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शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

इंसान 2040 तक खोज निकालेगा एलियन

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न्यूयॉर्क। इंसान आगामी 25 वर्षो के अंदर अंतरिक्ष में एलियन निर्मित विद्युत चुंबकीय तरंगों का पता लगाकर कुशाग्र अलौकिक जीवन को खोज निकालने में सक्षम हो जाएगा। यह दावा एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने किया है।
कैलीफोर्निया के माउंटेन व्यू स्थित एसईटीआइ [सर्च फॉर एक्ट्राटरेस्ट्रियल इंटेलीजेंस] इंस्टीट्यूट के सेठ शोस्तक के अनुसार, 2040 या इसके बाद तक खगोलविद एलियन निर्मित विद्युत चुंबकीय तरंगों का पता लगाने के लिए तारा मंडलों की बारीकी से पर्याप्त जांच कर चुके होंगे। उन्होंने यह बात पिछले सप्ताह स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में नासा के 2014 अभिनव उन्नत अवधारणा विषयक संगोष्ठी में चर्चा के दौरान कही। स्पेस डॉट कॉम की रिपोर्ट के अनुसार, शोस्तक ने कहा कि मुझे लगता है कि हम इस प्रकार के प्रयोगों का इस्तेमाल कर दो दर्जन सालों के अंदर अलौकिक जीवन का पता लगा लेंगे।

उन्होंने कहा कि अभी तक कुछ हजार तारा मंडलों को देखने के बावजूद हमें अब से अगले 24 वर्षो तक हो सकता है कि दस लाख तारा मंडलों पर गौर करना होगा। कुछ पाने के लिए दस लाख की संख्या सही है। शोस्तक की यह भविष्यवाणी नासा के अंतरिक्ष दूरबीन केपलर की प्रगति पर आधारित है जिससे आकाशगंगा में मौजूद जीवन के योग्य ग्रहों के प्रमाण मिल चुके हैं। उनका विश्वास है कि पांच तारा मंडलों में से एक में कम से कम एक ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन की उत्पत्ति हो सकती है।

यहां एलियंस उतरते हैं


अंग्रेजी फिल्मों या हिंदी फिल्मों में आपने जादू और जोकर फिल्म में अक्षय कुमार के साथ एलियन को देखा होगा। ये सारे एलियन केवल पर्दे के लिए ही होते हैं और हम यह मानकर चलते हैं कि एलियंस का कोई अस्तित्व नहीं होता। आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि दुनिया में एक ऐसी भी जगह है जहां एलियन उतरते हैं और इसका प्रमाण भी है।
रूस में यूराल क्षेत्र एक ऐसी ही जगह है। माना जाता है कि यहां एलियंस उतरते हैं। इस रहस्यमय स्थल पर जाने वालों को अज्ञात और चमत्कारिक शक्तियों का आभास होता है। रूस का बरमूडा त्रिकोण कहलाने वाला पर्म जोन कई रहस्यमयी बातों के लिए जाना जाता है। कहते हैं यहां जाने वाला कोई भी बीमार व्यक्ति बिना इलाज के ठीक हो जाता है। यहां कुछ रहस्यमय आवाजें भी सुनाई देती हैं। यहां कई बार उड़नतश्तरियों को देखा गया है। अभी हाल में यहां एक विशालकाय उल्कापिंड भी गिरा था। यहां के निवासी यहां अंतरिक्ष यानों के उतरने की बात करते हैं। अभी तक कोई भी देश इस रहस्यमय स्थान के रहस्यों से पर्दा नहीं उठा पाया है। sabhar :http://www.jagran.com/

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अब जूते बताएंगे सही रास्ता

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 GPS-enabled smart sports shoes



यह भी बताते हैं कि कितनी कैलरी खर्च हुई।




ये खास जूते सितंबर से बिक्री के लिए बाजार में आएंगे। इनमें ब्लूटूथ ट्रांसरिसीवर लगा है जो पहनने वाले के स्मार्टफोन के ऐप से जुड़ा है। गूगल मैप के जरिए जूते सही दिशा बताने के लिए वाइब्रेट करते हैं और यूजर को बताते हैं कि दांएं या बाएं किस ओर मुड़ना है। 

इस तरह के जूते बनाने का आइडिया 30 वर्षीय क्रिस्पियान लॉरेंस और 28 साल के अनिरुद्ध शर्मा को आया। जूते की कीमत 6,000 से लेकर 9,000 रुपये के बीच है। 2011 में दोनों ने एक अपार्टमेंट से छोटी सी टेक कंपनी की स्थापना की और अब इसमें 50 लोग काम करते हैं। लॉरेंस बताते हैं, हमें यह विचार आया और हमने महसूस किया कि यह नेत्रहीन लोगों के लिए काफी मददगार साबित होंगे, यह बिना ऑडियो और फिजिकल डिस्ट्रैक्शन के काम करेगा।
sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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गुरुवार, 4 सितंबर 2014

छिपकली की पूंछ जैसे उगेंगे मनुष्य के अंग!

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न्यूयॉर्क। अपनी विशेषता के कारण प्राचीन समय से मानव जाति के लिए आकर्षण का केन्द्र रही है। विदित हो कि छिपकली की पूंछ का अपने आप अलग हो जाना और फिर इसके स्थान पर नई पूंछ उग आना मनुष्य के लिए कौतूहल का विषय रहा है।

लेकिन, अब ऐसा दावा किया जा रहा है कि वैज्ञानिकों ने अब इस पहेली का रहस्य सुलझा लिया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्हें इस बात की जानकारी हो गई है कि आखिर कैसे छिपकली नई पूंछ उगा सकती है। वैज्ञानिकों ने वह आनुवांशिक नुस्खा खोज निकाला है जो छिपकली में अंग के पुनर्निर्माण के लिए जिम्मेदार होता है। 

अमेरिका की एरीजोना स्टेट यूनिवर्सिटी में लाइफ साइंसेज की प्रोफेसर डॉ. केनरो कुसुमी का कहना है किछिपकली में भी 326 वही जीन होते हैं जो मनुष्यों में भी पाए जाते हैं। वे मनुष्यों की शारीरिक संरचना से सबसे ज्यादा मेल खाने वाले जीव हैं। जर्नल 'पीएलओएस वन' में बीस अगस्त को प्रकाशित शोध में कहा गया है कि इस खोज से कई रोगों को ठीक करने में मदद मिल सकती है। 

इस आनुवांशिक नुस्खे का पता लगाकर उन्हीं जीन को मानव कोशिका में आरोपित कर उपास्थि, मांसपेशी और रीढ़ की हड्डी की पुनर्संरचना भविष्य में संभव हो सकती है और इस तरह से मनुष्यों में आर्थराइटिस (गठिया वात) जैसी बीमारी को समाप्त किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि अपनी फिर से उगाई गई पूंछ में छिपकली बहुत सारे कार्टिलेज उगाती है और इसी प्रक्रिया को सक्रिय करके मनुष्यों के घुटनों में नए कार्टिलेज उगाए जा सकेंगे
साभार :http://hindi.webdunia.com/

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बुधवार, 3 सितंबर 2014

गूगल ड्रोन बदल देंगे दुनिया

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गूगल की गुप्त रिसर्च लैब ऐसे ड्रोन डिजाइन करने की कोशिश कर रही है जो शहर के यातायात से बचते हुए लोगों तक माल तेजी से पहुंचा दे. इंटरनेट कंपनी गूगल ग्लास और स्मार्ट वॉच बाजार में पेश कर चुकी है.
USA Google
महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की घोषणा के बाद गूगल और अमेजन डॉट कॉम में तकनीकी रेस और तेज हो जाएगी. अमेजन कुछ महीनों पहले से ड्रोन के जरिए ग्राहकों तक पैकेट पहुंचाने का प्रयोग कर रहा है. अमेजन अमेरिका की सबसे बड़ी ऑनलाइन रिटेल कंपनी है. ऑनलाइन वीडियो, डिजिटल विज्ञापन और मोबाइल कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्र में अमेजन गूगल के सामने बड़ी चुनौती है. इस रेस में एप्पल भी शामिल है.
गूगल ने अपने ड्रोन बिजनेस को प्रोजेक्ट विंग नाम दिया है. हालांकि गूगल को उम्मीद है कि ड्रोन के बेड़े को पूरी तरह से तैयार होने में कई साल लगेंगे, कंपनी का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया में ड्रोन ने टेस्ट फ्लाइट्स में फर्स्ट एड किट, चॉकलेट और दो किसानों को पानी पहुंचाया. हवाई प्रौद्योगिकी में महारत हासिल करने के साथ ही गूगल और अमेजन को कई देशों में ड्रोन उड़ाने के लिए सरकारी इजाजत चाहिए होगी.
अमेरिकी कंपनी अमेजन ने देश के संघीय उड्डयन प्रशासन से ड्रोन परीक्षण के विस्तार की इजाजत मांगी थी, प्रशासन फिलहाल शौकिया ड्रोन उड़ाने वालों और मॉडल एयरक्राफ्ट बनाने वाले को ड्रोन उड़ाने की इजाजत देता है. लेकिन व्यावसायिक इस्तेमाल पर ज्यादातर प्रतिबंध ही है.
प्रोजेक्ट विंग गूगल की एक्स लैब से निकलने वाला सबसे ताजा प्रोजेक्ट है, इसी लैब से बिना स्टीयरिंग वाली कार भी निकली है. यही नहीं इसी लैब में गूगल ग्लास भी तैयार हुआ है. लेकिन समय समय पर निजता के हनन पर गूगल ग्लास आलोचना झेलता रहा है.
ड्रोनों की मदद से गूगल अपनी वर्तमान सेवा को विस्तार दे सकता है. इनके जरिए ऑनलाइन चीजें खरीदने वालों को ऑर्डर के ही दिन माल मिल जाएगा. गूगल अभी भी सैन फ्रांसिस्को, लॉस एजेंल्स के और न्यूयॉर्क के कुछ हिस्सों में कारों के जरिए उसी दिन माल पहुंचाने की सेवा मुहैया करवा रहा है. प्रोजेक्ट विंग के बारे में गूगल ने अपनी किताब में लिखा, "भेजे जाने वाले सामान के लिए खुद उड़ने वाले ड्रोन एकदम नया दृष्टिकोण सामने लाएंगे. आज मौजूद सेवाओं की तुलना में इसमें ऐसे विकल्प होंगे जो तेज, सस्ते, कम बर्बादी करने वाले और पर्यावरण के लिए संवेदनशील होंगे."
sabhar :http://www.dw.de/

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मंगलवार, 2 सितंबर 2014

स्मरण शक्ति में सुधार

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बहुत अधिक संख्या में ऐसे लोग हैं जो प्राय: अपनी कमजोर स्मरण क्षमता को लेकर चिंतित रहते हैं। जब वे किसी का पक्ष या सामने वाले व्यक्ति का नाम तक भूल जाते हैं तो उन्हें और भी बुरा लगता है। ऐसा उनके साथ भी होता है, जिनके पास पहले अच्छी स्मरण शक्ति थी। हमें याद रखना चाहिए कि स्मरण शक्ति एक बैंक की तरह है। यदि इसमें कुछ डालेंगे, तभी तो निकाल सकेंगे।
यह मान कर चलें कि आपकी स्मरण शक्ति तीव्र है, स्वयं से सकारात्मक अपेक्षा रखें। यदि मानेंगे कि आपका दिमाग काम नहीं करता, याददाश्त हाथ से निकल गई है तो दिमाग भी यही मानने लगेगा। हमारी स्मरण शक्ति इस बात पर भी निर्भर करती है कि आपने पहले किसी घटना को कितनी रुचि व महत्व दिया है। जब हम किसी व्यक्ति या घटना से आकर्षित होते हैं तो उस पर अधिक ध्यान देते हैं। तब ऐसे व्यक्ति या घटना को याद करना आसान हो जाता है।
अच्छी स्मरण शक्ति स्कूल, कॉलेज व जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काम आती है। इसकी मदद से हम नई व उन्नत तकनीकों तथा परिवर्तनों को तेजी से आत्मसात कर पाते हैं। कंप्यूटर में कोई चिप या सॉफ्टवेयर लगा कर उसकी मैमरी सुधार सकते हैं। मस्तिष्क की संरचना कंप्यूटर से कहीं जटिल है, इसके साथ ऐसा नहीं हो सकता।
जिस तरह व्यायाम से शारीरिक क्षमता सुधारी जा सकती है, उसी तरह मस्तिष्क व स्मरण शक्ति में भी सुधार लाया जा सकता है।
शरीर की तरह मस्तिष्क की फिटनेस भी महत्व रखती है। अच्छी स्मरण शक्ति हमें मानसिक रूप से सजग रखती है। यह एक पुरानी कहावत है कि ‘पुराने कुत्ते को नई ट्रिक नहीं सिखा सकते’। वैज्ञानिकों का दावा है कि मस्तिष्क के मामले में ऐसा नहीं है।
मानव मस्तिष्क वृद्धावस्था में भी परिवर्तन के अनुसार समायोजित होने की अद्भुत क्षमता रखता है। इस योग्यता को ‘न्यूरोप्लास्टीसिटी’ कहते हैं। उचित उत्तेजना से यह नए ‘न्यूरल पाथवे’ बना सकता है, मौजूदा स्नायु में बदलाव लाया जा सकता है तथा नए तौर-तरीकों के हिसाब से समायोजन कर, प्रतिक्रिया दे सकता है।
मैमरी या स्मरण शक्ति में सुधार के उपाय निम्नलिखित हैं: अपनी नींद पूरी लें। नींद पूरी होने पर ही मस्तिष्क पूरी क्षमता से कार्य कर पाता है। नींद पूरी न होने का अर्थ होगा कि हम अपनी रचनात्मकता, समस्या-समाधान की योग्यता व आलोचनात्मक चिंतन कौशल से समझौता कर रहे हैं। हम सभी कम समय व अधिक कार्यो के तथ्य से प्रभावित हैं। मैमरी के लिए नींद भी बहुत महत्वपूर्ण है।
अध्ययन यह भी दर्शाते हैं कि गहरी नींद के दौरान स्मृति में सुधार की गतिविधियां भी होती हैं। नींद की कमी एक भयंकर अभाव हो सकती है।
हमें अच्छी नींद व व्यायाम को नहीं भूलना। सेहत ठीक होगी तभी स्मृति भी अच्छी होगी। जब हम व्यायाम करते हैं तो वह शरीर के साथ-साथ मन के लिए भी होता है। व्यायाम सहायक मस्तिष्क कैमिकलों के प्रभाव में वृद्धि व सुरक्षा करता है।
अध्ययन यह भी कहते हैं कि अच्छे सार्थक संबंध व मजबूत समर्थन तंत्र न केवल भावनात्मक सेहत के लिए अच्छा है, बल्कि मस्तिष्क की सेहत के लिए भी अच्छा माना जा सकता है।
पब्लिक हेल्थ के हेवर्ड स्कूल के अध्ययन के अनुसार पाया गया कि सक्रिय सामाजिक जीवन जीने वालों की स्मरण क्षमता का बहुत कम ह्रास हुआ था। एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। जीवन के प्रति सकारात्मक रवैया, हंसने व अपने पर भी हंसने की क्षमता को मैमरी में सहायक माना जा सकता है। क्रॉसवर्ड हल करने व मैमरी गेम खेलने से भी दिमाग तेज होता है।
कुछ लोग अच्छी याददाश्त का दावा करते हैं, किन्तु फिर भी उन्हें छोटे टेप-रिकॉर्डर व ई-मेल रिमाइंडर जैसी चीजों के साथ-साथ याद करने का अभ्यास भी अपनाना चाहिए।
हमारे जीवन में समय-समय पर, विभिन्न पदों के अनुसार अच्छी स्मरण शक्ति की आवश्यकताओं में परिवर्तन आता रहता है। एक छात्र होने के नाते हमारे लिए आंकड़े व तिथियां याद करना अनिवार्य था, ताकि हम परीक्षा में अच्छे अंक पा सकें। नौकरी में आने के बाद ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं रही।
हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि बेकार के आंकड़ों, लक्ष्यों व जानकारी से मैमरी पर अतिरिक्त भार न डालें। अच्छी याददाश्त वालों के पास कुछ ऐसी आदतें होती हैं, जिन्हें हम भी विकसित कर सकते हैं। मदिरा के सेवन से बचें, यह मस्तिष्क की कार्य क्षमता व स्नायु क्षमता को प्रभावित करती है।
टी.वी. देखने की बजाय पुस्तकें पढ़ें। माना जाता है कि मछली जैसे खाद्य पदार्थ व चाय-कॉफी के सीमित मात्रा में सेवन से दिमाग को सजग व चुस्त बना सकते हैं, स्मरण शक्ति में सुधार ला सकते हैं। अपने आंकड़ों को परस्पर संबद्ध करने की कला सीखें। पंजाब में कुछ याद रखने के लिहाज से, कपड़े के छोर में गांठ बांध ली जाती है। यह आंकडमें को संबद्ध करने का देहाती उपाय है।
जो कुछ देखा हो, मन ही मन उसको दोहराएं फिर वास्तविक वस्तु से अपने तथ्यों की तुलना करें। फिर पता चलेगा कि आपको कितना याद रहा। दोहराने से वह तथ्य स्मृति में बस जाएगा।
याद रखें कि शरीर की तरह मस्तिष्क की फिटनेस भी महत्व रखती है। अच्छी स्मरण शक्ति हमें मानसिक रूप से सजग रखती है। यह एक पुरानी कहावत है कि ‘पुराने कुत्ते को नई ट्रिक नहीं सिखा सकते’। वैज्ञानिकों का दावा है कि मस्तिष्क के मामले में ऐसा नहीं है।
(डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित माइंड पॉजिटिव, लाइफ पॉजिटिव से साभार)

sabhar :http://www.livehindustan.com/

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शनिवार, 30 अगस्त 2014

दिमाग की तरंगों से फ्रांस भेजा संदेश

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photo googal

मोबाइल या इंटरनेट को भूल जाइए, जल्द आप मस्तिष्क के जरिए दोस्तों और सहकर्मियों को संदेश भेज सकेंगे। वैज्ञानिकों ने तकनीक के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए मस्तिष्क से संदेश भेजने का सफल प्रयोग किया है।
इस प्रयोग में एक भारतीय व्यक्ति ने फ्रांस में मौजूद अपने साथी को मस्तिष्क की तरंगों के जरिए संदेश भेजा है। स्पेन के तीन और फ्रांस के एक वैज्ञानिक संस्थान के शोधकर्ता इस प्रयोग पर काम कर रहे हैं।
प्लस वन जर्नल में प्रकाशित शोध रिपोर्ट के मुताबिक यह प्रयोग मस्तिष्क तंरग संवेदी मशीन पर आधारित था। इससे पहले मस्तिष्क तंरगों से कंप्यूटर गेम खेलने और हेलीकॉप्टर को नियंत्रित करने जैसे प्रयोग हुए हैं, लेकिन पहली बार इसका इस्तेमाल दो मस्तिष्कों के बीच संदेश भेजने में किया गया।
ऐसे किया प्रयोगजब हम कुछ सोचते हैं, तो मस्तिष्क में मौजूद न्यूरॉन धीमी विद्युत तरंगों को जन्म देता है। इलेक्ट्रोएनसेफ्लोग्राफी (ईईजी) मशीन इन विद्युत तरंगों को रिकॉर्ड करने में सक्षम होती है। प्रयोग के दौरान भारतीय ने दो शब्द सोचे ‘होला’ और ‘सिआ’। होला फ्रेंच शब्द है, जिसका अर्थ है हैलो। वहीं स्पैनिश शब्द सिआ अभिवादन में इस्तेमाल होता है। ईईजी ने इसे रिकॉर्ड किया और एक कंप्यूटर ने अपनी बाइनरी भाषा में बदल दिया। यह संदेश इंरटनेट से रिसीवर के पास पहुंचा। रिसीवर के मस्तिष्क से जुड़ी मशीन ने संदेश को डिकोड कर दिया, जिससे वह इसे सफलतापूर्वक समझ सका।

sabhar : http://www.livehindustan.com/

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गुरुवार, 28 अगस्त 2014

अन्यग्रहवासियों से मुलाक़ात ज़रूर होगी : रूसी अंतरिक्ष-यात्री

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अन्यग्रहवासियों से मुलाक़ात ज़रूर होगी : रूसी अंतरिक्ष-यात्री

अंतरिक्ष में पृथ्वी की परिधि पर उपस्थित अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष-स्टेशन में काम कर रहे रूसी अंतरिक्ष-यात्री गेन्नादी पदालका का कहना

अंतरिक्ष में पृथ्वी की परिधि पर उपस्थित अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष-स्टेशन में काम कर रहे रूसी अंतरिक्ष-यात्री गेन्नादी पदालका का कहना है कि भविष्य में मानव की मुलाक़ात दूसरे ग्रह के निवासियों से ज़रूर होगी।
चीन के प्रमुख टेलीविजन चैनल पर दर्शकों के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि इस ब्रह्माण्ड में अकेले सिर्फ़ मानवजाति ही रहती हो।
गेन्नादी पदालका ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने पहले से ही अन्यग्रहवासी से मुलाक़ात होने पर उसके साथ सम्पर्क और व्यवहार की हिदायतें तैयार कर रखी हैं। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि ये हिदायतें कैसी हैं।
sabhar :http://hindi.ruvr.ru/

और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2012_06_19/78619378/

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नैनोकण निकालेंगे तर्कसंगत निष्कर्ष

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नैनोकण निकालेंगे तर्कसंगत निष्कर्ष

रूसी विशेषज्ञ अब मेडिकल नैनोरोबोट बनाने की कगार पर पहुँच गए हैं| उन्होंने नैनो और सूक्ष्मकणों को जैव-रासयनिक प्रतिक्रियाओं (बायोकेमिकल रिएक्शनों) की मदद से तर्कसम्मत निष्कर्ष निकालना सिखा दिया है| यह नई पीढी के डाक्टरी उपकरणों की मदद से जैव-प्रक्रियाओं का विश्वसनीय संचालन करने का रास्ता है| ऐसे उपकरण आवश्यक औषधियां ठीक समय पर और ऐन सही ठिकाने पर शरीर में पहुंचाएंगे|

ये नैनोरोबोट निर्धारित ठिकाने पर “जादुई गोलियां” “दागेंगे”| स्नाइपरों की तरह बिलकुल सही निशाना लगाने वाली जैव-संरचनाओं (बायोस्ट्रक्चरों) को ही वैज्ञानिक ऐसी “जादुई गोलियां” कहते हैं| ये मानव-शरीर में अणुओं के स्तर पर बिलकुल सही समय पर और सही स्थान पर आवश्यक औषधि पहुंचा सकती हैं| इस प्रकार मानव-शरीर का “संचालन” किया जा सकेगा और उसमें आनेवाली समस्याएं शीघ्रातिशीघ्र हल की जा सकेंगी, साथ ही इस प्रकार मानव-शरीर पर कोई कुप्रभाव भी नहीं पड़ेगा| |
रूसी वैज्ञानिकों के दल ने वस्तुतः ऐसे “स्नाइपरी” डाक्टरी उपकरण बना लिए हैं| रूसी विज्ञानं अकादमी के बायो-ऑर्गनिक कैमिस्ट्री इन्स्टीट्यूट और सामान्य भौतिकी इन्स्टीट्यूट तथा मास्को के भौतिकी-तकनीकी इन्स्टीट्यूट के विशेषज्ञ जैव-अणुओं की सहायता से गणनाओं की विधि विकसित कर रहे हैं जिसे बायोकम्प्यूटिंग का नाम दिया गया है| इसकी मदद से नैनोरोबोटों को यह सिखाया जा सकेगा कि कैसी स्थिति होने पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए|
रूसी टीम ने जो रास्ता अपनाया है उसकी खासियत यह है कि यहाँ बायोकम्प्यूटिंग कोशिकाओं (सेलों) के भीतर नहीं, उनके बाहर होती है| ऐसा करना कहीं अधिक जटिल है| कोशिकाओं के भीतर तो कोशिकाओं के जैव-अणु तत्वों (उदाहरण के लिए डीएनए) का उपयोग किया जा सकता है, किंतु कोशिकाओं से बाहर ऐसी कोई नैसर्गिक संरचनाएं (नेचुरल स्ट्रक्चर) नहीं हैं जो गणनाएँ करने, निष्कर्ष पर पहुँचने में मदद दे सकें| किंतु कोशिका-इतर बायोकम्प्यूटिंग से ही “जादुई गोली” बन सकती है जोकि शरीर की दृष्टि से एक बाहरी “उपकरण” है किंतु इसके बावजूद वही ऊतकों (टीशू) पर सबसे सही तरीके से प्रभाव डालता है|
रूसी प्रोजेक्ट में नैनोकण अपनी गणनाओं के लिए अपनी बाहरी परत से काम लेते हैं जिसकी संरचना ख़ास तौर पर चुनी जाती है| बाहरी पदार्थों के सम्पर्क में आने पर इस परत की प्रतिक्रया अलग-अलग होती है| इन पदार्थों के अणु तर्कसंगत क्रियाओं के लिए संकेतों का काम करते हैं – निश्चित संकेत मिलने पर नैनोकण पहले से तय एल्गोरिथम के अनुसार निश्चित कार्य करते हैं|
यह पहला ऐसा प्लेटफार्म है जो कोई भी तर्कसंगत फंक्शन पूरा कर सकता है, नेचर नैनोटेक्नोलॉजी पत्रिका ने लिखा है|
sabhar :http://hindi.ruvr.ru/

और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2014_08_26/276373886/

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मंगलवार, 26 अगस्त 2014

टेलिपैथी

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एक समय पहले जब विज्ञान और तर्कशास्त्र जैसे विषयों तक सामान्य जनता की पहुंच नहीं थी तब तक हर क्रिया को चमत्कार ही समझा जाता था. लेकिन अब विज्ञान के आविष्कारों और स्थापनाओं ने चमत्कार के सिद्धांत को पूरी तरह नकार दिया है और यह साबित कर दिया है कि सूरज के चमकने से लेकर पृथ्वी पर होने वाली हर हलचल, यहां तक कि इंसानी जीवन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी घटना के तार विज्ञान के साथ जुड़े हैं ना कि चमत्कार के साथ.


telepathy
विज्ञान के आविष्कार ने हमारे जीवन को सहज बना दिया है और इसके कई फायदे भी हैं लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं और विज्ञान भी इन सबसे बच नहीं पाया है. टेलिपैथी, विज्ञान की ही एक विधा है, जिसके अंतर्गत शारीरिक रूप से एक दूसरे से मीलों दूर बैठे लोग भी मानसिक रूप से एक दूसरे तक संदेश पहुंचा सकते हैं. टेलिपैथी की सहायता से आप किसी भी व्यक्ति को अपने अनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं और सबसे खास बात है कि आप दोनों की बात किसी तीसरे के कानों तक नहीं पहुंचेगी.



टेलिपैथी के फायदे बहुत हैं लेकिन आज हम आपको इस विधा से जुड़ी एक ऐसी घटना से अवगत करवाने जा रहे हैं जब तुर्की के चार इंजीनियरों ने आत्महत्या कर ली थी और आश्चर्यजनक रूप से इन चारों ही आत्महत्याओं का कारण टेलिपैथी को बताया गया.


telepathy
संदिग्ध रूप से हुई इन चारों आत्महत्याओं की जब जांच-पड़ताल शुरू हुई तो इनके पीछे का कारण टेलिपैथी को पाया गया. ऐसा माना गया कि किसी ने इन चारों इंजीनियरों को टेलिपैथी के जरिए पहले अपने वश में किया और फिर बाद में उन्हें आत्महत्या करने के लिए उकसाया. इनपर टेलिपैथी का प्रयोग इतना असरदार था कि वह अपने कानों में गूंजने वाली आवाज को अनसुना नहीं कर पाए और बिना सोचे-समझे मौत को गले लगा लिया.



यह घटना 2006-2007 की है लेकिन टेलिपैथी के प्रयोग के किस्से पुराणों में भी पढ़े जाते हैं, जहां बिना किसी यंत्र के सिर्फ विचारों के संप्रेषण के जरिए ही अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई जाती थी. पहले इसे चमत्कातर का नाम दिया जाता था लेकिन अब यह स्पष्ट रूप से विज्ञान का ही एक नमूना साबित हुई है. आपको बता दें कि टेलिपैथी में मनुष्य शरीर की पांचों इन्द्रियों का कोई भी प्रयोग नहीं किया जाता बल्कि छठी इन्द्री को विकसित कर टेलिपैथी का उपयोग किया जाता है जो किसी भी रूप में आसान नहीं है.

telepathy

भारत में टेलिपैथी की विधा बहुत पुरानी है, हमारे शास्त्रों में इसका जिक्र मिलता है लेकिन आधुनिक युग में टेलिपैथी को जन सामान्य तक पहुंचाने का श्रेय फ्रेड्रिक डब्ल्यू एच मायर्स को जाता है जिन्होंने वर्ष 1882 में विचार संप्रेषण की इस विधा को जन टेलिपैथी का नाम दिया.


आपको शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि कछुआ इकलौता ऐसा जीव है जिसे इस विधा में महारत हासिल है, मादा कछुआ अपने अंडों से मीलों दूर से भी संपर्क साध सकती है इतना ही नहीं जब अंडों में से बच्चे निकलने का समय नजदीक आने लगता है तो वह अपने बच्चों के पास चली जाती है. सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि मादा कछुआ को अगर कुछ हो जाए तो अंडों में मौजूद उसके बच्चे भी मर जाते हैं.sabhar :http://infotainment.jagranjunction.com/

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सोमवार, 25 अगस्त 2014

जापान करेगा इबोला का इलाज

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अफ्रीकी देशों में इबोला महामारी के बढ़ते संकट के बीच जापान ने कहा है कि उसने इबोला का इलाज ढूंढ निकाला है और विश्व स्वास्थ्य संगठन की मांग पर दवाएं मुहैया कराने के लिए तैयार है.



जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव योशिहिदे सूगा ने सोमवार को पत्रकारों से कहा कि कंपनी फुजीफिल्म होल्डिंग्स कॉरपोरेशन की एक शाखा ने इंफ्लुएंजा की दवा तैयार की है, जिसे इबोला के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. फैवीपीरावीर नाम की इस दवा को मार्च में ही जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने मंजूरी दे दी थी.
फुजीफिल्म के प्रवक्ता ताकाओ आओकी ने बताया कि इबोला और इंफ्लुएंजा एक ही तरह के वायरस से फैलते हैं, इसलिए दोनों वायरस पर इस दवा का असर दिख सकता है. उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला में चूहों पर टेस्ट किए जा चुके हैं और नतीजे सकारात्मक रहे हैं.
कंपनी का कहना है कि उसके पास 20,000 मरीजों के लिए दवा मौजूद है और वह डब्ल्यूएचओ के जवाब का इंतजार कर रही है. साथ ही कंपनी अमेरिका की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के साथ भी संपर्क साधे हुए है. फुजीफिल्म का कहना है कि डब्ल्यूएचओ के जवाब से पहले अगर लोगों ने निजी तौर पर दवा की मांग शुरू की, तो वह उसके लिए भी तैयार है.
हाल ही में अमेरिका में जेडमैप नाम की दवा से दो लोगों का इलाज हुआ है. इस दवा को सैन डिएगो मैप नाम की कंपनी ने विकसित किया है और यह अभी भी प्रयोग के स्तर पर ही इस्तेमाल की जा रही है. इसी तरह की कई दवाएं दुनिया भर में विकसित की जा रही हैं और इबोला के मामले में डब्ल्यूएचओ का कहना है कि लोगों की जान बचाने के लिए किसी भी तरह की एक्सपेरिमेंटल दवा का इस्तेमाल नैतिक है.
अफ्रीका में इबोला का प्रकोप सबसे ज्यादा देखा जा रहा है. इस साल यह खतरनाक वायरस 1,400 लोगों की जान ले चुका है.
आईबी/एमजे (एएफपी)

sabhar :DW.DE

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रविवार, 24 अगस्त 2014

एचआईवी का टीका बनाने के करीब पहुंचे वैज्ञानिक

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एचआईवी का टीका बनाने के करीब पहुंचे वैज्ञानिक

न्यूयॉर्क: शोधकर्ताओं ने विशेष एचआईवी एंटीबॉडिज (रोग-प्रतिकारक) के नए गुणों का खुलासा करने में सफलता पाई है, जिसे ब्रॉडली न्यूट्रालाइजिंग एंटीबॉडिज (बीएनए) कहा जाता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि इस खुलासे से हम एचआईवी का टीका बनाने के एक कदम और पास पहुंच गए हैं। बीएनए का विकास एचआईवी के टीके का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। एचआईवी से संक्रमित कुछ ही लोगों में बीएनए का निर्माण होता है। बीएनए की सहायता से टीका बनाना प्रमुख उद्देश्य है। इसकी सहायता से टीकाकरण के बाद वही सुरक्षा एचआईवी से मिलेगी, जैसा अन्य बीमारियों में टीकाकरण के बाद मिलता है।
अमरीका में बॉस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर थॉमस केप्लर ने कहा, इस परिणाम से स्पष्ट होता है कि बीएनए टीके का विकास संभव है। उल्लेखनीय है कि एंडिबॉडी प्रतिरक्षण बी कोशिकाओं से बनती है। जब बी कोशिकाएं किसी एंटीजेंस (रोगाणु) के संपर्क में आती है, तो उसकी रचना में परिवर्तन आ जाता है, जो एंटिजेंस के लिए घातक होता है। इस परिवर्तन को इंडेल" कहा जाता है।
शोधकर्ताओं ने एक विशेष बीएनए का अध्ययन किया, जिसे सीएच 31 कहते हैं। इसमें काफी ज्यादा मात्रा में इंडेल पाया गया। जिसका अर्थ है कि इसमें रोगाणुओं से लड़ने की असीम क्षमता है। इस प्रकार, सीएच 31 के विकास में इंडेल की महत्वपूर्ण भूमिका उजागर हुई। केप्लर ने कहा, सीएच31 की एचआईवी से लड़ने की क्षमता को आंका गया, तो पता चला कि वही सीएच 31 ऎसा कर पाने में सक्षम थे, जिनमें इंडेल मौजूद थे और अधिक मात्रा में थे।
एजेंसी 
sabhar :http://zeenews.india.com/

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