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रविवार, 13 जनवरी 2013

लास वेगास में टीवी की बदलती तस्वीर

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अमेरिका के लास वेगास को आलीशान होटलों और कसीनो के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक मेला भी लगता है. इस बार इस मेले में एचडी और ओएलईडी टीवी का जादू बिखरा हुआ है. एक टीवी की कीमत छह लाख तक है. अमेरिका के लास वेगास को आलीशान होटलों और कसीनो के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक मेला भी लगता है. इस बार यहां एचडी और ओएलईडी टीवी का जादू बिखरा हुआ है. एक टीवी की कीमत 60 लाख रुपये तक है. तकनीक में दो मजेदार चलन हैं: एक तो हर मुमकिन उपकरण के आकार को छोटा करने का और दूसरा फोन और टीवी की स्क्रीन को बड़ा करने का. कंप्यूटर छोटे हो कर टैबलेट की शक्ल ले चुके हैं, तो टीवी की स्क्रीन अब 90 इंच तक हो गई है. कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स शो यानी सीईएस में दुनिया भर की टीवी बनाने वाली कंपनियों ने शिरकत की है. इनमें सैमसंग, सोनी, एलजी, शार्प और पैनासोनिक शामिल हैं. खास तौर से सैमसंग और पैनासोनिक का पलड़ा इस शो में भारी लग रहा है. 89" का स्मार्ट टीवी सैमसंग के एस9 को देखने के लिए यहां काफी भीड़ जमा हो रही है. यह टीवी यूएचडी यानी अल्ट्रा हाई डेफिनिशन तकनीक का इस्तेमाल करता है और इसकी स्क्रीन 89 इंच की है. सैमसंग का दावा है कि इस तकनीक से तस्वीरें एचडी के मुकाबले चारगुना साफ दिखती हैं. इसकी यही खासियत तस्वीरों में अनोखी जान डाल देता है. इसके अलावा अत्याधुनिक कंप्यूटर की तरह इस टीवी में क्वाड्रा कोर प्रोसेसर लगा है, जिस कारण इसे स्मार्ट टीवी का नाम दिया गया है. टीवी देखते देखते अगर दोस्तों से बात करने का मन करे या गेम खेलने का मन हो तो उठ कर फोन या कंप्यूटर तक जाने की जरूरत नहीं. सब कुछ इस स्मार्ट टीवी में हो जाएगा. सैमसंग ने इसमें पांच पैनल बनाए हैं. पहला पैनल 'ऑन टीवी' सामान्य केबल टीवी की तरह काम करता है. लेकिन यह आपके पसंदीदा कार्यक्रम को खुद ही सेव कर लेता है. जब आप टीवी देख रहे होते हैं, यह खुद ब खुद कोने में एक छोटी स्क्रीन पर देखा हुआ दूसरा कार्यक्रम भी लगा देता है ताकि आप उसे देखना भूल न जाएं. इस तरह से एक ही साथ टीवी पर कई छोटी स्क्रीन दिख सकती हैं. दूसरा पैनल है 'मूवी एंड टीवी'. इसमें भी टीवी मनपसंद फिल्मों पर ध्यान देता है. पर इस पैनल में ऑन डिमांड वीडियो चलते हैं, जिन्हें आपने अलग से पसंद किया होता है. तीसरा पैनल है 'फोटो, वीडियो एंड मूवी'. यहां आप कंप्यूटर की तरह टीवी में सेव की गयी तस्वीरें वगैरह देख सकते हैं. चौथा पैनल है 'एप्स'. यहां भी कंप्यूटर या स्मार्टफोन की ही तरह टीवी को इस्तेमाल किया जा सकता है. पांचवां और आखिरी पैनल है 'सोशल' यानी यहां आप फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब के जरिए वीडियो देख सकते हैं. ओएलईडी के फीचर यूएचडी के अलावा ओएलईडी यानी ऑर्गेनिक लाइट एमिटिंग डायोड की भी मेले में धूम है. इसी तकनीक पर चलने वाले सैमसंग के एफ9500 में भी अनोखे फीचर हैं. इस टीवी के सामने बैठ कर दो लोग दो अलग अलग कार्यक्रम देख सकते हैं. इसके लिए खास 3डी चश्मों की जरूरत पड़ेगी. इस टीवी की कीमत 10,000 डॉलर रखी गयी है. सैमसंग का कहना है कि उसने दुनिया का पहला ऐसा टीवी बनाया है जिसकी स्क्रीन हल्की सी मुड़ी है. इससे तस्वीरें और भी शानदार दिखती हैं. लेकिन मेले में इस तकनीक को दिखाने वाले और भी हैं. एलजी ओएलईडी टीवी बनाने वाली पहली कंपनी के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहता है. 55 इंच वाले ओएलईडी टीवी की कीमत 12,000 डॉलर है. इसी तरह पैनासोनिक भी 4के ओएलईडी टीवी लाया है. 56 इंच स्क्रीन के साथ पैनासोनिक का दावा है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा ओएलईडी टीवी है. इसमें फेशियल रेकॉगनिशन तकनीक लगी है जो टीवी के सामने बैठे व्यक्ति के चेहरे को पहचान लेती है. इसके जरिए टीवी आपको बता सकता है कि आपके दोस्त इस वक्त क्या देख रहे हैं. ओएलईडी तकनीक वाले टीवी दूसरे टीवी के मुकाबले कईगुना पतले होते हैं. इनमें तस्वीरों के रंग बेहतरीन होते हैं और बिजली की खपत कम होती है. हालांकि इनकी कीमत देखते हुए जानकारों का मानना है कि इन्हें बाजार में जगह बनाने में समय लग सकता है. लेकिन तकनीक के शौकीन फिलहाल लास वेगास में इन चमकती तस्वीरों का लुत्फ उठा सकते हैं. यह मेला 8 से 11 जनवरी तक चलेगा. आईबी/एजेए (एएफपी, डीपीए) DW.DE

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गुरुवार, 3 जनवरी 2013

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज

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लंदन. साइंस मैगजीन ने वर्ष 2012 की 10 सबसे बड़ी खोज की सूची जारी की है। इसमें हिग्स बोसोन की खोज शीर्ष स्थान पर रही है। वैज्ञानिक पिछले 4 दशकों से ‘गॉड पार्टिकल’  की तलाश में थे। यह है 2012 की टॉप-10 उपलब्धियां-
हिग्स बोसोन

जुलाई 2012 में यूरोपीय न्यूक्लीयर रिसर्च टीम ने जिनेवा के सर्न में घोषणा की कि उन्होंने एक ऐसे कण को खोज लिया है जो ‘गॉड पार्टिकल’ की अवधारणा पर खरा उतरता है। वैज्ञानिकों ने उस पार्टिकल की खोज में स्विस-फ्रांस बॉर्डर पर दुनिया की सबसे बड़ी एटम स्मेशिंग मशीन स्थापित की। साइंस न्यूज जर्नलिस्ट एड्रियन चो ने लिखा- बोसोन ने ही अंतरिक्ष में विद्यमान‘हिग्स फील्ड’ के जरिए तत्वों को घनत्व प्रदान किया। घनत्व के बिना ब्रह्मांड की अस्तित्व नामुमकिन है।



2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज


डेनिसोवान जीन

विलुप्त मानव प्रजाति ‘डेनिसोवांस’ के डीएनए ब्लूप्रिंट के सीक्वेंस को खोजना। ये 41 हजार साल पहले साइबेरिया में रहते थे।

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज


स्टेम सेल से अंडा बनाना

जापानी रिसर्चर ने चूहे के एंब्रायोनिक स्टेम सेल से अंडे का निर्माण किया। जिससे नए चूहे की उत्पत्ति हुई। भविष्य में नि:संतान दंपत्ति के लिए वरदान साबित होगी।

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज
मेजोराना फर्मिनोस

हर तत्व में पाया जाने वाला एक ऐसा तत्व जो अपने मूल तत्व से हटकर व्यवहार करता है जो वस्तु के साथ होने वाली क्रिया का बिलकुल हटकर व्यवहार दर्शाता है। इस तत्व को लेकर गत 7 दशकों से बहस छिड़ी हुई थी।





2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज

एक्स रे से प्रोटीन खोज

सामान्य स्रोत से एक अरब गुना तेज चमकीली एक्स-रे से अफ्रीकन स्लीपिंग सिकनेस पैदा करने वाले एंजाइम की खोज। इस बीमारी से हर साल 30 हजार लोग मरते हैं।


2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज


जीनोम टूल टेलेन

ट्रांसक्रिप्शन एक्टिवेटर लाइक इफेक्टर न्यूक्लियस(टेलेन), जो बीमार जीव के शरीर से स्वस्थ्य व्यक्ति में आने वाले जीन और सेल का पहचान करता है। जिससे पशु-पक्षियों से इंसानों में आने वाली बीमारियों की रोका जा सकेगा।



2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज


क्यूरोसिटी लैंडिंग

नासा के क्यूरोसिटी रोवर के लैंडिंग सिस्टम को पांचवें स्थान पर रखा गया। अमेरिका के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के तहत, 3.3 टन के रोवर की लैंडिंग।

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज

एनकोड प्रोजेक्ट

एक दशक की स्टडी के रिजल्ट के मुताबिक मानवीय जीनोम वैज्ञानिकों की सोच से अधिक 80 प्रतिशत सक्रिय पाया गया है जो नई संभावनाएं विकसित करेंगी।



2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज

न्यूट्रीनो मिक्सिंग

चीन के वैज्ञानिकों ने डाया बे रिएक्टर न्यूक्लीयर एक्सपेरीमेंट के जरिए न्यूट्रीनो को प्रकाश की रफ्तार से गति कराकर एकरूप बनाने में कामयाबी हासिल की है।

2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज





ब्रेन मशीन इंटरफेस

दिमाग की न्यूरल रिकॉर्डिग के जरिए कम्प्यूटर स्क्रीन पर कर्सर नियंत्रण कर दिखाया। लकवाग्रस्त व्यक्ति मैकेनिकल हाथ को दिमाग से कई दिशाओं में घुमा सकता है। इसे भविष्य में स्पाइनल चोट और अन्य मामलों में प्रयोग संभव होगा। sabhar : bhaskar.com



2012 की सबसे बड़ी खोज ‘गॉड पार्टिकल’, जानिए इस साल की टॉप 10 खोज


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मंगलवार, 6 नवंबर 2012

वायु से बनेगा शुद्ध जल और ऊर्जा

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अबू धाबी। फ्रांसीसी इंवेटर और ईओलवाटर के संस्थापक मार्क पेरेंट ने कई वर्षो तक हवा में घुली वाष्प को संघनन करने की चेष्टी की और अंत में सफलता भी पाई। उन्होंने जिस एयर कंडीशनर को तैयार किया है, वह विंड टरबाइन के साथ वाणिज्यिक स्तर पर वायुमंडलीय नमी को संघनीभूत कर सकता है।
पिछले साल उनके इस उपकरण से अबू धाबी में करीब 500-800 लीटर शुद्ध व ताजे जल को एक दिन में तैयार किया। इनके उपकरण ईओलवाटर डब्ल्यूएमएस1000 को केवल मरूभूमि में ही नहीं लगाया जा सकता है। यह उन स्थानों पर भी भूमिका निभा सकता है, जहां पानी की आपूर्ति के लिए आधारभूत व्यवस्थाएं नहीं है।

पांचवीं पीढ़ी के इस उपकरण के लिए 19.7 फीट गुणा 6.5 फीट की जगह चाहिए, जहां वाटर कंडेंसर सिस्टम शीर्ष पर करीब 78 फीट पर स्थापित किया जा सके। इसे 30 केवी का विंड टरबाइन संचालित करता है, जिसके लिए हवा की रफ्तार 24 किमी प्रति घंटा होनी चाहिए। टरबाइन में रोटर का व्यास 42 फीट है। वाष्प की संघनीभूत होने के बाद पानी फिल्टर होकर स्टेनलैस स्टील के टैंक में संग्रह हो जाता है। sabhar :patrika.com

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रविवार, 20 मई 2012

निजी विमान से अंतरिक्ष की सैर

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वो दिन दूर नहीं जब हम और आप अंतरिक्ष में सैर के लिए जाएंगे. वजह है अंतरिक्ष यान का आसानी से उपलब्ध होना. एक निजी कंपनी ने पहली बार आसमान में अपना निजी रॉकेट छोडने की पहल की है.
अमेरिका के कैलिफोर्निया की इस कंपनी का नाम है स्पेस एक्स. इस कंपनी की शनिवार को अपना निजी रॉकेट अंतरिक्ष के लिए रवाना करने की योजना थी, लेकिन उसे अंतिम समय में मोटर में तकनीकी समस्या के कारण रोक दिया गया है. इतिहास में ये पहली बार है जब कोई निजी कंपनी अपना रॉकेट अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र आईएसएस के लिए रवाना कर रही है. हालांकि ये टेस्ट उड़ान है. लेकिन कहा जा रहा है कि इसकी सफलता या असफलता से अमेरिका के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर काफी असर पड़ेगा. चालीस साल में यह पहला मौका है जब यान भेजने का ठेका गैर सरकारी कंपनी को मिला है.
राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार जॉन हाल्ड्रेन इसे नासा का एक और व्यापारिक अभियान मानते हैं. गौरतलब है कि इस अभियान में नासा की ओर से भी पैसा लगाया गया है. अभियान में नासा ने 38 करोड़ डॉलर खर्च किया है जबकि कंपनी की ओर से 1 अरब डॉलर का खर्चा किया गया है.
नासा के स्पेस स्टेशन कार्यक्रम के मैनेजर माइक सफ्रैदिनी का कहना है कि हमें इस तरह की टेस्ट उड़ान की सफलता या असफलता को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं होना चाहिए. परीक्षण उड़ानों का परिणाम कई बार योजना के मुताबिक नहीं होता. कंपनी के मालिक एलन मस्क भी मानते हैं कि इसमें दुर्घटना की संभावना होती है.
दो दिन की नियोजित उड़ान के बाद जब रॉकेट अंतरिक्ष केन्द्र के नजदीक पहुंच जाएगा तो इसके कैप्स्यूल ड्रैगन को अभ्यास गतिविधियां करने के लिए कहा जाएगा ताकि बाद में उसे आईएसएस में जुड़ने का निर्देश दिया जा सके. इसके बाद इसमें लदा करीब आधा टन खाद्य पदार्थ उतारा जाएगा. हालांकि अंतरिक्ष में इंसान भेजने की क्षमता स्पेस एक्स और कुछ दूसरी कंपनियां हासिल कर चुकी थी. यही वजह है कि अमेरिकी कांग्रेस में बहुत से लोगों ने इस कंपनी को मदद दिए जाने का विरोध भी किया है. डच अंतरिक्ष यात्री एंड्रे कुइपर्स का कहना है कि ये एक नये युग की शुरूआत है.
sabhar : dw.de

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पांच तरकीब जो बदल देंगी आपकी दुनिया

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आईबीएम वैसे तो आधुनिक कंप्यूटरों और तकनीक के लिए मशहूर है, लेकिन अब यह कंपनी पांच ऐसी नई तरकीब बाजार में ला रही है जिससे इंसान की जिंदगी बदल सकती है.
आईबीएम ने दिमाग में चल रहे विचारों को भांपने वाली मशीनों का आविष्कार किया है. इन मशीनों से पता लगाया जा सकेगा कि आप किस तरह के व्यक्ति से बात कर रहे हैं और उसके दिमाग में क्या चल रहा है. इस आविष्कार का नाम "आईबीएम 5 इन 5 है" और इसके लिए सामाजिक ट्रेंडों पर शोध किया गया है. 2017 से कंपनी अपने शोध के नतीजों का इस्तेमाल करना शुरू करेगी. "5 इन 5" का मतलब है, पांच ऐसे आविष्कार जो आने वाले सालों और महीनों में इंसान की जिंदगी बदल सकते हैं.
इनमें से पहला है पीपुल पॉवर. आईबीएम के वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य के हिलने डुलने से बहुत सारी ऊर्जा पैदा होती है और भविष्य में इसका सही तौर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा. अब कंपनी ऐसे तकनीक पर काम कर रही है जो किसी के चलने या काम करने से पैदा हो रही गर्मी को कहीं जमा कर सके ताकि उसका उपयोग बाद में किया जा सके.
दूसरी खोज के बारे में आईबीएम का कहना है कि स्काइवॉकर और एक्स मेन फिल्मों की तरह अब कंपनी ऐसी तकनीक बना रही है जिससे दिमाग को कंप्यूटर या स्मार्टफोन से जोड़ा जा सकता है. मिसाल के तौर पर आप अगर किसी को फोन करना चाहें, तो आपको केवल उसके बारे में सोचना होगा और फोन अपने आप कनेक्ट हो जाएगा. कंप्यूटर के स्क्रीन को भी आप अपनी सोच से नियंत्रित कर सकेंगे.
भविष्य में पासवर्ड की भी जरूरत नहीं होगी क्योंकि आंखों में रेटिना और आवाज से कंप्यूटर आपको पहचान लेगा. एटीएम से अगर आप पैसे निकालना चाहें, तो आपको बस मशीन के सामने खड़ा होना पड़ेगा. आपकी रेटिना को पढ़ कर कंप्यूटर अपने आप आपको पहचान लेता है और आपको पैसे निकालने में आसानी होती है.
तीसरी खोज पर एक बयान में कंपनी ने लिखा, "हूदीनी से लेकर स्काइवॉकर और फिर एक्स मेन, दिमाग को पढ़ना साइंस फिक्शन तक सीमित रह गया है, लेकिन कल्पना के फैंस की मन्नतें पूरी हो सकती हैं." हूदीनी एक मशहूर अमेरिकी जादूगर थे जो लोगों की भीड़ के बीचोंबीच से गायब होने और अपने आप को जंजीरों से छुड़ाने में अव्वल थे. अब माइंड रीडिंग एक आम बात होने वाली है.
आईबीएम ने अपने आविष्कारों में अमीरों को ही नहीं बल्कि समाज के हर स्तर के व्यक्ति को शामिल करने की कोशिश की है. दुनिया में ऐसे करोड़ों लोग हैं जिनके पास कंप्यूटर और यहां तक कि बिजली की सुविधा नहीं है. लेकिन कंपनी का कहना है कि आने वाले पांच सालों में दुनिया के 80 प्रतिशत लोगों के पास सेलफोन होगा और इससे बहुत सारे लोग वह सब काम कर पाएंगे जो वह इस समय नहीं कर पा रहे.
आईबीएम के 5 इन 5 में पांचवीं खोज आपके ईमेल इनबॉक्स में आपकी पसंद के संदेश लाएगी. बेकार के संदेश अब आपके ईमेल इनबॉक्स को भरेंगे नहीं. इंटरनेट में आपकी पसंदों को मापा जाएगा और उसके मुताबिक आपको संदेश भेजे जाएंगे.
sabhar : dw.de

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रविवार, 8 अप्रैल 2012

गूगल चश्में से करें फेसबुक स्टेटस अपडेट

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अब आपके हर प्रश्‍न का जवाब गूगल के साथ साथ गूगल चश्‍मा पर भी उपलब्‍ध होगा। आपकी हर कल्पना को अब गूगल चश्मा पूरी करेगा। आप इस गूगल चश्में को पहनकर किसी ऎतिहासिक बिल्डिंग को देखने पर उस बिल्डिंग का इतिहास आपके चश्में के लेंस पर डिस्प्ले हो जाएगा।


चश्मे से ही फोटो खींचना, चैटिंग करना, गूगल मैप यूज करना भी संभव हो सकेगा। यही नहीं आप इस गूगल चश्में से अपना फेसबुक स्टेटस भी अपडेट कर सकते हैं साथ ही आप वॉयस कमांड से रिप्लाई भी कर सकेंगे।


गूगल जल्द ही ऑगमेंटेड रियलिटी तकनीक से लैस एक चश्मा लाने वाला है। इस चश्मे को प्रोजेक्ट ग्लास नाम दिया है। sabhar : bhaskar.com
 
 

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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

शुक्र पर ओजोन की परत, जीवन का संकेत

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सौर मंडल के दूसरे ग्रह शुक्र के वायुमंडल में ओजोन की परत का मिलना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी कुंजी है. दूसरे ग्रहों को समझने के लिए भी सहायता मिलेगी. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जीवन के संकेत इस ग्रह पर मिल सकते हैं
वैज्ञानिक शुक्र ग्रह को कठोर और उथल पुथल वाला ग्रह बताते हैं और इसे नर्क की संज्ञा देते हैं. ऐसे में इस ग्रह पर ओजोन परत के अचानक मिलने से वैज्ञानिक आश्चर्य में हैं
गुरुवार को यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ईएसए) ने कहा कि वीनस एक्सप्रेस अंतरिक्ष यान ने पाया है कि सूर्य के नजदीकी ग्रह पर वायुमंडल है. वैज्ञानिकों का कहना है कि ओजोन की परत का मिलना यहां जीवन के होने का संकेत भी साबित हो सकता है. हालांकि शुक्र पर मिली ओजोन की परत बहुत ही विरल है, इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि यह जीवन के कारण है. लेकिन धरती के वायुमंडल में मिलने वाली ओजोन परत से तुलना कर यह जरूर पता लगाया जा सकता है कि क्या कहीं और जीवन संभव है.
वीनस एक्सप्रेस अंतरिक्ष यान से मिली सूचनाओं का विश्लेषण करने के बाद ईएसए के वैज्ञानिकों ने यह जानकारी दी है. डॉयचे वेले से बातचीत में ईएसए के शोधकर्ता फ्रांक मोंटमेसिन ने बताया, "हमें गैस के संकेत मिले हैं. यह अचानक था. हमने ध्यान से स्पेक्ट्रम देखा और हमें कुछ अप्रत्याशित संकेत मिले."
वीनस एक्प्रेस में लगे हुए उपकरण वीनस के वायुमंडल से गुजरते हुए तारों की रोशनी में तरंग दैर्ध्य के बदलाव को नापता है. शोधकर्ता मोंटमेसिन मानते हैं कि इससे पहले मंगल पर ओजोन की परत का मिलना तुलनात्मक रूप से सामान्य बात थी.
जर्मन एरोस्पेस सेंटर में खगोल जीवविज्ञानी आन्या बाउअरमाइस्टर ने डॉयचे वेले से बातचीत में बताया कि आंकड़े इसलिए भी विश्वसनीय हैं क्योंकि यह ग्रह के एकदम पास से लिए गए |  वीनस एक्प्रेस में लगे हुए उपकरण वीनस के वायुमंडल से गुजरते हुए तारों की रोशनी में तरंग दैर्ध्य के बदलाव को नापता है. शोधकर्ता मोंटमेसिन मानते हैं कि इससे पहले मंगल पर ओजोन की परत का मिलना तुलनात्मक रूप से सामान्य बात थी
जर्मन एरोस्पेस सेंटर में खगोल जीवविज्ञानी आन्या बाउअरमाइस्टर ने डॉयचे वेले से बातचीत में बताया कि आंकड़े इसलिए भी विश्वसनीय हैं क्योंकि यह ग्रह के एकदम पास से लिए गए हैं.


अब हमारे सौर मंडल में पृथ्वी सहित मंगल और शुक्र पर ओजोन की परत मिली है. पृथ्वी पर जीवित जीव ऑक्सीजन बनाते हैं. इसे पराबैंगनी रोशनी वायुमंडल की ऊपरी सतह में तोड़ती है. यह अणु ऑक्सीजन के दूसरे अणुओं से मिलकर ओजोन की परत बनाते हैं. रेडिएशन को सोख कर ओजोन की परत ग्रह का तापमान कम करने में मदद करती है.
बाउअरमाइस्टर कहती हैं कि माइक्रोब्स का शुक्र पर पाया जाना अटकलें हैं. वह कहती हैं, "सरल रूप में जीवन वहां ग्रह बनने के साथ ही पैदा हुआ हो सकता है." वीनस पर मिली इस परत का कारण ग्रह के वायुमंडल में सूरज की रोशनी का कार्बन डाइ ऑक्साइड में टूटना है
मोंटमेसिन कहते हैं, "शुक्र बहुत ही कठोर ग्रह है. जैसा कि लोग कहते हैं यह बिलकुल नर्क जैसा है, गर्म और अम्लीय
."
ओजोन की परत अक्सर बायोसिगनेचर मानी जाती है, यानी जीवन का संकेत. बाउअरमाइस्टर कहती हैं, "अगर हमें ओजोन सौरमंडल से बाहर के किसी ग्रह पर मिलती है तो हम नहीं कह सकते कि याहू...हमें जीवन मिल गया है." एक्सो जीवविज्ञानी और खगोल विज्ञानियों का मानना है कि कार्बन डाई ऑक्साइड और ऑक्सीजन के साथ ओजोन का मिलना जीवन होने की संभावना को बल देता है. बाउअरमाइस्टर का कहना है कि मीथेन और ऑक्सीजन भी बायोसिगनेचर के लिए अच्छा है.
मोंटमेसिन का कहना है कि शुक्र के वायुमंडल में मिली ओजोन ग्रह की सतह से सौ किलोमीटर दूर है. शुक्र पर सल्फ्यूरिक एसिड की परत इतनी मोटी है कि वीनस एक्प्रेस को ओजोन की और जांच करने में मुश्किल आ रही है. मोंटमेसिन कहते हैं कि शुक्र के वायुमंडल में गुब्बारे भेजे जा सकते हैं जो आगे की जांच करेंगे. हमें फिर से शुक्र पर जाना होगा और अलग तरह के आंकड़े लेने पड़ेंगे. तब पता लग सकेगा कि वहां जटिल जीव मौजूद हैं या नहीं.
sabhar dw.world.de.




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ग्रहों को निगल रहा है ब्लैक होल धनु-ए

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धरती से 26,000 प्रकाश वर्ष दूर एक विशाल ब्लैक होल एक एक कर ग्रहों, तारों और पिंडो को निगल रहा है. ब्लैक होल हमारी आकाश गंगा के केंद्र में है. वैज्ञानिकों के मुताबिक ब्लैक होल सूर्य से चार लाख गुना बड़ा है
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लिसेस्टर के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि यह ब्लैक होल हर दिन ब्रह्मांड में तैरती चीजों को निगलता जा रहा है. ब्लैक होल को सैजिटेरियस-A (धनु-ए) नाम दिया गया है. डॉक्टर कास्टीटिस जुबोवास के मुताबिक धनु-ए अपने सामने आने वाले गैस और धूल से बने क्षुद्र ग्रहों को तोड़ कर निगल रहा है. इस दौरान एक्स-रे किरणें और इंफ्रारेड विकीरण भी दिखाई पड़ रहा है.
डॉक्टर जुबोवास और उनके साथियों कहते हैं कि ब्लैक होल आकार में सूर्य से 4,00,000 गुना बड़ा है. ब्रह्मांड में तैर रहे तारों के अवशेषों को भी धनु-ए निगलता जा रहा है
यह जानकारी सामने आने के बाद यह बहस फिर छिड़ गई है कि क्या ब्लैक होल सौर मंडल को नए सिरे से बनाते हैं. ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के माउंट स्ट्रोम्लो ऑब्जरवेट्री के मिशेल बैनिस्टर कहती हैं, "आकाश गंगा का केंद्र एक अत्यंत ऊर्जा वाला स्थान है. बहुत कम दायरे में गतिशील रहने वाले कुछ ग्रह वहां पर बन सकते हैं."
एक्स रे किरणें और इंफ्रारेड विकीरण से साबित होता है कि आकाश गंगा के केंद्र के पास क्षुद्र ग्रह, पुच्छल तारे और ग्रह हो सकते हैं. मिशेल यह संभावना जताती है कि ब्लैक होल  ब्लैक होल और उसके किनारे बनते ग्रहों के संबंध में यह जानकारी नई है. मेलबर्न की स्विनबर्न यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर एलिस्टर ग्रैहम कहते हैं, "सभी नहीं, लेकिन अधिकतर आकाशगंगाओं के केंद्र में विशाल ब्लैक होल है." ग्रैहम भी इस बात से सहमत हैं कि धनु-ए की ताकत तारों को तोड़ रही है और हर दिन उससे एक्स रे किरणें और इंफ्रारेड विकीरण देखा जा रहा हैं
sabhar : dw.world.de  

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रविवार, 22 जनवरी 2012

इंसानी हुक्म का गुलाम 'असीमो'

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रोबोट असीमो
रोबोट का एक नया अवतार आ गया है जो इंसानी हुक्म का गुलाम है.
होंडा कंपनी की चार साल की मेहनत ने एक रोबोट को अद्भुत बना दिया और इसे नाम दिया है 'असीमो'. ये रोबोट एक नए अंदाज़ और बंपर तेवर के साथ हाजिर है.
ये रोबोट आदेश मिलने पर हर काम करता है, दौड़ता है, उछलता है, जूस बनाता है. इतना ही नहीं इस रोबोट को इस अंदाज़ में बनाया गया है, जिससे ये सिर्फ प्लेन सरफेस पर ही नहीं उबड़-खाबड़ इलाकों में भी बिल्कुल सधे हुए अंदाज़ में आसानी से चल सकता है.
ये रोबोट 9 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है.
इस रोबोट के पैर और हाथ में तो मूवमेंट है ही इसकी उंगलियां भी काम करती हैं.
होंडा कंपनी अब इस रोबोट में कुछ ऐसे गुण भरना चाहती है, जिससे ये रोबोट परमाणु संकट में अपने हुनर का दम दिखा सके.
साफ है अगले कुछ दिनों में ये रोबोट और भी कई खासियतों के साथ सामने होगा.

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बुधवार, 18 जनवरी 2012

मोड़ कर रख सकेंगे टीवी

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वैज्ञानिकों ने क्वांटम डॉट तकनीक विकसित की है, जिसकी मदद से लचीले टीवी स्क्रीन बनाए जा सकेंगे। अब आप 3-डी टीवी को भूल जाइए। रिसर्चर्स ने प्रकाश छोड़ने वाले ऐसे क्रिस्टल तैयार किए हैं, जिनकी मदद से बेहद पतले टीवी स्क्रीन बनाना संभव होगा। इन क्रिस्टल को क्वांटम डॉट्स(क्यूडी) नाम दिया गया है।

क्या हैं क्वांटम डॉट : क्वांटम डॉट रूपी क्रिस्टल का आकार हमारे एक बाल के एक लाखवें हिस्से के बराबर है। इन्हें बेहद सस्ते सेमी-कंडक्टर मटेरियल से बनाया गया है, जो अल्ट्रावॉयलेट या बिजली के संपर्क में आने पर प्रकाश छोड़ते हैं। इनके आकार में फेरबदल कर प्रकाश के रंग को नियंत्रित किया जा सकता है।

बनेंगे स्क्रीन : वैज्ञानिकों ने बेहद लचीली प्लास्टिक शीट पर इन्हें प्रिंट कर एक बेहद पतला डिस्प्ले बोर्ड बनाने में सफलता प्राप्त की है। यह डिस्प्ले बोर्ड ही एक स्क्रीन की तरह काम करेगा। लचीली प्लास्टिक से बने होने के कारण इसे किसी भी आकार में न सिर्फ ढाला जा सकेगा, बल्कि मोड़ कर कहीं भी रखा जा सकेगा।

कब तक आएगा : वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि क्वांटम डॉट टीवी सेट अगले वर्ष के अंत तक बाजार में होंगे। हालांकि इनके लचीले वर्जन को आने में अभी कुछ साल और लग जाएंगे। वास्तव में क्वांटम डॉट टीवी आज के फ्लैट टीवी सरीखे ही होंगे, लेकिन रंग और छरहरेपन के मामले में इनसे बेहतर होंगे।

आगे क्या : लचीले डिस्प्ले बोर्ड को कमरे के परदों और वॉलपेपर पर भी प्रिंट किया जा सकता है। इसकी मदद से उनका स्क्रीन की तरह इस्तेमाल हो सकेगा। हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक प्लास्टिक शीट के बजाए किसी अन्य मटेरियल पर इनके इस्तेमाल से पहले कई प्रयोग और करने होंगे। sabhar : bhaskar.com

 

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सोमवार, 16 जनवरी 2012

नासा ने खोजा पृथ्वी का जुड़वां ग्रह !

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पृथ्वी के बाहर जीवन की चाह फिर से परवान चढ़ रही है. दुनिया की सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था नासा ने बिलकुल पृथ्वी जैसा ग्रह खोज निकाला है. वह अपने सूर्य का चक्कर लगाता है. न बहुत ठंडा, न बहुत गर्म और पानी की पूरी संभावना.

कोई तीन साल पहले अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने नए ग्रहों की तलाश में केपलर नाम का टेलीस्कोप पृथ्वी से बाहर अनजान दुनिया की खोज में भेजा था. दो साल की मेहनत के बाद वैज्ञानिकों को वे तस्वीरें मिल गईं, जो अब तक की सबसे उत्साहित करने वाली बताई जा रही हैं. ऐसे ग्रह का पता चल रहा है, जो पृथ्वी से ढाई गुना बड़ा होगा. तापमान 22 डिग्री के आस पास यानी पानी न तो जमेगा और न ही खौलेगा. दिन वसंत ऋतु के किसी दिन की तरह खुशगवार होगा. उसकी स्थिति ऐसी जगह है, जहां पानी होने की पूरी संभावना दिख रही है यानी उस ग्रह में वह सारे गुण हैं, जो पृथ्वी में हैं और जिसके आधार पर जीवन की कल्पना की जा सकती है. केपलर को सम्मान देते हुए ग्रह का नाम रखा गया है, केपलर-22बी.
घर के बाहर घर
नए ग्रहों की तलाश के मामले में बड़ा योगदान देने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के ज्यॉफ मार्सी का कहना है, "यह मानव इतिहास की महान खोज मानी जाएगी. यह खोज बताती है हम होमोसेपियन (मनुष्य का बायोलॉजिकल नाम) पृथ्वी के बाहर घर की तलाश कर रहे हैं और ऐसी जगह पहुंच चुके हैं, जो हमें अपने घर की याद दिला रहा है."
नया ग्रह अपने प्रमुख सितारे की उसी तरह परिक्रमा कर रहा है, जैसा पृथ्वी सूर्य की करता है. उसका तारा सूर्य जितना ही बड़ा लग रहा है. केपलर-22बी को इसकी परिक्रमा करने में पृथ्वी से करीब 10 महीने कम लगभग 290 दिन का वक्त लगा है. बस इस ग्रह का आकार थोड़ा बड़ा है. यह पृथ्वी से करीब 2.4 गुना बड़ा है. फिर भी हमारे सौरमंडल के बाहर मिले दूसरे ग्रहों से इसका आकार छोटा है और यहां पानी होने की पूरी संभावना दिख रही है. ग्रह पानी और पत्थरों से बना हो सकता है और इसकी बनावट पृथ्वी और गैस तथा द्रव से बने नेप्च्यून ग्रहों के बीच की बताई जा रही है.
कैसे कहूं, क्या है
इस खोज से उत्साहित सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी की अंतरिक्ष विज्ञानी और नासा के केपलर अभियान की उप प्रमुख नताली बतालहा का कहना है, "हम पृथ्वी और नेप्च्यून ग्रहों के बीच के किसी ग्रह के बारे में ज्यादा नहीं बात कर सकते हैं क्योंकि हमारे सौरमंडल में ऐसा कोई ग्रह नहीं है. हम नहीं कह सकते हैं कि किस हिस्से में पानी होगा, कहां पत्थर होगा और किन इलाकों में बर्फ जमा होगी. हम जब तक इस बारे में जानकारी इकट्ठी नहीं कर लेते, तब तक कुछ नहीं बता पाएंगे."
लेकिन जानकारी इकट्ठी करना इतना आसान नहीं होगा. यह ग्रह हमारे सौरमंडल से कोई 600 प्रकाश वर्ष दूर है. एक प्रकाश वर्ष की दूरी तय करने में अनुमानित 10,000 अरब साल का वक्त लग जाता है. यानी मौजूदा वक्त की सबसे तेज उड़ान भरने वाला अंतरिक्ष यान केपलर-बी22 तक पहुंचने में कोई सवा दो करोड़ साल लगाएगा. मौजूदा वक्त में भले ही यह नामुमकिन लग रहा हो लेकिन विज्ञान अद्भुत आविष्कारों का गवाह रहा है और कब कौन सा आविष्कार कौन से दरवाजे खोल दे, कोई नहीं कह सकता.
मुश्किल से मिलता ग्रह
केपलर को बेहद जटिल प्रक्रिया के बाद गोल्डीलॉक्स जोन में इस ग्रह के बारे में पता चला. यह टेलीस्कोप सिर्फ उन्हीं ग्रहों की निशानदेही करता है, जो अपने तारों का चक्कर लगा रहे हों. किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने से पहले उस ग्रह के तीन चक्कर पूरे होने जरूरी हैं यानी तीन मौका ऐसा आना चाहिए, जब वह अपने मुख्य ग्रह के सामने से गुजरे. इस खोज को अलग अलग तीन जगहों की सहमति मिलनी चाहिए. केपलर की रिसर्च में 2326 ग्रहों की स्टडी की गई, जिसमें 10 ग्रह ऐसे निकले, जो पृथ्वी के आकार के हैं और अपने तारों का चक्कर लगाते दिखे.
केपलर की एक उड़ान ने वैज्ञानिकों को पृथ्वी के जुड़वां ग्रह तक तो पहुंचा दिया. अब कल्पना की दूसरी उड़ान उन्हें उस धरातल पर उतार भी सकती है.
रिपोर्टः रॉयटर्स, एपी/ए जमाल
संपादनः महेश झा
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