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शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

श्वास

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 एक तो, श्वास की गति मनोदशा से बंधी है। जैसा मन होता, वैसी हो जाती श्वास की गति। जैसी होती अंतर स्थिति, श्वास के आंदोलन और तरंगें, वाइब्रेशंस, फ्रीक्वेंसीज बदल जाती हैं। 


श्वास की फ्रीक्वेंसी, श्वास की तरंगों का आघात खबर देता है, कि मन की दशा कैसी है। अभी तो मेडिकल साइंस उसकी फिक्र नहीं कर पाई, क्योंकि अभी मेडिकल साइंस शरीर के पार नहीं हो पाई है।


इसलिए अभी प्राण पर उसकी पहचान नहीं हो पाई लेकिन जैसे मेडिकल साइंस ब्लडप्रेशर को, खून के दबाव को नापती है। जब तक पता नहीं था, तब तक कोई खून के दबाव का सवाल नहीं था।


रक्तचाप,  रक्त का परिभ्रमण भी नई खोज है। तीन सौ साल पहले आधुनिक विज्ञान को पता नहीं था कि शरीर में खून चलता है। खून के चलने का पता तीन सौ साल पहले ही लग पाया। 


और जब खून के चलने का पता लगा, तो यह भी पता लगा धीरे-धीरे कि खून का जो प्रेशर है, वह व्यक्ति के स्वास्थ्य के गहरे अंगों से जुड़ा हुआ है। इसलिए ब्लड प्रेशर चिकित्सक के लिए नापने की खास चीज हो गई।


लेकिन अभी तक भी हम यह नहीं जान पाए कि जैसे ब्लडप्रेशर है, वैसा ब्रेथप्रेशर भी है। वैसे वायु का अधिक दबाव और कम दबाव, वायु की गति और तरंगों का आघात-भेद, व्यक्ति की अंतर मनोदशा को परिवर्तित करता है। वह उसकी जीवन-ऊर्जा से संबंधित है।  


उदाहरण के लिए जब आप क्रोध में होते हैं, तो आपकी श्वास की गति बदल जाती है। वैसी ही नहीं रह जाती, जैसी साधारण होती है। इसका मतलब यह भी कि अगर आप श्वास की गति पर काबू पा लें।


तो आप फिर क्रोध पर काबू पा सकते हैं। अगर श्वास की गति न बदलने दें, तो क्रोध आना मुश्किल हो जाएगा।इसलिए जापान में  बच्चों को घरों में प्राणयोग का ही एक सूत्र सिखाते हैं। 


माता- पिता बच्चों को परंपरा से यह सिखाते हैं कि जब क्रोध आए, तब तुम श्वास को आहिस्ता लो, धीमे-धीमे लो। गहरी लो और धीमे लो। स्लोली एंड डीप, धीमे और गहरी। 


बच्चों को वे यह नहीं कहते कि क्रोध मत करो, जैसा कि सारी दुनिया कहती है। क्रोध न करना, हाथ की बात नहीं है। और मजा तो यह है कि जो पिता बच्चे को कह रहा है, क्रोध मत करो।


अगर बच्चा न माने तो स्वयं ही क्रोध करके बता देता है कि ''नहीं मानता! इतना कहा कि क्रोध मत कर!'' वह भूल ही जाता है कि अब हम खुद ही वही कर रहे हैं, जो हम उसको मना किए थे।


क्रोध इतना हाथ में नहीं है, जितना लोग समझते हैं कि क्रोध मत करो। क्रोध इतना वालंटरी नहीं है, नान वालंटरी है। इतना स्वेच्छा में नहीं है, जितना लोग समझते हैं। इसलिए शिक्षा चलती रहती है।


कुछ अंतर नहीं पड़ता है! योग का पुराना सूत्र, बुद्ध के द्वारा जापान में पहुंचा। बुद्ध ने श्वास पर बहुत जोर दिया। कोई आती-जाती श्वास के राज को पूरा समझ ले, तो फिर उसको दुनिया में और कुछ करने को नहीं रह जाता।


इसलिए बुद्ध तो कहते हैं, अनापानसती योग सध गया कि सब सध गया। क्रोध आता है, तब आप देखें कि श्वास बदल जाती है। जब आप शांत होते हैं, तब श्वास बदल जाती है, रिदमिक हो जाती है। 


आप आरामकुर्सी पर भी लेटे हैं, शांत हैं, मौज में हैं, चित्त प्रसन्न है, पक्षियों जैसा हलका है, हवाओं जैसा ताजा है, आलोकित है। तब देखें, श्वास ऐसी हो जाती है, जैसे हो ही नहीं। पता ही नहीं चलता। 


बहुत हलकी हो जाती है; न के बराबर हो जाती है। जब कामवासना मन को पकड़ती है, श्वास एकदम अस्तव्यस्त हो जाती है ,रक्तचाप बढ़ जाता है, शरीर पसीना छोड़ने लगता है, श्वास तेज हो जाती है और टूट-फूट जाती है।


प्रत्येक समय भीतर की स्थिति के साथ श्वास जुड़ी है। अगर कोई श्वास में बदलाहट करे, तो भीतर की स्थिति में बदलाहट की सुविधा पैदा करता है, और भीतर की स्थिति पर नियंत्रण लाने का पहला पत्थर रखता है।


प्राणयोग का इतना ही अर्थ है कि श्वास बहुत गहरे तक प्रवेश किए हुए है, वह एक तरफ शरीर को स्पर्श करती है, दूसरी तरफ आत्मा को स्पर्श करती है। एक तरफ बाहर जगत को छूती है।


और दूसरी तरफ भीतर ब्रह्म को भी छूती है। श्वास दोनों के बीच आदान-प्रदान है–पूरे समय, सोते-जागते, उठते-बैठते। इस आदान-प्रदान में श्वास का रूपांतरण प्राणयोग है, ट्रांसफार्मेशन आफ दि ब्रीदिंग प्रोसेस। 


वह जो प्रक्रिया है हमारे श्वास की, उसको बदलना। और उसको बदलने के द्वारा भी व्यक्ति परमसत्ता को उपलब्ध हो सकता है। जो लोग भी ध्यान का कभी थोड़ा अनुभव किए हैं, उनको पता है। जो गहरा प्रयोग करते हैं।


वे कहते हैं कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि श्वास बंद हो गई, चलती ही नहीं! तो हम बहुत घबड़ा जाते हैं कि इससे कुछ खतरा तो न हो जाएगा। घबराने की जरा भी जरूरत नहीं है। घबराएं तब, जब श्वास बहुत जोर से चले। 


जब बिलकुल लगे कि ठहर गई, जब लगे कि श्वास का कंपन ही नहीं है, तब आप उस बैलेंस को, उस संतुलन को उपलब्ध होते हैं। तब ऊपर की श्वास ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती है। 


बाहर की बाहर और भीतर की भीतर रह जाती है। और एक क्षण के लिए ठहराव आ जाता है। सब ठहर जाता है। न तो बाहर की श्वास भीतर जाती, न भीतर की श्वास बाहर आती। 


न ऊपर की श्वास ऊपर जाती, न नीचे की श्वास नीचे जाती। सब ठहर जाता है।श्वास के इस ठहराव के क्षण में परम अनुभव की किरण उत्पन्न होती है। श्वास के इस पूरे ठहर जाने में अस्तित्व पूरा संतुलित हो जाता है।


संयम को उपलब्ध हो जाता है। फिर कोई मूवमेंट नहीं, आंदोलन नहीं। फिर कोई परिवर्तन नहीं। फिर कोई हेर-फेर नहीं, बदलाहट नहीं, कोई गति नहीं। उस क्षण में आदमी परमगति में उतर जाता है या शाश्वत में डूब जाता है या इटरनल, सनातन से संपर्क साध लेता है।


श्वास का आंदोलन हमारा परिवर्तनशील जगत से संबंध है। श्वास का आंदोलनरहित हो जाना, अपरिवर्तनशील नित्य जगत से संबंधित हो जाना है। इसलिए श्वास का यह ठहर जाना बड़ी अदभुत अनुभूति है। 


कोशिश करके ठहराने की जरूरत भी नहीं है। क्योंकि कोशिश करके कभी नहीं ठहरा सकते। अगर आप कोशिश करके ठहराएंगे, तो भीतर की श्वास बाहर जाना चाहेगी, बाहर की श्वास भीतर जाना चाहेगी।


कोशिश करके कोई व्यक्ति श्वास को रोक नहीं सकता। हां, श्वास को आहिस्ता-आहिस्ता प्रशिक्षित किया जा सकता है, रिदमिक किया जा सकता है, तैयार किया जा सकता है लयबद्धता के लिए।


और अगर कोई प्राणायाम के साथ-साथ ध्यान में गहरा उतरता चला जाए, तो एक क्षण ऐसा आ जाता है कि प्रशिक्षित श्वास और ध्यान की शांत स्थिति का कभी मेल, टयूनिंग हो जाती, तो श्वास ठहर जाती है।


और भी एक आश्चर्य की बात कि जब श्वास ठहरती है, तब तत्काल विचार ठहर जाते हैं। बिना श्वास के विचार नहीं चल सकते। इसे जरा देखें, कभी ऐसे ही एक सेकेंड को श्वास को ठहराकर। 


इधर श्वास ठहरी, भीतर विचार ठहरे, एकदम ब्रेक! श्वास बिलकुल ब्रेक का काम करती है विचार पर। लेकिन जब आप ठहराते हैं, तब ज्यादा देर नहीं ठहर सकती। श्वास भी निकलना चाहेगी और विचार भी हमला करना चाहेंगे।


क्षणभर को ही गैप आएगा। लेकिन जब श्वास, प्रशिक्षित श्वास ध्यान के संयोग से अपने आप ठहर जाती है, तो कभी-कभी घंटों ठहरी रहती है। रामकृष्ण परमहंस के जीवन में ऐसे बहुत मौके हैं। 


कभी-कभी तो ऐसा हुआ है कि वह छः-छः दिन तक ऐसे पड़े रहते कि जैसे मर गए! प्रियजन घबरा जाते, मित्र घबरा जाते, कि अब क्या होगा, क्या नहीं होगा! सब ठहर जाता। 


उस ठहरे हुए क्षण में, इन दैट स्टिल मोमेंट.. चेतना समय के बाहर चली जाती, कालातीत हो जाती। विचार के बाहर हुए, निर्विचार में गए, ब्रह्म के द्वार पर खड़े हैं। विचार में आए, विचार में पड़े, कि संसार के बीच आ गए हैं।


संसार और मोक्ष के बीच पतली-सी विचार की पर्त के अतिरिक्त और कोई फासला नहीं है। पदार्थ और परमात्मा के बीच पतले, झीने विचार के पर्दे के अतिरिक्त और कोई पर्दा नहीं है। लेकिन यह विचार का पर्दा कैसे जाए?


दो तरह से जा सकता है। या तो कोई सीधा विचार पर प्रयोग करे ध्यान का, साक्षी-भाव का, तो विचार चला जाता है। जिस दिन विचार शून्य होता है, उसी दिन श्वास भी शांत होकर खड़ी रह जाती है। 


या फिर कोई प्राणयोग का प्रयोग करे, श्वास का। श्वास को गति दे, व्यवस्था दे, प्रशिक्षण दे; और ऐसी जगह ले आए, जहां श्वास अपने आप ठहर जाती है–बाहर की बाहर, भीतर की भीतर, ऊपर की ऊपर, नीचे की नीचे।


 और बीच में गैप, अंतराल आ जाता है; खाली, वैक्यूम हो जाता है, जहां श्वास नहीं होती। वहीं से छलांग, दि जंप। उसी अंतराल में छलांग लग जाती है परमसत्ता की ओर।

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