तँत्र क्यो महत्वपूर्ण है

 


साधारण काम-कृत्य में दो उत्तेजित प्राणी मिलते है जो तनाव से भरे हैं ;उत्तेजित है ,स्वयं को भार मुक्त करने में प्रयत्न शील हैं। साधारण काम-कृत्य  पागलपन लगता है। तांत्रिक काम-कृत्य एक गहरा तनावशून्य ध्यान है।


इसमें कोई शक्ति नष्ट नहीं होती, बल्कि शक्ति प्राप्त होती है। तुम्हें इस बात का ख्याल भी नहीं होगा लेकिन यह एक जैविक जीव-ऊर्जा का एक तथ्य है कि स्त्री और पुरुष दो विपरीत शक्तियां हैं।


धन और ऋण; यिन और यैग, या जो कुछ भी तुम उन्हें नाम दो। वे दोनों एक दूसरे के लिए चुनौती हैं और जब वे दोनों गहन शिथिलता में मिलते हैं तो एक दूसरे को पुन: जीवन-शक्ति प्रदान करते हैं। 


वे दोनों एक दूसरे में जीवन संचार करते हैं वे दोनों और युवा हो जाते हैं वे दोनों और अधिक सजीवता अनुभव करते हैं वे दोनों नव-शक्ति से कांतिमय हो जाते हैं। और नष्ट कुछ भी नहीं होता।


दो विपरीत ध्रुवों के मिलन से नव शक्ति का संचार होने लगता है। तांत्रिक काम कृत्य उतना किया जा सकता है जितना तुम करना चाहते हो। साधारण काम कृत्य उतना नहीं किया जा सकता जितना तुम करना चाहते हो।


क्योंकि उसमें तुम्हारी ऊर्जा नष्ट हो रही है और तुम्हारे शरीर को उसे पुन: प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। और जब फिर प्राप्त होगी तभी तुम उसे फिर गंवा सकते हो।


यह बात अजीब-सी लगती है सारा जीवन इसे खर्च करने और फिर प्राप्त करने में ही व्यतीत हो जाता है। यहकेवल ग्रस्तता/ आब्सेशन है। दूसरी बात जो स्मरण रखने योग्य है। तुमने इस बात पर गौर नहीं किया होगा।


कि अगर तुम पशु-पक्षियों को देखो तो तुम उन्हें काम- कृत्य का आनंद लेते कभी न पाओगे। बंदरों, कुत्तों या किसी भी पशु को देखो–तुम ऐसा कभी नहीं देखोगे कि वे काम-कृत्य करते हुए हर्षित हो रहे हैं ,आनंदित हो रहे हैं।


उनके लिए यह एक यांत्रिक कृत्य है.. कोई प्राकृतिक शक्ति उन्हें इस कर्म में धकेल रही है। उनके चेहरे देखो। वहां कोई आनंद की झलक नहीं–जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जब ऊर्जा विवश करती है।


जब ऊर्जा अतिशय हो जाती है वे बाहर फेंक देते हैं। पशु कभी इसका आनंद नहीं उठा सकते–केवल मनुष्य ही इसका आनंद ले सकता है। और जितनी गहराई से आनंद उठा सकते हो उतनी ही तुममें मानवता का जन्म होता है।


और अगर कहीं काम कृत्य ध्यान बन जाए तो तुम उच्चतम शिखर को छूने में समर्थ हो जाते हो। लेकिन याद रखो, तंत्र, घाटी का कामोत्ताप है। यह शिखर का अनुभव नहीं है यह घाटी का अनुभव है।


तुम उत्तेजना में शिखर की ओर बढ़ते हो और फिर धड़ाम से नीचे गिर जाते हो और फिर हाथ आती है खिन्नता। तुम ऊंचे शिखर से गिर पड़ते हो। तंत्र-काम कृत्य में तुम ऐसा कभी अनुभव नहीं करते।


तुम नीचे नहीं गिर रहे। तुम और इसके आगे नीचे नहीं गिर सकते–तुम घाटी में ही थे। बल्कि तुम ऊपर उठ रहे हो। तुम्हें ऐसा लगता है जैसे तुम ऊर्जा से भर गए हो ।तुम और सजीव, ओजस्वी, कांतिमय हो गए हो। 


और वह आनंद कई घंटों तक यहां तक कि कई दिनों तक बना रहेगा। यह सब इस बात पर आश्रित है कि तुम इस कृत्य में कितना गहरे जा पाए थे।और अगर तुम देर-अबेर इसमें गति कर सको तो तुम जान सकोगे।


वीर्य-स्खलन से ऊर्जा नष्ट होती है। इसकी आवश्यकता ही नहीं है–जब तक तुम्हें बच्चों की आवश्यकता नहीं है। और सारा दिन तुम एक गहन शिथिलता, एक गहन विश्रांति महसूस करोगे।


और कई दिनों तक तुम्हें एक ऐसे सुख का अनुभव होगा जैसे तुम घर पहुंच गए हो तुम्हें अहिंसा, अविरोध, अखिन्नता की मीठी प्रतीति होगी। ऐसा व्यक्ति दूसरों के लिए कभी कोई खतरा नहीं बन सकता। 


अगर संभव होगा तो वह दूसरों को प्रसन्न रखने मेंसहायक होगा। अगर वह ऐसा नहीं कर सकेगा तो कम से कम किसी को दुख न देगा। केवल तंत्र ही नये मनुष्य का निर्माण कर सकता है।


एक ऐसा मनुष्य जिसने समय -शून्यता, निरहंकारिता का जान लिया है और अब अस्तित्व के साथ गहरा अद्वैत विकसित होगा। एक दूसरा आयाम खुल गया है। अब वह घड़ी दूर नहीं जब काम-वासना तिरोहित हो जाएगी। 


जब काम वासना अनजाने ही विलीन हो जाती है तब अचानक एक दिन तुम्हें ज्ञात होता है कि काम-वासना तिरोहित हो गई है और तब ब्रह्मचर्य का जन्म होता है।


लेकिन गलत शिक्षा के कारण कठिन और दुःसाध्य लगती है। और तुम भयभीत भी हो अपने मन के संस्कारों के कारण।


                                              

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