शनिवार, 30 नवंबर 2024
नकारात्मक ऊर्जा (निगेटिव एनर्जी) एक प्रकार की ऊर्जा है
0शुक्रवार, 29 नवंबर 2024
तंत्र एक विज्ञान है
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तंत्र एक विज्ञान है । विज्ञान न राजसिक होता है न तामसिक , न सात्विक , ये मनुष्य की भेद बुद्धि है नतीजा है । रज , तम , सत ये गुण और तत्व है । इसका अर्थ ये हुआ की न अच्छा न बुरे की पारधी मे इनको नहीं रखा जा सकता है ।
विज्ञान को समझो उधरहण से :- नदी पर बांध बनाकर विधुत शक्ति का निर्माण किया ... अलग अलग माध्यमों का प्रयोग करके आप के घर तक पहुंचाया गया आप के घर के उपकरणो के हिसाब से आप के घर तक विधुत शक्ति का प्रभावहा किया गया । ये पूरा प्रयोग विज्ञान के अंतर्गत आता है इसमे राजसिक ,तामसिक , सात्विक कहाँ है ।
अब साधना के परिवेश मे समझो ...... माला रूपी टर्बाइन पर आपने मंत्र रूप पानी का प्रवाहा किया जिसे ऊर्जा उत्तपन हुई संकलप शक्ति द्वारा आप ने उसको दिशा प्रदान कर उस शक्ति का प्रयोग किया । अब ये प्रयोग आप अपने को दीप्तमान करने के लिए भी कर सकते है या भौतिक कामनाओ को पूर्ण करने के लिए .... तंत्र यही है ॥ सही तरीके से सही माध्यम से किया गया कार्य क्रिया होती है उस क्रिया के पीछे लगा सिद्धांत तंत्र होता है । बाकी आप अपने अहं को पुष्ट करने के लिए रज , सत , तम का खेल खेल सकते है ॐ नमः शिवाय साभार फेस बुक
सोमवार, 8 जुलाई 2024
स्त्री-पुरुष क्यों दूसरे स्त्री-पुरुषों के प्रति आकर्षित हैं आजकल
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[[[नमःशिवाय]]]
श्री गुरूवे नम:
#प्राण_ओर_आकर्षण
स्त्री-पुरुष क्यों दूसरे स्त्री-पुरुषों के प्रति आकर्षित हैं आजकल इसका कारण है--अपान प्राण। जो एक से संतुष्ट नहीं हो सकता, वह कभी संतुष्ट नहीं होता। उसका जीवन एक मृग- तृष्णा है। इसलिए भारतीय योग में ब्रह्मचर्य आश्रम का यही उद्देश्य रहा है कि 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करे। इसका अर्थ यह नहीं कि पुरष नारी की ओर देखे भी नहीं। ऐसा नहीं था --प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्य को अभ्यास कराता था जिसमें अपान प्राण और कूर्म प्राण को साधा जा सके और आगे का गृहस्थ जीवन सफल रहे--यही इसका गूढ़ रहस्य था।प्राचीन काल में चार आश्रमों का बड़ा ही महत्व था। इसके पीछे गंभीर आशय था। जीवन को संतुलित कर स्वस्थ रहकर अपने कर्म को पूर्ण करना उद्देश्य रहता था। लेकिन आज के मनुष्य का जीवन ताश के पत्तों की तरह बिखरा-बिखरा रहता है। वह समेटना चाहता है लेकिन जीवन है कि समेटने में नहीं आता। यही अशांति का कारण है। जीवन में प्राण का महत्व है।समान प्राण और कृकल प्राण का महत्व अपान प्राण की ही तरह समान प्राण भी काफी महत्वपूर्ण है।
समान प्राण नाभि के मध्य में रहता है। उसका कार्य पेट के पाचन-तंत्र को दुरुस्त करना है। गरमाहट और पित्त, चंचलता और उत्साह शरीर में तेज आदि समान प्राण की ही देन है। त्वचा में कोमलता, चमक ,भूख लगना कृकल प्राण का कार्य है। सर्दी का कम लगना समान प्राण और कृकल प्राण के संयोजन की विशेषता है। भूख लगना ,स्फूर्ति, उत्साह ,शरीर में तेज, सर्दी कम लगना--समान प्राण और कृकल प्राण के स्पन्दन पर निर्भर करता है। जिन पुरषों में समान प्राण का स्पन्दन कम होता है,उन्हें सर्दी अधिक लगती है। स्नान करना सर्दी में बड़ा कष्टकारी रहता है उनके लिए। गर्म कपडे पहनने पर भी उन्हें सर्दी महसूस होती रहती है। जरा-सा भोजन करते ही पेट भरा-भरा सा लगने लगता है। मनुष्य के पास सब कुछ होते हुए भी वह खिन्न बना रहता है। असंतुष्ट रहता है। शरीर का कोई-न-कोई अंग बीमार ही बना रहता है। पेट का भारीपन, थकान, आँखों की कमज़ोरी आदि रोग अक्सर घेरे रहते हैं।
आयुर्वेद ने सारे रोगों की जड़ पेट को माना है। यदि पेट ठीक है तो शरीर में रोगों की सम्भावना कम रहती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि समान प्राण ही हमारे स्वास्थ्य का मुख्य कारण है। तंत्र-योग में प्राण-साधना एक कठिन क्रिया है। अगर प्राण नहीं सधता तो तंत्र की सारी क्रिया व्यर्थ है।तंत्र में ' प्राणकर्षिणी विद्या' की साधना काफी दुरूह है लेकिन साधक उसे साधता है। बिना प्राण साधे ध्यान, समाधि, सूक्ष्म लोक का विचरण, देहातीत का अनुभव प्राप्त होना संभव नहीं है। जिस प्रकार पुरुष के बिना प्रकृति अपनी लीला नहीं कर सकती, उसी प्रकार पांच महा- प्राण बिना पांच लघुप्राण संतुलित नहीं हो सकते। महाप्राण और लघुप्राण शिव और शक्ति के प्रतीक हैं। जिस तरह बिना शिव-शक्ति के चराचर जगत शून्य है, ब्रह्माण्ड स्पन्दनहीन है, उसी प्रकार दसों प्राणों का स्पन्दन ही जीवन है। प्राणों का रहस्यमय सञ्चालन प्राणतोषणी क्रिया' तंत्र का काफी गूढ़ विषय है। यह क्रिया अगर सध जाय तो साधक प्राण पर नियंत्रण कर शरीर के तापमान को प्रकृति के अनुसार घटा-बढ़ा सकता है। प्राण को सहस्रार में स्थापित कर सैकड़ों वर्षो तक समाधि को उपलब्ध हो सकता है। कुण्डलिनी योग में षट्चक्र- भेदन बिना प्राणों के सन्धान के सम्भव नहीं। तंत्र ने प्राण को असीम ऊर्जा माना है।
उदान प्राण का निवास कण्ठ प्रदेश है। इसे साधने में "श्री" और "समृद्धि" दोनों का उदय होता है। कण्ठ प्रदेश को लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। इसी कारण स्वर्ण आभूषण गले में धारण किया जाता है। कण्ठ को 'स्फुटा ग्रन्थ' भी कहा गया है। स्फुटा को जागृत करने के लिए मोती की माला, रत्न और स्वर्ण आभूषण धारण करना शुभ होता है। उदान के पूर्ण होने पर मनुष्य कभी अभाव ग्रस्त नहीं होता। साधक प्राण की विशेष क्रिया द्वारा 'स्फुटा ग्रंथि' जागृत कर लेता है। भौतिक व आध्यात्मिक सुख जब चाहे प्राप्त कर सकता है। लेकिन विरले साधक ही इसका उपयोग भौतिक सुखों के लिए करते हैं। उनका उद्देश्य वाक्-सिद्धि और मन्त्र-सिद्धि के लिए होता है।धनंजन प्राण का स्पन्दन पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से होता रहता है। वह सभी प्राणों का प्रमुख है क्योंकि उसका सूक्ष्म सञ्चालन सूक्ष्म केंद्रों के आलावा शरीर के बाह्य सूक्ष्म तरंगों को भी करता है आकर्षित। इसलिए कपाल प्रदेश में इसका मुख्य निवास माना गया है जहाँ सहस्रार चक्र है, शिव-शक्ति का सामरस्य-मिलन है। इसीको तंत्र में शिवलोक कहा गया है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है--" प्राणों में मैं धनञ्जय प्राण हूँ।"
हमारा मस्तिष्क रहस्यमय है। विज्ञान भी अभी तक इसके रहस्यों को पूर्णरूप से उजागर नहीं कर पाया है। यह अद्भुत सुप्त शक्तियों का भण्डार है। संसार में ऐसे अनेक महान पुरुष हुए हैं जिन्होंने अपनी अद्भुत प्रतिभा से लोगों को हैरत में डाल दिया। जाने-अनजाने यह धनंजन प्राण का ही चमत्कार है। इसमें शिथिलता आने पर या स्पन्दन कम हो जाने पर मानसिक बीमारियां, चिन्ता, डिप्रेशन आदि का शिकार हो जाता है व्यक्ति। मस्तिष्क का विकास धनंजय प्राण पर ही निर्भर है।हज़ारों वर्ष पहले ऋषि-महर्षियों ने प्राण पर बेहद गम्भीर विचार किया था। साथ ही यह शोध किया था कि यदि प्राण कुपित हो जाय या मंद पड़ जाय तो उसे सन्धान कैसे किया जाय। लेकिन योग हो या तंत्र हो--बिना गुरु के निर्देशन के नहीं करना चाहिए। नहीं तो लाभ के वजाय हानि उठानी पड सकती है। इसीलिए योग को परम ज्ञान और तंत्र को गुह्य ज्ञान कहा गया है। प्राणों को साधने की क्रियाएँ दसों प्राणों का संयोजन- नियोजन करने, कुप्रवृत्तियों का निवारण करने और प्राणशक्ति पर अधिकार प्राप्त करने, साथ ही आत्मिक उन्नति के लिए प्राण-विद्या का रहस्य अवश्य जानना चाहिए--चाहे वह योगी हो या साधक हो या हो गृहस्थ। योगशास्त्र में प्राणों को साधने के लिए काफी क्रियाएँ हैं लेकिन उनमें से कुछ यहाँ दी जा रही हैं। बन्ध, मुद्रा, प्राणायाम और ध्यान--ये मुख्य हैं योगशास्त्र में। प्राण को साधने के लिए मुख्य तीन बन्ध हैं--
1. मूलबंध, 2. जालंधर बन्ध, 3. उड्डीयान बन्ध।
1. मूलबंध-- प्राणायाम की सहायता से यह सिद्ध होता है। इससे अपान प्राण स्थिर हो जाता है। वीर्य-स्तंभन होता है। वीर्य उर्ध्वभाग की ओर अग्रसर होता है। अपान प्राण का स्पन्दन बढ़ जाता है और मूलाधार स्थित कुण्डलिनी पर भी प्रभाव पड़ता है। उसमें ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। अपान प्राण और कूर्म प्राण दोनों पर मूलबन्ध का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रक्त-संचार ठीक होता है।
2. जालंधर बन्ध-- श्वास-क्रिया पर अधिकार होता है। ज्ञान-तंतु बलवान होते हैं। इसकी क्रिया से 16 ऊर्जा क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है। विशुद्ध चक्र को जागृत करने में इसकी बड़ी भूमिका होती है। हठयोग प्रदीपिका में इसका विस्तार से वर्णन आया है।
3. उड्डीयान बन्ध-- जीवनी शक्ति को बढाने के लिए परम सहायक सिद्ध होता है। नाभि स्थित समान और कृकल प्राणों में स्थिरता लाता है। सुषुम्ना नाड़ी को खोलने में सहायक है और स्वाधिष्ठान चक्र चैतन्य करता है। कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने में ये तीनो काफी सहायक होते हैं। sabhar कौलाचारि sadhana Facebook wall
सोमवार, 20 मई 2024
The Synergy Between Agriculture and Digital Marketing: A New Age of Farming
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By akhileshbahadurpal.com / May 19, 2024
The Role of Digital Marketing in Modern Agriculture
In the digital age, traditional farming methods are being augmented by innovative digital marketing strategies, revolutionizing the agricultural industry. Modern farmers and agribusinesses are increasingly turning to digital marketing to enhance their reach and profitability. Utilizing various platforms and tools, they are finding new ways to connect with consumers, promote their products, and drive sales.
Social media platforms like Facebook, Instagram, and Twitter have become vital channels for farmers to showcase their products and engage with a broader audience. By sharing visually appealing content, such as images and videos of their produce, farming processes, and behind-the-scenes activities, farmers can build a loyal customer base. Campaigns like #FarmToTable and #SupportLocalFarmers have gained substantial traction, encouraging consumer awareness and support for local agriculture.
Email marketing is another effective strategy being employed by modern agribusinesses. By maintaining a subscriber list, farmers can send regular updates, promotional offers, and personalized messages directly to their customers’ inboxes. This direct line of communication helps in fostering long-term relationships and ensuring repeat business. Additionally, email campaigns can be tailored to highlight seasonal specials or introduce new products, keeping the customer informed and engaged.
Content marketing and SEO (Search Engine Optimization) are pivotal in helping agricultural businesses reach potential customers through search engines. By creating informative blog posts, how-to guides, and educational videos, farmers can position themselves as experts in their field. Properly optimized content ensures that their websites rank higher in search engine results, making it easier for consumers to find them. For instance, a farm specializing in organic produce might write blog posts about the benefits of organic farming, which can attract health-conscious consumers looking for trustworthy sources.
Real-world examples of successful digital marketing in agriculture include campaigns like “Know Your Farmer, Know Your Food” by the USDA, which promotes farm-to-consumer connections through social media and online platforms. Another notable example is John Deere’s initiative, which uses a mix of content marketing and social media to educate farmers about their products and services, resulting in increased brand loyalty and sales.
Despite the numerous benefits, farmers might face challenges in adopting digital marketing technologies. Limited access to high-speed internet in rural areas, lack of technical know-how, and the initial investment required for digital tools can be significant hurdles. However, these challenges can be overcome by seeking training programs, grants, and support from agricultural organizations. Collaborating with digital marketing experts can also provide farmers with the necessary skills and resources to effectively harness the power of digital marketing.
The Impact of Digital Tools on Sustainable Farming Practices
In recent years, the integration of digital tools in agriculture has significantly advanced sustainable farming practices. The advent of technologies such as precision agriculture, the Internet of Things (IoT), and big data analytics has enabled farmers to optimize their operations more effectively, ensuring a balanced and eco-friendly approach to farming.
Precision agriculture, for instance, employs GPS technology and soil sensors to provide real-time data on crop health, soil conditions, and weather patterns. This granular level of information allows farmers to apply water, fertilizers, and pesticides more efficiently, targeting only the areas that require attention. Such precision not only conserves resources but also minimizes the environmental footprint of farming activities.
The IoT further enhances sustainability by connecting various farming equipment and sensors to the internet, creating a network of smart devices that communicate and automate tasks. For example, smart irrigation systems can adjust water usage based on soil moisture levels and weather forecasts, significantly reducing water waste. Similarly, automated pest management systems can detect and address pest issues early, reducing the need for chemical interventions.
Big data analytics plays a crucial role in sustainable farming by analyzing vast amounts of data collected from various sources. This analysis helps farmers make informed decisions, predict crop yields, and identify potential issues before they become critical. By adopting data-driven strategies, farmers can achieve higher efficiency and productivity with fewer inputs, leading to cost savings and improved crop yields.
Several farms worldwide have successfully implemented these digital technologies, demonstrating their efficacy in promoting sustainability. For instance, a case study of a vineyard in California showed that adopting precision agriculture techniques resulted in a 20% reduction in water usage and a 15% increase in crop yield. Similarly, a farm in Australia utilizing IoT devices reported a 30% decrease in fertilizer use while maintaining high production levels.
Economically, the benefits of sustainable practices enabled by digital tools are substantial. Cost savings from reduced resource usage and improved yields translate into higher profitability for farmers. Moreover, sustainable farming practices often attract premium prices in the market, further enhancing economic gains.
Looking ahead, the future prospect of integrating more advanced digital solutions in agriculture holds great promise for further promoting sustainability. Emerging technologies such as artificial intelligence and blockchain have the potential to revolutionize farming practices, offering even greater efficiency and transparency. As the agricultural sector continues to embrace these innovations, the synergy between digital tools and sustainable farming practices will undoubtedly strengthen, paving the way for a more sustainable and profitable future for farmers worldwide.
रविवार, 19 मई 2024
The Rise of Digital Technologies in Agriculture
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Dizital marketing The Intersection of Agriculture and Digital Expertise: Transforming the Future of Farming
The Intersection of Agriculture and Digital Expertise: Transforming the Future of Farming
By akhileshbahadurpal.com / May 19, 2024
The Rise of Digital Technologies in Agriculture
The agricultural sector has witnessed a dramatic transformation with the integration of digital technologies over the past few decades. The journey began with the mechanization of farming practices, which laid the foundation for the adoption of more advanced technological solutions. Early mechanization involved the use of simple machinery to enhance productivity and reduce manual labor. However, the advent of the Internet of Things (IoT), Artificial Intelligence (AI), and big data analytics has propelled agriculture into a new era of precision and efficiency.
The Intersection of Agriculture and Digital Expertise: Revolutionizing Farming Practices
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By akhileshbahadurpal.com / May 19, 2024
The Evolution of Agriculture Through Digital Technology
Agriculture has been a cornerstone of human civilization for millennia, relying heavily on traditional methods such as manual labor and rudimentary tools. These conventional farming practices, though effective in their time, often faced significant challenges including unpredictable weather conditions, pest infestations, and limited access to resources. As a result, crop yields were frequently inconsistent, and resource management was far from optimal.
With the advent of the digital era, agriculture has undergone a transformative evolution. The introduction of precision farming has enabled farmers to use data-driven insights to optimize crop management. Precision farming leverages technologies such as GPS and remote sensing to monitor soil conditions, weather patterns, and crop health in real-time. This granular level of monitoring ensures that resources such as water, fertilizers, and pesticides are used more efficiently, maximizing crop yields while minimizing waste and environmental impact.
The Internet of Things (IoT) has further revolutionized agricultural practices. IoT devices, such as soil moisture sensors and climate monitors, provide continuous data that helps farmers make informed decisions. These smart devices can alert farmers to potential issues before they become critical, ensuring timely interventions that safeguard crop health and productivity.
Drones and satellite imagery represent another leap forward in agricultural technology. Drones equipped with multispectral cameras can capture high-resolution images of fields, identifying areas that require attention. Satellite imagery offers a broader perspective, enabling large-scale monitoring of crop conditions and predicting potential issues such as droughts or pest outbreaks. These technologies collectively facilitate proactive rather than reactive farming, significantly enhancing efficiency and sustainability.
Case studies from around the world highlight the tangible benefits of integrating digital technologies into agriculture. For example, a farm in Iowa that adopted precision farming techniques reported a 20% increase in crop yields and a 30% reduction in water usage. Similarly, a vineyard in Italy using IoT-enabled sensors saw a dramatic improvement in grape quality and a reduction in chemical usage by 40%. These examples underscore the transformative potential of digital expertise in revolutionizing farming practices, paving the way for a more efficient, sustainable, and productive agricultural sector.
The Role of Digital Experts in Modern Agriculture
In today’s rapidly evolving agricultural landscape, the role of digital experts has become increasingly pivotal. These professionals bring a wealth of knowledge and specialized skill sets that are transforming traditional farming practices. Digital experts in agriculture must be proficient in various domains, including data analytics, machine learning, software development, and agricultural sciences. This diverse expertise enables them to address complex challenges and drive innovation in the industry.
One of the primary contributions of digital experts is the development of sophisticated farm management software. These tools empower farmers to make data-driven decisions by providing real-time insights into crop health, soil conditions, and weather patterns. By leveraging predictive analytics and machine learning algorithms, digital experts can create models that forecast crop diseases and pest infestations, allowing farmers to take proactive measures to protect their yields.
Moreover, digital experts play a crucial role in optimizing supply chains within the agricultural sector. Through the use of advanced software solutions, they can streamline logistics, reduce waste, and enhance traceability from farm to table. This not only improves efficiency but also ensures that consumers receive fresh and high-quality produce.
Collaboration between farmers and digital experts is essential for fostering innovation and problem-solving in the field. By working together, they can develop tailored solutions that address specific agricultural challenges. For example, digital experts might design sensors and IoT devices that monitor soil moisture levels, enabling precise irrigation practices that conserve water and enhance crop growth.
In addition, digital experts contribute to sustainable agriculture by implementing technologies that reduce environmental impact. Precision farming techniques, such as variable rate application of fertilizers and pesticides, are made possible through the integration of digital tools. These practices not only increase crop productivity but also minimize the use of harmful chemicals, promoting a healthier ecosystem.
In summary, the collaboration and expertise of digital professionals are indispensable in modern agriculture. Their ability to harness technology and data not only enhances productivity and sustainability but also paves the way for a more resilient and innovative agricultural sector.
गुरुवार, 2 मई 2024
टर्बाइन को समझना: प्रकार, अनुप्रयोग और दक्षता
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टर्बाइनों को समझना: प्रकार, अनुप्रयोग और दक्षता
टर्बाइन उल्लेखनीय मशीनें हैं जो बिजली उत्पादन से लेकर विमानन तक विभिन्न उद्योगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे पानी, भाप या गैस जैसे गतिशील तरल पदार्थों की गतिज ऊर्जा का उपयोग करते हैं और इसे यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। इस ऊर्जा का उपयोग काम करने के लिए किया जा सकता है, जैसे बिजली पैदा करना या विमान चलाना। इस लेख में, हम विभिन्न प्रकार के टर्बाइनों, उनके अनुप्रयोगों और उनकी दक्षता को प्रभावित करने वाले कारकों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
टर्बाइनों के प्रकार:
1. भाप टरबाइन:
बिजली पैदा करने के लिए बिजली संयंत्रों में भाप टरबाइनों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। वे टरबाइन ब्लेड को चलाने के लिए उच्च दबाव वाली भाप का उपयोग करके काम करते हैं, जो एक शाफ्ट से जुड़े होते हैं। जैसे ही भाप ब्लेडों पर बहती है, यह उन्हें घूमने का कारण बनती है, जिससे यांत्रिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। भाप टर्बाइनों को दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है: आवेग टर्बाइन और प्रतिक्रिया टर्बाइन।
आवेग टर्बाइन: ये टर्बाइन ब्लेड को घुमाने के लिए उच्च-वेग भाप जेट की गतिज ऊर्जा का उपयोग करते हैं। नोजल से गुजरते समय भाप फैलती है, जिससे एक उच्च गति वाला जेट बनता है जो ब्लेडों से टकराता है, जिससे वे घूमने लगते हैं।
प्रतिक्रिया टरबाइन: प्रतिक्रिया टरबाइन में, भाप नोजल के माध्यम से और टरबाइन ब्लेड के ऊपर से गुजरते समय फैलती है। यह विस्तार ब्लेडों पर एक प्रतिक्रिया बल उत्पन्न करता है, जिससे वे घूमने लगते हैं। प्रतिक्रिया टरबाइन अपनी उच्च दक्षता के कारण बड़े बिजली संयंत्रों में अधिक आम हैं।
2. गैस टर्बाइन:
गैस टर्बाइन, जिन्हें दहन टर्बाइन भी कहा जाता है, एक दहन कक्ष में ईंधन (जैसे प्राकृतिक गैस या डीजल) जलाने से संचालित होते हैं। उत्पन्न गर्म गैसें टरबाइन ब्लेडों पर फैलती हैं और प्रवाहित होती हैं, जिससे वे घूमने लगते हैं। गैस टर्बाइनों का व्यापक रूप से उनके कॉम्पैक्ट आकार, उच्च शक्ति-से-वजन अनुपात और त्वरित स्टार्टअप समय के कारण बिजली उत्पादन, विमान प्रणोदन और औद्योगिक अनुप्रयोगों में उपयोग किया जाता है।
3. जल टरबाइन:
जल टरबाइन यांत्रिक शक्ति उत्पन्न करने के लिए बहते पानी की ऊर्जा का उपयोग करते हैं। इनका उपयोग आमतौर पर जलविद्युत ऊर्जा संयंत्रों और जल वितरण प्रणालियों में किया जाता है। जल टरबाइनों को उनके डिज़ाइन और संचालन के आधार पर कई प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैं:
पेल्टन टर्बाइन: पेल्टन टर्बाइन आवेग टर्बाइन हैं जो एक पहिये पर लगी बाल्टियों को चलाने के लिए उच्च दबाव वाले पानी के जेट का उपयोग करते हैं। पानी की गतिज ऊर्जा टरबाइन ब्लेडों में स्थानांतरित हो जाती है, जिससे वे घूमने लगते हैं।
फ्रांसिस टर्बाइन: फ्रांसिस टर्बाइन प्रतिक्रिया टर्बाइन हैं जो जलमग्न वातावरण में काम करते हैं। इनमें घूमने वाले शाफ्ट पर लगे घुमावदार ब्लेड होते हैं। पानी एक सर्पिल आवरण के माध्यम से टरबाइन में प्रवेश करता है और ब्लेड के ऊपर से बहता है, जिससे एक प्रतिक्रिया बल उत्पन्न होता है जो टरबाइन को चलाता है।
टर्बाइनों के अनुप्रयोग:
बिजली उत्पादन: भाप, गैस और पानी सहित विभिन्न ऊर्जा स्रोतों से बिजली उत्पन्न करने के लिए बिजली संयंत्रों में टर्बाइनों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
विमानन: गैस टर्बाइन विमान प्रणोदन में उपयोग किए जाने वाले प्राथमिक इंजन हैं, जो उड़ान के लिए आवश्यक जोर प्रदान करते हैं।
समुद्री प्रणोदन: जहाजों और पनडुब्बियों को चलाने के लिए समुद्री प्रणोदन प्रणालियों में टर्बाइनों का उपयोग किया जाता है, जो प्रणोदन के लिए कुशल और विश्वसनीय शक्ति प्रदान करते हैं।
औद्योगिक प्रक्रियाएँ: टर्बाइनों का उपयोग विभिन्न औद्योगिक अनुप्रयोगों में किया जाता है, जैसे कंप्रेसर, पंप और जनरेटर चलाना।
टरबाइन दक्षता को प्रभावित करने वाले कारक:
टर्बाइनों की दक्षता को कई कारक प्रभावित करते हैं, जिनमें शामिल हैं:
डिज़ाइन: टरबाइन का डिज़ाइन, जिसमें ब्लेड का आकार और व्यवस्था शामिल है, इसकी दक्षता निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
परिचालन स्थितियाँ: तापमान, दबाव और प्रवाह दर जैसी परिचालन स्थितियाँ टरबाइन के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं।
रखरखाव: टर्बाइनों के इष्टतम प्रदर्शन और दक्षता सुनिश्चित करने के लिए नियमित रखरखाव और सर्विसिंग आवश्यक है।
पर्यावरणीय कारक: पर्यावरणीय स्थितियाँ, जैसे हवा या पानी की गुणवत्ता, टर्बाइनों की दक्षता और जीवनकाल को प्रभावित कर सकती हैं।
निष्कर्षतः, टर्बाइन बहुमुखी मशीनें हैं जो बिजली उत्पादन, परिवहन और औद्योगिक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विभिन्न प्रकार के टर्बाइनों, उनके अनुप्रयोगों और उनकी दक्षता को प्रभावित करने वाले कारकों को समझना उनके प्रदर्शन को अधिकतम करने और स्थायी ऊर्जा उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
बुधवार, 10 अप्रैल 2024
सनातन धर्म की जानकारी
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अब खुद ही रिपेयर हो जाएंगे डैमेज दांत
विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियों द्वारा किया गया अनुसंधान)
■ काष्ठा = सैकन्ड का 34000 वाँ भाग
■ 1 त्रुटि = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुटि = 1 लव ,
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 30 क्षण = 1 विपल ,
■ 60 विपल = 1 पल
■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
■3 होरा=1प्रहर व 8 प्रहर 1 दिवस (वार)
■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
■ 2 माह = 1 ऋतू
■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग
■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 72 महायुग = मनवन्तर ,
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
■ महालय = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )
सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यहीं है जो हमारे देश भारत में बना हुआ है । ये हमारा भारत जिस पर हमे गर्व होना चाहिये l
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।
तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।
चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।
पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।
छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य।
सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।
आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।
नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।
दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।
*उक्त जानकारी शास्त्रोक्त 📚 आधार पर... हे.....💐
जय श्री राम राधे कृष्णा राधे श्याम🙏🙏
ऐसी जानकारी बार-बार नहीं आती, और आगे भेजें, ताकि लोगों को सनातन धर्म की जानकारी हो सके आपका आभार धन्यवाद होगा
1-अष्टाध्यायी पाणिनी
2-रामायण वाल्मीकि
3-महाभारत वेदव्यास
4-अर्थशास्त्र चाणक्य
5-महाभाष्य पतंजलि
6-सत्सहसारिका सूत्र नागार्जुन
7-बुद्धचरित अश्वघोष
8-सौंदरानन्द अश्वघोष
9-महाविभाषाशास्त्र वसुमित्र
10- स्वप्नवासवदत्ता भास
11-कामसूत्र वात्स्यायन
12-कुमारसंभवम् कालिदास
13-अभिज्ञानशकुंतलम् कालिदास
14-विक्रमोउर्वशियां कालिदास
15-मेघदूत कालिदास
16-रघुवंशम् कालिदास
17-मालविकाग्निमित्रम् कालिदास
18-नाट्यशास्त्र भरतमुनि
19-देवीचंद्रगुप्तम विशाखदत्त
20-मृच्छकटिकम् शूद्रक
21-सूर्य सिद्धान्त आर्यभट्ट
22-वृहतसिंता बरामिहिर
23-पंचतंत्र। विष्णु शर्मा
24-कथासरित्सागर सोमदेव
25-अभिधम्मकोश वसुबन्धु
26-मुद्राराक्षस विशाखदत्त
27-रावणवध। भटिट
28-किरातार्जुनीयम् भारवि
29-दशकुमारचरितम् दंडी
30-हर्षचरित वाणभट्ट
31-कादंबरी वाणभट्ट
32-वासवदत्ता सुबंधु
33-नागानंद हर्षवधन
34-रत्नावली हर्षवर्धन
35-प्रियदर्शिका हर्षवर्धन
36-मालतीमाधव भवभूति
37-पृथ्वीराज विजय जयानक
38-कर्पूरमंजरी राजशेखर
39-काव्यमीमांसा राजशेखर
40-नवसहसांक चरित पदम् गुप्त
41-शब्दानुशासन राजभोज
42-वृहतकथामंजरी क्षेमेन्द्र
43-नैषधचरितम श्रीहर्ष
44-विक्रमांकदेवचरित बिल्हण
45-कुमारपालचरित हेमचन्द्र
46-गीतगोविन्द जयदेव
47-पृथ्वीराजरासो चंदरवरदाई
48-राजतरंगिणी कल्हण
49-रासमाला सोमेश्वर
50-शिशुपाल वध माघ
51-गौडवाहो वाकपति
52-रामचरित सन्धयाकरनंदी
53-द्वयाश्रय काव्य हेमचन्द्र
वेद-ज्ञान:-
प्र.1- वेद किसे कहते है ?
उत्तर- ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है।
प्र.2- वेद-ज्ञान किसने दिया ?
उत्तर- ईश्वर ने दिया।
प्र.3- ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?
उत्तर- ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।
प्र.4- ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए।
प्र.5- वेद कितने है ?
उत्तर- चार ।
1-ऋग्वेद
2-यजुर्वेद
3-सामवेद
4-अथर्ववेद
प्र.6- वेदों के ब्राह्मण ।
वेद ब्राह्मण
1 - ऋग्वेद - ऐतरेय
2 - यजुर्वेद - शतपथ
3 - सामवेद - तांड्य
4 - अथर्ववेद - गोपथ
प्र.7- वेदों के उपवेद कितने है।
उत्तर - चार।
वेद उपवेद
1- ऋग्वेद - आयुर्वेद
2- यजुर्वेद - धनुर्वेद
3 -सामवेद - गंधर्ववेद
4- अथर्ववेद - अर्थवेद
प्र 8- वेदों के अंग हैं ।
उत्तर - छः ।
1 - शिक्षा
2 - कल्प
3 - निरूक्त
4 - व्याकरण
5 - छंद
6 - ज्योतिष
प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?
उत्तर- चार ऋषियों को।
वेद ऋषि
1- ऋग्वेद - अग्नि
2 - यजुर्वेद - वायु
3 - सामवेद - आदित्य
4 - अथर्ववेद - अंगिरा
प्र.10- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?
उत्तर- समाधि की अवस्था में।
प्र.11- वेदों में कैसे ज्ञान है ?
उत्तर- सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान।
प्र.12- वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?
उत्तर- चार ।
ऋषि विषय
1- ऋग्वेद - ज्ञान
2- यजुर्वेद - कर्म
3- सामवे - उपासना
4- अथर्ववेद - विज्ञान
प्र.13- वेदों में।
ऋग्वेद में।
1- मंडल - 10
2 - अष्टक - 08
3 - सूक्त - 1028
4 - अनुवाक - 85
5 - ऋचाएं - 10589
यजुर्वेद में।
1- अध्याय - 40
2- मंत्र - 1975
सामवेद में।
1- आरचिक - 06
2 - अध्याय - 06
3- ऋचाएं - 1875
अथर्ववेद में।
1- कांड - 20
2- सूक्त - 731
3 - मंत्र - 5977
प्र.14- वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ? उत्तर- मनुष्य-मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है।
प्र.15- क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?
उत्तर- बिलकुल भी नहीं।
प्र.16- क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?
उत्तर- नहीं।
प्र.17- सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?
उत्तर- ऋग्वेद।
प्र.18- वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?
उत्तर- वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व ।
प्र.19- वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?
उत्तर-
1- न्याय दर्शन - गौतम मुनि।
2- वैशेषिक दर्शन - कणाद मुनि।
3- योगदर्शन - पतंजलि मुनि।
4- मीमांसा दर्शन - जैमिनी मुनि।
5- सांख्य दर्शन - कपिल मुनि।
6- वेदांत दर्शन - व्यास मुनि।
प्र.20- शास्त्रों के विषय क्या है ?
उत्तर- आत्मा, परमात्मा, प्रकृति, जगत की उत्पत्ति, मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान आदि।
प्र.21- प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?
उत्तर- केवल ग्यारह।
प्र.22- उपनिषदों के नाम बतावे ?
उत्तर-
01-ईश ( ईशावास्य )
02-केन
03-कठ
04-प्रश्न
05-मुंडक
06-मांडू
07-ऐतरेय
08-तैत्तिरीय
09-छांदोग्य
10-वृहदारण्यक
11-श्वेताश्वतर ।
प्र.23- उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?
उत्तर- वेदों से।
प्र.24- चार वर्ण।
उत्तर-
1- ब्राह्मण
2- क्षत्रिय
3- वैश्य
4- शूद्र
प्र.25- चार युग।
1- सतयुग - 17,28000 वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।
2- त्रेतायुग- 12,96000 वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।
3- द्वापरयुग- 8,64000 वर्षों का नाम है।
4- कलयुग- 4,32000 वर्षों का नाम है।
कलयुग के 5122 वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।
4,27024 वर्षों का भोग होना है।
पंच महायज्ञ
1- ब्रह्मयज्ञ
2- देवयज्ञ
3- पितृयज्ञ
4- बलिवैश्वदेवयज्ञ
5- अतिथियज्ञ
स्वर्ग - जहाँ सुख है।
नरक - जहाँ दुःख है।.
*#भगवान_शिव के "35" रहस्य!!!!!!!!
भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है।
*🔱1. आदिनाथ शिव : -* सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।
*🔱2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : -* शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।
*🔱3. भगवान शिव का नाग : -* शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।
*🔱4. शिव की अर्द्धांगिनी : -* शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।
*🔱5. शिव के पुत्र : -* शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।
*🔱6. शिव के शिष्य : -* शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।
*🔱7. शिव के गण : -* शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है।
*🔱8. शिव पंचायत : -* भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।
*🔱9. शिव के द्वारपाल : -* नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।
*🔱10. शिव पार्षद : -* जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।
*🔱11. सभी धर्मों का केंद्र शिव : -* शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में विभक्त हो गई।
*🔱12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय : -* ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।
*🔱13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव : -* भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।
*🔱14. शिव चिह्न : -* वनवासी से लेकर सभी साधारण व्यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।
*🔱15. शिव की गुफा : -* शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा 'अमरनाथ गुफा' के नाम से प्रसिद्ध है।
*🔱16. शिव के पैरों के निशान : -* श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।
रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे 'रुद्र पदम' कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।
तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।
जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के पास शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।
रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर 'रांची हिल' पर शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को 'पहाड़ी बाबा मंदिर' कहा जाता है।
*🔱17. शिव के अवतार : -* वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।
*🔱18. शिव का विरोधाभासिक परिवार : -* शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।
*🔱19.* तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।
*🔱20.शिव भक्त : -* ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।
*🔱21.शिव ध्यान : -* शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।
*🔱22.शिव मंत्र : -* दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।
*🔱23.शिव व्रत और त्योहार : -* सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।
*🔱24.शिव प्रचारक : -* भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
*🔱25.शिव महिमा : -* शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।
*🔱26.शैव परम्परा : -* दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।
*🔱27.शिव के प्रमुख नाम : -* शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।
*🔱28.अमरनाथ के अमृत वचन : -* शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। 'विज्ञान भैरव तंत्र' एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।
*🔱29.शिव ग्रंथ : -* वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।
*🔱30.शिवलिंग : -* वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।
*🔱31.बारह ज्योतिर्लिंग : -* सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।
दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्योति पिंड पृथ्वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्योतिर्लिंग में शामिल किया गया।
*🔱32.शिव का दर्शन : -* शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
*🔱33.शिव और शंकर : -* शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं- शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।
*🔱34. देवों के देव महादेव :* देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।
साभार कृतिका राजपूत Facebook wall
गुरुवार, 28 मार्च 2024
नई बदलाव बदलावकरते विश्व में आर्टिफीसियल इंटेलीजेन्स की क्या संभावना है
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नई बदलाव करते विश्व में आर्टिफीसियल इंटेलीजेन्स की क्या संभावना है दुनियाभर में AI यानी Artificial Intelligence को लेकर लोगों के बीच जॉब सिक्योरिटी को लेकर बहस छिड़ चुकी है. एआई के बढ़ते प्रभुत्व ने 'व्हाइट कॉलर जॉब्स' को भी इसकी जद में ला दिया है. हालांकि, इसे लेकर लोग दो मतों में बंटे हैं. एक का कहना है कि इससे नौकरियां धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगीं. वहीं, कुछ का कहना है कि AI लोगों के जीवन में कई मौके लेकर आने वाला है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या एआई भविष्य में नौकरियों की संभावनाएं पैदा करेगा या फिर नौकरियों के लिए खतरा बन जाएगा
जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है AI
सवाल उठ रहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से किस तरह के काम लिए जा सकते हैं? दरअसल, एआई से हर तरह के काम लिए जा सकते हैं. चिंता इसी बात की है. अभी से ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया है. बहुत से ऐसे काम हैं, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए ही हो रहे हैं. मसलन, सेल्फ ड्राइविंग कार आ रही है. गूगल मैप तो पहले से ही हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. इसके साथ ही फेस डिटेक्शन, वॉइस रिकॉग्निशन, टेक्स्ट ऑटोकरेक्ट, ऑटोमेटेड ट्रांसलेशन, चैटबॉट, ई-पेमेंट, एपल का सिरी (Siri) फीचर और अमेजॉन की एलेक्सा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में ये लिस्ट और बड़ी होती जाएगी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर होने वाली बहस और भी तीखी होगी.
धोखाधड़ी के लिए एआइ सबसे मजबूत हथियार बन रहा है। ऐसे गॅ एआइ प्लेटफार्मों का सही और विवेकपूर्ण इस्तेमाल हो, इसके लिए संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में एक साझा संकल्प पारित किया है। एआइ की नई चुनौतियों, नियमन और इससे जुड़ी सतर्कता पर चर्चा कर रहे
कोई नई तकनीक आती है, ज तो अक्सर जाने-समझे बगैर विरोध शुरू हो जाता है, लेकिन उसके चमत्कारों से परिचित होते ही लोग बिना सोचे-समझे प्रयोग भी शुरू कर देते हैं। आज जब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के प्रभाव से कोई अछूता नहीं है, तो इसके दुरुपयोग का भी सवाल उठ खड़ा हुआ है। मशीनी मेधा (एआइ) जिस तरह वित्त, विनिर्माण से लेकर कृषि, स्वास्थ्य देखभाल जैसे अनेकानेक क्षेत्रों की कार्यपद्धति बदल रही है, उससे आर्थिकी उत्थान और जनसेवाओं का स्वरूप चमत्कारिक ढंग से बदलने लगा है। दूसरी ओर, इसके खतरे भी अब सामने हैं
एआइ का सही और सुरक्षित प्रयोग
व्यवधान पैदा करने की ताकत:
टेक्स्ट और इमेज तैयार करने वाले एआइ माडल अवैधानिक, अवांछित सामग्री पेश कर रहे हैं, तो वहीं वायस इमिटेशन साफ्टवेयर किसी के स्पीच पैटर्न का गलत इस्तेमाल कर धोखाधड़ी, अफवाह फैलाने में मददगार हो रहे हैं। चैटबाट से परीक्षाओं में गड़बड़ी की आशंका तो हर वक्त बनी हुई है। एआइ प्लेटफार्म मानवीय और निजी अधिकारों, डाटा सुरक्षा में सेंधमारी के लिए बिल्कुल नए तरह के ईंधन हैं। कुल मिलाकर, एआइ का दांव आसान नहीं है।
कापीराइट से जुड़े मुद्दे
किसी एआइ माडल की • ट्रेनिंग के लिए व्यापक डाटा सेट की आवश्यकता होती है। ऐसे में कापीराइट वाले किसी मैटर से एआइ माडल की ट्रेनिंग क्या उचित है? क्या मूल लेखक को कंपनी इसका मुआवजा देगी? या फिर इस तरह की सामाग्री का किस हद तक प्रयोग किया जा सकता है ? कापीराइट से जुड़े इन प्रश्नों का जवाब अनिवार्य है । कापीराइट के मामलों का समाधान अलग-अलग अदालतों के जरिये नहीं हो सकता। ऐसे में एआइ के समुचित प्रयोग को नियमबद्ध करना आवश्यक है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट आई है. जिसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर नई बहस हो रही है.
'फ्यूचर ऑफ जॉब्स: 2023' शीर्षक वाली
इस रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे अगले पांच सालों में एआई और टेक्नोलॉजी मिलकर लाखों वर्कर्स की नौकरियां खाने जा रहे हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, अगले पांच सालों में लगभग 8.3 करोड़ लोग अपनी नौकरियां गंवा देंगे. सबसे ज्यादा एडमिन और एग्जीक्यूटिव सेक्रेटरी, कैशियर, डाटा एंट्री और टिकट क्लर्क, डाक सेवा क्लर्क, बैंककर्मी जैसे पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों की नौकरियां जाएंगी.
बुधवार, 20 मार्च 2024
कामवासना भी एक उपासना, साधना है।
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कामवासना भी एक उपासना, साधना है। काम पूर्ति से दिमाग की गन्दगी निकलकर जिन्दगी सुधर जाती है। अगर इस ब्लॉग से पूरी बात या सार समझ नही आया हो, तो टिप्पणी करें। किस्सा ओर भी बढ़ सकता है। काम, जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है।
प्रत्येक प्राणी के भीतर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा काम है। वैदिक दर्शन के अनुसार काम सृष्टि के पूर्व में जो एक अविभक्त तत्व था वह विश्वरचना के लिए दो विरोधी भावों में आ गया। इसी को भारतीय विश्वास में यों कहा जाता है कि आरंभ में प्रजापति अकेला था। उसका मन नहीं लगा। उसने अपने शरीर के दो भाग। वह आधे भाग से स्त्री और आधे भाग से पुरुष बन गया। तब उसने आनंद का अनुभव किया। स्त्री और पुरुष का युग्म संतति के लिए आवश्यक है और उनका पारस्परिक आकर्षण ही कामभाव का वास्तविक स्वरूप है। प्रकृति की रचना में प्रत्येक पुरुष के भीतर स्त्री और प्रत्येक स्त्री के भीतर पुरुष की सत्ता है। ऋग्वेद में इस तथ्य की स्पष्ट स्वीकृति पाई जाती है, जैसा अस्यवामीय सूक्त में कहा है—जिन्हें पुरुष कहते हैं वे वस्तुत: स्त्री हैं; जिसके आँख हैं वह इस रहस्य को देखता है; अंधा इसे नहीं समझता। (स्त्रिय: सतीस्तां उ मे पुंस आहु: पश्यदक्षण्वान्न बिचेतदन्ध:। - ऋग्वेद, ३। १६४। १६)।
इस सत्य को अर्वाचीन मनोविज्ञान शास्त्री भी पूरी तरह स्वीकार करते हैं। वे मानते हैं कि प्रत्येक पुरुष के मन में एक आदर्श सुंदरी स्त्री बसती है जिसे "अनिमा' कहते हैं और प्रत्येक स्त्री के मन में एक आदर्श तरुण का निवास होता है जिसे "अनिमस' कहते हैं। वस्तुत: न केवल भावात्मक जगत् में किंतु प्राणात्मक और भौतिक संस्थान में भी स्त्री और पुरुष की यह अन्योन्य प्रतिमा विद्यमान रहती है, ऐसा प्रकृति की रचना का विधान है। कायिक, प्राणिक और मानसिक, तीन ही व्यक्तित्व के परस्पर संयुक्त धरातल हैं और इन तीनों में काम का आकर्षण समस्त रागों और वासनाओं के प्रबल रूप में अपना अस्तित्व रखता हे। अर्वाचीन शरीरशास्त्री इसकी व्याख्या यों करते हैं कि पुरुष में स्त्रीलिंगी हार्मोन (Female sex hormones) और स्त्री में पुरुषलिंगी हार्मोंन (male sex hormones) होते हैं। भारतीय कल्पना के अनुसार यही अर्धनारीश्वर है, अर्थात प्रत्येक प्राणी में पुरुष और स्त्री के दोनों अर्ध-अर्ध भाव में सम्मिलित रूप से विद्यमान हैं और शरीर का एक भी कोष ऐसा नहीं जो इस योषा-वृषा-भाव से शून्य हो। यह कहना उपयुक्त होगा कि प्राणिजगत् की मूल रचना अर्धनारीश्वर सूत्र से प्रवृत्त हुई और जितने भी प्राण के मूर्त रूप हैं सबमें उभयलिंगी देवता ओत प्रोत है। एक मूल पक्ष के दो भागों की कल्पना को ही "माता-पिता' कहते हैं। इन्हीं के नाम द्यावा-पृथिवी और अग्नि-सोम हैं। द्यौ: पिता, पृथिवी मता, यही विश्व में माता-पिता हैं। प्रत्येक प्राणी के विकास का जो आकाश या अंतराल है, उसी की सहयुक्त इकाई द्यावा पृथिवी इस प्रतीक के द्वारा प्रकट की जाती है। इसी को जायसी ने इस प्रकार कहा है :
एकहि बिरवा भए दुइ पाता,
सरग पिता औ धरती माता।
द्यावा पृथिवी, माता पिता, योषा वृषा, पुरुष का जो दुर्धर्ष पारस्परिक राग है, वही काम है। कहा जाता है, सृष्टि का मूल प्रजापति का ईक्षण अर्थात् मन है। विराट् में केंद्र के उत्पत्ति को ही मन कहते हैं। इस मन का प्रधान लक्षण काम है। प्रत्येक केंद्र में मन और काम की सत्ता है, इसलिए भारतीय परिभाषा में काम को मनसिज या संकल्पयोनि कहा गया है। मन का जो प्रबुद्ध रूप है उसे ही मन्यु कहते हैं। मन्यु भाव की पूर्ति के लिए जाया भाव आवश्यक है। बिना जाया के मन्यु भाव रौद्र या भयंकर हो जाता है। इसी को भारतीय आख्यान में सत्ती में सती से वियुक्त होने पर शिव के भैरव रूप द्वारा प्रकट किया गया है। वस्तुत: जाया भाव से असंपृक्त प्राण विनाशकारी है। अतृप्त प्राण जिस केंद्र में रहता है उसका विघटन कर डालता है। प्रकृति के विधान में स्त्री पुरुष का सम्मिलन सृष्टि के लिए आवश्यक है और उस सम्मिलन के जिस फल की निष्पति होती है उसे ही कुमार कहते हैं। प्राण का बालक रूप ही नई-नई रचना के लिए आवश्यक है और उसी में अमृतत्व की श्रृंखला की बार-बार लौटनेवाली कड़ियाँ दिखाई पड़ती हैं। आनंद काम का स्वरूप है। यदि मानव के भीतर का आकाश आनंद से व्याप्त न हो तो उसका आयुष्यसूत्र अविच्छन्न हो जाए। पत्नी के रूप में पति अपने आकाश को उससे परिपूर्ण पाता है।
अर्वाचीन मनोविज्ञान का मौलिक अन्वेषण यह है कि काम सब वासनाओं की मूलभूत वासना है। यहाँ तक तो यह मान्यता समुचित है, किंतु भारतीय विचार के अनुसार काम रूप की वासना स्वयं ईश्वर का रूप है। वह कोई ऐसी विकृति नहीं है जिसे हेय माना जाए।
इस नियम के अनुसार काम प्रजनन के लिए अनिवार्य है और उसका वह छंदोमय मर्यादित रूप अत्यंत पवित्र है। काम वृत्ति की वीभत्स व्याख्या न इष्ट है, न कल्याणकारी। मानवीय शरीर में जिस श्रद्धा, मेधा, क्षुधा, निद्रा, स्मृति आदि अनेक वृत्तियों का समावेश है, उसी प्रकार काम वृत्ति भी देवी की एक कला रूप में यहाँ निवास करती है और वह चेतना का अभिन्न अंग है। sabhar विकिपीडिया
रविवार, 17 मार्च 2024
शक्ति की उपासना ही अघोर की अपनी क्रिया है
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ब्रम्हांड की जो परा अपरा शक्ति है उससे जुडना ही अपने आप को जोड़ना ही योग है।सभी सूर्यांन्शियो को अपने क्षात्र धर्म के पताका तर आना चाहिए। हमारे देश में जो एक सौ आठ शक्ति पीठेंहैं।वह परा अपरा इसी विद्या के पाठशाला और उच्च विद्या के विद्यालय है।जिसे स्वयं शिव ने स्थापित किया था।जो शिव शिवा वंशजों को पूर्णत्व प्राप्त करने हेतु ही थे।तथा ग्यारह शिव लिंगो की स्थापना ब्रम्हवंशियो को वैष्णव विद्या ब्रम्ह विद्या को प्राप्त करने के केन्द्र स्थापित किए थे।पर अब विद्या शिक्षा दीक्षा का आडंबर मात्र रह गया है। धनोपार्जन हेतु लोग गुरु गद्दी तिकड़म से अपने लेते हैं।ऐसा में आचरण नहीं होता।सनातन बहुत सी विद्याओं का लोप हो गया है।अब विद्वानों द्वारा उन विद्याओं का शोध कर प्रगट करना अनिवार्य हो गया है। वैदिक मंत्रों के रहस्य को जाने शोध करें। प्रत्येक गांव तथा ब्लाक में एक पीठ स्थापित कर वहां पांच वर्ष से दस वर्ष के बच्चों को क्षात्रावास में प्राकृतिक परिवेश में रखकर उत्तम गुरुओ द्वारा संस्कारिक ्शारीरिक व्यवहारिक वआध्यात्मिक भाषाओ ज्ञान विज्ञान की शिक्षा देनी चाहिए।योग का संयम नियम का प्रारम्भिक ज्ञान व अभ्यास करना चाहिए।इसी प्रकार प्रत्येक जनपद में भी एक एक पीठ की स्थापना कर। बच्चों को ज्ञान विज्ञान वऊंची विद्याओं में पूर्ण रूप पारंगत बनाना चाहिए। पच्चीस वर्ष के बाद पूर्ण ज्ञान विज्ञान तथा योग सम्पन्न युवक युवतियों का सम्बन्ध कराकर तब गृहस्थ जीवन में प्रवेश कराना चाहिए। ऐसे लोग स्वयं ही नहीं पूरे समाज को व संसार को मंगल मय बना देंगे।वे स्वतह न्याय और उत्तम नीति को पालन करने वाले स्वअनुशासित लोग होंगे हर तरह की समस्या स्वतह समाप्त हो जाएगी। चरी बेइमानी अनीति तथा अन्यान्य पूर्ण कार्य ऐसे लोग करेंगे ही नहीं।वे जो भी कार्य करेंगे उसमें पूर्ण कुशल होगे। आज जीवन पद्धति अपने पूर्वजों के अनुसार न होने के कारण बच्चे अज्ञान में ही नशा व कुरीतियों तथा कुसंगतियो में फंस कर अपना जीवन नष्ट कर ले रहे हैं ।जब तक उन्हें ज्ञान होता है तब तक अपनी आधी उम्र खो चुके होते हैं। तमाम तरह के पुलिस केस उनके सर पर लद चुके होते हैं।और वे माफिया किंग डान आदि डिग्रियां हासिल कर चुके होते हैं।इस तरह समूचा समाज रसातल की राह पकड़ लिया है। फिर उन्हें कौन सम्हाले कौन रोके।मति जा भइया गडहिया की ओर।। बहुत बा चेहलवा न लागी कौनो जोर।।मति जा भइया गडहवा की ओर।।।शेष कल हर-हर महादेव जय सर्वेश्वरी
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