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मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

लंबी उम्र बढ़ाने वाली वैज्ञानिक तकनीकों के परिणाम

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लंबी उम्र बढ़ाने वाली वैज्ञानिक तकनीकों के परिणाम

(Social, Ethical and Environmental Implications of Life-Extension Technologies)

मानव जीवन को सैकड़ों वर्ष तक बढ़ा देने वाली तकनीकें विज्ञान की चमत्कारी उपलब्धि लग सकती हैं। फिर भी इनके प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रह जाते। समाज, नैतिकता और पर्यावरण—तीनों पर इनके गहरे परिणाम संभव हैं।


I. सामाजिक परिणाम (Social Consequences)

1) जनसंख्या विस्फोट और संसाधनों पर दबाव

जीवन प्रत्याशा बढ़ने पर जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ सकती है।
ऐसी स्थिति में

  • भोजन, पानी, ऊर्जा, भूमि जैसी मूल आवश्यकताओं पर अत्यधिक बोझ पड़ेगा

  • आवास संकट और संसाधनों की समाप्ति जैसी समस्याएँ सामने आएँगी

वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि यदि संसाधनों का यही दोहन जारी रहा, तो ग्रह पर जीवन कठिन हो जाएगा।

2) असमानता में वृद्धि

उच्च तकनीकें सामान्यतः महंगी होती हैं।
संभावना है कि

  • अमीर लोग लंबे, स्वास्थ्यवान जीवन का लाभ उठा पाएँगे

  • गरीब वर्ग पीछे रह जाएगा
    यह स्थिति समाज में जीवन-आधारित वर्ग विभाजन पैदा कर सकती है।

3) जीवन दर्शन और सामाजिक संरचना में बदलाव

लंबी आयु आधुनिक जीवन को पूरी तरह बदल देगी

  • रिश्तों की अवधि कैसे तय होगी?

  • शिक्षा और करियर के कितने चरण होंगे?

  • क्या धर्म, अध्यात्म और मृत्यु-दर्शन का स्वरूप बदल जाएगा?

जीवन के नए अर्थ और सवाल जन्म लेंगे।


II. नैतिक व दार्शनिक परिणाम (Ethical & Philosophical Consequences)

1) प्रकृति के नियम बदलने का अधिकार

युगों से जीवन और मृत्यु को प्रकृति या ईश्वर की देन माना गया है।
यदि मनुष्य मृत्यु पर नियंत्रण पा लेता है, तो प्रश्न उठता है

  • क्या हमें यह अधिकार होना चाहिए?

  • क्या यह अहंकार की हद है?

2) मानव अस्तित्व का भविष्य

दीर्घायु तकनीकें ट्रांस-ह्यूमनिज़्म जैसी अवधारणाओं को बढ़ाएंगी

  • साइबर शरीर, कृत्रिम अंग, अमरता का लक्ष्य
    ऐसी संभावनाएँ मानवता की पहचान और उद्देश्य को ही बदल देगी।

3) स्वास्थ्य बनाम दीर्घायु

लंबा जीवन तभी सार्थक है, जब

  • शरीर और मन स्वस्थ रहें
    वरना वृद्धावस्था की लम्बी कैद बन सकता है।

भारतीय परंपरा में चिरंजीवी की कल्पना रही है, पर वह आशीर्वाद थी—तकनीक नहीं।


III. पर्यावरणीय परिणाम (Environmental Consequences)

1) संसाधनों का अति-उपयोग

बढ़ी जनसंख्या का मतलब

  • जंगलों की कटाई

  • प्रदूषण

  • जल और ऊर्जा संकट

पृथ्वी की सहनशीलता की एक सीमा है।

2) ग्रह पर बढ़ता दबाव

हम आज ही दूसरे ग्रह खोजने की मजबूरी में हैं।
यदि लाखों लोग सदियों तक जीवित रहें, तो यह दबाव कई गुना बढ़ेगा।

अतीत में चिकित्सा कमजोर थी, फिर भी साधु-संत 90 वर्ष तक इसलिए जी पाते थे
क्योंकि वातावरण शुद्ध, प्रकृति संतुलित और जीवन अपेक्षाकृत सरल था।
आज स्वयं मनुष्य ही ग्रह की रहने योग्य स्थिति को कम कर रहा है।


निष्कर्ष (Conclusion)

दीर्घायु तकनीकें मानव स्वास्थ्य और विज्ञान का रोमांचकारी भविष्य रच सकती हैं।
फिर भी इनके साथ

  • जनसंख्या संकट

  • सामाजिक असमानता

  • नैतिक दुविधाएँ

  • पर्यावरणीय क्षति
    जैसे जटिल प्रश्न जुड़े हैं।

ऐसी तकनीकों पर आगे बढ़ते हुए यह आवश्यक है कि
विज्ञान, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन सुनिश्चित किया जाए।

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मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

जब प्रेम ऊर्जा ध्यान ऊर्जा में बदल जाए

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दो व्यक्ति ध्यान में बैठे, उनके बीच उज्जवल ऊर्जा धारा

कई रिश्ते सिर्फ एक-दूसरे को देखकर, स्पर्श करके और बातें बाँटकर रह जाते हैं। पर कभी-कभी ऐसा भी घटता है कि दो लोग केवल बाहरी रूप से नहीं, भीतर से जुड़ जाते हैं — उनकी ऊर्जा एक ही ताल पर धड़कने लगती है। ऐसे मिलन में केवल दो शरीर नहीं मिलते; दो अंदरूनी संसार, दो दिशाएँ और दो अनुभव एक साथ गूँजने लगते हैं।


जब प्रेम सतर्कता और जागरूकता के साथ होता है, तब वह सतही मिलन से ऊपर उठ जाता है। दोनों साथी अपनी छोटी-छोटी पहचानें भूलकर एक समग्र अनुभूति में खो जाते हैं — शांति, सृजन और आनन्द की एक नई लय बनती है। यह कोई अधिकार या माँग का खेल नहीं, बल्कि एक साझा अनुनाद है।


ऊर्जा की समानता

पुरुष और स्त्री की ऊर्जा को अक्सर सूर्य और चंद्र की तरह देखा जाता है: पुरुष ऊर्जा सक्रिय और बाहर की ओर जाती है; स्त्री ऊर्जा ग्रहणशील और शांत होती है। जब ये दो तरह की ऊर्जा सचेत रूप से मिलती हैं, तब रिश्ता सिर्फ भौतिक नहीं रह जाता — वह आध्यात्मिक बन जाता है।


“पूर्ण स्त्री” का मतलब यह नहीं कि वह साथी की हर चाह पूरी करे, बल्कि वह व्यक्ति का सच्चा प्रतिबिंब बन जाए। और “पूर्ण पुरुष” वह नहीं जो नियंत्रण करे, बल्कि वह जो साथ होने पर साथी को खिलने दे।


समर्पण और साक्षी बनना

इस मिलन में दोनों की सीख बदलती है—पुरुष को समर्पण की कला सीखनी पड़ सकती है; स्त्री को मौन और साक्षी बनने का अभ्यास करना पड़ सकता है। जब ये विरोधाभास नाच की तरह संतुलित हो जाएँ — न कोई शक्ति की टकराहट, न कोई माँग, न भय — तब उनके बीच बहने वाली ऊर्जा आनंदमय, सृजनशील और प्रार्थनापूर्ण बन जाती है। सेक्स उस वक़्त केवल शारीरिक क्रिया नहीं रह जाता; वह समाधि जैसा अनुभव बन जाता है।


यह “पूर्ण ऊर्जा” किसी एक “पूर्ण व्यक्ति” को पाकर नहीं मिलती—यह दो लोगों के बीच एक साझी गूँज है। जब दोनों खुले, निर्भीक और पूरी तरह उपस्थित होते हैं, तभी उनकी ऊर्जाएँ एक स्वर में गूँजती हैं। और उसी क्षण उन्हें दिव्य निकटता का अनुभव होता है।


क्या यह विचार आपको छू गया?

यदि हाँ — अपनी कहानी या विचार नीचे कमेंट में साझा करें। आपका अनुभव किसी और के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।

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जब किसी पुरुष की ऊर्जा किसी स्त्री की ऊर्जा से गहरे सामंजस्य में मिलती है

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 “जब किसी पुरुष की ऊर्जा किसी स्त्री की ऊर्जा से गहरे सामंजस्य में मिलती है,

तो कुछ ऐसा घटता है जो पारलौकिक है।

यह केवल दो शरीरों का मिलन नहीं होता —

यह दो ब्रह्मांडों का एक लय में विलय होना है।

जब यह पूर्णता से होता है, तब दोनों खो जाते हैं।

तब न पुरुष रहता है, न स्त्री;

केवल एक ऊर्जा रह जाती है — पूर्णता की ऊर्जा।


सामान्य प्रेम में तुम केवल सतह पर मिलते हो —

शरीर को छूते हो, बातें करते हो, भावनाएँ साझा करते हो —

लेकिन भीतर से अलग ही रहते हो।

जब प्रेम ध्यानमय हो जाता है, जब उसमें जागरूकता उपस्थित होती है,

तब यह मिलन दो व्यक्तियों का नहीं, दो ध्रुवों का हो जाता है।


पुरुष सूर्य की ऊर्जा लिए होता है — सक्रिय, पैठनेवाली, बाहर की ओर जानेवाली।

स्त्री चंद्रमा की ऊर्जा लिए होती है — ग्रहणशील, ठंडी, स्वागतपूर्ण।

जब ये दोनों ऊर्जा जागरूकता में मिलती हैं,

तब एक नई दिशा खुलती है — वही ईश्वर का द्वार है।


किसी पुरुष के लिए “पूर्ण स्त्री” वह नहीं जो उसकी इच्छाओं को पूरा करे,

बल्कि वह है जो उसके अस्तित्व का दर्पण बन जाए।

और किसी स्त्री के लिए “पूर्ण पुरुष” वह नहीं जो उस पर अधिकार करे,

बल्कि वह है जिसकी उपस्थिति में वह खिल सके।


पुरुष को कभी-कभी समर्पण करना सीखना होता है —

यही उसका स्त्री के माध्यम से दीक्षा है।

और स्त्री को मौन और साक्षी होना सीखना होता है —

यही उसकी पुरुष के माध्यम से दीक्षा है।


जब यह द्वंद्व नाच बन जाता है —

जब न शक्ति की लड़ाई होती है, न कोई माँग, न कोई भय —

तब उनके बीच जो ऊर्जा बहती है, वह आनंदमय, सृजनशील और प्रार्थनापूर्ण बन जाती है।

तब सेक्स अब सेक्स नहीं रहता — वह समाधि बन जाता है।

प्रेमी किसी विशालता में खो जाते हैं;

वे अस्तित्व के सार को छू लेते हैं।


“पूर्ण ऊर्जा” का मिलना किसी “पूर्ण व्यक्ति” को पाना नहीं है —

यह एक “पूर्ण अनुनाद” को पाना है।

यह किसी के साथ भी घट सकता है,

जब दोनों खुले हों, निडर हों, और उपस्थित हों।

जिस क्षण दोनों की ऊर्जाएँ एक स्वर में गूँजती हैं,

उसी क्षण तुमने दिव्य प्रिय को पा लिया।”

~ ♡sH♡

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काम और ध्यान (कामयोग) का अद्भुत संगम है

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 और संवेदनशील है — यह सिर्फ “काम” (यौन भाव) की नहीं बल्कि आत्मा और देह के मिलन की चेतना को छूती है।


“ऐसे काम-आलिंगन में जब तुम्हारी इन्द्रियाँ पत्‍तों की भाँति काँपने लगें, उस कम्पन में प्रवेश करो।”

यहाँ कवि या लेखक शरीर की प्रतिक्रिया को केवल शारीरिक सुख नहीं मानता, बल्कि उसे आध्यात्मिक कंपन के रूप में देखता है।
जब इन्द्रियाँ काँपती हैं — जैसे हवा में पत्ते काँपते हैं — तब वह प्रकृति के लय में मनुष्य की सम्मिलिति का संकेत है।
“उस कम्पन में प्रवेश करो” — इसका अर्थ है कि उस क्षण से डरना नहीं, उसे केवल भोग की दृष्टि से न देखना,
बल्कि उसमें उपस्थित जीवन, ऊर्जा और आत्मिक एकता को महसूस करना।

संक्षेप में, यह पंक्ति काम और ध्यान (कामयोग) का अद्भु काम और ध्यान (कामयोग) का अद्भुत संगम है —
जहाँ प्रेम केवल शरीर का नहीं, बल्कि आत्मा का भी जागरण है।

क्या आप चाहेंगे कि मैं इसे “दार्शनिक व्याख्या” के रूप में विस्तार से लिख दूँ (जैसे गद्य में या काव्य विश्लेषण रूप में)?

बहुत अच्छा — आइए इस पंक्ति का गहराई से, क्रमबद्ध और व्यावहारिक रूप में विश्लेषण करें। मैं पाँच हिस्सों में बाँटकर बताऊँगा: (1) शब्दार्थ और रूपक, (2) भावनात्मक-आध्यात्मिक स्तर, (3) दार्शनिक/सांस्कृतिक संदर्भ, (4) व्यावहारिक-अनुभवात्मक मार्गदर्शन (जो जोड़ों के लिए उपयोगी है), और (5) चेतावनियाँ/नैतिक पहलू।

1) शब्दार्थ और रूपक (literal + metaphorical)

  • “इन्द्रियाँ” — केवल इंद्रियां (स्पर्श, स्वाद, दृष्टि, श्रवण, गंध) ही नहीं; यहाँ शरीर की संवेदनशीलता और चाह का समग्र रूप है — इच्छाएँ, अनुभूतियाँ, ऊर्जा।

  • “पत्‍तों की भाँति काँपने” — पत्तों का कांपना सूक्ष्म, प्राकृतिक, स्वतःस्फूर्त और नाज़ुक होता है। यह किसी हिंसक सदमा नहीं, बल्कि एक हल्की, प्राकृतिक लय है। यह रूपक बताता है कि जिस कम्पन की बात है वह कोमल पर प्रामाणिक है — न कलात्मक नाटकीयता, बल्कि सच्ची संवेदना।

  • “उस कम्पन में प्रवेश करो” — संकेत है सक्रिय हिस्सेदारी का: डर कर पीछे हटने की बजाय उस अनुभव के भीतर पूरी तरह समाहित हो जाओ। प्रवेश करना पासिव होना नहीं, बल्कि पूर्ण उपस्थति (presence) और संमोहन (surrender) का आग्रह है।

2) भावनात्मक-आध्यात्मिक स्तर — क्या सूचित होता है?

  • इकात्मता (union): काम-आलिंगन केवल शारीरिक क्रिया नहीं रहकर एक ऐसी स्थिति बन जाती है जहाँ दो व्यक्तियाँ या देह-मन और प्रकृति एक-साँस में आ जाते हैं।

  • साक्षीभाव + सहभागिता: “काँपने” को सिर्फ देखना पर्याप्त नहीं; उसे अंदर जाकर अनुभव करना है — यानी एक तरफ़ साक्षी (observer) और दूसरी तरफ सहभागी (participant) का सम्मिश्रण।

  • स्वाभाविकता और अनासक्ति: पत्तों का कांपना अनावश्यक नियोजन नहीं करता — इसी तरह, प्रेम के क्षणों में स्वाभाविक प्रवाह में बने रहना सलाह दी जा रही है।

  • आध्यात्मिक रूपांतरण: काम का शरीर-केंद्रित आनंद, निगमित (sublimated) होकर चेतना के विस्तार या ध्यान का साधन बन सकता है — इसे कई धार्मिक/आध्यात्मिक परंपराएँ स्वीकार करती हैं (नीचे विस्तार है)।

3) दार्शनिक और सांस्कृतिक संदर्भ

  • तान्त्रिक दृष्टि: तंत्र परंपरा में काम और प्रेम को ऊर्जा-केंद्र (kundalini, bindu) से जोड़कर देखा जाता है — सही उपस्थिति और श्वास के द्वारा यह ऊर्जा ऊपर चढ़ाई जा सकती है और आध्यात्मिक अनुभव उत्पन्न हो सकता है।

  • भक्ति/सूफी दृष्टि: प्रेम को ईश्वर-संबंध की तरह देखा जाता है — आराधना और काम में समान भाव (लय, समर्पण) मिलते हैं।

  • आधुनिक मनोविज्ञान: माइंडफुलनेस और बॉडी-अवेयरनेस (सरीर पर ध्यान) से सैक्सुअल अनुभवों की तीव्रता और संबंध की गरिमा बढ़ती है; भय/अतीलतता घटती है।

  • कवितात्मक-मानववादी दृष्टिकोण: कवि इस अनुभव को प्रकृति के लय से जोड़कर मानवता की प्रकृतिकता और उस्मन्यता (finitude) का स्मरण कराता है।

4) व्यावहारिक-अनुभवात्मक मार्गदर्शन (जोड़ों/व्यक्तियों के लिए)

उद्देश्य: काम-आलिंगन को तेज़ शारीरिक क्रिया से अलगाकर — संवेदनशील, उपस्थित और अर्थपूर्ण अनुभव बनाना।

  1. श्वास पर ध्यान

    • धीमी, गहरी साँसें लें — एक साथ ही साँस लेना/छोड़ना साथी के साथ ताल मिला देता है।

    • साँस को “काँप” के रूप में महसूस करें — जहां छाती/गर्दन/पेट का हल्का कम्पन है, वहाँ अपना ध्यान रखें।

  2. स्लो डाउन (धीरे करें)

    • गति और विचारों को धीमा कर दें। तेज़ी में अक्सर सिर्फ़ उत्तेजना होती है; धीमेपन में संवेदनाएँ खुलती हैं।

  3. सेंस ऑब्जर्व करना (इन्द्रियों की उपस्थिति)

    • छूने, गंध, ध्वनि, स्वाद, दृष्टि — हर इन्द्रि को संक्षेप में नोट करें। जैसे: “मैं अब स्पर्श को महसूस कर रहा/रही हूँ” — यह साक्षीभाव लाता है।

  4. आँखों का संपर्क और मिलना

    • आँखों के संपर्क से भावनात्मक निकटता बढ़ती है; यह “कम्पन” को साझा करने का त्वरित तरीका है।

  5. बॉडी-इंटोनेशन्स (हाव-भाव की सुनना)

    • पत्तों की तरह कांपना अक्सर सूक्ष्म संकेत देता है — आँखों का झपकना, हँसी, साँस का बदलना — इन संकेतों पर ध्यान दें और उसी अनुरूप प्रतिक्रिया दें।

  6. अनुमति और भाषा

    • “प्रवेश” का मतलब अनिवार्य नहीं; निरपेक्ष सहमति और आराम ज़रूरी है। उससे पहले कमेंट करें: “क्या तुम चाहोगे/चाहोगी कि मैं और नज़दीक आऊँ?” — मौन भी हाँ/ना बताता है पर साफ़ संचार बेहतर है।

  7. आफ्टरकेयर (बाद की देखभाल)

    • गले लगना, बात करना, साझा करना — ये अनुभव को समेटते हैं और भावना को जमीन पर लाते हैं।

5) चेतावनियाँ और नैतिक पहलू

  • सहमति (consent) सर्वोपरि — किसी भी प्रवेश से पहले दोनों पक्षों की स्वेच्छापूर्ण सहमति अनिवार्य है।

  • भावनात्मक सुरक्षा — कुछ अनुभव लोगों के लिए संवेदनशील हो सकते हैं — ट्रिगर या पुरानी चोटें हो सकती हैं; सावधानी रखें।

  • नशीले पदार्थ/दवाओं का प्रभाव — जब चेतना प्रभावित हो, तो “पूर्ण प्रवेश” और जिम्मेदारी कमजोर हो सकती है — साफ़ दिमाग बेहतर निर्णय देता है।

  • व्यक्तिगत सीमाएँ और सम्मान — हर किसी की सीमाएँ अलग होती हैं; “प्रवेश” तब ही सार्थक है जब संबंध का सम्मान बना रहे।

संक्षेप में — एक छोटा पर स्पष्ट अर्थ

यह पंक्ति एक आह्वान है: जब काम-आलिंगन आपको सिर्फ शारीरिक उत्तेजना से आगे, एक नाज़ुक प्राकृतिक कम्पन की तरह संदेश दे — तो उसे सिर्फ पारित होने न दें; उस कम्पन के भीतर जाकर पूरी तरह अनुभव मानो आत्मा-और-देह का एक-सोच वाला मिलन हो रहा हो। यह भोग से भी बड़ा — एक रूपांतरणकारी अनुभव बनने की क्षमता रखता है, बशर्ते वहाँ सहभागिता, शांति और सम्मान हो।


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ऐसे काम-आलिंगन में जब तुम्‍हारी इन्द्रियाँ पत्‍तों की भाँति काँपने लगें उस कम्पन में प्रवेश करो

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 ‘’ऐसे काम-आलिंगन में जब तुम्‍हारी इन्द्रियाँ 

पत्‍तों की भाँति काँपने लगें उस कम्पन में प्रवेश करो


।‘’


जब प्रेमिका या प्रेमी के साथ ऐसे आलिंगन में, 

ऐसे प्रगाढ़ मिलन में तुम्‍हारी इन्द्रियाँ 

पत्‍तों की तरह काँपने लगें, 

उस कम्पन में प्रवेश कर जाओ ।


तुम भयभीत हो गये हो ।

सम्भोग में भी तुम अपने शरीर को 

अधिक हलचल नहीं करने देते हो ।

क्‍योंकि 

अगर शरीर को भरपूर गति करने दिया जाए 

तो पूरा शरीर इसमें सँलग्‍न हो जाता है ।

तुम उसे तभी नियन्त्रण में रख सकते हो 

जब वह काम-केन्द्र तक ही सीमित रहता है ।

तब उस पर मन नियन्त्रण कर सकता है ।

लेकिन जब वह पूरे शरीर में फैल जाता है 

तब तुम उसे नियन्त्रण में नहीं रख सकते हो ।

तुम काँपने लगोगे ।

चीखने चिल्‍लाने लगोगे ।

और जब शरीर मालिक हो जाता है 

तो फिर तुम्‍हारा नियन्त्रण नहीं रहता ।


हम शारीरिक गति का दमन करते है । 

विशेषकर हम स्‍त्रियों को दुनिया भर में 

शारीरिक हलन-चलन करने से रोकते हैं । 

वे सम्भोग में लाश की तरह पड़ी रहती हैं ।

तुम उनके साथ जरूर कुछ कर रहे हो, 

लेकिन वे तुम्‍हारे साथ कुछ भी नहीं करतीं ।

वे निष्‍क्रिय सहभागी बनी रहती हैं ।

ऐसा क्‍यों होता है ?

क्‍यों सारी दुनिया में पुरूष स्‍त्रियों को इस तरह दबाते हैं ?


कारण भय है ।

क्‍योंकि एक बार अगर स्‍त्री का शरीर 

पूरी तरह कामाविष्‍ट हो जाए तो 

पुरूष के लिए उसे सन्तुष्ट करना बहुत कठिन है ।

क्‍योंकि 

स्‍त्री एक शृंखला में, एक के बाद एक अनेक बार 

ओर्गास्म के शिखर को उपलब्‍ध हो सकती है । 

पुरूष वैसा नहीं कर सकता ।

पुरूष एक बार ही 

ओर्गास्म के शिखर अनुभव को छू सकता है ।

स्‍त्री अनेक बार छू सकती है ।

स्‍त्रियों के ऐसे अनुभव के अनेक विवरण मिले हैं ।

कोई भी स्‍त्री एक शृंखला में 

तीन-तीन बार शिखर-अनुभव को प्राप्‍त हो सकती है ।

लेकिन पुरूष एक बार ही हो सकता है ।

सच तो यह है कि 

पुरूष के शिखर अनुभव से स्‍त्री 

और-और शिखर अनुभव को उत्‍तेजित होती है ।

तैयार होती है ।

तब बात कठिन हो जाती है ।

फिर क्‍या किया जाए ?


स्‍त्री को तुरन्त दूसरे पुरूष की जरूरत पड़ जाती है ।

और सामूहिक कामाचार निषिद्ध है ।

सारी दुनिया में हमनें 

एक विवाह वाले समाज बना रखे हैं ।

हमें लगता है कि स्‍त्री का दमन करना बेहतर है ।

फलत: अस्‍सी से नब्‍बे प्रतिशत स्‍त्रियाँ

शिखर अनुभव से वँचित रह जाती हैं ।

वे बच्‍चों को जन्‍म दे सकती हैं ।

यह और बात है ।

वे पुरूष को तृप्‍त कर सकती हैं ।

यह भी और बात है ।

लेकिन वे स्‍वयं कभी तृप्‍त नहीं हो पातीं ।

अगर सारी दुनिया की स्‍त्रियाँ 

इतनी कड़वाहट से भरी हैं, 

दुःखी है, 

चिड़चिड़ी है, 

हताश अनुभव करती हैं 

तो यह स्‍वाभाविक है ।

उनकी बुनियादी जरूरत पूरी नहीं होती ।


काँपना अद्भुत है ।

क्‍योंकि 

जब सम्भोग करते हुए तुम काँपते हो 

तो तुम्‍हारी ऊर्जा पूरे शरीर में प्रवाहित होने लगती है ।

सारे शरीर में तरँगायित होने लगती है ।

तब तुम्‍हारे शरीर का अणु-अणु 

सम्भोग में सँलग्‍न हो जाता है ।

प्रत्‍येक अणु जीवन्त हो उठता है ।

क्‍योंकि 

तुम्‍हारा प्रत्‍येक अणु काम अणु है ।


तुम्‍हारे जन्‍म में दो कास-अणु आपस में मिले 

और तुम्‍हारा जीवन निर्मित हुआ ।

तुम्‍हारा शरीर बना ।

वे दो काम अणु तुम्‍हारे शरीर में सर्वत्र छाये हैं । 

यद्यपि उनकी सँख्‍या अनन्त गुनी हो गयी है ।

लेकिन तुम्‍हारी बुनियादी इकाई काम-अणु ही है ।

जब तुम्‍हारा समूचा शरीर काँपता है 

तो प्रेमी प्रेमिका के मिलन के साथ-साथ 

तुम्‍हारे शरीर के भीतर प्रत्‍येक पुरूष-अणु 

स्‍त्री अणु से मिलता है ।

वह कम्पन यही बताता है ।

यह पशुवत मालूम पड़ेगा ।

लेकिन मनुष्‍य पशु है और 

पशु होने में कुछ गलती नहीं है ।


यह दूसरा सूत्र कहता है : 

‘’ऐसे काम-आलिंगन में 

जब तुम्‍हारी इन्द्रियाँ पत्‍तों की भाँति काँपने लगे ।‘’


मानो तूफान चल रहा है और वृक्ष काँप रहा है ।

उनकी जड़ें तक हिलने लगती हैं ।

पत्‍ता-पत्‍ता काँपने लगता है ।

यही हालत सम्भोग में होती है ।

कामवासना भारी तूफान है ।

तुम्‍हारे आर-पार एक भारी ऊर्जा प्रवाहित हो रही है ।

काँपो । 

तरँगायित होओ ।

अपने शरीर के अणु-अणु को नाचने दो ।

और इस नृत्‍य में दोनों के शरीरों को भाग लेना चाहिए ।

प्रेमिका को भी नृत्‍य में सम्‍मिलित करो ।

अणु-अणु को नाचने दो ।

तभी तुम दोनों का सच्‍चा मिलन होगा ।

और वह मिलन मानसिक नहीं होगा ।

वह जैविक ऊर्जा का मिलन होगा ।


‘’उस कम्पन में प्रवेश करो ।‘’


और काँपते हुए उससे अलग-थलग मत रहो ।

मन का स्‍वभाव दर्शक बने रहने का है ।

इसलिए अलग मत रहो ।

कम्पन ही बन जाओ ।

सब कुछ भूल जाओ और 

कम्पन ही कम्पन हो रहो ।

ऐसा नहीं कि तुम्‍हारा शरीर ही काँपता है ।

तुम पूरे के पूरे काँपते हो ।

तुम्‍हारा पूरा अस्‍तित्‍व काँपता है ।

तुम खुद कम्पन ही बन जाते हो ।

तब दो शरीर और दो मन नहीं रह जायेंगे ।

आरम्भ में दो कम्पित ऊर्जाएँ हैं और

अन्त में मात्र एक वर्तुल है ।

दो नहीं रहे ।


इस वर्तुल में क्‍या घटित होगा ।

पहली बात तो उस समय तुम 

अस्‍तित्‍वगत सत्‍ता के अंश हो जाओगे ।

तुम एक सामाजिक चित नहीं रहोगे ।

अस्‍तित्‍वगत ऊर्जा बन जाओगे ।

तुम पूरी सृष्‍टि के अँग हो जाओगे ।

उस कम्पन में तुम पूरे ब्रह्माण्ड के भाग बन जाओगे ।

वह क्षण महान सृजन का क्षण है ।

ठोस शरीरों की तरह तुम विलीन हो गये हो ।

तुम तरल हो कर एक दूसरे में प्रवाहित हो गये हो ।

मन खो गया ।

विभाजन मिट गया ।

तुम एकता को प्राप्‍त हो गये ।


यही अद्वैत है ।

और अगर तुम इस अद्वैत को अनुभव नहीं करते हो ।

अद्वैत का सारा दर्शन शास्त्र व्यर्थ है ।

वह बस शब्‍द ही शब्‍द है ।

जब तुम इस अद्वैत अस्‍तित्‍वगत क्षण को जानोंगे 

तो ही तुम्‍हें उपनिषद समझ में आयेंगे ।

और तभी तूम सन्तों को समझ पाओगे ।

कि जब वे 

जागतिक एकता की अखण्डता की बात करते हैं 

तो उनका क्‍या मतलब है ।

तब तुम जगत से भिन्‍न नहीं होगे ।

उससे अजनबी नहीं होगे ।

तब पूरा अस्‍तित्‍व तुम्‍हारा घर बन जाता है ।

और इस भाव के साथ कि पूरा अस्‍तित्‍व मेरा घर है ।

सारी चिन्ताएँ समाप्‍त हो जाती हैं ।

फिर कोई द्वन्द्व न रहा ।

सँघर्ष न रहा ।

सन्ताप न रहा ।


उसका ही लाओत्से ताओ कहते हैं :

शङ्कर अद्वैत कहते हैं ।

तब तुम उसके लिए कोई अपना शब्‍द भी दे सकते हो । 

लेकिन प्रगाढ़ प्रेम आलिंगन में ही 

उसे सरलता से अनुभव किया जाता है ।

लेकिन जीवन्त बनो, काँपो, कम्पन ही बन जाओ ।


ओशो 

तन्त्र-सूत्र - भाग - 3,

प्रवचन - 33

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सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

मानवता सुरक्षित रह सकती यदि प्रभावी कदम उठाए जाएं

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 बिलकुल, मैं “मानवता को बचाने और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने के लिए अगले 50 सालों में जरूरी कदम” की **ठोस और क्रमबद्ध सूची** बना देता हूँ। इसे तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: **सामाजिक, तकनीकी/वैज्ञानिक, और नैतिक/दार्शनिक कदम**।


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## 1. **सामाजिक कदम**


1. **सर्व शिक्षा अभियान और जागरूकता**


   * सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और Critical Thinking सिखाना।

   * सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी की समझ बढ़ाना।


2. **समानता और न्याय सुनिश्चित करना**


   * लैंगिक, आर्थिक और जातीय असमानताओं को कम करना।

   * गरीब और कमजोर वर्गों को अवसर देना।


3. **सामाजिक सहयोग और वैश्विक शांति**


   * देशों और समुदायों के बीच सहयोग बढ़ाना।

   * हिंसा और युद्ध के विकल्प के रूप में संवाद और कूटनीति को प्रोत्साहित करना।


4. **स्वस्थ जीवन और सार्वजनिक स्वास्थ्य**


   * हर व्यक्ति तक स्वास्थ्य सेवाएँ और पोषण सुनिश्चित करना।

   * मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान देना।


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## 2. **तकनीकी और वैज्ञानिक कदम**


1. **पर्यावरण संरक्षण और जलवायु नियंत्रण**


   * नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन, हाइड्रो) अपनाना।

   * जंगलों, जल स्रोतों और जैव विविधता की सुरक्षा।


2. **सुरक्षित और जिम्मेदार तकनीक**


   * AI, रोबोटिक्स और जैव प्रौद्योगिकी के सुरक्षित उपयोग पर नियंत्रण।

   * डेटा सुरक्षा और व्यक्तिगत गोपनीयता सुनिश्चित करना।


3. **वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार**


   * स्वास्थ्य, ऊर्जा, अंतरिक्ष और जलवायु क्षेत्र में अनुसंधान बढ़ाना।

   * प्राकृतिक आपदाओं और महामारी के लिए तैयारी।


4. **स्मार्ट शहर और जीवन संरचना**


   * शहरों को टिकाऊ, पर्यावरण के अनुकूल और तकनीकी रूप से सक्षम बनाना।


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## 3. **नैतिक और दार्शनिक कदम**


1. **सहानुभूति और सहयोग का विकास**


   * व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर दूसरों के लिए चिंता और सहायता बढ़ाना।

   * अहिंसा और सहिष्णुता को जीवन का हिस्सा बनाना।


2. **नैतिक शिक्षा और आदर्श**


   * बच्चों और युवाओं को नैतिक मूल्यों, ईमानदारी और जिम्मेदारी सिखाना।

   * समाज में विश्वास और पारदर्शिता को प्रोत्साहित करना।


3. **सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समृद्धि**


   * कला, संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से मानसिक और सामाजिक संतुलन बनाए रखना।


4. **सकारात्मक सोच और दीर्घकालिक दृष्टि**


   * केवल व्यक्तिगत लाभ की बजाय मानवता के दीर्घकालिक हित को प्राथमिकता देना।

   * भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए सतत सोच और योजना बनाना।


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### 🔹 निष्कर्ष


यदि ये कदम सच में लागू किए जाएँ, तो आने वाले 50 सालों में मानवता **न केवल जीवित रहेगी, बल्कि विकसित और नैतिक रूप से मजबूत भी होगी।**

इनमें **सामाजिक चेतना + तकनीकी समझ + नैतिक मूल्यों** का संतुलन सबसे महत्वपूर्ण 


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गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

क्या केवल सेक्स से ही बंधे रह सकते हैं स्त्री और पुरुष

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L "क्या केवल सेक्स से ही बंधे रह सकते हैं स्त्री और पुरुष?"


सेक्स यह शब्द सुनते ही बहुत से लोगों के मन में या तो एक तीव्र आकर्षण उत्पन्न होता है या फिर एक प्रकार का झिझक और संकोच। भारतीय समाज में यह विषय आज भी पूरी तरह से खुलकर नहीं बोला जाता, लेकिन यह मानवीय अस्तित्व का एक स्वाभाविक और आवश्यक हिस्सा है। परंतु जब यह प्रश्न उठता है कि क्या केवल सेक्स के आधार पर कोई संबंध टिक सकता है, या क्या एक महिला और पुरुष सिर्फ सेक्स के कारण ही जीवनभर एक-दूसरे से बंधे रह सकते हैं, तब यह मुद्दा केवल शारीरिक नहीं रह जाता यह मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक और यहां तक कि आत्मिक स्तर तक पहुंच जाता है।


मानव मनोविज्ञान की गहराई में उतरें तो यह स्पष्ट होता है कि सेक्स, रिश्तों का एक अभिन्न अंग ज़रूर हो सकता है, लेकिन यह रिश्ता बनाए रखने का इकलौता आधार नहीं हो सकता। शुरूआती आकर्षण चाहे जितना भी तीव्र क्यों न हो, समय के साथ उसका असर फीका पड़ता है। यह एक प्रकार का रसायन है, जो संबंध की शुरुआत में बहुत प्रभावशाली होता है, परंतु समय के साथ इसके प्रभाव को बनाए रखने के लिए भावनात्मक समझ, आपसी आदर और मानसिक सामंजस्य की आवश्यकता होती है।


सेक्स से जुड़े हार्मोन जैसे ऑक्सिटोसिन और डोपामिन, व्यक्ति को एक अस्थायी सुख और जुड़ाव का अनुभव जरूर कराते हैं। इन हार्मोनों के कारण दो व्यक्ति एक-दूसरे के बहुत करीब महसूस कर सकते हैं, लेकिन यह निकटता स्थायी तभी हो सकती है जब उनके बीच संवाद, समझ और भरोसा हो। एक रिश्ता, जिसमें केवल शारीरिक संबंध हैं, वह कुछ समय बाद खोखला लगने लगता है, क्योंकि इंसान केवल शरीर नहीं है वह भावनाओं, विचारों, उम्मीदों और आत्मीयता से भी बना है।


एक महिला जब किसी संबंध में होती है, तो सामान्यतः वह सेक्स के साथ-साथ सुरक्षा, स्नेह, समझदारी और सम्मान की अपेक्षा करती है। उसके लिए सेक्स केवल शारीरिक सुख नहीं होता, बल्कि एक गहराई से जुड़ा अनुभव होता है जिसमें वह अपना दिल खोलती है। यदि उसे लगे कि उसके साथ केवल शारीरिक उपयोग हो रहा है और भावनात्मक जुड़ाव नहीं है, तो वह बहुत जल्द उस संबंध से खुद को अलग कर सकती है, चाहे वह कितना भी आकर्षक क्यों न हो।


पुरुषों की बात करें, तो पारंपरिक रूप से समाज ने उन्हें यह सिखाया है कि वे सेक्स को एक प्रमुख आवश्यकता मानें। परंतु आज का पुरुष भी बदल रहा है। वह भी भावनात्मक समर्थन, समझ और अपनापन चाहता है। अकेले सेक्स उसे खुशी नहीं देता वह एक ऐसा रिश्ता चाहता है जिसमें उसे भी सुना जाए, समझा जाए और जहाँ वह अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त कर सके। यदि ऐसा नहीं होता, तो पुरुष भी उस संबंध से ऊबने लगता है।


अब यदि हम समाज और संस्कृति की बात करें, तो भारतीय सामाजिक व्यवस्था में सेक्स को हमेशा ही विवाह या लंबे रिश्ते के संदर्भ में देखा गया है। यहाँ सेक्स केवल दो शरीरों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्माओं और दो परिवारों के जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि जब कोई रिश्ता केवल सेक्स पर आधारित होता है, तो समाज उसे स्थायित्व नहीं देता, बल्कि उसे अस्वीकार कर देता है। यह सामाजिक अस्वीकार्यता कई बार मानसिक और भावनात्मक दबाव बनकर व्यक्ति को भी भीतर से तोड़ने लगती है।


आज के आधुनिक समय में, जब रिश्ते सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स के जरिए पलक झपकते ही बन और बिगड़ जाते हैं, तब यह सवाल और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। बहुत से लोग आज इस भ्रम में जी रहे हैं कि शारीरिक आकर्षण और नियमित सेक्स एक मजबूत रिश्ते की निशानी है। लेकिन जब जीवन की वास्तविक कठिनाइयाँ सामने आती हैं जैसे आर्थिक समस्याएं, मानसिक दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, या स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियाँ तब यह स्पष्ट हो जाता है कि केवल सेक्स किसी रिश्ते को टिकाए रखने में असमर्थ है।


इसके विपरीत, वे रिश्ते अधिक स्थायी सिद्ध होते हैं जिनमें संवाद होता है, एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र होती है, और दोनों साथी मिलकर एक-दूसरे के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं। जहाँ केवल सेक्स होता है, वहाँ उत्साह भले हो, परंतु स्थायित्व की गारंटी नहीं होती। वहाँ आकर्षण होता है, पर समर्पण नहीं। वहाँ उत्तेजना होती है, पर समझदारी नहीं।


एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इंसान की आवश्यकताएं समय के साथ बदलती हैं। बीस की उम्र में जो चीज़ें प्राथमिक लगती हैं, चालीस की उम्र में उनका महत्व कम हो जाता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, व्यक्ति सेक्स के बजाय companionship (साथ) की अधिक तलाश करने लगता है। वह चाहता है कि कोई ऐसा हो जो उसे बिना कहे समझे, जो उसकी चुप्पी में भी अर्थ तलाशे, और जिसके साथ वह बिना किसी दिखावे के जी सके। ऐसे में केवल सेक्स पर आधारित रिश्ता उसके लिए सतही और अधूरा हो जाता है।


यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो सेक्स के बिना भी गहराई से टिके रहते हैं। कुछ जीवनसाथी ऐसे भी होते हैं जो शारीरिक संबंधों के अभाव के बावजूद एक-दूसरे के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहते हैं, क्योंकि उनके बीच सम्मान, समझ और जीवन के प्रति समान दृष्टिकोण होता है। वहीं, कई बार यह भी देखा गया है कि बहुत अच्छे शारीरिक संबंधों के बावजूद रिश्ते टूट जाते हैं, क्योंकि उनमें वह भावनात्मक परिपक्वता और आपसी समझ नहीं होती।


इसलिए, निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सेक्स एक रिश्ता बनाने का माध्यम हो सकता है, लेकिन उसे बनाए रखने का आधार नहीं। यह रिश्ते को एक शुरुआत दे सकता है, लेकिन उसे जीवनभर की यात्रा में बदलने के लिए उसमें बहुत कुछ और चाहिए संवाद, समझ, संवेदना, साझेदारी और सबसे महत्वपूर्ण, एक-दूसरे के प्रति आत्मीयता और सम्मान। जब तक यह सारे तत्व एक साथ मौजूद न हों, तब तक कोई भी रिश्ता केवल सेक्स के आधार पर नहीं टिक सकता।


यह बात पुरुष और महिला दोनों पर समान रूप से लागू होती है। दोनों को चाहिए शारीरिक संतुष्टि के साथ मानसिक सुकून, आत्मिक जुड़ाव के साथ भावनात्मक गहराई। और जब यह संतुलन बनता है, तभी कोई रिश्ता वास्तव में पूर्ण, संतोषजनक और स्थायी बन पाता है। sabhar public authar Facebook 


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मंगलवार, 3 जून 2025

2050 तक मौत हमेशा के लिए टल सकती है

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 साइंटिस्ट्स का कहना है कि अगर कोई 2050 तक ज़िंदा रहा, तो वह मौत को हमेशा के लिए टाल सकता है! यह सुनकर भले ही आपको अविश्वसनीय लगे, लेकिन यह एक गंभीर वैज्ञानिक दावे की शुरुआत है। हाल के शोधों और विकासों के अनुसार, चिकित्सा और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में इतनी प्रगति हो सकती है कि इंसान अपनी जीवनकाल को बढ़ाने में सक्षम हो सकता है, और शायद एक दिन "अमरता" की सीमा तक पहुंच सकता है।


आजकल के वैज्ञानिक शोधों में जीवनकाल बढ़ाने के लिए कई उपायों पर काम हो रहा है, जैसे एंटी-एजिंग टेक्नोलॉजी, जीन थेरेपी, स्टेम सेल रिसर्च और क्लोनिंग। साथ ही, कुछ शोधकर्ता न्यूरो साइंस और बायोमेडिकल साइंस के उपयोग से मृत्यु को टालने के तरीकों पर काम कर रहे हैं, ताकि शरीर के विभिन्न हिस्सों में होने वाली जैविक प्रक्रिया को स्थिर किया जा सके।


हालांकि, अभी यह सभी विचार प्रयोगात्मक हैं और इनमें काफी समय और शोध की आवश्यकता है, लेकिन 2050 तक इस दिशा में संभावनाएं वाकई काफी बढ़ चुकी होंगी। यह दावा इस बात का भी संकेत देता है कि भविष्य में हम मानव जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचने से पहले उसे बढ़ा सकते हैं।


#Immortality #LifeExtension #AntiAging #FutureOfMedicine #Biotech #2025viralvideo

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गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

कोलेस्ट्रोल) हार्टअटैक,अर्जुन की छाल से ऐसे करे कण्ट्रोल

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 💥 खून में कचरा (Acidity) की वजह से आता है (कोलेस्ट्रोल) हार्टअटैक,अर्जुन की छाल से ऐसे करे कण्ट्रोल.....!!


बागभट्ट जी सुबह दूध पीने को मना करते हैं लेकिन जो सुबह हम चाय पीते हैं उसमें भी दूध का यूज होता है बाग़भट्ट जी के किसी भी सूत्र और शास्त्र में चाय का उल्लेख नहीं किया गया  क्योंकि बाग़भट्ट जी 3500 वर्ष पहले हुए और चाय 250 साल पहले अंग्रेजों के द्वारा लाई गयी ।


हाँ लेकिन उन्होंने काढ़े का जीक्र किया है वो कहते है जो काढ़ा हमारे वात पित्त और कफ को कम करे ऐसा कोई भी कड़ा सुबह दूध में मिलाकर पिया जा सकता है जैसे कि अर्जुन की छाल का काढ़ा वात को सबसे ज्यादा कम करता है यह रक्त की एसिडिटी को कम करता है जो की शरीर की एसिडिटी से भी ज्यादा खतरनाक होती है और हार्ट अटैक का कारण बनती है अर्जुन की छाल सबसे तेजी से रक्त की एसिडिटी को ख़त्म करता है इसलिए अर्जुन की छाल का काढ़ा पीयें


नवम्बर दिसम्बर जनवरी और फ़रवरी में वात सबसे ज्यादा होता है ठण्ड के दिनों में वायु का प्रकोप सबसे ज्यादा होता है और इस समय में अर्जुन की छाल का काढ़ा गर्म दूध में मिलकर पीयें तो औषधि का काम करेगा. याद रहे की यह काढे की तासीर हमेशा गर्म होती है इसलिए इसे ठण्ड के समय में ही प्रयोग करें हमारे देश में कोई भी ठंडा काढ़ा नही होता यदि आप सुबह दूध पीना ही चाहते है तो अर्जुन की छाल के काढे के साथ पीयें.


इससे आपको दो फायदे होंगे भविष्य में आपको हार्ट अटैक कभी नहीं होगा और अब तक आपने जो बेकार चीजें खाई हैं ये उसे शरीर से साफ़ कर देगा क्योंकि यह छाल का काढ़ा रक्त को साफ़ करता है और शरीर में सबसे ज्यादा कचरा(कोलेस्ट्रोल) रक्त में ही होता है


सबसे बड़ी बात तो ये है कि अर्जुन की छाल 100 रूपये किलो मिलती है, जो आप पंसारी की दुकान से ले सकते है और चाय 500 रूपये किलो मिलती है और 3000 रूपये किलो कॉफ़ी मिलती है इसलिए सुबह ठण्ड में चायकॉफी की जगह अर्जुन की छाल का काढ़ा दूध के साथ पीयें


किस तरह करें सेवन  

       एक गिलास दूध और आधा चम्मच अर्जुन की छाल का पाउडर और अगर इसमें गुड़ मिलायेंगे तो बहुत अच्छा यदि गुड़ न मिले तो   खांड या फिर बुरा(राजस्थान,बिहार,यू.पी. वाला चीनी वाला नहीं). ध्यान रहे चीनी का इस्तेमाल न करे अगर मिश्री मिले तो वह गुड़ से भी अच्छा होता है अगर सोंठ है तो उसे भी मिलाया जा सकता है जिससे वह और भी उत्तम क्वालिटी का बन जायेगा क्योंकि अर्जुन छाल और सोंठ दोनों ही वात नाशक है


जाने कौन से रोगों से मिलेगा छुटकारा

    इसे पीने से हड्डियों के समस्त विकार एवं शरीर में वात के सभी रोग जैसे घुटने का दर्द, कंधे का दर्द, डाईबीटीस, हार्ट अटैक ये सब वात के रोग हैं शांत हो जाते है। साभार Facebook 

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रविवार, 30 मार्च 2025

स्त्री के स्तनों से जुड़ा होता है स्त्री का सारा व्यक्तित्व

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 ईस्वर ने स्तन क्यों दिये....?


समझिये...


बिना स्तन कोई स्त्री की कल्पना व्यर्थ है..!!


इसे फैशन या दिखावा ना बनायें... और अगर दिखाना ही है तो आपका पति है दूसरे को क्यों दिखाना...?


स्त्री के स्तनों से जुड़ा होता है स्त्री का सारा व्यक्तित्व । जब तक स्त्री माँ नही बन जाती तब तक उसकी ऊर्जा पूर्णतः स्तनों तक नही पहुँचती..!!


शरीर शास्त्री ये प्रश्न उठाते रहते है। कि पुरूष के शरीर में स्तन क्यों होते है। जब कि उनकी कोई आवश्यकता नहीं दिखाई देती है। क्योंकि पुरूष को बच्चे को दूध तो पिलाना नहीं है। फिर उनकी क्या आवश्यकता है। वे ऋणात्‍मक ध्रुव है। इसलिए तो पुरूष के मन में स्त्री के स्तनों की और इतना आकर्षण है। वे धनात्‍मक ध्रुव है।


इतने काव्य, साहित्य, चित्र,मूर्तियां सब कुछ स्त्री के स्तनों से जुड़े है। ऐसा लगता है जैस पुरूष को स्त्री के पूरे शरीर की अपेक्षा उसके स्तनों में अधिक रस है। और यह कोई नई बात नहीं है। गुफाओं में मिले प्राचीनतम चित्र भी स्तनों के ही है। स्तन उनमें महत्‍वपूर्ण है। बाकी का सारा शरीर ऐसा मालूम पड़ता है कि जैसे स्तनों के चारों और बनाया गया हो। स्तन आधार भूत है।


क्‍योंकि स्तन उनके धनात्मक ध्रुव है। और जहां तक योनि का प्रश्न है वह करीब-करीब संवेदन रहित है। स्तन उसके सबसे संवेदनशील अंग है। और स्त्री देह की सारी सृजन क्षमता स्तनों के आस-पास है।


यही कारण है कि हिंदू कहते है कि जबतक स्त्री मां नहीं बन जाती, वह तृप्त नहीं होती। पुरूष के लिए यह बात सत्य नहीं है। कोई नहीं कहेगा कि पुरूष जब तक पिता न बन जाए तृप्त नहीं होगा। पिता होना तो मात्र एक संयोग है। कोई पिता हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है। यह कोई बहुत आधारभूत सवाल नहीं है। एक पुरूष बिना पिता बने रह सकता है। और उसका कुछ न खोये।


लेकिन बिना मां बने स्त्री कुछ खो देती है। क्योंकि उसकी पूरी सृजनात्मकता, उसकी पूरी प्रक्रिया तभी जागती है। जब वह मां बन जाती है। जब उसके स्तन उसके अस्तित्व के केंद्र बन जाते है। तब वह पूर्ण होती है। और वह स्तनों तक नहीं पहुंच सकती यदि उसे पुकारने वाला कोई बच्चा न हो।


तो पुरूष स्त्रियों से विवाह करते है ताकि उन्हें पत्नियाँ मिल सके, और स्त्रियां पुरूषों से विवाह करती है ताकि वे मां बन सकें। इसलिए नहीं कि उन्हें पति मिल सके। उनका पूरा का पूरा मौलिक रुझान ही एक बच्चा पाने में है जो उनके स्त्रीत्‍व को पुकारें।


पश्चिम में बच्चों को सीधे स्तन से दूध न पिलाने का फैशन हो गया है। यह बहुत खतरनाक है। क्योंकि इसका अर्थ यह हुआ कि स्त्री कभी अपनी सृजनात्‍मकता के केंद्र पर नहीं पहुंच सकेगी। जब एक पुरूष किसी स्त्री से प्रेम करता है तो वह उसके स्तनों को प्रेम कर सकता है। लेकिन उन्हें मां नहीं कह सकता।


केवल एक छोटा बच्चा ही उन्हें मां कह सकता है।


कृपया गलत कमेंट ना करें. 🙏🙏

साभार Facebook 

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सोमवार, 24 मार्च 2025

दुनिया का पहला अंतरिक्ष होटल "2027 में,

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 दुनिया का पहला अंतरिक्ष होटल "2027 में, पृथ्वी की कक्षा में खुलने की संभावना है। जिसका नाम 'वॉयेजर होटल' होगा। यह होटल 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगाएगा और इस होटल में लगभग 400 लोगों के ठहरने का इंतजाम होगा। इस होटल में बार, लाउंज, सिनेमा और स्पा जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद होंगी।"




#viralpost2025シ #facthubanup #viralpost2024 #viralphotochallenge #foodblogger #quotes #facts #couple #love #post Sweta Singh Vlogs Rupesh Kumar 

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