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स्त्री के स्तनों से जुड़ा होता है स्त्री का सारा व्यक्तित्व

 ईस्वर ने स्तन क्यों दिये....? समझिये... बिना स्तन कोई स्त्री की कल्पना व्यर्थ है..!! इसे फैशन या दिखावा ना बनायें... और अगर दिखाना ही है तो आपका पति है दूसरे को क्यों दिखाना...? स्त्री के स्तनों से जुड़ा होता है स्त्री का सारा व्यक्तित्व । जब तक स्त्री माँ नही बन जाती तब तक उसकी ऊर्जा पूर्णतः स्तनों तक नही पहुँचती..!! शरीर शास्त्री ये प्रश्न उठाते रहते है। कि पुरूष के शरीर में स्तन क्यों होते है। जब कि उनकी कोई आवश्यकता नहीं दिखाई देती है। क्योंकि पुरूष को बच्चे को दूध तो पिलाना नहीं है। फिर उनकी क्या आवश्यकता है। वे ऋणात्‍मक ध्रुव है। इसलिए तो पुरूष के मन में स्त्री के स्तनों की और इतना आकर्षण है। वे धनात्‍मक ध्रुव है। इतने काव्य, साहित्य, चित्र,मूर्तियां सब कुछ स्त्री के स्तनों से जुड़े है। ऐसा लगता है जैस पुरूष को स्त्री के पूरे शरीर की अपेक्षा उसके स्तनों में अधिक रस है। और यह कोई नई बात नहीं है। गुफाओं में मिले प्राचीनतम चित्र भी स्तनों के ही है। स्तन उनमें महत्‍वपूर्ण है। बाकी का सारा शरीर ऐसा मालूम पड़ता है कि जैसे स्तनों के चारों और बनाया गया हो। स्तन आधार भूत है। क्‍योंकि ...

दुनिया का पहला अंतरिक्ष होटल "2027 में,

 दुनिया का पहला अंतरिक्ष होटल "2027 में, पृथ्वी की कक्षा में खुलने की संभावना है। जिसका नाम 'वॉयेजर होटल' होगा। यह होटल 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगाएगा और इस होटल में लगभग 400 लोगों के ठहरने का इंतजाम होगा। इस होटल में बार, लाउंज, सिनेमा और स्पा जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद होंगी।" #viralpost2025シ #facthubanup #viralpost2024 #viralphotochallenge #foodblogger #quotes #facts #couple #love #post Sweta Singh Vlogs Rupesh Kumar 

विज्ञान अर्थात विषय का ज्ञान: ऋतु सिसोदिया

 विज्ञान अर्थात विषय का ज्ञान 10 हजार करोड़ की पावर आपके ब्रेन में है इसका सही से उपयोग किया तो आइंस्टीन बन जाओगे आतंकवादी भी बन जाओगे जादूगर भी बन जाओगे लोगो को मोरख भी बनाओगे सोच पर प्रहार  हमारे दिमाग का निर्माण कैसे हुआ ऊर्जा भोजन से प्राय होती है केमिकल रिलीज होते है खोज कीजिये भाई वैदिक scince सनातन वर्ड ही वेद से निकला मंत्र का प्रभाव साइंस के प्रक्रिया है क्योंकि ऊर्जा का ही खेल है सारा इसलिए ही तो हम आज भी मांनासिक गुलाम है क्योंकि ज्ञान को जान नही समझा नही सत्य को धारण कैसे करते जब जानते ही नही थे लड़ो भिड़ा मार काट बस इसे में उलझाए रखा बाकी सभी अन्य जाती उठान क्यों कर गयी ज्ञान कौशल को बढ़ाया हमने अहनकार को इसलिए प्रगति अवरुद्ध हुई एन्टीनाधारी  निहितार्थ स्वर्थी अल्प श्रम जीवी है परजीवी अधिक है तो कोई खतरा मोल ना लेते इधर उधर लुढ़कते रहते है समय काल परिस्थितियों अनुरूप वेश बदल लेते वह लक्षय से भृमित नही थे प्रत्येक जीव स्वतंत्र है भाई तो क्षत्रय बन्धन में क्यों है अब मौके का लाभ उठाओ ज्ञान कौशल से भरो अपने को  साभार ऋतु सिसोदिया 

ब्रह्म और पंचतत्वों का आपस में सामंजस्य-संक्षिप्त विमर्श

 ब्रह्म और पंचतत्वों का आपस में सामंजस्य-संक्षिप्त विमर्श   =====================================   जो भेद दृष्टि रखते हैं न तो वे पूर्णतः शाक्त हैं न वैष्णव न शैव न ही गाणपत्य और न ही सौर्य। चूंकि ब्रह्म है तो एक ही यथा "एकोहि रुद्रं द्वितीयोनाऽस्ति।  किंतु वह अपने कार्य भेद से अनेकों रुपों में विभक्त होकर साकार रूप ग्रहण कर लेता है - एकोऽहंबहुस्याम:।  जिस प्रकार से मनुष्य देह पंचतत्वों में विभक्त है। उसी प्रकार से वह ब्रह्म भी अपने आप को पांच तत्वों (पंच मुख्य स्वरुपों में ) पंचब्रह्म के रूप में विभक्त करता है। यथा: गणपति, सूर्य, विष्णु, शिव और शक्ति। यहां पर शक्ति का तात्पर्य किसी विशेष शक्ति से मत जोड़ लेना। क्योंकि कुछ लोग उस शक्ति को केवल दुर्गा, काली, तारा, भुवनेश्वरी, त्रिपुर सुंदरी, महालक्ष्मी, चण्डिका आदि तक ही सीमित समझ बैठते हैं। क्योंकि शक्ति के तो असंख्य, अनगिनत और अनंत रुप हैं। ये सब तो केवल कार्यभेद के अनुसार नामांतर मात्र हैं।  वही ब्रह्म जब ब्रह्माण्डोंं की रचना करता है तो सूर्य कहलाता है। आज का विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है क...

आध्यात्मिक चिन्तन आपके शब्दो मे अधिक शक्ति होनी चाहिए आवाज में नही

 आपके शब्दो मे अधिक शक्ति होनी चाहिए आवाज में नही क्योंकि फूल हल्की बारिश में ही खिलते है बाढ़ में नही आप किसी की कितना पसंद करते हो उससे कही ज्यादा उस व्यक्ति का आपके प्रति बर्ताव मायने रखता है पसंद आंतरिक गुणवत्ता के आधार परहोनी चाहिए नाकि बाहरी आकर्षण के आधार पर आकर्षण समय के साथ कम हो जाएगा किन्तु गुणवत्ता में और निखार की संभावनाबनी रहती है  जिस प्रकार मानव तन बाहरी चमक दमक देखकर हर्षित व आनंदित होते है,, सुख व दुख का अनुभव करते है क्योंकि अंर्तमन की गहराई में उतरना ही नही चाहते स्वयम को प्राप्त करना ही नही चाहते है जिसनी स्वयम को प्राप्त कर लिया वही परमात्मा को पाप्तकर आनंद व सुख से भर जाता है  जिस पर परमात्मा की कृपा है फिर उसे किसी अन्य की आवस्यकता नही वह आनंदित है सुखी है प्रतिपल प्रतिक्षण परमात्म की शरण मे  उसे बाहरी कोई भी वस्तु वयक्ति प्रभावित नही कर पाता व्यह मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाता है वह परमात्मा का दास कहलाता है जिस हेतु ईश्वर ने उसका चह्यन किया ,,वह अपने कर्तव्य कर्म को पूरी निष्ठा व भक्ति से पूर्ण कर इस जगत से अलविदा लेगा यह पावरफुल सोल दिव्य ऊर्जा...

भारत की अधिकतर भाषाओं की जननी संस्कृत ही है

 संस्कृत भारतीय उप महाद्वीप में यह भाषा लगभग छह हजार साल से पहले बोली जाती रही है। भाषाविज्ञान शास्त्री भी विभिन्न अध्ययनों में साफ कर चुके हैं कि भारत की अधिकतर भाषाएं संस्कृत से ही निकली हैं। वेदों की भाषा वैदिक संस्कृत से ही आधुनिक संस्कृत निकली है। संस्कृत से प्राकृत भाषा का उदय हुआ और  प्राकृत से पालि भाषा। भारत की अधिकतर भाषाओं की जननी संस्कृत ही है ।  हालांकि पिछले कुछ समय से भारत में संस्कृत भाषा लेकर एक कुत्सित अभियान चलाया जा रहा है कि संस्कृत तो  पाली से निकली है। जबकि इस दावे को असत्य  साबित करने के लिए एक ही तथ्य काफी है। वह यह कि संस्कृत का व्याकरण अष्टाध्यायी के रचयिता महर्षि पाणिनी के जन्म के कई सदियों बाद तथागत बुद्ध हुए। महर्षि पाणिनी के साहित्य में बुद्ध का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। यानी  तथागत बुद्ध का कालखंड महर्षि पाणिनी के बाद का है। तथागत बुद्ध ने अपने प्रवचन पालि में दिए।उसी दौहरान पालि भाषा अस्तित्व में थी। यह भी तथ्य है कि पालि को संस्कृत से प्राचीन होने का दावा करने वाले  लोग इस बारे में अपना एक भी रिसर्च पेपर  भारतीय इ...

आंतरिक सशक्त होना है तो सत्य के साथ निष्पक्ष रहो:ऋतु सिसोदिया:

 आंतरिक सशक्त होना है तो सत्य के साथ निष्पक्ष रहो कुटिल दुसरो की हानि करकेखुद का भला सोचता है जबकि आद्यात्मिक्ता की राह पर चलने वाला स्वय दुख सहन करके दुसरो को सुख प्रदान करता है जबकि एक समझदार व्यक्तिना स्वयम की ना किसी अन्य का अहित करके बल्कि समाधान की ओर अग्रसर होता है जिससे सबका लाभ हो या लाभ ना होतो हानि तो कदापि ना हो  चालाक" का मतलब बुरी प्रवृत्ति नहीं होता। इसका अर्थ होता है समझदार, चतुर, और परिस्थिति के अनुसार सही निर्णय लेने वाला व्यक्ति। हालाँकि, कभी-कभी यह नकारात्मक रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है, जब किसी व्यक्ति को अत्यधिक चालाकी या चतुराई से किसी को धोखा देने वाला समझा जाता है। अगर चालाकी का इस्तेमाल सही दिशा में किया जाए, तो यह एक अच्छी विशेषता होती है, क्योंकि यह व्यक्ति को बुद्धिमान और परिस्थितियों को समझने वाला बनाती है। कर्मफल से कोई नही बच पाता अतः सत्कर्म करते रहे  साभार ऋतु सिसोदिया