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गुरुवार, 13 फ़रवरी 2025

क्या यह संसार वास्तविकता है या मात्र एक भ्रामक सपना

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 क्या यह संसार वास्तविकता है या मात्र एक भ्रामक सपना?


कल्पना कीजिए, आप एक फिल्म थिएटर में बैठे हैं। स्क्रीन पर चल रही फिल्म आपको हँसा सकती है, रुला सकती है, यहाँ तक कि आपको उसमें डूब जाने को मजबूर कर सकती है। लेकिन अचानक कोई आपको याद दिलाए कि यह सब केवल एक प्रोजेक्शन है—कुछ भी असली नहीं है! क्या यह संभव नहीं कि हमारी पूरी ज़िंदगी भी वैसी ही हो—एक भव्य फिल्म, जिसे हम वास्तविक मानने की भूल कर रहे हैं?


वेदांत कहता है कि यह संसार माया है—एक भ्रम, जो सत्य को छुपाकर हमारे सामने एक आभासी दुनिया प्रस्तुत करता है। शंकराचार्य कहते हैं—


"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।"

(ब्रह्म ही सत्य है, यह संसार मिथ्या है, और जीव ब्रह्म के अलावा कुछ नहीं है।)


इसका तात्पर्य यह है कि संसार में जो कुछ भी हमें दिख रहा है, वह परिवर्तनशील और अस्थायी है, इसलिए वह अंतिम सत्य नहीं हो सकता। जैसे कोई सपना वास्तविक प्रतीत होता है, लेकिन जागने के बाद उसकी कोई सच्चाई नहीं होती, वैसे ही यह भौतिक जगत भी एक अस्थायी आभास है। केवल ब्रह्म ही एकमात्र शाश्वत सत्य है, और प्रत्येक जीव भी मूलतः उसी ब्रह्म का ही अंश है।


लेकिन यह माया इतनी वास्तविक क्यों लगती है? क्या आधुनिक विज्ञान भी अब यह मानने लगा है कि यह ब्रह्मांड केवल एक प्रोजेक्शन हो सकता है?


एक जादूगर जब मंच पर जादू दिखाता है, तो उसकी चालाकी हमें दिखती नहीं—हम केवल उसका प्रभाव देखते हैं। ठीक यही कार्य माया करती है। श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा गया है—


"मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।"

(माया प्रकृति है, और इसे नियंत्रित करने वाला परमेश्वर है।)


हम जब स्वप्न देखते हैं, तो हमें उसमें सबकुछ असली लगता है। लेकिन जैसे ही हम जागते हैं, हमें समझ आता है कि वह मात्र एक सपना था। क्या यह संभव नहीं कि यह जाग्रत अवस्था भी वैसा ही एक सपना हो, जिसे हम मृत्यु के बाद ही समझ पाते हैं?


आधुनिक विज्ञान अब यह मानने लगा है कि यह ब्रह्मांड उतना ठोस नहीं है जितना हमें प्रतीत होता है। Quantum Mechanics के प्रसिद्ध Double-Slit Experiment ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया।


इस प्रयोग में, जब वैज्ञानिकों ने एक कण को देखा, तो वह एक ठोस वस्तु की तरह व्यवहार कर रहा था।


लेकिन जब उसे नहीं देखा गया, तो वह एक तरंग (Wave) की तरह फैल गया।


इसका मतलब यह हुआ कि हमारी वास्तविकता हमारी चेतना पर निर्भर करती है—जब तक कोई देख नहीं रहा, तब तक ब्रह्मांड निश्चित रूप नहीं लेता।


यह ठीक वैसा ही है जैसे वीडियो गेम में! जब आप किसी गेम में आगे बढ़ते हैं, तो रास्ता तभी दिखाई देता है जब कैमरा उसे कवर करता है। अगर कैमरा नहीं घूमा, तो वहाँ कुछ भी नहीं होता!


अब सोचिए—क्या यह संभव नहीं कि हमारी पूरी दुनिया भी किसी "Cosmic Simulation" का हिस्सा हो?


ब्रिटिश वैज्ञानिक David Bohm ने कहा कि यह ब्रह्मांड एक Holographic Universe हो सकता है—एक विशाल होलोग्राम, जिसे कहीं और से प्रक्षिप्त किया जा रहा है।


भगवद गीता (2.16) कहती है—

"नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।"

(असत्य का कोई अस्तित्व नहीं, और सत्य का कभी अभाव नहीं होता।)


कैसे तोड़े इस भ्रम को?


अगर यह दुनिया वास्तव में एक प्रोजेक्शन मात्र है, तो क्या हम इससे बाहर निकल सकते हैं? वेदांत कहता है कि हाँ, लेकिन इसके लिए हमें सही दृष्टि अपनानी होगी। जिस तरह कोई सोया हुआ व्यक्ति सपने में उलझा रहता है, लेकिन जागते ही समझ जाता है कि वह केवल एक भ्रम था, वैसे ही इस जगत से पार पाने के लिए हमें साक्षी भाव में आना होगा। इसके तीन प्रमुख मार्ग हैं—ज्ञान, भक्ति और ध्यान।


 ज्ञान का मार्ग


कल्पना कीजिए कि कोई आदमी अंधेरे में रस्सी को साँप समझकर डर जाता है। लेकिन जैसे ही प्रकाश पड़ता है, उसे एहसास होता है कि वहाँ कोई साँप था ही नहीं—यह केवल उसकी आँखों का धोखा था। यही भूमिका ज्ञान योग की है। जब हमें यह समझ आ जाता है कि यह संसार अस्थायी है और केवल आत्मा ही शाश्वत है, तो माया का प्रभाव स्वतः समाप्त हो जाता है। जैसे ही व्यक्ति "मैं शरीर नहीं, मैं आत्मा हूँ" का अनुभव करता है, माया का जाल टूटने लगता है।


भक्ति योग: प्रेम और समर्पण का मार्ग


क्या आपने कभी कोई सपना देखा है जिसमें आप किसी मुसीबत में थे, लेकिन अचानक किसी ने आकर आपको बचा लिया? फिर जब आप जागे, तो समझ आया कि वह केवल सपना था। इसी तरह, जब हम परमात्मा की शरण में जाते हैं और पूर्ण विश्वास रखते हैं कि वही हमारी वास्तविकता का आधार है, तब माया हमें भ्रमित नहीं कर सकती। भगवद गीता (7.14) में भगवान कृष्ण कहते हैं—

"मेरी माया अत्यंत शक्तिशाली है, लेकिन जो मेरी शरण में आते हैं, वे इसे पार कर जाते हैं।"

पूर्ण समर्पण से हमारी चेतना उस परम वास्तविकता से जुड़ने लगती है, जिससे यह सारा जगत उत्पन्न हुआ है।


 ध्यान और आत्मनिरीक्षण: साक्षी भाव का मार्ग


कभी आपने समुद्र को ध्यान से देखा है? जब सतह पर तूफान होता है, तो लहरें उग्र दिखती हैं, लेकिन समुद्र की गहराई में सब शांत रहता है। हमारा मन भी ऐसा ही है—बाहर से अशांत, लेकिन भीतर पूर्ण शांति। जब हम ध्यान करते हैं और स्वयं को एक साक्षी के रूप में देखते हैं, तब हम धीरे-धीरे इस माया से परे जाने लगते हैं। जब मन पूर्ण रूप से शांत होता है, तो हमें अहसास होता है कि यह संसार केवल एक दृश्य है, और हम उसके देखने वाले मात्र हैं।


 याद रखिए—माया केवल उतनी ही वास्तविक है, जितनी हम उसे मानते हैं। जैसे ही आप सत्य को पहचानेंगे, यह दुनिया भी एक सपने की तरह प्रतीत होगी, और आप वास्तविक जागरण की ओर बढ़ेंगे। साभार Facebook 

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अर्जुन की छाल और दालचीनी ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करने में लाभकारी होती है

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 # अर्जुन की छाल और दालचीनी ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करने में लाभकारी होती है


। नियमित रूप से इसका काढ़ा पीने से खून को पतला किया जा सकता है, जिससे शरीर में ब्लड क्लॉटिंग की समस्या होने का खतरा भी नहीं होता। शरीर में ब्लड का फ्लो बेहतर तरीके से काम करता है, जिससे हृदय की हेल्थ भी अच्छी होती है।

# अर्जुन की छाल शरीर में सूजन कम करती है और जोड़ों के दर्द में भी आराम पहुंचाती है। हाई ब्लड प्रेशर में फायदेमंद- अर्जुन की छाल का उपयोग दिल को स्वस्थ रखने और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए भी किया जाता है। इसमें फाइटोकेमिकल्स खासतौर से टैनिन होता है, जो कार्डियोप्रोटेक्टिव असर दिखाता है।

# अर्जुन की छाल का काढ़ा पोषक तत्वों से भरपूर है. इसके सेवन से कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहते हैं. ये खून को पतला बनाने का काम करता है, जिससे हार्ट अटैक का खतरा दूर रहता है।

अर्जुन की छाल लिवर और किडनी की सेहत के लिए फायदेमंद मानी जाती है। अर्जुन की छाल में फ्लेवोनोइड्स, टैनिन्स, ट्राइटरपेनॉइड सैपोनिन, एंटीऑक्सीडेंट्स और फाइटोस्टेरॉल मौजूद होता है जो लिवर और किडनी को हेल्दी रखता है। अर्जुन की छाल में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट लिवर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाते हैं।

# अर्जुन के पेड़ की छाल को हृदय स्वास्थ्य का समर्थन करने और शरीर के कार्डियोवैस्कुलर फ़ंक्शन को बनाए रखने के लिए जाना जाता है। यह रक्तचाप (ब्लडप्रेशर)को नॉर्मल बनाए रखने में भी मदद करता है और दिल की विफलता के जोखिम को कम करता है। इसके अलावा, आयुर्वेद कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करके हृदय की रुकावट के लिए अर्जुन की छाल की सलाह देता है।

रोजाना दो से तीन ग्राम अर्जुन की सूखी छाल को पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर सुबह खाली पेट पीने से बेहतर परिणाम देखे जा सकते हैं. अर्जुन की छाल में एंटी-डायबिटिक गुण होते हैं, जो रक्त में शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करते हैं

गर्भवती स्तनपान कराने वाली महिला को इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

स्वस्थ रहने के लिए भी आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक नहीं करना है। आप हफ्ते में 1-2 बार करीब एक दो महीने तक अर्जुन की छाल का इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर आप किसी बीमारी को ठीक करने के लिए इसका उपयोग कर रहे हैं तो आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह भी लें सकतें है। sabhar facebook

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तिल का तेल ... पृथ्वी का अमृत,

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 तिल का तेल ... पृथ्वी का अमृत,


यदि इस पृथ्वी पर उपलब्ध सर्वोत्तम खाद्य पदार्थों की बात की जाए तो तिल के तेल का नाम अवश्य आएगा और यही सर्वोत्तम पदार्थ बाजार में उपलब्ध नहीं है. और ना ही आने वाली पीढ़ियों को इसके गुण पता हैं.


🔹 क्योंकि नई पीढ़ी तो टी वी के इश्तिहार देख कर ही सारा सामान ख़रीदती है.

और तिल के तेल का प्रचार कंपनियाँ इसलिए नहीं करती क्योंकि इसके गुण जान लेने के बाद आप उन द्वारा बेचा जाने वाला तरल चिकना पदार्थ जिसे वह तेल कहते हैं लेना बंद कर देंगे.


🔹तिल के तेल में इतनी ताकत होती है कि यह पत्थर को भी चीर देता है. प्रयोग करके देखें.... 


🔹आप पर्वत का पत्थर लिजिए और उसमे कटोरी के जैसा खडडा बना लिजिए, उसमे पानी, दुध, धी या तेजाब संसार में कोई सा भी कैमिकल, ऐसिड डाल दीजिए, पत्थर में वैसा की वैसा ही रहेगा, कही नहीं जायेगा... 


🔹लेकिन... अगर आप ने उस कटोरी नुमा पत्थर में तिल का तेल डाल दीजिए, उस खड्डे में भर दिजिये.. 2 दिन बाद आप देखेंगे कि, तिल का तेल... पत्थर के अन्दर भी प्रवेश करके, पत्थर के नीचे आ जायेगा. यह होती है तेल की ताकत, इस तेल की मालिश करने से हड्डियों को पार करता हुआ, हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है.


🔹 तिल के तेल के अन्दर फास्फोरस होता है जो कि हड्डियों की मजबूती का अहम भूमिका अदा करता है. 


🔹और तिल का तेल ऐसी वस्तु है जो अगर कोई भी भारतीय चाहे तो थोड़ी सी मेहनत के बाद आसानी से प्राप्त कर सकता है. तब उसे किसी भी कंपनी का तेल खरीदने की आवश्यकता ही नही होगी. 


🔹तिल खरीद लीजिए और किसी भी तेल निकालने वाले से उनका तेल निकलवा लीजिए. लेकिन सावधान तिल का तेल सिर्फ कच्ची घाणी  का ही प्रयोग करना चाहिए. 


🔷तैल शब्द की व्युत्पत्ति तिल शब्द से ही हुई है। जो तिल से निकलता वह है तैल। अर्थात तेल का असली अर्थ ही है "तिल का तेल".


🔹तिल के तेल का सबसे बड़ा गुण यह है की यह शरीर के लिए आयुषधि का काम करता है.. चाहे आपको कोई भी रोग हो यह उससे लड़ने की क्षमता शरीर में विकसित करना आरंभ कर देता है. यह गुण इस पृथ्वी के अन्य किसी खाद्य पदार्थ में नहीं पाया जाता.


🔹सौ ग्राम  तिल  में 1000 मिलीग्राम कैल्शियम प्राप्त होता हैं। बादाम की अपेक्षा तिल में छः गुना से भी अधिक कैल्शियम है। काले और लाल तिल में लौह तत्वों की भरपूर मात्रा होती है जो रक्तअल्पता के इलाज़ में कारगर साबित होती है।


🔷तिल में उपस्थित लेसिथिन नामक रसायन कोलेस्ट्रोल के बहाव को रक्त नलिकाओं में बनाए रखने में मददगार होता है।

तिल के तेल में प्राकृतिक रूप में उपस्थित सिस्मोल एक ऐसा एंटी-ऑक्सीडेंट है जो इसे ऊँचे तापमान पर भी बहुत जल्दी खराब नहीं होने देता। आयुर्वेद चरक संहित में इसे पकाने के लिए सबसे अच्छा तेल माना गया है।


🔷तिल में विटामिन  सी छोड़कर वे सभी आवश्यक पौष्टिक पदार्थ होते हैं जो अच्छे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं। तिल विटामिन बी और आवश्यक फैटी एसिड्स से भरपूर है।

इसमें मीथोनाइन और ट्रायप्टोफन नामक दो बहुत महत्त्वपूर्ण एमिनो एसिड्स होते हैं जो चना, मूँगफली, राजमा, चौला और सोयाबीन जैसे अधिकांश शाकाहारी खाद्य पदार्थों में नहीं होते। 


🔹ट्रायोप्टोफन को शांति प्रदान करने वाला तत्व भी कहा जाता है जो गहरी नींद लाने में सक्षम है। यही त्वचा और बालों को भी स्वस्थ रखता है। मीथोनाइन लीवर को दुरुस्त रखता है और कॉलेस्ट्रोल को भी नियंत्रित रखता है।


🔷तिलबीज स्वास्थ्यवर्द्धक वसा का बड़ा स्त्रोत है जो चयापचय को बढ़ाता है।

यह कब्ज भी नहीं होने देता।

तिलबीजों में उपस्थित पौष्टिक तत्व,जैसे-कैल्शियम और आयरन त्वचा को कांतिमय बनाए रखते हैं।


🔷तिल में न्यूनतम सैचुरेटेड फैट होते हैं इसलिए इससे बने खाद्य पदार्थ उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद कर सकता है।

सीधा अर्थ यह है की यदि आप नियमित रूप से स्वयं द्वारा निकलवाए हुए शुद्ध तिल के तेल का सेवन करते हैं तो आप के बीमार होने की संभावना ही ना के बराबर रह जाएगी.


🔹 जब शरीर बीमार ही नही होगा तो उपचार की भी आवश्यकता नही होगी. यही तो आयुर्वेद है.. आयुर्वेद का मूल सीधांत यही है की उचित आहार विहार से ही शरीर को स्वस्थ रखिए ताकि शरीर को आयुषधि की आवश्यकता ही ना पड़े.


🔹एक बात का ध्यान अवश्य रखिएगा की बाजार में कुछ लोग तिल के तेल के नाम पर अन्य कोई तेल बेच रहे हैं.. जिसकी पहचान करना मुश्किल होगा. ऐसे में अपने सामने निकाले हुए तेल का ही भरोसा करें. यह काम थोड़ा सा मुश्किल ज़रूर है किंतु पहली बार की मेहनत के प्रयास स्वरूप यह शुद्ध तेल आपकी पहुँच में हो जाएगा. जब चाहें जाएँ और तेल निकलवा कर ले आएँ.


🔷तिल में मोनो-सैचुरेटेड फैटी एसिड (mono-unsaturated fatty acid) होता है जो शरीर से बैड कोलेस्ट्रोल को कम करके गुड कोलेस्ट्रोल यानि एच.डी.एल. (HDL) को बढ़ाने में मदद करता है। यह हृदय रोग, दिल का दौरा और धमनीकलाकाठिन्य (atherosclerosis) के संभावना को कम करता है।

कैंसर से सुरक्षा प्रदान करता है-

तिल में सेसमीन (sesamin) नाम का एन्टीऑक्सिडेंट (antioxidant) होता है जो कैंसर के कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने के साथ-साथ है और उसके जीवित रहने वाले रसायन के उत्पादन को भी रोकने में मदद करता है।


🔹 यह फेफड़ों का कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, स्तन कैंसर और अग्नाशय के कैंसर के प्रभाव को कम करने में बहुत मदद करता है।

तनाव को कम करता है-


🔹इसमें नियासिन (niacin) नाम का विटामिन होता है जो तनाव और अवसाद को कम करने में मदद करता है।

हृदय के मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद करता है-


🔹तिल में ज़रूरी मिनरल जैसे कैल्सियम, आयरन, मैग्नेशियम, जिन्क, और सेलेनियम होता है जो हृदय के मांसपेशियों को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है और हृदय को नियमित अंतराल में धड़कने में मदद करता है। 


🔹शिशु के हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है-

तिल में डायटरी प्रोटीन और एमिनो एसिड होता है जो बच्चों के हड्डियों के विकसित होने में और मजबूती प्रदान करने में मदद करता है। 


🔹उदाहरणस्वरूप 100ग्राम तिल में लगभग 18 ग्राम प्रोटीन होता है, जो बच्चों के विकास के लिए बहुत ज़रूरी होता है।

गर्भवती महिला और भ्रूण (foetus) को स्वस्थ रखने में मदद करता है-


🔹तिल में फोलिक एसिड होता है जो गर्भवती महिला और भ्रूण के विकास और स्वस्थ रखने में मदद करता है।


 🔹शिशुओं के लिए तेल मालिश के रूप में काम करता है-


🔹अध्ययन के अनुसार तिल के तेल से शिशुओं को मालिश करने पर उनकी मांसपेशियाँ सख्त होती है साथ ही उनका अच्छा विकास होता है।


🔹 आयुर्वेद के अनुसार इस तेल से मालिश करने पर शिशु आराम से सोते हैं।

अस्थि-सुषिरता (osteoporosis) से लड़ने में मदद करता है-


🔹तिल में जिन्क और कैल्सियम होता है जो अस्थि-सुषिरता से संभावना को कम करने में मदद करता है।


🔹मधुमेह के दवाईयों को प्रभावकारी बनाता है-


🔹डिपार्टमेंट ऑफ बायोथेक्सनॉलॉजी विनायक मिशन यूनवर्सिटी, तमिलनाडु (Department of Biothechnology at the Vinayaka Missions University, Tamil Nadu) के अध्ययन के अनुसार यह उच्च रक्तचाप को कम करने के साथ-साथ इसका एन्टी ग्लिसेमिक प्रभाव रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को 36% कम करने में मदद करता है जब यह मधुमेह विरोधी दवा ग्लिबेक्लेमाइड (glibenclamide) से मिलकर काम करता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह (type 2 diabetic) रोगी के लिए यह मददगार साबित होता है।


🔹दूध के तुलना में तिल में तीन गुना कैल्शियम रहता है। इसमें कैल्शियम, विटामिन बी और ई, आयरन और ज़िंक, प्रोटीन की भरपूर मात्रा रहती है और कोलेस्टरोल बिल्कुल नहीं रहता है। 


🔹तिल का तेल ऐसा तेल है, जो सालों तक खराब नहीं होता है, यहाँ तक कि गर्मी के दिनों में भी वैसा की वैसा ही रहता है. 

तिल का तेल कोई साधारण तेल नहीं है। इसकी मालिश से शरीर काफी आराम मिलता है। यहां तक कि लकवा जैसे रोगों तक को ठीक करने की क्षमता रखता है। 


🔹इससे अगर  महिलाएं अपने स्तन के नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें, तो स्तन पुष्ट होते हैं। सर्दी के मौसम में इस तेल से शरीर की मालिश करें, तो  ठंड का एहसास नहीं होता।


🔹 इससे चेहरे की मालिश भी कर सकते हैं। चेहरे की सुंदरता एवं कोमलता बनाये रखेगा। यह सूखी त्वचा के लिए उपयोगी है।

 

🔹तिल का तेल- तिल विटामिन ए व ई से भरपूर होता है। इस कारण इसका तेल भी इतना ही महत्व रखता है। इसे हल्का गरम कर त्वचा पर मालिश करने से निखार आता है। अगर बालों में लगाते हैं, तो बालों में निखार आता है, लंबे होते हैं।


🔹जोड़ों का दर्द हो, तो तिल के तेल में थोड़ी सी सोंठ पावडर, एक चुटकी हींग पावडर डाल कर गर्म कर मालिश करें। तिल का तेल खाने में भी उतना ही पौष्टिक है विशेषकर पुरुषों के लिए।इससे मर्दानगी की ताकत मिलती है!


🔹हमारे धर्म में भी तिल के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है, जन्म, मरण, परण, यज्ञ, जप, तप, पित्र, पूजन आदि में तिल और तिल का तेल के बिना संभव नहीं है अतः इस पृथ्वी के अमृत को अपनावे और जीवन निरोग बनावे।

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रविवार, 9 फ़रवरी 2025

गिलोय का औषधीय गुण

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अरंडी का व्यवसायिक महत्व  अरंडी का महत्व

गिलोय


(Tinospora Cordifolia) एक आयुर्वेदिक औषधि है जिसे संस्कृत में "अमृता" और "गुडुची" कहा जाता है। यह बेलनुमा पौधा है, जिसकी पत्तियां दिल के आकार की होती हैं और इसे औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है। गिलोय का उपयोग आयुर्वेद में प्राचीन काल से विभिन्न रोगों के उपचार में किया जा रहा है।


औषधीय गुण


1. इम्यूनिटी बढ़ाना: गिलोय शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है।


2. डायबिटीज में फायदेमंद: यह ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करता है।


3. ज्वर नाशक: डेंगू, मलेरिया और वायरल बुखार में इसका उपयोग बुखार कम करने के लिए किया जाता है।


4. पाचन सुधारना: यह अपच, गैस और पेट की अन्य समस्याओं को ठीक करता है।


5. डिटॉक्सिफायर: गिलोय रक्त को शुद्ध करता है और त्वचा संबंधी रोगों में लाभकारी है।


6. एंटीऑक्सिडेंट गुण: यह शरीर में मुक्त कणों को कम करता है और एंटी-एजिंग गुण प्रदान करता है।


7. संधि रोगों में उपयोगी: गिलोय जोड़ों के दर्द और सूजन में राहत देता है।


8. तनाव और चिंता: यह मानसिक स्वास्थ्य को सुधारता है और तनाव कम करता है।


उपयोग की विधि


1. काढ़ा:

गिलोय की ताजी या सूखी डंडी लें।

इसे पानी में उबालें और छानकर सेवन करें।

यह बुखार और इम्यूनिटी बढ़ाने में सहायक है।


2. गिलोय पाउडर:


1-2 ग्राम गिलोय पाउडर पानी या दूध के साथ लें।

डायबिटीज और पाचन के लिए यह लाभकारी है।


3. गिलोय रस:


ताजी गिलोय की डंडियों से रस निकालकर सेवन करें।

यह त्वचा और बालों के लिए फायदेमंद है।


4. गिलोय की गोलियां:


आयुर्वेदिक दुकानों पर उपलब्ध गिलोय टैबलेट्स को चिकित्सक की सलाह अनुसार लें।


सावधानियां


गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली महिलाएं इसका उपयोग डॉक्टर की सलाह से करें।


अत्यधिक मात्रा में इसका सेवन न करें, यह हानिकारक हो सकता है।


गिलोय का नियमित और सही तरीके से उपयोग आपके स्वास्थ्य को बेहतर बना सकता है।


नोट: डाक्टर से सलाह लें करके ही इसका प्रयोग करें। यह पोस्ट के शिक्षा के लिए है।

साभार आदिवासी राकेश बामनवास

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शनिवार, 8 फ़रवरी 2025

आपका मस्तिष्क एक रहस्यमयी यात्रा पर होता है

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 क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप गहरी नींद में होते हैं, तब भी आपका मस्तिष्क एक रहस्यमयी यात्रा पर होता है? एक ऐसी यात्रा, जो जागृत संसार से परे, आपके अवचेतन मन (Subconscious Mind) के गहरे गलियारों में प्रवेश करती है। इस रहस्य की चाबी छुपी है मेलाटोनिन में—वह दिव्य रसायन, जो न केवल शरीर को विश्राम देता है, बल्कि आत्मा को भी ज्ञान, अंतर्ज्ञान और आध्यात्मिक जागरण के द्वार तक ले जाता है।


विज्ञान इसे नींद का हार्मोन कहता है, परंतु शास्त्रों में इसे ‘आज्ञाचक्र का अमृत’ कहा गया है। यह वह पुल है, जो बाहरी संसार से हमें भीतर की रहस्यमयी दुनिया तक पहुँचाता है—वह जगह, जहाँ आपके विचार, भावनाएँ और छुपे हुए संस्कार संचित होते हैं।


आधुनिक न्यूरोसाइंस की दृष्टि से देखें, तो मेलाटोनिन मस्तिष्क की जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) को नियंत्रित करता है और शरीर को गहरी नींद के लिए तैयार करता है। लेकिन इसके प्रभाव यहीं खत्म नहीं होते! यह गहरी निद्रा के दौरान हमारे अवचेतन मन को सक्रिय करता है, जहाँ स्मृतियाँ संचित होती हैं, विचारों की सफाई होती है और मानसिक ऊर्जाओं का पुनर्निर्माण होता है।


जब मेलाटोनिन पर्याप्त मात्रा में स्रावित होता है, तब हमारा मस्तिष्क REM (Rapid Eye Movement) स्लीप में प्रवेश करता है—यानी वह अवस्था, जहाँ सपने जन्म लेते हैं। यह सपने केवल कल्पनाएँ नहीं, बल्कि हमारे अवचेतन मन की गहराइयों से आने वाले संदेश होते हैं, जिन्हें सही तरीके से समझा जाए, तो वे हमारे भविष्य के संकेत भी दे सकते हैं!


अब जरा योग शास्त्रों की ओर बढ़ते हैं। हिंदू दर्शन में पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) को ‘आज्ञाचक्र’ कहा गया है, जो तीसरी आँख का प्रतीक है। यही वह केंद्र है, जहाँ आत्मा और ब्रह्मांड के बीच का संचार स्थापित होता है।वेदांत और योग के अनुसार, यह अंग हमारे भीतर की दिव्य चेतना से जुड़ा हुआ है और यही वह स्थान है जहां हमारी आत्मा और ब्रह्मा का मिलन होता है। इस संदर्भ में, मेलाटोनिन को भी एक दिव्य स्राव के रूप में देखा जाता है, जो हमारे भीतर शांति और जागरूकता का संचार करता है।


जब ध्यान और साधना के द्वारा आज्ञाचक्र को सक्रिय किया जाता है, तो मेलाटोनिन का प्रवाह बढ़ता है, और साधक को गहरी शांति, अंतर्ज्ञान और दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त होती हैं। इसे ही आध्यात्मिक जागरण (Spiritual Awakening) कहा जाता है।


भगवद गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—

"ध्यानयोगेन संयुक्तो मद्भावं आगता:।"

(जो ध्यान में लीन होता है, वह मेरी चेतना से एकाकार हो जाता है।)


यानी जब साधक अपने अवचेतन को नियंत्रित कर लेता है, तब वह संसार की सीमाओं से परे आत्मज्ञान के द्वार तक पहुँच सकता है।

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सभी गैर-भौतिक आयाम अस्तित्व के स्तर हैं

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 "सभी गैर-भौतिक आयाम अस्तित्व के स्तर हैं जो ज्ञात भौतिक ब्रह्मांड की तुलना में उच्च आवृत्ति पर कंपन करते हैं।


यह उन्हें सामान्य पाँच इंद्रियों और आज उपलब्ध सभी वैज्ञानिक साधनों के लिए अदृश्य और अगोचर बनाता है।


जिस तरह विभिन्न प्रकार की ऊर्जाएँ - प्रकाश, गुरुत्वाकर्षण, एक्स-रे, ऊष्मा, माइक्रोवेव, आदि।


- सामान्य भौतिक ब्रह्मांड में एक ही समय में एक ही स्थान पर एक दूसरे के साथ किसी भी बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप किए बिना रहती हैं, उसी तरह ये विभिन्न आयामी स्तर एक ही समय में एक ही स्थान पर सह-अस्तित्व में रहते हैं।


प्रत्येक पूरी तरह से अलग प्रकार का है, जिसके अपने विशिष्ट गुण और आवृत्तियों का स्पेक्ट्रम है।


लेकिन गैर-भौतिक आयामों के रूप और अनुभव को बताने वाला आसानी से समझने योग्य विवरण देना बहुत मुश्किल है।


उदाहरण के लिए, सूक्ष्म विमान अपेक्षाकृत पूर्वानुमानित और स्थिर भौतिक आयाम की तुलना में एक अविश्वसनीय रूप से जटिल गैर-भौतिक आयामी स्तर का हिस्सा हैं।


सूक्ष्म विमानों की कई जटिलताएँ लगभग अज्ञात हैं।


 इस आयाम को नियंत्रित करने वाले गैर-भौतिक नियम {इन्हें सूक्ष्म भौतिकी कहते हैं} अत्यंत तरल और परिवर्तनशील हैं।


इसके अलावा, प्रोजेक्टर का दिमाग सूक्ष्म आयाम की उनकी धारणा को बहुत प्रभावित कर सकता है।


यह किसी भी सूक्ष्म शोधकर्ता या खोजकर्ता के लिए काम करने के लिए बहुत कम स्थिर कारक छोड़ता है।


सूक्ष्म आयाम से निपटने के दौरान आप केवल इशारा करके नहीं कह सकते, जैसा कि आप भौतिक ब्रह्मांड में कर सकते हैं-


"यह हमारा ग्रह है, पृथ्वी; यह इसका वायुमंडल है और वह बाहरी अंतरिक्ष है, आदि"।


आप इशारा करके यह भी नहीं कह सकते, "यह सूक्ष्म आयाम है!"


यद्यपि सूक्ष्म आयाम पूरे भौतिक ब्रह्मांड में व्याप्त है, लेकिन यह अधिकांश भाग के लिए गैर-स्थानिक है।


 सूक्ष्म जगत के द्वार हर जगह और कहीं भी मौजूद हैं, मानव मन के अंदर और बाहर दोनों जगह।" 


----रॉबर्ट ब्रूस

एस्ट्रल डायनेमिक्स: आउट-ऑफ-बॉडी एक्सपीरियंस की पूरी किताब


---अनुवादित साभार 


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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

चीनी का सेवन हमारे मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है

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 चीनी का सेवन हमारे मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है


और हमारे शरीर को ऊर्जा मिलती है। मीठा खाना लगभग हर किसी को पसंद होता है, यह जानते हुए भी कि आजकल के दौर में हम शारीरिक तौर पर ज्यादा मेहनत नहीं करते, फिर भी मीठा तो बहुत से लोगों की कमजोरी है।

         खाने के बाद मीठा तो जरूर चाहिए, मौसम अच्छा हो तो मीठा चाहिए, गर्मी ज्यादा हो तो मिल्कशेक चाहिए, ठंड हो तो जलेबी या गर्मागर्म हलवा चाहिए। बाकी बिना किसी अवसर के भी कभी-कभी मीठा खाया जाए तो कोई क्या परेशानी है।

        लेकिन क्या कभी हमने यह सोचा है अगर खाने से मीठे की मात्रा हटा ली जाए, तो शरीर पर किस तरह के प्रभाव देखने को मिलते हैं? नहीं सोचा, तो चलिए हम ही बता देते हैं कि अगर एक महीने तक चीनी को अलविदा कह देते हैं तो इससे हमारे शारीरिक या मानसिक रूप से क्या अंतर देखने को मिलता है।

        १. हमारे दिल की सेहत बहुत अच्छी रहती है, हमारा दिल शरीर का सबसे संवेदनशील भाग होता है। इस वजह से उसे कहीं ज्यादा हमारे केयर की जरूरत होती है। अगर हम अपनी दिनचर्या से चीनी को हटा देंगे तो यकीन मानिए इससे हमारे दिल को बहुत आराम मिलेगा और साथ ही वह और जवान रहेगा।

        २. हमारी त्वचा पर भी इसका स्पष्ट असर नजर आएगा। वह स्वस्थ और चमकदार तो बनेगी ही साथ ही साथ अगर हमारे चेहरे पर गड्ढे हैं तो वह भी गायब हो जाएंगे। हम जितनी चाहे क्रीम, लोशन या फिर अन्य दवाइयां उपयोग कर लें, पर सबसे बेहतरीन असर हमें चीनी छोड़ने के बाद ही मिलेगा।

        ३. मीठा ज्यादा खा लेने की वजह से नींद भी सही से नहीं आती। जिस रात मीठा ज्यादा खा लेते हैं, उस रात नींद आने में परेशानी होती है, इसलिए हमें मीठा कम से कम ही खाना चाहिए।

        ४. जो लोग अपने भोजन में मीठे की मात्रा कम रखते हैं उनके चेहरे पर उम्र की परछाई बहुत देर से पड़ती है। ज्यादा चीनी खाने से चेहरे की त्वचा में सूजन आने लगती है, हमारा चेहरा झुर्रियों से मुक्त तभी रहेगा जब हम मीठा खाने की आदत को कम कर देंगे।

        ५. मीठा छोड़ने से वजन भी कम होता है अतः जो अपना वजन कम करना चाहते हैं उन्हें आज से ही मीठे खाद्य पदार्थों से दूरी रखनी शुरू कर देनी चाहिए।

        ६. मीठा छोड़ने के बाद हमारी याद्दाश्त भी बढ़ती है तथा बोलचाल का तरीका प्रभावी होता है। हम सामने वाले की बात बड़ी आसानी और स्पष्ट तरीके से समझ सकते हैं। 

        ७. मीठे की मात्रा कम रखने से हम मधुमेह से भी बचते हैं, अगर कभी मीठा खाने का मन करे तो मेवे खाकर इसकी पूर्ति कर सकते हैं।

        ८. मीठा छोड़ने से हमारी आंतें अच्छे तरीके से काम करने लगती हैं, इससे न सिर्फ खाना आसानी से पचता है बल्कि वह हमारे पेट और आंतों को नुकसान भी नहीं पहुंचाता है। 

        ९. मीठा छोड़ने से हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, बस हमें एक बार अपने मस्तिष्क को इस बात के लिए राजी करना है कि अब से हम मीठा नहीं खाएंगे। हम पायेंगे कि किस तरह हम संक्रमण और अन्य बीमारियों से खुद को बचा लेते हैं।

        १०. मीठा छोड़ने के बाद न सिर्फ हमें मानसिक रूप से सुकून मिलेगा बल्कि हमारे दांत और मसूड़े भी ज्यादा स्वस्थ रहेंगे। एक बात का ध्यान हमें अवश्य रखना चाहिए कि मीठा खाने के तुरंत बाद कभी भी ब्रश न करें क्योंकि इस समय हमारे मसूड़े बहुत ज्यादा सॉफ्ट होते हैं। उन्हें नुकसान पहुंच सकता है। 

        ११. अगर हमारे जोड़ों के दर्द की शिकायत रहती है तो एक बार चीनी छोड़कर अवश्य देखना चाहिए, हम पायेंगे कि दर्द में हमें  बहुत फर्क नजर आयेगा। साभार फेसबुक वॉल शिव कुमार

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रहस्यमय ‘डूबे हुए संसार’ (Sunken World) की खोज

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 वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की आंतरिक संरचना की नई मैपिंग तकनीक का उपयोग करके प्रशांत महासागर के नीचे एक रहस्यमय ‘डूबे हुए संसार’ (Sunken World) की खोज


की है। यह खोज पृथ्वी के मेंटल (Mantle) में लगभग 2,900 किलोमीटर गहराई में की गई है, जहां भूकंपीय तरंगों (Seismic Waves) की गति अचानक धीमी हो जाती है। यह क्षेत्र लो-वेलोसिटी ज़ोन (Low-Velocity Zone) कहलाता है, जो वैज्ञानिकों को संकेत देता है कि यहाँ कोई असामान्य और अति-प्राचीन परत मौजूद हो सकती है।


‼️क्या है यह डूबा हुआ संसार?


यह संरचना पृथ्वी के शुरुआती इतिहास की एक बची हुई परत हो सकती है, जो संभवतः  4 अरब साल पुरानी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह किसी प्राचीन महाद्वीप या थिया (Theia) नामक एक प्राचीन ग्रह के अवशेष हो सकते हैं, जो अरबों साल पहले पृथ्वी से टकराया था और जिससे चंद्रमा का निर्माण हुआ था।


‼️कैसे हुआ यह खुलासा?


शोधकर्ताओं ने एक अत्याधुनिक सेस्मिक इमेजिंग तकनीक का उपयोग किया, जिससे पता चला कि यह परत आसपास के मेंटल की तुलना में घनी और गर्म है। इसका मतलब यह हो सकता है कि यह पृथ्वी के निर्माण के शुरुआती दिनों में गहरे मेंटल में समा गया कोई प्राचीन टुकड़ा है, जो अरबों सालों तक हमारी नजरों से छिपा रहा।

साभार फेसबुक ब्रह्मांड 

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मंगलवार, 4 फ़रवरी 2025

हृदय का राजा अर्जुन छाल

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 🇮🇳 हृदय  का राजा अर्जुन छाल 



अर्जुन की छाल को आयुर्वेद में एक शक्तिशाली औषधि माना गया है, खासकर हृदय (दिल) से जुड़ी समस्याओं के लिए। इसे "हार्ट का राजा" कहा जाता है क्योंकि यह हृदय को मजबूत बनाने और कई हृदय रोगों को ठीक करने में मदद करता है।


अर्जुन की छाल के मुख्य फायदे:


1. हृदय को मजबूत बनाती है – अर्जुन छाल रक्त संचार को सही रखती है और हृदय की धमनियों को स्वस्थ बनाए रखती है।


2. ब्लड प्रेशर कंट्रोल करती है – हाई ब्लड प्रेशर और लो ब्लड प्रेशर दोनों को संतुलित करने में मददगार है।


3. कोलेस्ट्रॉल कम करती है – खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को बढ़ाने में सहायक है।


4. दिल की धड़कन को नियंत्रित करती है – अनियमित धड़कनों (Arrhythmia) को सही करने में मदद करती है।


5. ब्लड शुगर को नियंत्रित करती है – मधुमेह के मरीजों के लिए भी यह फायदेमंद है।


6. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर – शरीर में फ्री रेडिकल्स को कम करके एंटी-एजिंग प्रभाव डालती है।


7. लिवर और किडनी के लिए लाभकारी – यह लिवर को डिटॉक्स करने और किडनी को स्वस्थ रखने में मदद करती है।


8. तनाव और चिंता को कम करती है – यह एक प्राकृतिक एडेप्टोजेन है, जो मानसिक शांति देती है।


9. पाचन में सुधार – अपच, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याओं में फायदेमंद होती है।


10. घाव भरने में मदद करती है – त्वचा के घावों को जल्दी भरने में उपयोगी है।


अर्जुन की छाल का उपयोग कैसे करें?


1. अर्जुन चाय – 1 चम्मच अर्जुन की छाल पाउडर को 1 कप पानी में उबालकर दिन में 1-2 बार पिएं।


2. अर्जुन दूध – आधा चम्मच अर्जुन छाल पाउडर को 1 गिलास दूध में उबालकर सेवन करें।


3. कैप्सूल या टैबलेट – आयुर्वेदिक स्टोर्स में उपलब्ध अर्जुन कैप्सूल का सेवन कर सकते हैं।


सावधानियाँ:


गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।


किसी भी दवा के साथ लेने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।


अधिक मात्रा में सेवन करने से पेट दर्द या एसिडिटी हो सकती है।


अगर आप इसे अपने डेली रूटीन में शामिल करना चाहते हैं, तो डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

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रविवार, 2 फ़रवरी 2025

भोग का अर्थ है – सुख-दुःख का अनुभ

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 भोगायतन ----+


भोग का अर्थ है – सुख-दुःख का अनुभव। यह अनुभव शरीरी आत्मा का होता है (वस्तुतः सुख-दुःख का प्रत्यक्ष सम्बन्ध बुद्धि से ही है; निर्गुण आत्मा में सुख-दुःख का आरोपमात्र किया जाता है)। भोग की शरीर-सापेक्षता के कारण शरीर (स्थूल-सूक्ष्म) को भोग का आयतन (आश्रय) कहा जाता है। सांख्यसूत्र (5/114; 6/60) में इस दृष्टि से भोगायतन शब्द का प्रयोग भी किया गया है। भोगायतन को भोगाधिष्ठान भी कहा जाता है (व्यासभाष्य 2/5)।

भौतिकसर्ग भौतिक = पंचभूतविकार; पर ‘भौतिक सर्ग’ के प्रसंग में भौतिक का अर्थ है – भूतनिर्मित शरीर (शरीर चूंकि शरीरी क्षेत्रज्ञ के बिना नहीं रहता, अतः ‘भौतिक सर्ग’ वस्तुतः देही आत्मा के भेदों को लक्ष्य करता है)। सांख्य के अनुसार देहधारी जीवों की चौदह योनियाँ ही भौतिक सर्ग हैं (सांख्यका. 53) – देवयोनि आठ प्रकार की, तिर्यक्-योनि पाँच प्रकार की तथा मनुष्ययोनि एक प्रकार की है। ये जीव सत्त्व-रजः-तमः के प्राधान्य के अनुसार ऊर्ध्वलोक-मध्यलोक-अधोलोक के निवासी होते हैं – यह ज्ञातव्य है। पाँच भूतों के परस्पर संमिश्रण से जो स्थूल वस्तु बनती है, वह भी भौतिक कहलाती है (घट आदि पदार्थ भौतिक अर्थात् पाँच भौतिक हैं) भौतिक पदार्थों की सर्ग ( सृष्टि) – इस अर्थ में भी ‘भौतिकसर्ग’ शब्द प्रयुक्त होता है।

भ्रान्तिदर्शन नौ अन्तरायों में यह एक है (द्र. योगसू. 1/30)। स्वरूपतः यह विपर्यय ज्ञान ही है। संशय-ज्ञान से विपर्ययज्ञान में अन्तर है। संशय में दोनों ही कोटियों का ज्ञान होता है, यथा – यह स्थाणु (खूँटा) है या पुरुष है। विपर्यय में एक पदार्थ अन्य पदार्थ के रूप में ज्ञात होता है। योग का अन्तराय-रूप जो भ्रान्तिदर्शन है, वह योगसाधन-सम्बन्धी या तत्वस्वरूप-सम्बन्धी होता है। सत्त्वगुणजात आनन्द निर्गुण आत्मा में है या आत्मा आनन्दरूप है – यह एक भ्रान्तिदर्शन है। इसी प्रकार अनिद्रारोग को निद्राजय के रूप में समझना भी भ्रान्तिदर्शन है।

मठिका शैव दर्शन की भिन्न भिन्न शाखाओं को मठिका कहते हैं। वर्तमान युग में शैव दर्शन को तीन गुरुओं ने अभिनवतया चालू कर दिया। वे तीन गुरु भगवान श्रीकंठनाथ की प्रेरणा से ऊर्ध्व लोकों से इस भूलोक पर अवतार बनकर प्रकट हो गए। उनमें से अमर्दक नामक सिद्ध ने द्वैतदृष्टि से शैवदर्शन का उपदेश किया। उसकी मठिका को आमर्द मठिका या आमर्द संतति कहा गया है। दूसरी मठिका का प्रवर्तन श्रीनाथ ने किया। वह मठिका भेदाभेद प्रधान शैव मठिका थी। तीसरे गुरु त्र्यंबक ने अभेद दृष्टि प्रधान दो मठिकाओं को चलाया। उनमें से एक मठिका काश्मीर शैव दर्शन की त्रिक आगम प्रधान अद्वैत मठिका है, जिसे त्र्यंबक मठिका कहा गया है। इसे त्र्यंबक ने अपने पुत्र के द्वारा चलाया। चौथी मठिका को उसने अपनी कन्या के द्वारा चलाया। उसका अर्धत्र्यंबक मठिका नाम पड़ा। इन्हें शैव शास्त्र में साढ़े तीन मठिकाएँ कहा जाता है।

मणिपूर चक्र स्वाधिष्ठान चक्र के ऊपर नाभि के मूल भाग में मेघ के समान श्याम वर्ण दस दलों से शोभित मणिपूर चक्र की स्थिति मानी जाती है। इन दलों में अर्धचन्द्र और बिन्दु से भूषित ड से लेकर फ पर्यन्त दस वर्ण सुशोभित हैं। इसके बीच में प्रातःकाल के अरुण वर्ण से सूर्य के समान कान्ति वाले त्रिकोणात्मक वैश्वानर मण्डल में रँ बीज का ध्यान किया जाता है। यह मण्डल तीन स्वस्तिक द्वारों से अलंकृत हैं। रँ बीज का वाहन मेष है, वर्ण रक्त है और इसका शरीर चतुर्भुज है। इस वह्नि बीज के देवता रुद्र है। इनका वर्ण सिन्दूर के समान है और इसकी अधिष्ठात्री योगिनी का नाम लकिनी है। (श्रीतत्वचिन्तामणि, षट्चक्रनिरूपण 6 प्र.)। साभार फेस बुक

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गुरुवार, 30 जनवरी 2025

काम वासना और जीवन:आचार्य श्री रजनीश ओशो, तंत्र

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 ताओ कहता है अगर व्यक्ति संभोग में उतावला न हो, केवल गहरे विश्राम में ही शिथिल हो तो वह एक हजार वर्ष जी सकता है। अगर स्त्री और पुरुष एक दूसरे के साथ गहरे विश्राम में हो एक दूसरे में डूबे हों कोई जल्दी न हो, कोई तनाव न हो, तो बहुत कुछ घट सकता है रासायनिक चीजें घट सकती हैं। क्योंकि उस समय दोनों के जीवन-रसों का मिलन होता है दोनों की शरीर-विद्युत, दोनों की जीवन-ऊर्जा का मिलन होता है। और केवल इस मिलन से–क्योंकि ये दोनों एक दूसरे से विपरीत हैं–एक पॉजिटिव है एक नेगेटिव है। ये दो विपरीत धुरव हैं–सिर्फ गहराई में मिलन से वे एक दूसरे को और जीवतंता प्रदान करते हैं।


वे बिना वृद्धावस्था को प्राप्त हुए लंबे समय तक जी सकते हैं। लेकिन यह तभी जाना जा सकता है जब तुम संघर्ष नहीं करते। यह बात विरोधाभासी प्रतीत होती है। जो कामवासना से लड़ रहे हैं उनका वीर्य स्खलन जल्दी हो जाएगा, क्योंकि तनाव ग्रस्त चित्त तनाव से मुक्त होने की जल्दी में होता है।


नई खोजों ने कई आश्चर्य चकित करने वाले तथ्यों को उद्धाटित किया है। मास्टर्स और जान्सन्स ने पहली बार इस पर वैज्ञानिक ढंग से काम किया है कि गहन मैथुन में क्या-क्या घटित होता है। उन्हें यह पता चला कि पचहत्तर प्रतिशत पुरुषों का समय से पहले ही वीर्य-स्खलन हो जाता है। पचहत्तर प्रतिशत पुरुषों का प्रगाढ़ मिलन से पहले ही स्खलन हो जाता है और काम-कृत्य समाप्त हो जाता है। और नब्बे प्रतिशत स्त्रियां काम के आनंद-शिखर ऑरगॉज्म तक पहुंचती ही नहीं, वे कभी शिखर तक गहन तृसिदायक शिखर तक नहीं पहुंचतीं नब्बे प्रतिशत स्त्रियां।


इसी कारण स्त्रियां इतनी चिड़चिड़ी और क्रोधी होती हैं और वे ऐसी ही रहेंगी। कोई ध्यान आसानी से उनकी सहायता नहीं कर सकता, कोइ दर्शन, कोई धर्म, कोई नैतिकता उसे पुरुष–जिसके साथ वह रह रही है–के साथ चैन से जीने में सहायक नहीं हो सकता। और तब उनकी खीझ उनका तनाव…क्योंकि आधुनिक विज्ञान तथा प्राचीन तंत्र दोनों ही कहते हैं कि जब तक स्त्री को गहन काम-तृप्ति नहीं मिलेगी, वह परिवार के लिए एक समस्या ही बनी रहेगी। वह हमेशा झगड़ने के लिए तैयार होगी।


इसलिए अगर तुम्हारी पत्नी हमेशा झगड़े के भाव में रहती है तो सारी बातों पर फिर से विचार करो। केवल पत्नी ही नहीं, तुम भी इसका कारण हो सकते हो। और क्योंकि स्त्रियां काम संवेग, ऑरगॉज्म, तक नहीं पहुंचती, वे काम-विरोधी हो जाती हैं। वे संभोग के लिए आसानी से तैयार नहीं होतीं। उनकी खुशामद करनी पड़ती है; वे काम- भोग के लिए तैयार ही नहीं होतीं। वे इसके लिए तैयार भी क्यों हो उन्हें कभी इससे कोई सुख भी तो प्राप्त नहीं होता। उलटे, उन्हें तो ऐसा लगता है कि पुरुष उनका उपयोग करता है उन्हें इस्तेमाल किया गया है। उन्हें ऐसा लगता है कि वस्तु की भांति उपयोग कर उन्हें फेंक दिया गया है।


पुरुष संतुष्ट है क्योंकि उसने वीर्य बाहर फेंक दिया है। और तब वह करवट लेता है और सो जाता है और पत्नी रोती है। उसका उपयोग किया गया है और यह प्रतीति उसे किसी भी रूप में तृप्ति नहीं देती। इससे उसका पति या प्रेमी तो छुटकारा पाकर हल्का हो गया लेकिन उसके लिए यह कोई संतोषप्रद अनुभव न था।


नब्बे प्रतिशत स्त्रियों को तो यह भी नहीं पता कि ऑरगॉज्म क्या होता है? क्योंकि वे शारीरिक संवेग के ऐसी आनंददायी शिखर पर कभी पहुंचती ही नहीं जहां उनके शरीर का एक-एक तंतु सिहर उठे और एक-एक कोशिका सजीव हो जाए। वे वहां तक कभी पहुंच नहीं पातीं। और इसका कारण है समाज की काम-विरोधी चित्तवृत्ति। संघर्ष करनेवाला मन वहां उपस्थित है इसलिए स्त्री इतनी दमित और मंद हो गई है।


और पुरुष इस कृत्य को ऐसे किए चला जाता है जैसे वह कोई पाप कर रहा हो। वह स्वयं को अपराधी अनुभव करता है वह जानता है ”इसे करना नहीं चाहिए। ” और जब वह अपनी पत्नी या प्रेमिका से संभोग करता है तो वह उस समय किसी महात्मा के बारे में ही सोच रहा होता है। ”कैसे किसी महात्मा क पास जाऊं और किस तरह




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