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रविवार, 23 फ़रवरी 2025

मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक

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 मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक  ?


मरने के बाद व्यक्ति की तीन तरह की गतियां होती हैं

( १ ) : - उर्ध्व गति


( २ ) : - स्थिर गति और


( ३ ) : - अधो गति।


व्यक्ति जब देह छोड़ता है तब सर्वप्रथम वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाता है। सूक्ष्म शरीर की गति के अनुसार ही वह भिन्न- भिन्न लोक में विचरण करता है और अंत में अपनी गति अनुसार ही पुन: गर्भ धारण करता है।


आत्मा के तीन स्वरूप माने गए हैं


१ ) : - जीवात्मा,


( २ ) : - प्रेतात्मा और


( ३ ) : - सूक्ष्मात्मा


जो भौतिक शरीर में वास करता है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासनामय शरीर में निवास होता है तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। तीसरा स्वरूप है सूक्ष्म स्वरूप। मरने के बाद जब आत्मा सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है, तब उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।


कमजोर सूक्ष्म शरीर से ऊपर की यात्रा मुश्किल हो जाती है तब ऐसा व्यक्ति नीचे के लोक में स्वत: ही गिर जाता है या वह मृत्युलोक में ही पड़ा रहता है और दूसरे जन्म का इंतजार करता है। उसका यह इंतजार 100 वर्ष से 1000 वर्ष तक की अवधि का भी हो सकता है।


पहले बताए गए आत्मा के तीन स्वरूप से अलग


( १) : -  पहली विज्ञान आत्मा,


( २ ) : - दूसरी महान आत्मा और


( ३ ) : - तीसरी भूत आत्मा।


( १ ) : - विज्ञान आत्मा वह है, जो गर्भाधान से पहले स्त्री-पुरुष में संभोग की इच्छा उत्पन्न करती है, वह आत्मा रोदसी नामक मंडल से आता है, उक्त मंडल पृथ्वी से सत्ताईस हजार मील दूर है।


( २ ) : - महान आत्मा वह है, जो चन्द्रलोक से अट्ठाईस अंशात्मक रेतस बनाकर आता है, उसी 28 अंश रेतस से पुरुष पुत्र पैदा करता है। 28 अंश रेतस लेकर आया महान आत्मा मरने के बाद चन्द्रलोक पहुंच जाता है, जहां उससे वहीं 28 अंश रेतस मांगा जाता है। चंद्रलोक में वह आत्मा अपने स्वजातीय लोक में रहता है।


( ३ ) : - भूतात्मा वह है, जो माता-पिता द्वारा खाने वाले अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड में प्रवेश करता है। उससे खाए गए अन्न और पानी की मात्रा के अनुसार अहम भाव शामिल होता है, इसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते हैं। यह भूतात्मा पृथ्वी के अलावा किसी अन्य लोक में नहीं जा सकता है।


वे लोग जो जिंदगीभर क्रोध, कलह, नशा, भोग-संभोग, मांसभक्षण आदि धर्म-विरुद्ध निंदित कर्म में लगे रहे हैं मृत्यु के बाद उन्हें अधो गति प्राप्त होती। जिन्होंने थोड़ा-बहुत धर्म भी साधा है या जो मध्यम मार्ग में रहे हैं उन्हें स्थिर गति प्राप्त होती है।


और जिन्होंने वेदसम्मत आचरण करते हुए जीवनपर्यंत यम-नियमों का पालन किया है उन्हें उर्ध्व गति प्राप्त होती है।


अधो गति वाला आत्मा कीट-पतंगे, कीड़े-मकौड़े, रेंगने वाले जंतु, जलचर प्राणी और पेड़-पौधे आदि योनि में पहुंच जाता है।


स्थिर गति वाला आत्मा पशु, पक्षी और मनुष्य की योनि में पहुंच जाता है, लेकिन जो उर्ध्व गति वाला आत्मा है उनमें से कुछ पितरों के लोक और कुछ देवलोक पहुंच जाता है।


जो आत्मा अपने आध्यात्मिक बल के द्वारा देवलोक चला जाता है वह देवलोक में रहकर सुखों को भोगता है। यदि वहां भी वह देवतुल्य बनकर रहता है तो देवता हो जाता है। लेकिन यदि उनमें राग-द्वेष उत्पन्न होता है तो वह फिर से मृत्युलोक में मनुष्य योनि में जन्म ले लेता है।


लेकिन उर्ध्व गति प्राप्त कुछ आत्माएं अपने आध्यात्मिक बल की शक्ति से पितर और देवलोक से ऊपर ब्रह्मलोक में जाकर सदा के लिए जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।


यही मोक्ष है.......

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बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

तंत्र साधना में असम को स्त्री प्रदेश भी कहा जाता हैं

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 #कामरू_कामाख्या

असम को स्त्री प्रदेश भी कहा जाता हैं। वहां प्राचीन काल से ही तंत्र साधना के क्षेत्र में स्त्री शक्तियों का विशेष प्रभाव मौजूद रहा है। आज भी असम के कामाख्या क्षेत्र में तंत्र साधिकाओ का बहुत बड़ा वर्ग मौजूद है। जो अद्भुत तांत्रिक शक्तियों में  निपुण हैं।असम एक ऐसा क्षेत्र है जहां कामाख्या नामक शक्तिपीठ मौजूद है। शक्तिपीठ के विषय में आप सभी को जानकारी होगी। इसीलिए थोड़ा संक्षेप में विवरण दे रहा हूं। यहां भगवती का गुप्तांग गिरा था ऐसा माना जाता है। यहां पर कामाख्या मंदिर में उसी की पूजा होती है। वहां कोई भी विग्रह नहीं है बल्कि योनि मंडल बना हुआ है। ऐसा माना जाता है कि जून के महीने में 3 दिनों के लिए योनि में रजस्त्राव होता है। इस दौरान मंदिर के पट बंद रहते हैं और उस क्षेत्र में पूजा-पाठ का कार्यक्रम रोक दिया जाता है। 

उस दौरान यह भी देखा गया कि ब्रह्मपुत्र नदी का जल भी लाल रंग का हो जाता है।उस समय विशेष में, मंदिर में योनि मंडल के ऊपर वस्त्र  बिछा दिये जाते है।इन वस्त्रों को प्रसाद के रूप में दर्शनार्थियों में बांट दिया जाता है। इसे कामाख्या तार कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस वस्त्र का एक भी तार अगर किसी के शरीर पर ताबीज के रूप में या किसी अन्य रुप में मौजूद हैं तो उसके ऊपर किसी भी प्रकार का तांत्रिक प्रयोग कोई प्रभाव नहीं डालेगा। 

इसे मूल शक्तिपीठ माना जाता है। सभी प्रकार के जीवो के जन्म लेने का कारण योनि ही होता है। संभवतः इसीलिए इस पीठ को सबसे ज्यादा मान्यता दी गई हैं। तांत्रिक क्षेत्र में जितने भी सिद्ध पुरुष हुए हैं उन्होंने इस तांत्रिक क्षेत्र में आकर कोई ना कोई साधना सिद्धि अवश्य प्राप्त की है।शाबर मंत्र साधना के अधिकांश विशेषज्ञ या सिद्ध पुरुष कामाख्या को ही अपनी शक्तियों का केंद्र मानते हैं वे यथासंभव वहां जाकर दर्शन करने या वहां साधना करने की कोशिश अवश्य करते हैं।इससे उनकी शक्तियां और उनकी साधनात्मक  क्षमता दोनों और बढ़ती है।कामाख्या को कामरूप, कौरु नगर जैसे नामों से भी जाना जाता है। इन स्थानों पर रहने वाली स्त्रियों को तंत्र विद्या में निपुण माना जाता है। यही नहीं यह भी मान्यता है कि पहले किसी भी जानवर जैसे पक्षी पशुओं में परिवर्तित करके अपने पास बंदी बना लेते हैं फिर उनसे मनचाहा काम भी करवाते हैं आवश्यकता अनुसार आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती रहती हैं।

कामाख्या पीठ का लोगों का निजी अनुभव है कोई भी ऐसा काम जो नहीं हो पा रहा हो तो एक बार भगवती कामाख्या के दरवाजे पर पहुंचकर उनसे निवेदन करके जरूर देखें। साल भर के अंदर वह कार्य जरूर पूर्ण हो जाता है। 

हां! इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि वह कार्य किसी को कष्ट पहुंचाने वाला या सामाजिक मान्यता को नष्ट करने वाला न हो। 

आप अपने विकास के लिए कोई भी इच्छा  रखें और भगवती कामाख्या के दर्शन को जाऐ तो 90% संभावना है कि आपका काम हो जाएगा


इस संबंध में मुझे एक कहीं पड़ी हुई घटना की याद आ रही है। जिसे मैं आप लोगों के साथ शेयर करना चाहता हूं। जो कामाख्या से संबंधित है और संभवत किसी विदेशी जिज्ञासु ने लिखी है। 

वह विदेशी भारत में  कामाख्या के तंत्र साधिकाओ के विषय में सुनकर आया था। बहुत मेहनत करने के बाद वह एक ऐसी ही तंत्र साधिका के सम्पर्क में आया जिसने उसे प्रत्यक्ष में तंत्र साधना का प्रयोग करके दिखाने पर सहमति व्यक्त कर दी।

साधिका के निर्देश पर वह व्यक्ति एक काला मुर्गा अपने साथ लाया। एक लगभग 8 फीट गहरा गड्ढा खुदवाया गया, मुर्गे को उस गड्ढे में डाल दिया गया और उसे चटाई से ढक दिया गया।


इसके पश्चात साधिका उस गड्ढे से लगभग चार फीट दूर बैठ गयी। विदेशी भी वहीं पर बैठा रहा ताकि देखता रहे कोई गड़बड़ी तो नहीं हो रही हैं।

उस साधिका ने कुछ मंत्रों का उच्चारण किया और काली मिर्च के दाने उस चटाई पर फेंक दिये। उनके चटाई पर गिरने तक की हल्की आवाज तक उस विदेशी पर्यटक को सुनाई दी! 

उसके बाद मुर्गे की चीख  एक बार सुनाई थी। उसके बाद सब कुछ शांत हो गया।

कुछ समय बाद साधिका ने अपनी आंखे खोली और उस विदेशी पर्यटक को चटाई हटाकर देखने के लिए कहा।

उसे लगा कुछ खास तो घटित हुआ नहीं होगा जैसा मुर्गा है वैसा ही होना चाहिए।

लेकिन.... 

जैसे ही उसने चटाई हटाई वह मुर्गा मृत पड़ा हुआ था। वह तुरंत गढ्ढे में कूदा और उस मुर्गे को बाहर लेकर निकला।

उस मुर्गे के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। 

मंत्र शक्ति का प्रभाव उस पर्यटक को पता चल गया था।

उस साधिका ने बताया है यह तो तुम्हें दिखाने के लिए इस गढ्ढे में मुर्गे को रखा गया है। अगर मुर्गा यहां से 100 किलोमीटर दूर भी होता तो भी इसकी यही हालत होनी थी। 


इतना कह कर वह तंत्र साधिका वहां से लुप्त हो गई।

इस घटना से आप कामाख्या तंत्र क्षेत्र की साधिकाओं की क्षमता के बारे में समझ सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि उनके द्वारा की गई तंत्र की काट बहुत मुश्किल होती है!लगभग असंभव।


गुरु गोरखनाथ तंत्र के अद्भुत विद्वान माने जाते हैं। और शाबर तंत्र साधना में उनका स्थान बेहद प्रतिष्ठित और सिद्ध पुरुषों में लिया जाता है। 

उनके गुरु मछेंद्रनाथ थे! जो इस क्षेत्र से गुजर रहे थे! तभी यहां की रानी ने उन्हें महल में बुलवा लिया और उस के बाद ऐसा प्रयोग सम्पन्न किया कि गुरुदेव मच्छिंन्द्रनाथ सारी दुनियादारी भूलकर राजकाज संभालकर रानी के साथ रास विलास में लीन  हो गये। 

जब काफी समय बीत गया और गुरुदेव मच्छिंन्द्रनाथ का कोई अता पता नहीं चला... 

तो गोरखनाथ अपने गुरु की तलाश में निकले! और किसी प्रकार से अपने गुरु को उस रानी के चंगुल से छुड़ा कर ले जाने में सफल हुए। 

तो कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह हैं कि कामाख्या एक रहस्यमई जगह है और वहां रहने वाली महिला साधिकाओ का रहस्य उस से भी गहरा हैं। दिखने में उनमें कोई भी विशिष्टता दिखाई नहीं देगी! वह सामान्य महिलाओ की तरह ही दिखेगी लेकिन जब वह अपनी औकात पर आ जाये तो अच्छे अच्छे तांत्रिको को अपनी पांव की जूती की नोक पर रख लेती है और अपनी अंगुलियो पर नचाती हैं। एक प्रकार से वे महामाया का ही अंश है जो इस सम्पूर्ण सृष्टि को अपनी अंगुलियों पर नचाती रहती है।

जय माँ कामरूप कामाख्या  🙏🙏🙏

#अनूप साभार  Facebook wall

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अमरूद खाने से कई तरह की बीमारियों से बचाव होता है

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 अमरूद खाने से कई तरह की बीमारियों से बचाव होता है


 अमरूद के फ़ायदेः 

ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है।

वज़न घटाने में मदद करता है।

आंखों की रोशनी बढ़ाने में मदद करता है।

पाचन को ठीक रखता है।

इम्यून सिस्टम को मज़बूत करता है।

डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए फ़ायदेमंद होता है।

गर्भवती महिलाओं के लिए फ़ायदेमंद होता है।

कब्ज़ से राहत देता है।

शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को सही रखता है।

थायराइड के मरीज़ों के लिए फ़ायदेमंद होता है।

अमरूद में मौजूद पोषक तत्वः 

विटामिन-सी, लाइकोपीन, एंटीऑक्सीडेंट, पोटैशियम, मैग्नीशियम, फ़ाइबर, आयरन, फ़ोलिक एसिड, नियासिन (Vitamin B3), कॉपर.

अमरूद के कुछ और फ़ायदेः कैंसर के जोखिम को कम करता है, एनीमिया से राहत दिलाता है, ब्रेन फ़ंक्शनिंग में सुधार करता है, प्रजनन क्षमता को बढ़ावा देता है। साभार विनोद कुमार facebook wall

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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

जिन खोजा तिन पाईंयां--प्रवचन

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 कभी आपने खयाल किया, आपने किसी आदमी को मरते देखा? आप कहेंगे, बहुत लोगों को देखा। पर मैं कहता हूं, नहीं देखा। आज तक किसी व्यक्ति ने किसी को मरते नहीं देखा। मरने की प्रक्रिया आज तक देखी नहीं गई। जो हम देखते हैं, वह केवल जीवन के विदा हो जाने की प्रक्रिया है, मरने की नहीं।


बटन दबाई हमने, बिजली का बल्ब बुझ गया। जो नहीं जानता, वह कहेगा, बिजली मर गई। जो जानता है, वह कहेगा, बिजली अभिव्यक्त थी, अब अप्रकट हो गई। प्रकट थी, अप्रकट हो गई। मर नहीं गई। फिर बटन दबेगा, बिजली फिर वापस लौट आएगी। फिर बटन दबाएंगे, बिजली फिर भीतर तिरोहित हो जाएगी।


जीवन समाप्त नहीं होता, केवल शरीर से विदा होता है। लेकिन विदाई हमें मृत्यु मालूम पड़ती है। क्यों मालूम पड़ती है? क्योंकि हमने कभी अपने भीतर शरीर से अलग किसी अस्तित्व का अनुभव नहीं किया है। हमारा अनुभव यही है कि मैं शरीर हूं, इसलिए जब शरीर समाप्त होगा, जलाने के योग्य हो जाएगा, तब स्वभावतः निष्कर्ष होगा कि मर गए।


शरीर से अलग जिसने अपने भीतर किसी तत्व को नहीं जाना, वह अज्ञानी है। अज्ञानी का मतलब यह नहीं कि जिसे यूनिवर्सिटी की डिग्री नहीं है, विश्वविद्यालय का कोई सर्टिफिकेट नहीं है। सच तो यह है कि विश्वविद्यालय ने जितने सर्टिफिकेट दिए, अज्ञान उतना बढ़ा है, कम नहीं हुआ। कारण है। कारण यह है कि विश्वविद्यालय के सर्टिफिकेट को लोग ज्ञान समझने लगे। इसलिए असली ज्ञान की खोज की कोई जरूरत नहीं मालूम पड़ती। अज्ञानी आदमी के पास सर्टिफिकेट नहीं होता; वह ज्ञान की खोज करता है। तथाकथित ज्ञानी के पास सर्टिफिकेट होता है; वह मान लेता है कि मैं ज्ञानी हूं। मेरे पास यूनिवर्सिटी की डिग्री है। और क्या चाहिए?


ज्ञान तो सिर्फ एक है, स्वयं का ज्ञान। बाकी सब सूचनाएं हैं, इनफर्मेशनस हैं, नालेज नहीं। बाकी सब परिचय है, ज्ञान नहीं।


बर्ट्रेंड रसेल ने ज्ञान के दो हिस्से किए हैं, नालेज और एक्वेनटेंस–ज्ञान और परिचय। ज्ञान तो सिर्फ एक ही चीज का हो सकता है, जो मैं हूं; बाकी सब परिचय है, ज्ञान नहीं है। अपने से पृथक जिसे भी मैं जानता हूं, वह सिर्फ एक्वेनटेंस, परिचय है। जान तो सिर्फ अपने को सकता हूं; क्योंकि अपने से जो भिन्न है, उसके भीतर मेरा प्रवेश नहीं हो सकता, सिर्फ बाहर घूम सकता हूं। परिचय ही कर सकता हूं, ऊपर-ऊपर से जान सकता हूं, भीतर तो नहीं जा सकता। भीतर तो सिर्फ एक ही जगह जा सकता हूं, जहां मैं हूं।


यह बहुत मजे की बात है, अपना परिचय नहीं होता और दूसरे का ज्ञान नहीं होता। दूसरे का परिचय होता है, अपना ज्ञान होता है। अपना परिचय नहीं होता; क्योंकि अपने बाहर घूमने का उपाय नहीं है। दूसरे का ज्ञान नहीं होता; क्योंकि दूसरे के भीतर प्रवेश नहीं है।


लेकिन हम बड़े अजीब लोग हैं! हम दूसरे का ज्ञान ले लेते हैं और अपना परिचय कर लेते हैं। हम अपना परिचय कर लेते हैं, जो कि हो नहीं सकता। और हम दूसरे के ज्ञान को ज्ञान समझ लेते हैं, जो कि हो नहीं सकता। यह अज्ञान की स्थिति है। अज्ञान में मृत्यु है।


जब आप एक व्यक्ति को बुझते देखते हैं–बुझते, मरते नहीं। इसलिए बुद्ध ने ठीक शब्द का उपयोग किया है। वह शब्द है, निर्वाण। निर्वाण का अर्थ है, दीए का बुझना। बस, दीया बुझ जाता है; कोई मरता नहीं। दिखाई पड़ती थी ज्योति, अब नहीं दिखाई पड़ती। देखने के क्षेत्र से विदा हो जाती है, अदृश्य में लीन हो जाती है। फिर प्रकट हो सकती है, फिर लीन हो सकती है। यह प्रकट-अप्रकट होने का क्रम अनंत चल सकता है। जब तक कि ज्योति पहचान न ले कि प्रकट में भी मैं वही हूं, अप्रकट में भी मैं वही हूं; न मैं प्रकट होती, न मैं अप्रकट होती, सिर्फ रूप प्रकट होता और अप्रकट होता। वह जो रूप के भीतर छिपा हुआ सत्व है, वह न प्रकट में प्रकट होता, न अप्रकट में अप्रकट होता; न जीवन में जीवित होता, न मृत्यु में मरता। तब अमृत का अनुभव है।


हम दूसरों को मरते देखकर, बुझते देखकर, हिसाब लगा लेते हैं कि सब मरते हैं, तो मैं भी मरूंगा। लेकिन कभी किसी मरने वाले से पूछा कि मर गए? लेकिन वह उत्तर नहीं देता। इसलिए मान लेते हैं कि हां में उत्तर देता होगा। मौन को सम्मति का लक्षण समझने की बात सभी जगह ठीक नहीं है। मरे हुए आदमी से पूछो, मर गए? अगर वह उत्तर दे, तो समझना मरा नहीं; और अगर मौन रह जाए, तो हम समझ लेते हैं कि मर गया!


लेकिन मौन सम्मति का लक्षण नहीं है। नहीं बोल पा रहा है, इसलिए मर गया, ऐसा समझने का कोई कारण नहीं है।


जिन खोजा तिन पाईंयां--प्रवचन--19

ओशो

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   OMM ADI ANADI ARIHANT NAMO NAMAH

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देवीय शक्ति से साक्षात्कार कराते मंत्र

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मंत्रों का प्रयोग मानव ने अपने कल्याण के साथ-साथ दैनिक जीवन की संपूर्ण समस्याओं के समाधान हेतु यथासमय किया है और उसमें सफलता भी पाई है, परंतु आज के भौतिकवादी युग में यह विधा मात्र कुछ ही व्यक्तियों के प्रयोग की वस्तु बनकर रह गई है।

मंत्रों में छुपी अलौकिक शक्ति का प्रयोग कर जीवन को सफल एवं सार्थक बनाया जा सकता है। सबसे पहले प्रश्न यह उठता है कि 'मंत्र' क्या है, इसे कैसे परिभाषित किया जा सकता है। इस संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि मंत्र का वास्तविक अर्थ असीमित है। किसी देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए प्रयुक्त शब्द समूह मंत्र कहलाता है। 

जो शब्द जिस देवता या शक्ति को प्रकट करता है उसे उस देवता या शक्ति का मंत्र कहते हैं। मंत्र एक ऐसी गुप्त ऊर्जा है, जिसे हम जागृत कर इस अखिल ब्रह्मांड में पहले से ही उपस्थित इसी प्रकार की ऊर्जा से एकात्म कर उस ऊर्जा के लिए देवता (शक्ति) से सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं।

ऊर्जा अविनाशिता के नियमानुसार ऊर्जा कभी भी नष्ट नहीं होती है, वरन्‌ एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती रहती है। अतः जब हम मंत्रों का उच्चारण करते हैं तो उससे उत्पन्न ध्वनि एक ऊर्जा के रूप में ब्रह्मांड में प्रेषित होकर जब उसी प्रकार की ऊर्जा से संयोग करती है तब हमें उस ऊर्जा में छुपी शक्ति का आभास होने लगता है। ज्योतिषीय संदर्भ में यह निर्विवाद सत्य है कि इस धरा पर रहने वाले सभी प्राणियों पर ग्रहों का अवश्य प्रभाव पड़ता है। 

चंद्रमा मन का कारक ग्रह है और यह पृथ्वी के सबसे नजदीक होने के कारण खगोल में अपनी स्थिति के अनुसार मानव मन को अत्यधिक प्रभावित करता है। अतः इसके अनुसार जो मन का त्राण (दुःख) हरे उसे मंत्र कहते हैं। मंत्रों में प्रयुक्त स्वर, व्यंजन, नाद व बिंदु देवताओं या शक्ति के विभिन्न रूप एवं गुणों को प्रदर्शित करते हैं। मंत्राक्षरों, नाद, बिंदुओं में दैवीय शक्ति छुपी रहती है।

मंत्र उच्चारण से ध्वनि उत्पन्न होती है, उत्पन्न ध्वनि का मंत्र के साथ विशेष प्रभाव होता है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु के ज्ञानर्थ कुछ संकेत प्रयुक्त किए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार मंत्रों से संबंधित देवी-देवताओं को संकेत द्वारा संबंधित किया जाता है, इसे बीज कहते हैं। विभिन्न बीज मंत्र इस प्रकार हैं :

ॐ👉 परमपिता परमेश्वर की शक्ति का प्रतीक है।

ह्रीं👉 माया बीज,

श्रीं👉 लक्ष्मी बीज,

क्रीं👉 काली बीज,

ऐं👉 सरस्वती बीज,

क्लीं👉 कृष्ण बीज। 

मंत्रों में देवी-देवताओं के नाम भी संकेत मात्र से दर्शाए जाते हैं, जैसे राम के लिए 'रां', हनुमानजी के लिए 'हं', गणेशजी के लिए 'गं', दुर्गाजी के लिए 'दुं' का प्रयोग किया जाता है। इन बीजाक्षरों में जो अनुस्वार (ं) या अनुनासिक (जं) संकेत लगाए जाते हैं, उन्हें 'नाद' कहते हैं। नाद द्वारा देवी-देवताओं की अप्रकट शक्ति को प्रकट किया जाता है।


लिंगों के अनुसार मंत्रों के तीन भेद होते हैं


पुर्लिंग👉 जिन मंत्रों के अंत में हूं या फट लगा होता है।

स्त्रीलिंग👉 जिन मंत्रों के अंत में 'स्वाहा' का प्रयोग होता है।

नपुंसक लिंग👉 जिन मंत्रों के अंत में 'नमः' प्रयुक्त होता है।

अतः आवश्यकतानुसार मंत्रों को चुनकर उनमें स्थित अक्षुण्ण ऊर्जा की तीव्र विस्फोटक एवं प्रभावकारी शक्ति को प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र, साधक व ईश्वर को मिलाने में मध्यस्थ का कार्य करता है। मंत्र की साधना करने से पूर्व मंत्र पर पूर्ण श्रद्धा, भाव, विश्वास होना आवश्यक है तथा मंत्र का सही उच्चारण अति आवश्यक है। मंत्र लय, नादयोग के अंतर्गत आता है। 

मंत्रों के प्रयोग से आर्थिक, सामाजिक, दैहिक, दैनिक, भौतिक तापों से उत्पन्न व्याधियों से छुटकारा पाया जा सकता है। रोग निवारण में मंत्र का प्रयोग रामबाण औषधि का कार्य करता है। मानव शरीर में 108 जैविकीय केंद्र (साइकिक सेंटर) होते हैं जिसके कारण मस्तिष्क से 108 तरंग दैर्ध्य (वेवलेंथ) उत्सर्जित करता है। 

शायद इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने मंत्रों की साधना के लिए 108 मनकों की माला तथा मंत्रों के जाप की आकृति निश्चित की है। मंत्रों के बीज मंत्र उच्चारण की 125 विधियाँ हैं। मंत्रोच्चारण से या जाप करने से शरीर के 6 प्रमुख जैविकीय ऊर्जा केंद्रों से 6250 की संख्या में विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं, जो इस प्रकार हैं :

मूलाधार👉 4×125=500

स्वधिष्ठान👉 6×125=750

मनिपुर👉 10×125=1250

हृदयचक्र👉 13×125=1500

विध्रहिचक्र👉 16×125=2000

आज्ञाचक्र👉 2×125=250 

कुल योग👉 6250 (विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगों की संख्या)

भारतीय कुंडलिनी विज्ञान के अनुसार मानव के स्थूल शरीर के साथ-साथ 6 अन्य सूक्ष्म शरीर भी होते हैं। विशेष पद्धति से सूक्ष्म शरीर के फोटोग्राफ लेने से वर्तमान तथा भविष्य में होने वाली बीमारियों या रोग के बारे में पता लगाया जा सकता है। सूक्ष्म शरीर के ज्ञान के बारे में जानकारी न होने पर मंत्र शास्त्र को जानना अत्यंत कठिन होगा। 

मानव, जीव-जंतु, वनस्पतियों पर प्रयोगों द्वारा ध्वनि परिवर्तन (मंत्रों) से सूक्ष्म ऊर्जा तरंगों के उत्पन्न होने को प्रमाणित कर लिया गया है। मानव शरीर से 64 तरह की सूक्ष्म ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं जिन्हें 'धी' ऊर्जा कहते हैं। जब धी का क्षरण होता है तो शरीर में व्याधि एकत्र हो जाती है।

मंत्रों का प्रभाव वनस्पतियों पर भी पड़ता है। जैसा कि बताया गया है कि चारों वेदों में कुल मिलाकर 20 हजार 389 मंत्र हैं, प्रत्येक वेद का अधिष्ठाता देवता है। ऋग्वेद का अधिष्ठाता ग्रह गुरु है। यजुर्वेद का देवता ग्रह शुक्र, सामवेद का मंगल तथा अथर्ववेद का अधिपति ग्रह बुध है। 

मंत्रों का प्रयोग ज्योतिषीय संदर्भ में अशुभ ग्रहों द्वारा उत्पन्न अशुभ फलों के निवारणार्थ किया जाता है। ज्योतिष वेदों का अंग माना गया है। इसे वेदों का नेत्र कहा गया है। भूत ग्रहों से उत्पन्न अशुभ फलों के शमनार्थ वेदमंत्रों, स्तोत्रों का प्रयोग अत्यन्त प्रभावशाली माना गया है। 

उदाहरणार्थ आदित्य हृदयस्तोत्र सूर्य के लिए, दुर्गास्तोत्र चंद्रमा के लिए, रामायण पाठ गुरु के लिए, ग्राम देवता स्तोत्र राहु के लिए, विष्णु सहस्रनाम, गायत्री मंत्रजाप, महामृत्युंजय जाप, क्रमशः बुध, शनि एवं केतु के लिए, लक्ष्मीस्तोत्र शुक्र के लिए और मंगलस्रोत मंगल के लिए। मंत्रों का चयन प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथों से किया गया है। 

वैज्ञानिक रूप से यह प्रमाणित हो चुका है कि ध्वनि उत्पन्न करने में नाड़ी संस्थान की 72 नसें आवश्यक रूप से क्रियाशील रहती हैं। अतः मंत्रों के उच्चारण से सभी नाड़ी संस्थान क्रियाशील रहते हैं।

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गुरुवार, 13 फ़रवरी 2025

क्या यह संसार वास्तविकता है या मात्र एक भ्रामक सपना

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 क्या यह संसार वास्तविकता है या मात्र एक भ्रामक सपना?


कल्पना कीजिए, आप एक फिल्म थिएटर में बैठे हैं। स्क्रीन पर चल रही फिल्म आपको हँसा सकती है, रुला सकती है, यहाँ तक कि आपको उसमें डूब जाने को मजबूर कर सकती है। लेकिन अचानक कोई आपको याद दिलाए कि यह सब केवल एक प्रोजेक्शन है—कुछ भी असली नहीं है! क्या यह संभव नहीं कि हमारी पूरी ज़िंदगी भी वैसी ही हो—एक भव्य फिल्म, जिसे हम वास्तविक मानने की भूल कर रहे हैं?


वेदांत कहता है कि यह संसार माया है—एक भ्रम, जो सत्य को छुपाकर हमारे सामने एक आभासी दुनिया प्रस्तुत करता है। शंकराचार्य कहते हैं—


"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।"

(ब्रह्म ही सत्य है, यह संसार मिथ्या है, और जीव ब्रह्म के अलावा कुछ नहीं है।)


इसका तात्पर्य यह है कि संसार में जो कुछ भी हमें दिख रहा है, वह परिवर्तनशील और अस्थायी है, इसलिए वह अंतिम सत्य नहीं हो सकता। जैसे कोई सपना वास्तविक प्रतीत होता है, लेकिन जागने के बाद उसकी कोई सच्चाई नहीं होती, वैसे ही यह भौतिक जगत भी एक अस्थायी आभास है। केवल ब्रह्म ही एकमात्र शाश्वत सत्य है, और प्रत्येक जीव भी मूलतः उसी ब्रह्म का ही अंश है।


लेकिन यह माया इतनी वास्तविक क्यों लगती है? क्या आधुनिक विज्ञान भी अब यह मानने लगा है कि यह ब्रह्मांड केवल एक प्रोजेक्शन हो सकता है?


एक जादूगर जब मंच पर जादू दिखाता है, तो उसकी चालाकी हमें दिखती नहीं—हम केवल उसका प्रभाव देखते हैं। ठीक यही कार्य माया करती है। श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा गया है—


"मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।"

(माया प्रकृति है, और इसे नियंत्रित करने वाला परमेश्वर है।)


हम जब स्वप्न देखते हैं, तो हमें उसमें सबकुछ असली लगता है। लेकिन जैसे ही हम जागते हैं, हमें समझ आता है कि वह मात्र एक सपना था। क्या यह संभव नहीं कि यह जाग्रत अवस्था भी वैसा ही एक सपना हो, जिसे हम मृत्यु के बाद ही समझ पाते हैं?


आधुनिक विज्ञान अब यह मानने लगा है कि यह ब्रह्मांड उतना ठोस नहीं है जितना हमें प्रतीत होता है। Quantum Mechanics के प्रसिद्ध Double-Slit Experiment ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया।


इस प्रयोग में, जब वैज्ञानिकों ने एक कण को देखा, तो वह एक ठोस वस्तु की तरह व्यवहार कर रहा था।


लेकिन जब उसे नहीं देखा गया, तो वह एक तरंग (Wave) की तरह फैल गया।


इसका मतलब यह हुआ कि हमारी वास्तविकता हमारी चेतना पर निर्भर करती है—जब तक कोई देख नहीं रहा, तब तक ब्रह्मांड निश्चित रूप नहीं लेता।


यह ठीक वैसा ही है जैसे वीडियो गेम में! जब आप किसी गेम में आगे बढ़ते हैं, तो रास्ता तभी दिखाई देता है जब कैमरा उसे कवर करता है। अगर कैमरा नहीं घूमा, तो वहाँ कुछ भी नहीं होता!


अब सोचिए—क्या यह संभव नहीं कि हमारी पूरी दुनिया भी किसी "Cosmic Simulation" का हिस्सा हो?


ब्रिटिश वैज्ञानिक David Bohm ने कहा कि यह ब्रह्मांड एक Holographic Universe हो सकता है—एक विशाल होलोग्राम, जिसे कहीं और से प्रक्षिप्त किया जा रहा है।


भगवद गीता (2.16) कहती है—

"नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।"

(असत्य का कोई अस्तित्व नहीं, और सत्य का कभी अभाव नहीं होता।)


कैसे तोड़े इस भ्रम को?


अगर यह दुनिया वास्तव में एक प्रोजेक्शन मात्र है, तो क्या हम इससे बाहर निकल सकते हैं? वेदांत कहता है कि हाँ, लेकिन इसके लिए हमें सही दृष्टि अपनानी होगी। जिस तरह कोई सोया हुआ व्यक्ति सपने में उलझा रहता है, लेकिन जागते ही समझ जाता है कि वह केवल एक भ्रम था, वैसे ही इस जगत से पार पाने के लिए हमें साक्षी भाव में आना होगा। इसके तीन प्रमुख मार्ग हैं—ज्ञान, भक्ति और ध्यान।


 ज्ञान का मार्ग


कल्पना कीजिए कि कोई आदमी अंधेरे में रस्सी को साँप समझकर डर जाता है। लेकिन जैसे ही प्रकाश पड़ता है, उसे एहसास होता है कि वहाँ कोई साँप था ही नहीं—यह केवल उसकी आँखों का धोखा था। यही भूमिका ज्ञान योग की है। जब हमें यह समझ आ जाता है कि यह संसार अस्थायी है और केवल आत्मा ही शाश्वत है, तो माया का प्रभाव स्वतः समाप्त हो जाता है। जैसे ही व्यक्ति "मैं शरीर नहीं, मैं आत्मा हूँ" का अनुभव करता है, माया का जाल टूटने लगता है।


भक्ति योग: प्रेम और समर्पण का मार्ग


क्या आपने कभी कोई सपना देखा है जिसमें आप किसी मुसीबत में थे, लेकिन अचानक किसी ने आकर आपको बचा लिया? फिर जब आप जागे, तो समझ आया कि वह केवल सपना था। इसी तरह, जब हम परमात्मा की शरण में जाते हैं और पूर्ण विश्वास रखते हैं कि वही हमारी वास्तविकता का आधार है, तब माया हमें भ्रमित नहीं कर सकती। भगवद गीता (7.14) में भगवान कृष्ण कहते हैं—

"मेरी माया अत्यंत शक्तिशाली है, लेकिन जो मेरी शरण में आते हैं, वे इसे पार कर जाते हैं।"

पूर्ण समर्पण से हमारी चेतना उस परम वास्तविकता से जुड़ने लगती है, जिससे यह सारा जगत उत्पन्न हुआ है।


 ध्यान और आत्मनिरीक्षण: साक्षी भाव का मार्ग


कभी आपने समुद्र को ध्यान से देखा है? जब सतह पर तूफान होता है, तो लहरें उग्र दिखती हैं, लेकिन समुद्र की गहराई में सब शांत रहता है। हमारा मन भी ऐसा ही है—बाहर से अशांत, लेकिन भीतर पूर्ण शांति। जब हम ध्यान करते हैं और स्वयं को एक साक्षी के रूप में देखते हैं, तब हम धीरे-धीरे इस माया से परे जाने लगते हैं। जब मन पूर्ण रूप से शांत होता है, तो हमें अहसास होता है कि यह संसार केवल एक दृश्य है, और हम उसके देखने वाले मात्र हैं।


 याद रखिए—माया केवल उतनी ही वास्तविक है, जितनी हम उसे मानते हैं। जैसे ही आप सत्य को पहचानेंगे, यह दुनिया भी एक सपने की तरह प्रतीत होगी, और आप वास्तविक जागरण की ओर बढ़ेंगे। साभार Facebook 

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अर्जुन की छाल और दालचीनी ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करने में लाभकारी होती है

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 # अर्जुन की छाल और दालचीनी ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करने में लाभकारी होती है


। नियमित रूप से इसका काढ़ा पीने से खून को पतला किया जा सकता है, जिससे शरीर में ब्लड क्लॉटिंग की समस्या होने का खतरा भी नहीं होता। शरीर में ब्लड का फ्लो बेहतर तरीके से काम करता है, जिससे हृदय की हेल्थ भी अच्छी होती है।

# अर्जुन की छाल शरीर में सूजन कम करती है और जोड़ों के दर्द में भी आराम पहुंचाती है। हाई ब्लड प्रेशर में फायदेमंद- अर्जुन की छाल का उपयोग दिल को स्वस्थ रखने और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए भी किया जाता है। इसमें फाइटोकेमिकल्स खासतौर से टैनिन होता है, जो कार्डियोप्रोटेक्टिव असर दिखाता है।

# अर्जुन की छाल का काढ़ा पोषक तत्वों से भरपूर है. इसके सेवन से कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहते हैं. ये खून को पतला बनाने का काम करता है, जिससे हार्ट अटैक का खतरा दूर रहता है।

अर्जुन की छाल लिवर और किडनी की सेहत के लिए फायदेमंद मानी जाती है। अर्जुन की छाल में फ्लेवोनोइड्स, टैनिन्स, ट्राइटरपेनॉइड सैपोनिन, एंटीऑक्सीडेंट्स और फाइटोस्टेरॉल मौजूद होता है जो लिवर और किडनी को हेल्दी रखता है। अर्जुन की छाल में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट लिवर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाते हैं।

# अर्जुन के पेड़ की छाल को हृदय स्वास्थ्य का समर्थन करने और शरीर के कार्डियोवैस्कुलर फ़ंक्शन को बनाए रखने के लिए जाना जाता है। यह रक्तचाप (ब्लडप्रेशर)को नॉर्मल बनाए रखने में भी मदद करता है और दिल की विफलता के जोखिम को कम करता है। इसके अलावा, आयुर्वेद कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करके हृदय की रुकावट के लिए अर्जुन की छाल की सलाह देता है।

रोजाना दो से तीन ग्राम अर्जुन की सूखी छाल को पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर सुबह खाली पेट पीने से बेहतर परिणाम देखे जा सकते हैं. अर्जुन की छाल में एंटी-डायबिटिक गुण होते हैं, जो रक्त में शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करते हैं

गर्भवती स्तनपान कराने वाली महिला को इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

स्वस्थ रहने के लिए भी आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक नहीं करना है। आप हफ्ते में 1-2 बार करीब एक दो महीने तक अर्जुन की छाल का इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर आप किसी बीमारी को ठीक करने के लिए इसका उपयोग कर रहे हैं तो आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह भी लें सकतें है। sabhar facebook

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तिल का तेल ... पृथ्वी का अमृत,

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 तिल का तेल ... पृथ्वी का अमृत,


यदि इस पृथ्वी पर उपलब्ध सर्वोत्तम खाद्य पदार्थों की बात की जाए तो तिल के तेल का नाम अवश्य आएगा और यही सर्वोत्तम पदार्थ बाजार में उपलब्ध नहीं है. और ना ही आने वाली पीढ़ियों को इसके गुण पता हैं.


🔹 क्योंकि नई पीढ़ी तो टी वी के इश्तिहार देख कर ही सारा सामान ख़रीदती है.

और तिल के तेल का प्रचार कंपनियाँ इसलिए नहीं करती क्योंकि इसके गुण जान लेने के बाद आप उन द्वारा बेचा जाने वाला तरल चिकना पदार्थ जिसे वह तेल कहते हैं लेना बंद कर देंगे.


🔹तिल के तेल में इतनी ताकत होती है कि यह पत्थर को भी चीर देता है. प्रयोग करके देखें.... 


🔹आप पर्वत का पत्थर लिजिए और उसमे कटोरी के जैसा खडडा बना लिजिए, उसमे पानी, दुध, धी या तेजाब संसार में कोई सा भी कैमिकल, ऐसिड डाल दीजिए, पत्थर में वैसा की वैसा ही रहेगा, कही नहीं जायेगा... 


🔹लेकिन... अगर आप ने उस कटोरी नुमा पत्थर में तिल का तेल डाल दीजिए, उस खड्डे में भर दिजिये.. 2 दिन बाद आप देखेंगे कि, तिल का तेल... पत्थर के अन्दर भी प्रवेश करके, पत्थर के नीचे आ जायेगा. यह होती है तेल की ताकत, इस तेल की मालिश करने से हड्डियों को पार करता हुआ, हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है.


🔹 तिल के तेल के अन्दर फास्फोरस होता है जो कि हड्डियों की मजबूती का अहम भूमिका अदा करता है. 


🔹और तिल का तेल ऐसी वस्तु है जो अगर कोई भी भारतीय चाहे तो थोड़ी सी मेहनत के बाद आसानी से प्राप्त कर सकता है. तब उसे किसी भी कंपनी का तेल खरीदने की आवश्यकता ही नही होगी. 


🔹तिल खरीद लीजिए और किसी भी तेल निकालने वाले से उनका तेल निकलवा लीजिए. लेकिन सावधान तिल का तेल सिर्फ कच्ची घाणी  का ही प्रयोग करना चाहिए. 


🔷तैल शब्द की व्युत्पत्ति तिल शब्द से ही हुई है। जो तिल से निकलता वह है तैल। अर्थात तेल का असली अर्थ ही है "तिल का तेल".


🔹तिल के तेल का सबसे बड़ा गुण यह है की यह शरीर के लिए आयुषधि का काम करता है.. चाहे आपको कोई भी रोग हो यह उससे लड़ने की क्षमता शरीर में विकसित करना आरंभ कर देता है. यह गुण इस पृथ्वी के अन्य किसी खाद्य पदार्थ में नहीं पाया जाता.


🔹सौ ग्राम  तिल  में 1000 मिलीग्राम कैल्शियम प्राप्त होता हैं। बादाम की अपेक्षा तिल में छः गुना से भी अधिक कैल्शियम है। काले और लाल तिल में लौह तत्वों की भरपूर मात्रा होती है जो रक्तअल्पता के इलाज़ में कारगर साबित होती है।


🔷तिल में उपस्थित लेसिथिन नामक रसायन कोलेस्ट्रोल के बहाव को रक्त नलिकाओं में बनाए रखने में मददगार होता है।

तिल के तेल में प्राकृतिक रूप में उपस्थित सिस्मोल एक ऐसा एंटी-ऑक्सीडेंट है जो इसे ऊँचे तापमान पर भी बहुत जल्दी खराब नहीं होने देता। आयुर्वेद चरक संहित में इसे पकाने के लिए सबसे अच्छा तेल माना गया है।


🔷तिल में विटामिन  सी छोड़कर वे सभी आवश्यक पौष्टिक पदार्थ होते हैं जो अच्छे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं। तिल विटामिन बी और आवश्यक फैटी एसिड्स से भरपूर है।

इसमें मीथोनाइन और ट्रायप्टोफन नामक दो बहुत महत्त्वपूर्ण एमिनो एसिड्स होते हैं जो चना, मूँगफली, राजमा, चौला और सोयाबीन जैसे अधिकांश शाकाहारी खाद्य पदार्थों में नहीं होते। 


🔹ट्रायोप्टोफन को शांति प्रदान करने वाला तत्व भी कहा जाता है जो गहरी नींद लाने में सक्षम है। यही त्वचा और बालों को भी स्वस्थ रखता है। मीथोनाइन लीवर को दुरुस्त रखता है और कॉलेस्ट्रोल को भी नियंत्रित रखता है।


🔷तिलबीज स्वास्थ्यवर्द्धक वसा का बड़ा स्त्रोत है जो चयापचय को बढ़ाता है।

यह कब्ज भी नहीं होने देता।

तिलबीजों में उपस्थित पौष्टिक तत्व,जैसे-कैल्शियम और आयरन त्वचा को कांतिमय बनाए रखते हैं।


🔷तिल में न्यूनतम सैचुरेटेड फैट होते हैं इसलिए इससे बने खाद्य पदार्थ उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद कर सकता है।

सीधा अर्थ यह है की यदि आप नियमित रूप से स्वयं द्वारा निकलवाए हुए शुद्ध तिल के तेल का सेवन करते हैं तो आप के बीमार होने की संभावना ही ना के बराबर रह जाएगी.


🔹 जब शरीर बीमार ही नही होगा तो उपचार की भी आवश्यकता नही होगी. यही तो आयुर्वेद है.. आयुर्वेद का मूल सीधांत यही है की उचित आहार विहार से ही शरीर को स्वस्थ रखिए ताकि शरीर को आयुषधि की आवश्यकता ही ना पड़े.


🔹एक बात का ध्यान अवश्य रखिएगा की बाजार में कुछ लोग तिल के तेल के नाम पर अन्य कोई तेल बेच रहे हैं.. जिसकी पहचान करना मुश्किल होगा. ऐसे में अपने सामने निकाले हुए तेल का ही भरोसा करें. यह काम थोड़ा सा मुश्किल ज़रूर है किंतु पहली बार की मेहनत के प्रयास स्वरूप यह शुद्ध तेल आपकी पहुँच में हो जाएगा. जब चाहें जाएँ और तेल निकलवा कर ले आएँ.


🔷तिल में मोनो-सैचुरेटेड फैटी एसिड (mono-unsaturated fatty acid) होता है जो शरीर से बैड कोलेस्ट्रोल को कम करके गुड कोलेस्ट्रोल यानि एच.डी.एल. (HDL) को बढ़ाने में मदद करता है। यह हृदय रोग, दिल का दौरा और धमनीकलाकाठिन्य (atherosclerosis) के संभावना को कम करता है।

कैंसर से सुरक्षा प्रदान करता है-

तिल में सेसमीन (sesamin) नाम का एन्टीऑक्सिडेंट (antioxidant) होता है जो कैंसर के कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने के साथ-साथ है और उसके जीवित रहने वाले रसायन के उत्पादन को भी रोकने में मदद करता है।


🔹 यह फेफड़ों का कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, स्तन कैंसर और अग्नाशय के कैंसर के प्रभाव को कम करने में बहुत मदद करता है।

तनाव को कम करता है-


🔹इसमें नियासिन (niacin) नाम का विटामिन होता है जो तनाव और अवसाद को कम करने में मदद करता है।

हृदय के मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद करता है-


🔹तिल में ज़रूरी मिनरल जैसे कैल्सियम, आयरन, मैग्नेशियम, जिन्क, और सेलेनियम होता है जो हृदय के मांसपेशियों को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है और हृदय को नियमित अंतराल में धड़कने में मदद करता है। 


🔹शिशु के हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है-

तिल में डायटरी प्रोटीन और एमिनो एसिड होता है जो बच्चों के हड्डियों के विकसित होने में और मजबूती प्रदान करने में मदद करता है। 


🔹उदाहरणस्वरूप 100ग्राम तिल में लगभग 18 ग्राम प्रोटीन होता है, जो बच्चों के विकास के लिए बहुत ज़रूरी होता है।

गर्भवती महिला और भ्रूण (foetus) को स्वस्थ रखने में मदद करता है-


🔹तिल में फोलिक एसिड होता है जो गर्भवती महिला और भ्रूण के विकास और स्वस्थ रखने में मदद करता है।


 🔹शिशुओं के लिए तेल मालिश के रूप में काम करता है-


🔹अध्ययन के अनुसार तिल के तेल से शिशुओं को मालिश करने पर उनकी मांसपेशियाँ सख्त होती है साथ ही उनका अच्छा विकास होता है।


🔹 आयुर्वेद के अनुसार इस तेल से मालिश करने पर शिशु आराम से सोते हैं।

अस्थि-सुषिरता (osteoporosis) से लड़ने में मदद करता है-


🔹तिल में जिन्क और कैल्सियम होता है जो अस्थि-सुषिरता से संभावना को कम करने में मदद करता है।


🔹मधुमेह के दवाईयों को प्रभावकारी बनाता है-


🔹डिपार्टमेंट ऑफ बायोथेक्सनॉलॉजी विनायक मिशन यूनवर्सिटी, तमिलनाडु (Department of Biothechnology at the Vinayaka Missions University, Tamil Nadu) के अध्ययन के अनुसार यह उच्च रक्तचाप को कम करने के साथ-साथ इसका एन्टी ग्लिसेमिक प्रभाव रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को 36% कम करने में मदद करता है जब यह मधुमेह विरोधी दवा ग्लिबेक्लेमाइड (glibenclamide) से मिलकर काम करता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह (type 2 diabetic) रोगी के लिए यह मददगार साबित होता है।


🔹दूध के तुलना में तिल में तीन गुना कैल्शियम रहता है। इसमें कैल्शियम, विटामिन बी और ई, आयरन और ज़िंक, प्रोटीन की भरपूर मात्रा रहती है और कोलेस्टरोल बिल्कुल नहीं रहता है। 


🔹तिल का तेल ऐसा तेल है, जो सालों तक खराब नहीं होता है, यहाँ तक कि गर्मी के दिनों में भी वैसा की वैसा ही रहता है. 

तिल का तेल कोई साधारण तेल नहीं है। इसकी मालिश से शरीर काफी आराम मिलता है। यहां तक कि लकवा जैसे रोगों तक को ठीक करने की क्षमता रखता है। 


🔹इससे अगर  महिलाएं अपने स्तन के नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें, तो स्तन पुष्ट होते हैं। सर्दी के मौसम में इस तेल से शरीर की मालिश करें, तो  ठंड का एहसास नहीं होता।


🔹 इससे चेहरे की मालिश भी कर सकते हैं। चेहरे की सुंदरता एवं कोमलता बनाये रखेगा। यह सूखी त्वचा के लिए उपयोगी है।

 

🔹तिल का तेल- तिल विटामिन ए व ई से भरपूर होता है। इस कारण इसका तेल भी इतना ही महत्व रखता है। इसे हल्का गरम कर त्वचा पर मालिश करने से निखार आता है। अगर बालों में लगाते हैं, तो बालों में निखार आता है, लंबे होते हैं।


🔹जोड़ों का दर्द हो, तो तिल के तेल में थोड़ी सी सोंठ पावडर, एक चुटकी हींग पावडर डाल कर गर्म कर मालिश करें। तिल का तेल खाने में भी उतना ही पौष्टिक है विशेषकर पुरुषों के लिए।इससे मर्दानगी की ताकत मिलती है!


🔹हमारे धर्म में भी तिल के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है, जन्म, मरण, परण, यज्ञ, जप, तप, पित्र, पूजन आदि में तिल और तिल का तेल के बिना संभव नहीं है अतः इस पृथ्वी के अमृत को अपनावे और जीवन निरोग बनावे।

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रविवार, 9 फ़रवरी 2025

गिलोय का औषधीय गुण

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अरंडी का व्यवसायिक महत्व  अरंडी का महत्व

गिलोय


(Tinospora Cordifolia) एक आयुर्वेदिक औषधि है जिसे संस्कृत में "अमृता" और "गुडुची" कहा जाता है। यह बेलनुमा पौधा है, जिसकी पत्तियां दिल के आकार की होती हैं और इसे औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है। गिलोय का उपयोग आयुर्वेद में प्राचीन काल से विभिन्न रोगों के उपचार में किया जा रहा है।


औषधीय गुण


1. इम्यूनिटी बढ़ाना: गिलोय शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है।


2. डायबिटीज में फायदेमंद: यह ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करता है।


3. ज्वर नाशक: डेंगू, मलेरिया और वायरल बुखार में इसका उपयोग बुखार कम करने के लिए किया जाता है।


4. पाचन सुधारना: यह अपच, गैस और पेट की अन्य समस्याओं को ठीक करता है।


5. डिटॉक्सिफायर: गिलोय रक्त को शुद्ध करता है और त्वचा संबंधी रोगों में लाभकारी है।


6. एंटीऑक्सिडेंट गुण: यह शरीर में मुक्त कणों को कम करता है और एंटी-एजिंग गुण प्रदान करता है।


7. संधि रोगों में उपयोगी: गिलोय जोड़ों के दर्द और सूजन में राहत देता है।


8. तनाव और चिंता: यह मानसिक स्वास्थ्य को सुधारता है और तनाव कम करता है।


उपयोग की विधि


1. काढ़ा:

गिलोय की ताजी या सूखी डंडी लें।

इसे पानी में उबालें और छानकर सेवन करें।

यह बुखार और इम्यूनिटी बढ़ाने में सहायक है।


2. गिलोय पाउडर:


1-2 ग्राम गिलोय पाउडर पानी या दूध के साथ लें।

डायबिटीज और पाचन के लिए यह लाभकारी है।


3. गिलोय रस:


ताजी गिलोय की डंडियों से रस निकालकर सेवन करें।

यह त्वचा और बालों के लिए फायदेमंद है।


4. गिलोय की गोलियां:


आयुर्वेदिक दुकानों पर उपलब्ध गिलोय टैबलेट्स को चिकित्सक की सलाह अनुसार लें।


सावधानियां


गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली महिलाएं इसका उपयोग डॉक्टर की सलाह से करें।


अत्यधिक मात्रा में इसका सेवन न करें, यह हानिकारक हो सकता है।


गिलोय का नियमित और सही तरीके से उपयोग आपके स्वास्थ्य को बेहतर बना सकता है।


नोट: डाक्टर से सलाह लें करके ही इसका प्रयोग करें। यह पोस्ट के शिक्षा के लिए है।

साभार आदिवासी राकेश बामनवास

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शनिवार, 8 फ़रवरी 2025

आपका मस्तिष्क एक रहस्यमयी यात्रा पर होता है

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 क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप गहरी नींद में होते हैं, तब भी आपका मस्तिष्क एक रहस्यमयी यात्रा पर होता है? एक ऐसी यात्रा, जो जागृत संसार से परे, आपके अवचेतन मन (Subconscious Mind) के गहरे गलियारों में प्रवेश करती है। इस रहस्य की चाबी छुपी है मेलाटोनिन में—वह दिव्य रसायन, जो न केवल शरीर को विश्राम देता है, बल्कि आत्मा को भी ज्ञान, अंतर्ज्ञान और आध्यात्मिक जागरण के द्वार तक ले जाता है।


विज्ञान इसे नींद का हार्मोन कहता है, परंतु शास्त्रों में इसे ‘आज्ञाचक्र का अमृत’ कहा गया है। यह वह पुल है, जो बाहरी संसार से हमें भीतर की रहस्यमयी दुनिया तक पहुँचाता है—वह जगह, जहाँ आपके विचार, भावनाएँ और छुपे हुए संस्कार संचित होते हैं।


आधुनिक न्यूरोसाइंस की दृष्टि से देखें, तो मेलाटोनिन मस्तिष्क की जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) को नियंत्रित करता है और शरीर को गहरी नींद के लिए तैयार करता है। लेकिन इसके प्रभाव यहीं खत्म नहीं होते! यह गहरी निद्रा के दौरान हमारे अवचेतन मन को सक्रिय करता है, जहाँ स्मृतियाँ संचित होती हैं, विचारों की सफाई होती है और मानसिक ऊर्जाओं का पुनर्निर्माण होता है।


जब मेलाटोनिन पर्याप्त मात्रा में स्रावित होता है, तब हमारा मस्तिष्क REM (Rapid Eye Movement) स्लीप में प्रवेश करता है—यानी वह अवस्था, जहाँ सपने जन्म लेते हैं। यह सपने केवल कल्पनाएँ नहीं, बल्कि हमारे अवचेतन मन की गहराइयों से आने वाले संदेश होते हैं, जिन्हें सही तरीके से समझा जाए, तो वे हमारे भविष्य के संकेत भी दे सकते हैं!


अब जरा योग शास्त्रों की ओर बढ़ते हैं। हिंदू दर्शन में पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) को ‘आज्ञाचक्र’ कहा गया है, जो तीसरी आँख का प्रतीक है। यही वह केंद्र है, जहाँ आत्मा और ब्रह्मांड के बीच का संचार स्थापित होता है।वेदांत और योग के अनुसार, यह अंग हमारे भीतर की दिव्य चेतना से जुड़ा हुआ है और यही वह स्थान है जहां हमारी आत्मा और ब्रह्मा का मिलन होता है। इस संदर्भ में, मेलाटोनिन को भी एक दिव्य स्राव के रूप में देखा जाता है, जो हमारे भीतर शांति और जागरूकता का संचार करता है।


जब ध्यान और साधना के द्वारा आज्ञाचक्र को सक्रिय किया जाता है, तो मेलाटोनिन का प्रवाह बढ़ता है, और साधक को गहरी शांति, अंतर्ज्ञान और दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त होती हैं। इसे ही आध्यात्मिक जागरण (Spiritual Awakening) कहा जाता है।


भगवद गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—

"ध्यानयोगेन संयुक्तो मद्भावं आगता:।"

(जो ध्यान में लीन होता है, वह मेरी चेतना से एकाकार हो जाता है।)


यानी जब साधक अपने अवचेतन को नियंत्रित कर लेता है, तब वह संसार की सीमाओं से परे आत्मज्ञान के द्वार तक पहुँच सकता है।

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सभी गैर-भौतिक आयाम अस्तित्व के स्तर हैं

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 "सभी गैर-भौतिक आयाम अस्तित्व के स्तर हैं जो ज्ञात भौतिक ब्रह्मांड की तुलना में उच्च आवृत्ति पर कंपन करते हैं।


यह उन्हें सामान्य पाँच इंद्रियों और आज उपलब्ध सभी वैज्ञानिक साधनों के लिए अदृश्य और अगोचर बनाता है।


जिस तरह विभिन्न प्रकार की ऊर्जाएँ - प्रकाश, गुरुत्वाकर्षण, एक्स-रे, ऊष्मा, माइक्रोवेव, आदि।


- सामान्य भौतिक ब्रह्मांड में एक ही समय में एक ही स्थान पर एक दूसरे के साथ किसी भी बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप किए बिना रहती हैं, उसी तरह ये विभिन्न आयामी स्तर एक ही समय में एक ही स्थान पर सह-अस्तित्व में रहते हैं।


प्रत्येक पूरी तरह से अलग प्रकार का है, जिसके अपने विशिष्ट गुण और आवृत्तियों का स्पेक्ट्रम है।


लेकिन गैर-भौतिक आयामों के रूप और अनुभव को बताने वाला आसानी से समझने योग्य विवरण देना बहुत मुश्किल है।


उदाहरण के लिए, सूक्ष्म विमान अपेक्षाकृत पूर्वानुमानित और स्थिर भौतिक आयाम की तुलना में एक अविश्वसनीय रूप से जटिल गैर-भौतिक आयामी स्तर का हिस्सा हैं।


सूक्ष्म विमानों की कई जटिलताएँ लगभग अज्ञात हैं।


 इस आयाम को नियंत्रित करने वाले गैर-भौतिक नियम {इन्हें सूक्ष्म भौतिकी कहते हैं} अत्यंत तरल और परिवर्तनशील हैं।


इसके अलावा, प्रोजेक्टर का दिमाग सूक्ष्म आयाम की उनकी धारणा को बहुत प्रभावित कर सकता है।


यह किसी भी सूक्ष्म शोधकर्ता या खोजकर्ता के लिए काम करने के लिए बहुत कम स्थिर कारक छोड़ता है।


सूक्ष्म आयाम से निपटने के दौरान आप केवल इशारा करके नहीं कह सकते, जैसा कि आप भौतिक ब्रह्मांड में कर सकते हैं-


"यह हमारा ग्रह है, पृथ्वी; यह इसका वायुमंडल है और वह बाहरी अंतरिक्ष है, आदि"।


आप इशारा करके यह भी नहीं कह सकते, "यह सूक्ष्म आयाम है!"


यद्यपि सूक्ष्म आयाम पूरे भौतिक ब्रह्मांड में व्याप्त है, लेकिन यह अधिकांश भाग के लिए गैर-स्थानिक है।


 सूक्ष्म जगत के द्वार हर जगह और कहीं भी मौजूद हैं, मानव मन के अंदर और बाहर दोनों जगह।" 


----रॉबर्ट ब्रूस

एस्ट्रल डायनेमिक्स: आउट-ऑफ-बॉडी एक्सपीरियंस की पूरी किताब


---अनुवादित साभार 


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