत कच्चा प्रतीत होता है। इस सोपान में घुसते ही साधक कई बार घबरा जाता है कि यह उसके साथ क्या हो रहा है? इस सोपान में व्यक्ति के लिए हानिप्रद होती है। कभी-कभी प्रारब्ध भुगतान से मृत्यु आती नजर आती है अथवा वैसा कष्ट लगता है। इस सोपान में घुसने पर साधक को साधना के नियमों का कठोरता पूर्वक पालन करना होता है अन्यथा वह बीच में ही शरीर छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएगा। यह नाजुक छोर होता है जिसमें व्यक्ति को चारों ओर से सम्भाल की जरूरत महसूस होती है। लेकिन इस सोपान में थोड़ा सा आगे बढ़ते ही ऋद्धियाँ सिद्धियाँ देख साधक का मन हर्षित भी हो उठता है। उसको वाक सिद्धि की प्राप्ति होने लगती है। प्रज्ञा के प्रकाश से किसी भी परिस्थिति का आकलन कर सकता है। किसी भी रोगी के लिए यदि वह मृत्युन्जे मन्त्र का जप कर दे तो रोग ठीक होने लगता है। कई बार इतना तक होता है कि व्यक्ति प्रारब्ध वश खुद तो कठिन स्वास्थ्य संकट में फंसा है परन्तु जिसके लिए उसने प्रार्थना कर दी उसका भला हो जाता है। इस सोपान में व्यक्ति साधना की ऊँचाई पर चढ चुका है। जैसे यदि वृक्ष में ऊँचाई से गिर जाए तो मृत्यु की सम्भावना रहती है। उसी प्रकार यदि इस सोपान में व्यक्ति ने सावधानी न बरती तो वह धडाम से दुखद अन्त की ओर गिर सकता है। अपनी वाणी पर नियन्त्रण, भावना पर नियन्त्रण व वासना का दमन करना होता है। कामदेव के शिव ने भस्मीभूत कर दिया। साधक के भी कठोरता पूर्वक भीतर वासना के संस्कारों को भस्म करना होता है। यद्यपि उसके भीतर उत्पन्न उपलब्धियाँ उसको असामान्य बना रही होती है परन्तु उसे स्वयं को सामान्य रखना होता है। गुड़ की महक से मक्खियाँ भिनभिनाना प्रारम्भ कर देती है। चेहरे पर आयी दिव्य क्रान्ति, उसकी मधुर वाणी, आत्मीय व्यवहार से हर कोई उसकी समीपता चाहता है। ऐसे व्यक्ति को चाहिए कि भीड़ से बचे व दस बीस पचास अपनी सामर्थ्य अनुसार जिज्ञासुओं की एक मण्डली चयन कर बनाकर उनको साधना के लिए प्रेरित करें। कभी-कभी अपने अनुभवों के असे बाँटे, जिससे उनको भी प्ररेणा मिलें। यदि साधको की छोटी-छोटी समूह तैयार होते रहेंगे। तो सभी की साधना में तीव्रता आएगी। जैसे जूनियर का बच्चा प्राइमरी के बच्चे को सिखा सकता है वैसे ही शक्ति खण्ड में चल रहा साधक प्रथम ज्ञान खण्ड के साधको का मार्गदर्शन कर सकता है। शक्ति खण्ड में व्यक्ति के प्रारब्ध तो तेजी से कट जाते है परन्तु एक ओर समस्या से उसको जुझना पड़ता है। जैसे ही व्यक्ति शक्ति खण्ड में घुसता है आसुरी शक्तियाँ उसको दबाने के लिए तत्पर हो जाती है व भाँति-भाँति से उसको भ्रमित करती है जिससे वह घबराकर साधना में पीछे हटना प्रारम्भ कर दें। ज्ञान खण्ड में व्यक्ति जीवन में समर्पण लाता है तो शक्ति खण्ड में व्यक्ति आत्मदान के लिए प्रयत्नशील होता है जितनी बढ़िया मनोभूमि आत्मदान की बनती है उतनी अधिक सफलता साधक को मिलती है। अन्यथा व्यक्ति अंह में फंस योग भ्रष्ट हो सकता है। जैसे ज्ञान खण्ड के सोपान वाले व्यक्ति को कभी-कभी शक्ति, सिद्धि का अनुभव होता है वैसे ही साधना बढ़ने सम्भलने पर शक्ति खण्ड वाले व्यक्ति को आत्म चेतना ब्रह्म चेतना का अनुभव होता है। व्यक्ति के प्रतीत होता है जैसे आज्ञा चक्र सहस्त्रार के आस पास कोई बिन्दु है जो वह है। रात्रि में जब वह सोता है तो उसी बिन्दु पर ध्यान लगाता है उसका शरीर सो रहा होता है परन्तु वह उस बिन्दु पर सचेत होता है बिन्दु पर बने रहकर वह रात भर जप भी कर सकता है। ये स्थितियाँ बड़ी आनन्दायक होती हैं, परन्तु साथ-साथ पूर्ण पवित्रता की माँग भी करती है। अन्तर बाहर यदि पवित्रता न मिलें तो कष्ट प्रद स्थिति बनते भी देर नहीं लगती। साधक की भावमुखी दशा देख उसके घर परिवार वाले उसे सनकी अथवा पागल भी मानने लग सकते हैं व उसके साथ दुव्र्यवहार भी कर सकते है। क्योंकि उसकी परिपाटी अन्य लोगों की परिपाटी से मेल नहीं खाती। उदाहरण के लिए साधक को शान्त वातावरण चाहिए जबकि अन्य सदस्यों को घूम धड़ाके वाला वातावरण। साधक करुणावश धन वितरित करता है, जरूरत मन्दो की मदद करते हैं, अन्य लोग बैंक बेलेंस बढ़ाना पसन्द करते हैं। यदि परिवार में लोग समझदार नहीं है साधक को अधिक परेशान करते हैं तो यह सबके लिए खतरनाक भी हो सकता है यदि तालमेल उचित है तो भले ही दूसरे व्यक्ति साधना न करें। परन्तु साधक की सदभावना का लाभ कमा सकते है उसकी साधना से प्रत्यक्ष परोक्ष रूप में लाभान्वित हो सकते है। यदि पति पत्नी में से एक शक्ति खण्ड में प्रवेश कर गया है तो दूसरे को भी बाध्य होकर संयम का पालन करना पड़ेगा, अन्यथा एक या दोनों के जान से हाथ धोना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में नियति को स्वीकार कर लें तो ही अच्छा हैं। यह प्रयास न करें कि साधक पीछे हटें। क्योंकि शक्ति खण्ड में पीछे हटना भी बहुत सावधानी से करना पडता है। पहले तो स्थूल शरीर प्रचण्ड ऊर्जा को सहने का अभ्यासी नहीं था धीरे-धीरे उच्च ऊर्जा के अनुसार स्थूल शरीर का तन्त्र बना। अब यदि उच्च ऊर्जा से फिर निम्न ऊर्जा में आया तो शरीर सह नहीं पाता किसी न किसी अंग में विकृति आने का खतरा बना रहता है। यदि परिवार में सद्भावना हो उचित तालमेल हो तो साधनाक्रम सही चल सकता है। एक व्यक्ति अधिक समय साधना में लगाए व दूसरे उसका सहयोग करें। यदि पति पत्नी दोनों शक्ति खण्ड में प्रवेश कर जाएँ व बच्चे छोटे हो तो भी कठिनाई रहती है उनके पालन पोषण में बाधा आती है। ऐसे में सुंयक्त परिवार हो व सद्भावनापूर्ण हो तभी साधना में प्रगति सम्भव हैं। अधिकतर साधक साधना के प्रथम सोपान पर ही अटके रहते है आगे नही बढ़ पाते; इसका कारण यह है कि उनकी मनोभूमि उर्वर नहीं होती जिस कारण वो अपने कु:संस्कारों से संघर्ष कर तेजी से आगे नहीं बढ़ पाते यदि हमें दही से मक्खन निकालना हो तो रई को धीरे-धीरे घुमाने से काम नही चलेगा, तीव्र गति से घुमाना ही पड़ेगा ऐसे ही यदि साधना में कुछ उपलब्धि हासिल करनी है तो ढीले-पीले तरीके से काम नही चलता, हमारी समस्या यह होती है कि हम दोनों को पकड़ कर चलते है। साधना भी और वासना भी, यह आधापन छोड़ना ही पडे़गा। साधना करनी है तो पूरी साधना करो, साधक की साधना धुएँ वाली आग नही धधकती हुई ज्वाला होनी चाहिए अर्थात् साधना जिस किसी तरह न करके उसे तीव्रतम व प्रचण्डतम होना चाहिए, हम एक नदी ऐसी में उलझे हुए है जिसके एक किनारे का नाम संसार है और दूसरे का नाम समाधि है यदि नाव ठीक से चलाई जाए सही ढंग से साधना की जाएँ तो समाधि निश्चित है। इस सन्दर्भ में एक घटना बड़ी मार्मिक है। बनारस में एक सिद्ध पुरुष हुए है जिनका नाम या हरिबाबा, उनके एक शिष्य ने उनसे पूछा कि मैं बहुत जप-तप करता हूँ, पर सब अकारण जाते हैं। भगवान् है भी या नहीं मुझे संदेह होने लगा है। हरिबाबा ने इस बात पर जोर का ठहाका लगाया और बोले-चल मेरे साथ आ, थोड़ी देर गंगा में नाव चलायेंगे और तेरे सवाल का जवाब भी मिल जायेगा। बाढ़ से उफनती गंगा में हरिबाबा ने नाव डाल दी। उन्होंने पतवार उठाई पर केवल एक। नाव चलानी हो तो दोनों पतवारें चलानी होती है, पर वह एक ही पतवार से नाव चलाने लगे। नाव गोल-गोल चक्कर काटने लगी। शिष्य तो डरा-पहले तो बाढ़ से उफनती गंगा उस पर से गोल-गोल चक्कर। वह बोला-अरे आप यह क्या कर रहे हैं, ऐसे तो हम उस किनारे कभी भी न पहुँचेंगे। हरिबाबा बोले-तुझे उस किनारे पर शक आता है या नहीं शिष्य बोला-यह भी कोई बात हुई जब यह किनारा है तो दूसरा भी होगा। आप एक पतवार से नाव चलायेंगे, तो नाव यूँ ही गोल चक्कर काटती रहेगी। यह एक दुष्चक्र बनकर रह जायेगी। हरिबाबा ने दूसरी पतवार उठा ली। अब तो नाव तीर की तरह बढ़ चली। वह बोले-मैं तुझसे भी यही कह रहा हूँ कि तू जो परमात्मा की तरफ जाने की चेष्टा कर रहा है-वह बड़ी आधी-अधूरी है। एक ही पतवार से नाव चलाने की कोशिश हो रही है। आधा मन तेरा इस किनारे पर उलझा है, आधा मन उस किनारे पर जाना चाहता है। तू आधा-आधा है। तू बस यूँ ही कुनकुना सा है। जबकि साधना में साधक की जिन्दगी खौलती हुई होनी चाहिए। sabhar Facebook wall sakti upasak agyani

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शनिवार, 21 मई 2022

ओशो विचार

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 ओशो विचार (45)


(1) 0sh0 - नर्क एक दुख का सपना है और स्वर्ग एक सुख का सपना है लेकिन दोनों ही सपना मात्र हैं। 

(2) 0sh0 - शान्ति और अशान्ति हमारे लिए द्वन्द है लेकिन सिद्ध पुरुष के लिए मुक्ति है। 

(3) 0sh0 - जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता, जिसका आचरण ब्रह्म जैसा हो जाए वही ब्राह्मण है। 

(4) 0sh0 - सिद्ध के लिए सिद्धावस्था का प्रारंभ तो है पर अन्त नहीं है, सिद्धावस्था में समय नहीं 

(5) 0sh0 - प्रशनों का उत्तर नहीं खोजना है लेकिन सारे प्रशन गिर जाएं ऐसी चित्त की दशा खोजनी है। 

(6) 0sh0 - मृत्यु शरीर मोह का परिणाम है, अमरत्व का बोध शरीर मुक्ति का परिणाम है। 

(7) 0sh0 - पहले अपने भीतर के सोने को खोज लो फिर उसे साधना की अग्नि में शुद्ध करो। 

(8)0sh0 - जब तक जीवन है तब तक दुख रहेगा, यदि दुख से मुक्ति पानी हो तो दुख को स्वीकार कर लो। .                                                         (9) 0sh0 - जिस आदत को बदलना हो उसे स्वीकार कर लो, ध्यान ना देने से आदतें छूट जाती हैं।                                                         (10) 0sh0 - पाप और पुन्य कृत्य में नही होते, पाप और पुन्य कृत्य के पीछे के हेतु में होते हैं। 

Collected by Sw.Ramesh Bharti (45)

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गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

होलोग्राफिक तकनीक द्वारा अंतरिक्ष की यात्रा

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  लंदन: यह फिल्म स्टार ट्रेक के एक दृश्य की तरह लग सकता है, लेकिन नासा के एक डॉक्टर और उनकी टीम पृथ्वी से अंतरिक्ष में 'होलोपोर्टेड' होने वाले पहले इंसान बन गए हैं. फ्लाइट सर्जन डॉ जोसेफ श्मिड ने अचानक खुद को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के बीच में बीमित पाया, जहां वह दो-तरफा बातचीत का आनंद लेने में सक्षम थे और यहां तक ​​​​कि फ्रांसीसी अंतरिक्ष यात्री थॉमस पेस्केट के साथ हाथ मिलाने में भी सक्षम थे.

      नासा ने खुलासा किया है कि कैसे होलोग्राफिक डॉक्टर नेअंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन' का दौरा किया. फ्लाइट सर्जन जोसेफ श्मिड पृथ्वी से अंतरिक्ष में पहुंचने वाले पहले मानव 'होलोपोर्टेड' थे. डॉ श्मिड ने बताया कि होलोपोर्टेशन एक प्रकार की तकनीक है जो लोगों के उच्च-गुणवत्ता वाले 3D मॉडल को वास्तविक समय में कहीं भी फिर से संगठित, संपीड़ित और प्रसारित करने की अनुमति देती है. इस प्रयोग के लिए नासा ने कस्टम सॉफ़्टवेयर के साथ Microsoft Hololens Kinect कैमरा और कंप्यूटर का उपयोग किया. 

 पहली बार इस तकनीक का इतनी दूरी पर प्रयोग

माइक्रोसाफ्ट के होलोलेंस जैसे मिश्रित रियलिटी डिस्प्ले के साथ संयुक्त होने पर, यह उपयोगकर्ताओं को 3D में दूरस्थ प्रतिभागियों को देखने, सुनने और बातचीत करने की अनुमति देता है जैसे कि वे वास्तव में एक ही भौतिक स्थान में मौजूद हों. माइक्रोसाफ्ट की ओर से 2016 से होलोपोर्टेशन का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन यह पहली बार है जब प्रौद्योगिकी को अंतरिक्ष जैसे चरम और दूरस्थ वातावरण में तैनात किया गया है.

मानव संचार का नया तरीका

डॉ श्मिड ने कहा, 'यह विशाल दूरी पर मानव संचार का पूरी तरह से नया तरीका है. 'इसके अलावा, यह मानव अन्वेषण का एक नया तरीका है, जहां हमारी मानव इकाई ग्रह से यात्रा करने में सक्षम है. हमारा भौतिक शरीर वहां नहीं है, लेकिन हमारा मानव अस्तित्व बिल्कुल है. 'इससे ​​कोई फर्क नहीं पड़ता कि अंतरिक्ष स्टेशन 17,500 मील प्रति घंटे की यात्रा कर रहा है और पृथ्वी से 250 मील ऊपर कक्षा में निरंतर गति में है. नासा ने कहा कि कोविड महामारी के लगभग दो वर्षों के दौरान, 'टेलीमेडिसिन का विकास और लोगों तक पहुंचने के नए तरीके बदल गए और विकसित हुए'.sabhar znews. Com

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मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

आत्मा की यात्रा

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 आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है,,ऐसे में वह स्वयं भी हथियार डाल देता है अन्यथा उसने आत्मा को शरीर में बनाए रखने का भरसक प्रयत्न किया होता है और इस चक्कर में कष्ट झेला होता है ।


अब उसके सामने उसके सारे जीवन की यात्रा चल-चित्र की तरह चल रही होती है । उधर आत्मा शरीर से निकलने की तैयारी कर रही होती है इसलिए शरीर के पांच प्राण  एक धनंजय प्राण को छोड़कर शरीर से बाहर निकलना आरंभ कर देते है।


यह प्राण आत्मा से पहले बाहर निकलकर आत्मा के लिए सूक्ष्म शरीर का निर्माण करते हैं जो कि शरीर छोड़ने के बाद आत्मा का वाहन होता है ।धनंजय प्राण पर सवार होकर आत्मा शरीर से निकलकर इसी सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाती है ।


बहरहाल अभी आत्मा शरीर में ही होती है और दूसरे प्राण धीरे-धीरे शरीर से बाहर निकल रहे होते हैं कि व्यक्ति को पता चल जाता है ।


उसे बेचैनी होने लगती है,, घबराहट होने लगती है सारा शरीर फटने लगता है,,खून की गति धीमी होने लगती है सांस उखड़ने लगती है बाहर के द्वार बंद होने लगते हैं ।


अर्थात अब चेतना लुप्त होने लगती है और मूर्छा आने लगती है चेतन ही आत्मा के होने का संकेत है और जब आत्मा ही शरीर छोड़ने को तैयार है - तो चेतना को तो जाना ही है और वह मूर्छित होने लगता है ।


बुद्धि समाप्त हो जाती है और किसी अनजाने लोक में प्रवेश की अनुभूति होने लगती है यह चौथा आयाम होता है 


फिर मूर्छा आ जाती है और आत्मा एक झटके से किसी भी खुली हुई इंद्रिय से बाहर निकल जाती है इसी समय चेहरा विकृत हो जाता है यही आत्मा के शरीर छोड़ देने का मुख्य चिन्ह होता है ।


 शरीर छोड़ने से पहले केवल कुछ पलों के लिए आत्मा अपनी शक्ति से शरीर को शत-प्रतिशत प्रतिशत सजीव करती है ताकि उसके निकलने का मार्ग अवरुद्ध ना रहे और फिर उसी समय आत्मा अपनी शक्ति से शरीर को शत प्रतिशत सजीव करती है ताकि उसके निकलने का मार्ग अवरुद्ध ना रहे और फिर उसी समय आत्मा निकल जाती है और शरीर खाली मकान की तरह निर्जीव रह जाता है ।

इससे पहले घर के आसपास कुत्ते बिल्ली के रोने की आवाज आती हैं इन पशुओं की आंखें अत्यधिक चमकीली होती है जिससे यह रात के अंधेरे में तो क्या सूक्ष्म शरीर धारी आत्मा को भी देख लेते हैं।


जब किसी व्यक्ति की आत्मा शरीर छोड़ने को तैयार होती है तो उसके अपने सगे-संबंधी जो मृत आत्माओं के रूप में होते हैं उसे लेने आते हैं और व्यक्ति उन्हें यमदूत समझता है और कुत्ते बिल्ली उन्हें साधारण जीवित मनुष्य ही समझते हैं । और अनजान होने की वजह से उन्हें देख कर रोते हैं और कभी-कभी भोंकते भी हैं ।


शरीर के पांच प्रकार के प्राण बाहर निकल कर उसी तरह सूक्ष्म शरीर का निर्माण करते हैं जैसे गर्भ में स्थूल शरीर का निर्माण क्रम से होता है।


सूक्ष्म शरीर का निर्माण होते ही आत्मा अपने मूल वाहक धनंजय प्राण के द्वारा बड़े वेग से निकलकर सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाती है ।आत्मा शरीर के जिस अंग से निकलती है उसे खोलती व तोड़ती हुई निकलती है ।जो लोग भयंकर पापी होते हैं उनकी आत्मा मूत्र या मल मार्ग से निकलती है,,जो पापी भी हैं और पुण्यात्मा भी हैं उनकी आत्मा मुख से निकलती है,,जो पापी कम और पुण्यात्मा अधिक हैं उनकी आत्मा नेत्रों से निकलती है,, और जो पूर्ण धर्मनिष्ठ हैं पुण्यात्मा और योगी पुरुष हैं उनकी आत्मा ब्रह्मरंध्र से निकलती है 


अब तक शरीर से बाहर सूक्ष्म शरीर का निर्माण हुआ रहता है लेकिन यह सभी का नहीं हुआ रहता जो लोग अपने जीवन में ही मोह-माया से मुक्त हो चुके योगी पुरुष हैं उन्हीं के लिए तुरंत सूक्ष्म शरीर का निर्माण हो पाता है। अन्यथा जो लोग मोह माया से ग्रस्त हैं परंतु बुद्धिमान हैं ज्ञान विज्ञान से अथवा पांडित्य से युक्त हैं ऐसे लोगों के लिए 13दिनों में सूक्ष्म शरीर का निर्माण हो पाता है।


हिंदू धर्म में शास्त्रों में 10 गात्र का श्राद्ध और अंतिम दिन मृतक का श्राद्ध करने का विधान इसलिए है कि 10 दिनों में शरीर के 10 अंगो का निर्माण इस विधान से पूर्ण हो जाए और आत्मा को सूक्ष्म शरीर मिल जाय ।

ऐसे में जब तक दसगत्र का श्राद्ध पूर्ण नहीं होता और सूक्ष्म शरीर तैयार नहीं हो जाता आत्मा प्रेत शरीर में निवास करती है।

अगर किसी कारणवश ऐसा नहीं हो पाता है तो आत्मा प्रेत योनि में भटकती रहती है ।

एक और बात, आत्मा के शरीर छोड़ते समय व्यक्ति को पानी की बहुत प्यास लगती है । शरीर से प्राण निकलते समय कंठ सूखने लगता है ह्रदय सूखता जाता है और इसे नाभि जलने लगती है । लेकिन कंठ अवरुद्ध होने से पानी पिया नहीं जाता और ऐसी स्थिति में आत्मा शरीर छोड़ देती है ।प्यास अधूरी रह जाती है इसलिए अंतिम समय में मुख्य में गंगा जल डालने का विधान है।


इसके बाद आत्मा का अगला पड़ाव होता है "शमशान का पीपल"यहां आत्मा के लिए 'यमघंट' बंधा होता है जिसमें पानी होता है यहां प्यासी आत्मा यमघंट से पानी पीती हैं,,जो उसके लिए अमृ-त्तुल्य होता है । इस पानी से आत्मा तृप्ति का अनुभव करती है ।


 हिंदू धर्म शास्त्रों में विधान है कि मृतक के लिए यह सब करना होता है ताकि उसकी आत्मा को शांति मिले अगर किसी कारणवश मृतक का दस गात्र का श्राद्ध ना हो सके और उसके लिए!! पीपल पर यमघंट भी ना बांधा जा सके तो उसकी आत्मा प्रेत योनि में चली जाएगी और फिर कब वहां से उसकी मुक्ति होगी कहना कठिन होगा ।

सदगुरुदेव भगवान के चरणों में दण्डवत  नमन....


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शुक्रवार, 11 मार्च 2022

बायोइंजीनियरिंग के क्षेत्र में भारत लाया है क्रांति, दुनिया को उपहार स्वरूप दिया ‘Liquid Cornea’

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 लिक्विड कॉर्निया आविष्कार : भारत आविष्कारों और विविध नवाचारों का देश है। अपने दक्ष युवा शक्ति और कुशल कर्मचारियों एवं वैज्ञानिकों के बल पर भारत तकनीक प्रौद्योगिकी और विज्ञान के क्षेत्र में नित नए प्रयोग करते रहता है। इन प्रयोगों में मिलने वाले सफलताओं और असफलताओं की खुशियों और झंझावातों को झेलते हुए एक कर्मयोगी की भांति भारत अनवरत रूप से विश्व निर्माण की प्रक्रिया में लीन रहता है। इसी क्रम में भारत ने पुनः एक नया आविष्कार कर पूरे विश्व को उपकृत किया है।

आंखें इंसान को मिली ईश्वर की अनुपम भेंट है। सभी ज्ञानेंद्रियों में आपकी आंखें सर्वोत्तम हैं, इसके बिना सब सूना-सूना है, देव दर्शन भी अधूरा है। विश्व में हर साल लाखों लोगों को अपनी दृष्टि संबंधी समस्या के निवारण हेतु कॉर्निया की आवश्यकता होती है। इन जरूरतमंदों में भारत के भी दो से तीन लाख लोग निरंतर अस्पतालों के चक्कर काटते रहते हैं। चक्षु दृष्टि रहित हो और ऐसी स्थिति में अस्पतालों का चक्कर काटना काफी पीड़ादायी है, लेकिन उससे भी भयावह है रोशनी मिलने की उम्मीद का टूटना।

पूर्व में आंखों की रोशनी प्राप्त करने का एकमात्र उपाय पूर्ण रूप से नेत्र प्रत्यारोपण था। आप सभी जानते हैं कि अंगदान को लेकर भारत में प्रचलन बहुत कम है और इस कारण से किसी भी सामान्य व्यक्ति को नेत्रदान के माध्यम से नेत्र प्रत्यारोपण कराना काफी असंभव सा कार्य था। ऊपर से इस पूरी प्रक्रिया में इतना खर्च व्यय होता था कि उसका वहन करना एक सामान्य आदमी के लिए दुष्कर था। तब भारत ने पूरे विश्व के नेत्र को प्रकाशित कर तमस रहित बनाने का बीड़ा उठाया और अपने इस दुर्धुष प्रयास में भारत सफल भी हुआ है।

तैयार हो गया है कॉर्निया का ब्लू प्रिंट

Organovo, Tissium,  Carmat,  Syncardia, जैसे पूरे देश-विदेश में कई ऐसे नवाचार है, जो रिजेनरेटिव तकनीक पर काम कर रहे हैं। इन  सभी नवाचारों का मूल उद्देश्य तकनीक के माध्यम से क्षतिग्रस्त  अंगों में पुनः प्राकृतिक कोशिकाओं के निर्माण प्रक्रिया को प्रारंभ करना है। उदाहरण हेतु हमारा लिवर कुछ परिस्थितियों जैसे- कर्क  रोग में स्वयं से कोशिकाओं का निर्माण करने में सक्षम होता है। भारतीय स्टार्टअप “The Pandorum” के सीईओ अरुण चन्द्र भी अपने इस नवाचार का आधार इसी प्रक्रिया को बताते है। डॉक्टर सांगवान भी “The Pandorum” से जुड़े हुए हैं, उनकी कोशिश ऐसी ही बायो इंजीनियरिंग के माध्यम से कॉर्निया का निर्माण करना है जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के स्वानिर्माण में सक्षम हो। बायो प्रिंटिंग तकनीक के माध्यम से ऐसे कॉर्निया का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया गया है।

इस महान उद्देश्य में दिल्ली के दरियागंज स्थित ‘Dr Shroff charity eye hospital’ ने सांगवान और “The Pandorum”  का साथ दिया है। दोनों संस्थानों ने मिलकर लिक्विड कॉर्निया (Liquid Cornea) के प्रोटोटाइप का निर्माण कर पूरे विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया है। Dr shroff charity eye hospital का  निर्माण 1917 में किया गया था और “The Pandorum” ने इसी संस्थान से चिकित्सीय आधारभूत संरचना और शोध में मदद मांगी थी। डॉक्टर सांगवान के नेतृत्व में Shroff-Pandorum cornea regeneration टीम का गठन किया गया, जिसने लिक्विड कॉर्निया (Liquid Cornea) बनाने में अशातीत सफलता हासिल की। यह Gel और पॉलीमर के बेहतरीन संयोग से बनी है और कॉर्नियल कोशिका के विकास में अप्रत्याशित मदद करती है, जिसके कारण पूरे नेत्र और कॉर्निया प्रत्यारोपण की जगह मात्र क्षतिग्रस्त कोशिका के प्रत्यारोपण से काम बन जाता है। जानवरों पर इसका प्रयोग सफल रहा है और अब 2022 तक इसका परीक्षण इंसानों पर किया जाएगा।

देश में 11 लाख लोग दृष्टि बाधित हैं

नेत्रदान और नेत्र प्रत्यारोपण दोनों की प्रक्रिया काफी जटिल और कठिन है। मृत्यु पश्चात अगर नेत्रदान त्वरित और एक समय सीमा के अंदर ना हो तो वह व्यर्थ हो जाता है। नेत्रदान में चिकित्सक आपकी आंखों के ऊपरी परत को ही निकालते हैं, जिसे हम कॉर्निया कहते हैं। आई बैंक एसोसिएशन ऑफ इंडिया (EBAI) के अनुसार हमारे देश में 11 लाख लोग दृष्टि बाधित हैं।

1,00,000 लोगों को हर साल नेत्र प्रत्यारोपण की आवश्यकता पड़ती है, जबकि हमारी स्वास्थ्य और चिकित्सीय व्यवस्था सिर्फ 25,000 लोगों की जरूरतों को ही पूरा कर पाती है। महामारी ने परिस्थितियों को और भी बदतर कर दिया है। अप्रैल 2020 से मार्च 2021 के एक साल के दौरान पूरे देश में 12,998 प्रत्यारोपण ही संभव हो सकें, जो कि औसतन 52 प्रतिशत कम है लेकिन अब इस बड़ी खोज से हालात पहले से बेहतर होंगे, इसकी उम्मीद लगाई जा रही है।

चाहे कोरोना हो या फिर कोई और आपदा हिंदुस्तान मानवता के लिए सर्वदा खड़ा रहा है। यह आविष्कार भारत के प्रयासों का सूचक है और भारत के गौरव का विषय है। धन्य है ‘सांगवान’ और ‘धरती के भगवान’ जो इस पुनीत कार्य के संवाहक है।

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गुरुवार, 10 मार्च 2022

कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की भाग

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सहजबोध को मेघा बुद्धि ( तर्क-वितर्क) के साथ नही जोडना चाहिए क्योंकि मेधा का अवलोकन कभी सही और कभी गलत हो सकता है। मगर सहजबोध का अवलोकन सर्वदा सही ही होंगा।

    

प्रत्येक व्यक्ति को कार्य शक्ति प्राप्त करने के लिए चालीस हजार प्रोटींस की आवश्यकता होती है। नित्य सुबह-शाम क्रियायोग कर हम इन प्रोटींस मे वृद्धि कर सकते है एवम वृद्धावस्था और व्याधियों का भी निवारण कर सकते है।


फेफडों, कालेय(जिगर), गुर्दो इत्यादि अंगों के बीच मे असंतुलन ही वृद्धावस्था और व्याधियों का प्रमुख कारण है। जेनेस ही व्याधिग्रस्थ कोशिकाओ(सेल्सो) को आरोग्यवंत करा सकते है।


हम क्रियायोग द्वारा इन जेनेस को जो आवश्यक प्रेरणा है वह देकर फेफडों, कालेय(जिगर), गुर्दा इत्यादि अंगों के बीच मे असंतुलित को दूर कर सकते है।शरीर के भीतर की प्रत्येक कोशिका उस आदमी का प्रतिरूप होती है।


हर जीवित कोशिका मे जेने विध्यमान रहता है।जेने का अंदर क्रोमोजोम होते है और इन क्रोमोजोम के अंदर डी.एन.ए होते है! जीवित सेल के अंदर डी.एन.ए मालिक्यूल अति मुख्य साझेदारी रखता है।


प्रोटीन, जेने और ऐंजाईम्स का उत्पादन करने मे प्रत्येक कोशिका शक्तिशाली होती है।हम जेने से वंशपरंपराणुगत गुण निर्धारित कर सकते है। हार्मोंस इस जेनेस को आवश्यक उत्प्रेरणा देते है ।


जिसकी वजह से यह जेनेस आरोग्यता बनाए रखते है हजारों जेनेस मे से शास्त्रज्ञो ने व्याधिकारक जेनेस को पहचाना है। यदि हम नियम से चक्रों मे ध्यान, क्रियायोग इत्यादि करे तो जो 40 से 50 हजार प्रोटींस है ।


वह अपने-अपने शरीरिक स्वास्थ्य के लिये स्वयं ही तैयारी कर सकते है जिससे हम समस्त जीवन सुख और शांति से आराम से रह सकते है। इंद्रियों मे ज्यादा लालच या चंचलता होने पर हम ।


जीवकणो का सुधारस न पी सकते है और न ही अनुभव कर सकते है।हर एक जीवकण मे डियोक्सी अडेनिलिक, गुआनिलिक, रिबोसी, सिटेडिलिक, थैमिडिलिक और फास्फारिक नाम के छः अम्ल और मिठापन होता है! 


साधक खेचरी मुद्रा मेंॐ का ध्यान करते हुवे सहस्रार चक्र मे पहुंच कर स्थिर हो जाता है तब ये मिठा-सा अमृत जैसे सोमरस का आस्वादन अवश्य मिलता है। पहले कारण शरीर मे फिर सूक्ष्मशरीर मे स्थूल शरीर मे प्रवेश करता है।


कुण्डलिनी शक्ति को व्यष्टि मे कुंडलिनी और समिष्ठि मे माया कहते हैकुंडलिनी शक्ती चर(चलनेवाली चीजो मे) और अचर (नही चलनेवाली चीजों मे) प्रपंच मे उपस्थित है।सृष्टि, स्थिति और लय कारक है यह कुंडलिनी शक्ति।


प्रत्येक प्राण कण मे प्राणशक्ति उपस्तिथ रहती है।यह प्राणशक्ति जेनेस के रूप मे होती है, ये जेने क्रोमोजोम मे उपस्थित रहते है।जेनेस वंशानुगत गुणों के वाहक होते है। जेनेस मे डी.एन.ए मालिक्यूल्स रहते है।


ये डी.एन.ए मालिक्यूल्स बहुत ही मुख्य एवम आवश्यक होते है, इन डी.एन.ए मालिक्यूल्स मे छः अम्ल होते।अगर हम इन छः अम्लों को संतुलित कर पाए तो हम वृद्धावस्था और व्याधियों का निवारण कर सकते है।


इस संसार मे प्रत्येक व्यक्ति का जेनेस 99.9 फिसदी मिलता-जुलता है । बाकी 0.01 फिसदी की भिन्नता से ही एक व्यक्ति और दुसरे व्यक्ती के रंग, गुण और प्रकृती मे परख होती है। 


विस्तार इतना है कई बार कलम स्वयं बढ़ती जाती हमे वापस लौटना पड़ता । यह विषय पेढ की शाखाओं की तरह है और आगे से आगे अंनत विस्तृत है न लोटे तो मुख्य विषय ही छूट जाता। 


इडा नाडी गंगा, पिंगला नाडी यमुना और शुषुम्ना नाडी सरस्वती नदी है। ये तीनों सूक्ष्म नाडिया जब कूटस्थ यानि आज्ञाचक्र मे मिल जाती है तब इसी मिलन को गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का त्रिवेणीसंग़म कहते है।


अधिक साधना से प्राणशक्ति कूटस्थ से आगे बढकर केवल शुषुम्ना नाडी द्वारा ही सहस्रारचक्र मे पहुंचती है, इडा और पिंगला नाडियाँ केवल कूटस्थ तक ही शुषुम्ना के साथ रहती है।


स्वास अंदर खींचने और कूटस्थ को इस प्राणशक्ति से भरने को पूरक कहते है, कूटस्थ को इस प्राणशक्ति से भर के थोडा देर रखने को यानि कुंम्भक करने को अंतः कुंभक कहते है बाहर निकालने को रेचक कहते है ।


प्राणशक्ति को बाहर थोडी देर रोकने को बाह्य कुंभक कहते है। पूरक करके प्राणशक्ति को कूटस्थ मे अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार रोककर फिर इस प्राणशक्ति को रेचक करके मूलाधारचक्र द्वारा छोडने से विद्युत अयस्कांत शक्ति का उत्पादन होता है! 

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रविवार, 30 जनवरी 2022

निद्रा को योगसूत्र

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 निद्रा को योगसूत्र में पाँच कठिन दोषों में से एक माना गया है | गहरी नीन्द वालों की स्मृति कमजोर हो जाती है | इसलिए ब्रह्मचर्य आश्रम वालों को श्वाननिद्रा का आदेश दिया जाता था | 


इन्द्रियाँ सो जाए किन्तु मन जागता रहे उसे स्वप्न कहते हैं | मन की सात्विकता के अनुसार स्वप्न की सत्यता होती है | सात्विक संस्कारों वाला मन स्वप्न में सु+अप्न अर्थात समस्याओं का अच्छा समाधान प्राप्त करता है | इसकी विधि लोमश संहिता में वर्णित है |


स्वप्न से निकलते समय जो अन्तिम स्वप्न होता है वही याद रहता है | सात घण्टे बारह मिनट की औसत निद्रा में वास्तविक सुषुप्ति अत्यल्प काल की होती है जिसके बाद स्वप्न का दीर्घकाल होता है, पुनः सुषुप्ति आती है | इस प्रकार इन्द्रियों की जागृति के स्तर का उतार-चढ़ाव होता रहता है, एक सीमा से अधिक ऊपर चढ़ने पर जागृति होती है |


मन भी सो जाय उसे सुषुप्ति कहते हैं, जिसमे सभी प्राणी ब्रह्मलोक में रहते हैं और शारीरिक एवं मानसिक थकान दूर करके नयी ऊर्जा प्राप्त करते हैं | अज्ञानी जीव सुषुप्ति में चित्त की निद्रावृत्ति को देखकर स्वयं को निद्रा में अनुभव करता है, सोचता है कि कुछ नहीं है, न तो मैं हूँ और न ही विश्व है | सुषुप्ति में भी जीव को आत्मज्ञान रहे तो अवस्था को समाधि कहते हैं | चित्त की ये चार अवस्थाएं हैं जिनका वर्णन योगवासिष्ठ में है |


आत्मा से संसर्ग के कारण जड़ चित्त में एक आभासीय मिथ्या चेतना होती है जो अज्ञानी जीव को वास्तविक चेतना प्रतीत होती है | असली चेतना तो आत्मा है, चित्त तो पूर्णतः जड़ है, अभ्यास की गुलाम है, जबतक बाह्य बल न लगे तबतक बदल नहीं सकती |


किन्तु अनन्त जन्मों के अभ्यास के कारण चित्त की जड़ आदतों से पिण्ड छुड़ाना जीव के लिए बड़ा ही कठिन है | विरले ही ऐसे भाग्यवान होते हैं जो पिछले जन्मों के पुण्य के कारण बिना कठिन क्रियायोग के समाधि तक पँहुच सकते हैं, अधिकाँश मनुष्य बिना कठोर क्रियायोग के ऐसा नहीं कर सकते |


पिछले जन्मों के कर्मों का क्रियमाण फल ही वर्तमान जीवन में प्रारब्ध बनता है | उदाहरणार्थ, यदि बलवान धनयोग हो तो वास्तविक जीवन में धन मिलेगा, कमजोर धनयोग है तो स्वप्न में धन मिलेगा और जागने पर गरीबी


आज बस इतना ही....


अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन

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शनिवार, 29 जनवरी 2022

ध्यान की ताकत

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जब 100 लोग एक साथ साधना करते हैं तो उत्पन्न लहरें 5 कि.मी. तक फैलती हैं और नकारात्मकता नष्ट कर सकारात्मकता का निर्माण करती हैं।

आइंस्टाईन नें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कहा था कि एक अणु के विघटन से लाखों अणुओं का विघटन होता है, इसीको हम अणु विस्फोट कहते है। यही सूत्र हमारे ऋषि, मुनियों ने हमें हजारो साल पहले दिया था।

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आज पृथ्वी पर केवल 4% लोग ही ध्यान करते है लेकिन बचे 96% लोगों को इसका पॉजिटिव इफेक्ट होता है।

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अगर हम लगातार 90 दिनों तक ध्यान करे तो इसका सकारात्मक प्रभाव हमारे और हमारे परिवार पर दिखाई देगा।

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अगर पृथ्वी पर 10% लोग ध्यान करने लगें तो पृथ्वी पर विद्यमान लगभग सभी समस्याओं को नष्ट करने की ताकत ध्यान में है।

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उदाहरण के लिए हम बात करें तो महर्षि महेश योगी जी ने सन् 1993 में वैज्ञानिकों के समक्ष यह सिद्ध किया था।।

हुआ यूं कि उन्होने वॉशिंगटन डी सी में 4000 अध्यापको को बुलाकर एक साथ ध्यान (मेडिटेशन) करने को कहा और चमत्कारिक परिणाम यह था कि शहर का क्राईम रिपोर्ट 50% तक कम हुआ पाया गया।

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वैज्ञानिकों को कारण समझ नहीं आया और उन्होनें इसे`महर्षि इफेक्ट" नाम दिया।

 

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शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

तँत्र क्यो महत्वपूर्ण है का शेष भाग

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हम दो चीजों से बहुत भयभीत हैं–काम और मृत्यु।लेकिन ये दोनों ही बुनियादी हैं।वास्तविक अर्थों में सत्यान्वेष इन दोनों में प्रवेश करेगा। वह काम-वृत्ति को समझने के लिए इसमें प्रवृत्त होगा ।


क्योंकि काम-वृत्ति को समझना जीवन को समझना है। और वह यह भी जानना चाहेगा कि मृत्यु क्या है? क्योंकि जब तक तुम यह न जानोगे कि मृत्यु क्या है? तुम शाश्वत जीवन को नहीं जान सकते।


सत्यान्वेष के लिए काम और मृत्यु दोनों बुनियादी हैं लेकिन साधारण मनुष्यता के लिए ये दोनों वर्जनाएं हैं–उनकी चर्चा ही मत करो। और दोनों बुनियादी हैं और दोनों एक -दूसरे से जुड़ी हैं। 


उनका परस्पर संबंध इतना घनिष्ठ है कि काम में प्रवेश करते समय तुम एक प्रकार की मृत्यु में ही प्रविष्ट होते हो; क्योंकि तुम मर रहे हो। अहंकार मिट रहा है समय विलीन हो रहा है तुम मर रहे हो। काम भी एक सूक्ष्म मृत्यु है।


अगर तुम यह जान सको कि काम एक सूक्ष्म मृत्यु है तो मृत्यु एक महान काम-कृत्य, बन जाएगा। कोई सुकरात मृत्यु में प्रवेश करते समय भयभीत नहीं होता। उलटे वह मौत को जानने के लिए अत्यधिक उत्साहित है।


;रोमांचित है ,उतावला है। उसके हृदय में मौत के लिए स्वागत का एक गहरा भाव है। क्योंकि अगर तुम ने काम में घटित होने वाली छोटी मृत्यु को जान लिया है और इसके पीछे-पीछे आने वाले आनंद को जान लिया है।


तो तुम उस महान मृत्यु को जानना चाहोगे–उसके पीछे एक महा-आनंद छिपा है। लेकिन हमारे लिए तो ये दोनों ही वर्जनाएं हैं। तंत्र के लिए ये दोनों ही खोज के मूलभूत आयाम है। इसमें से गुजरना अनिवार्य है।


साथी के प्रगाढ़ आलिंगन में बद्ध तुम यह भूल सकते हो कि दूसरा है। वास्तव में तुम केवल तभी दूसरे को भुला पाते हो। केवल प्रगाढ़ आलिंगन में ही दूसरा नहीं बचता तब तम्हारी ऊर्जा सरलता से प्रवाहित हो सकती है।


नहीं तो दूसरा उसे नीचे की ओर खींचता रहता है।इसलिए योग विधियां विपरीत यौन से पलायन है। उन्हें बचना ही पड़ेगा सावधान रहना पड़ेगा, निरंतर संघर्ष और दमन करना पड़ेगा। 


लेकिन अगर तुम काम-विरोधी हो तो यह विरोध ही तुम्हारे लिए निरंतर तनाव बना रहता है और निरंतर तुम्हें नीचे की ओर खींचता रहता है। तंत्र कहता है ”किसी तनाव की जरूरत नहीं। 


दूसरे के साथ तनाव शून्य विश्राम में रहो। उस शिथिलता के क्षण में दूसरा विलीन हो जाता है और तुम्हारी ऊर्जा ऊपर की ओर बह सकती है। लेकिन वह तभी ऊर्ध्वगमन करती है जब तुम घाटी में हो। 


वह तभी नीचे की ओर बहती है जब तुम शिखर पर होते हो। तंत्र कहता है, जब तुम प्रात: भ्रमण के लिए निकलते हो तुम्हें कोई जल्दी नहीं; क्योंकि तुम्हें कहीं पहुंचना नहीं है। तुम सिर्फ जा रहे हो।


तुम कहीं से भी लौट सकते हो।यह जल्दी का न होना ही घाटी बनाता है नहीं तो शिखर निर्मित हो जाएगा। और जब ऐसा कहा जाता इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हें  अपनी उत्तेजना पर नियंत्रण नहीं रखना है ।


कयोंकि वे परस्पर विरोधी है। तुम उत्तेजना को नियंत्रित नहीं कर सकते। अगर तुम उस पर अकुंश लगाते हो तो  तुम दुगुनी उत्तेजना उत्पन्न कर रहे हो। बस सब ढीला छोड़ दो, इसे खेल की भांति लो।


आरंभ में ऐसा करना कठिन-सा लगेगा, पुरानी आदत है इतनी जल्दी नहीं छूटेगी। बस, शिथिल शिथिल और शिथिल होते जाओ।और ऐसा भी मत सोचो कि तुम कुछ चूक गए हो। तुमने कुछ भी नहीं खोया है।


शुरू-शुरू में कुछ कमी सी महसूस होगी क्योंकि उत्तेजना और शिखर वहां न होंगे। और इससे पहले कि घाटी आए तुम्हें ऐसा प्रतीत होगा जैसे कि कुछ कमी है तुम कुछ खो रहे हो लेकिन यह सिर्फ पुरानी आदत है। 


कुछ समय के भीतर घाटी प्रकट होने लगेगी। और जब घाटी दिखाई देने लगेगी तब तुम अपने शिखरों को भूल जाओगे। लेकिन तुम्हें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। और उसके साथ जबदरस्ती मत करना।


शिथिलता रिलैक्सेशन एक समस्या है- क्योंकि जब हम कहते हैं शिथिल हो जाओ बुद्धि इसका यही अर्थ करती है कि कुछ प्रयत्न करना होगा। ऐसा हमारी भाषा के कारण प्रतीत होता है। भाषा एक समस्या है। 


कुछ चीजों को भाषा हमेशा गलत ढंग से व्यक्त करती है। अगर तुम पूछते हो, ”कैसे शिथिल हों?” कैसे पूछते

ही तुम असली बात से चूक जाते हो। तुम विधि पूछ रहे हो। विधि चेष्टा को जन्म देगी चेष्टा तनाव पैदा करेगी।


इसलिए कुछ भी मत करो। बस, सब ढीला छोड़ दो केवल शिथिल हो जाओ। एक दूसरे के साथ रहो। एक दूसरे की उपस्थिति में प्रसन्नता अनुभव करो। जब तुम काम-कृत्य को समाप्त बारे सोच रहे होते कि कैसे इसे खत्म करे। 


तब क्रीडा झूठी है; तुम वहां नहीं हो ;तुम्हारा मन कहीं भविष्य में है। यह हमेशा तुम से आगे निकल जाना चाहता है। इसे ऐसा मत करने दो। केवल क्रीडा-रत रहो,  इसे घटित होने दो। तब शिथिल होना आसान हो जाएगा।  


जब तुम उत्तेजित होने लगते हो तुम्हारी सांस तेजी से चलने लगती है।शिथिलता के लिए अच्छा है कि तुम धीमी गति से.. गहरी सांस लो या सांस सहजतापूर्वक और सरलतापूर्वक लो।


केवल यह महसूस करने के लिए कि क्या घट रहा अपने मन का उपयोग करो। जो ऊष्मा प्रवाहित हो रही है जो प्रेम प्रवाहित हो रहा है जिस ऊर्जा से मिलन हो रहा है सिर्फ इसके साथ बहना-अचेष्टित।


तब केवल तब घाटी प्रकट होती है। और एक बार घाटी दिख जाए तुम इसके पार हो गए।एक बार उस घाटी को ,शिथिल काम-संवेग को अनुभव कर लेना ,पहचान लेना ही अतिक्रमण है। वह काम नहीं ध्यान बन गया है।


'ओंम मणि पद्ये हुम् फट् ''। अगर इस पूरे मंत्र को आप दोहराएं , तो आप पाएंगे कि इसमें शरीर के शरीर के अलग -अलग हिस्से तक इसका प्रवेश है। ओंम जैसे गले ओर ऊपर ही घूम कर रह जाता है। 


मणि हृदय तक चला जाता है। पद्ये नाभि तक चला जाता है। हुम् काम -सेंटर तक चला जाता है।  अब ''ओंम मणि पद्ये हुम् फट् '' अगर इस हुम् का बहुत प्रयोग किया जाए, तो काम- सेंटर जो है।


वह बाहर की तरफ प्रवाहित होना बंद हो जाता है। इतनी बड़ी चोट लगती है हुम् की। अगर इस हुम् का बार -बार उपयोग किया जाए, तो आदमी की कामुकता विदा हो जाती है। ओर ऊर्जा उर्घ्व बहने लगती । sabhar kundalni shadhana Facebook wall

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